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Monday, October 24, 2016

“मेरे प्रिय आत्मन् . . ."


ओशो. . . .

जुलाई २०१२ में ओशो मिले. . संयोग से पहले ही कुछ प्रवचनों में ध्यान सूत्र प्रवचन माला मिली| वहाँ से फिर 'एस धम्मो सनन्तनो', 'सम्भोग से समाधी तक', 'ताओ उपनिषद', 'अष्टावक्र महागीता', 'मै कहता आखं देखी' और अन्य बहुतसी मालाएँ सुनी. . . अब भी रोज सुनता हूँ| उसमें से इतना कुछ मिलता गया और मिल रहा है कि जुलाई २०१२ से एक नया ही जीवन शुरू हुआ है. . . जैसे जीवन के दो हिस्से हैं- जुलाई २०१२ के पहले और जुलाई २०१२ के बाद. . .

उस समय उनसे मिलना होने के पहले उनके बारे में थोड़ा थोड़ा सुना था, पढा था| पर कहते हैं ना कि सही‌ समय के पहले कुछ भी नही होता है| इसलिए पहले कई बार उनका नाम सुनने के बाद भी परिचय नही हुआ था| लेकिन तब परिचय हुआ; मिलना हुआ; जीवन में एक नई मिति प्रवेश कर गई| . .

उस ज़िन्दगी से कैसे गिला करे जिस ज़िन्दगी ने मिलवा दिया आपसे. .

ओशो कैसे थे, उन्होने क्या किया था, क्या वे वाकई महान थे, ऐसे तर्क मै नही करना चाहता हूँ| मै मेरे करीब के लोगों को इतना ही कहता हूँ कि ओशो सुनिए, पढिए, अनुभव लीजिए! थोड़ा स्वाद तो लीजिए! और फिर तय किजीए कैसे लगता है!

पीछले चार सालों में इतना कुछ मिला है कि कहा नही जा सकता है| वे जो बताते है वे जीवन से कितना करीब है, यह बार बार महसूस होता गया| वे जो बताते हैं, जो कहते हैं, उसकी प्रतिति बाहर किसी शास्त्र में नही, वरन् अपने जीवन के अनुभव में चप्पे चप्पे पर मिलती है, इसका अनुभव लिया. . .

फिर धीरे धीरे सब प्रेम गीतों का अर्थ ही बदल गया| प्रेमियों के गाने ठीक गुरू- शिष्य नाते के लिए भी लागू होने लगे| जैसे- गुरू शिष्य को कई जन्मों से पुकार रहे हैं-


जाईए आप कहाँ जाएंगे
 
ये नज़र लौट के आएगी

दूर तक आपके पीछे पीछे

मेरी आवाज चली जाएगी

 
या यह भी

तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई

युंही नही दिल लुभाता कोई

जाने तू या जाने ना माने तू या माने ना


ओशो के विचार कहना बहुत कठिन है| क्यों की वे सिर्फ विचार ही नही हैं, उनमें 'निर्विचारता' भी है| उनकी एक बात याद आती है| शुरू के दिनों में वे उनके प्रवचन का आरम्भ 'मेरे प्रिय आत्मन्' द्वारा करते थे और प्रवचन समाप्त होते समय कहते थे, "आपके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूँ, मेरा प्रणाम स्वीकार करें|” लोग अपनी भगवत्ता पहचाने, यह उनकी अपेक्षा थी| और फिर १९७३ के बाद उन्होने स्वयं को भगवान कहना शुरू किया| उसका भी हेतु यही था कि सभी लोग भगवानस्वरूप ही हैं| सिर्फ वह देखने के लिए हिम्मत चाहिए| मै स्वयं को भगवान कहता हूँ और आपको भी स्वयं के बीच का ईश्वर देखने के लिए प्रेरित करता हूँ, ऐसा वे कहते हैं| उस समय उन्हे बहुतसे पत्र आए कि कि आप कैसे स्वयंघोषित भगवान हैं, स्वयं को कैसे भगवान कहते है आदि आदि| उस पर ओशो ने कहा, 'जब मै आपको प्रणाम करता था, आपमें भीतर बैठे परमात्मा को नमन करता था, तब एक ने भी मुझे 'क्यों' नही पूछा| क्योंकि वह आपके अहंकार के अनुकूल था| पर जब मैने मेरा उल्लेख भगवान ऐसा किया, तभी फिर आपने मुझे क्यों पूछा? तब तो एक ने भी नही पूछा था और इतने सारे पूछ रहे हैं|' उसके बाद उन्होने कहा कि भगवान न होने का विकल्प है ही नही| जो भी है, सब भगवानस्वरूप ही है| सिर्फ वह खुले आँखों से देखना या न देखना, इतना ही फर्क है|


ओशो को सुनते समय इतना कुछ मिलता गया कि जीवन के प्रति दृष्टि बदली| जीवन में हमें पसन्द न आने वाले, अनचाहे कई पहलू होते हैं| उनका स्वीकार करने की दृष्टि धीरे धीरे आई| जीवन के तनाव- संघर्ष तीव्रता से चले जा रहे हैं. . .


ओशो के प्रवचन में कुछ शिष्यों ने प्रश्न पूछते समय ऐसे गाने भी पूछे हैं-


कुछ दिल ने कहा, कुछ भी नहीं

 
कुछ दिल ने सुना, कुछ भी नहीं

 
ऐसी भी बातें होती हैं


उस पर ओशो कहते हैं कि असली संवाद मौन से ही होता है| शब्द तो सिर्फ माध्यम होते हैं|

 
एक ने उन्हे प्रश्न के तौर पर यह गाना ही पूछा- 
 

कोरा कागज़ था मन मेरा
 
लिख दिया नाम इसपे तेरा. . .
   

सुना आँगन था जीवन मेरा. . . 
 
बस गया प्यार जिसपे तेरा. . .

 
और


तुम अबसे पहले सितारों में बस रहे थे कहीं

तुम्हे बुलाया गया है जमीं पर मेरे लिए. . .


उस पर ओशो कहते हैं कि मै भी आप जैसा ही हूँ, पर मुझमें ऐसा कुछ है जो सितारों में से है और वह आपमें भी हो सकता है|


ओशो ने जो कहा है, वह बहुत विलक्षण है; युनिक है| सिर्फ विभन्न धर्मपंथ और साधना मार्ग के बारे में ही नही, उन्होने प्रचलित समाज; प्रोजेक्टेड ट्रूथ; देश-काल इसके बारे में जो भाष्य किया है; वह अ द् भु त और अ वा क करनेवाला है. . . उसे यहाँ कहने के बजाय जिन्हे इच्छा हो, उन्होने उसे ओरिजिनल सुनना/ पढना चाहिए (उसकी थोड़ी और चर्चा करनेवाला मेरा यह ब्लॉग)|


ओशो ने एक जगह कहा है कि आप मुझे गुरू भी मत मानिए और मित्र भी मत मानिए| सड़क पर जाते समय आपको मिलनेवाला कोई अन्जान राहगीर समझिए| मित्र भी मानेंगे तो मेरे प्रति आसक्त होंगे| मुझे एक अन्जान राहगीर समझ कर मुझमें आसक्त हुए बिना मै जो मार्ग दिखा रहा हूँ, सिर्फ उस पर आगे बढ़िए. . .


कहने जैसा बहुत कुछ है| वह भाव व्यक्त करनेवाले ये कुछ गाने| गुरू- शिष्य; अध्यात्म का सार इसका अर्थ दर्शानेवाले कुछ गाने और खास कर ६०- ७० के दशक के कुछ गानों में उस समय प्रवचन देनेवाले ओशो की उपस्थिति स्पष्ट महसूस होती है. . .

यहीं वो जगह है. . . यही वो फिज़ाएँ हैं. . .
 
यहीं पर कभी आप हमसे मिले थे. . .
 
इन्हे हम भला किस तरह भूल जाएं . .
 
यहीं पर कभी आप हमसे मिले थे. . .


खामोश है ज़माना, चुपचाप हैं सितारें 
आराम से है दुनिया, बेक़ल हैं दिल के मारे
 
ऐसे में कोई आहट, इस तरह आ रही है
जैसे की चल रहा हो, मन में कोई हमारे
 
या दिल धड़क रहा है, एक आस के सहारे. . .
 
आएगा, आएगा, आएगा. . आएगा आनेवाला



तुम पुकार लो. . .
 
तुम्हांरा इन्तज़ार है. . .

 
इन गानों में भी ठीक यही अर्थ महसूस होता है


अजनबी मुझको इतना बता दे
 
दिल मेरा क्यों परेशान है
 
देख के तुझको ऐसा लगे
 
जैसे बरसों की पहचान है . . .


मन अपने को कुछ ऐसे हल्का पाए
 
जैसे कन्धों पे रखा बोझ हट जाए
 
जैसे भोला सा बचपन फिरसे आये
 
जैसे बरसों में कोई गंगा नहाए. . .


धुल सा गया है ये मन
 
खुल सा गया हर बंधन
 
जीवन अब लगता है पावन मुझको. . .

 
जीवन में प्रीत है, होठों पे गीत है
 
बस ये ही जीत है सुन ले राही

 
तू जिस दिशा भी जा, तू प्यार ही लूटा
 
तू दीप ही जला, सुन ले राही. . .

 
यूं ही चला चल राही यूं ही चला चल
 
कौन ये मुझको पुकारे
 
नदियां पहाड़ झील और झरने, जंगल और वादी
 
इनमें है किसके इशारे . . .


. . . जिन्हे रस होगा, उन्हे ओशो को समझने का एक अच्छा मार्ग उनके प्रवचनों में बताई गई यादों का संग्रह कर बनाया उनका एक चरित्र| यह १३०५ पृष्ठ का पीडीएफ किताब यहाँ उपलब्ध है| जिन्हे रस होगा, वे उसे डाउनलोड कर शुरू के कम से कम १०० पृष्ठ पढ़ सकते हैं| ओशो के बारे में कई लोगों ने बहुत कुछ कहा है| पर मेरा अनुभव है कि ओशो के बारे में अन्य क्या कह रहे हैं, इसे थोड़ा साईड में रख कर ओशो खुद क्या कह रहे हैं, यह सुनना आरम्भ किया की धीरे धीरे शंकाएँ रहती ही नही है. . . . इसलिए जिन्हे कुछ आक्षेप हो या कुछ प्रश्न हो, उन्होने इस किताब के कम से कम पहले १०० पृष्ठ पढ कर अपनी राय बनानी चाहिए| धन्यवाद! :)

अन्त में भी एक गाना ही याद आता है-


उसके सिवा कोई याद नही. . . उसके सिवा कोई बात नही. . .
 
उन ज़ुल्फों की छाँव में. . . . उन कातिल अदाओं में,
 
इन गहरी निगाहों में. .
 
हुआ हुआ मै मस्त. . .

 
वो दौड़े है रग रग में, वो दौड़े है नस नस में
 
अब कुछ न रहा मेरे बस में हुआ हुआ मै मस्त. . .

Sunday, April 21, 2013

ओशो: एक आकलन




ओशो! हाल ही में उनकी जीवनी पढने में आयीं। ओशो ने कभी किताबें नही लिखीं। उनकी कही जानेवाली किताबें उनके भाषणों का संग्रह है। इसी प्रकार उनकी जीवनी उनके कई हजार भाषणों में स्वयं के बारे में दिए गए कथन का संकलन मात्र है। यह एक तरह से बोली गयी जीवनी है जो कि १३०८ पृष्ठों में संकलित की गई है।

इस जीवनी को पढने का अनुभव अद्भुत है। ‘ओशो हमारी विचारधारा के विपरित है, वे गलत है अथवा वे मात्र सेक्स और ड्रग से ही सम्बन्धित है,’ ऐसा सोच कर हममें से कितने सारे लोग शायद ओशो को जानने से वंचित रह जाते होंगे। इसलिए इस जीवनी को पढने के पश्चात् मन में हुई प्रतिक्रियाओं को प्रस्तुत कर रहा हुँ। 

ओशो अथवा जो लोग उन्हे १९८९ के पूर्व जानते होंगे उनके लिए रजनीश.....  निश्चित रूप से एक असामान्य व्यक्तित्व।एक अलग किस्म के साधु अथवा संत। ओशो को जानने का प्रयास करते समय दिक्कत यह होती है, कि हम उन्हे अपने पूर्वग्रहों से बनाए गए दायरे में ही देखते है। और यह स्वाभाविक भी है। परंतु जैसे उनके बारे में आकलन बढता है, तब महसूस होता है, कि उनका व्यक्तित्व काफी व्यापक है। जैन परिवार में जन्मे वह जैन नही थे। भारत में जन्मे वह भारतीय नही थे। वरन् उनकी गरिमा इन सब मर्यादाओं से परे है।

अतीत में जैसे गुरू नानक साहाब और रामकृष्ण परमहंस जी ने जिस तरह का प्रयास किया था, कुछ उस तरह का परंतु उससे अधिक गहन तथा अधिक वैश्विक प्रयास ओशो ने किया। गुरू नानक और रामकृष्ण परमहंस ने हिंदु, मुस्लीम, ईसाई, बौद्ध आदि सभी धर्मों का सार तत्त्व निकाल कर उसे जोड कर एक सच्चे तत्त्व को प्रस्तुत करने का प्रयास किया था। इस दिशा में ओशो और आगे गए हुए प्रतीत होते है। उन्होने धर्म, सम्प्रदाय तथा परंपराओं के नाम पर संकुचित किए गए सार तत्त्व का एक अद्भुत संश्लेषण किया, उसे संग्रहित किया, उसे simplify एवम् amplify भी किया। आज की भाषा में, आज के इन्सान के लिए अनुकूल तरिके से विश्व के सामने रखा। भगवान बुद्ध ने जो बातें कही, वे यथार्थ है; पर उनके बाद पच्चीससौ साल बीत चुके है और मानव बदला है। यह ध्यान में रखते हुए उन्होने भगवान बुद्ध की बातों को आज के समय के अनुरूप सामने रखा। यही कार्य उन्होंने सभी धर्म, सम्प्रदाय तथा विचारधाराओं के साधु, संत तथा साक्षात्कारी व्यक्तियों के साथ किया। इसमें ख्रिश्चन, इस्लामी, बौद्ध, जैन, पारसी, सीख्ख और अन्य सभी मतों के महान व्यक्ति थे। वरन् संत पलटूदास, बोधिधर्म, अतिसा और भी कई ऐसे कई महान व्यक्ति थे, जिन्हे आज इतिहास की धूल ने हमारे नजरों से ओझल कर दिया है। उन्होने अज्ञात को ज्ञात तो किया ही, पर ज्ञात पर भी काफी प्रकाश डाला। 

ओशो की वाणि तथा उनका विवेचन सुनने योग्य है। उसका वर्णन शब्दों में करना ठीक नही होगा।

उनकी यह जीवनी उनके असामान्य जीवन को बारिकी से दर्शाती है। बचपन से ही वह तीक्ष्ण तथा दृढ प्रज्ञा के व्यक्ति थे। उनका बचपन, युवावस्था तथा आत्मसाक्षात्कार और फिर व्याख्याता और अध्यापक का कार्य विस्तार से बताया गया है। आचार्य के रूप में बीस साल तक देश में जनजागरण करने के पश्चात उन्हें उनके ‘अपने लोग’ मिल गए और उनके साथ उन्होने नव संन्यास आन्दोलन शुरू किया। पारंपारिक संन्यास जीवन  विरोधी था। उन्होने उस संन्यास के सभी कर्मकाण्ड तथा कालबाह्य तरिकों को छोड कर मात्र ध्यान पर आधारित तथा जीवन केन्द्रित संन्यास का समर्थन किया। वे खुद को कोई मसीहा, भगवान या कोई प्रेषित नही समझते थे। सभी व्यक्तियों के अन्दर बसे भगवान को पुकारने के लिए उन्होने खुद को भगवान कहना शुरू किया। खुद के आत्मसाक्षात्कार के अनुभव सामने रखे। वे समझाते है कि जैसे धर्मों में बताया गया है, वैसे आत्मसाक्षात्कार कोई सैकडों या हजार जन्मों के प्रयास का ही परिणाम नही है, अगर कोई चाहें तो इसी जीवन में स्वयं का साक्षात्कार कर सकता है। इस प्रकार उनका समस्त प्रतिपादन अनुठा और अपूर्व है और आज के समय के अनुकूल है। मूलत: वह जीवन विरोधी न हो कर जीवन केन्द्रित है। जीवन के सभी पहलूओं को स्वीकार करनेवाला है।

जैसे उनका कार्य बढता गया और नए नए ‘कम्युन’ बनते गए, वैसे राजनीतिक तथा धार्मिक सत्ताओं ने उनका विरोध करना शुरू किया। और यह स्वाभाविक भी था। क्यों कि बचपन से उन्हों ने इन लोगों के विरुद्ध जैसे युद्ध आरम्भ किया था। धर्मसत्ता (जिसमें सभी सम्प्रदाय एवम् परम्पराएँ शामील है) की स्थिति आज मूर्दाघर जैसी है, यह उनका कहना था। उन्होने धर्मसत्ता के अपराधों पर कठोर प्रतिपादन किया। सभी धर्मों के पण्डित और पुरोहित अपराधी है यह उनका कहना है। उन्होने पोप और अमरिका के उस समय के अध्यक्ष रेगन जैसे व्यक्तियों के बारे में भी कहा की वे बडे अपराधी है। एक आम आदमी के द्वारा यह कहा जाना नि:संशय काफी हिम्मत और वैचारिक प्रतिबद्धता का सूचक कहा जा सकता है।

उनके प्रबोधन के कारण लोगों का विश्वास दूर जाता हुआ देख कर राजनीतिक और धार्मिक सत्ताएँ बुरी तरह डर गईं और अमरिका में ओशो के कम्युन को नष्ट कर दिया गया। उन्हें काफी प्रताडना दे कर अमरिका से एक राजद्रोही जैसे निकाल दिया गया। अमरिकी सेना, पुलिस और सरकार उनके कार्य को रोकने के लिए ऐसे सामने आयी जैसे वह ओसामा जैसे किसी दुश्मन से लड रही हो। समूचे ख्रिश्चन जगत् एवम् अमरिका जैसी महासत्ता से ओशो की टक्कर वाकई पढने लायक है। एक अकेले जागे हुए इन्सान का भय इतनी महान सत्ता भी सह नही सकती इसका वह प्रमाण है। बुरी तरह पीडा दे कर और प्रजातंत्र के नाम के नीचे शैतानी ताकत के द्वारा कुचल कर और अंत में विषबाधा कर ओशो को अमरिका ने बाहर कर दिया। और फिर किसी भी देश में उनके कार्य को काफी समय तक ठीक चलने नही दिया। सोए हुए लोगों में इतना भय और इतना विलक्षण प्रभाव एक जागा हुआ इन्सान उत्पन्न कर सकता है, यह विश्व ने देखा। 


असामान्यता और अपने समय से आगे होने का एक परिणाम यह भी होता है, कि प्रचलित तथा पारंपारिक नजरें ऐसे अविष्कार का आकलन करने में असमर्थ होती हैं। जो कोई उन्हे अपने अपने नजरिए से देखता है और कही न कही उनको देखते समय पूर्व परम्परा से बनी धारणाएँ चरमराती हैं। इसकी एक प्रतिक्रिया तो रचनात्मक और नम्र हो सकती है कि चलिए, देखें इस इन्सान को जो हमारा सब कुछ हिला के रख दे रहा है। और दुसरी प्रतिक्रिया तो नकारात्मक होती ही है। जब भी हमें कुछ अलग दिखता है, तब हम उसे सकारात्मक नही तो नकारात्मक तरिके से देखते है। ओशो के साथ यही हुआ और यही हो रहा है। उनके अपूर्व विचारों को समझना आसान नही है और इसलिए ‘वह हमारी विचारधारा के विपरित है, मात्र सेक्स और ड्रग्ज के समर्थक है’ ऐसे पूर्वग्रहों में कई लोग फंस जाते है।

ओशो कहते है, उनका कार्य ऐसा है, कि वह हृदय को हिला के रख देगा। एक तो अत्यंत अनुकूल प्रतिक्रिया आएगी या फिर अत्यंत प्रतिकूल प्रतिक्रिया आएगी। या तो लोग उन्हे सुनते और देखते ही प्रभावित होंगे या फिर तिरस्कार करने लगेंगे। ओशो कहते है, यही उनकी ताकत है। प्रेम हो या तिरस्कार हो, हृदय से संवाद जरूर होगा। और यदि तिरस्कार भी कोई करता है, तो भी वह उनकी प्रक्रिया का भाग बन रहा है। क्यों कि तिरस्कार होने के कारण ऐसा व्यक्ति और कुछ लोगों के सामने उनके बारे में टिप्पणि करेगा और उससे कुछ और लोगों में उनके बारे में कौतुहल निर्माण होगा। ओशो कहते है, कि उनके साथ या तो आस्था या फिर तिरस्कार ये ही दो विकल्प है और मूलत: दोनो उनके कार्य के लिए अनुकूल है। उपेक्षा या अनास्था को अवसर है हि नही।

ओशो के बारे में कुछ जानना हो तो सबसे सही तरिका शायद उनके कुछ व्याख्यानों को पहले सुनना है। पूर्वग्रह और पहले के विचार जरूर होंगे, पर उन्हे थोडा दूर रख कर यदि हम उनके कुछ व्याख्यान सुनते है, तो शायद हम उनके विचारों के वैभव का रस ग्रहण कर सकेंगे। 

ओशो का सन्देश या उनका विचार संक्षेप में क्या है? वे यह नही कहते है कि मुझे एक गुरू की भाँति या एक पूजनीय प्रेषित की भाँति देखिए। मै एक मित्र जैसा हुँ जो आपको मात्र राह दिखा रहा हुँ। वे यह भी कहते है, कि मुझे मित्र भी मत कहिए, क्यों कि मित्र कहने से भी कुछ आसक्ती निर्माण होगी। वे कहते है, कि मै तो मात्र एक अंजान राही हुँ, जो आपको मात्र रास्ता दिखा रहा हुँ। मुझमें आसक्त या मुझे देखते रहने से अच्छा है कि आप मेरे द्वारा अनुभव लिए गए रास्ते पर आगे चलिए। 



WITNESSING




उनका जीवन सन्देश संक्षेप में कहना हो तो साक्षीभाव या जागरूकता कहा जा सकता है। वे कहते है, कि सब कुछ त्यागने की या जीवन को छोडने की आवश्यकता नही है। आवश्यकता जागने की है, साक्षी और सजग हो कर द्रष्टा बनने की है।

अधिक जानकारी

१.     उनके हिन्दी तथा अंग्रेजी व्याख्यान यहाँ नि:शुल्क उपलब्ध है।
२.     उनकी जीवनी यहाँ से डाउनलोड की जा सकती है।