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Monday, November 7, 2022

Cycling in 4 states on single gear cycle 1: Preface

1: Preface

✪ Gratitude!
✪ Pilgrimage into nature
✪ Preparation and planning
✪ Bharat Vikas Sangam and other organizations
✪ Wonderful sea ride at Vengurla!
✪ Everyone has got this capacity!
✪ Doing, doing, doing- it gets done!
✪ Kudal and Karachi!

Hello all. With an objective of dialogue on mental health awareness, recently I completed around 1450 kms and 18 days solo cycling expedition- Kudal, Maharashtra- Goa- Belgavi- Bagalkote- Kalaburgi- Hyderabad- Warangal- Gadchiroli- Nagpur. It was a wonderful experience. I could meet many local organizations, groups and people. I could also meet students of schools and colleges and could give something positive and joyful to them. It was actually a very unbelievable tour. Almost dreamlike! Hero Radical SLR cycle accompanied me wonderfully. During this long route- nothing- absolutely no problem occurred with the cycle. The nature on the route- people- small villages- tribal places- witnessing all this was witnessing incredible India! Although I was alone on the cycle, even on the road and in villages I was never alone. Many people were always there with me and were helping me. Now I am starting to share my experiences by expressing my gratitude towards everyone who helped me in this- those who helped with technical aspects of cycling, those who helped to connect with organizations, helped for the routes and in many other ways and also I express my gratitude towards nature and life.



 


While writing this, I am having the same feeling which I had when I finished it on the day exactly as per the plan- gratitude! My luck or fate would be very fine so as to give me this incredible experience. Cycling on all this route- up- down roads in Konkan, Chorla ghat between Goa and Belgvi and beautiful nature everywhere, the forests and the massive rivers- all this was nothing less than a nature- pilgrimage. I could just enjoy so much of grace and peace in the nature. I just looted this treasure! After completion of the ride, I shared my experiences at many places. Along with sharing experiences, it was also sharing of this joy in the nature- pilgrimage. Even now by writing this in detail, I am going to share my joy of this nature- pilgrimage with you.

Friday, November 2, 2018

साईकिल पर कोंकण यात्रा भाग ७: कोस्टल रोड़ से कुणकेश्वर भ्रमण

भाग ७: कोस्टल रोड़ से कुणकेश्वर भ्रमण
 

इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए|

१२ सितम्बर का दिन साईकिल चलाए बिना समाप्त हो गया| मेरी पत्नि और बेटी को लाने के लिए मुझे जाना पड़ा| इससे साईकिल यात्रा का और एक दिन कम हुआ| अब शायद सिर्फ एक ही दिन साईकिल चला पाऊँगा| मेरे रिश्तेदार, भाई और अब पत्नि- बेटी आने के बाद इस सुनसान घर में चहल पहल हुई है| अब यहाँ कुछ ठीक महसूस कर रहा हूँ| पुरानी यादें तो हैं ही, अब बेटी साथ होने से नई यादें भी जुड़ रही हैं| यह फार्म हाऊस समुद्र तट से लगभग नौ किलोमीटर दूर आता है| लेकीन सुना है कि जब बरसाती दिनों में भीषण बारीश होती है, समंदर में तुफान जैसी स्थिति बनती है, तब यहाँ तक उसकी गूँज सुनाई देती है| अगर इस बार तेज़ बरसात होती, तो यह मौका मिलता! इसके लिए बरसात के चरम समय में यहाँ आना होगा|










Friday, October 26, 2018

साईकिल पर कोंकण यात्रा भाग ४: मलकापूर- आंबा घाट- लांजा- राजापूर (९४ किमी)

भाग ४: मलकापूर- आंबा घाट- लांजा- राजापूर (९४ किमी)
 

इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए|

९ सितम्बर की सुबह| कल रात अच्छा विश्राम होने से बहुत ताज़ा महसूस कर रहा हूँ| आज रविवार है, इसलिए थोड़ी देरी से निकलना है| लेकीन सुबह नीन्द जल्द खुल गई, इसलिए लॉज के बाहर आकर थोड़ा मॉर्निंग वॉक लिया| बाहर सब शान्ति शान्ति है, चाय का होटल तक खुला नही है| फिर आराम से सात बजे बाहर निकला| अब होटल खुला मिला| नाश्ता करते समय मेरी साईकिल देख कर कई बस ड्रायवर और कंडक्टर मुझसे मिलने लगे! यहाँ पास ही तो बस स्टैंड है| कुछ देर तक उनसे बात की और लगभग पौने आठ बजे मलकापूर से निकला| विगत चार दिनों से क्या यात्रा रही है! और आज का पड़ाव बहुत अहम होगा| आज लगभग ९२ किलोमीटर ही जाना है, लेकीन यह भी सफर चढने- उतरनेवाले रास्तों के बीच होगा| इसी रोड़ पर लगभग आठ साल पहले एक बार आया हूं, इसलिए कुछ तो याद है| इतिहास में प्रसिद्ध विशालगढ़ के पास से यह सड़क गुजरती हैं| मलकापूर से आगे आते ही नजारों की झड़ी जैसे शुरू हुई!







Thursday, May 5, 2016

दोस्ती साईकिल से ३१: श्रीवर्धन में क्या हुआ. . .


दोस्ती साईकिल से १: पहला अर्धशतक
दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . . 
दोस्ती साईकिल से ५: सिंहगढ़ राउंड १. . . 
दोस्ती साईकिल से ६: ऊँचे नीचे रास्ते और मन्ज़िल तेरी दूर. . . 
दोस्ती साईकिल से ७: शहर में साईकिलिंग. . . 
दोस्ती साईकिल से ८: सिंहगढ़ राउंड २! 
दोस्ती साईकिल से ९: दूसरा शतक. . . 
दोस्ती साईकिल से १०: एक चमत्कारिक राईड- नर्वस नाइंटी!  
दोस्ती साईकिल से ११: नई सड़कों पर साईकिल यात्रा!  
दोस्ती साईकिल से १२: तिसरा शतक- जीएमआरटी राईड 
दोस्ती साईकिल से १३: ग्रामीण सड़कों पर साईकिल राईड
दोस्ती साईकिल से: १४ "नई साईकिल" से नई शुरुआत
दोस्ती साईकिल से: १५: औंढा नागनाथ के साथ चौथा शतक
दोस्ती साईकिल से: १६: पाँचवा शतक- लोअर दुधना डैम
दोस्ती साईकिल से: १७: एक ड्रीम माउंटेन राईड- साक्री से नन्दुरबार
दोस्ती साईकिल से: १८: तोरणमाळ हिल स्टेशन पर साईकिल ट्रेक!
दोस्ती साईकिल से: १९: हौसला बढ़ानेवाली राईडस!
दोस्ती साईकिल से: २०: इंज्युरी के बाद की राईडस
दोस्ती साईकिल से: २१: चढाई पर साईकिल चलाने का आनन्द
दोस्ती साईकिल से: २२: सिंहगढ़ राउंड ३ सिंहगढ़ पर फतह!
दोस्ती साईकिल से: २३: नई हैं मन्जिलें. . नए है रास्ते नया नया सफर है तेरे वास्ते. . .
दोस्ती साईकिल से: २४: अप्रैल की गरमी में १४८ किलोमीटर
दोस्ती साईकिल से: २५: आँठवा शतक
दोस्ती साईकिल से: २६: २०१५ की लदाख़ साईकिल यात्रा की तैयारी
दोस्ती साईकिल से २७: २०१५ की लदाख़ साईकिल यात्रा पर दृष्टिक्षेप. . .
दोस्ती साईकिल से २८: फिर नई शुरुआत
दोस्ती साईकिल से २९: नई साईकिल यात्रा की तैयारी की राईडस
दोस्ती साईकिल से ३०: चाकण- माणगाँव


श्रीवर्धन में क्या हुआ. . .

६ दिसम्बर २०१५ की देर रात माणगाँव के लॉज में नीन्द नही लगी| दिन भर पसीना बहने के कारण और शायद शरीर से शक्कर कम होने के कारण देर रात तक पेशाब के लिए बार बार जाना पड़ा| उसी कारण से नीन्द भी नही आयी| आखिर कर देर रात डेढ बजे कुछ सुकून मिला और नीन्द ने अपनी शरण में लिया| लेकिन फिर भी अधिक नीन्द नही हुई| डेडलाईन का काम करना था, इसलिए सुबह साढ़ेचार बजे उठ कर तैयार हुआ| लैपटॉप पर ढाई घण्टे तक काम किया| उसके बाद व्यायाम भी किया| आज समन्दर के तट पर पहुँचना है- श्रीवर्धन और फिर उसके बाद कोंकण में दक्षिण की तरफ बढ़ना है| आज कमसे कम १२० किलोमीटर का लक्ष्य है| सुबह निकलते समय इसके बारे में बिल्कुल भी शंका नही है|







Monday, May 2, 2016

दोस्ती साईकिल से ३०: चाकण- माणगाँव


दोस्ती साईकिल से १: पहला अर्धशतक
दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . . 
दोस्ती साईकिल से ५: सिंहगढ़ राउंड १. . . 
दोस्ती साईकिल से ६: ऊँचे नीचे रास्ते और मन्ज़िल तेरी दूर. . . 
दोस्ती साईकिल से ७: शहर में साईकिलिंग. . . 
दोस्ती साईकिल से ८: सिंहगढ़ राउंड २! 
दोस्ती साईकिल से ९: दूसरा शतक. . . 
दोस्ती साईकिल से १०: एक चमत्कारिक राईड- नर्वस नाइंटी!  
दोस्ती साईकिल से ११: नई सड़कों पर साईकिल यात्रा!  
दोस्ती साईकिल से १२: तिसरा शतक- जीएमआरटी राईड 
दोस्ती साईकिल से १३: ग्रामीण सड़कों पर साईकिल राईड
दोस्ती साईकिल से: १४ "नई साईकिल" से नई शुरुआत
दोस्ती साईकिल से: १५: औंढा नागनाथ के साथ चौथा शतक
दोस्ती साईकिल से: १६: पाँचवा शतक- लोअर दुधना डैम
दोस्ती साईकिल से: १७: एक ड्रीम माउंटेन राईड- साक्री से नन्दुरबार
दोस्ती साईकिल से: १८: तोरणमाळ हिल स्टेशन पर साईकिल ट्रेक!
दोस्ती साईकिल से: १९: हौसला बढ़ानेवाली राईडस!
दोस्ती साईकिल से: २०: इंज्युरी के बाद की राईडस
दोस्ती साईकिल से: २१: चढाई पर साईकिल चलाने का आनन्द
दोस्ती साईकिल से: २२: सिंहगढ़ राउंड ३ सिंहगढ़ पर फतह!
दोस्ती साईकिल से: २३: नई हैं मन्जिलें. . नए है रास्ते नया नया सफर है तेरे वास्ते. . .
दोस्ती साईकिल से: २४: अप्रैल की गरमी में १४८ किलोमीटर
दोस्ती साईकिल से: २५: आँठवा शतक
दोस्ती साईकिल से: २६: २०१५ की लदाख़ साईकिल यात्रा की तैयारी
दोस्ती साईकिल से २७: २०१५ की लदाख़ साईकिल यात्रा पर दृष्टिक्षेप. . .
दोस्ती साईकिल से २८: फिर नई शुरुआत
दोस्ती साईकिल से २९: नई साईकिल यात्रा की तैयारी की राईडस

दोस्ती साईकिल से ३०: चाकण- माणगाँव

६ दिसम्बर की सुबह छह बजे चाकण से निकला| एक बड़ी साईकिल यात्रा तो करनी है ही| साथ में लैपटॉप ले कर काम भी करते रहना है| सुबह ५ बजे से दोपहर २ बजे तक साईकिल चलाऊँगा और दोपहर कुछ देर विश्राम करने के बाद लॉज में रूक कर लैपटॉप पर मेरा काम भी करता रहूँगा, ऐसा सोचा है| लेकिन हम जो सोचते हैं, वह होता नही है! सुबह ६ बजे साईकिल ले कर निकला ज़रूर, लेकिन रात अच्छी नीन्द बिल्कुल नही हुई| बड़ी राईड के लिए निकलने के पहले अक्सर रात की नीन्द बाधित होती है| यह भी नौसिखिए का निशान है| जो व्यक्ति ऐसी राईडस के लिए या एक्सपिशन के लिए अभ्यस्त हुआ होगा, उसे भला रात में चैन से नीन्द क्यो नही आएगी? खैर| आज १२५ किलोमीटर का उद्देश्य है| पुणे जिले के चाकण से कोंकण में माणगाँव तक जाऊँगा| पीछले साल भी इसी रोड़ पर गया था, लेकिन बड़ी मुश्किल से अस्सी किलोमीटर साईकिल चला पाया था| अब देखना है आज क्या होता है| वाकई यह मेरे साईकिलिंग का बहुत बड़ा दिन है|










Friday, May 27, 2011

हिमालयाच्या दिशेने.......

ही एका मोहिमेची सुरुवात आहे. हा एक प्रवास आहे.

तसं पाहिलं तर जीवन हा अखंड प्रवासच आहे. फक्त टप्पे बदलतात. रेल्वेच्या रुळांप्रमाणेच सांधे आणि ट्रॅक बदलतात.

मनामध्ये फार पूर्वीपासून असलेली इच्छा आणि ओढ कुठे तरी साकार होते आहे, असं वाटत आहे. सह्याद्रीच्या दर्शनाच्या निमित्ताने किंवा हिमालयाच्या फोटोंच्या दर्शनाच्या निमित्ताने असेल, पण गेले काही दिवस हिमालयामध्ये लद्दाखपर्यंत तरी जाऊन यायची तीव्र इच्छा होते आहे. शक्य असेल तितकं सियाचेनच्या म्हणजेच भारताच्या ताब्यात असलेल्या सर्वोच्च भारतीय भूभागावर जाऊन यावं असं वाटत आहे. काश्मीर- भारताचा अत्यंत वेगळा भाग. नेहमी चर्चेत असलेला. सियाचेन त्यातला टोकाचा भाग. पाकव्याप्त काश्मीर व चीनव्याप्त काश्मीरच्या बेचक्यात असलेला. पुढील फोटोमध्ये सियाचेन व काश्मीरमधील गुंतागुंत दाखवली आहे. आंतरराष्ट्रीय विकिपेडियाचा फोटो आहे, म्हणून आझाद काश्मीर व अक्साई चीन ह्या नावाने भारतीय भाग दाखवला आहे:




असा हा भाग सर्वच दृष्टीने असाधारण. सर्वच विपरित असलेला. तिथे जाऊन सैनिकांना, तिथल्या बॉर्डर रोड ऑर्गनायझेशनच्या सदस्यांना व लोकांना भेटण्याची तीव्र इच्छा आहे.

एकदा डोक्यात किडा वळवळू लागला तर सनकी माणसं शांत बसू शकत नाहीत. तेच झालं आणि एक एक विचार सुरू झाला. ट्युबा पेटू लागल्या. मनामध्ये लद्दाखला बाईकवरून जाण्याची विलक्षण कल्पना शिरली व तिने मन व्यापून टाकलं.

चर्चा, माहिती व विचारांचं आदानप्रदान सुरू झालं. माहिती मिळवणे, देणे, मेलवर संपर्क करणे इत्यादि इत्यादि सर्व सुरू झालं. ह्या सर्वच प्रक्रियेमध्ये आधीचे लद्दाखवीर व सह्याद्रीचे सरसेनापती म्हणून ब्लॉगर्समध्ये प्रसिद्ध असलेल्या रोहन चौधरी ह्यांनीही खतपाणी घातलं व अनुभवाचे बोल सांगितले. ही सर्व माहिती घेत असताना व कच्चा आराखडा बनवत असताना आम्ही- मी व गिरीश- माझा परममित्र ह्यांनी एक चाचणी मोहिम घ्यायची ठरवलं, ज्यामुळे बाईकवर मोठा प्रवास करण्याचा आम्हांला एक छोटासा अनुभव आला असता.

जवळचा, शक्य असलेला आणि विविध अनुभव मिळतील असा प्रवास म्हणून पुणे ते देवगड हा प्रवास ठरवला. ठरवलं, काही तयारी केली आणि निघालोही पहाटे 5 वाजता पुणे- बंगळुरू राष्ट्रीय महामार्ग क्रमांक 4 वरून. दोघंच जण. दोघं नाही, अजून एक जण आणि 'तीच' सर्वांत महत्त्वाची. ती म्हणजे गिरीशची स्प्लेंडर.

तिघं निघालो. पहाटेची वेळ म्हणजे ड्रायव्हिंग करायला सर्वांत सुखद आणि निवांत वेळ. अगदी बॅटिंग पिच आणि सकाळ होईपर्यंत पॉवर प्ले! पुणे जिल्हा ओलांडून खंबाटकी घाट- सातारा व कराड आलं. इथे पहिला टप्पा संपला व ड्रायव्हर बदलला. माझी आणि 'तिची' म्हणजे स्प्लेंडरची पहिल्यांदाच इतक्या जवळून ओळख होत होती. प्रत्येक गाडी प्रत्येक व्यक्तीप्रमाणे किंवा घोड्याप्रमाणे युनिक असावी. त्यामुळे थोडं जुळवून घ्यायला वेळ लागला.

जसा वेळ जात होता, तसा ताजेपणा कमी होत गेला. नंतर कोल्हापूरमध्ये गर्दी आणि रस्त्याची शोधाशोध ह्यात वेळ गेला.

अखेर बरीच विचारपूस करून राधानगरी रस्ता शोधला व रस्त्याच्या बांधकामामधून 'वाट' काढत तिथे पोचलो. जाताना राधानगरीमार्गे फोंडा घाट बघायचा होता, त्यावर गाडी चालवून बघायची होती आणि देवगडहून परत येताना गगनबावडा हा सरळ उभा घाट चढायचा होता. म्हणजे चांगली फेरी झाली असती.

कोल्हापूरमध्ये सगळीकडे रस्त्यांची (रखडलेली) कामं पाहून आलेला वैताग राधानगरी येईपर्यंत टिकला. कारण इथपर्यंत रस्ता 'अंडर कन्स्ट्रक्शन' आणि कच्चा असल्यासारखा आहे. जसा वेळ जात होता, तसं थकव्यामुळे, गुरुत्वाकर्षण सक्रीय झाल्यामुळे (बसून बसून शरीराचा काही भाग दुखत असल्यामुळे) वारंवार थांबावं लागत होतं. एक गोष्ट छान होती. की निसर्ग खूप आल्हाददायक होता. त्यामुळे ऊन्हाचा त्रास लागत नव्हता. परंतु पहाटे 5 ला निघून व 10 वाजता कोल्हापूर सोडून राधानगरीला पोचेपर्यंत दुपारचा 1 वाजल्यामुळे थांबत थांबत जावं लागत होतं. येणा-या प्रत्येक गावात चहा- सरबत असा ब्रेक घेत घेत जात होतो.

राधानगरीनंतर कुठेही घाटाचा फलक लागला नाही, परंतु रस्ता घाटासारखाच होता. तरीही खूप कमी वळणं आणि कमी तीव्र. मात्र जंगल, वनश्री व वातावरण छान होतं. सह्याद्रीच्या माथ्याकडे जात असल्याची जाणीव होत होती. सर्वत्र पूरेपूर हिरवं असलेलं कोल्हापूर दिसत होतं.

राधानगरीनंतर दाजीपूर येऊन गेल्यावर पुढे वळणं- वळणं संपून दूरवर सपाट जागा दिसायला लागली. हाच घाटाचा बिंदू... इथून पुढे उतार सुरू झाला. दूरवर किनारी मैदानी प्रदेश- सिंधुदुर्ग जिल्हा दिसत होता. कोल्हापूर जिल्हा संपून सिंधुदुर्ग जिल्हा सुरू झाला. प्रवासाच्या ह्या टप्प्यावरील दृश्ये इथे पाहता (येतील  फाईल फार मोठी नसल्यामुळे लगेच दिसेल).  निसर्गाला बघताना थकवा व गुरुत्वाकर्षणाचा ताण निघून जात होता.



देवगड इथून साधारण 50 किमी होतं. रस्ता यक नंबर होता. राधानगरी- देवगड चांगला रस्ता मिळाला. आता सिंधुदुर्ग सुरू झाल्यावर लाल माती सुरू झाली. आठ वर्षांपूर्वी पाहिलेलं देवगड आठवत होतं.

थांबत थांबत जात असल्यामुळे आणि कोल्हापूरमध्ये रस्ता शोधताना व गर्दीत बराच वेळ गेल्यामुळे आमचं वेळेचं गणित चुकलं. जो प्रवास 7 तासांमध्ये होईल असं वाटलं होतं, त्यासाठी आम्हांला 9 तास लागले. शेवटी 2.15 ला देवगडजवळ आलो. पण आत्याच्या घरी जाण्याऐवजी सरळ समुद्राच्या दिशेने पुढे जामसंडेपर्यंत आलो. दूरवरूनच समुद्राचं- निळ्या अभेद्य भिंतीचं दर्शन घेतलं. नंतर मग परत मागे वळून देवगडपासून 9 किमी पूर्वेला असलेल्या माळरानातील घरी गेलो. सर्वत्र लाल माती, मोठे मोठे दगड आणि शां त ता.

जेवण-  आराम करून झाल्यावर पुढचं नियोजन सुरू झालं. आधी विचार होता, देवगड समुद्र पाहून (म्हणजे बीचवरून) लगेच परत निघावं. कारण लद्दाख मोहिमेच्या तयारीसाठी सतत ड्राईव्ह करण्याचा सराव करायचा होता. बरीच चर्चा व बौद्धिक अभ्यासानंतर तिथे मुक्काम करण्याचा निर्णय घेतला. उरलेल्या दिवसात विजयदुर्ग पाहून होण्यासारखा होता. लगेच विजयदुर्गच्या दिशेने निघालो.

सर्व परिसर रमणीय होता, शरिराच्या दुख-या भागालाही विश्रांती मिळाली होती. त्यामुळे मजेत निघालो. शहरापेक्षा अत्यंत वेगळ्या वातावरणात आल्यामुळे अत्यंत प्रसन्नता होती. नवीन परिसर असल्यामुळे अत्यंत विशेष वाटत होतं. परिसर मी कित्येक वर्षांपूर्वी पाहिला होता आणि गिरीश पहिल्यांदाच पाहत होता. जामसंडे सोडल्यानंतर थोड्याच वेळात देवगडच्या खाडीचं दर्शन झालं.




समुद्राला ओलांडलं. समुद्राचं दर्शन अत्यंत सुंदर होतं.  मन अत्यंत खोलवर प्रसन्न करणारं. छोटा ब्रेक- फोटो आणि व्हिडिओसेशन करून पुढे निघालो.

रस्ता छान होता आणि सर्व नवीन असल्यामुळे तिघंही मजेत होतो [स्प्लेंडर सर्व काळ मजेत होती, तिला गुरुत्वाकर्षणाचा काहीच त्रास नव्हता..... (;o ] अंतर फार जास्त नव्हतं, परंतु वळणं आणि नवीन भाग ह्यामुळे हळु चालवत होतो. त्यावेळी गिरीशने टिपलेले हे काही क्षण. ह्यामध्ये घरं, हिरवी झाडं, शांतता, समुद्राचं पाणी ह्या दुर्मिळ गोष्टींचं दर्शन होतं.

छोटी छोटी गावं मागे पडली. रत्नागिरीचा रस्ता पुढे निघून गेला व विजयदुर्गचा रस्ता डावीकडे वळाला. विजयदुर्ग सिंधुदुर्ग जिल्ह्याच्या उत्तर पश्चिम टोकाला आहे. तीन बाजूंनी समुद्र व एका बाजूने जमीन. खाडीच्या पुढे रत्नागिरी जिल्हा- राजापूर तालुका दिसतो (इथेच जैतापूर आहे)...

विजयदुर्ग गाव ओलांडून किल्ला व किना-याजवळ आलो. समुद्राचा आवाज येत होता. पण तो समोरच्या समुद्राचा- खाडीच्या पाण्याचा नव्हता तर मागील बाजूच्या समुद्राचा होता. तिस-या प्रवाशाला विश्रांतीसाठी ठेवून किल्यात शिरलो. सर्वत्र इतिहास आणि समुद्र ह्यांचा प्रभाव. विजयदुर्ग अनेक दृष्टीने मराठा इतिहासातील एक विशेष किल्ला. शिवाजी महाराज आणि आरमार!!





विजयदुर्ग भव्य आहे. आणि खूप फिरण्यासारखा आहे. मुख्य म्हणजे खूप फिल करण्यासारखा आहे. तिथे जावं आणि समुद्राची हवा आणि इतिहासाच्या प्रेरणेला ग्रहण करावं. बस. इथे त्याचे काही बिंदु आणण्याचा प्रयत्न केला आहे. हे काही व्हिडिओज आहेत.

विजयदुर्ग01
विजयदुर्ग 02
विजयदुर्ग 03
विजयदुर्ग 04 हे व्हिडिओ सविस्तर आहे.
विजयदुर्ग 05

विजयदुर्गाला एक प्रदक्षिणा घातली. बरीच पडझड झाला असला तरी किल्ला बराचसा टिकून आहे. गतवैभवाची चुणूक आणि नववैभवाची प्रेरणा देण्यास पुरेसा आहे. पण कोण ती घेणार???

विजयदुर्ग मनसोक्त बघून परत फिरलो. किल्ल्यामध्ये परत वळताना एका टप्प्यावर समुद्राच्या लाटांचा आवाज क्षणात बंद झाला. ही नक्कीच किल्ल्याच्या रचनेतील व्यवस्था असली पाहिजे. किल्ल्याच्या सुरक्षेचे पैलू- बुरूज- बंदुकीसाठीचे झरोखे व मजबूत भिंती अजूनही टिकून आहेत.

हा किल्ला, किंवा हा एकूण परिसरच काळ मंदावलेला- Timeless आहे, असं वाटून गेलं. समुद्राच्या उपस्थितीत पन्हपान करून विजयदुर्गाला निरोप घेतला. ड्रायव्हर बदलला. येताना सव्वा तास लागला होता, तर येताना गिरीशने फास्ट गाडी आणल्यामुळे पाऊण तासच लागला. देवगडमधून सूर्यास्त पाहता आला नाही. गाडीमध्ये पेट्रोल भरलं. कोल्हापूरइतकं नाही, तरी इथे पेट्रोल महाग मिळालं. प्रवासाच्या बजेटमध्ये ह्याही गोष्टीचा विचार करावा लागणार होता.

रात्र झाली तसं परत माळरानाच्या घरी आलो. हापूसची खरेदी केली आणि जेवून बाहेरच्या थरार अंधारात थोडा वेळ फिरलो. थरार फारच थरार होता. जवळपास कोणीच (माणूस/ मानवी घर) नाही, किर्र अंधार व समोरचं खोल दरी असलेलं माळरान. हा परिसर लहानपणापासून आकर्षणाचा विषय असल्याने आठवणींना भरती आली होती.

दुस-या दिवशी पहाटे उठून निघायचं होतं. झोप आली होती, तरी जागे असेपर्यंत मस्त गप्पा झाल्या व मग विश्रांती. तिसरी यात्रेकरू बाहेरच्या थंडीत व निरवतेत उभ्या उभ्याच आराम घेत होती.

देवगडपासून 9 किमीवर असलेल्या माळरानातील घरातून पहाटे 5 करता करता 5.40 ला निघालो. पहाटेचा प्रसन्न वारा, शांतता आणि हळुहळु जागा होणारा परिसर. प्रवासासाठी ह्याहून अधिक कोणती बॅटिंग पिच मिळणार? मस्त गाडी पळवत होतो. काल सूर्यास्त मिळाला नव्हता पण आज सूर्योदय मिळणार होता. चढ- उतार- डोंगर- झाडं (नदीया पहाड झील और झरने जंगल और वादी) ओलांडून नांदगावच्या दिशेने निघालो. मस्त रस्ता होता.

नांदगावला थोडं थांबून राष्ट्रीय महामार्ग क्र. 17 वरून थोडं उत्तरेला निघालो. हा दिल चाहता है रस्ता (मुंबई- गोवा महामार्ग) !! त्या गाण्याच्या ओळी मनात आठवत निघालो.

नंतर गगनबावडाचा फाटा आला आणि उजवीकडे निघालो. गगनबावडा 35 किमी दूर होते. वाटेतला परिसर सुंदर होता. असणारच. रस्ताच्या दोन्ही बाजूंना झाडी आणि सकाळची शांतता. वैभववाडीच्या आधी कोंकण रेल्वे लागली. 

मग सुरू झाला गगनबावडाचा घाट. अत्यंत अप्रतिम होता. आणि अगदी घाटात येईपर्यंत घाट समोर दिसत नव्हता. हळु हळु एकामागोमाग एक उंच डोंगर दिसले. ढगातले डोंगर व रस्ता दिसला. हळुहळु धुकं सुरू झालं. अवघ्या 18 किमीमध्ये सह्याद्री चढून जाणारा हा घाट इथे पाहता येईल.

गगनबावडा मनात भरून घेतल्यानंतर परत कोल्हापूरच्या दिशेने प्रवास सुरू. रस्ता व परिसर अत्यंत रमणीय होता. कोल्हापूर जिल्हा कमालीचा सुंदर आहे व समृद्ध आहे. कोल्हापूरपर्यंत प्रवास छान झाला. ह्यावेळी कोल्हापूरमध्ये फार थांबावं लागलं नाही, रस्ता लगेच मिळाला व ट्रॅफिक व रस्त्याची बांधकामं पार करून भन्नाट अशा राष्ट्रीय महामार्ग क्रमांक 4 ला लागलो. थांबत थांबत आलो, नाही तर तीन तासातच कोल्हापूरला पोचलो असतो, इतका रस्ता चांगला होता.

कोल्हापूर सोडल्यानंतर परत गुरुत्वाकर्षणाची जाणीव होण्यास सुरुवात झाली आणि ऊनही अस्तित्वाची जाणीव करून देत होतं. निसर्गाचं रूपही बदललं होतं. कोल्हापूरच्या पलीकडचा सर्व भाग पर्वणीसारखा होता व त्या तुलनेत कराड- सातारा इथला रस्त्यावरून दिसणारा भाग म्हणजे ओसाडच म्हणावा लागेल. त्यामुळे प्रवासाचा थकवा वाढत चालला. वारणेच्या वाघाची जन्मभूमी ओलांडून आल्यानंतर कराडला परत ड्रायव्हर चेंज.

इथून पुढचा प्रवास बराचसा कंटाळवाणाच झाला. कारण एक तर शरिराचे काही भाग खिळखिळे वाटत होते. प्रवासाला सुरुवात करून 5-6 तास झाले होते आणि सतत थांबावं लागत असल्यामुळे गती कमी होती व त्यामुळे अजूनच कंटाळा येत होता.

कोणत्याही मोहिमेमध्ये हा वेळ म्हणजे कसोटीचा काळ. बॅटिंग पिच, पॉवर प्ले इत्यादि संपून कसोटीचा प्रसंग आला होता. नंतर नंतर तर इतकं खिळखिळं वाटत होतं, की इतर वेळी जो रस्ता बघता बघता पार केला असता, तो अवघड होऊन बसला. थांबत थांबत प्रवास करत करत सातारा- शिरवळ करत पुण्याच्या जवळ आलो. ट्रॅफिक लागली नाही, त्यामुळे पुढे लवकर येता आलं. शेवटी पहाटे 5.40 ला निघून दुपारी 2 ला पुण्यात पोचलो. जातानापेक्षा 1 तास कमी लागला. शेवटी थांबत थांबत यावं लागलं. अर्थात थांबूनसुद्धा गुरुत्वाकर्षणाचा त्रास जात नव्हताच, तरीपण क्षणभर विश्रांती..... असं करत करत प्रवास पार पडला.

प्रवा संपल्यावर प्रवासाकडे बघताना वाटतं, की एक चाचणी म्हणून ज्या उद्देशाने हा प्रवास केला, तो ब-याच प्रमाणात यशस्वी झाला. हजारो किमीचा प्रवास- तोही हिमालयात करताना कोणत्या अडचणी येतील, ह्याची  छोटीशी ओळख झाली. वेळेची गणितं चुकणे, शरिराचा काही भाग दुखणे आणि शरीर खिळखिळे होणे, अपरिचित प्रदेशातील गोंधळ, अडचणी इत्यादि इत्यादि. आता ह्या छोट्या धड्याचा उपयोग होणार आहे. मोठ्या मोहिमेची ही प्रीटेस्टिंग चांगली झाली.

एका व्यक्तीला धन्यवाद दिल्याशिवाय ह्या वर्णनाचा शेवट होऊच शकत नाही. ते म्हणजे गिरीशची स्प्लेंडर. राहुल द्रविड- द वॉल प्रमाणेच तिने एक बाजू भक्कम संभाळली व कोणताही व कसलाच त्रास दिला नाही. त्यामुळे आम्ही मनसोक्त भटकू शकलो.

इथून पुढे......

इथून पुढे हिमालयाच्या दिशेने जायचं आहे. त्या दृष्टीने सर्व माहिती घेणं, तयारी, अंदाज घेणं, चर्चासत्रं चालू आहे. मोहिम तर मोठीच आहे. साधी, सरळ नाही. त्या दिशेने प्रयत्न करायचा आहे. अजून पूर्वतयारीचा प्राथमिक टप्पाच चालू आहे. पण जायचं नक्की आहे. जम्मु- श्रीनगर- द्रास- कारगिल- लेह- खार्दुंगला- सियाचेन बेस कँप- खार्दुंगला- लेह- पेंगॉंग त्सो- लेह- पांग- रोहतांग- मनाली असा मुख्य प्रवास करायचा विचार आहे. जमेल तितक्या सियाचेन बेस कँपच्या जवळ जायचं आहे, जो भारताचा भारतीय नियंत्रणातील उत्तरेकडचा सर्वोच्च बिंदु आहे. जमल्यास 15 ऑगस्टला सियाचेनमध्ये अशा असाधारण ठिकाणी जायचं आहे (सियाचेनवरील जन गण मन- एक थरारक अनुभव व्हिडिओमधून)  व सैनिकांना भेटायचं आहे. देश, निसर्ग, लोक, सैनिक ह्यांना भेटणे व बोलणे हीच ह्या मोहिमेची उद्दिष्टं आहेत.  वरील व्हिडिओ बघितल्यानंतर काही बोलायची गरज उरतच नाही. देशाचा काश्मीर हा अतिसंवेदनशील आणि असाधारण भाग बघण्याची, जमलंच तर त्यासाठी काही करण्याची इच्छा आधीपासूनच होती. तिला इथे साकार रूप मिळेल, असं वाटतं आहे. बघूया.... अजून खूप मोठी तयारी व मेहनत घ्यावी लागणार आहे. त्यासाठी आपणही काही आयडियाज सूचवू शकता....