Saturday, September 17, 2022

अदू का आंठवा जन्मदिन: आनंद यात्रा के आंठ वर्ष!

 
१७ सितम्बर २०२२

✪ "ओह! मै कितनी क्युट थी!"
✪ वो छोटा बेबी कहाँ गया! ए वक़्त रूक जा, थम जा ठहर जा वापस जरा दौड़ पीछे!
✪ उत्तराखण्ड में लिया आनन्द और दिल्ली से वापसी की यात्रा
✪ मै दुनिया की सबसे लकी लड़की हूँ!
✪ स्कूल जाते समय स्वागत करनेवाले फूल!
✪ ना शेरवा का डर, ना बाघवा का डर, डर त डर टिपटिपवा का डर!
✪ ढेर सारी मौज और मस्ती

प्रिय अदू, यह तुम्हारा आंठवा जन्मदिन!! अदू, अब तुम सचमुच आंठ वर्ष की हो गई हो! हमारी पीढि की दृष्टि में कहें, तो कुछ कुछ होता है की‌ छोटी अंजली जितनी तुम बड़ी हुई हो! तुम्हारा एक फोटो भी था, बिल्कुल उसके जैसा!! हर साल की अनगिनत यादें हैं| लेकीन अब ये आंठ साल बहुत महसूस हो रहे हैं| और रह रह कर उस छोटे से बेबी की- छोटी अदू की याद आ रही है- वह अदू जो रैंगते रैंगते एक कमरे से दूसरे कमरे में‌ जाती थी| जो मिठी किलकारी मारती थी| उसे उठा लेना बहुत आसान भी था! उसे उठाने पर वो मुझे ठीक कन्धे पर ही कांटती थी! किलकारी मार कर हंसती थी! मेरे साथ बहुत खेलती थी और हाँ! वो बेबी दोपहर में सोता भी था! कभी कभी तो मेरे कन्धे पर ही सो जाता था! लगभग पीछले वर्ष तक तुम छोटे बच्चे जैसे रैंगते हुए कमरे में आती थी! तुम्हे उठाना आसान था| अब तो तुम्हे लगभग उठा ही नही पाता हूँ| अब तो तुम मुझे धकेल सकती हो, गिरा भी सकती हो! इतनी बड़ी हुई हो!

और अदू, एक बार जब मैने लैपटॉप पर तुम्हे तुम्हारे बचपन के फोटो दिखाए थे, तो तुम्हे कितनी ख़ुशी हुई थी! तुमने तुरन्त कहा था, ओह निनू, मै इतनी क्युट थी! रह रह कर उसे छोटे से बच्चे की याद आती है| उसकी, जिसने मुझे कहानियाँ कहना सीखाया, खेलना सीखाया, तरह तरह के आवाज सीखाए| वो छोटी अदू जो इतनी मिठी थी कि सिर्फ मेरे शर्ट के बटन से खुश होती थी! उड़ते हुए पंछी को देख कर खुशी से भर जाती थी! उस छोटी अदू को मै बहुत मिस करता हूँ| अब भी तुम उतनी ही मिठी हो| लेकीन उस बचपन की बात और थी| उस समय का तुम्हारा खुशी‌ से झूमना- चिल्लाना! ख़ुश होने पर तुम जोर से हसती भी थी और जब रोती थी, तो वो तुम्हारा ध्यान होता था!

रूकना जीवन का स्वभाव ही नही है! जो है, वो आगे जानेवाला है| जो अब है, वह अवस्था बदलनेवाली है| गति यही प्रकृति का नियम है! इसलिए प्रकृति तुम्हे ऐसी छोटी नही‌ रखेगी|‌ लेकीन फिर भी‌ मन में तुम्हारी बचपन की यादों को संजोता रहता हूँ, देखता रहता हूँ| तुम्हारे साथ की हुई मस्ती, तरह तरह के आवाज और तुम्हारा मैने खाया हुआ जंगल और चोटी! और हां, याद रखना, वह चोटी मेरी ही है, बस मैने सम्हालने के लिए तुम्हे दी है! तुमने लिए हुए तरह तरह के नाम- टमडी, टमकडी, ब्याऊ, पाबई ऐसे नाम और मुझे दिए हुए टोमड्या, ब्याऊ, निनू ऐसे नाम! और तुमने मुझे दिया हुआ और इस वक्त ट्रेंडिंग में होनेवाला नाम- टॉइंड्या! इन्हे लिखना भी कितना मज़ेदार है! यह सब देखते हुए बार बार मन कहता है- ए वक़्त रूक जा, थम जा ठहर जा, वापस जरा दौड़ पीछे! मुझे सन्तोष इस बात का है कि हर साल की ऐसी अनगिनत मिठीं यादे मैने तुम्हारे हर वर्ष के पत्र में लिखी हैं! और निश्चित ही मेरी फोटोग्राफिक स्मृति में भी वे सदैव जीवित हैं| और हम इतना आनन्द लेते हैं तो उसे आगे भी जारी रखनेवाले ही हैं!

उत्तराखण्ड में लिया आनन्द और दिल्ली से वापसी की यात्रा

पीछले साल हमने बहुत मस्ती की और आनन्द लिया| पीछले जन्म दिन पर स्कूल बन्द होने के कारण तुम नाराज थी| तुम्हारी नई स्कूल- केन्द्रीय विद्यालय शुरू तो हुई थी| लेकीन ऑनलाईन स्कूल तुम्हे पसन्द नही थी| कार्टून देखते हुए और आर्टस- क्राफ्टस करते हुए तुम खुद का मनोरंजन करती थी| कभी कभी तुम्हारे दोस्त- भाई बहन को व्हॉईस मॅसेज करती थी| हम मिल कर भी कभी कहानी कहते थे| अक्तूबर में लेकीन बड़े मज़ेदार दिन बिते| हम १५ दिनों के लिए उत्तराखण्ड को- पिथौरागढ़ को गए थे| और तुम तो हमारे लौटने के बाद भी बर्फ देखने के लिए वहीं‌ रही थी! और वहाँ होते हुए भी जब हम गूँजी को गए थे, तब भी कुछ दिन हमसे दूर रही| बुंगाछीना, सत्गड़ और बस्तड़ी में बिताए तुम्हारे दिन लेकीन बहुत अनुठे थे! हिमालय के गाँव और खेत, बहुत सारे भाई- बहन- मौसी- नाना- नानी और कल्लू- भोटू जैसे बड़े "भ्याऊँ" और ढेरों बकरिया, पेड़ और पहाड़! ऐसे माहौल का आनन्द तुमने लिया था! मुझे याद है सत्गड में घर के छत पर पहली बार तुमने क्रिकेट ठीक से खेला था! और बाद में हमने बुंगाछीना में एक छोटा ट्रेक भी किया था! उसमें भी तुम्हे थोड़ी दूरी तक उठाना पड़ा था! और सत्गड़ में चढाई की पगडण्डी पर भी तुम चली थी और एक बार उस चढाई पर मै तुम्हे उठा भी सका था! ऐसे हमने बहुत मज़े लिए थे! और तुमने तो हमसे भी ज्यादा आनन्द लूटा, क्यों कि आगे भी एक महिने तक तुम रूकी थी| और तुम समझ रही थी कि कितनी‌ अनुठी चीज़ों का आनन्द तुम ले रही हो! तुम्हे आनन्द देनेवाली बहुत सी चीज़ें थी, फिर भी‌ तुम इतनी छोटी थी कि तुम्हे रोना आना स्वाभाविक था| फिर भी तुम ज्यादा रोयी नही| जब हम तुम्हे विदा कह कर निकले और तुमने हमें बाय किया था| उसके बाद तुम्हारा रोना टूट पड़ा था| अत्यधिक ठण्डे मौसम में भी तुम वहाँ अच्छे से रही और बाद में ओमीक्रॉन के चलते जब तुम्हे वापस लाने का निर्णय किया, तब भी तुम रोयी! बर्फ का गिरना शुरू होने के कुछ दिन पहले ही तुम्हे लाना पड़ा था|

तुम्हे ले कर की हुई दिल्ली से परभणी की यात्रा! तुम तो मौसी के साथ पिथौरागढ़- दिल्ली ऐसी थकानभरी यात्रा कर के आयी थी| तुम्हे बहुत नीन्द आ रही थी और मै जैसे तैसे तुम्हे सोने से रोक कर स्टेशन पर पहुँचा| तब मैने जाना कि समस्त महिलाओं को बच्चों को ले कर यात्रा करना कितना कठिन होता होगा! निजामुद्दीन के बाहर के ही होटल से स्टेशन के प्लॅटफॉर्म तक पहुँचना मेरे लिए एक मुश्कील अभियान ही था! लेकीन तुमने भी तुम्हारी एक बैग उठायी और मेरा हाथ थामे चलती रही| सीट पर पहुँचने के बाद तुरन्त सो भी गई! बाद में तुम्हारे हिन्दी और मराठी बोलने से और खेल- कुद से सभी सहयात्रियों को तुमने खूब हंसाया! लगातार खेलती रही, सभी का मन बहलाती रही!  पूरी यात्रा अच्छी बिती, लेकीन परभणी में प्लैटफॉर्म पर ट्रेन आते आते तुम्हे उल्टी हुई! लेकीन फिर भी वहाँ भी तुमने शिकायत नही की|

तुम शान्त मन की हो| भीतर से बहुत निश्चिन्त हो| एक गहरी समझ तुम्हारे पास है| इस कारण तुम्हारी बहुत सी चीज़ें तुम खुद ही करती हो और बहुत अच्छी भी करती हो| तुम्हारा चीज़ों को रखना इतना अच्छा होता है कि मेरी कोई चीज़ कहाँ है, यह मै तुम्हे ही पूछता हूँ और तुम भी वह बता देती हो! दिल्ली से लौटने के बाद कुछ दिन हम परभणी में रहे| वहाँ तुम अनन्या- आजू के साथ खेलती थी| परभणी का घर हम छोड़ रहे थे, इसलिए तुम्हे दुख हो रहा था| लेकीन वहाँ‌ भी तुम्हारी शिकायत नही थी| जो अभी सामने है, उसमें से ख़ुश रहने का विकल्प तुम बराबर ढूँढ लेती हो| परभणी का घर छोड़ना तुम्हारे मन में जरूर था|‌ क्यों कि बहुत बाद में एक बार तुमने दादाजी को बोला कि क्यों दादाजी, आपने परभणी का घर क्यों छोड़ दिया? तब तुमने उन्हे सजा के तौर पर रोज एक कहानी कहने के लिए कहा था! हम सब परभणी से एक छोटी बस से पुणे आ रहे थे, तब अंताक्षरी में तुम्हे पता होनेवाले गाने सुन कर सभी चौकन्ने रह गएं! सभी को लगा कि ये गानें तुम्हे कब पता हुए! (उदा., जैसे साजन का गाना)!

Saturday, September 10, 2022

Solo cycling for mental health awareness


4 states, 1500 kms from Sindhudurg- Goa- Belgavi- Kalburgi- Hyderabad- Warangal- Gadchiroli- Nagpur in 20 days

Hello, namaste. Hope you are all fine. Mental health is very significant issue nowadays. Many times we see people committing suicide from very petty reasons (Actually, any so called severe reason should always be feeble to commit such a thing). After corona times and with economic slow down and all, mental health, stress management and positive mental health are key issues. So this issue is for all of us. Not only mental health sufferers, but all of us. From special people (such as people with autism, MR or Down’s syndrome) to even young students, everyone is important. This cycle expedition will raise this issue before the broader society. Awareness about mental sickness, mental problems and problems of differently abled needs to be there so that proper help can be given at the earliest possible time. This cycling expedition will create awareness about this by having dialogue with people in general- farmers, youth, students and all. Everyone is a party to this cause. Cyclist doing this expedition will also interact with social organizations, groups and people and also will understand local issues. He will use an ordinary- single- gear SLR cycle for this expedition. The message is that everybody can do such things with their resources, once they know how to tap their potential.

मानसिक आरोग्य जागरूकतेसाठी सायकलिंग

मानसिक भलायकेची जागृताय करपा खातीर सायकल चलोवप

ಮಾನಸಿಕ ಆರೋಗ್ಯ ಜಾಗೃತಿಗಾಗಿ ಸೈಕ್ಲಿಂಗ್
మానసిక ఆరోగ్య అవగాహన కోసం సైక్లింగ్


Why this route?



Because it is important to reach out to those who are not mainstream. Initially he thought to start with Mumbai based NGOs. But there is some awareness in cities in Maharashtra. So why not take the most remote/ backward region, And also the message is to look beyond our comfort zone, to go beyond our limitations and being sensitive towards unknown. So it will start in Kudal in Konkan and then from Goa it will continue via Karnataka, Telangana and again remote part of Maharashtra.

If you know any organization working in this route or if any of your friends are on this route-  Kudal- Goa- Belgavi- Bagalkote- Kolhar- Kalburgi- Hyderabad- Warangal- Gadchiroli- Nagpur, you can share this message with them. The schedule of this expedition is from 24th September to 14th October.

About the cyclist

Niranjan Welankar, 37 has completed several solo cycling expeditions including those in Ladakh and Spiti. Also he has cycled in Maharashtra for HIV and health awareness and also for promotion of Yoga and meditation. His blog- www.niranjan-vichar.blogspot.com 09422108376 niranjanwelankar@gmail.com

Friday, September 2, 2022

India's biggest cover up: अनुज धर ह्यांच्या २० वर्षांच्या नेताजींच्या रहस्याच्या अभ्यासाचा निष्कर्ष

सर्वांना नमस्कार. नेताजी सुभाषचंद्र बोस! लहानपणापासून त्यांच्याबद्दल अतिशय आत्मीयता वाटते. "महानायक" आणि "नेताजी" अशी मोठी पुस्तकं व इतर अनेक पुस्तकांमधून त्यांचा परिचय झाला. नव्हे त्यांच्या आयुष्यातला प्रत्येक प्रसंग, प्रत्येक घटना मनावर बिंबली होती. लहानपणापासून त्यांचं वेगळेपण, त्यांचे विचार, त्यांची बंडखोर वृत्ती, शाळा- महाविद्यालयातील पराक्रम, नंतर ब्रिटनमधील शिक्षण, गांधीजींना विरोध, दुस-या महायुद्धामध्ये केलेला अभूतपूर्व प्रवास, परकीय देशांमध्ये जपलेला स्वाभिमान, देश प्रेम, पुन: एकदा रोमांचक पाणबुडी प्रवास, पूर्व आशियातील रोमहर्षक महाभारत आणि... असे सर्व प्रसंग मनावर कोरले गेले होते. पुढे २००५ मध्ये आलेला 'नेताजी द फरगॉटन हिरो' हा चित्रपटही हा अनुभव परत देऊन गेला. नेताजींचा शेवट नक्की काय झाला, ह्याबद्दल मनामध्ये नेहमी प्रश्न होता. आता ह्या प्रश्नाचं सुस्पष्ट असं उत्तर नाही, पण एक निश्चित दिशा मिळते आहे असं वाटतंय. निमित्त झालं नेताजींच्या रहस्यांवर गेल्या २० वर्षांपासून अभ्यास करणा-या अनुज धर ह्यांच्या विविध पोडकास्टसचं आणि 'India's biggest cover up' ह्या त्यांच्या पुस्तकाचं. त्यांचे दोन- तीन तासांचे पोडकास्टस अक्षरश: न थांबता ऐकले आणि मग त्यांचं पुस्तकही सलग वाचून काढलं. नंतर मुखर्जी आयोगाच्या कामकाजावर आधारित असलेला गुमनामी चित्रपटही बघितला. हे ऐकणं- बघणं आणि वाचणंही थरारक होतं. आणि त्यानिमित्ताने नेताजींबद्दल खूप काही कळालं. निश्चित उत्तरांची दिशा कळाली. भारतीय राजकारणाची एक नवीन आणि खोलवर ओळख झाली. हा छोटा लेख म्हणजे हे पोडकास्टस, हे पुस्तक आणि ह्या विषयावर समोर आलेल्या सद्यस्थितीला थोडक्यात मांडण्याचा प्रयत्न.

(शब्द संख्या- २६३९ वाचन अवधी १० मिनिटे. हा लेख इंग्लिशमध्ये इथे वाचता येईल)

✈ नेताजींना जाऊन तर इतकी वर्षं झाली. आता त्याचं काय? "मेरे पिताजी हैं, उनका सच मुझे जानना है|"
✈ २० वर्षांचे परिश्रम आणि अथक अभ्यास- अनुज धर!!
✈ १९४५ नंतर रशियामध्ये नेताजींच्या उपस्थितीची साक्ष देणारे अनेक पुरावे
✈ आपला भारत देश असा- इतका उदासीन, इतका अंधारात आणि इतका भ्रष्ट?
✈ देशप्रेम आणि स्वाभिमानापुढे सगळ्या अडथळ्यांची शरणागती
✈ Your dead man- गुमनामी बाबा!
✈ नेताजींच्या केवळ १% हिंमत, साहस, शौर्य, बुद्धीमत्ता आपल्याला कशी मिळेल?
✈ जोदी तोर डाक सुने केउ ना आसे तोबे एकला चोलो रे एकला चोलो एकला चोलो रे

नेताजी! स्वातंत्र्याचे एक शिल्पकार! डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर आणि ब्रिटीश पंतप्रधान एटली ह्यांनी म्हंटलंय की, भारताला स्वातंत्र्य मिळालं‌ त्यामागे मुख्य कारण आझाद हिंद सेनेमुळे प्रेरित झालेली व ब्रिटीशांची चाकरी सोडून देण्यास सज्ज झालेली भारतीय सेना हे होतं. आता भारतीय सैनिकांचा भरवसा आपण धरू शकत नाही, ही खात्री ब्रिटीशांना झाली. आणि त्यातून देश सोडून जाण्याची भुमिका ब्रिटीशांना घ्यावी लागली. नेताजींनी वस्तुत: अशा शेकडो गोष्टी केल्या आहेत, ज्यापैकी एक गोष्टही कोणी करू शकला तरी तो स्वत:ला धन्य समजेल. मग ते तत्कालीन आयसीएस उत्तीर्ण होणं असेल, गांधीजींना थेट विरोध करणं असेल, मणिपूरपासून पेशावरपर्यंतच्या लोकांसोबत नातं जोडणं असेल, उद्दाम विदेशी सत्तेच्या गुहेमध्येही स्वाभिमान आणि देशप्रेमाने कार्यरत राहणं असेल! किंवा अतिशय भयंकर असा अंधारात उडी मारून केवळ स्वत:च्या हिमतीवर केलेला कोलकाता- काबूल- मॉस्को- जर्मनी असा प्रवास असेल किंवा १% पेक्षाही कमी शाश्वती असलेला अर्ध्या जगाला समुद्राखालून प्रदक्षिणा घालून केलेला पाणबुडीचा प्रवास असेल! किंवा पूर्व आशियामध्ये थायलंड- म्यानमार ते मणिपूर- इंफाळ परिसरामध्ये दिलेली अफाट झुंज- संपूर्ण भारतातील विविधतेचं केलेलं नेतृत्व! तेही‌ असं की, शेकडो सैनिकांनी युद्धात आहुती द्यावी आणि लाखो भारतीयांनी त्यांना सर्वस्व द्यावं! ह्या शेकडो गोष्टींपैकी जो एकही करू शकत असेल तो स्वत:ला धन्य समजेल. असे नेताजी! देशगौरव नेताजी! आत्ताच्या लेखाचा विषय त्यांच्या रहस्यावर अलीकडे पडलेला प्रकाश हा आहे, त्यामुळे त्यासंदर्भात बोलतो.


Saturday, August 13, 2022

India's biggest cover up: Inferences of 20 year- study of Anuj Dhar ji on Netaji's mystery

Hello all. Netaji Subhas chandra Bose! I feel very attached to him since childhood. I was introduced to him through Marathi books such as "Mahanayak", "Netaji" and others. Rather, each and every incident and milestone of his life was engraved on my mind. His uniqueness since childhood, his thoughts, his rebel nature, his heroics in school- colleges, his education in Britain, his opposition to Gandhiji, unprecedented journey he undertook in the World War II, how he remained confident and patriotic in foreign lands, once again the nail biting submarine journey crossing half the world, his wonderful leadership in the battlefield of East Asia and ..... All those heroics were engraved on the mind. Then the 2005 movie- 'Netaji the forgotton hero' once again recalled it. Always there was that question in mind- what was the end? Now an answer is emerging, not very clear, but certainly showing one specific direction, I feel. It all started with some podcasts of Anuj Dhar ji and his book 'India's biggest cover up.' His 2-3 hour long podcasts I listened without gap and then read his book too. Later on I could not refrain from watching the movie Gumnami, loosely based on proceedings of the Mukherjee Commission. Seeing, reading and listening all this was wonderful. It threw light on several aspects of Netaji. I came to know about a definite direction of the answers. I came to know to new and deep aspects of Indian polity. This small article is an attempt to present what I came across these podcasts, the book and on this subject.

(No. of words 3328- Reading time 15 minutes.)




✈ Now so many years passed since he is dead. Now why? "He is my father, I need to know the truth."
✈ Hard work of 20 years and wonderful study- Anuj Dhar ji!!
✈ Many evidences indicating Netaji's presence in Russia after 1945
✈ Why our India so reluctant, in darkness and corrupt?
✈ All obstacles surrender before love for the country and pride
✈ Your dead man- Gumnami Baba!
✈ How we can strive to have just 1% of Netaji's bravery, courage and intellect?
✈ जोदी तोर डाक सुने केउ ना आसे तोबे एकला चोलो रे एकला चोलो एकला चोलो रे (Even if no one responds to your call, keep going yourself)

Netaji! One architect of the freedom! Dr. Babasaheb Ambedkar and the British Prime Minister Attlee had stated that the main reason for Indian independence was that Indian armed forces were shaken by Azad Hind Fauj and they were willing to quit serving the British. The British were convinced that henceforth they cannot take for granted the Indian soldiers and so they had to agree to leave the country. Netaji actually had done hundreds of marvelous things that even if anyone manages to do just one such thing, then he or she would feel grateful. It can be then passing the ICS examination of those days, directly opposing Gandhiji, connecting with people from Manipur to Peshawar, working confidently with love for the country in dens of arrogant foreign powers! Or it may be be the non- probable jump into darkness- single handed leap from Kolkata- Kabul- Moscow to Germany or it can be the submarine journey of covering over half the planet which had success chances lesser than 1%! Or it can be the unthinkable battle he waged and led in East Asia from Thailand- Myanmar to Indian areas of Manipur- Imphal- his leadership with followers as diverse as all India! And such leadership that hundreds of soldiers sacrificed their lives for him and lacs of Indians gave their everything to him! Even if we can do any ONE such thing out of such hundreds of achievements, our life would become meaningful. This is Netaji for you! Pride of the country! Topic of this article is light recently thrown on his mystery, therefore let me talk about it more.

The air crash happened on 18th August 1945 was not accepted even then by those who knew some inside aspects and even British and American officers did not accept it. There were many lacunae in eye- witness accounts, there were no direct evidences. Many things were suspicious. But for some people, it was convenient to state that Netaji had died. Therefore that was the truth, it was stated again and again. A few people here and there know with evidence that Netaji was in Russia. After some years people even had seen him in India. But this thing never became the “Government stated truth”. Why? To understand this, one has to listen to some podcasts by Anuj Dhar ji. Salute to Anuj Dhar ji! At a time when this topic was almost forgotten, he started with the mantra of Ekla Cholo re. He committed himself to digging the truth about Netaji. It now has become his life. I remember reading a series of articles ‘Enigma of Netaji Subhas Bose’ in Hindustan Times on internet around 2004- 05. It was his work. He took off from this story in Hindustan Times and then it became his mission. Later on he was joined by Netaji adorer and researcher Chandrachur Ghose and others. They found their way with the Government by resolving innumerable difficulties and resistance. Getting a thing done from the Government people in India is next to impossible! Slowly with the help of some Government officers, some Netaji admirers and some retired officers, they brought some information forth. They also explored information from more transparent countries. Later on they employed the tool of Right to information act and also global communication possible with Internet. In the same times, i.e. in 1999, the third Commission was established to dig mystery surrounding Netaji. The Mukherjee Commission did excellent work and proved that there was no air crash on 18th August 1945. It also brought forth indirect evidences almost proving Netaji’s stay in Russia and his return to India. But the Government in 2006 rejected this report. But despite of all this, the truth is coming up directly or indirectly. Many people knew this in a scattered form. But now many threads are getting linked. In this era, new technologies are helping to connect the dots. In 2016, Modi Government declassified many Netaji files. Although it cannot be called as Government truth, but there are many things that are coming to light. If we have love for our country and love for those who had worked for us, then other dark things also will come into light.


Russia via Manchuria!

I just present all threads coming to forth from this research. Those who have more interest can listen to podcasts of Anuj Dhar and they can also read his book ‘India’s biggest cover up’ written after study of 20 years and with evidence of hundreds of documents. I am just presenting some of the inferences. All these things have indirect evidence and can be proven. The air crash of 18th August 1945 was just a projection. You may remember, when Netaji left for Germany from Kolkata in 1941, when he had actually reached Kabul, the ‘news’ that he is no more in the house was out. In the same manner, ‘news’ of this alleged crash was conveyed from Tokyo on 22 August, by then he was likely to have reached near Manchuria. Later on he went to Soviet Russia. An American journalist Alfred Wegg had told Nehru in his press conference that he had seen Netaji after 18th August 1945. After the independence, one Indian engineer had gone to Soviet Russia for some automobile project. On his specific project, his leader was a German working in Russia from several years. He took this Indian engineer in confidence and told that he had met Netaji. He had known Netaji as he had seen him face to face in 1941. When he was in a Soviet camp for professionals and political leaders, he recognized Netaji there and also talked with him in German. He was given the status of a diplomat. When the engineer shared this information with the Indian ambassador in Moscow, the ambassador warned him to focus only on his work! Later the engineer returned to India and after he was retired, he recalled this and also presented his account before the Mukherjee Commission. One year after the alleged air crash at Taipei in July 1946, Gandhiji’s secretary and Dadabhau Naoroji’s grand daughter Khursheed Naoroji had written to American journalist Louis Fischer that if Netaji comes to India with Russian military, Gandhi- Neharu could not do anything and entire the country would go with him.


Our great country!

One would wonder then, if he was alive in Russia, why he did not come to India. And even when he came later on, why he was hiding? One reason for this is that maybe there was one confidential term in the agreement of Indian Independence (Transfer of powers) that if Netaji comes to India, then he had to be captured and be given to the British as a war criminal. In fact, threads coming from inside also suggest that this independence was not a true independence. It was rather dominion status. And it is a fact that till 1955, Indian military was led by British people. Even Nehru himself had taken oath to be committed to British Queen in 1956. Another shocking and less known fact is that Indian police who had fired bullets in Jalianwala Baug were Government servants and they were getting pensions in free India. And at the same time, soldiers and officers fought in Azad Hind Fauj were not regarded even as freedom fighters. Also, in free India, there were many such laws that any pride and patriotic person would not accept. It was in 1955 that the unaccountability became illegal by law. The black act of the Criminal Tribes Act was there till 1952. So one has to think, whether it was actual independence or just the dominion status. The British were regarding Netaji as the war criminal, in fact much more than that, but not a single Indian leader ever regarded British as criminals due to their atrocities conducted during their rule.

Whatever was the Government stand, close associates of Netaji, his two brothers, wife Emilie were aware that he was in Russia. One more reason indicating this is that till 1968, Netaji’s family was snooped by the Government. Why it is necessary to spy a family of a dead man? Thus, it was a known truth for those who know deeper things. Therefore, the first Commission to resolve this mystery was formed around 1956 and second commission was formed in 1970. Many times the Government tried to end this issue by bringing so called relics of Netaji from Renkoji temple of Tokyo. But Netaji’s family always opposed to this and hence the Government could not do this.

The Government mostly tried to avoid the truth coming up. The Government did not allow the first two Commissions to go to Taiwan due to lack of political relations of India and Taiwan. Or it might be afraid that after going there, the Commission might realize falsity of fabricated ‘evidences’ for the so called air crash. Whereas, Netaji on the basis of his confidence and his friends from across nations was taking massive leaps in unknown lands of Manchuria- China and Russia. How many countries and lands!! From Afghanistan- Russia- Italy- Germany and later on Myanmar- Thailand- Indonesia- Singapore- Japan! All these were not his friends. Here too there were arrogant rulers and officers. But Netaji overcame all of them with his love for his country. The arrogant rulers tried to dominate him, but he never ever was suppressed and stood firm on his objective. Even he gave taste of his pride to Hitler too. Indian people are just like goats, was the opinion of Hitler. But he too changed his stand. He looked directly into his eyes and shook hands with him with a great confidence. His stand was that the help from other countries was the help given to a free nation and after the independence, the free country would return it with gratitude. But then Indian leaders were thinking as if meeting Hitler is like getting buried in the hell. They were accepting India hater Churchill who would say, “If Hitler attacks Satan, I will support Satan.” Indian leaders were okay with Churchill who had murdered 30 lac Bengali people due to artificial famine, Churchill who wanted to keep India slave.

Your dead man- Gumnami Baba!

Today we can say that after spending some years in exile in Russia and waiting for the rulers of India to become favourable, Netaji finally returned to India as Gumnami Baba. Of course, there are scattered threads that even when he was in the exile in Russia, he would travel to the communist nations and would be in touch with their leaders. After 1955, he came to stay in small towns such as Basti and Faizabad in Uttar Pradesh not far from Nepal border. He would stay totally alone and behind the curtain. His face was always covered and he would not meet anyone. But his possessions included English- Bengali and German books, books on subjects such as war, international developments etc. Later on senior personnel from Azad Hind Fauj, his old friends and associates came in contact with Netaji. Later on slowly, Netaji’s inner circle came to know about his arrival. There are evidences that his, i.e. Netaji’s childhood friends, youth colleagues, party workers and personnel from Azad Hind Fauj had met Gumnami baba aka Bhagwanji aka Pardewale Baba and they remained in touch for several years. Letters written by Gumnami Baba are available. All these people would ask him, why don’t you come out? On that, he would state that my coming out would not be in the interest of the country. Maybe civil conflicts in the country, resistance from preachers of non- violence, India’s dependence on other countries due to food and other kinds of support and India being not actually free country would be some reasons.

Many then would think, what Netaji was actually doing when he was hiding even in India? There are two- three clear answers to this. One thing he was undergoing a sadhana. Remember, when he was 17, he had gone to Himalayas for 7 months. Sri Aurobindo was also a revolutionary, but later on he devoted himself to spiritual sadhana and that too was for the country. Netaji’s sadhana was now going ahead. Also, from his letters and conversations, it seems that he was in secrete contacts with many Asian leaders including the communist leaders and he was guiding them also about various issues and crisis such as Vietnam war. He also states that he had secretly intervened/ assisted in Indo- China war and also Bangladesh war of independence. This all looks very unbelievable. But let us recall again what kind of man he was. He was active in India for 20 years- from 1921 when he had resigned from ICS till 1941 (even some years he had to take forced rest outside India due to medical reasons when he had met European leaders). In his active life of 20 years if we count breaks such as imprisonment, house arrest, imprisonment in Mandaley, then hardly for around three and half years he was free and still he created such great influence. In entire the country he had followers. He fought an election against Gandhiji and he won it. He was supported from provinces such as Madras. The man of this calibre- even foreign rulers with awareness would not reject him. He had just flown away out of British grip like Shivaji Maharaj had flown away from Agra, he had so much command on secrete communication and channels that he immediately recognized a secrete group in Nazis opposing Hitler. Then which borders can stop him? And then how it can be a wonder that he was in secrete contacts with rulers of many countries? Then such a person even does not need to come out in light to work. There are many indirect evidences pointing this direction. There are many dots which we can connect with our intellect. Mystery surrounding death of Shastriji and references from rule of various PMs in free India from Indira Gandhi, Morarji Desai, V. P. Singh, Narsingh Rao, Atalji, Manmohan Singh come in this study. Every non- Congress Government had done something to solve this mystery, it is seen. The External Affairs minister in the 1995 Government who later became President of India- is seen as forcing Emilie Shenkl to sign the proposal to bring back Tokyo relics (whom she tells to leave her house). Evidence of many such things are in the Government papers. It is there in many documents which are declassified now.

The Mukherjee Commission had conducted tests of handwriting of Gumnami Baba and his DNA. One expert inferred that the handwriting matches. The Government experts inferred negatively. Results of DNA tests with family members of Netaji were shown as negative. But Netaji adorers attending proceedings of the Commission know well that the Government labs were giving fabricated results. Therefore, the Mukherjee Commission had to state that it cannot clearly state that Gumnami Baba was Netaji. Because there are evidences, but they are not clinching on paper. What to say about reluctance of out nation, lack of awareness and corruption! But while speaking in private, Justice Mukherjee had clearly stated that Gumnami Baba was Netaji only. Incidentally this was shooted on a cemra and this video is available today also. You can just google. He too was knowing that Gumnami Baba was Netaji, but due to fabricated results of the tests and due to lack of cooperation of the Government, he could not prove it. But there are several indirect evidences. Many Bengali revolutionaries and leaders such as Lila Roy, MP Samar Guha, veterans from Azad Hind Fauj, the then Chief Minister of UP Sampurnanand had regarded him as Netaji. But due to above mentioned reasons, it could not become established truth.

There are two definite objectives to recall Netaji, his contribution and his truth. Firstly, it is my right to know what happened with my father. Any son or daughter would not feel satisfied without knowing it. Also, it is important to carry forward this legacy, his inspiration and the energy to this and coming generations. Such unbelievable kind of person existed, we must know and we must get confidence that we too can become at least 1% of him. We too should get indomitable spirit to overcome innumerable obstacles. Today the freedom- however limited it be- we are enjoying, we are experiencing this satisfaction, we must know what was its actual cost. If we have this awareness and memory, then we can internalize him at least up to 1%. There can be many ways to do this. It can be working with courage and pride and self- motivation in our fields. It can be sharing this to new generation through street- plays, essay or speech competitions. It can be exploring truth in our own path. Even if we are able to do 1% of this, then our life will become meaningful.
 
In the movie ‘Netaji the forgotten hero’, there is a song- Ekla Cholo re and it has one line. If as a country and as children of Netaji, we can internalize him for 1%, then the next line of that song too would become meaningful.

मज़िलें कभी क्या मिलेगी हमें
होगी क्या सहल कभी जो राह है कड़ी
आज हर जवाब हमको मिल जाएगा
आ गई है आज फैसले की घड़ी

(How long let it be, we will embrace our goals
At one point, the hard path would ease out
We will get every answer
Time of judgment is right there)

(Niranjan Welankar 09422108376, niranjanwelankar@gmail.com)

Sunday, March 20, 2022

प्रीसिशन सर्जिकल स्ट्राईक करनेवाला और मधुमख्खियों के झुण्ड पर हमला बोलनेवाला कश्मीर फाईल्स!!

नमस्ते| आप सब कैसे हैं? हाल ही में कश्मीर फाईल्स फिल्म देखी| उसके बारे में मेरे विचार शेअर करता हूँ| शायद आप कुछ मुद्दों से सहमत होंगे, कुछ से सहमत न भी होंगे| लेकीन अलग अलग सोच, विचार और नज़रिए कम से कम सुनने या पढ़ने तो चाहिए होते हैं ना| इसलिए यह शेअर करने का मन हुआ|

कभी ट्रेकिंग, कभी घूमना, कभी राहत कार्य के लिए कश्मीर जाना हुआ| कश्मीर घाटी में कई जगहों पर जाने का मौका मिला- श्रीनगर, पुलवामा, अनन्तनाग, छत्तीसिंगपोरा (जहाँ बिल क्लिंटन की भारत यात्रा के समय ३६ सीख्खों का कत्ल मिलिटरी के भेस में आए आतंकवादियों ने किया गया था) और शंकराचार्य हिल भी! बचपन से कश्मीर के बारे में बहुत पढ़ा भी था| यह फिल्म देखते समय कश्मीर में देखी हुई बातें, वहाँ के अनुभव और वहाँ की घटनाएँ याद आ रही थी| जम्मू से टैक्सी द्वारा श्रीनगर जाते समय साथ में होनेवाले कश्मिरियों की खामोशी और उनका बातचीत में उत्सुक न होना, श्रीनगर में ऑटो रिक्षावाले ने सबसे पहले पूछना- हिन्दु की मुसलमान हो, श्रीनगर में गोलीबारी की आवाज, पथराव (स्टोन पेल्टिंग), छत्तीसिंगपोरा में अब भी सीख्खों का घूमना- रहना, अनन्तनाग को इस्लामाबाद और शंकराचार्य हिल को सुलेमान टॉप कहा जाना, कुछ स्थानीयों द्वारा अक्सर एक तरह की दूरी रखी जाना, मिलिटरी की भारी गतिविधियों के कारण स्थानीयों को असुविधा होना भी देखा था| यह भी देखा की, सब तरह के फर्क, भिन्न पृष्ठभूमि, अलग किस्म का रहन- सहन होने के बावजूद लोगों में अपनापन और सरलता देखी| मिठी सी कश्मीरी भाषा में हिन्दी और संस्कृत के शब्द भी सुने थे| इन सब अनुभवों के आधार पर कह सकता हूँ कि इस फिल्म ने एक ऐसे सच को सबके सामने पटक दिया है जो अधिकांश लोगों के सामने अब तक नही आया था|

(जम्मू- कश्मीर में २०१४ में आयी आपदा के दौरान राहत कार्य में सहभाग के अनुभव यहाँ पढ़ सकते हैं|  निरंजन वेलणकर 09422108376, niranjanwelankar@gmail.com)

Wednesday, March 9, 2022

हिमालय की गोद में... (कुमाऊँ में रोमांचक भ्रमण) १५ (अन्तिम): हिमालय से वापसी...

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९ नवम्बर को पाताल भुवनेश्वर की रमणीय यात्रा हुई| अब हिमालय से विदा लेने का समय आ रहा है! लेकीन १५ दिनों तक हिमालय में रह पाया और हिमालय का सत्संग ले सका! निरंतर बने रहनेवाले घाट की सड़कें, शानदार ट्रेक, रमणीय हिमशिखर, गूंजी की रोमांचक यात्रा, नए जगहों पर भ्रमण, रात में उमड़नेवाली तारों की बारात! लेकीन मज़े की बात है कि हिमालय से विदा लेते समय पहले जैसा होता था, वैसा अब होमसिक नही हो रहा है| स्पीति में‌ साईकिल चलाने के बाद हिमालय की आज्ञा ली थी, तो लगा ही नही था कि मै बिछड़ रहा हूँ| हिमालय जैसे साथ ही रहा| खैर| १० नवम्बर को बाकी लोगों को एक जगह जाना था, इसलिए उनकी यात्रा शुरू हुई| अदू हमारे साथ वापस नही आनेवाली थी, इसलिए वह सत्गड में ही ठहरी और मै उसके साथ एक और दिन सत्गड में ठहरा| दिनभर अदू पास पड़ौस के बच्चों से खेलती रही| खेत, आँगन में झरना, पेड़ और छत! पूरे दिन बन्दरों की एक टोली आयी थी| आँगन के पेड़, खेत की फसल आदि का बहुत नुकसान कर रही थी| लेकीन अदू को जैसे बन्दरों की लॉटरी लग गई! सब जगह वही थे! वह भी बिना डरे उनके पास जा रही थी| बहुत उपद्रव हुआ, तब कुछ लोगों ने घर में होनेवाली एअरगन से उन्हे डराया| लेकीन फिर भी शाम तक वे वहीं पर थे| शाम को अदू और दूसरों के साथ सत्गड में ही एक छोटा ट्रेक किया| शाम की रोशनी में शिखर लाल दिखाई दे रहे थे| दूर से ही उन्हे अलविदा कहा| अन्धेरा होते होते उस ट्रेक से घर लौटे और अदू एकदम से रोने लगी| दिनभर तो वह खेलने में व्यस्त थी| लेकीन रात में उसे माँ की एकदम से याद आ गई| उसकी माँ और नानी दूसरे स्थान पर गए थे, मौसी भी साथ नही थी| इसलिए एकदम उसके आँसूओं का बांध टूट गया| उसे ऐसे रोता देख कर शक हुआ कि क्या वह हमारे जाने के बाद भी यहाँ रह लेगी? उसका ऐसा रोना देख कर एक बार तो तय भी किया कि हमारे फ्लाईट का टिकिट कैंसिल कर उसके लिए ट्रेन का ही टिकिट निकालूँगा| रात में उसका सामान भी पैक कर के रखा|



 



Wednesday, March 2, 2022

हिमालय की गोद में... (कुमाऊँ में रोमांचक भ्रमण) १४: रोमांचकारी पाताल भुवनेश्वर

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कल महाशिवरात्रि थी और आज मै एक अनुठे शिव मन्दिर पर लिख रहा हूँ| उत्तराखण्ड में होने के दौरान पाताल भुवनेश्वर को जाने का अवसर मिला| यह ट्रेक नही था, लेकीन एक ट्रेक जैसी ही थकानेवाली दूर की यात्रा थी| हिमालय में भ्रमण समाप्त होते होते वहाँ जाने का अवसर मिला| ९ नवम्बर की सुबह| गूंजी जैसे ही यह यात्रा जीप से करनी है| पाताल भुवनेश्वर पिथौरागढ़ जिले में ही स्थित है, लेकीन जाने का रास्ता बड़ी दूर से और घूमते हुए जाता है| मज़े की बात यह है कि हम जिस बुँगाछीना में कुछ दिन रहे थे, वहाँ से पैदल पगडण्डी से पाताल भुवनेश्वर पास ही था| लेकीन सड़क घूमते हुए जाती है| सुबह आठ बजे सत्गड से निकले| निकलते समय सत्गड पर बादल छाए हैं और ध्वज मन्दिर बादलों में खो गया है! इस बार हमारे साथ होंगे जितूजी, जो गूंजी के दौरान भी हमारे साथ थे| गाड़ी भी उन्ही की है| पिथौरागढ़ के पास तेल डाल कर बुँगाछीना- थल रास्ते से निकले| निकलते समय जाने की ही यात्रा लगभग १२० किलोमीटर की- कम से कम पाँच घण्टों की है, इसका अन्दाजा नही था| इस रूट पर मै थल- चौकोड़ी- बागेश्वर ऐसा दिसम्बर २०१२ में‌ अकेला घूमा था, उस यात्रा की याद आ रही है| पिथौरागढ़ में २०११ में पहली बार गया था, तब से पाताल भुवनेश्वर के बारे में सुना था| लेकीन जाने का मौका आज आया है!



Tuesday, February 22, 2022

हिमालय की गोद में... (कुमाऊँ में रोमांचक भ्रमण) १३: एक अविस्मरणीय ट्रेक (२६ किमी)

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८ नवम्बर की सुबह| जल्द ही हिमालय से विदा होना है! पिथौरागढ़ जिले में पाताल भुवनेश्वर एक अतिशय सुन्दर गुफा- मन्दिर है| वहाँ जाने की योजना बन रही है| वहाँ अगले दिन जाएंगे, ऐसा तय हुआ|‌ इसलिए आज मै मनचाहा बड़ा ट्रेक कर सकता हूँ| कल २१ किलोमीटर चला था| आज २६ किलोमीटर घुमूँगा| उस दिन जीप में से देखे हुए बिल्कुल अन्दर के बेहद खूबसूरत रास्ते पर चलूँगा| थोड़ा सोच के तय किया कि कहाँ तक और कैसे जाऊँगा| यहाँ विद्यालय खुल गए हैं| इसलिए शुरू में सत्गड से कनालीछीना तक बच्चों के साथ पगडण्डी पर जाऊँगा| उस दिन गया था, वही पगडण्डी, लेकीन थोड़ी दूसरी तरफ से| और कनालीछीना से आगे सड़क पर चलूँगा| वापसी में कनालीछीना से सड़क से होते हुए ही आऊँगा| ऐसे कुल मिला कर २६ किलोमीटर और लगभग सवा चार घण्टे होंगे| सुबह ८ बजे बच्चों के साथ निकला| खेतों और पहाड़ के बीच से गुजरनेवाली राह! ये क्षण मन में सम्हाल के रख रहा हूँ!


Friday, February 18, 2022

हिमालय की गोद में... (कुमाऊँ में रोमांचक भ्रमण) १२: रमणीय चण्डाक हिल पर २० किमी ट्रेक

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७ नवम्बर की सुबह| कल पिथौरागढ़ में ही ठहरे थे| दो-मंजिला घर, आँगन और आँगन में सुन्दर बगीचा और फूल! यहाँ पूरब की तरफ बड़ा पहाड़ नही है, इसलिए धूप सुबह ६ बजे ही मिली| यह घर थोड़ी ऊँचाई पर है, इसलिए सामने पिथौरागढ़ शहर फैला दिखाई देता है| साथ में शहर से सटे छोटे पहाड़ भी दिखाई देते हैं| यहाँ से चण्डाक हिल की दूरी लगभग ८ किलोमीटर है| वहाँ से थोड़ा आगे मोस्टा मनू मन्दिर है| वहाँ तक घूमने का तय किया| कुल मिला कर लगभग १८- २० किलोमीटर का ट्रेक होगा| कभी भी न देखे हुए परिसर में ट्रेक होगा| पानी की बोतल, कुछ गूड़पापड़ी आदि सामान पीठ पर ले कर निकला| रास्ता पहले पिथौरागढ़ शहर में जाता है और वहाँ के मेन मार्केट सिल्थाम से चण्डाक हिल की तरफ सड़क निकलती है| यहाँ कई जगह पर आईटीबीपी और बीआरओ के केन्द्र हैं| मिलिटरी की यातायात चलती रहती है| तेज़ी से चलते हुए बीस मिनट में मेन सिटी में पहुँचा| यहाँ नाश्ता मिलने की उम्मीद थी| लेकीन आगे देखता हूँ, ऐसा सोचते सोचते होटल पीछे छूट गए| और सुबह के आठ बजे ज्यादा होटल खुले भी नही थे| आगे चण्डाक के पास होटल मिलेगा, ऐसा पता चला| साथ में लायी गूड़पापड़ी खा कर आगे बढ़ा| धीरे धीरे पिथौरागढ़ शहर पीछे होता गया और निर्जन इलाका शुरु हुआ| यहाँ सुबह टहलने के लिए निकले हुए लोग दिखे| बाहर आने पर दूर से चण्डाक हिल का परिसर दिखाई देने लगा|

 


Tuesday, February 15, 2022

हिमालय की गोद में... (कुमाऊँ में रोमांचक भ्रमण) ११: उद्ध्वस्त बस्तड़ी गाँव के पास ट्रेक

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६ नवम्बर की शाम शिंगाली गाँव में पहुँचे| तब मन में बस्तड़ी गाँव की यादें उमड़ पड़ी| इसी गाँव के रिश्तेदारों के पास दिसम्बर २०११ में मै एक बार आया था| पहाड़ की ढलान पर और खाई के थोड़ा पहले यह गाँव बंसा है| यह पूरा क्षेत्र पहाड़ में ही है| यहाँ चोटियों के साथ खाई भी होती है| सड़कें तो निरंतर घाट की ही होती हैं| यह गाँव ऐसे स्थान पर है कि पिथौरागढ़ वापस जाते समय सड़क जब कुछ दूरी चढ़ कर फिर खाई के आगे सामने आती है, तब वहाँ से भी बस्तड़ी का परिसर दिखाई देता है| ३० जून २०१६ की रात्र यहाँ काल की रात साबित हुई| अत्यधिक बारीश चल रही थी| बादल फटा, बिजलियाँ कड़की और पानी आने लगा| लोगों को डर महसूस हुआ| सब लोग जग गए और हमारे जो रिश्तेदार गाँव में थे, वे सब एक घर में‌ इकठ्ठा हुए| और पूरे गाँव पर ही पहाड़ टूट पड़ा! अचानक आयी तेज़ बारीश के कारण पानी की बड़ी धारा तेज़ी से नीचे बहने लगी और वह इस पहाड़ की क्षमता से अधिक थी| इसलिए पहाड़ गिर पड़ा (लैंड स्लाईड) और उसके नीचे बंसा बस्तड़ी गाँव उसमें समा गया| गाँव के २१ व्यक्तियों ने अपने प्राण खोए और लगभग पूरा गाँव तबाह हुआ| पहाड़ से इतनी मिट्टी बह कर आयी थी कि कई दिनों की खोज के बाद भी मृतकों के अवशेष भी नही मिल पाए| हमारे उस समय वहाँ होनेवाले कई रिश्तेदार उसमें गुजर गए| संयोग से जो बाहर थे, वही बच गए| महाराष्ट्र में २०१४ में माळीण नाम के गाँव में भी कुछ इसी तरह का हादसा हुआ था...