Tuesday, August 1, 2017

गुरू नानक की वाणि ओशो की जुबानी

नानक को जो पहली झलक मिली परमात्मा की, जिसको सतोरी कहें…वह मिली एक दूकान पर; जहां वे तराजू से गेहूं और अनाज तौल रहे थे। अनाज तौल कर किसी को दे रहे थे। तराजू में भरते और डालते। कहते–एक, दो, तीन… दस, ग्यारह, बारह…फिर पहुंचे वे, तेरा। पंजाबी में तेरह का जो रूप है, वह तेरा। उन्हें याद आ गई परमात्मा की। तेरा, दाईन, दाऊ–धुन बन गई। फिर वे तौलते गए लेकिन संख्या तेरा से आगे न बढ़ी। भरते तराजू में, डालते और कहते, तेरा। भरते तराजू में और डालते, और कहते, तेरा। क्योंकि आखिरी पड़ाव आ गया। तेरा के आगे कोई संख्या है? मंजिल आ गई। तेरा पर सब समाप्त हो गया। लोग समझे कि पागल हो गए। लोगों ने रोकना भी चाहा, लेकिन वे तो किसी और लोक में हैं। वे तो कहे जाते हैं, तेरा। डाले जाते हैं तराजू से, तौले जाते हैं और तेरा से आगे नहीं बढ़ते। तेरा से आगे बढ़ने को जगह भी कहां है?

दो ही तो पड़ाव हैं, या तो मैं या तू। मैं से शुरुआत है, तू पर समाप्ति है।

नानक संसार के विरोध में नहीं हैं। नानक संसार के प्रेम में हैं। क्योंकि वे कहते हैं कि संसार और उसका बनाने वाला दो नहीं। तुम इसे भी प्रेम करो, तुम इसी में से उसको प्रेम करो। तुम इसी में से उसको खोजो।

तो नानक जब युवा हुए और घर के लोगों ने कहा शादी कर लो, तो उन्होंने नहीं न कहा। सोचते तो रहे होंगे घर के लोग कि यह नहीं कहेगा, क्योंकि बचपन से ही इसके ढंग, ढंग के नहीं थे। नानक के बाप तो परेशान ही रहे। उनको कभी समझ में न आया कि क्या मामला है। भजन में, कीर्तन में, साधु-संगत में…।

भेजा बेटे को सामान खरीदने दूसरे गांव। बीस रुपए दिए थे। सामान तो खरीदा, लेकिन रास्ते में साधु मिल गए, वे भूखे थे। बाप ने चलते वक्त कहा था, सस्ती चीज खरीद लाना और इस गांव में आ कर महंगे बेच देना। यही धंधे का गुर है। दूसरे गांव से सस्ते में खरीदना, यहां आ कर महंगे में बेच देना। यहां जो चीज सस्ती हो खरीदना, दूसरे गांव में महंगे में बेच देना। यही लाभ का रास्ता है। तो कोई ऐसी चीज खरीद कर लाना जिसमें लाभ हो। नानक लौटते थे खरीद कर, मिल गई साधुओं की एक जमात, वे पांच दिन से भूखे थे। नानक ने पूछा कि भूखे बैठे हो! उठो, कुछ करो। जाते क्यों नहीं गांव में? उन्होंने कहा, यही हमारा व्रत है। कि जब उसकी मर्जी होगी, वह देगा। तो हम आनंदित हैं। भूख से कोई अंतर नहीं पड़ता।

तो नानक ने सोचा कि इससे ज्यादा लाभ की बात क्या होगी कि इन परम साधुओं को यह भोजन बांट दिया जाए जो मैं खरीद लाया हूं! बाप ने यही तो कहा था कि कुछ काम लाभ का करो।

बांट दिया। साथी था साथ में, मित्र था साथ में, उसका नाम बाला था। उसने कहा, क्या करते हो, दिमाग खराब हुआ है? नानक ने कहा, यही तो कहा था पिता ने कि कुछ लाभ का काम करना। इससे ज्यादा लाभ क्या होगा? बांट कर बड़े प्रसन्न घर लौट आए।

इसलिए कहता हूं, ढंग के न थे। बाप ने कहा कि मूरख! ऐसे कहीं धंधा हुआ है? तू बरबाद कर देगा। और नानक ने कहा कि आप नहीं सोचते कि इससे ज्यादा लाभ की और क्या बात होगी? लाभ कमा कर लौटा हूं।

लेकिन यह लाभ किसी को दिखाई नहीं पड़ता था। नानक के पिता कालू मेहता को तो बिलकुल दिखाई नहीं पड़ता था। उनको तो लगता था, लड़का बिगड़ गया। साधु-संगत में बिगड़ा। होश में नहीं है। सोचा कि शायद स्त्री से बांधने से कुछ राहत मिल जाएगी।

अक्सर ऐसा लोग सोचते हैं। सोचने का कारण है। क्योंकि संन्यासी स्त्री को छोड़ कर भागते हैं। तो अगर किसी को गृहस्थ बनाना हो, तो स्त्री से बांध दो। पर नानक पर यह तरकीब काम न आयी। क्योंकि यह आदमी किसी चीज के विरोध में न था।

बाप ने कहा, शादी कर लो। नानक ने कहा, अच्छा। शादी हो गई। लेकिन इसके ढंग में कोई फर्क न पड़ा। बच्चे हो गए, लेकिन इसके ढंग में कोई फर्क न पड़ा।

इस आदमी को बिगाड़ने का उपाय ही न था, क्योंकि संसार और परमात्मा में इसे कोई भेद न था। तुम बिगाड़ोगे कैसे? जो आदमी धन छोड़ कर संन्यासी हो गया, बिगाड़ सकते हो, धन दे दो। जो आदमी स्त्री छोड़ कर संन्यासी हो गया, एक सुंदर स्त्री को उसके पास पहुंचा दो, बिगाड़ सकते हो। लेकिन जो कुछ छोड़ कर ही नहीं गया, उसको तुम कैसे बिगाड़ोगे? उसके पतन का कोई रास्ता नहीं है। नानक को भ्रष्ट नहीं किया जा सकता।






 


















इसलिए मैं भी पक्ष में हूं कि संन्यासी तो नानक के ही होने चाहिए। क्योंकि संन्यासी वही परम है, जिसको भ्रष्ट न किया जा सके। भ्रष्ट तुम उसी को न कर सकोगे जो ठीक तुम्हारे संसार में बैठा है, और फिर भी वहां नहीं है। तुम उसे कैसे भ्रष्ट करोगे? उसने सब उपाय तोड़ दिए।
इसलिए नानक कहते हैं, कुछ छोड़ कर कहीं भागना नहीं है। जहां तुम हो, वहीं वह छिपा है। इसलिए नानक ने एक अनूठे धर्म को जन्म दिया है, जिसमें गृहस्थ और संन्यासी एक है। और वही आदमी अपने को सिक्ख कहने का हकदार है, जो गृहस्थ होते हुए संन्यासी हो; संन्यासी होते हुए गृहस्थ हो। सिर के बाल बढ़ा लेने से, पगड़ी बांध लेने से कोई सिक्ख नहीं होता। सिक्ख होना बड़ा कठिन है। गृहस्थ होना आसान है। संन्यासी होना आसान है; छोड़ दो, भाग जाओ जंगल। सिक्ख होना कठिन है। क्योंकि सिक्ख का अर्थ है–संन्यासी, गृहस्थ एक साथ। रहना घर में और ऐसे रहना जैसे नहीं हो। रहना घर में और ऐसे रहना जैसे हिमालय पर हो। करना दूकान, लेकिन याद परमात्मा की रखना। गिनना रुपए, नाम उसका लेना।

ओशो: एक ओंकार सतनाम