Wednesday, October 23, 2019

फिट रहेंगे!!


नमस्कार. आपके साथ मेरी एक नई पहल के बारे में शेअर करना चाहता हूँ|

क्या आपको लगता हैं कि आप फिट हैं और आपको और फिट होना है?

क्या आपको लगता है कि आपने व्यायाम करना चाहिए?

क्या आपको स्वस्थ जीवनशैलि अपनानी है?

और यह सब करते समय आपको कुछ दिक्कतें आती हैं, कुछ प्रश्न आते हैं?

अगर हाँ, तो आपके लिए मै लाया हूँ एक सुन्दर कल्पना| अधिक फिट, अधिक स्वस्थ एवम् सकारात्मक जीवनशैलि की तरफ जाने के लिए एक राहगीर है| अगर आपकी पूरे मन के साथ इच्छा है, तो आपको स्वयं की सहायता करने में मै आपकी सहायता कर सकता हूँ| अगर आपको लगता है कि आपको अधिक फिट, अधिक एक्टीव्ह होना है, तो आपके लिए यह कैसे सम्भव है, इसको ले कर मै आपका साथ दे सकता हूँ|

(पोस्ट का लेखक साईकिलिस्ट, मॅरेथॉनर और योग ध्यान प्रेमी है| कई साईकिल याताएँ, ट्रेकिंग, योग, ध्यान इसके अनुभव ब्लॉग पर उपलब्ध हैं- www.niranjan-vichar.blogspot.in)

शायद आपको लगता होगा कि स्वयं में ऐसा परिवर्तन लाना बहुत कठिन है, समय नही है, फुरसत नही है, कई बन्धन हैं| पर मै आपसे कहना चाहूँगा कि इन सबके बावजूद यह सम्भव है| इसके लिए मेरे पास एक संकल्पना है| आप और आपके साथ होनेवाले आपके मित्र- करीबी इन सबको खुद की सहायता करने के लिए मै सहायता करूँगा| आपका रूटीन, आपका दिनक्रम, आपकी आदतें, आपकी पसन्द, आपने पहले किए हुए व्यायाम इन सबको सामने रख कर मै आपको ऐसा व्यायाम प्रकार बताऊँगा जो आप हफ्ते में पाँच दिन तो जरूर कर सकेंगे| आपके लिए मै उस व्यायाम की एक समय सारणी बनाऊँगा और हर हफ्ते में आप कितने घण्टे एक्टीव्ह हैं, इस पर ध्यान रखूँगा| आप और आपके साथ होनेवाले अन्य लोग इनका हम एक ग्रूप बनाएँगे|‌ इस ग्रूप में मेरे सहित हर कोई हर रोज अपना फिटनेस अपडेट देता रहेगा| तीन महिनों तक मै आपके हर रोज के और हर हफ्ते के फिटनेस घण्टों का रिकार्ड रखूँगा| यदि कभी आप यात्रा कर रहे होंगे, कभी बिजी होंगे, तो उस समय भी आप कौनसे व्यायाम कर सकते हैं, यह भी आपको कहूँगा| आपको यदि दूसरा कुछ व्यायाम करना हो, तो किस तरह से वह किया जा सकता है, यह भी आपसे कहूँगा|

Monday, October 14, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ११ (अन्तिम): इस यात्रा का विहंगावलोकन

११ (अन्तिम): इस यात्रा का विहंगावलोकन
 

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७ अगस्त की सुबह बससे लोसर से निकला और शाम को मनाली पहुँचा| वास्तव में इस पूरी यात्रा का यह हिस्सा ही सबसे अधिक डरावना और रोचक भी लगा| बहुत ज्यादा बरफ भी‌ करीब से देखने का मौका मिला| अब बात करता हूँ इस पूरी यात्रा के रिलेवन्स की| पहले साईकिल से जुड़े पहलूओं के बारे में बात करता हूँ| सामाजिक विषयओं को लेकर इसके पहले भी मैने कुछ साईकिल यात्राएँ की हैं| लेकीन इस बार विशेष यह रहा कि पहली बार मेरी साईकिल यात्रा के लिए कई संस्थाएँ और लोग भी सामने आए| एक तरह की स्पॉन्सरशिप मुझे मिली| जैसा मैने पहले लेख में कहा था, स्पॉन्सरशिप एक आंशिक हिस्सा ही होती है, बाकी की तैयारी और प्रैक्टीस राईडस आदि से जुड़ा बहुत बड़ा खर्चा स्वयं ही करना होता है| फिर भी, इस तरह की स्पॉन्सरशिप प्राप्त करना एक साईकिलिस्ट के तौर पर मेरे लिए बड़ी बात है| मै फिर एक बार मन्थन फाउंडेशन, रिलीफ फाउंडेशन एवम् अन्य सब संस्थाएँ तथा व्यक्तियों को धन्यवाद देता हूँ जिन्होने कई तरह से इस यात्रा में सहयोग दिया, एक तरह का सहभाग भी लिया| हिमाचल प्रदेश में और अंबाला में भी मुझे कई लोगों से मदद लेनी पड़ी, उन्हे भी उनके सहयोग के लिए धन्यवाद! अगर इस तरह का सहयोग मुझे मिला न होता, तो मेरे लिए ऐसी यात्रा करना लगभग नामुमकीन होता| दूसरी बात साईकिल को लेकर मैने जो तैयारी की‌ थी, जो व्यवस्थाएँ की थी, वे सब कारगर साबित हुई| जैसे साईकिल को महंगे प्रचलित टायर्स के बजाय देसी लेकीन मजबूत टायर्स डाले थे| बहुत से पथरिले और खतरनाक रास्तों पर चलने के बावजूद एक भी पंक्चर नही हुआ! उसके साथ मैने साईकिल के लिए मेरे साईकिल मित्र और साईकिल रेसर शेख खुदूस से जो थैला बनवा लिया था, वो भी बहुत काम आया| इस तरह से अब ट्रेन में आसानी से साईकिल कहीं से कहीं ले जा सकता हूँ! एक परेशानी हमेशा के लिए हल हुई| साईकिल चलाने से जुड़ी बाकी तैयारी भी वैसे ही काम आई| साईकिल को भी धन्यवाद देता हूँ, उसने खूब साथ निभाया!






Thursday, October 10, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति १०: एक बेहद डरावनी बस यात्रा

१०: एक बेहद डरावनी बस यात्रा
 

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५ अगस्त की शाम को बड़े बुरे हालत में लोसर पहुँचा! काज़ा से सुबह निकलते समय तो सोचा था कि  काज़ा से लोसर और लोसर से कुंजुमला दर्रे तक जाऊँगा और वैसे ही वापस काज़ा को जाऊँगा| लेकीन सड़क और शरीर की स्थिति देखते हुए यह सम्भव नही है| इसलिए लोसर से ही बस लेनी होगी| और लोसर से मनाली की बस चलती है! लेकीन उसके लिए भी अच्छा विश्राम करना होगा| इसलिए तय किया कि लोसर में एक दिन विश्राम करूँगा और उसके बाद दूसरे दिन मनाली के लिए निकलूंगा| लोसर! स्पीति का तिसरा मुख्य गाँव और कुंजुमला दर्रे का बेस! यहाँ से ४५५० मीटर ऊँचाई का कुंजुमला दर्रा सिर्फ १९ किलोमीटर ही है| और वहाँ से सड़क बड़े ही दुर्गम क्षेत्र से बढ़ते हुए मनाली की ओर जाती है! स्पीति से यह सड़क लाहौल जाती है| लोसर में पहुँचने पर देखा कि मोबाईल टॉवर तो है! लेकीन नेटवर्क नही है| यहाँ बिजली बहुत अनियमित होती है, इसलिए जब बिजली आती है, तभी मोबाईल भी चलता है| इस यात्रा के पहले लगा था कि मोबाईल के बिना कुछ दिन विपश्यना जैसी स्थिति में गुजरने तो मज़ा आएगा| लेकीन यहाँ एक तरह से मोबाईल और कनेक्टिविटी का लगाव नही छुटता दिखाई दे रहा है| खैर| शाम को बिजली आई और थोड़ा नेटवर्क भी आया| लोसर में मेरे होटल में लिखा है- आप ४०७९ मीटर पर डिनर कर रहे हैं! लोसर में शाम तो थोड़ी अच्छी गई| लेकीन रात में बहुत ज्यादा ठण्ड बढ़ गई! रात को शेअरिंग सिस्टम के कमरे में हिमाचल के अन्य यात्री भी हैं| उनसे भी थोड़ी बात हुई|







अगली सुबह थोड़े आराम से नीन्द खुली| बहुत ज्यादा ठण्ड है! आज कुछ भी करना नही है| लेकीन साईकिल तो फोल्ड करनी होगी| कल सुबह मनाली की बस मिलेगी| सुबह दो बार चाय का आनन्द लिया| होटल में कमरा दूसरी मंजिल पर है और सामने बहुत सुन्दर दृश्य दिखाई देते हैं! मेरी स्थिति ठीक नही है, लेकीन कितनी सुन्दर जगह है यह! पास ही की पहाड़ी पर लोसर गोम्पा भी है| लेकीन वहाँ जाने की इच्छा नही हुई| चढाई भी है| सुबह काफी देर बाद ठण्ड थोड़ी कम हुई| मौसम भी ठीक नही है, बादल उमड़े हैं| ज्यादा तर समय पुराने जमाने के नोकिया मोबाईल में गाने सुनता रहा| इस छोटे से शुद्ध फोन ने इस यात्रा में बड़ा साथ दिया! दोपहर जब इच्छा हुई, तो साईकिल को फोल्ड कर दिया| फोल्ड कर साईकिल कॅरी केस अर्थात् बोरे में रख दी| बेचारा स्टैंड टूटा है| सुबह की बस का पता किया| यहाँ से मनाली के लिए बस निकलती है सुबह सांत बजे| यह बस है काज़ा से लोसर- ग्राम्फू- मनाली- कुल्लू! इसी बस से मनाली तक जाऊँगा और वहाँ से अंबाला| अब ट्रेन का टिकिट भी नया निकलना होगा| एक तरह से अब भी हताशा तो है, लेकीन this is part and parcel of the game! साईकिल चलाना या अन्य कोई भी खेल हो, उसमें तो ऐसी चीजें होती ही हैं| कभी रिटायर्ड हर्ट होना पड़ता है, कभी इंज्युरी होती है, कभी स्थिति खराब भी होती है| वैसे मेरी योजना २०- २१ दिन साईकिल चलाने की थी, लेकीन सिर्फ ८ दिन चला पाया| एक तरह से क्रिकेट की भाषा में चार टेस्ट की‌ शृंखला का पहला मैच मैने जिता, दूसरे मैच के तीन दिन भी अच्छे गए और अन्त में वह मैच ड्रॉ हुआ और बाकी के दो मैच भी रद्द हुए| कुल मिला कर १-० रही यह शृंखला! और हताशा के बावजूद मुझे लगभग लोसर तक की इस अविश्वसनीय यात्रा का एक तरह से फक्र रहेगा, अचिव्हमेंट का एहसास भी रहेगा|






Friday, October 4, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ९: काज़ा से लोसर. . .

९: काज़ा से लोसर. . .
 

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५ अगस्त की सुबह! काज़ा में अच्छा विश्राम हुआ| अब तय हो गया है कि मै लदाख़ की तरफ नही जा पाऊँगा, क्यों कि जम्मू- कश्मीर बन्द अभूतपूर्व रूप से शट डाउन हुआ है| इस कारण अब मन में दो विचार हैं| मन का एक हिस्सा कह रहा है केलाँग तक तो जाओ कम से कम| केलाँग हिमाचल में ही है| और मेरी योजना के अनुसार वहाँ पहुँचने में और चार दिन लगेंगे| लेकीन उसमें दिक्कत यह है कि तबियत उतनी विश्वासभरी नही लग रही है|‌ और केलाँग तक पहुँचने के पहले मुझे लोसर- बातल- ग्राम्फू इस क्षेत्र से गुजरना होगा और इस क्षेत्र में सड़क है ही नही| या यूं कहे की बीच में सिर्फ कुछ जगह है जो ग्लेशियर्स, झरने, नदी, पहाड़, खाई इन के बीच से बची हुई है! और कहने के वास्ते "इधर" से वाहन निकलते हैं और कैसे तो भी "उधर" पहुँच जाते हैं| इस ट्रैक का डर बहुत लगने लगा है| वैसे तो मै दुनिया के तथा कथित सबसे दुर्गम सड़क पर साईकिल चला कर ही आ रहा हूँ, लेकीन यहाँ आगे तो सड़क भी नही होगी| और दूसरी बात यह भी लग रही है कि जब लदाख़ जाना ही नही होगा, तो सिर्फ केलाँग तक जाने से भी कुछ खास फर्क नही होगा और सिर्फ केलाँग तक जाने के लिए उस ट्रैक से जाने का मतलब नही लग रहा है| यह निर्णय या इस सोच में एक बड़ा आधार अन्त:प्रेरणा का भी होता है| हम सब परिस्थिति पर गौर करते हैं, जैसे सड़क की स्थिति, मौसम, शरीर का मैसेज और इन सब पर निर्णय लेने का काम भीतर  की आवाज़ का होता है| और वह आवाज़ मुझे अब रूकने के लिए कह रही है| भीतर की आवाज़ का बहुत महत्त्व होता है| क्यों कि मै यहाँ तक आया भी तो उसी आवाज के कहने पर! सब तैयारी की, सब जुगाड़ किए, उसी आवाज़ के कहने पर! अब वही आवाज़ मुझे और आगे जाने से रोक रही है तो रुकना होगा... आखिर कर काज़ा से निकलते समय यही सोच कर निकला कि काज़ा से लोसर तक जाऊँगा और लोसर से कुंजुमला टॉप तक जाकर वहीं से वापस लौटूंगा| मेरी कुल योजना २०- २१ दिनों की थी, तो और तीन दिन साईकिल चलाने पर कम से कम आधी योजना पूरी हो जाएगी अर्थात् १० साईकिल चलाना हो जाएगा और आँकडों के लिए ६०० किलोमीटर भी पूरे हो जाएंगे| अर्थात् अब सिर्फ तीन दिनों का साईकिलिंग बाकी है|







Tuesday, October 1, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ८: ताबो से काज़ा

८: ताबो से काज़ा
 

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३ अगस्त को नाको से ताबो पहुँचा| ताबो बहुत शानदार गाँव लगा| छोटा सा, लेकीन सड़के अच्छी हैं, होटल- दुकान भी हैं, लेकीन फिर भी गाँव ही है| पर्यटक और विदेशी पर्यटक भी हैं, लेकीन फिर भी शान्त गाँव लगा| नाको से ताबो की ऊँचाई तो कम है, लेकीन घूमक्कड़ी के लिहाज से उसका "कद" नाको से अधिक है! ताबो का होम स्टे बहुत अच्छा रहा| जिस घर में मै ठहरा था, उन्होने रात में भी नीचे घर में ही खाने के लिए बुलाया| एक तरह का बहुत ही अपनापन यहाँ मिला| परिवारवालों से बातचीत भी हुई| स्पीति के स्थानियों का घर अन्दर से देखने को मिला| और जाहीर तौर पर तिब्बत का करीब होना पता चल रहा है| क्यों कि हम जिसे ड्रॉईंग रूम कहते हैं, वहाँ पर ध्यान और प्रार्थना के लिए नीचे गद्दे बिछाए हैं| या गद्दे जैसे आसन| एक साथ पन्द्रह लोग बैठ कर ध्यान कर सकें, ऐसी व्यवस्था है| आदरणीय दलाई लामा जी का फोटो और मन्त्र फ्लैग्ज तो हर तरफ है ही|
 

यहाँ व्हॉईस और डेटा दोनो का कुछ नेटवर्क मिलने से घर पर और मित्रों से दो दिन के बाद ठीक बात हो सकी| कई सारे समाचार भी मिले| जम्मू- कश्मीर में अभूतपूर्व परिस्थिति है| अमरनाथ यात्रा रोकी गई है और सभी पर्यटकों को वहाँ से निकलने के लिए कहा गया है| इससे मेरी यात्रा भी बीच में खण्डित होगी| क्यों कि बाद में मुझे मनाली- लेह हायवे से लेह की तरफ जाना है जो की मै नही जा पाऊँगा| और इतनी अभूतपूर्व परिस्थिति में सब तरह के रिस्ट्रिक्शन्स भी वहाँ होंगे| जब यह समाचार मिला, तो सच कहता हूँ, एक तरह से राहत ही मिली| क्यों की लगातार चल रही अनिश्चितताओं से भरी यात्रा का मानसिक दबाव भी बहुत बना था| जब पता चला की, मै लेह की तरफ आगे नही जा पाऊँगा, तो सच में एक तरह का सुकून ही मिला| शिमला से निकल कर ताबो तक पहुँच तो गया हूँ, लेकीन शारीरिक और मानसिक दृष्टि से अब बहुत थकान भी हुई है| इस समाचार ने एक तरह से इस यात्रा का रूख भी और दिशा भी बदल ही‌ दी| बीच बीच में बारीश का अलर्ट भी चल रहा है| हिमाचल और जम्मू- कश्मीर की सीमा अभी बहुत दूर है| लेकीन तबियत को देखते हुए उस सीमा तक भी जा पाना कठीन लग रहा है| ४ अगस्त को ताबो से काज़ा के लिए निकला तो सब इस तरह से अनिश्चित बना हुआ है| हालांकी आज की यात्रा ज्यादा कठिन नही होगी, इस यात्रा का सबसे छोटा पड़ाव- सिर्फ ४७ किलोमीटर आज है|



  



Thursday, September 26, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ७: नाको से ताबो

७: नाको से ताबो
 

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१ अगस्त का वह दिन! गलितगात्र स्थिति में नाको पहुँचा| क्या दिन रहा यह! लगभग शाम होते होते अन्धेरे के पहले नाको पहुँच गया! जीवनभर के लिए अविस्मरणीय राईड रही! अविश्वसनीय भी! नाको में एक होटलवाले की जानकारी तो मिली थी, लेकीन थकान की वजह से सड़क पर जो होटल मिला, वही रूक गया| पहुँचते पहुँचते बहुत ठण्ड लगने लगी थी| गर्म पानी मिला तो नहा लिया| फिर धीरे धीरे कुछ राहत मिलती गई| गर्म चाय पी, गर्म खाना भी खाया| चारों ओर अद्भुत नजारे हैं! दोपहर तक मौसम जहाँ अच्छा था, वहीं अब बादल मंडलाए हैं| बहुत जगह पर बर्फ भी दिखाई दे रही है, ये जरूर दूर दूर के पहाड़ होंगे| सामने ही एक टीले पर बहुत ऊँचाई पर बना मन्दीर भी दिखाई दे रहा है| ठण्ड भी बढ़ गई है| दूर खाई में लकीर जैसी स्पीति बहती दिखाई दे रही है| एक दिक्कत यह है कि यहाँ मोबाईल नेटवर्क बिल्कुल न के बराबर है| और इसकी अपेक्षा भी थी| लेकीन मोबाईल नेटवर्क अगर पूरा नही होता, तो भी ठीक होता. बहुत धिमा सा नेटवर्क है, जिससे मॅसेज भेजे जाने की उम्मीद बनी है| लेकीन कुल मिला कर रात को किसी से बात नही हो सकी| सिर्फ दो मैसेज सेंड हो सके|









Thursday, September 12, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ६: स्पिलो से नाको

६: स्पिलो से नाको
 

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३१ जुलाई शाम को स्पिलो में होटलवाले युवकों‌ से अच्छी‌ बात हुई| यहाँ‌ से अब बौद्ध समुदाय ही मुख्य रूप से हैं| रहन- सहन और खाना भी लदाख़ जैसा लग रहा है| किन्नौर के इस दूरदराज के क्षेत्र में गाँव यदा कदा ही होते हैं| इसलिए हर एक गाँव में होटल, राशन, होम स्टे, बैंक आदि सब सुविधाएँ होती हैं| यहाँ पर पहले ब्लास्टिंग और सड़क की स्थिति का पता किया| मेरे जाने के बाद परसो स्पिलो के कुछ आगे ब्लास्टिंग किया जाएगा| सड़क फिलहाल तो ठीक है| स्पिलो में अच्छा नेटवर्क मिल रहा है, इसलिए आगे के रूट के बारे में कुछ पता किया| जब इंटरनेट पर पूह (पू) गाँव के बारे में देखा, तो पता चला कि १९०९ में‌ यहाँ तक- हिमालय में इतने अन्दर तक एक विदेशी‌ आया था और उसने निरीक्षण किया कि पूह (पू)‌ में सभी लोग तिब्बती बोलते हैं! अगले दिन याने १ अगस्त को मुझे वही‌ं से जाना है| सुबह निकलने के पहले जब प्रेयर व्हील के पास टहल रहा था, तब कुछ लोगों ने मुझसे बात की| उन्होने मेरे अभियान के बारे में जानना चाहा, बाद में रूचि भी ली| श्री नेगी जी से बात हुई| उन्होने मुझे आज के नाको के होटल का भी सम्पर्क दिया| मुझे शुभकामनाएँ भी दी| सुबह आलू- पराठे का नाश्ता करने के बाद निकला| आज शायद बीच में होटल कम ही लगेंगे, इसलिए बिस्कीट और केले भी ले लिए| कल के मुकाबले आज अच्छी धूप खिली है, आसमाँ नीला नजर आ रहा है| स्पिलो छोडते समय तो मुस्कुरा रहा हूँ....







Monday, September 9, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ५: टापरी से स्पिलो

५: टापरी से स्पिलो

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३१ जुलाई! टापरी में सतलुज की गर्जना के बीच नीन्द खुली| कल की साईकिल यात्रा क्या रही थी! और सड़क कितनी अनुठी थी! आज भी यही क्रम जारी रहेगा| अब मन बहुत प्रसन्न एवम् स्वस्थ है| एक दिन में बहुत फर्क लग रहा है| कल डर लग रहा था कि कहाँ आ फंसा हूँ| तब समझाना पड़ा था कि अरे तू तो कुछ दिनों के लिए ही यहाँ होगा, यहाँ के स्थानीय लोग और मिलिटरी के लोग तो कैसे रहते होंगे, सड़क की अनिश्चितताओं को कैसे सहते होंगे| कल ऐसा खुद को कहते कहते ही साईकिल चलाई थी| लेकीन आज तो अब खुद को खुशकिस्मत मान रहा हूँ कि इन सड़कों पर साईकिल चलाने का मौका मिल रहा है| एक तरह से जीवन की आपाधापी, तरह तरह के उलझाव, पहले शिक्षा और बाद में करिअर के दबाव इन सबमें जो जवानी जीना भूल गया था, उसे जीने का यह मौका लग रहा है! आज जाना है स्पिलो को जो लगभग अठावन किलोमीटर दूर होगा| आज भी सड़क बहुत मज़ेदार होगी!








Wednesday, September 4, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ४: रामपूर बुशहर से टापरी

४: रामपूर बुशहर से टापरी
 

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२९ जुलाई की शाम रामपूर बुशहर में बिताई| दो दिन शिमला और नार्कण्डा में ठहरने के बाद यहाँ बहुत गर्मी हो रही है| शाम को कुछ समय के लिए लगा कि बुखार तो नही आया है| उस दिन ठिक से विश्राम नही हो पाया| रात बारीश भी हुई| ३० जुलाई की सुबह नीन्द खुली तो नकारात्मक विचार मन में हैं| शायद ठीक से विश्राम नही हो पाया है और शरीर जब ताज़ा नही होता, तो मन भी ताज़ा नही हो सकता है| दो दिनों की ठण्डक के मुकाबले यह गर्मी कुछ भारी पड़ रही है| बुखार जैसी स्थिति में क्या मै आगे चला पाऊँगा? बारीश के भी आसार लग रहे हैं| कुल मिला कर जब भी ऐसी साईकिल यात्रा की है, पहले दिन मन में जो तनाव होता है; जो शंकाएँ होती हैं, वो सब आज तिसरे दिन मन में हैं| कुछ समय के लिए लगा भी कि शायद आज टापरी जा भी नही पाऊँगा और उसके पहले ही झाकड़ी में ही हॉल्ट करना पड़ेगा| धीरे धीरे हिम्मत बाँधी| सामान भी साईकिल पर बान्धा| पहले दो दिन मै स्पेअर टायर को सीट के नीचे रख रहा था| पेडल चलाते समय वह पैर को चुभ रहा था| अभी उसको सामने हैंडल पर एडजस्ट कर दिया| ऐसे ही बाकी शंकाओं को भी थोड़ा एडजस्ट कर दिया| गेस्ट हाऊस में पराठा खा कर निकलने के लिए तैयार हुआ| जैसे ही निकला, सतलुज की गर्जना फिर तेज़ हुई| हल्की हल्की बून्दाबान्दी भी हो रही है| मन का एक हिस्सा तो बारीश भी चाहता है| क्यों कि अगर बारीश नही होती है, तो यहाँ की गर्मी में साईकिल चलाना कठीन ही होगा| उससे अच्छा है कि कुछ बारीश आ जाए|







Monday, August 26, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ३: नार्कण्डा से रामपूर बुशहर


३: नार्कण्डा से रामपूर बुशहर
 

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२९ जुलाई! इस यात्रा का दूसरा दिन| आज नार्कण्डा से रामपूर बुशहर की तरफ जाना है| कल नार्कण्डा में अच्छा विश्राम हुआ| रात बारीश भी हुई| २७०० मीटर से अधिक ऊँचाई पर रात में कोई दिक्कत नही हुई| और वैसे आज का दिन एक तरह का आसान चरण भी है, क्यों कि आज बिल्कुल चढाई नही है, वरन् बड़ी उतराई है| सुबह चाय- बिस्कीट और केले का नाश्ता कर रेस्ट हाऊस से निकला| नार्कण्डा में कई घर और दुकानों पर 'ॐ मणि पद्मे हुं' मन्त्र लगे हुए हैं! सुबह के लगभग आठ बजने के बाद भी बाहर बहुत कोहरा- धुन्द है| बारीश तो रूक गई है, लेकीन रोशनी बहुत कम है| नीचे बादल दिखाई दे रहे हैं| नार्कण्डा से आगे बढ़ते ही उतराई शुरू होती है| जैसे ही उतराई शुरू हुई, सड़क बादलों के बीच घिर गई| जैसे सड़क नीचे उतरने लगी तो बिल्कुल बादलों का समन्दर शुरू हुआ| विजिबिलिटी बिल्कुल ही कम है| मुश्किल से दस कदमों तक दिखाई दे रहा है| साईकिल पर टॉर्च लगाया| सभी वाहन रोशनी और इमर्जन्सी लाईट लगा कर ही चल रहे हैं! इस तरह की कम रोशनी बड़ी कठिन होती है| अगर पूरी रात हो, तो भी एक तरह से आसानी होती है| धीरे धीरे कुछ बून्दाबान्दी हुई और ठण्ड भी बढ़ गई| तब चेहरे पर मास्क लगा कर आगे बढ़ने लगा| पेडल मारने की जरूरत तो बिल्कुल नही है| यही उतराई अब सीधा शतद्रू अर्थात् सतलुज के करीब आने तक जारी रहेगी!