Thursday, December 6, 2018

एचआयवी एड्स इस विषय को लेकर जागरूकता हेतु एक साईकिल यात्रा के अनुभव: ४. पंढरपूर से बार्शी

४. पंढरपूर से बार्शी

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१५ नवम्बर| कल लगातार दूसरे दिन पंक्चर होने से एक तरह से अब भी अस्वस्थ हूँ| पंक्चर तो मैने ठीक कर दिया है, लेकीन फिर होने का डर है| कल सोने में बहुत देर होने पर भी सुबह फ्रेश लग रहा है| सुबह बच्चों से विदा लिया, पालवी संस्था की दिदी से विदा लिया| अच्छी खासी ठण्ड लग रही है| पंढरपूर गाँव में से शेटफळ की सड़क पूछ कर आगे निकला|‌ जब इस यात्रा का रूट प्लैन बनाया और योजना बनाई, तो हर दिन लगभग ८०- ८५ किलोमीटर साईकिल चलाने का लक्ष्य रखा| ऐसे रूट बनाते समय कई बार बहुत इंटेरिअर की सड़के लेनी पड़ी| आज भी मुझे ऐसी ही सड़क से जाना है| पंढरपूर गाँव के बाद चंद्रभागा नदी का पूल पार करते ही ऐसी ही सड़क लगी! पंढरपूर इतना बड़ा तीर्थ क्षेत्र और उसके बाद दिया तले अंधेरा! देखा तो पूरी तरह उखाड़ दी है! नई सड़क बनाने के पहले पुरानी को तोड़ दिया है! मन ही मन उम्मीद कर रहा हूँ कि आगे जा कर कुछ ठीक होगी|





चन्द्रभागा और पण्ढरपूर!

लेकीन जैसे आगे बढ़ता रहा, दूर तक ऐसी ही सड़क दिखाई‌ दे रही है| सड़क का मतलब बिल्कुल पत्थरों से युक्त मिट्टी! सिर्फ मिट्टी होती, तो भी चलता| यहाँ तो पत्थरों पर ऑफ रोड साईकिलिंग हो रही है| कुछ देर बाद एक गाँव आया| आगे शेटफळ गाँव तक ऐसी ही सड़क होगी, यह बताया गया| लगभग एक घण्टे में सिर्फ बारह किलोमीटर हो पाए हैं| लेकीन चाय- बिस्कीट के लिए भी आगे होटल मिलेगा ऐसा बताया गया| यहाँ से शेटफळ कम से कम बाईस किलोमीटर दूर होगा| पंक्चर का बहुत डर लगने लगा| भयावह घनघोर पत्थरों वाली सड़क! कल परसो मेरी साईकिल तो हायवे पर भी पंक्चर   हुई, यहाँ तो जैसे पंक्चर होना सिर्फ समय की बात है ऐसा लग रहा है| जैसे तैसे डरते डरते आगे जाता रहा| बीच में कुछ कुछ जगह पर सड़क का प्लास्टर कर दिया है| कुछ दोपहिएवालों को देख कर वहाँ साईकिल उठा कर ले गया और चलाने लगा| लेकीन ऐसे प्लास्टर छोटे छोटे ही है और बार बार नीचे उतरना पड़ रहा है| लेकीन कोई उपाय न देख कर फिर प्लास्टर पर ही चला रहा हूँ| कुछ देर बाद एक चौराया आया| यहाँ चाय- बिस्कीट मिलेगा| यहाँ होटलवाले ने मेरी साईकिल का बोर्ड देखा- 'क्या आप आपके और सबके स्वास्थ्य के बारे में जागरूक हैं?' और कहा कि इसका एक पेज और हो तो उसे चाहिए, वो अपने होटल पर लगाएगा! उन्हे धन्यवाद दिया! यहाँ दो बिस्कीट पैक और दो चाय का नाश्ता किया| सड़क की आगे की दशा जानी, बस ऐसी ही रहेगी| बीच बीच में प्लास्टर आता रहेगा| कुछ कुछ जगह पर पुरानी सड़क भी मिलेगी|





सड़क की दशा देख कर लगभग हर पाँच मिनट बाद टायर चेक कर रहा हूँ| एक बार तो डर के मारे टायर पंक्चर है, ऐसा महसूस भी हुआ| लेकीन यह वैसा ही है जैसा कि हमें आभास होते हैं| मन में डर हो तो सामने हर चीज़ डरावनी लगती‌ है| साईकिल पंक्चर न होगी, ऐसी उम्मीद भी छोड चुका हूँ| अगर आज तीसरे दिन साईकिल पंक्चर हुई तो सम्भवत: मुझे मेरी यात्रा की योजना बदलनी पड़ेगी| शायद कुछ दूरी लिफ्ट ले कर जाना होगा और किसी तरह जुगाड़ कर पुणे से इसका टायर मंगाना पड़ेगा| कुछ भी हो सकता है| ऐसे अस्वस्थ भाव के साथ आगे जाते समय ट्रैक्टर्स ने बहुत साथ दिया|  पहले दिन से ट्रैक्टर्स लगातार मिल रहे हैं| पुणे से यहाँ तक गन्ने का वहन करनेवाले ट्रैक्टर्स बहुत मिल रहे हैं| अक्सर वो मेरे पसन्दीदा गाने ही लगाते हैं! यहाँ तो बहुत मजेदार दृश्य देखने को मिला! एक दूर से आए ट्रैक्टरवाले ने तो प्लास्टर पर ही ट्रैक्टर डाल दिया है! वाह! एक ही प्रश्न मन में आया- वो इसे ठीक से उतार पाएगा ना, और दूसरी तरफ से भी ट्रैक्टर आया तो क्रासिंग कैसी होगी? खैर! ऐसी स्थिति में जब की मै सड़क से निराश हुआ था, तब साईकिल ने बड़ा साथ निभाया| वह चलती रही| पत्थरों से वह टकराती रही और सब झटकों को झेलती रही| जैसे शेटफळ पास आता गया, धीरे धीरे सड़क के कुछ हिस्सों में सुधार शुरू हुए| बीच बीच में पुरानी सड़क लगने लगी| एक जगह लगा कि जैसे शेटफळ आया, लेकीन वो उसके पहले का गाँव था! मन बड़ा अस्वस्थ हो जाता है! धीरे धीरे शेटफळ पहुँचा| दूर से यहाँ हायवे देख कर मन उत्तेजित हो उठा| यह पुणे- सोलापूर हायवे ही है जो मैने कल इन्दापूर में छोडा था| अभी मुझे इसे क्रॉस कर आगे माढा की सड़क पर जाना है|





शेटफळ में मुख्य हायवे के पास नही रूका और आगे फिर होटल नही मिला| अब तक सिर्फ पैतीस किलोमीटर हुए है और पचास से अधिक बाकी है| होटल न मिलने से थोड़ी तकलीफ हुई| यहाँ से आगे सड़क सम्भवत: ठीक ही है| आगे सड़क बहुत छोटी है और कुछ विरान क्षेत्र से जा रही है| लेकीन पहली पत्थरों वाली तथा कथित सड़क से बहुत बेहतर! और यहाँ का परिसर भी बहुत अलग रहा है| बिल्कुल अन्दरूनी ग्रामीण इलाके से गुजर रहा हूँ| जैसे जैसे माढा पास आता गया, छोटे छोटे गाँव लगने लगे| एक जगह चाय- बिस्कीट, चिप्स और चिक्की भी मिली| अब बेहतर सड़क के कारण कुछ गति भी मिल रही है| सड़क पर चढाई भी है और उतराई भी| मै सोलापूर जिले के इस क्षेत्र में बिल्कुल पहली बार आ रहा हूँ, तो सब दिक्कतों के बीच इसे एंजॉय भी कर रहा हूँ| बेहतर सड़क आने से मानसिक गतिरोध दूर हुआ| आगे हायवे भी मिलनेवाला है| इसलिए आगे का चरण आसान होता गया| माढा से लगभग दस किलोमीटर आगे हायवे लगा और यहाँ से बार्शी बाईस किलोमीटर है| यहाँ दो ग्लास गन्ने का रस लिया और आगे बढ चला| बार्शी के कुछ पहले थोड़ी सी चढाई आई और हेड विंड भी आया| उससे गति थोड़ी कम हुई, फिर भी समय रहते बार्शी पहुँच गया| दोपहर के दो बजने के पहले बार्शी पहुँच गया| आज चौथे दिन ८८ किलोमीटर हो गए| लेकीन ऐसी सड़क को देखकर लग रहा है कि ये ८८ किलोमीटर बेहतर सड़क पर चलाए गए सौ किलोमीटर से अधिक होंगे|





पहुँचने पर पहले बार्शी गाँव के रेड लाईट एरिया में काम करनेवाली क्रान्ति महिला संघ के दफ्तर में गया| यहाँ छोटासा प्रोग्राम हुआ जिसमें संस्था के कार्यकर्ता, आयसीटीसी काउंसिलर लोंढे सर और कुछ फिमेल सेक्स वर्कर्स भी थी| संस्था के कार्यकर्ताओं ने उनके कार्य के बारे में बताया| मेरे अनुभव भी बताए| किसी भी संस्था के लिए रेड लाईट एरिया में काम करना बहुत चुनौतिपूर्ण होता है| यहाँ सेक्स वर्कर्स के साथ संस्था का रैपोर्ट अच्छा दिखा| बीस- पच्चीस महिलाएँ आई थी| लेकीन आज सबसे कठिन सड़क से थकान भी अधिक है, इसलिए कार्यक्रम में बहुत सक्रिय रूप से सहभाग नही ले सका| लोंढे सर के एक मित्र के पास ठहरने की व्यवस्था की गई है| यहाँ वे बार्शी के एचआयवी पॉजिटीव नेटवर्क का काम देखते हैं| उसके बाद फिर हर रोज का रूटीन- विश्राम, भोजन और फिर मेरा लैपटॉप का काम|



आज जिनके पास ठहरा हूँ, वे भी इस क्षेत्र में काम करते हैं| उनसे आगे भी बहुत बातचीत होती रही| चर्चा में मैने उनसे पूछा कि आपने यह कार्य कैसे शुरू किया? तब पता चला कि वे भी बहुत सालों से पॉजिटीव हैं| लोंढे सर ने उन्हे इस कार्य में आने के लिए हौसला दिया था| एचआयवी क्षेत्र में ऐसे पीअर एज्युकेटर्स का बहुत बड़ा महत्त्व है| जब कोई एचआयवी पॉजिटीव व्यक्ति दुसरे किसी पॉजिटीव व्यक्ति से मिलता है, उसे सकारात्मक दृष्टि से जीते और काम करते हुए देखता है, उसे इस संक्रामण के साथ लेकीन नॉर्मल तरीके से ही जीते देखता है, तो उसे बहुत प्रेरणा मिलती है| पॉजिटीव नेटवर्क ऐसे ही पॉजिटीव लोगों का होता है| ज्योत से ज्योत लगाते चलो के तर्ज पर ही ये एक दूसरे को मदद करते हैं और काफिला आगे बढ़ता है| यह नेटवर्क एचआयवी होनेवाले व्यक्तियों को सब तरह से सहायता करता है- ट्रीटमेंट के लिए सलाह, पोषण के लिए सेवा, रेफरल सेवा, सरकारी सेवाओं के लिए मार्गदर्शन भी करता है| इनके स्वयं सहायता समूह भी हैं| आज के पहले मै कई बार एचआयवी पॉजिटीव लोगों से मिला था, लेकीन कभी भी एचआयवी पॉजिटीव व्यक्ति के साथ रहा नही था| आज वह कमी दूर हो गई| और अब मै मेरे अनुभव के साथ कह सकता हूँ कि चाहे कोई एचआयवी पॉजिटीव भी हो, पूरी तरह नॉर्मल और स्वस्थ जीवन जी सकता है, जीता भी है| इनका अच्छा परिवार है, सब खुशहाली में जी रहे हैं| मेरा उन्होने बहुत प्यार से ख्याल रखा| इनके बेटे को म्युजिक मिक्सिंग में बहुत रूचि दिखी| शाम तक इनसे और लोंढे सर से बातें होती रही| शाम को बार्शी में घूमना भी हुआ| आज वाकई लग रहा है कि मै जो साईकिल चला रहा हूँ, ऐसी ऐसी सड़कों से इस तरह यात्रा कर रहा हूँ, वह बहुत सार्थक है और मेरे लिए इसमें बहुत कुछ सीखने को भी मिल रहा है|

अगला भाग: एचआयवी एड्स इस विषय को लेकर जागरूकता हेतु एक साईकिल यात्रा के अनुभव ५. बार्शी से बीड

मेरी पीछली साईकिल यात्राओं के बारे में आप यहाँ पढ़ सकते हैं: www.niranjan-vichar.blogspot.com

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (08-12-2018) को "शहनाई का दर्द" (चर्चा अंक-3179) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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