Monday, September 3, 2018

पिथौरागढ़ में भ्रमण भाग ६: काण्डा गाँव से वापसी

६: काण्डा गाँव से वापसी
 

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१ दिसम्बर २०१७ की सुबह| काण्डा गाँव में विवाह का माहौल है| रातभर लोग जगते रहे| नाच- गाना भी हुआ| सुबह जल्दी निकलने की तैयारी है| यहीं से बारात निकलेगी| सुबह रोशनी आने के पहले अन्धेरे में इस गाँव का अलग दर्शन हुआ| चाय- नाश्ता ले कर यहाँ से निकलने के लिए चले| अब कल वाला ट्रेक फिर उल्टी दिशा में करना है| ट्रेक तो छोटा सा ही है| एक दो जगहों पर ही एक्स्पोजर है या पैर फिसलने जैसी सम्भावना है| कल आते समय मेरी बेटी को आशा ने लाया था| बहुत दूरी वह पैदल चली और फिर गोद में बैठ कर| ट्रेक तो मै आराम से कर लूँगा, लेकीन ऐसी जगह बेटी को उठा कर ले जाने का साहस मुझमें नही है| उसे तो यहाँ की स्थानीय दिदी उठा कर ले जाएगी, ऐसा तय हुआ| मैने कुछ सामान उठा लिया| और सुबह की ओस की‌ उपस्थिति में ही निकल पड़े| साथ ही बारात भी निकली| एक जगह मन्दीर में दर्शन ले कर वे आगे आएंगे| यहाँ कोई‌ भी वाहन नही आ सकता है| इसलिए सबको पैदल ही चलना है| अगर कुछ बड़ा सामान होता है, तो उसके लिए घोडा है|








Monday, August 27, 2018

पिथौरागढ़ में भ्रमण भाग ५: काण्डा गाँव का रोमांचक ट्रेक

५: काण्डा गाँव का रोमांचक ट्रेक

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३० नवम्बर २०१७ की दोपहर| सद्गड- पिथौरागड़ जा कर अब काण्डा गाँव जाना है| काण्डा गाँव सड़क से जुड़ा हुआ नही है, इसलिए यहाँ एक छोटा ट्रेक करना है| साथ के लोगों ने कहा भी, की कुछ ही समय पहले तक यहाँ बनी सड़क भी नही थी और दूर से ही पैदल चलना होता था| जैसे ही जीप से उतरे, सामने नीचे उतरती पगडण्डी दिखी और साथ में घोडे भी दिखे! इस ट्रेक के बारे में रिश्तेदारों ने बताया भी था| और शुरू हो गया एक सुन्दर ट्रेक! सड़क से पगडण्डी सीधा जंगल में जाने लगी और नीचे भी उतरने लगी| एक घना जंगल सामने आया और पगडण्डी धीरे धीरे और सिकुड़ती गई|








Monday, August 13, 2018

पिथौरागढ़ में भ्रमण भाग ४: काण्डा गाँव के लिए प्रस्थान

४: काण्डा गाँव के लिए प्रस्थान
 

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३० नवम्बर २०१७| आज सद्गड से निकलना है| गाँव में से दिखता हुआ कल का ध्वज मंदीर! वह इस परिसर का सबसे ऊँचा स्थान है| और वहाँ नेपाल का नेटवर्क मोबाईल ने पकड़ा था! आज थोड़ी गाँव की सैर की जाए| सुबह जल्द उठ कर निकला| पगडंडी के साथ साथ चल कर नीचे उतरा और सड़क पर पहुँचा! यह एक हिमालयीन गाँव! सड़क से सट कर होने के कारण दुर्गम तो नही कह सकते, लेकीन पहाड़ी गाँव! गाँव में दोपहिया वाहन एक- दो के पास ही हैं| जरूरत भी नही पड़ती है| एक तो घर तक वाहन आ भी‌ नही पाते हैं| यहाँ के लोग खेती के साथ इस भूगोल से जुड़े व्यवसाय करते हैं- जैसे मिलिटरी, बीआरओ और आयटीबीपी और उससे जुड़े कामों में बहुत लोग होते हैं; कुछ सरकार के साथ काम करते हैं; और कोई बीस किलोमीटर दूर पिथौरागढ़ में नौकरी भी करते हैं| शहर की हवा यहाँ भी पहुँची है| सद्गड़ के कई बच्चे अंग्रेजी माध्यम की स्कूल में पढ़ते हैं; उन्हे स्कूल बस भी नीचे रोड़ से मिलती है|









Thursday, August 9, 2018

पिथौरागढ़ में भ्रमण भाग ३: एक सुन्दर ट्रेक: ध्वज मन्दीर

३: एक सुन्दर ट्रेक: ध्वज मन्दीर
 

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२९ नवम्बर २०१७ की‌ सर्द सुबह और हिमालय की गोद में बसा हुआ सद्गड गाँव! रात में ठण्ड बहुत ज्यादा थी| रात में एक बार उठना हुआ तो ठण्ड का एहसास हुआ| यह घर ठीक पहाड़ में और वन के करीब बसा है| यहाँ के लोग बताते हैं कि वन्य पशू रात में यहाँ से गुजरते हैं| वे खेत में नुकसान ना करे, इसके लिए खेत में इलेक्ट्रिक तार भी लगाते हैं| हिमालय के कई हिस्सों में घर के पालतू जानवर- जैसे कुत्ता, भैंस आदि को शेर द्वारा ले जाना आम बात है... सुबह भी ठण्ड बहुत ज्यादा है| हाथ धोने के लिए तक गर्म पानी का इस्तेमाल करना पड़ रहा है| इन दिनों में यहाँ नहाना कंपल्सरी भी नही होता है| यहाँ की ठण्ड में सुबह के हल्की धूप में बैठ कर चाय का स्वाद लेना अपने में एक अनुभव है!







Wednesday, July 25, 2018

पिथौरागढ़ में भ्रमण भाग २: पहाड़ में बंसा एक गाँव- सद्गड

भाग २: पहाड़ में बंसा एक गाँव- सद्गड  

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२८ नवम्बर २०१७ की‌ सर्द सुबह! पिथौरागढ़ में पहुँचने के बाद पहला काम है कि एक व्यक्ति से बात हुई है, उससे साईकिल लेनी है| हिमालय में सिर्फ- छह दिन के लिए जाने के समय भी साईकिल चलाने का मन था| इसलिए हर तरह से प्रयास किया कि पिथौरागढ़ पहुँचने पर मुझे साईकिल मिल सके| इंटरनेट पर उत्तराखण्ड के विविध साईकिलिस्ट ग्रूप्स से सम्पर्क किया, पिथौरागढ़ या आसपास के साईकिलिस्ट ग्रूप्स से भी सम्पर्क करने का प्रयास किया| लेकीन किसी से सीधा सम्पर्क नही हुआ| कुछ लोग साईकिल देते हैं, लेकीन पैकेज में; किसी व्यक्ति को कुछ दिनों के लिए नही‌ देते| फिर पिथौरागढ़ के परिचित लोग और उनके व्हॉटसएप ग्रूप पर सम्पर्क किया| तब जा कर एक व्यक्ति ने कहा कि वह मुझे उसकी साधारण सी साईकिल देगा| अब उसकी प्रतीक्षा है| जैसे तय हुआ था, बस अड़्डे के पास रूक कर उसे सम्पर्क किया| सम्पर्क हुआ नही| जब हुआ तो उसने कहा कि वह किसी और स्थान पर है| आखिर कर होते होते पता चला कि वह किसी दूसरी जगह पर है| अत: साईकिल नही मिल सकी| अब तक मन में इच्छा थी कि यहाँ साईकिल चलाऊँगा, मन में‌ उसकी योजना चल रही थी| अब मन की‌ वह धारा टूट गई! एक तरह से हताशा हुई| पता था ही की‌ पहाड़ के लोग कोई‌ बहुत प्रॉम्प्ट नही होते हैं| फिर भी कुछ देर तक दु:ख हुआ| लेकीन बाद में यह भी समझ आई की देख! हिमालय में आने के बाद भी कैसे तू रो रहा है कि साईकिल नही मिली! हिमालय तुझे मिल रहा है, हिमालय का सत्संग मिल रहा है, उसके सामने साईकिल की बिशात क्या है? फिर सबके साथ आगे बढ़ा| पिथौरागढ़ के आगे धारचुला रोड़ पर बीस किलोमीटर पर सत्गढ़ या सद्गड गाँव है| वहाँ पहला पड़ाव होगा|





Monday, July 23, 2018

पिथौरागढ़ में भ्रमण भाग १: प्रस्तावना

प्रस्तावना

उत्तराखण्ड! हिमालय! पिथौरागढ़! लगभग ढाई साल के बाद अब फिर हिमालय का बुलावा आया है! नवम्बर- दिसम्बर २०१७ में पिथौरागढ़ में घूमना हुआ| उसके बारे में आपसे बात करता हूँ| यह एक छोटी पर बहुत सुन्दर यात्रा रही| इसमें दो छोटे ट्रेक किए और पिथौरागढ़ के कुछ गाँवों में जाना हुआ| मेरी पत्नि मूल रूप से पिथौरागढ़ से है, अत: उनके यहाँ एक विवाह समारोह में जाना हुआ| पारिवारिक यात्रा, लोगों से मिलना और छुट्टियों की कमी इस कारण वश वैसे तो यह यात्रा एक सप्ताह की ही रही| लेकीन फिर एक बार हिमालय और खास कर सर्दियों में हिमालय की ठण्ड और रोमांच का अनुभव मिल सका| पुणे से २६ नवम्बर २०१७ को निकले| मुंबई में बांद्रा टर्मिनस जा कर दिल्ली की ट्रेन ले ली| २७ नवम्बर की दोपहर दिल्ली‌ में निजामुद्दीन उतर कर दिल्ली परिवहन निगम की बस से आनन्द विहार टर्मिनस गए| यहाँ से पिथौरागढ़ के लिए बस चलती हैं| इस बस अड़्डे पर बहुत से शहरों के लिए बसें निकलती हैं जिनमें वाराणसी, गोरखपूर, महेन्द्रनगर (नेपाल) आदि भी है| कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद पिथौरागढ़ की बस मिली| दिवाली की छुट्टियाँ होने के कारण बहुत भीड़ भी है| जैसे ही‌ बस में बैठे, एक मज़ेदार वाकया हुआ| बस में एक तृतीयपंथी आया और उसने मेरे और अन्य कुछ लोगों के सिर पर हात लगा कर पैसे मांगे| तभी उसने मेरी पत्नि को देखा और नमस्कार बोला (बोली)! मेरी पत्नि भी उसे जानती है, क्यों कि उसने मुंबई में इस विषय पर काम करनेवाली संस्था में काम किया है| दोनों में एकदम परिचित की तरह बातें हुई| वह तृतीयपंथी नेपाल का (की) है और वही जा रहा (रही) है! कहाँ कहाँ कैसे पहचान के लोग मिल जाते हैं!






Saturday, June 30, 2018

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा भाग १३: यात्रा समापन (अंतिम)

१३:‌ यात्रा समापन (अंतिम)
 

योग साईकिल यात्रा २१ मई को सम्पन्न हुई| ग्यारह दिनों में लगभग ५९५ किलोमीटर साईकिल चलाई और ग्यारह जगहों के योग साधकों से मिलना हुआ| मेरे लिए यह बहुत अनुठा और विलक्षण अनुभव रहा| इस यात्रा पर अब संक्षेप में कुछ बातें कहना चाहता हूँ| शुरुआत करता हूँ आने के बाद परभणी में निरामय की टीम और परभणी के योग साधकों के साथ हुई चर्चा से| परभणी के निरामय की टीम को मैने मेरे हर दिन के अनुभव कहे| हर जगह पर मिले योग साधकों के बारे में मेरा निरीक्षण बताया| हालांकी सिर्फ एक ही दिन मिलने से बहुत कुछ जाना नही जा सकता है| लेकीन चूँकी मेरा सामाजिक संस्था के क्षेत्र में अनुभव रहा है, कई बातें मैने हर जगह पर देखी| हर जगह के साधक और टीम या टीम का अभाव भी देखा| ये निरीक्षण सिर्फ मेरी एक प्रतिक्रिया के तौर पर देखिए, इसे एक ठोस राय मत मानिए, ऐसा भी मैने कहा| हर जगह बहुत से लोग रोज मिलते रहे| लोगों ने बहुत सारी बातें भी कहीं| लेकीन जो कहा क्या वही वास्तव है, यह भी मुझे देखना था| जैसे चर्चाओं में कई लोग कहते थे कि हम इतने बारीकी से और इतने नियमित रूप से योग करते हैं| जब भी कोई ऐसा कहता, तब मै उसके शरीर को देखता| हमारा मन झूठ बोल सकता है, लेकीन शरीर कभी झूठ नही बोलता| कई जगहों पर शरीर ने ऐसी बातों को प्रमाण नही भी‌ दिया| तब मै समझता था कि जब कई लोग सुनने के लिए होते हैं, तो कुछ इन्सान अन्यथा जो नही कहेंगे, वैसी बातें भी कह जाते हैं| खैर| इसलिए मेरी यात्रा और मेरे सभी अनुभवों के बारे में मैने मेरी प्रतिक्रियाएँ निरामय टीम को दी| हर जगह का कार्य, वहाँ के कार्यकर्ताओं की‌ समझ, उनके कार्य की गहराई आदि पर मेरा जो कुछ छोटा सा निरीक्षण रहा, वह मैने उन्हे कहा| साथ में यह भी‌ बताया कि मैने इस यात्रा में क्या किया और क्या मै कर नही सका| जैसे चर्चा का संचालन करना या सम्भाषण करना मेरा गुण नही है| इसकी कमी एक- दो जगहों पर मुझे महसूस हुई|‌ कहीं कहीं पर थकान के कारण मेरा सहभाग उतना अधिक नही रहा| यह भी निरामय टीम को बताया|





Thursday, June 28, 2018

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा भाग १२: मानवत- परभणी

१२: मानवत- परभणी
 

योग साईकिल यात्रा का अन्तिम दिन- २१ मई की सुबह| आज यह यात्रा समाप्त होगी! मेरे लिए यह पूरी यात्रा और हर पड़ाव बहुत अनुठे रहे है| मेरे लिए बहुत कुछ सीखने जैसा इसमें मिला| बहुत लोगों से और साधकों से मिलना हुआ| कुल मिला कर एक अविस्मरणीय यह यात्रा रही है| इसके बारे में विस्तार से अगले अन्तिम लेख में बात करूँगा| अभी बात करता हूँ इस यात्रा के साईकिल चलाने के अन्तिम दिन की| मानवत- परभणी दूरी छोटी है, इसलिए रास्ते में रूढि गाँव के योग- शिविर पर जाना हुआ| मानवत से इस शिविर तक मेरे साथ श्री पद्मकुमारजी कहेकर जी भी आए| रूढ़ी गाँव में स्वामी मनिषानन्द जी‌ का आश्रम है और यहाँ पर मिटकरी सर योग शिविर लेते हैं| मिटकरी सर से कल मिलना भी हुआ था| सुबह छह बजे इस शिविर में पहुँचा| लगभग पच्चीस- तीस बच्चे योग कर रहे हैं|‌ थोड़ी उनसे बातचीत की| आश्रम में स्वामीजी से मिलना हुआ| उनका आशीर्वाद प्राप्त हुआ| यह भी इस यात्रा की एक खास बात रही|‌ कई तरह के एनर्जी फिल्डस और डॉ. प्रशान्त पटेल अर्थात् स्वामी प्रशांतानंद जी जैसे कई दिग्गज साधकों का भी सत्संग मिला| 





Tuesday, June 26, 2018

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा भाग ११: मंठा- मानवत

११: मंठा- मानवत

यह लिखते लिखते एक महिना हो गया, लेकीन अब भी सब नजरों के सामने है| योग साईकिल यात्रा का दसवा दिन २० मई की सुबह| आज सिर्फ ५३ किलोमीटर साईकिल चलानी है| अब यह यात्रा आखरी दिनों में है| लेकीन कल का दिन क्या खूब रहा! मंठा में बहुत अच्छी चर्चा हुई| कई साधकों से और कार्यकर्ताओं से अच्छा मिलना हुआ| आज मानवत में जाना है| रोज के जैसे ही सुबह ठीक साढ़ेपाँच बजे निकला| कुछ दूरी तक डॉ. चिंचणे जी मुझे छोडने आए| कल बहुत उखडी हुई सड़क थी|  आज अच्छी सड़क है| हमारा मन बहुत छलाँग लगाता है| अब भी इस यात्रा के पूरे दो दिन बाकी है, लेकीन मन तो पहुँच गया वापस| लेकीन फिर भी सजगता रखते हुए मन को वर्तमान में ला कर आज के चरण का आनन्द ले रहा हूँ| इतनी शानदार यह यात्रा रही है कि जो भी पल बचे हैं, उनका आनन्द पूरी तरह से लेना चाहिए|

साईकिल पर यात्रा करते समय मैने अक्सर देखा है कि कोई‌ भी सड़क कितनी भी परिचित क्यों ना हो, उस पर हम जो अलग- अलग राईड करते हैं, उसका मज़ा अलग अलग होता है| अगर हम एक ही रूट पर लगातार- हमेशा- साईकिल चला रहे हैं, तब भी हर एक राईड का मजा अलग ही होता है| और इसका कारण यह है कि राईड चाहे एक जैसी हो, साईकिल वही हो, रूट भी वही हो, लेकीन हम तो वही नही होते हैं- देखनेवाला वही नही होता है! साथ में हमारा मन, विचार, भावनाएँ तो हर समय बदलती रहती है| किसी विचारक ने कहा है कि कोई भी एक नदी में दो बार डुबकी नही लगा सकता है| इसके दो कारण हैं- एक तो नदी की धारा बहती रहती है; पानी आगे- और आगे जाता है; और दूसरी बात हम भी हर पल बदलते रहते हैं| मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि हम में इतने परम्युटेशन्स- काँबीनेशन्स होते हैं कि हम बिल्कुल भी थिर नही रह सकते हैं| जो भी इन्सान खुद से प्रामाणिक है, वह अक्सर यह अनुभव करता है कि उसका मन कई बार उसी के विपरित जाता है| इसलिए व्यक्तित्व में द्वंद्व पैदा होते है| कई बार इसी तरह बहुत तनाव होता है और कई बार हम आत्महत्या की खबरें भी सुनते हैं| ऐसे मे हमारे शरीर- मन में यह सब जो बदलाव होते हैं, उसे देखनेवाला जो है, उसे जानके का नाम ध्यान है| साईकिल चलाते समय भी उस समय जो कुछ घट रहा है- जो अनुभव आ रहे हैं, जो विचार मन में आ रहे हैं, उनका साक्षी बनने का प्रयास करते हुए आगे बढ़ रहा हूँ|




 


Tuesday, June 19, 2018

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा भाग १०: मेहकर- मंठा

१०: मेहकर- मंठा
 

आज यह लिखते समय बरसात शुरू हो गई है, लेकीन योग साईकिल यात्रा का नौवा दिन बहुत गर्मी का था- १९ मई की सुबह| आज लगभग ७० किलोमीटर साईकिल चलानी है| और आज की सड़क भी निम्न गुणवत्ता वाली है| इसकी एक झलक कल देखी है| इसलिए ये ७० किलोमीटर बेहद कठीन जाएंगे| सुबह मेहकर में मन्दीर के पास चलनेवाले एक महिला योग वर्ग की साधिकाओं से मिल कर आगे बढ़ा| आज की सड़क पर विश्व प्रसिद्ध लोणार सरोवर आएगा जो एक उल्का के गिरने से बना है| जल्द ही सुलतानपूर से आगे निकला| यहाँ से लोणार सिर्फ बारह किलोमीटर है, लेकीन अब सड़क बहुत बिगड़ने लगी| बिल्कुल उखडी हुई टूटी फूटी‌ सड़क| नया चार या छह लेन का हायवे बनाने के लिए पूरी सड़क ही उखाड़ दी गई है| बीच बीच में थोड़ी सी सड़क; बाकी सिर्फ पत्थर और मिट्टी!

लोणार के कुछ पहले सड़क के पास एक खेत में एक लोमड़ी से मिलना हुआ| पहले तो कुत्ता ही लगा, लेकीन फिर काला मुंह और गुच्छे जैसी पूँछ! जरूर यह पानी की तलाश में खेत- गाँवों में आया होगा| उसने भी मुझे देखा, लेकीन उसे इन्सान देखनी की आदत होगी, इसलिए वह आगे बढ गया| यह मुख्य  शहरों को जोड़नेवाली सड़क न होने के कारण यातायात कम ही है| धीरे धीरे लोणार पास आता गया| लेकीन उसके साथ यह भी तय हुआ कि आज यात्रा बिल्कुल कछुए की गति से होनेवाली है| लोणार गाँव के बाद नाश्ता किया और आगे सरोवर की तरफ बढ़ा|‌ सरोवर सड़क के पास ही है| बचपन में एक बार यह सरोवर देखा था| आज की यात्रा बहुत लम्बी होने के कारण सड़क से थोड़ा हट कर उपर से ही सरोवर देखा और आगे बढ़ा| यह अभयारण्य होने के कारण मोर की आवाज आ रही है|


लोणार सरोवर!!