Thursday, September 12, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ६: स्पिलो से नाको

६: स्पिलो से नाको
 

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३१ जुलाई शाम को स्पिलो में होटलवाले युवकों‌ से अच्छी‌ बात हुई| यहाँ‌ से अब बौद्ध समुदाय ही मुख्य रूप से हैं| रहन- सहन और खाना भी लदाख़ जैसा लग रहा है| किन्नौर के इस दूरदराज के क्षेत्र में गाँव यदा कदा ही होते हैं| इसलिए हर एक गाँव में होटल, राशन, होम स्टे, बैंक आदि सब सुविधाएँ होती हैं| यहाँ पर पहले ब्लास्टिंग और सड़क की स्थिति का पता किया| मेरे जाने के बाद परसो स्पिलो के कुछ आगे ब्लास्टिंग किया जाएगा| सड़क फिलहाल तो ठीक है| स्पिलो में अच्छा नेटवर्क मिल रहा है, इसलिए आगे के रूट के बारे में कुछ पता किया| जब इंटरनेट पर पूह (पू) गाँव के बारे में देखा, तो पता चला कि १९०९ में‌ यहाँ तक- हिमालय में इतने अन्दर तक एक विदेशी‌ आया था और उसने निरीक्षण किया कि पूह (पू)‌ में सभी लोग तिब्बती बोलते हैं! अगले दिन याने १ अगस्त को मुझे वही‌ं से जाना है| सुबह निकलने के पहले जब प्रेयर व्हील के पास टहल रहा था, तब कुछ लोगों ने मुझसे बात की| उन्होने मेरे अभियान के बारे में जानना चाहा, बाद में रूचि भी ली| श्री नेगी जी से बात हुई| उन्होने मुझे आज के नाको के होटल का भी सम्पर्क दिया| मुझे शुभकामनाएँ भी दी| सुबह आलू- पराठे का नाश्ता करने के बाद निकला| आज शायद बीच में होटल कम ही लगेंगे, इसलिए बिस्कीट और केले भी ले लिए| कल के मुकाबले आज अच्छी धूप खिली है, आसमाँ नीला नजर आ रहा है| स्पिलो छोडते समय तो मुस्कुरा रहा हूँ....







Monday, September 9, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ५: टापरी से स्पिलो

५: टापरी से स्पिलो

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३१ जुलाई! टापरी में सतलुज की गर्जना के बीच नीन्द खुली| कल की साईकिल यात्रा क्या रही थी! और सड़क कितनी अनुठी थी! आज भी यही क्रम जारी रहेगा| अब मन बहुत प्रसन्न एवम् स्वस्थ है| एक दिन में बहुत फर्क लग रहा है| कल डर लग रहा था कि कहाँ आ फंसा हूँ| तब समझाना पड़ा था कि अरे तू तो कुछ दिनों के लिए ही यहाँ होगा, यहाँ के स्थानीय लोग और मिलिटरी के लोग तो कैसे रहते होंगे, सड़क की अनिश्चितताओं को कैसे सहते होंगे| कल ऐसा खुद को कहते कहते ही साईकिल चलाई थी| लेकीन आज तो अब खुद को खुशकिस्मत मान रहा हूँ कि इन सड़कों पर साईकिल चलाने का मौका मिल रहा है| एक तरह से जीवन की आपाधापी, तरह तरह के उलझाव, पहले शिक्षा और बाद में करिअर के दबाव इन सबमें जो जवानी जीना भूल गया था, उसे जीने का यह मौका लग रहा है! आज जाना है स्पिलो को जो लगभग अठावन किलोमीटर दूर होगा| आज भी सड़क बहुत मज़ेदार होगी!








Wednesday, September 4, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ४: रामपूर बुशहर से टापरी

४: रामपूर बुशहर से टापरी
 

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२९ जुलाई की शाम रामपूर बुशहर में बिताई| दो दिन शिमला और नार्कण्डा में ठहरने के बाद यहाँ बहुत गर्मी हो रही है| शाम को कुछ समय के लिए लगा कि बुखार तो नही आया है| उस दिन ठिक से विश्राम नही हो पाया| रात बारीश भी हुई| ३० जुलाई की सुबह नीन्द खुली तो नकारात्मक विचार मन में हैं| शायद ठीक से विश्राम नही हो पाया है और शरीर जब ताज़ा नही होता, तो मन भी ताज़ा नही हो सकता है| दो दिनों की ठण्डक के मुकाबले यह गर्मी कुछ भारी पड़ रही है| बुखार जैसी स्थिति में क्या मै आगे चला पाऊँगा? बारीश के भी आसार लग रहे हैं| कुल मिला कर जब भी ऐसी साईकिल यात्रा की है, पहले दिन मन में जो तनाव होता है; जो शंकाएँ होती हैं, वो सब आज तिसरे दिन मन में हैं| कुछ समय के लिए लगा भी कि शायद आज टापरी जा भी नही पाऊँगा और उसके पहले ही झाकड़ी में ही हॉल्ट करना पड़ेगा| धीरे धीरे हिम्मत बाँधी| सामान भी साईकिल पर बान्धा| पहले दो दिन मै स्पेअर टायर को सीट के नीचे रख रहा था| पेडल चलाते समय वह पैर को चुभ रहा था| अभी उसको सामने हैंडल पर एडजस्ट कर दिया| ऐसे ही बाकी शंकाओं को भी थोड़ा एडजस्ट कर दिया| गेस्ट हाऊस में पराठा खा कर निकलने के लिए तैयार हुआ| जैसे ही निकला, सतलुज की गर्जना फिर तेज़ हुई| हल्की हल्की बून्दाबान्दी भी हो रही है| मन का एक हिस्सा तो बारीश भी चाहता है| क्यों कि अगर बारीश नही होती है, तो यहाँ की गर्मी में साईकिल चलाना कठीन ही होगा| उससे अच्छा है कि कुछ बारीश आ जाए|







Monday, August 26, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ३: नार्कण्डा से रामपूर बुशहर


३: नार्कण्डा से रामपूर बुशहर
 

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२९ जुलाई! इस यात्रा का दूसरा दिन| आज नार्कण्डा से रामपूर बुशहर की तरफ जाना है| कल नार्कण्डा में अच्छा विश्राम हुआ| रात बारीश भी हुई| २७०० मीटर से अधिक ऊँचाई पर रात में कोई दिक्कत नही हुई| और वैसे आज का दिन एक तरह का आसान चरण भी है, क्यों कि आज बिल्कुल चढाई नही है, वरन् बड़ी उतराई है| सुबह चाय- बिस्कीट और केले का नाश्ता कर रेस्ट हाऊस से निकला| नार्कण्डा में कई घर और दुकानों पर 'ॐ मणि पद्मे हुं' मन्त्र लगे हुए हैं! सुबह के लगभग आठ बजने के बाद भी बाहर बहुत कोहरा- धुन्द है| बारीश तो रूक गई है, लेकीन रोशनी बहुत कम है| नीचे बादल दिखाई दे रहे हैं| नार्कण्डा से आगे बढ़ते ही उतराई शुरू होती है| जैसे ही उतराई शुरू हुई, सड़क बादलों के बीच घिर गई| जैसे सड़क नीचे उतरने लगी तो बिल्कुल बादलों का समन्दर शुरू हुआ| विजिबिलिटी बिल्कुल ही कम है| मुश्किल से दस कदमों तक दिखाई दे रहा है| साईकिल पर टॉर्च लगाया| सभी वाहन रोशनी और इमर्जन्सी लाईट लगा कर ही चल रहे हैं! इस तरह की कम रोशनी बड़ी कठिन होती है| अगर पूरी रात हो, तो भी एक तरह से आसानी होती है| धीरे धीरे कुछ बून्दाबान्दी हुई और ठण्ड भी बढ़ गई| तब चेहरे पर मास्क लगा कर आगे बढ़ने लगा| पेडल मारने की जरूरत तो बिल्कुल नही है| यही उतराई अब सीधा शतद्रू अर्थात् सतलुज के करीब आने तक जारी रहेगी!







Monday, August 19, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति २: शिमला से नार्कण्डा

२: शिमला से नार्कण्डा 

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२५ जुलाई को ट्रेन से स्पीति- लदाख़ साईकिल यात्रा के लिए निकला| ट्रेन पर मुझे छोडने के लिए कई साईकिल मित्र और परिवारवाले आए| ट्रेन में चढ़ कर जल्द ही साईकिल का थैला बर्थ के नीचे रख दिया| बहुत आसानी से फोल्ड की हुई साईकिल और उसी थैले में काफी सामान भी बर्थ के नीचे चला गया! इससे बड़ी राहत मिली| अब साईकिल ट्रेन में से आसानी से ले जा सकता हूँ! साईकिल इस तरह फोल्ड करने के लिए उसका कैरीयर, दोनों पहिए, स्टैंड, सीट और दोनों पेडल निकालने पड़ते हैं| कल साईकिल इस तरह से थैले में भरने के लिए भी मित्रों ने सहायता की| अगले दो दिनों में शिमला तक की यात्रा करूंगा और उसके बाद २८ जुलाई से साईकिल चलाऊँगा| प्रयासपूर्वक मन को वर्तमान में ही रखा और ट्रेन की यात्रा का आनन्द लेने लगा|






Thursday, August 15, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति १: प्रस्तावना

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति १: प्रस्तावना
 

सभी को नमस्कार! हाल ही में किन्नौर- स्पीति यात्रा साईकिल पर की| इसके बारे में अब विस्तार से लिखना आरम्भ कर रहा हूँ| हर साईकिल यात्रा काफी कुछ सीखा जाती है, समृद्ध कर जाती है| इस यात्रा में भी बहुत कुछ सीखने को मिला| एक तरह से स्पीति में साईकिल चलाने का सपना भी पूरा हुआ| यह साईकिल यात्रा सिर्फ एक साईकिल यात्रा न हो कर एक सामाजिक उद्देश्य होनेवाली यात्रा थी| स्वास्थ्य, फिटनेस, पर्यावरण इन बातों के बारे में जागरूकता का मैसेज दिया जाना तथा इन्ही विषयों पर विभिन्न लोगों और समूहों से बात करना भी इसका एक अंग था| पुणे की संस्था मंथन फाउंडेशन, रिलीफ फाउंडेशन और अन्य संस्थाएँ तथा सहयोगियों का कई तरह का सहयोग इस सोलो साईकिल यात्रा के लिए मिला| एक तरह से यह एक नई पहल थी| समाज के सहयोग के साथ और सामाजिक उद्देश्य को ले कर यह यात्रा हुई| इसके बारे में अलग अलग सोच हो सकती है| किसी को ऐसा भी लग सकता है साईकिल यात्रा करनी हो तो अपने ही बल पर क्यों नही करते, संस्था का और अन्य व्यक्तियों का सहयोग क्यों लेना चाहिए| यह भी एक राय हो सकती है| मेरे विचार से मैने इस बार थोड़ा नया करने की कोशिश की| एक विचार और एक थीम ले कर कई लोगों के पास गया| पुणे की मंथन फाउंडेशन और रिलीफ फाउंडेशन इन दो संस्थाओं ने इस अभियान और उसके सामाजिक मैसेज में रूचि ली| उनके अपील पर कई और संस्थाएँ और व्यक्तियों ने भी इसमें रुचि ली| इसमें और एक बात भी है| जब मै अकेला साईकिल चलाता हूँ, तो वह मेरे तक या सिर्फ मेरे सोशल मीडीया तक सीमित रहता है| लेकीन जब मै किसी संस्था के साथ, व्यापक समाज के सामने आ कर साईकिल चलाता हूँ, तो वह ज्यादा लोगों तक पहुँचता है| प्रिंट मीडिया से और अधिक अनुपात में सोशल मीडिया में आने से कई लोगों तक यह विचार पहुँचता है| और जहाँ तक यात्रा के खर्च में सहयोग का मुद्दा है, यह सहयोग बहुत आंशिक होता है| इस यात्रा के प्रत्यक्ष यात्रा में होनेवाले अनुमानित खर्च के लिए संस्थाएँ और व्यक्तियों से सहयोग मिला| लेकीन काफी खर्च तो अप्रत्यक्ष होता है- जैसे मैने यात्रा की तैयारी के लिए कई महिनों तक जो राईडस की, जो अभ्यास किए उसका खर्च तो अलग ही होता है| या छुट्टियों की वजह से भी जो एक तरह का आर्थिक नुकसान होगा, वह भी तो होता ही है| खैर|



Thursday, July 25, 2019

स्पीति- लदाख़ साईकिल यात्रा!

पुणे की मंथन फाउंडेशन द्वारा दुर्गम प्रदेश- स्पीति एवम् लदाख़ में सोलो साईकिल अभियान
पुणे स्थित मंथन फाउंडेशन यह स्वयंसेवी संस्था स्वास्थ्य और पर्यावरण पर काम करती है| यह सोलो साईकिल अभियान स्पीति व लदाख़ में होगा जहाँ अत्यधिक दुर्गम मानी जाती है| स्पीति और लदाख़ में सड़क की ऊँचाई ५००० मीटर्स से अधिक होती है और ऐसी उंचाई पर ऑक्सीजन का अनुपात ५०% से कम होता है| यहाँ चलना भी कठिन होता है| ऐसे दुर्गम क्षेत्र में यह सोलो साईकिल अभियान किया जाएगा और वह शिमला से २८ जुलाई को शुरू होगा और शिमला- नार्कंडा- रामपूर- टाप्री- स्पेलो- नाको- ताबो- काजा- लोसर- बाटाल- ग्राम्फू- केलाँग- पांग- त्सो कार- लेह इस रूट पर पूरा किया जाएगा और सम्भवत: १७ अगस्त को साईकिलिस्ट निरंजन वेलणकर (मोबाईल क्रमांक 09422108376) लेह पहुँच जाएगा| हर रोज औसतन ६० किलोमीटर साईकिल चलाने की योजना है|

इस अभियान के उद्देश्य

1. साईकिल यह स्वास्थ्य और फिटनेस का संदेश देनेवाला माध्यम है|

2. साईकिल चलाना पर्यावरण- अनुकूल जीवनशैलि की ओर ले जानेवाला एक कदम है| पर्यावरण के प्रति आदर और पर्यावरण संवर्धन का संदेश उसमें दिया जाता है|

3. स्पीति और लदाख़ भारत के दुर्गम क्षेत्र हैं और वहाँ का लोकजीवन वैविध्यपूर्ण है| यहाँ साईकिल चलाते समय स्थानीय लोगों के साथ संवाद किया जा सकता है|

4. यहाँ साईकिल चलाना एक तरह से राष्ट्रीय एकात्मता और विविधता में एकता भी दर्शाता है|

5. ये हिस्से सीमा से सटे होने के कारण यहाँ साईकिल चलाते समय आर्मी के जवानों से भी मिलना होता है और उनसे अनौपचारिक संवाद भी किया जा सकता है| ये कितने विपरित स्थिति में काम करते हैं, यह जाना जा सकता है| उनसे मिलना भी उन्हे किया जानेवाला एक तरह का सैल्यूट ही है|

सोलो साईकिल योजना

यह सोलो साईकिलिंग सपोर्ट वाहन के बिना की जाएगी| उसकी शुरुआत शिमला में होगी और उसका समापन लेह, जम्मू- कश्मीर में होगा| लगभग २५ दिनों में साईकिलिस्ट १२०० किलोमीटर की दूरी तय करेगा और जगह जगह लोगों से और स्थानीय संस्थाएँ/ कार्यकर्ताओं से मिलेगा| उपर बताए गए विषयों पर मंथन करना भी उसमें होगा| अभियान पूरा होने के बाद साईकिलिस्ट यह अनुभव विविध फोरम्स पर लोगों के साथ साझा करेगा|

इस साईकिल यात्रा को रिलीफ फाउंडेशन, महा एनजीओ फेडरेशन, माहिती सेवा समिती, हरित सेना, महाराष्ट्र आदि विविध संस्थाओं का और कई व्यक्तियों का सहभाग मिला है|

मंथन फाउंडेशन सम्पर्क क्रमांक: आशा भट्ट 07350016571.
साईकिलिस्ट: निरंजन वेलणकर 09422108376

Tuesday, July 23, 2019

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी- १४ (अन्तिम): जीवनशैलि में दौड़ने का अन्तर्भाव

१४ (अन्तिम): जीवनशैलि में दौड़ने का अन्तर्भाव
 

डिस्क्लेमर: यह लेख माला कोई भी टेक्निकल गाईड नही है| इसमें मै मेरे रनिंग के अनुभव लिख रहा हूँ| जैसे मै सीखता गया, गलती करता गया, आगे बढता गया, यह सब वैसे ही लिख रहा हूँ| इस लेखन को सिर्फ रनिंग के व्यक्तिगत तौर पर आए हुए अनुभव के तौर पर देखना चाहिए| अगर किसे टेक्निकल गायडन्स चाहिए, तो व्यक्तिगत रूप से सम्पर्क कर सकते हैं|

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मुम्बई मैरेथॉन पूरी होने के बाद यह तय किया कि रनिंग तो जारी रखनी ही है, लेकीन महिने में एक लाँग रन करना है| तभी मैरेथॉन फिटनेस/ स्टैमिना बरकरार रहेगा| इसलिए जनवरी के बाद मार्च में एक बार २५ किलोमीटर दौड़ की और उसके बाद अप्रैल में २२ किलोमीटर दौड़ की| छोटे रन्स भी जारी रहे| और साईकिल चलाना,  चलना, योग, स्ट्रेंदनिंग आदि तो अब जीवन का हिस्सा बन चुके हैं| और अब उन्हे 'करने की' जरूरत नही पड़ती है| बल्की अब उन्हे न किए बिना चलता ही नही है|  



Friday, July 19, 2019

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी- १३: मुंबई मैरेथॉन के अन्य पहलू

१३: मुंबई मैरेथॉन के अन्य पहलू
 

डिस्क्लेमर: यह लेख माला कोई भी टेक्निकल गाईड नही है| इसमें मै मेरे रनिंग के अनुभव लिख रहा हूँ| जैसे मै सीखता गया, गलती करता गया, आगे बढता गया, यह सब वैसे ही लिख रहा हूँ| इस लेखन को सिर्फ रनिंग के व्यक्तिगत तौर पर आए हुए अनुभव के तौर पर देखना चाहिए| अगर किसे टेक्निकल गायडन्स चाहिए, तो व्यक्तिगत रूप से सम्पर्क कर सकते हैं|

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जनवरी २०१९ की मुम्बई मैरेथॉन! ए दिल है मुश्किल यहाँ, जरा हट के जरा बचके ये है बम्बई मैरेथॉन! अपेक्षाकृत एक तरह से यह ईवंट कुछ हद तक डरावनी लगती रही| और ईवंट की तुलना में बाकी चीजें- जैसे मुम्बई में यात्रा करना, मैरेथॉन के लिए बिब कलेक्शन आदि चीजें मानसिक रूप से थोड़ी थकानेवाली लगी| मैरेथॉन की पूर्व संध्या तक बहुत तनाव लगा, लेकीन जब उस विषय पर बहुत बातचीत हुई, बार बार उस पर सोचा गया, तो एक समय आया कि मन उस तनाव से हल्का हुआ| या एक तरह से उस विषय से थक गया/ बोअर हुआ| उससे राहत मिली| और बाद में मैरेथॉन तो बहुत ही अच्छी रही| इस लेखमाला के पहले लेख में उस मैरेथॉन के अनुभव बता चुका हूँ|

अब चर्चा करता हूँ उसके कुछ अन्य पहलूओं की| सबसे बड़ी बात तो लोगों द्वारा दिया जानेवाला प्रोत्साहन- लगातार घण्टों तक सड़क पर खड़े रहना और पानी, एनर्जाल, फल आदि देते रहना बहुत बड़ी बात है| यह एक मुंबई का कल्चर का हिस्सा लगा| मैरेथॉन का रूट जापानी दूतावास के पास से जाता है, तो वे लोग भी आए थे| इसी मैरेथॉन के दौरान राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय एलिट रनर्स (रेसर) भी देखने को मिले| आम रनर्स से दो घण्टा बाद में शुरू कर भी वे बहुत जल्द रेस पूरी कर गए! मेरे जैसे आम रनर और वे रेसर्स इनमें शायद संजय मंजरेकर और विरेंदर सेहवाग के स्ट्राईक रेट जितना अन्तर होगा!



फोटो: इंटरनेट से साभार


मैरेथॉन के उत्तरार्ध में सड़कों पर बहुत कुछ फेंका गया| कई बोतलें, एनर्जाल आदि के पाउच भी रनर्स फेंकते गए| उससे कुछ हद तक सड़क भी फिसलनेवाली हो गई| पानी पिने के बाद वजन नही ढोना पड़े इसलिए रनर्स उसे फेंकना था तो कूड़ेदान में भी फेंक सकते थे, लेकीन ऐसा शायद कम हुआ| बाद में तो कूड़े का ढेर लग गया| बेचारे वालंटीअर्स उसे सम्भालने का प्रयास करते दिखे|

Tuesday, July 2, 2019

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी- १२: मुंबई मैरेथॉन की तैयारी

१२: मुंबई मैरेथॉन की तैयारी
 

डिस्क्लेमर: यह लेख माला कोई भी टेक्निकल गाईड नही है| इसमें मै मेरे रनिंग के अनुभव लिख रहा हूँ| जैसे मै सीखता गया, गलती करता गया, आगे बढता गया, यह सब वैसे ही लिख रहा हूँ| इस लेखन को सिर्फ रनिंग के व्यक्तिगत तौर पर आए हुए अनुभव के तौर पर देखना चाहिए| अगर किसे टेक्निकल गायडन्स चाहिए, तो व्यक्तिगत रूप से सम्पर्क कर सकते हैं|

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नवम्बर २०१८ में फिर एक बार लाँग रन्स शुरू किए| २० जनवरी २०१९ की मैरेथॉन के लिए तैयारी करनी है| उसके पहले एक बार ३६ किलोमीटर तक मुझे पहुँचना है| अगस्त- सितम्बर में जब लगातार हर हफ्ते २५- ३० किमी दौड़ा था, तो दिक्कत हुई थी और इंज्युरी भी हुई थी| इसलिए इस बार सोचा कि हर हफ्ते के बजाय हर पखवाड़े लाँग रन करूँगा और बीच बीच में छोटे रन ही करूँगा| इसके साथ मैरेथॉन के पहले कुछ चीजें भी थोड़ी ठीक करनी है| शूज का निर्णय लेना है और तकनीक भी थोड़ी ठीक करनी है| इसी समय मेरे रनिंग के मार्गदर्शक बनसकर सर ने मुझे अदिदास के शूज गिफ्ट किए| मेरे लिए वह बिल्कुल अच्छे लगे| अब इन शूज के साथ लाँग रन कर के देखना होगा| साथ ही एक तरह से २५ किलोमीटर के बाद जो दिक्कत आती है, उसे भी पार करना है|

कई रनर्स के साथ इसके बारे में चर्चा भी कर रहा हूँ| २५ किलोमीटर के बाद रनिंग करना कठिन होता है और चलना पड़ता है, इसके कई कारण हो सकते हैं| जैसे ठीक डाएट ना होना, रनिंग की तकनीक गलत होना या मानसिक अवरोध भी! उस तरह से कुछ बदलाव भी करता गया| प्रोटीन का इन्टेक बढ़ाया| कुछ और व्यायाम शुरू किए| इसी दौरान बनसकर सर ने मुझे पुश अप्स करने की ट्रिक भी बताई| पहले कभी भी पुश अप्स नही किए थे, इसलिए उन्हे करना बहुत कठिन लग रहा था| क्यों कि उसमें पूरे शरीर का आधा वजन दो हाथों पर उठाना होता है| तब सर ने मुझे एक बार रनिंग के बाद एक फूट या दो फूट ऊँची फर्श पर पुश अप करने के लिए कहे| वे मै कर पाया| उसी से धीरे धीरे वह ट्रिक आ गई और वह क्षमता भी आ गई| रनिंग के लिए कुछ जिम के अभ्यास, योग, प्राणायाम, चलना, साईकिलिंग बहुत उपयोगी है| मसल्स भी तैयार होते हैं, स्टैमिना भी बढ़ता है| इसी कारण इस दौरान बड़े बड़े वॉक भी किए और आगे भी करता रहा| इससे फास्ट वॉकिंग की स्पीड भी बढ़ गई और २५ किलोमीटर या ३० किलोमीटर की दूरी के बाद चलना भी पड़े तो आसानी से बाकी की दूरी पार कर लूँगा, यह हौसला मिला|