Tuesday, October 16, 2018

साईकिल पर कोंकण यात्रा भाग २: पुणे से सातारा (१०५ किमी)

भाग २: पुणे से सातारा (१०५ किमी)
 

इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए|

७ सितम्बर की सुबह| आज इस यात्रा का बड़ा दिन है| आज सौ किलोमीटर से अधिक साईकिल चलाऊँगा| सुबह उजाला होते होते शुरुआत की| आज पहले ही घण्टे में कात्रज घाट या कात्रज टनेल की चढाई होगी| इस रूट पर कुछ दूरी तक पहले भी गया हूँ, इसलिए कोई कठिनाई नही है| पुणे के धायरी इलाके से निकलने के बाद थोड़ी देर में कात्रज टनेल की चढाई शुरू हुई| साईकिल में ब्लिंकर ऑन कर दिया| साथ में साईकिल पर और हेलमेट पर भी कई जगह पर लाल स्टिकर्स चिपकाए हैं| और लाईट में चमकनेवाला रिफ्लेक्टिव जैकेट भी पहना है| आज के दिन जरूर मुझे बरसात मिलेगी, उसकी भी अच्छी तैयारी की है| टनेल तक चढाई है और उसके बाद लम्बी उतराई! टनेल लगभग आठ किलोमीटर की चढाई के बाद आता है| सवा किलोमीटर टनेल में साईकिल चलाई| वाकई यह अनुभव कितने भी बार लिया हो, फिर भी अनुठा है| धीरे धीरे जैसे टनेल खत्म होता है, उजाला फिर से आता है|‌ यह हम सबके जीवन कहानि का भी हिस्सा है! अब यहाँ से निरंतर पच्चीस किलोमीटर तक उतराई|









Saturday, October 13, 2018

साईकिल पर कोंकण यात्रा भाग १: प्रस्तावना

भाग १: प्रस्तावना

नमस्ते! कोंकण में साईकिल पर घूमना मेरा कई बरसों का सपना सा था| पहले एक बार इसका असफल प्रयास भी किया था| लेकीन इस बार यह सपना सच हुआ| साईकिल पर कोंकण में घूम सका- अकेले सोलो साईकिलिंग करते हुए| अब इसके बारे में विस्तार से बात करता हूँ| पहली बात तो यह की यह यात्रा मेरी नई हायब्रिड साईकिल मेरीडा स्पीडर 100 पर पहली यात्रा है| मार्च में यह हायब्रिड साईकिल ली| इसपर दो शतक भी हुए, लेकीन हर बार पंक्चर हुआ| मेरी पुरानी एमटीबी साईकिल और यह हायब्रिड साईकिल में पुराने ज़माने का नोकिया का शुद्ध फोन- 3315 और अभी के जनरेशन का आई फोन सेवन जैसा अंतर है! इसलिए यह साईकिल सीखने में, समझने में और उसे अपनानें में बहुत दिक्कत हुई| साईकिल ही हो कर भी बहुत आधुनिक और अलग किस्म की साईकिल होने के कारण बहुत कुछ एडजस्ट करना पड़ा जैसे टायर प्रेशर, एक्सेसरीज के साथ तालमेल, सड़क पर ग्रिप आदि| धीरे धीरे यह सब सीखता गया| और इस प्रक्रिया में मेरे साईकिल मित्र आशिष फडणीस जी ने बहुत मार्गदर्शन दिया और साथ भी दिया! मेरे सभी सवालों और शंकाओं का धैर्य के साथ निरसन किया! वाकई मेरे सवाल बहुत थे और बहुत समस्याएँ भी आईं! कई बार तो लगता भी था कि इस नाज़ुक सी और बहुत रिजर्व किस्म की साईकिल के बजाय मेरी पुरानी एमटीबी साईकिल ही अच्छी जिसकी हर समस्या का इलाज हर अच्छे साईकिल दुकान में उपलब्ध है जबकी इस साईकिल को 'कुछ' भी हो गया, तो उसके लिए सीधे उसके शोरूम तक जाना पड़ रहा है| इसलिए मानसिक तौर पर भी काफी मशक्कत कर के साईकिल की बेसिक्स सीखनी पड़ी| लेकीन इन सबके दौरान आशिषजी ने बहुत मार्गदर्शन दिया और धीरे धीरे इस साईकिल से भी दोस्ती हो गई! इस साईकिल को मैने नाम भी दिया- मेरी!









Thursday, October 11, 2018

'योग जिज्ञासा: एटलस सायकलीवर योग यात्रा विशेषांक'

नमस्कार. नुकतंच जालना येथे 'योग संमेलन' झालं. चैतन्य योग केंद्र जालना व निरामय योग प्रसार व संशोधन केंद्रातर्फे आयोजित ह्या योग संमेलनामध्ये 'योग जिज्ञासा: एटलस सायकलीवर योग यात्रा विशेषांक' प्रकाशित करण्यात आला. गेल्या मे महिन्यामध्ये परभणी- जालना- औरंगाबाद व बुलढाणा जिल्ह्यात ५९५ किमी सायकल प्रवासातून विविध योग साधकांसोबत झालेल्या भेटी, त्यांचे अनुभव, ठिकठिकाणची योग केंद्रे/ योग साधक ह्यांचे पत्ते व संपर्क क्रमांक ह्यांचे तपशील असलेला हा विशेषांक आहे. योगामुळे आयुष्यात काय फरक पडला, हे २७ साधक- साधिकांच्या अनुभवातून आपल्याला कळतं. त्याबरोबरच मराठवाडा भागातल्या अनेक ठिकाणच्या योग केंद्रांची व योग- साधकांची माहितीही मिळते. हा विशेषांक प्रत्येक योग प्रेमी व सायकल प्रेमीच्या संग्रही असावा असा आहे.

हे पुस्तक कुठे मिळेल:

निरामय योग प्रसार व संशोधन संस्था, गोरेकाका भवन, अक्षदा मंगल कार्यालयाजवळ, विद्यापीठ रस्ता, परभणी ४३१४०१. सहभाग मूल्य रू. १००/-.
हे पुस्तक ऑनलाईन हवं असल्यास संस्थेच्या खात्यात पेमेंट करून पुढील मेलवर पावती व आपला पूर्ण पत्ता पाठवून संपर्क करता येईल. कूरियरने आपल्याला पुस्तक पाठवले जाईल.

डॉ. धीरज देशपांडे 09420033773, 08329595332 drdddeshpande@gmail.com
श्री. राहुल झांबड 09028968879, 09422968870 rahulzambad2014@gmail.com

संस्थेच्या बँक खात्याचे तपशील:

A/c no. 60116294640 Nirmaya yog Prasar and sanshodhan Kendra Parbhani Bank of Maharashtra Parbhani main branch, Parbhani IFSC code MAHB0000103

धन्यवाद! हे पुस्तक आपण घेऊ शकता किंवा आपल्या जवळच्या सायकलप्रेमी/ योग प्रेमींना भेट म्हणूनही देऊ शकता.
 
 

Wednesday, October 3, 2018

पिथौरागढ़ में भ्रमण ८ (अन्तिम): पिथौरागढ़ से वापसी

८ (अन्तिम): पिथौरागढ़ से वापसी
 

इस लेखमाला को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए|

२ दिसम्बर २०१७ की सुबह| कल रात की यात्रा कर पिथौरागढ़ पहुँचे| आज मुझे यहाँ से निकलना है, क्यों कि कल दोपहर को दिल्ली से ट्रेन है| वैसे तो कल लोहाघाट से ही मै जा सकता था, लेकीन उसके लिए एक रात लोहाघाट में ठहरना पड़ता| उसके बजाय सभी के साथ वापस पिथौरागढ़ आया, रात की यात्रा का भी अनुभव लिया| मेरे साथ में आए हुए लोग और कुछ दिन यहाँ रूकेंगे| लेकीन मुझे छुट्टियों की कमी के कारण निकलना होगा| लेकीन ये सांत दिन बेहद अनुठे रहे| लगभग ढाई सालों के बाद हिमालय का दर्शन हुआ और सद्गड़ और कांडा के रोमांचक ट्रेक हुए| हिमालय की गोद में होनेवाले गाँवों में रहने का मौका मिला! अब इन्ही यादों को संजोते हुए यहाँ से निकलना है|








Monday, October 1, 2018

पिथौरागढ़ में भ्रमण भाग ७: लोहाघाट यात्रा

७: लोहाघाट यात्रा
इस लेखमाला को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए|

१ दिसम्बर २०१७ की दोपहर लोहाघाट जाने के लिए जीप से निकले| सुबह अच्छा ट्रेक हुआ है और अब जीप से यात्रा करनी है| यहाँ पहाड़ी सड़कों पर वाहन से जाना भी एक तरह का ट्रेक होता है| रास्ते में कल रखा हुआ सामान एक दुकान से वापस लिया और आगे बढ़े| जीप से और भी नजारे दिखाई देते रहे| थोड़ी देर में पिथौरागढ़ पहुँचे| यहाँ से लोहाघाट ६० किलोमीटर है| लेकीन सड़क पूरी पहाड़ी होने के कारण यह थकानेवाली यात्रा होगी| पिथौरागढ़ से आगे गुरना माता मन्दीर के आगे एक जगह जीपें बहुत देर तक रूकी| यहाँ सड़क पर निर्माण कार्य किया जा रहा है जिसके लिए सड़क रोकी गई और वाहनों की लम्बी कतार हो गई| इस स्थान से कुछ दूरी पर नीचे खाई में रामगंगा बह रही है| थोड़ी देर नजारों का आनन्द लिया| दोपहर होते हुए भी दिसम्बर का दिन होने के कारण अब ठण्ड लग रही है|







Monday, September 3, 2018

पिथौरागढ़ में भ्रमण भाग ६: काण्डा गाँव से वापसी

६: काण्डा गाँव से वापसी
 

इस लेखमाला को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए|

१ दिसम्बर २०१७ की सुबह| काण्डा गाँव में विवाह का माहौल है| रातभर लोग जगते रहे| नाच- गाना भी हुआ| सुबह जल्दी निकलने की तैयारी है| यहीं से बारात निकलेगी| सुबह रोशनी आने के पहले अन्धेरे में इस गाँव का अलग दर्शन हुआ| चाय- नाश्ता ले कर यहाँ से निकलने के लिए चले| अब कल वाला ट्रेक फिर उल्टी दिशा में करना है| ट्रेक तो छोटा सा ही है| एक दो जगहों पर ही एक्स्पोजर है या पैर फिसलने जैसी सम्भावना है| कल आते समय मेरी बेटी को आशा ने लाया था| बहुत दूरी वह पैदल चली और फिर गोद में बैठ कर| ट्रेक तो मै आराम से कर लूँगा, लेकीन ऐसी जगह बेटी को उठा कर ले जाने का साहस मुझमें नही है| उसे तो यहाँ की स्थानीय दिदी उठा कर ले जाएगी, ऐसा तय हुआ| मैने कुछ सामान उठा लिया| और सुबह की ओस की‌ उपस्थिति में ही निकल पड़े| साथ ही बारात भी निकली| एक जगह मन्दीर में दर्शन ले कर वे आगे आएंगे| यहाँ कोई‌ भी वाहन नही आ सकता है| इसलिए सबको पैदल ही चलना है| अगर कुछ बड़ा सामान होता है, तो उसके लिए घोडा है|








Monday, August 27, 2018

पिथौरागढ़ में भ्रमण भाग ५: काण्डा गाँव का रोमांचक ट्रेक

५: काण्डा गाँव का रोमांचक ट्रेक

इस लेखमाला को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए|

 

३० नवम्बर २०१७ की दोपहर| सद्गड- पिथौरागड़ जा कर अब काण्डा गाँव जाना है| काण्डा गाँव सड़क से जुड़ा हुआ नही है, इसलिए यहाँ एक छोटा ट्रेक करना है| साथ के लोगों ने कहा भी, की कुछ ही समय पहले तक यहाँ बनी सड़क भी नही थी और दूर से ही पैदल चलना होता था| जैसे ही जीप से उतरे, सामने नीचे उतरती पगडण्डी दिखी और साथ में घोडे भी दिखे! इस ट्रेक के बारे में रिश्तेदारों ने बताया भी था| और शुरू हो गया एक सुन्दर ट्रेक! सड़क से पगडण्डी सीधा जंगल में जाने लगी और नीचे भी उतरने लगी| एक घना जंगल सामने आया और पगडण्डी धीरे धीरे और सिकुड़ती गई|








Monday, August 13, 2018

पिथौरागढ़ में भ्रमण भाग ४: काण्डा गाँव के लिए प्रस्थान

४: काण्डा गाँव के लिए प्रस्थान
 

इस लेखमाला को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए|

३० नवम्बर २०१७| आज सद्गड से निकलना है| गाँव में से दिखता हुआ कल का ध्वज मंदीर! वह इस परिसर का सबसे ऊँचा स्थान है| और वहाँ नेपाल का नेटवर्क मोबाईल ने पकड़ा था! आज थोड़ी गाँव की सैर की जाए| सुबह जल्द उठ कर निकला| पगडंडी के साथ साथ चल कर नीचे उतरा और सड़क पर पहुँचा! यह एक हिमालयीन गाँव! सड़क से सट कर होने के कारण दुर्गम तो नही कह सकते, लेकीन पहाड़ी गाँव! गाँव में दोपहिया वाहन एक- दो के पास ही हैं| जरूरत भी नही पड़ती है| एक तो घर तक वाहन आ भी‌ नही पाते हैं| यहाँ के लोग खेती के साथ इस भूगोल से जुड़े व्यवसाय करते हैं- जैसे मिलिटरी, बीआरओ और आयटीबीपी और उससे जुड़े कामों में बहुत लोग होते हैं; कुछ सरकार के साथ काम करते हैं; और कोई बीस किलोमीटर दूर पिथौरागढ़ में नौकरी भी करते हैं| शहर की हवा यहाँ भी पहुँची है| सद्गड़ के कई बच्चे अंग्रेजी माध्यम की स्कूल में पढ़ते हैं; उन्हे स्कूल बस भी नीचे रोड़ से मिलती है|









Thursday, August 9, 2018

पिथौरागढ़ में भ्रमण भाग ३: एक सुन्दर ट्रेक: ध्वज मन्दीर

३: एक सुन्दर ट्रेक: ध्वज मन्दीर
 

इस लेखमाला को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए|

२९ नवम्बर २०१७ की‌ सर्द सुबह और हिमालय की गोद में बसा हुआ सद्गड गाँव! रात में ठण्ड बहुत ज्यादा थी| रात में एक बार उठना हुआ तो ठण्ड का एहसास हुआ| यह घर ठीक पहाड़ में और वन के करीब बसा है| यहाँ के लोग बताते हैं कि वन्य पशू रात में यहाँ से गुजरते हैं| वे खेत में नुकसान ना करे, इसके लिए खेत में इलेक्ट्रिक तार भी लगाते हैं| हिमालय के कई हिस्सों में घर के पालतू जानवर- जैसे कुत्ता, भैंस आदि को शेर द्वारा ले जाना आम बात है... सुबह भी ठण्ड बहुत ज्यादा है| हाथ धोने के लिए तक गर्म पानी का इस्तेमाल करना पड़ रहा है| इन दिनों में यहाँ नहाना कंपल्सरी भी नही होता है| यहाँ की ठण्ड में सुबह के हल्की धूप में बैठ कर चाय का स्वाद लेना अपने में एक अनुभव है!







Wednesday, July 25, 2018

पिथौरागढ़ में भ्रमण भाग २: पहाड़ में बंसा एक गाँव- सद्गड

भाग २: पहाड़ में बंसा एक गाँव- सद्गड  

इस लेखमाला को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए|

२८ नवम्बर २०१७ की‌ सर्द सुबह! पिथौरागढ़ में पहुँचने के बाद पहला काम है कि एक व्यक्ति से बात हुई है, उससे साईकिल लेनी है| हिमालय में सिर्फ- छह दिन के लिए जाने के समय भी साईकिल चलाने का मन था| इसलिए हर तरह से प्रयास किया कि पिथौरागढ़ पहुँचने पर मुझे साईकिल मिल सके| इंटरनेट पर उत्तराखण्ड के विविध साईकिलिस्ट ग्रूप्स से सम्पर्क किया, पिथौरागढ़ या आसपास के साईकिलिस्ट ग्रूप्स से भी सम्पर्क करने का प्रयास किया| लेकीन किसी से सीधा सम्पर्क नही हुआ| कुछ लोग साईकिल देते हैं, लेकीन पैकेज में; किसी व्यक्ति को कुछ दिनों के लिए नही‌ देते| फिर पिथौरागढ़ के परिचित लोग और उनके व्हॉटसएप ग्रूप पर सम्पर्क किया| तब जा कर एक व्यक्ति ने कहा कि वह मुझे उसकी साधारण सी साईकिल देगा| अब उसकी प्रतीक्षा है| जैसे तय हुआ था, बस अड़्डे के पास रूक कर उसे सम्पर्क किया| सम्पर्क हुआ नही| जब हुआ तो उसने कहा कि वह किसी और स्थान पर है| आखिर कर होते होते पता चला कि वह किसी दूसरी जगह पर है| अत: साईकिल नही मिल सकी| अब तक मन में इच्छा थी कि यहाँ साईकिल चलाऊँगा, मन में‌ उसकी योजना चल रही थी| अब मन की‌ वह धारा टूट गई! एक तरह से हताशा हुई| पता था ही की‌ पहाड़ के लोग कोई‌ बहुत प्रॉम्प्ट नही होते हैं| फिर भी कुछ देर तक दु:ख हुआ| लेकीन बाद में यह भी समझ आई की देख! हिमालय में आने के बाद भी कैसे तू रो रहा है कि साईकिल नही मिली! हिमालय तुझे मिल रहा है, हिमालय का सत्संग मिल रहा है, उसके सामने साईकिल की बिशात क्या है? फिर सबके साथ आगे बढ़ा| पिथौरागढ़ के आगे धारचुला रोड़ पर बीस किलोमीटर पर सत्गढ़ या सद्गड गाँव है| वहाँ पहला पड़ाव होगा|





Monday, July 23, 2018

पिथौरागढ़ में भ्रमण भाग १: प्रस्तावना

प्रस्तावना

उत्तराखण्ड! हिमालय! पिथौरागढ़! लगभग ढाई साल के बाद अब फिर हिमालय का बुलावा आया है! नवम्बर- दिसम्बर २०१७ में पिथौरागढ़ में घूमना हुआ| उसके बारे में आपसे बात करता हूँ| यह एक छोटी पर बहुत सुन्दर यात्रा रही| इसमें दो छोटे ट्रेक किए और पिथौरागढ़ के कुछ गाँवों में जाना हुआ| मेरी पत्नि मूल रूप से पिथौरागढ़ से है, अत: उनके यहाँ एक विवाह समारोह में जाना हुआ| पारिवारिक यात्रा, लोगों से मिलना और छुट्टियों की कमी इस कारण वश वैसे तो यह यात्रा एक सप्ताह की ही रही| लेकीन फिर एक बार हिमालय और खास कर सर्दियों में हिमालय की ठण्ड और रोमांच का अनुभव मिल सका| पुणे से २६ नवम्बर २०१७ को निकले| मुंबई में बांद्रा टर्मिनस जा कर दिल्ली की ट्रेन ले ली| २७ नवम्बर की दोपहर दिल्ली‌ में निजामुद्दीन उतर कर दिल्ली परिवहन निगम की बस से आनन्द विहार टर्मिनस गए| यहाँ से पिथौरागढ़ के लिए बस चलती हैं| इस बस अड़्डे पर बहुत से शहरों के लिए बसें निकलती हैं जिनमें वाराणसी, गोरखपूर, महेन्द्रनगर (नेपाल) आदि भी है| कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद पिथौरागढ़ की बस मिली| दिवाली की छुट्टियाँ होने के कारण बहुत भीड़ भी है| जैसे ही‌ बस में बैठे, एक मज़ेदार वाकया हुआ| बस में एक तृतीयपंथी आया और उसने मेरे और अन्य कुछ लोगों के सिर पर हात लगा कर पैसे मांगे| तभी उसने मेरी पत्नि को देखा और नमस्कार बोला (बोली)! मेरी पत्नि भी उसे जानती है, क्यों कि उसने मुंबई में इस विषय पर काम करनेवाली संस्था में काम किया है| दोनों में एकदम परिचित की तरह बातें हुई| वह तृतीयपंथी नेपाल का (की) है और वही जा रहा (रही) है! कहाँ कहाँ कैसे पहचान के लोग मिल जाते हैं!






Saturday, June 30, 2018

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा भाग १३: यात्रा समापन (अंतिम)

१३:‌ यात्रा समापन (अंतिम)
 

योग साईकिल यात्रा २१ मई को सम्पन्न हुई| ग्यारह दिनों में लगभग ५९५ किलोमीटर साईकिल चलाई और ग्यारह जगहों के योग साधकों से मिलना हुआ| मेरे लिए यह बहुत अनुठा और विलक्षण अनुभव रहा| इस यात्रा पर अब संक्षेप में कुछ बातें कहना चाहता हूँ| शुरुआत करता हूँ आने के बाद परभणी में निरामय की टीम और परभणी के योग साधकों के साथ हुई चर्चा से| परभणी के निरामय की टीम को मैने मेरे हर दिन के अनुभव कहे| हर जगह पर मिले योग साधकों के बारे में मेरा निरीक्षण बताया| हालांकी सिर्फ एक ही दिन मिलने से बहुत कुछ जाना नही जा सकता है| लेकीन चूँकी मेरा सामाजिक संस्था के क्षेत्र में अनुभव रहा है, कई बातें मैने हर जगह पर देखी| हर जगह के साधक और टीम या टीम का अभाव भी देखा| ये निरीक्षण सिर्फ मेरी एक प्रतिक्रिया के तौर पर देखिए, इसे एक ठोस राय मत मानिए, ऐसा भी मैने कहा| हर जगह बहुत से लोग रोज मिलते रहे| लोगों ने बहुत सारी बातें भी कहीं| लेकीन जो कहा क्या वही वास्तव है, यह भी मुझे देखना था| जैसे चर्चाओं में कई लोग कहते थे कि हम इतने बारीकी से और इतने नियमित रूप से योग करते हैं| जब भी कोई ऐसा कहता, तब मै उसके शरीर को देखता| हमारा मन झूठ बोल सकता है, लेकीन शरीर कभी झूठ नही बोलता| कई जगहों पर शरीर ने ऐसी बातों को प्रमाण नही भी‌ दिया| तब मै समझता था कि जब कई लोग सुनने के लिए होते हैं, तो कुछ इन्सान अन्यथा जो नही कहेंगे, वैसी बातें भी कह जाते हैं| खैर| इसलिए मेरी यात्रा और मेरे सभी अनुभवों के बारे में मैने मेरी प्रतिक्रियाएँ निरामय टीम को दी| हर जगह का कार्य, वहाँ के कार्यकर्ताओं की‌ समझ, उनके कार्य की गहराई आदि पर मेरा जो कुछ छोटा सा निरीक्षण रहा, वह मैने उन्हे कहा| साथ में यह भी‌ बताया कि मैने इस यात्रा में क्या किया और क्या मै कर नही सका| जैसे चर्चा का संचालन करना या सम्भाषण करना मेरा गुण नही है| इसकी कमी एक- दो जगहों पर मुझे महसूस हुई|‌ कहीं कहीं पर थकान के कारण मेरा सहभाग उतना अधिक नही रहा| यह भी निरामय टीम को बताया|





Thursday, June 28, 2018

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा भाग १२: मानवत- परभणी

१२: मानवत- परभणी
 

योग साईकिल यात्रा का अन्तिम दिन- २१ मई की सुबह| आज यह यात्रा समाप्त होगी! मेरे लिए यह पूरी यात्रा और हर पड़ाव बहुत अनुठे रहे है| मेरे लिए बहुत कुछ सीखने जैसा इसमें मिला| बहुत लोगों से और साधकों से मिलना हुआ| कुल मिला कर एक अविस्मरणीय यह यात्रा रही है| इसके बारे में विस्तार से अगले अन्तिम लेख में बात करूँगा| अभी बात करता हूँ इस यात्रा के साईकिल चलाने के अन्तिम दिन की| मानवत- परभणी दूरी छोटी है, इसलिए रास्ते में रूढि गाँव के योग- शिविर पर जाना हुआ| मानवत से इस शिविर तक मेरे साथ श्री पद्मकुमारजी कहेकर जी भी आए| रूढ़ी गाँव में स्वामी मनिषानन्द जी‌ का आश्रम है और यहाँ पर मिटकरी सर योग शिविर लेते हैं| मिटकरी सर से कल मिलना भी हुआ था| सुबह छह बजे इस शिविर में पहुँचा| लगभग पच्चीस- तीस बच्चे योग कर रहे हैं|‌ थोड़ी उनसे बातचीत की| आश्रम में स्वामीजी से मिलना हुआ| उनका आशीर्वाद प्राप्त हुआ| यह भी इस यात्रा की एक खास बात रही|‌ कई तरह के एनर्जी फिल्डस और डॉ. प्रशान्त पटेल अर्थात् स्वामी प्रशांतानंद जी जैसे कई दिग्गज साधकों का भी सत्संग मिला| 





Tuesday, June 26, 2018

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा भाग ११: मंठा- मानवत

११: मंठा- मानवत

यह लिखते लिखते एक महिना हो गया, लेकीन अब भी सब नजरों के सामने है| योग साईकिल यात्रा का दसवा दिन २० मई की सुबह| आज सिर्फ ५३ किलोमीटर साईकिल चलानी है| अब यह यात्रा आखरी दिनों में है| लेकीन कल का दिन क्या खूब रहा! मंठा में बहुत अच्छी चर्चा हुई| कई साधकों से और कार्यकर्ताओं से अच्छा मिलना हुआ| आज मानवत में जाना है| रोज के जैसे ही सुबह ठीक साढ़ेपाँच बजे निकला| कुछ दूरी तक डॉ. चिंचणे जी मुझे छोडने आए| कल बहुत उखडी हुई सड़क थी|  आज अच्छी सड़क है| हमारा मन बहुत छलाँग लगाता है| अब भी इस यात्रा के पूरे दो दिन बाकी है, लेकीन मन तो पहुँच गया वापस| लेकीन फिर भी सजगता रखते हुए मन को वर्तमान में ला कर आज के चरण का आनन्द ले रहा हूँ| इतनी शानदार यह यात्रा रही है कि जो भी पल बचे हैं, उनका आनन्द पूरी तरह से लेना चाहिए|

साईकिल पर यात्रा करते समय मैने अक्सर देखा है कि कोई‌ भी सड़क कितनी भी परिचित क्यों ना हो, उस पर हम जो अलग- अलग राईड करते हैं, उसका मज़ा अलग अलग होता है| अगर हम एक ही रूट पर लगातार- हमेशा- साईकिल चला रहे हैं, तब भी हर एक राईड का मजा अलग ही होता है| और इसका कारण यह है कि राईड चाहे एक जैसी हो, साईकिल वही हो, रूट भी वही हो, लेकीन हम तो वही नही होते हैं- देखनेवाला वही नही होता है! साथ में हमारा मन, विचार, भावनाएँ तो हर समय बदलती रहती है| किसी विचारक ने कहा है कि कोई भी एक नदी में दो बार डुबकी नही लगा सकता है| इसके दो कारण हैं- एक तो नदी की धारा बहती रहती है; पानी आगे- और आगे जाता है; और दूसरी बात हम भी हर पल बदलते रहते हैं| मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि हम में इतने परम्युटेशन्स- काँबीनेशन्स होते हैं कि हम बिल्कुल भी थिर नही रह सकते हैं| जो भी इन्सान खुद से प्रामाणिक है, वह अक्सर यह अनुभव करता है कि उसका मन कई बार उसी के विपरित जाता है| इसलिए व्यक्तित्व में द्वंद्व पैदा होते है| कई बार इसी तरह बहुत तनाव होता है और कई बार हम आत्महत्या की खबरें भी सुनते हैं| ऐसे मे हमारे शरीर- मन में यह सब जो बदलाव होते हैं, उसे देखनेवाला जो है, उसे जानके का नाम ध्यान है| साईकिल चलाते समय भी उस समय जो कुछ घट रहा है- जो अनुभव आ रहे हैं, जो विचार मन में आ रहे हैं, उनका साक्षी बनने का प्रयास करते हुए आगे बढ़ रहा हूँ|




 


Tuesday, June 19, 2018

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा भाग १०: मेहकर- मंठा

१०: मेहकर- मंठा
 

आज यह लिखते समय बरसात शुरू हो गई है, लेकीन योग साईकिल यात्रा का नौवा दिन बहुत गर्मी का था- १९ मई की सुबह| आज लगभग ७० किलोमीटर साईकिल चलानी है| और आज की सड़क भी निम्न गुणवत्ता वाली है| इसकी एक झलक कल देखी है| इसलिए ये ७० किलोमीटर बेहद कठीन जाएंगे| सुबह मेहकर में मन्दीर के पास चलनेवाले एक महिला योग वर्ग की साधिकाओं से मिल कर आगे बढ़ा| आज की सड़क पर विश्व प्रसिद्ध लोणार सरोवर आएगा जो एक उल्का के गिरने से बना है| जल्द ही सुलतानपूर से आगे निकला| यहाँ से लोणार सिर्फ बारह किलोमीटर है, लेकीन अब सड़क बहुत बिगड़ने लगी| बिल्कुल उखडी हुई टूटी फूटी‌ सड़क| नया चार या छह लेन का हायवे बनाने के लिए पूरी सड़क ही उखाड़ दी गई है| बीच बीच में थोड़ी सी सड़क; बाकी सिर्फ पत्थर और मिट्टी!

लोणार के कुछ पहले सड़क के पास एक खेत में एक लोमड़ी से मिलना हुआ| पहले तो कुत्ता ही लगा, लेकीन फिर काला मुंह और गुच्छे जैसी पूँछ! जरूर यह पानी की तलाश में खेत- गाँवों में आया होगा| उसने भी मुझे देखा, लेकीन उसे इन्सान देखनी की आदत होगी, इसलिए वह आगे बढ गया| यह मुख्य  शहरों को जोड़नेवाली सड़क न होने के कारण यातायात कम ही है| धीरे धीरे लोणार पास आता गया| लेकीन उसके साथ यह भी तय हुआ कि आज यात्रा बिल्कुल कछुए की गति से होनेवाली है| लोणार गाँव के बाद नाश्ता किया और आगे सरोवर की तरफ बढ़ा|‌ सरोवर सड़क के पास ही है| बचपन में एक बार यह सरोवर देखा था| आज की यात्रा बहुत लम्बी होने के कारण सड़क से थोड़ा हट कर उपर से ही सरोवर देखा और आगे बढ़ा| यह अभयारण्य होने के कारण मोर की आवाज आ रही है|


लोणार सरोवर!!




Monday, June 18, 2018

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा भाग ९: सिंदखेड़ राजा- मेहकर

९: सिंदखेड़ राजा- मेहकर
 

योग साईकिल यात्रा का आंठवा दिन, १८ मई की सुबह| सुबह ठीक साढ़ेपाँच बजे निकला| आज कुछ अन्धेरा है| गर्मियों के दिनों में सुबह साढ़ेपाँच बजे रोशनी हो जाती है, लेकीन आज कुछ मिनटों तक अन्धेरा रहा| पहली बार ऐसा हो रहा है| और सिंदखेड़ राजा से मेहकर जानेवाला यह हायवे पुणे- नागपूर मार्ग भी है, इसलिए यहाँ बहुत तेज़ रफ्तार से ट्रैवल्स की‌ बसें जा रही हैं| इसलिए कुछ मिनटों तक अन्धेरे का थोड़ा डर लगा| उसके साथ तेज़ गति से जानेवाले और बहुत पास से गुजरनेवाले ट्रक्स|  आखिर जब आधे घण्टे बाद धीरे धीरे रोशनी आती गई, कुछ सुकून मिला| अब तक की योग चर्चाएँ याद आ रही है| एक जगह पर एक योग साधिका ने कहा था कि मेरा बेटा बहुत भागदौड़ करता था, उससे कुछ शान्ति के लिए मैने योग शुरू किया और बाद में बेटा भी योग करने लगा! एक जगह एक योग शिक्षक ने हमारी खाने के आदतों के बारे में बहुत अच्छी टिपणि की थी| उन्होने कहा था कि हम अगर खाना खा रहे है तो हमे ऐसा खाना चाहिए- अगर हमें‌ आम बहुत पसन्द है, तो उसे बहुत धीरे से, उसे देखते हुए, उसका पूरा आनन्द लेते हुए खाना चाहिए| जैसे आम को देखना, उसका सुगन्ध लेना, धीरे धीरे उसका स्वाद लेना|‌ अगर हम इस तरह खाते हैं तो बहुत थोड़ा सा खाना भी‌ शरीर के लिए पर्याप्त होता है| इससे ध्यानपूर्वक खाना खाया जा सकता है और अतिरिक्त खाना भी नही खाया जाएगा!





Friday, June 15, 2018

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा भाग ८: जालना- सिंदखेडराजा

८: जालना- सिंदखेडराजा
योग साईकिल यात्रा का सांतवा दिन, १७ मई की सुबह| आज सिर्फ ३४ किलोमीटर दूर होनेवाले सिंदखेड राजा जाना है, इसलिए थोड़ी देर से निकला| निकलते समय जालना शहर में चलनेवाले दो योग वर्गों के साधकों से मिला| हर रोज कुछ साधक इन स्थानों पर योग करते हैं| उनसे मिल कर आगे बढ़ा| जालना के कुछ साधक मुझे विदा करने के लिए भी आए| अब एक तरह से यह यात्रा समापन की ओर बढ़ रही है| आज सांतवा दिन, इसके बाद सिर्फ चार दिन रहेंगे| लेकीन हमारा मन कितना दौड़ता है! आज सांतवा दिन शुरू भी नही हुआ कि मन तो पहुँच गया वापस! साईकिल चलाते समय भी मन दौड़ता रहता है|‌ बहुत कम बार, बड़ी मुश्कील से वह साईकिल पर रूकता है और सिर्फ उस क्षण को देख पाता है| स्पीड, टारगेट, समय सीमा आदि के बारे में सोचे बिना बहुत मुश्कील से मन वर्तमान क्षण में ठहरता है| लेकीन इसी का नाम तो ध्यान है! एक समय कोई भी गतिविधि अगर पूर्ण रूपेण करते हैं, तो वह ध्यान बन जाता है| चाहे वह साईकिलिंग ही क्यो ना हो| लेकीन यह उतना ही कठीन भी है, क्यों कि हमारा मन बहुत जटिल होता है; उसके अक्सर अलग- अलग टुकड़े होते हैं| उन खण्ड- खण्डों को इकठ्ठा लाने का नाम तो ध्यान है| खैर|





Tuesday, June 12, 2018

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा भाग ७: औरंगाबाद- जालना

७: औरंगाबाद- जालना

योग साईकिल यात्रा का छटा दिन, १६ मई की सुबह| कल औरंगाबाद में अच्छी चर्चा हुई और आज अब औरंगाबाद से जालना जाना है| जालना एक तरह से इस पूरी योग- यात्रा का केन्द्र बिन्दू रहा है| जब से इस यात्रा की योजना बनी, यह विषय सब साधकों के सामने रखा गया तब से जालना के लोग इसमें अग्रेसर रहे| उन्होने इस पूरी यात्रा के आयोजन में बहुत सहभाग लेना शुरू किया और बहुत अच्छा प्रतिसाद भी दिया| मेरा हौसला भी बढाया| जालना के चैतन्य योग केंद्र से सीखे योग साधकाओं से पहले परतूर और अंबड में मिला ही हूँ| आज यह केन्द्र देखना है, यहाँ के साधकों से बातचीत करनी है| कल डॉ. पटेल सर से मिलना इस पूरी यात्रा का एक शिखर था और आज जालना में हुए कार्य- विस्तार को देखना एक दूसरा चरम बिन्दू है! जालना और औरंगाबाद में मेरी यात्रा के बारे में अखबारों में खबर भी आयी हैं| पहले मेरी योजना बनी थी, तब भी खबर दी गई थी| कुल मिला कर इस यात्रा के दौरान मेरी कम से कम दस- बारह खबरें तो आयी ही होगी! यह भी वहाँ के साधकों की तैयारी और उनके कार्य की गहराई दर्शाता है|

हर रोज की तरह आज भी सुबह बहुत जल्द, ५.४५ बजे निकला| आज की दूरी वैसे ६० किलोमीटर है| लेकीन अब शरीर के लिए यह दूरी बहुत कम लग रही है| और आज की सड़क इस पूरी यात्रा की सबसे शानदार सड़क है| बहुत बढिया दो- दो लेनवाली मेरी पसंतीदा सड़क! इसलिए आज जल्दी ही पहुँचूँगा| और दूसरी बात यह भी है कि इस सड़क पर औरंगाबाद से जालना जाते समय हल्की ढलान भी है जिससे और भी आसानी होगी| तथा आज तक मै बहती हवा की विपरित दिशा में साईकिल चला रहा था, आज कुछ हद तक हवा भी मेरा साथ देगी! सुबह की ताज़गी में बढ़ चला| और बिना रूके बढ़ता ही गया| जल्द ही पता चला कि आज तो पूरी बॅटींग पिच है भाई! अब तक कुछ साधारण और कुछ निम्न साधारण सड़कों से गुजर चुका हूँ| आज का दिन मेरे लिए और मेरी साईकिल के लिए बॅटिंग पिच जैसा है! सुहावना मौसम, आसपास दिखाई देनेवाले पहाड़ और सड़क भी उतनी ही रोमँटीक! और क्या चाहिए!


Friday, June 8, 2018

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा भाग ६: देवगिरी किला और औरंगाबाद में योग- चर्चाएँ

६: देवगिरी किला और औरंगाबाद में योग- चर्चाएँ
योग साईकिल यात्रा का पांचवा दिन, १५ मई की सुबह| कल बहुत बड़ा दिन था| लेकीन रात में अच्छा विश्राम हुआ और सुबह बहुत ताज़ा महसूस कर रहा हूँ| आज की साईकिल राईड छोटी ही है- सिर्फ ३७ किलोमीटर| और आज पाँचवा दिन होने के कारण यह बहुत ही मामुली लग रही है| कल शाम को योग साधकों से मिलना नही हुआ था| आज उनसे मिलूँगा| कल मुझे रिसिव करने के लिए जो साधक आए थे, उनमें एक साईकिल चलानेवाले भी थे| आज उनके साथ पहले औरंगाबाद के पास होनेवाले देवगिरी किले पर जाऊँगा| वहाँ श्री. खानवेलकर और कुछ योग साधक आएंगे जिनसे अनौपचारिक बात होगी|

सुबह ठीक साढ़ेपाँच बजे निकला| महेन्द्रकर सर भी तैयार थे| वे औरंगाबाद में साईकिल चलाते हैं| उनके साथ दौलताबाद अर्थात् देवगिरी किले की तरफ बढ़ा| कई दिन अकेले साईकिल चलाई थी, आज बात करते हुए जाना अच्छा लग रहा है| और साथ में औरंगाबाद एक हिल स्टेशन होने के कारण होनेवाला सुहावना मौसम, हरियाली और छोटे पहाड़ भी है! दौलताबाद अर्थात् देवगिरी किला! अतीत की गहराईयों में से उपर उठता हुआ एक शिखर! जाने कितने समय, कितने लोग देखे होंगे इस किले ने! भारत के इतिहास का एक पुख़्ता प्रतिक! इस किले के बारे में एक बात बहुत रोचक है| जब अलाउद्दीन खिलजी की सेना इस पर हमला करने के लिए आई थी, तो कुछ दिनों तक उन्हे यही लगा कि देवगिरी के पास जो शरणापूर की गढ़ी या टीला है, वही देवगिरी है! इसलिए वे इसी के पास कुछ दिनों तक लड़ते रहे और बाद में उन्हे पता चला कि देवगिरी किला तो और आगे हैं! देवगिरी के पास आते समय पहले शरणापूर का टिला ही दिखा और एक पल के लिए मै भी धोख़ा खा गया!





Tuesday, June 5, 2018

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा: भाग ५: अंबड - औरंगाबाद

५: अंबड- औरंगाबादयोग साईकिल यात्रा का चौथा दिन, १४ मई की सुबह| आज अंबड से औरंगाबाद जाना है| सुबह अंबड के कुछ योग साधकों से मिलना हुआ| यहाँ कुछ लोग व्यक्तिगत रूप से क्लास लेते हैं| उनसे मिलकर आगे बढ़ा| आज भी सड़क आधी दूरी तक भारत से ही जाएगी और हायवे आने के बाद फिर इंडिया शुरू होगा! आज पहली बात तो खुद को बहुत धन्यवाद दे रहा हूँ कि मै इस यात्रा पर साईकिल पर आया, क्यों कि अगर गाडी से आता तो इस दिशा में कभी‌ भी नही आता! आज यह सड़क रोहीलागड़ से जाएगी| रोहीलागड़ यह आज एक छोटा सा कस्बा है लेकीन अतीत में‌ यहाँ पर बौद्ध गुंफाएँ थी|‌ रोहीलागड़ के पास ही जांबुवंतगड भी‌ है जिसका सम्बन्ध श्रीकृष्ण के समय के जाम्बुवन्त से है, ऐसा कहा जाता है| आज पहले इस रोहीलागड़ को देखने की उत्सुकता थी| इंटरनेट पर इसके बारे में खोजा था, पर कुछ खास मिला नही| अंबड से निकलने के बाद से ही सड़क विराने से रोहीलागड़ के तरफ बढ़ रही है| कल जैसा ही शान्त विराना और प्रकृति का साथ! बीच बीच में लगनेवाले बहुत ही‌ छोटे गाँव!





Saturday, June 2, 2018

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा: भाग ४: परतूर- अंबड

४: परतूर- अंबड
 

योग साईकिल यात्रा का तिसरा दिन, १३ मई की सुबह| रात में अच्छा विश्राम हुआ है और कल जो योग साधकों से मिलना हुआ था, उससे भी बहुत ऊर्जा मिली है| इस यात्रा के लिए उत्साह और भी बढ़ गया है| कल जहाँ ठहरा था वह परतूर गाँव! इसे वैसे तो परतुड़ भी कहा जाता है|‌ और महाराष्ट्र और भारत के इतिहास में भी इस गाँव से जुड़ा एक घटनाक्रम है| १७६१ में पानिपत में मराठा सेना और अब्दाली के बीच पानिपत का तिसरा युद्ध हुआ| जब मराठा सेना इस युद्ध के लिए निकली थी, तो तब वह यहाँ परतूड़ में थी| परतूड़ में पेशवा सदाशिवरावभाऊ की अगुवाई में मराठा सेना ने निज़ाम की सेना को मात दी थी|‌ यहीं मराठा सेना को अब्दाली और नजीबखान रोहीला की सेना ने मराठा सरदार दत्ताजी शिंदे को मात देने की की खबर मिली और सीधा परतूड़ से ही मराठा सेना दिल्ली के लिए निकली थी| 





Sunday, May 27, 2018

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा: भाग ३: जिंतूर- परतूर

३: जिंतूर- परतूर

१२ मई की सुबह| ठीक साढ़ेपाँच बजे जिंतूर से निकला| रात में अच्छी नीन्द होने से ताज़ा महसूस कर रहा हूँ| आज ६२ किलोमीटर साईकिल चलाने का उद्देश्य है| मेरे कारण जिंतूर के डॉ. पारवे जी सुबह जल्दी उठ गए और मुझे विदा देने के लिए भी सड़क तक आए| सुबह की ताज़गी में साईकिल चलाना एक बहुत बड़ा सुख है! अच्छी नीन्द के कारण थकान की भरपाई हो गई है| कल जब बहुत थकान के बीच एक बार हल्का सा डर लगा था, तब इस यात्रा पर कुछ क्षण प्रश्नचिह्न उठा था| लेकीन तब तय किया कि पूरी यात्रा के बारे में अभी सोचूँगा ही नही| अभी सिर्फ उस समय की स्थिति पर ध्यान दूँगा| इसलिए बस आज के पड़ाव के बारे में सोचते हुए आगे बढ़ चला| विपश्यना में इसे 'इस क्षण की सच्चाई' कहते हैं|

जिन्तूर से आगे बढ़ते समय सड़क के आसपास कुछ छोटी पहाडियाँ हैं| सड़क भी चढती- उतरती है| यह सिंगल गेअर की साईकिल होने के कारण चढाई महसूस होती है| साईकिल के टायर्स अभी पूरे एडजस्ट नही हुए हैं, इसलिए उतराई पर भी ज्यादा स्पीड नही मिल रही है| सड़क पर कुछ गावों में पाणी फाउंडेशन का बोर्ड दिखा| कल ही मंठा के योग- साधकों से बात हुई थी| आज मेरे रूट पर मंठा गाँव आएगा जो मेरी यात्रा में लौटते समय एक पडाव का स्थान होगा| मंठा से जाते समय उन्होने मिलने के लिए कहा है| इसलिए उनसे मिलूँगा|



Friday, May 25, 2018

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा: भाग २: परभणी- जिंतूर नेमगिरी

२: परभणी- जिंतूर नेमगिरी
११ मई को सुबह ठीक साढेपाँच बजे परभणी से निकला| कई लोग विदा देने आए, जिससे उत्साह बढा है| बहोत से लोगों ने शुभकामनाओं के मॅसेजेस भी भेजे हैं| कुछ दूरी तक मेरे प्रिय साईकिल मित्र और मेरे रनिंग के गुरू बनसकर सर भी मेरे साथ आए| मै जो एटलस साईकिल चला रहा हूँ, उनकी ही है! पैर में दर्द होने पर भी वे मेरे साथ चलने आए| कुछ समय तक उनका साथ मिला और फिर आगे बढ़ चला| योग प्रसार हेतु साईकिल के हमारे ग्रूप पर मेरा लाईव लोकेशन डाला है| आज का पड़ाव वैसे घर से आँगन तक जाने का ही है| पहले कई बार जिंतूर- नेमगिरी गया हूँ| साईकिल पर मेरा पहला शतक इसी रूट पर हुआ था, इसलिए एक तरह से आज का चरण बहुत सामान्य सा लग रहा है| जिंतूर घर से ४५ किलोमीटर है और वहाँ सामान छोड कर पास ३ किलोमीटर पर होनेवाली नेमगिरी चोटी पर जा कर आऊँगा|






३ लीटर पानी साथ ले कर जा रहा हूँ| उसमें भी इलेक्ट्रॉल मिलाया हुआ है| साथ में चिक्की- बिस्कीट भी रखा है जिसे बीच बीच में खाता रहूँगा| पहले आधे घण्टे के बाद शरीर लय में आ गया और आराम से आगे बढ़ने लगा| धूप अभी हल्की है| इस बार सोच रहा हूँ कम से कम ब्रेक लूँगा| सड़क पर होटलों में खाने के विकल्प ज्यादा नही है| इसलिए चाय बिस्किट खा के आगे बढ़ूँगा| बहोत देर तक पहला ब्रेक लेने की इच्छा नही हुई| ३० किलोमीटर पूरे होने पर बोरी नाम के गाँव में पहला ब्रेक लिया| चाय- बिस्किट लिया और आस- पास होनेवाले लोगों को मेरी यात्रा के बारे में बताया और संस्था के ब्रॉशर्स भी दिए| अब बचे हैं सिर्फ पन्द्रह किलोमीटर| लेकीन अब धूप बढ़ने लगी है और मेरे शरीर में डिहायड्रेशन के लक्षण नजर आ रहे है| शायद बड़े अन्तराल बाद पहला ब्रेक लिया, उससे ऊर्जा स्तर भी थोड़ा कम है| लेकीन आगे बढ़ता रहा| जिंतूर के छह किलोमीटर पहले चांदज गाँव में कुछ लोग सड़क पर काम कर रहे थे, उन्होने मेरा फोटो खींचा| बाद में पता चला कि वे पानी फाउंडेशन के कार्यकर्ता है और इधर के गाँवों में जल- संवर्धन (वॉटर कन्जर्वेशन) के लिए काम कर रहे हैं| महाराष्ट्र के कई गाँवों में अमीर खान के पानी फाउंडेशन का काफी अच्छा काम चल रहा है| उन्होने मेरी यात्रा को शुभकामनाएँ दी और मैने उनके कार्य को| साथ में कुछ ब्रॉशर्स भी दिए| अब जिन्तूर बस छह किलोमीटर|

Wednesday, May 23, 2018

एटलास साईकिल पर योग- यात्रा: भाग १ प्रस्तावना

प्रस्तावना
 

नमस्ते!

हाल ही में मैने और एक साईकिल यात्रा पूरी की| यह योग प्रसार हेतु साईकिल यात्रा थी जिसमें लगभग ५९५ किलोमीटर तक साईकिल चलाई और लगभग योजना के अनुसार ही यह यात्रा पूरी हुई (सिर्फ कुछ कारण से एक पड़ाव कम हुआ)| मध्य महाराष्ट्र के परभणी जिले में कार्यरत 'निरामय योग प्रसार एवम् अनुसंधान संस्था' तथा उसके कार्य का विस्तार को ले कर यह यात्रा थी| मध्य महाराष्ट्र के परभणी, जालना, औरंगाबाद एवम् बुलढाणा जिलों में काम करनेवाले योग- कार्यकर्ता, योग अध्यापक इनसे इस यात्रा में मिलना हुआ| अब इस यात्रा का विवरण लिखना शुरू कर रहा हूँ|

पहली बात तो यह है कि किसी‌ भी विषय का प्रसार करना हो, तो कई मुद्दे उपस्थित होते हैं| सीधा प्रसार हमेशा ही कारगर साबित नही होता है| कई लोग बार बार आग्रह करने पर उस चीज़ की तरफ जा सकते हैं, पर यह सभी के लिए लागू नही होता है| मेरा अपना उदाहरण यही है कि जब जब मुझे किसी चीज़ के बारे में आग्रह किया गया, अक्सर मैने उससे दूर ही गया| इसलिए योग प्रसार करना इतनी सरल बात नही है| मेरा विश्वास प्रत्यक्ष प्रसार के बजाय अप्रत्यक्ष प्रसार में हैं| किसी को योग कीजिए, ऐसा बताने के बजाय खुद उसे करते रहने में है| और इस यात्रा में भी कुछ ऐसा ही हुआ| जैसे यह एक साईकिल यात्रा है और साईकिल सन्देश और साईकिल प्रसार भी इसका एक अन्दरूनी पहलू है| मैने किसी से भी नही कहा कि साईकिल चलाईए, लेकीन हर जगह कुछ लोग अपने आप साईकिल चलाते दिखे! इसके साथ हर जगह पे योग- साधकों से बहुत अच्छा मिलना हुआ| योग का एक अर्थ जोड़ है और इस पूरी यात्रा में भी कई लोगों‌ से जुड़ना हुआ| हर गाँव में कार्यकर्ताओं की टीम में भी नए लोग कहीं कहीं जुड गए| यह साईकिल यात्रा उनके जुड़ने के लिए एक माध्यम बनी| अप्रत्यक्ष और अपरोक्ष रूप से योग को बढ़ावा मिला| एक साईकिल पर आए यात्री से मिल कर कार्य करनेवाले कार्यकर्ताओं का भी हौसला बढ़ा| इसका श्रेय साईकिल को जाता है, उसमें होनेवाले इनोवेशन को जाता है| 



इस साईकिल पर तैयारी करते हुए!

Sunday, May 6, 2018

योग प्रसार हेतु साईकिल यात्रा


महाराष्ट्र में परभणी- जालना- औरंगाबाद- बुलढाणा जिले के गाँवों में ६०० किलोमीटर साईकिलिंग

नमस्ते!


एक नई सोलो साईकिल यात्रा करने जा रहा हूँ| जिसके बारे में संक्षेप में आपसे बात करूँगा| पीछले साल महाराष्ट्र के सातारा क्षेत्र में योग- ध्यान इस विषय को ले कर एक छोटी यात्रा की थी| इस बार भी 'योग प्रसार हेतु साईकिल यात्रा' ऐसा विषय ले कर साईकिल चलाऊँगा| मध्य महाराष्ट्र के परभणी जिले में कार्यरत 'निरामय योग प्रसार एवम् अनुसंधान संस्था' तथा उसके कार्य का विस्तार को ले कर यह यात्रा है| मध्य महाराष्ट्र के परभणी, जालना, औरंगाबाद एवम् बुलढाणा जिलों में काम करनेवाले योग- कार्यकर्ता, योग अध्यापक इनसे इस यात्रा में मिलूँगा|

परभणी जिले में चार दशक से निरामय संस्था का कार्य चल रहा है| १९७० के दशक में कुछ व्यक्तियों ने साथ आ कर योग सीखना और सीखाना चालू किया| उसके बाद कई कार्यकर्ता जुड़ते गए| कार्य बढता गया| योग साधना और योग अध्यापन के साथ योग में अनुसंधान, योग परिषद में सहभाग, योग प्रसार, योग अध्यापकों को शिक्षा आदि कार्य बढ़ते गए| बाद में इसका विस्तार परभणी जिले के गाँवों में और फिर अन्य जिलों में भी हुआ| वहाँ भी कार्यकर्ताओं की टीम खड़ी हुई| यह पूरा कार्य स्वयं के योगदान से कार्यकर्ता करते रहे हैं| आज जब अधिकांश संस्थाएँ प्रोजेक्ट या फंडिंग होने पर ही कार्य करती हैं, ऐसे समय में इस तरह का निरपेक्ष कार्य बहुत महत्त्वपूर्ण है| इसी लिए एक तरह से सोचता था कि इस कार्य को सामने लाना जरूरी है| मेरा इस कार्य से बचपन से थोड़ा परिचय है|‌ परभणी मेरा गाँव है और मेरे पिताजी इस पूरे कार्य में एक कार्यकर्ता रहे हैं|

किसी के मन में एक प्रश्न आ सकता है कि आज मध्य महाराष्ट्र के क्षेत्र में अकाल की समस्या है; पानी एवम् ग्राम विकास तथा खेती से जुड़े कई प्रश्न हैं| तो उस विषय के लिए साईकिल यात्रा करने के बजाय योग प्रसार के लिए साईकिल यात्रा कैसे कर रहा हूँ| प्रश्न स्वाभाविक भी है और सही भी है| इन दिनों पानी और खेती पर काम करने के लिए बहुत लोग सामने आ रहे हैं जो वाकई बड़ी बात है| लेकीन मेरी सोच में हर तरह के कार्य जरूरी ही होते हैं| हर कोई अपनी रुचि एवम् अपने विचारों के साथ ऐसे कार्य में सहभाग लेता हैं| इसके अलावा मै यह भी मानता हूँ कि योग का सम्बन्ध समूचे व्यक्तित्व से है| अगर कोई व्यक्ति योग की दिशा में आगे बढ़ता है तो वह अपनी सभी समस्याओं से निपटने की दिशा में भी एक कदम आगे बढ़ेगा ही| मैने आज तक जो योग जाना है, उसका अभ्यास किया है, साईकिलिंग से मुझे जो मिला है, उसके आधार पर यह मेरा अनुभव रहा है| इसलिए प्रत्यक्ष रूप में न होता हो तो भी अप्रत्यक्ष रूप में योग प्रसार भी सामाजिक समस्याओं को सुलझाने की दिशा में ले जानेवाला एक कदम है| खैर|

यह पूरी यात्रा मध्य महाराष्ट्र के अत्यधिक गर्मी होनेवाले इलाके में होगी| हर रोज लगभग ५५- ६० किलोमीटर साईकिल चलाऊँगा| इस क्षेत्र में दो- तीन शहर छोड कर बाकी गाँव ही हैं| और जब भी मैने गाँवों में साईकिल चलाई हैं, तब लोग यही कहते हैं- ओह गेअर की साईकिल! तो फिर यह तो मोटर साईकिल जैसी दौड़ती होगी! इस बार इसी लिए एक साधारण सी साईकिल (दुधवाला साईकिल) पर यह यात्रा करूँगा| ताकी लोगों को ऐसा सोचने का मौका न मिले और साईकिल सम्बन्धी जो प्रश्न पूछे जाते हैं, उनसे मुझे भी राहत मिलेगी! लोगों को भी यह समझ में आएगा की ठीक उनकी ही साईकिल भी इतनी चलायी जा सकती है| लोगों को शायद पता हो ना हो की यह दुधवाला टाईप की साईकिल भी इतनी दूर तक जा सकती हैं, मुझे तो बिल्कुल पता नही था| इसलिए जब इस तरह की साईकिल से ५०, ६० किलोमीटर साईकिलिंग की, तो मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला| साईकिलिंग की योजना कुछ इस प्रकार है| ११ मई से परभणी से शुरू करूँगा| हर दिन सुबह ४-५ घण्टे साईकिल चलाऊँगा और हर रोज ५५- ६० किलोमीटर दूरी पार करूँगा| उसके बाद लॅपटॉप पर मेरा रूटीन काम भी जारी रखूँगा| इसका रूट कुछ इस प्रकार होगा- परभणी- जिंतूर नेमगिरी- परतूर- अंबड- औरंगाबाद- देवगिरी किला- औरंगाबाद- जालना- सिंदखेड राजा- देऊळगांव राजा- चिखली- मेहकर- लोणार सरोवर- मंठा- मानवत- परभणी| लगभग १२ दिनों में ६०० किलोमीटर से अधिक साईकिल चलाने की योजना है| योग कार्य विस्तार एवम् योग- अध्यापक और केन्द्र इनके अनुसार यह रूट बनाया है|

इस यात्रा का एक उद्देश्य योग कार्य को सामने लाना यह है| उसके साथ इस रूट पर और इन केन्द्रों में होनेवाले योग अध्यापक- योग कार्यकर्ताओं से संवाद भी करूँगा| कई योग कार्यकर्ताओं ने बड़ी चुनौतिभरी स्थिति में कार्य किया है|‌ कुछ महिलाओं ने कई अवरोधों पर मात करते हुए पहले यह पाठ्यक्रम पूरा किया और उसके बाद उतनी ही कठिन स्थिति में योग अध्यापन भी किया| कुछ कार्यकर्ता तो किसी रोग के कारण योग करने लगे और अब उनकी रोग को धन्यवाद देते हैं! ऐसे कई कार्यकर्ता और कई अनुठे उदाहरण इस यात्रा में मिलेंगे जिनके बारे में बाद में लिखूँगा|

अगर आप चाहे तो इस कार्य से जुड़ सकते हैं| कई प्रकार से इस प्रक्रिया में सम्मीलित हो सकते हैं| अगर आप मध्य महाराष्ट्र में रहते हैं, तो यह काम देख सकते हैं; उनका हौसला बढ़ा सकते हैं| आप कहीं दूर रहते हो, तो भी आप निरामय संस्था की वेबसाईट देख सकते हैं; उस वेबसाईट पर चलनेवाली ॐ ध्वनि आपके ध्यान के लिए सहयोगी होगी| वेबसाईट पर दिए कई लेख भी आप पढ़ सकते हैं| और आप अगर कहीं दूर हो और आपको यह विचार ठीक लगे तो आप योगाभ्यास कर सकते हैं या कोई भी व्यायाम की एक्टिविटी कर सकते हैं; जो योग कर रहे हैं, उसे और आगे ले जा सकते हैं; दूसरों को योग के बारे में बता सकते हैं; आपके इलाके में काम करनेवाली योग- संस्था की जानकारी दूसरों को दे सकते हैं; उनके कार्य में सहभाग ले सकते हैं|

निरामय संस्था को किसी रूप से आर्थिक सहायता की अपेक्षा नही है| लेकीन अगर आपको संस्था को कुछ सहायता करनी हो, आपको कुछ 'योग- दान' देना हो, तो आप संस्था द्वारा प्रकाशित ३५ किताबों में से कुछ किताब या बूक सेटस खरीद सकते हैं या किसे ऐसे किताब गिफ्ट भी कर सकते हैं| निरामय द्वारा प्रकाशित किताबों की एक अनुठी बात यह है कि कई योग- परंपराओं का अध्ययन कर और हर जगह से कुछ सार निचोड़ कर ये किताबें बनाईं गई हैं| आप इन्हे संस्था की वेबसाईट द्वारा खरीद सकते हैं| निरामय संस्था की वेबसाईट- http://www.niramayyogparbhani.org/ इसके अलावा भी आप इस प्रक्रिया से जुड़ सकते हैं| आप यह पोस्ट शेअर कर सकते हैं| निरायम की वेबसाईट के लेख पढ़ सकते हैं| इस कार्य को ले कर आपके सुझाव भी दे सकते हैं| इस पूरी यात्रा के अपडेटस मै मेरे ब्लॉग पर देता रहूँगा- www.niranjan-vichar.blogspot.in (यहाँ आप मेरी पीछली साईकिल यात्राएँ, अन्य लेख आदि पढ़ सकते हैं)| आप मुझसे फेसबूक पर भी जुड़ सकते हैं| बहुत बहुत धन्यवाद!

- निरंजन वेलणकर
niranjanwelankar@gmail.com



Tuesday, January 2, 2018

जनवरी में लदाख़ में साईकिलिंग की योजना

जनवरी में लदाख़ में साईकिलिंग

जनवरी में जम्मू- कश्मीर राज्य के लदाख़ क्षेत्र में तपमान -२० से -२५ तक नीचे जाता है| इस क्षेत्र का मुख्य नगर लेह सिर्फ हवाई जहाज से दुनिया से जुड़ा रहता है| ऐसे स्थिति में भी कुछ लोग लदाख़ में जाते है और सर्दियों में भी वहाँ घूमते हैं| पहले दो बार लेह देखा है, लेकीन वह गर्मियों के महने में देखा है| इसलिए एक बार वहाँ सर्दियों में जाकर देखना है| ऐसे प्रतिकूल मौसम में जितनी हो सके, उतनी साईकिल चलानी है| लेह के आसपास की सड़के खुली रहती है, इसलिए लेह से कारू, निम्मू और हो सके तो खार्दुंगला भी जाया जा सकता है| खार्दुंगला सड़क मिलिटरी के लिए बहुत अहम है, इसलिए उसे हर स्थिति में चालू रखा जाता है| ५३०० मीटर ऊँचाई का खार्दुंगला दर्रा सर्दियों में भी चालू रहता है| हालाकी बीच बीच में भारी बर्फबारी के चलते कभी कभी बन्द हो सकता है|

ऐसे समय में लदाख़ जाने के कुछ उद्देश्य भी है-
१. सर्दियों के विषम मौसम में वहाँ के लोग किस प्रकार रहते हैं और वहाँ जवान और सेना के अन्य लोग किस प्रकार काम करते हैं, इसका अनुभव लेना|
२. वहाँ के लोग और जवानों के साथ २६ जनवरी के कार्यक्रम में अनौपचारिक रूप से संवाद करना|
३. शरीर की क्षमताओं को चुनौति देना और उसकी क्षमता की परख करना|
४. साईकिल चलाना हमेशा कुछ सन्देश देता है- पर्यावरण के प्रति संवेदना और फिटनेस के बारे में जागरूकता|



फोटो स्रोत: http://travel.paintedstork.com/blog/2013/02/leh-ladakh-winter.html

तैयारी

इस यात्रा की इच्छा हाल ही में अच्छी साईकिलिंग करने के बाद हुई| जो घाट और चढाईयाँ कभी कठिन लगती थी, वहाँ जब आसानी साईकिल पर जा सका, तब लगने लगा कि अब इससे भी ऊँचे पर्वत पर भी साईकिल चला सकता हूँ- अर्थात् लदाख़ में साईकिल चला सकूँगा| तैयारी कुछ इस तरह से की है-

- नियमित रूप से साईकिल चलाना; चढाई की सड़कों पर साईकिल बार बार चलाना|
- साईकिल का स्टैमिना बढ़ाने के लिए रनिंग शुरू की जिसका पीछली साईकिल यात्रा में बहुत लाभ मिला| धीरे धीरे रनिंग बढाता गया और २१ किलोमीटर तक दौड सका| इसके बाद ग्रेड १ की चढाई पर भी रनिंग कर सका| इस तरह साईकिल चलाने के साथ रनिंग करना भी तैयारी का हिस्सा रहा|
- योगासन और प्राणायाम

ठण्ड के लिए तैयारी अभी जारी है| कम से कम कपडों के तीन- चार लेअर लेह में पहनने पड़ेंगे| थर्मल और इनर के साथ तीन जुराब- सड़क पर चलते समय गम बूट और नाक छोड कर पूरे शरीर को ढाकने का इन्तजाम करना होगा| और ठण्ड की वास्तविक तैयारी मानसिक होगी| ठण्ड का इतना बड़ा तो नही; पर छोटा- मोटा अनुभव है जब दिसम्बर में बद्रीनाथ के पास गया था| वहाँ लेकीन ऊँचाई बहुत कम थी; फिर भी शाम को साढ़ेपाँच बजे जैसे रात होती थी| और एक तरह का आलस आ जाता था|

इस बार भी शायद यही चुनौति सबसे बड़ी है| इसके साथ लेह में सर्दियों में कारोबार बहुत कम चालू रहता है| इसलिए सुविधाओं की भी दिक्कते हैं| साईकिल उपलब्ध होने से दिक्कते हैं| दिन देर से शुरू होता है और जल्द डूबता है, साईकिल चलाने के लिए मुश्कील से आठ- नौ घण्टे होंगे| इन सबकी तैयारी कर रहा हूँ| लेह में पीछली बार जहाँ ठहरा था, वहाँ चोगलमसर क्षेत्र के मित्र के पास रूकूँगा|

साईकिलिंग की योजना
पुणे- दिल्ली- लेह हवाई जहाज से २४ जनवरी की सुबह लेह आगमन|
२६ जनवरी तक पूरी तरह विश्राम जिससे शरीर उस मौसम से तालमेल बिठा सके|
२६ जनवरी के कार्यक्रम में सहभाग लेना और लेह घूमना- साईकिल का जुगाड़|
२७ जनवरी- लेह शहर में १० किलोमीटर साईकिल चलाना|
२८ जनवरी- लेह- सिन्धू घाट परिसर में १० किलोमीटर साईकिल चलाना|
२९ जनवरी- लेह से निम्मू- चिलिंग जाना (४५ किलोमीटर)| चिलिंग में ठहरना
३० जनवरी-  चिलिंग- निम्मू- लेह वापसी (४५ किलोमीटर)|
३१ जनवरी- लेह से खर्दुंगला रोड़ पर साउथ पुल्लू तक जाना|
१ फरवरी- खार्दुंगला जाने का प्रयास| खार्दुंगला जाना सड़क खुली होने पर निर्भर करेगा|

२- ३ फरवरी अतिरिक्त दिन रखे हैं| और ४ फरवरी को लेह- दिल्ली- पुणे हवाई जहाज से वापसी|

ऐसी योजना तो बनाई है, लेकीन इसमें बहुत से if and buts हैं| शरीर इतने ठण्ड को कितना सह पाता है, ऐसी स्थिति में साईकिल कितनी चला सकता हूँ, यह कुछ भी कह नही सकता हूँ| वहाँ जाने पर ही पता चलेगा|  शायद यह भी हो सकता है कि साईकिल ना मिले या बहुत महंगे रेट से मिले, क्यों कि सभी दुकान बन्द होते हैं|| साईकिल न मिलने की स्थिति में लेह के आसपास पैदल घूमना हो सकता है| या अगर त्सोमोरिरी गाड़ी जा रही हो, तो वहाँ भी जा सकता हूँ| पर सड़क कई दिनों के लिए कभी भी बन्द हो सकती है| इसलिए सब कुछ उस समय की स्थिति पर निर्भर करेगा|

लेकीन जो भी हो, एक बहुत अविस्मरणीय अनुभव जरूर आनेवाला है. . . .