Showing posts with label India. Show all posts
Showing posts with label India. Show all posts

Monday, November 2, 2026

Conjunction of Moon and Jupiter

Hello. After midnight, i.e. on the early dawn of 3rd November at around 2 am, Moon will obstruct Jupiter when seen from South India and some other regions. From the rest of the India, they will appear so close to each other. As Moon and Jupiter both are bright objects, this wonderful view can be enjoyed even from cities. They will rise in the East by midnight. In November there are many interesting sky events coming up.



After this conjunction, on 7th November Venus and Spica bright star would appear close to each other just before Sunrise. Venus has just emerged in the dawn sky and it is very bright these days. The crescent Moon will also be nearby Venus and Spica. Then on early dawn of 16th November, red planet Mars and Jupiter will be so close to each other. It is also the time of Leonid meteor shower having its peak around 18th November. The meteor shower will be near Jupiter and Mars. So coming days are excellent and they mark beginning of the sky watching season. 

Photo of Flame nebular captured by me.

If you want to conduct a sky watching event or other fun- learn session at your place, you can contact me. Thanks for reading.

-Niranjan Welankar 09422108376. Date of writing- 2 November 2026.

Friday, August 14, 2026

Sufia- First human to run from Kanyakumari to Karakoram pass

“It was about thousands of small decisions not to give up!”
 

Do you know where is Karakoram pass? It is in Northern Ladakh, near DBO! Sufia Sufi, 5 times Guinness World Record holder ran from Kanyakumari to Karakoram- 5000 kms in 86 days (daily average ≈ 58 kms)! Yes. What you just read is right. It is a pity that very few people know about her. Just imagine, you are standing for 1 hour outside in harsh heat, high humidity and continuous rain. And now again think. 86 days and daily 58 kms average distance running across entire India in rain, heat, winds, floods and high mountains! She finished it on 6th August.
 

Sufiya Sufi, an ultra-distance runner from Ajmer, Rajasthan, spent nearly a decade in the aviation industry before discovering her passion for running in 2017. What started as a fitness journey soon became one of India's greatest endurance stories.

Her earlier 5× Guinness World Records:

* Fastest woman to run *Kashmir to Kanyakumari* (4,000 km in 87 days, daily average ≈ 46 kms) She herself broke this record during this run and completed this distance in 68 days!
* Fastest woman to complete the *Indian Golden Quadrilateral* (6,000 km in 110 days, daily average ≈ 55 kms)
* First woman to run from *Siachen Base Camp to Kargil*
* Fastest overall runner on the *Manali to Leh* route (430 km in 98 hours i.e. in just 4 days across those high mountains!)
* First woman to run the *entire length of Qatar*





My small video about her.



Tuesday, March 10, 2026

Experiencing Kumaon Himalaya 8 (Final): Journey towards South begins...

✪ Feeling of being home- sick!
✪ Mountain road journey along Ramganga river
✪ Vivekananda's Almoda and Neem Karoli Baba's Kainchi Dham!
✪ Mountains from three sides and land in the distance
✪  Kathgodam- The station built by British for carrying wood
✪  Excitement for South India cycle tour

Left from Satgarh on early morning of 11th December. The jeep arrived sharp at 5:30. Had great stay at my relatives in Satgarh. Greet meetings! Himalaya, the villages and the people! Of course, the trekking and sky watching! But now it is time to leave. Feeling extremely home- sick! 

The mountain in darkness in the dawn! But windows are closed due to cold temperature. Within no time, got introduced with the passengers. Here, in villages, every one knows one another! Slowly Sunlight is coming as the jeep reaches Pithauragarh. We picked up one more passenger from his house and left. City traffic is low due to early morning.

(Here you can listen my article in audio format. )





Saturday, September 26, 2015

अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ५ अलकनन्दा के साथ बद्रिनाथ की ओर




अलकनन्दा के साथ बद्रिनाथ की ओर

१७ दिसम्बर २०१२ की सुबह! आज बद्रिनाथ रोड़ पर पण्डुकेश्वर जाना है| जहाँ तक रोड़ चालू रहेगा, वहाँ जाने का प्रयास करूँगा| सर्दियों में भी इस रोड़ पर जीपे चलती है और स्थानीय लोग आते- जाते रहते हैं| सुबह चाय पीते समय पता चला की जोशीमठ के उपरी हिस्से में रात में बर्फबारी हुई है| हल्की बरफ गिरी है| जोशीमठ चढाई पर बंसा कस्बा होने के कारण नीचले और उपर के हिस्से में ऊँचाई का अन्तर है| वाकई अब पास के पहाड़ों पर भी अच्छी बरफ दिखाई दे रही है| शायद मुझे बद्रिनाथ रोड़ पर भी अच्छी बरफ मिलें!

यथावकाश पण्डुकेश्वर की जीप ले ली| शेअर यात्रियों को ले जानेवाली जीपें अच्छी हैं! अभी भी पण्डुकेश्वर तक और उधर तपोबन तक ऐसी जीपें चल रही हैं| पर इस यात्रा का एक मुख्य आकर्षण- औली के लिए शेअर जीपें नही चलती| या तो अठारह किलोमीटर सड़क पर पैदल जाना होगा या आंठ किलोमीटर के पैदल मार्ग से जाना होगा| लेकिन उसके पहले आज बद्रिनाथ की तरफ जाता हुँ| इन दिनों बड़ी बस जोशीमठ तक ही आती है| जोशीमठ के आगे जीपें ही अधिकतर चलती है और आर्मी/ आयटीबीपी के ट्रक्स आदि वाहन चलते हैं| जगह जगह बी.आर.ओ. के पट्ट देख कर खुशी हुई|

जोशीमठ से सड़क पहले नीचे उतरती है और अलकनन्दा के पास जाती हैं| यहाँ भी एक 'प्रयाग' है अर्थात् दो नदियों का संगम| यहाँ विष्णुप्रयाग है जहाँ पर एक हायड्रो इलेक्ट्रिक प्लांट हैं| यहाँ एक नदी अलकनन्दा को मिलती है| इसके बाद सड़क फिर से उपर उठती है| नजारा बेहद रोमांचक है! बर्फाच्छादित शिखर पास आ रहे हैं| सड़क भी दुर्गम स्थान से जा रही है| हालाकि सड़क अच्छी है| थोड़ी ही देर में गोविन्दघाट आया| यहाँ से एक पैदल रास्ता घांघरिया की तरफ जाता है जो आगे फूलों की घाटी और हेमकुण्ड साहिब जाता है| वैसे तो प्रसिद्ध फूलों की घाटी और हेमकुण्ड साहिब यहाँ से पास ही है; लेकिन पैदल मार्ग पर बरफ जमने के कारण सर्दियों में वहाँ नही जाया जा सकता है| वे स्थान अधिक ऊँचाई पर है| हेमकुण्ड साहिब के बारे में एक रोचक बात यह है कि हर साल मई के समय में बन्दों के जत्थे आते हैं और वे स्वयं हेमकुण्ड साहिब का रास्ता साफ करते जाते हैं| इस कार्य को कार सेवा कहा जाता है| सात पर्वतों से घिरा हेमकुण्ड ४६०० मीटर से अधिक ऊँचाई पर स्थित एक ग्लेशिअर है| यहाँ सीक्खों के दसवे गुरू श्री गोविन्द सिंह जी ने साधना की थी| खैर| 

















































गोविन्द घाट! एक तरह से विश्वास नही हो रहा है कि पहाड़ में यहाँ तक आ गया हुँ| क्या अपूर्व नजारा! गोविन्द घाट से थोड़ा आगे पण्डुकेश्वर है| करीब डेढ घण्टा लगा यहाँ पहुँचने में| लेकिन यह क्या! जीप तो और आगे जा रही है! तो यह जीप चार किलोमीटर और आगे लामबगड़ गाँव तक जाएगी| आखिर कर लामबगड़ में जीप रूक गई| वापिस जानेवाली जीप भी यहीं से मिलेगी| सुबह के लगभग ग्यारह बज रहे हैं| चाय पीते हुए पता किया कि और आगे कहाँ तक सड़क चल रही है? तो बताया गया कि पैदल आगे जाया जा सकता है| यहाँ से बद्रिनाथ मात्र १९ किलोमीटर दूर हैं| सड़क तो अच्छी दिख रही है| सोचा कि चलो, आगे पैदल चला जाए| जहाँ तक सड़क खुली होगी, वहाँ तक जाऊँगा| वापस भी पैदल ही आऊँगा|

चारों तरफ पास आते बर्फिले पहाड़! अलकनन्दा का कलरव! भूजलशास्त्र की दृष्टि से अलकनन्दा ही गंगा नदी की मुख्य धारा हैं| क्यों कि गंगोत्री से आनेवाली गंगा (भागीरथी) की लम्बाई और उसमें बह कर आनेवाला पानी अलकनन्दा से कम है| हालाकि मान्यता में गंगा को मुख्य नदी और अलकनन्दा को उसकी उपनदी माना जाता है.. यहाँ पर भी एक पॉवर प्रोजेक्ट चल रहा है- जेपी पॉवर प्रोजेक्ट! अलकनन्दा नदी के तट पर यह बसा है| कंपनी ने नदी के किनारे मन्दिर भी बनाया है| आते समय इसे देखूँगा| सड़क अब लगभग खाली है| कुछ कंपनी की गाड़ियाँ और कुछ मिलिटरी के वाहन| इस यात्रा का वास्तविक ट्रेकिंग अब शुरू हो रहा है! रास्ता चढाई- उतराईवाला है| धीरे धीरे रास्ता उपर उठता गया| ये क्या! सड़क पर रुई जैसा यह क्या गिरा है? यह तो बरफ है! सड़क पर गिरी बरफ को हटा कर एक जगह रख दिया गया है! अब तो सामने ही बरफ दिख रही है! एक जगह अलकनन्दा को सड़क ने पार किया|

धीरे धीरे सड़क पर ताज़ी बरफ नजर आने लगी| जरूर सुबह बरफ गिरी हैं| यहाँ यातायात न के बराबर होने के कारण अभी भी वैसे ही है! अब तो ढेर सारी बरफ दिखाई दे रही है| जीवन में दूसरी ही बार इतनी बरफ देख रहा हुँ| इसके पहले इससे भी अधिक- पूरी बर्फाच्छादित सड़क सिर्फ एक बार लदाख़ के चांगला में ही देखी थी| चलो, आज अच्छी बरफ देखने की कामना पूरी हुई जाती है! एक जगह अलकनन्दा पर एक छोटी पुलिया बनी हुई है और एक पैदल सड़क नदी को पार कर रही है| जरूर यह बीआरओ का कुछ स्थान होगा|

आगे जाने पर नदी का विहंगम दृश्य दिखा! एक झरने जैसी अलकनन्दा बह रही हैं! और सड़क के किनारे के विशाल वृक्ष! अब सब तरफ बरफ ही बरफ! सामने जो पहाड़ दिखाई दे रहे हैं वे जरूर बद्रिनाथ के पास के नर- नारायण आदि पहाड़ होंगे| किसी अन्जान आकर्षण से खींचा हुआ आगे जाता रहा| बीच बीच में फोटो जारी रहे| धूप खिली होने के कारण ठण्ड उतनी नही लग रही है| और निरन्तर चलने से भी शरीर को ऊर्जा मिल रही है| एक जगह बीआरओ के मजदूर भी मिले| मुस्कान से ही पूछताछ हुई और आगे निकला| बद्रिनाथ बिल्कुल पास आता जा रहा है| लगभग दो घण्टों में मै छह किलोमीटर चला हुँ| यानी बद्रिनाथ यहाँ से बामुश्किल बारह- तेरह किलोमीटर होना चाहिए| दोपहर का एक बज रहा है| अगर बीच में पुलिस या आयटीबीपी नही रोकती है तो मै आज बद्रिनाथ जरूर पहुँचूँगा! लेकिन फिर आज वहीं रूकना पड़ेगा| देखते हैं| 






















 


थोड़ी चढाई मिली| लेकिन चलना इतना स्वस्थ व्यायाम है कि ऐसी चढाई पर चलने में कोई कठिनाई नही आती हैं| मिलिटरी के वाहनों के सड़क पर गिरे बरफ में निशान हुए हैं| एक झरने पार करने के लिए एक पुलिया आयी| सामने अब कुछ लोग दिखाई पड़ रहे हैं! और वे तो खेल रहे हैं! यह तो हनुमान चट्टी गाँव है! लेकिन पूरा बन्द है| दुकान तो है पर बन्द है| आगे जाने पर स्थिति स्पष्ट हुई| सामने खेलनेवाले लोग उत्तराखण्ड पुलिस हैं और यहाँ उनका एक चेक पोस्ट है| आम नागरिकों को यहीं तक आने की अनुमति है| इसके बाद का क्षेत्र भारत- तिब्बत सीमा पुलिस और अर्थात् आर्मी के नियंत्रण में हैं| अर्थात् मुझे यहीं से लौटना होगा| यहाँ से भारत- तिब्बत सीमा मुश्किल से पचास किलोमीटर होगी| और बद्रिनाथ की सड़क पर अत्यधिक बरफ भी हैं जिसके कारण आगे जाने की अनुमति नही है. . . लेकिन क्या नजारा है!

यह स्थान हनुमान चट्टी है!‌ यहाँ लिखा है कि जिस स्थान पर वृद्ध हनुमानजी ने भीम का गर्वहरण किया था, वह स्थान यही हैं! थोड़ी देर यहाँ रूका; फोटो खींचे और यादों को संजोया| ढाई घण्टे मैं चला हुँ| शायद साढे- सात किलोमीटर आया हुँ| इस स्थान की ऊँचाई भी करीब २५०० मीटर्स होगी| जीवन में पहली बार इतनी ऊँचाई पर ट्रेकिंग कर रहा हुँ! आज का दिन अद्भुत है! और खास बात यह रही कि थकान बिल्कुल भी नही है| उल्टा ऐसा लग रहा है कि मै तो बद्रिनाथ की ओर खींचा जा रहा हुँ| काश यह चेक पोस्ट न होती और बाकी के ग्यारह किलोमीटर भी खुली सड़क होती... 

























बीआरओ की शिवालिक परियोजना!



























लेकिन अब जल्द निकलना चाहिए| दोपहर के दो बज रहे हैं| यहाँ शाम तो होती ही नही; सीधा दोपहर से रात हुई जाती है| इसलिए अब तेज़ चलना होगा| आते समय भी फोटो खींचता रहा| लेकिन अब सूरज पहाड़ के पीछे गया है और इसलिए इस घाटी के स्थान में अब छाया फैली हुई है और उससे ठण्डक लगने लगी है... अलकनन्दा पर जहाँ पूल था; वही पर नदी तक जाने का पैदल रास्ता भी था! अलकनन्दा को नमन किया| कितनी शुद्ध जलधारा है ये! जीवन के उद्गम के जितना पास जाते हैं, उतनी शान्ति और प्रसन्नता मिलती है! अलकनन्दा के कुछ छोटे पत्थर साथ ले लिए! लौटते समय भी पैर नही दुख रहे हैं| उतराई मामुली सी है| जेपी कंपनी द्वारा बनाए गए मन्दिर का भी दर्शन कर लिया| फूलों की घाटी न सही; यहाँ के फूल भी कम सुन्दर नही हैं!

लामबगड़ पहुँचने तक साढ़ेतीन बजे हैं| यहाँ चाय मिली| यहाँ से वापस बस्ती शुरू हुई| लेकिन अभी जोशीमठ की जीप नही दिख रही है| शायद उसके आने में समय होगा| चलने में इतना मजा आ रहा है कि आगे पण्डुकेश्वर की ओर पैर चल दिए| जोशीमठ की जीप जब भी आएगी, उसे सड़क पर रोक लूँगा| पण्डुकेश्वर में ध्यान- योग बद्रि मन्दिर है| लामबगड़ से पण्डुकेश्वर चार किलोमीटर दूर है| पैरों में बिल्कुल थकान नही है| रास्ता बीच बीच में थोड़ा कच्चा या टूटा हुआ है| एक स्थान पर थोड़ा डरावना भी लगा| आज लगभग उन्नीस किलोमीटर चलना हो जाएगा मेरा| पण्डुकेश्वर आने के ठीक पहले जीप मिली| चलानेवाले ने कहा कि यही जोशीमठ की आंखरी जीप होगी| उससे अनुरोध किया कि ध्यान योग बद्रि मन्दिर के पास सड़क पर रूकिए; जल्द मन्दिर देख कर आता हुँ| यह मन्दिर पण्डुकेश्वर गाँव के भीतर नीचले हिस्से में है| नीचे जाने में अधिक समय नही लगा| फटाफट मन्दिर देख लिए| शाम के साढे चार बज रहे हैं| रोशनी कम हो रही है| उपर जीप भी रूकी होगी| इसलिए जल्द निकल आया| लेकिन गाँव के भीतर की पगडण्डी बड़ी है| लगभग दो फीट की एक स्टेप होगी| इस वजह से चढते समय कुछ थकान हुई और रूकना पड़ा| पहाड़ में बंसे एक गाँव का शाम का रूप देखने को मिला| जल्द ही उपर आ कर जीप ले ली|

अविश्वसनीय दिन रहा ये! यकिन नही आता की उन्नीस किलोमीटर चला हुँ| और वो भी ऐसे अपूर्व नजारों के बीच! अब शाम- नही रात का मन्जर आने को है| ठण्ड हो रही है| जीप में कुछ सहयात्रियों से थोड़ी बात हुई| उतने में एक महिला ने बताया- वो देखो- हिरन गया अभी! पहाड़ के लोग कितने सरल होते हैं और कितना आतिथ्य करते हैं! पहाड़ देख रहा हुँ तो कुछ भी नही छूटना चाहिए, इस लिए उस महिला ने हिरन की तरफ इशारा किया था... जोशीमठ में पहुँचने तक लगभग अन्धेरा हो चुका है| स्टैंड से होटल जाते समय बहुत ठिठुरन हो रही है| ध्रुव तारा आकाश में दक्षिण भारत के मुकाबले कुछ उपर दिखाई दे रहा है! जैसे तैसे कुछ खा लिया और फिर डॉर्मिटरी में रजाई की शरण गया| आज के दिन में जो कुछ देखा, उस पर अब भी यकीन नही आ रहा है| आज इतना चला हुँ तो कल जरूर औली जा सकूँगा| देखते हैं| 


अलकनन्दा!
योग- ध्यान बद्रि मन्दिर





















... ढाई साल बाद यह वृत्तान्त लिखते समय भी सब बिल्कुल ताज़ा है| ये जो नजारे देखे- जो नदी, जो सड़क, जो गाँव और जो स्थान देखें- वे सब एक तरह से अब खो गए हैं| मेरी यात्रा के बाद छह महिनों में ही प्रलय आनेवाला था और उसमें सब बुरी तरह क्षतिग्रस्त होनेवाला था| लेकिन मेरी स्मृति में सब अब भी वैसा ही जीवन्त है...

Friday, September 25, 2015

अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोS हिमालय: ४




जोशीमठ दर्शन!

१६ दिसम्बर २०१२! नीन्द जल्दी खुली| सुबह पाँच बजे से ही नीचे बजार से देहरादून और ऋषीकेश की बसें निकलती हैं| उनके चालक निरन्तर आवाज दे रहे हैं| ठण्ड अब पता चल रही है| रजाई के बाहर आने का मन ही नही हो रहा है| कुछ देर वैसे ही लेटा रहा| धीरे धीरे सुबह हुई और फिर तैयार हो कर होटल के रिसेप्शन पर आया| आज के दिन में मुख्य रूप से जोशीमठ में ही घूमना है| सर्दियों में इस यात्रा पर आने का एक उद्देश्य जहाँ तक सड़क चालू हो वहाँ जाना और खास कर औली जाना है| औली जोशीमठ से भी अधिक- लगभग २७०० मीटर ऊँचाई पर है| इसलिए सोचा कि एक दिन जोशीमठ में रूक कर इस वातावरण से अनुकूल होता हुँ|

होटल के रिसेप्शन पर पूछा कि कहाँ तक रोड़ खुला रहेगा तो पता चला कि पण्डुकेश्वर जाया जा सकता है| यह स्थान बद्रिनाथ रोड पर बद्रिनाथ से बीस किलोमीटर पहले है| जोशीमठ प्रसिद्ध है आदि शंकराचार्य के पीठ के लिए! इसका वास्तविक नाम ज्योतिर्मठ था जो बाद में जोशीमठ हो गया| बिलकुल संकरा और चढाई पर बंसा हुआ सा गाँव| सुबह आरती के समय एक मन्दिर में‌ गया| सर्दियों में बद्रिनाथ जी की मूर्ति जोशीमठ रखी जाती है| यहाँ आदि शंकराचार्य ने साधना की थी और ज्योतिर्मठ तथा बद्रिकाश्रम की स्थापना की थी! वाकई करीब १२०० साल पहले वे सुदूर दक्षिण भारत से कैसे यहाँ तक आए होंगे? १२०० वर्ष जाने दिजिए, अभी भी सड़क जो बनी है बड़ी नाजुक है| कभी भी टूट सकती है| दादाजी के पिता एक बार यहाँ आए थे- करीब साठ साल पहले| तब उन्होने चूल्हा आदि सामान साथ ही लाया था| बीते जमाने में‌ चुनौतियाँ चाहे कितनी हो; एक बात जरूर अनुकूल रही होगी| इन्सान सरल थे| आज जैसा मार्केट और स्वार्थ का जाल नही होगा| इसलिए यात्रियों को कठिनाईयाँ तो होती ही होगी; लेकिन साथ में लोग सहायता भी अवश्य करते होंगे|

ऑफ सीजन होने पर भी मन्दिर परिसर में यात्री है| जोशीमठ के मन्दिर देखते समय आदि शंकराचार्य की दूरदृष्टि पता चल रही है| शंकराचार्य ने जहाँ जहाँ पीठ बनाए, वही स्थान आज भारत के सीमा के पास हैं| जैसे द्वारका और श्रीनगर! और उन्होने उत्तर भारत के पीठों के लिए दक्षिण भारत के पुजारियों को नियुक्त किया था और आज भी यही परंपरा चल रही है| मन्दिरों का समूह- ध्यान भूमि और उसके साथ में बर्फिली चोटियाँ!

मन्दिर में एक स्वामीजी मिले| उन्होने बुलाया तो आरती में जा कर बैठा| बातचीत होने पर उन्होने बताया कि तपोबन तक भी सड़क खुली हैं और शेअर जीप चलती हैं| मन्दिर देखने के बाद जोशीमठ कस्बे में चक्कर लगाया| दूर पहाड़ में एक गाँव की सड़क उपर उठती दिख रही है| धूप का आनन्द लेने में बड़ा मजा आ रहा है| बस लग रहा है कि धूप में ऐसे ही बैठा रहूँ| आज आराम ही करने का मन हो रहा है| ठण्ड में थोड़ी सुस्ती तो आती ही है| आम तौर पर हम गर्म क्षेत्र के लोग जो हैं| टहलते टहलते ही नाश्ता कर लिया|

दोपहर में फिर डॉर्मिटरी जा कर विश्राम किया| यहाँ मोबाईल में इंटरनेट बन्द है| फोन पर बात करने की भी अधिक इच्छा नही हो रही है| एक तरह का सुकून जरूर मिल रहा है| काफी देर लेटने के बाद तीन बजे फिर बाहर घूमने के लिए निकला| जोशीमठ में नीचले हिस्से में भी कुछ मन्दिर है| वहीं बद्रिनाथ जी की गद्दी रखी जाती है| उन्हे देखने के लिए गया| यह परिसर थोड़ी ढलान पर स्थित है| जाते समय शहर से आनेवाला एक नाले जैसा झरना भी लगा| यहाँ से दूर अलकनन्दा दिखाई दे रही है| घण्टे भर तक टहला और फिर शाम ढलने लगी| यहाँ शाम के पाँच बजे ही अन्धेरा हो रहा है| और ठण्ड भी तेजी से बढ़ने लगी| कल बद्रिनाथ रोड़ पर पण्डुकेश्वर जाना है| वहाँ जानेवाली जीप का पता कर लिया| शाम का भोजन अभी कर लेता हुँ|

साढ़ेपाँच बजे तक तो रात हो चुकी है| अब रजाई में घुसने के अलावा चारा नही है| ठण्ड फैल रही हैं... लेकिन इसी ठण्ड के कारण ही डॉर्मिटरी खाली पड़ी है! ये डॉर्मिटरी का सिस्टम पसन्द आया| वहाँ बैजनाथ में भी मामुली दाम पर आराम से ठहरा था| वहाँ सिर्फ ८० रूपए लगे तो यहाँ १४० रूपए| लेकिन सुविधा अच्छी है| लेटे लेटे मोबाईल पर संगीत का आनन्द लिया| 'ॐ मणि पद्मे हुँ' इस तिब्बती मन्त्र पर कुछ प्रवचन भी सुने| वाकई ऐसे स्थानों पर प्रवचन सुनने में भी बड़ी गहराई अनुभव में आती है...

आज का दिन एक तरह से आलस में ही बिता| लेकिन अगर कल मुझे घूमना है तो आज विश्राम करना ही ठीक था| विश्राम और श्रम एक ही ऊर्जा के तो दो पहलू है| जितना अच्छा विश्राम होगा, उतना ही श्रम किया जा सकेगा| विश्राम भी एक कला है और लोग अपनी चिन्ताएँ और परेशानियों को सहज नही भूला सकते| इसलिए आज विश्राम हुआ तो वही सही| और ठण्ड भी ऐसी है कि कोई उपाय नही है| जल्द ही १६ दिसम्बर का दिन बीतता गया| यह वही दिन था जिसने पूरे देश को हिला दिया| दिल्ली में हुए बलात्कार और अपराध काण्ड ने सभी को अस्वस्थ कर दिया| लेकिन उस समय मुझे उसकी खबर नही है... मै एक तरह से दुनिया से दूर विश्राम में हुँ|