१२. वाशिम से अकोला
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२३ नवम्बर की सुबह| आज वाशिम से अकोला जाना है और चौथे बाल गृह को विजिट करना है| यह इस यात्रा का एक वाकई चरम बिन्दू होगा| सुबह की ठण्डक में वाशिम में विहान प्रोजेक्ट ऑफीस से निकला| वहाँ देवानन्द जी ने मुझे विदा किया| उसके पहले सवेरे जल्द उठ कर कॉफी भी पिलाई थी| यह ऑफीस अकोला कॉर्नर पर ही है, इसलिए मुझे तुरन्त हायवे मिल गया| आज काफी उतराई भी मिलनेवाली है और कल कुछ दूरी तक इसी सड़क पर वापस आऊँग, तो वह चढाई बन कर मिलेगी| मन ही मन सोच रहा हूँ क्या सफर रहा है यह अब तक| साईकिल ने क्या खूब साथ निभाया है! यकीन नही होता| शुरू के चार पाँच दिन तो जैसे मै बहाव के विपरित तैर रहा था| लेकीन उसके बाद एक बहुत प्रबल बहाव पैदा हुआ है| शरीर और मन की एक पूरी धारा बन गई है| अब सब कुछ जैसे अपने आप हो रहा है| सुबह साढ़ेचार बजे आराम से नीन्द खुलती है, शरीर अपने आप साईकिल चलाता है और मन भी बिल्कुल तैयार रहता है| पानी की जैसे लकीर बनती है और पानी उसी लकीर में से गुजरता है, वैसे ही शरीर और मन इस क्रम में बिल्कुल स्थिर हो गए हैं| या युं कहूँ तो ठीक रहेगा- मै ठहरा रहा, जमीं चलने लगे| इतना सब आसान हुआ है| आज का दिन तो बढिया रहेगा, आज वैसे ८४ किलोमीटर साईकिल चलानी है, लेकीन कुछ ढलान भी होगी| इसलिए मज़ा तो पूरा आएगा| साथ ही आज कई दिनों बाद बाल गृह में बच्चों से मिलना भी होगा|


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२३ नवम्बर की सुबह| आज वाशिम से अकोला जाना है और चौथे बाल गृह को विजिट करना है| यह इस यात्रा का एक वाकई चरम बिन्दू होगा| सुबह की ठण्डक में वाशिम में विहान प्रोजेक्ट ऑफीस से निकला| वहाँ देवानन्द जी ने मुझे विदा किया| उसके पहले सवेरे जल्द उठ कर कॉफी भी पिलाई थी| यह ऑफीस अकोला कॉर्नर पर ही है, इसलिए मुझे तुरन्त हायवे मिल गया| आज काफी उतराई भी मिलनेवाली है और कल कुछ दूरी तक इसी सड़क पर वापस आऊँग, तो वह चढाई बन कर मिलेगी| मन ही मन सोच रहा हूँ क्या सफर रहा है यह अब तक| साईकिल ने क्या खूब साथ निभाया है! यकीन नही होता| शुरू के चार पाँच दिन तो जैसे मै बहाव के विपरित तैर रहा था| लेकीन उसके बाद एक बहुत प्रबल बहाव पैदा हुआ है| शरीर और मन की एक पूरी धारा बन गई है| अब सब कुछ जैसे अपने आप हो रहा है| सुबह साढ़ेचार बजे आराम से नीन्द खुलती है, शरीर अपने आप साईकिल चलाता है और मन भी बिल्कुल तैयार रहता है| पानी की जैसे लकीर बनती है और पानी उसी लकीर में से गुजरता है, वैसे ही शरीर और मन इस क्रम में बिल्कुल स्थिर हो गए हैं| या युं कहूँ तो ठीक रहेगा- मै ठहरा रहा, जमीं चलने लगे| इतना सब आसान हुआ है| आज का दिन तो बढिया रहेगा, आज वैसे ८४ किलोमीटर साईकिल चलानी है, लेकीन कुछ ढलान भी होगी| इसलिए मज़ा तो पूरा आएगा| साथ ही आज कई दिनों बाद बाल गृह में बच्चों से मिलना भी होगा|