Monday, January 17, 2022

हिमालय की गोद में... (कुमाऊँ में रोमांचक भ्रमण) ८: गाँव के जीवन की झलक


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१ नवम्बर का दिन| सत्गड की ठण्डी सुबह! परसो की यात्रा के बाद अब पेट को थोड़ी तकलीफ हो रही है| अत्यधिक ठण्ड, यात्रा में थकान और होटल का खाना, इससे अन्त में तकलीफ हुई| इसलिए कुछ विश्राम करने का मन हुआ| लेकीन दिक्कत इतनी नही थी जिससे रोज का घूमना छूट जाए| इसलिए थोड़ी देर बाद सत्गड से नीचे आ कर सड़क पर टहलने के लिए निकला| तेज़ वॉक करते करते ठिठुरन कम हुई और अच्छा महसूस हुआ| कुछ दूरी पर जा कर वापस निकला| इसी सड़क पर हमारे एक रिश्तेदार का होटल है| उनके पास चाय ली| घर के लिए आलू पराठे पार्सल लिए| उनके साथ अच्छी बातें भी हुईं|

 

Monday, January 3, 2022

हिमालय की गोद में... (कुमाऊँ में रोमांचक भ्रमण) ७: सत्गड- कनालीछीना ट्रेक

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३१ अक्तूबर की सुबह! गूंजी से वापस आने के बाद सत्गड की ठण्ड कितनी सुखद लग रही है| सुबह की मिठी धूप लेते समय बहुत अच्छा लग रहा है|‌ गूंजी की अनुगूँज अब भी मन में सुनाई‌ दे रही है और वह इतनी जल्द रूकनेवाली भी नही है! लगातार दो दिनों की थकानेवाली यात्रा के बाद सभी को विश्राम चाहिए| गूंजी की‌ यात्रा जीप से की थी, फिर भी‌ वह ट्रेकिंग जैसे ही थकानेवाली है| इसलिए आराम तो करना है ही| लेकीन इतना शानदार पहाड़ और प्राकृतिक सुन्दरता पास हो तो घूमने का मन तो होगा ही| तैयार हो कर घूमने के लिए निकला| साथ में होनेवाले दोस्त और बाकी लोगों को कनालीछीना इस पास के गाँव में किसी से मिलने जाना है| इसके अनुसार मैने मेरे ट्रेकिंग का प्लैन बनाया| कनालीछीना गाँव सड़क से छह किलोमीटर की दूरी पर है| लेकीन वहाँ से आते समय ट्रेक की एक पगडण्डी आती है| बिल्कुल गाँवों के बीच से आती हुई पगडण्डी| संयोग से मुझे कनालीछीना की स्कूल में जानेवाले एक लड़के का साथ भी मिल रहा है| ऐसी पगण्डण्डियों पर जानकार होना जरूरी है, अन्यथा दिशाएँ समझ में नही आती हैं| इस तरह आज का ट्रेकिंग तय हुआ| फैमिली‌ और ग्रूप साथ होने से समय की सीमा तो है, लेकीन उसमें भी अच्छा खासा घूमना हो रहा है|




Monday, December 27, 2021

हिमालय की गोद में... (रोमांचक कुमाऊँ भ्रमंती) ६: गूंजी का हँगओव्हर

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२९ अक्तूबर की रात गूंजी‌ में सभी के लिए कठीन रही! एक तो अत्यधिक ठण्ड थी, साथ ही ऊँचाई लगभग ३३०० मीटर होने के कारण साँस लेने में भी कुछ दिक्कत हो रही थी| इसी कारण सोते समय कंबल सिर के उपर लेना सम्भव नही था, उसमें खतरा था| सभी लोग एक ही कमरे में अधिकसे अधिक कंबल आदि ले कर सोए| कितने अप्रत्याशित जगह पर हम है! और बिल्कुल भी अनप्लैन्ड तरीके से! लेकीन यह भी सच है कि अगर प्लैन किया होता तो शायद हम आते ही नही| क्यों कि सभी लोग उस अर्थ में घूमक्कड़ या ट्रेकर नही हैं| टूरीस्ट ही हैं| इसीलिए प्लैन नही किया, इसी लिए आ पाए| सभी लोग एक ही कमरे में होने से कुछ गर्मी मिली और छत लकड़ी का होने से भी लाभ मिला| हालांकी ठीक से नीन्द किसी की भी नही हुई| भोर होते होते सब जग गए थे| यहाँ के भोर का आकाश छूट न जाए, इसलिए मै बाहर आया! चाँद आसमाँ में‌ आया है और उसकी रोशनी में पास के शिखर अच्छे से चमक रहे हैं| बादल है, इसलिए तारे उतने ज्यादा नही दिखे|‌ लेकीन ठण्ड से उंगलियाँ जैसी ठिठुर गई हैं| और उससे भी बड़े मज़े की बात तो होटल के द्वार के पास रखी हुई बकेट का पानी जम गया है!! रात में होटलवाले ने थोड़ा दूर होनेवाला बाथरूम दिखाया था| वहाँ अन्दर प्लास्टीक के ड्रम का पानी लेकीन नही जमा है| उस ठण्ड में ब्रश करना भी टेढ़ी खीर है| जैसे तैसे अनिवार्य चीज़ें निपटा दी| कुछ मिनटों तक उंगलियाँ अकड़ सी गई थी| और साँस छोड़ना तो जैसे धुम्रपान ही बन गया है|





Wednesday, December 22, 2021

हिमालय की गोद में... (रोमांचक कुमाऊँ भ्रमंती) ५: है ये जमीं गूंजी गूंजी!


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२९ अक्तूबर की दोपहर! धारचुला पार करते ही मोबाईल नेटवर्क चला गया| अब सड़क भी पहाड़ में उपर उठ रही है और संकरी हो रही है| गूंजी जाना है, लेकीन सड़क कितनी दूर तक चल रही है, इसका अन्दाज़ा नही है| यहाँ के जानकार बता रहे हैं कि गूंजी तक अब गाडी चलती है| लेकीन मुझे शक है| इसलिए इसके आगे जो भी मिलेगा, पूरी तरह अप्रत्याशित होगा| तवा घाट के पास हमें एक परिचित मिले, वे सड़क पर हमारे लिए ही रूके थे| वे एक अर्थ में हमारी इस गूंजी यात्रा के संयोजक थे| उन्होने ही कहा था कि गूंजी जाईए, ॐ पर्वत देख आईए| वे हमारे लिए रूके थे और मिलते ही उन्होने हमारी गाडी चलाना शुरू किया| धीरे सड़क टूटने लगी थी, इसलिए हमारे ड्रायवर को उनके आने से राहत मिली| अब शुरू होता है एक रोमांचकारी यात्रा! 




यहाँ जॉईन हुए जितू जी वैसे तो पेशे से ड्रायवर हैं, लेकीन बिल्कुल ऑल राउंडर इन्सान| ड्रायवर, टूअर ऑपरेटर, टूरीस्ट गाडी, किसान, ट्रेकर इन सबमें कुशल| उन्होने फिर गूंजी के बारे में जानकारी दी| एक बार मैने उनसे पूछा कि अगर वास्तव में गूंजी तक जाया जात हो, तो इनर लाईन परमिट लगता होगा ना| उस पर उन्होने कहा कि उनकी पहचान है, इसलिए नही‌ लगेगा| फिर यहाँ की भीषण सड़कें, ड्रायवर्स कैसे चलाते हैं इसको ले कर वे बात करते रहें| तवा घाटच्या के कुछ आगे गूंजी की सड़क का अन्तिम होटल होनेवाला गाँव लगा| वहाँ दल- सब्जी राईस खा लिया| अब लोगों के चेहरे की शैलि में फर्क साफ नजर आ रहा है! और अब सड़क पर वाहनों में अधिक वाहन मिलिटरी के वाहन हैं!


 


Tuesday, December 14, 2021

हिमालय की गोद में... (कुमाऊँ में रोमांचक भ्रमण) ४: गूंजी की ओर प्रयाण...

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२८ अक्तूबर की सुबह बुंगाछीना- अग्न्या परिसर में अच्छा ट्रेक हुआ| यह गाँव ठीक पहाड़ के बीचोबीच है| बस बैठ कर नजारों को आँखों में संजोना है! सबके साथ बातें हो रही हैं| बातों बातों में बाघ के बारे में बहुत कुछ सुनने में आया| यहाँ उत्तराखण्ड और कुमाऊँ में शेर अक्सर दिखाई देते हैं| शेर यहाँ बिल्कुल भी अपरिचित नही है| बल्की तो नरभक्षक शेरों की कहानियाँ और उनकी शिकार करनेवाला विख्यात शिकारी जिम कॉर्बेट की कर्म भूमि कुमाऊँ ही है| हाल ही के वर्षों में शेर की दहशत फिर से बढ़ रही है| एक समय तो शेर थोड़े कम हो गए थे| जंगल जैसे टूटता गया, वैसे वन्य प्राणियों पर मुश्कील समय आया| उसमें शेर भी थे| लेकीन अब फिर से उनकी दहशत बढ़ गई है| सत्गड़ और इस अग्न्या जैसे गाँवों में भी शेर आता है और दिन में जो गाँव सुहावना और रमणीय लगता है, वह रात में सुनसान हो जाता है! रात में कोई आँगन के बाहर तक नही जाता है!


 

Monday, December 6, 2021

हिमालय की गोद में... (कुमाऊँ में रोमांचक भ्रमण)३: अग्न्या और बुंगाछीना गाँव में ट्रेक

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२७ अक्तूबर! रात जल्द सोने से नीन्द जल्द खुली| बड़ी भयंकर ठण्ड है! लेकीन भोर का माहौल और आकाश भी देखनी की बड़ी इच्छा है| इसलिए ठिठुरते हुए बाहर आया| आसमान में तारों के खूबसूरत नजारे हैं| अष्टमी का चन्द्रमा ठीक उपर है, जिससे सितारे कुछ कम दिखाई दे रहे है| कुछ देर तक मेरे छोटे टेलिस्कोप से आकाश दर्शन किया| सुबह भी नही हुई है और घर घर लोग उठे हुए दिखाई दे रहे हैं| सत्गड का आज दूसरा दिन| लेकीन आज यहाँ से दूसरे गाँव में जाना है| वापस यही आएंगे, इसलिए थोड़ा ही सामान ले जाएंगे| सब उठ कर तैयार होने के पहले जैसे तैसे सुबह का टॉर्चर- टास्क निपट दिया और छोटे ट्रेक के लिए निकला|





























Thursday, December 2, 2021

हिमालय की गोद में... (कुमाऊँ में रोमांचक भ्रमण) २: सत्गड परिसर में भ्रमण

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२६ अक्तूबर का दिन! अत्यधिक थकानेवाली यात्रा के बाद अच्छी नीन्द हुई| अलार्म ऑफ करने के बावजूद सुबह जल्दी नीन्द खुली| उजाला होने के पहले ही बाहर आया| अहा हा! सामने एक ही नजर में शब्दश: हजारो वृक्ष और घनी हरियाली! सत्गड से एक ही नजर में करीब तीन हजार देवदार वृक्ष तो दिख ही रहे हैं! अब पता चल रहा है कि हम देर रात कहाँ आए हैं| और महसूस हो रहा है कि हम कितने किस्मतवाले हैं| यहाँ के परिसर और दृश्यों का आनन्द लेते समय बड़ी ठिठुरन हो रही है| ब्रश करना भी जैसे एक टास्क है| टास्क नही, टॉर्चर! सुबह का फ्रेश होना सज़ा जैसे लग रहा है| ठण्ड पानी अत्यधिक ठण्डा जैसे वह जला रहा है| बड़ा दाह लग रहा है| दो दिनों की यात्रा के कारण कम से कम आज नहाना आवश्यक है| थोड़ी देर बाद सूर्य उपर आने पर और तपमान थोड़ा बढ़ने पर नहा लिया| लेकीन नहाने के लिए हुआ उबलता पानी भी सौम्य नही, शीतल लग रहा है! अर्थात् अत्यधिक ठण्डा पानी जला रहा है और उबलता हुआ पानी शीतल लग रहा है!



 

 

 

 

 

 


 

 

 

 

 

 


 

 

 

 

 

 

 

 

Tuesday, November 30, 2021

हिमालय की गोद में... (कुमाऊँ में रोमांचक भ्रमण) १: प्रस्तावना

हिमालय की गोद में... (कुमाऊँ में रोमांचक भ्रमण) १: प्रस्तावना

सभी को नमस्कार| हाल ही में उत्तराखण्ड के कुमाऊँ क्षेत्र में घूमने का अवसर मिला| यह एक तरह का संयोग होता है और अगर किस्मत में हो, तो ही इस तरह का घूमना होता है| अन्यथ कितनी भी योजना बना के घूमना नही होता है| हिमालय में घूमने की यह दसवी बारी थी| इस बार मौसम बहुत स्वच्छ था, इसलीए दूर के बर्फ शिखर दिखाई दे रहे थे| कई जगहों पर ट्रेकिंग कर सका| और सबसे बड़ी बात दुर्गम मानस सरोवर- कैलाश पर्वत मार्ग पर गूंजी और काला पानी जैसे स्थानों तक की दुर्गम यात्रा हो सकी| पीछले वर्ष २०२० में ही यहाँ जीप की सड़क बनी है| सड़क नही, जीप का ट्रेक ही है! वहाँ जाने का रोमांचकारी अनुभव मिला| वहाँ जाना जीप के लिए और जीप के ड्रायवर के लिए तो हॉलीवूड मूवी जैसा था| कई हॉलीवूड मूवीज में नही, कोई साहसिक मुहीम दिखाते हैं| ज्ल्द ही वह भटक जाती है और वह एक सर्वायवल मिशन बनता है! गूंजी और काला पानी का जीप ट्रेक ऐसा ही सर्वायवल मिशन बना! उसके बारे में विस्तार से लिखूँगा|
 


 

 

 

 

 

 

 


 

 

 

 

 

 

 

Friday, June 4, 2021

"राज" और "सिमरन": एक प्लॅटफॉर्म की कहानी


किसी रेल्वे जंक्शन का प्लॅटफॉर्म| वहाँ कई लोग ट्रेन में बैठ कर  यात्रा के लिए निकलते हैं| भागे भागे प्लॅटफॉर्म पर आते हैं, ट्रेन पकड़ते हैं और आगे निकल जाते हैं| पर यह सिर्फ रेल्वे स्टेशन पर ही नही घटता है| जीवन में ऐसे कई जंक्शन्स और अनगिनत प्लॅटफॉर्म होते हैं| प्लॅटफॉर्म एक माध्यम है जो हमें आगे ले जाता है| कभी स्कूल एक प्लॅटफॉर्म होता है और वहाँ विद्या मिलती है| कभी दु:ख एक प्लॅटफॉर्म होता है जो हमें आगे जाने के लिए सीखाता है|

जीवन भी एक प्लॅटफॉर्म है| ज्ञानी कहते हैं कि जीवन एक युनिवर्सिटी है| यहाँ इन्सान सीखते सीखते आगे जाता है| उसे एक प्लॅटफॉर्म से दूसरा ऐसे कई प्लॅटफॉर्म और कई ट्रेनें मिलती जाती हैं| ऐसे ही आगे बढ़ते हुए एक दिन साधक या शिष्य को गुरू की ओर ले जानेवाला प्लॅटफॉर्म मिलता है| यह कहानी उस प्लॅटफॉर्म की है| जब पहली बार गुरू साधक को पुकारता है, तब उसे तो भ्रम ही लगता है| लेकीन धीरे धीरे गुरू पुकारता रहता है| उसके बाद अदृश्य जरियों से गुरू शिष्य से मिलता है और उसका साथ देता रहता है| अहंकार और अज्ञान से भरा हुआ शिष्य का घड़ा गुरू एक एक अंजुली से खाली करता जाता है| और यह करते समय छलकने की आवाज़ भी नही होने देता है, कौन जाने, शिष्य नाराज होगा! ऐसा एक न दिखाई देनेवाला सत्संग शुरू होता है| एक सूक्ष्म शल्य- क्रिया शुरू होती है| और जब गुरू शिष्य को अपने पास पुकारता है, तो शिष्य को आना ही होता है| उसे गुरू के पास जाते समय कई बाधाएँ बीच में आ जाती है| उसका पूरा अतीत उसे रोकता है| लेकीन जब गुरू पुकारता है, तो उसे आना ही पड़ता है| शिष्य की इच्छा और आकांक्षाएँ गिर जाती है और सिर्फ गुरू के प्रति समर्पण की इच्छा बचती है| शिष्य की भाव दशा ऐसी हो जाती है-

मेरा है क्या, सब कुछ तेरा

जाँ तेरी, साँसें तेरी

तुने आवाज़ दी देख मै आ गई

प्यार से है बड़ी क्या कसम

या

मेरी आँखों में आँसू तेरे आ गए

मुस्कुराने लगे सारे ग़म

अब यहाँ से कहाँ जाएँ हम

तेरी बाँहों में मर जाएँ हम

Wednesday, May 26, 2021

मृत्यु का दंश

नमस्ते| आप सब कैसे हैं? सभी ठीक होंगे ऐसी आशा करता हूँ| इन दिनों हम जो भुगत रहे हैं, उसके बारे में कुछ विचार शेअर करता हूँ| इन दिनों हम लगातार मृत्यु से जुझ रहे हैं| हम में से कई लोगों ने उनके अपने खोए हैं| कई लोगों ने भीषण यातनाओं को सहा है| हमें वैसे तो आँख खोल कर मौत को देखने के लिए सीखाया नही जाता है| बचपन से ही हमें मौत को जानने ही नही दिया जाता है| मरघट भी गाँव के बाहर होता है और यह विषय कभी भी हमारी बातचीत में नही आता है|

लेकिन जब हम सजग होकर देखते हैं तो पता चलता है कि मौत शाश्वत चीज़ है| बल्की जीवन में मृत्यु जितना कन्फर्म है, उतना कन्फर्म बाकी कुछ भी नही है| धन, प्रतिष्ठा, सुख, सन्तोष, शान्ति ये चीज़ें मिलेगी या नही मिलेगी यह निश्चित कहा नही जा सकता है| लेकीन मौत निश्चित है| किसी का भी टिकट वेटिंग या आरएसी नही है, बल्की बिल्कुल कन्फर्म है| आज बुद्ध पूर्णिमा है| तथागत बुद्ध अपने भिक्षुओं को मौत पर ध्यान करने के लिए मरघट भेजते थे| दो दो महिनों तक वे भिक्षुओं को मरघट भेजते थे और कहते थे कि देखिए मौत को| देखिए जलनेवाली देह जो नष्ट हो रही है| और उसे सजग हो कर देखिए| इससे उन भिक्षुओं को समझ आता था कि, यहाँ अन्य कोई नही, खुद उनकी देह भी मर रही है, ऐसे ही मरनेवाली है|

जब हमारे प्रिय व्यक्ति का मृत्यु होता है, तो एक अर्थ में हमारा भी मृत्यु होता है| क्यों कि वह हमारा हिस्सा होता है या हम उसका हिस्सा होते हैं| इसलिए एक रिक्तता और सुनापन छा जाता है| लेकीन अगर हम सजग हो कर मौत को देख सकें, तो दूसरे व्यक्ति की मौत में हमें खुद की मौत भी दिखाई देती है| समाज ने तो हमें हमेशा से मौत को देखने से दूर रखा है| इसलिए हम खुली आँख से मौत देखना जानते नही है| लेकिन अगर हम थोड़ी हिंमत कर मौत को देख सके, तो होनेवाली हर मौत में हमें खुद की मौत दिखाई देने लगती है| और तब हमे वह सत्य समझता है कि हाँ, यहाँ हर व्यक्ति का मरना निश्चित है| जब हम दूसरे की मौत में खुद की ही मौत देख पाते हैं, हमारी मौत की ही खबर के तौर पर देखते हैं, तब धीरे धीरे उस मौत का दंश कम होता जाता है| भीतर से महसूस होता है कि जो कन्फर्म है, वह तो हो कर रहेगा, उसे इन्कार करने से कुछ भी नही होगा| और जब हम मौत को स्वीकार करते हैं, तब जीवन के दूसरे अर्थ हमारे लिए खुल जाते हैं| तब जब हम कोई असहाय और अति विकलांग रुग्ण देखते हैं, तो हमें भीतर से महसूस होता है कि एक दिन मेरा भी यही होनेवाला है| आज जो उस व्यक्ति के लिए सच है, वही मेरा भी कल का सच है|