Tuesday, September 24, 2013

चेतावनी प्रकृति की: ६

चेतावनी प्रकृति की: ६

. . . आज गुजरात के कुछ इलाकों में बाढ द्वारा काफी नुकसान की आशंका है और पाकिस्तान में बडे भूकम्प से तबाही हुई है। प्रकृति निरंतर चेतावनी दे रही है। इसी बीच जुलाई- अगस्त के कुछ दिनों के बारे में बात करते करते सितम्बर महिना आ कर समाप्त हो रहा है। ऐसे में मन में प्रश्न उठता है कि क्या यह बात इतनी विस्तार से की जानी चाहिए? प्रश्न सार्थक भी है। वैसे तो बात विस्तार से नही भी कही जा सकती है। विस्तार से कहने का एक ही उद्देश है और वह यह है कि वहाँ उस परिस्थिति में देखे गए सभी पहलू सामने रखे जाए। विस्तारपूर्वक बताने से शायद कभी किसी को कुछ जानकारी मिल सके। 

आज २४ सितम्बर है और आज भी मैत्री की अगली टीम वहाँ कार्यरत है। कुछ पुराने ही साथी है और कुछ लोग नए भी गए हैं। स्थान भी बदले हैं। कुछ सहायता पिण्डर व्हॅली में भी की जा रही है। हमारे टीम लीडर सर ने उत्तराखण्ड के कई इलाकों में जा कर असेसमेंट की है। और ऐसा भी नही की यह काम अभी समाप्त होगा। काम और कुछ समय तक चलता ही रहेगा। लोग जरूर बदलेंगे; पर कार्य जारी रहेगा। इसी कार्य के आरम्भिक चरण के दिनों की बात पूरी करते है। 

. . .  ३१ जुलाई की रात काली गंगा की गर्जना में बीत गई। उसी दिन डॉक्टरों की टीम मनकोट, घरूडी आदि गाँवों से लौटी थी। आज १ अगस्त की सुबह वे हमें मिलेंगे और फिर सब लोग साथ तवाघाट और उसके आगे जाएंगे। मन में थोडा हो पर डर निश्चित रूप से है। क्यों कि घरूडी  की यात्रा में काफी संघर्ष करना पडा। वैसा आगे भी होनेवाला है। और इसलिए डर के साथ मन में एक कौतुहल भी है। और आज का रास्ता मानस सरोवर मार्ग पर है।

सवेरे साथीयों को आने में थोडी देरी थी। इसलिए हमें नेपाल जाने का अवसर मिला। नेपाल जाना कोई बडी बात थी ही नही। बस सामने से गर्जना करनेवाली काली गंगा नदी पर एक लोहे की पुलिया पार करनी है। दो मिनट का रास्ता और शुरू हुई पहली विदेश यात्रा! तकनिकी रूप से जरूर यह विदेश है, एक अलग देश है। पर लग रहा है कि यह भी अपना ही है। और अंतर्राष्ट्रीय सीमा एक छोटीसी लकीर मात्र है। नेपाल में गए तो पाँच मिनट के लिए ही। पर वहाँ अर्पण की दीदीयों दारचुला दिखाया। सुबह है। दुकान खुले हुए हैं। कई लोग विदेश से आ रहे हैं और विदेश जा रहे हैं। हाँ भाषा जरूर अलग दिखाई दे रही है। एक जगह पे लिखा है- म्हारो अस्तित्व खतरामां छ। उस पर एक शेर का चित्र भी है। वन्य संरक्षण प्रकल्प है। लेकिन मन डर रहा है और कह रहा है कि तवाघाट जाते समय नदी या टूटी सड़क की वजह से ‘मेरो अस्तित्व खतरामा छ’ जैसी स्थिति तो न बन जाए! नेपाली चाय और आतिथ्य का आनन्द ले कर स्वदेस लौटे। प्रथम विदेश यात्रा समाप्त हो गई!

. . . तवा घाट! नक्शे में दिखाई देनेवाला छोटा सा शहर। धारचुला से तवा घाट महज १९ किलोमीटर की दूरी पर है। पर अब सड़क कई स्थानों पर खण्डित है। इसलिए बार बार रूक के चलना पड रहा है। और गज़ब की बात यह है कि जीप चलाने वाले लोग हर एक खण्ड में सेवा प्रदान कर रहे हैं! धारचुला से कुछ ही आगे जीप से उतारना पडा। रास्ते पर बी.आर.ओ. का कुछ काम चल रहा है। बडी बडी मशीने रास्ता साफ कर रही हैं। उन वीरों को मनोमन प्रणाम कर आगे पैदल चल दिए। रास्ता ठीक ही है। एक दो जगह पर थोडी सी कठिनाई हुई। अगले मोड़ पर दूसरी जीपें खडी हैं। ये अब दोबाट तक ले जाएंगे। अब हमारी कुल संख्या ग्यारह है। अर्पण के तीन लोग और ग्राम गरगुवा की प्रधान दीदी भी साथ हैं। सब जीप में तुरन्त बैठ गए। सब लोग साथ में हो और साथी जोशिले हो तो एक जोशभरा वातावरण होता है। नदी भी नीचे से पुकार रही है। और ऐसे में यदि कोई अच्छा गाना भी बजता है तो फिर सोने पर सुहागा होता है। गाना साधारण ही है; पर उसके बोल बडे अर्थपूर्ण है। 

खुलती फ़िजाएँ .. खुलती घटाएँ ..
सर पे नया है आसमाँ...
चारो दिशाएँ .. हस के बुलाएँ ..
वो सब हुए हैं मेहेरबाँ.. 

और जैसे ही यह गाना समाप्त हुआ, जीप भी रूक गई। यहाँ भी अब पैदल चलना पडेगा। और अब यहाँ का नजारा थोडा अलग है! एक छोटी सी नदी के उपर का रास्ता पूरा टूटा है। इसलिए एक जगह पर उस नदी को पैदल पार करना पडेगा। यहाँ काफी कठिनाई है। लेकिन कई लोग पार कर रहे है। कई लोग तो पीठ पर बडा भार भी ले जा रहे हैं। सेना के साथी भी मदद के लिए है। छोटी नदी की धारा एक जगह थोडी सीमित है। वहाँ उसके उपर लोहे की एक छोटी सी पुलिया नजर आ रही है। उसी से जाना है। पीछले अनुभव से सीखते हुए इस बार न सोचने का प्रयास किया। जो है, बस है! सोचने जैसा, विचार करने जैसा कुछ नही है। बस चलना है। पर कैसे चलें, जब सडक से उतरते समय पाँव रखने के लिए जगह नही है... लेकिन साथीयों की सहायता से कदम चलते गए। अर्पण के एक भाई से मदद मांगी और फिर वह पुलिया भी पार हो गईं। यहाँ पार करते समय हाथ से पकडने का रेलिंग भी था। और पुलिया घरूडी की पुलिया के मुकाबले और सुरक्षित थी। पुलिया पार करने पर सीधी चढाई थी। वह भी पार हो गई। और अब वापस सड़क आ गई है। अब फिर जीप से जाना है। तभी किसी ने बताया कि कल धारचुला में मैत्री और गिरीप्रेमी संस्था द्वारा बनाए गए पूल की जो बात हुईं थी, वह यही पुलिया है। और स्थानीय ग्रामीण भी इस पुलिया से काफी सुविधा पा रहे हैं।

जीप चलानेवाले जरूर किस प्रकार तेल का जुगाड कर रहे है। और किराया भी परिस्थिति देखते हुए उतना अधिक नही है। फिर से जीप यात्रा शुरू हुईं। लेकिन अब यह अंतिम बार थी। जहाँ जीप रूकी, वहाँ से अब पैदल ही जाना है। अब तवाघाट भी करीब दो किलोमीटर ही है। टूटी सडक पर पैदल चल कर जैसे तैसे आगे निकलते गए। पैदल रास्ता मात्र चलने के लिए है; सुविधा के लिए नही! बीच बीच में पत्थरों से राह गुजरती है। अब तवा घाट आने को है। बी.आर.ओ. के तवाघाट के केंद्र में हुई तबाही साफ देखी जा सकती है। और यह तवा घाट का बोर्ड। बोर्ड तो टूटा है फिर भी दिख रहा है। लेकिन तवा घाट? वह तो दिखाई ही नही दे रहा है! नक्शे में यहाँ पर तो अच्छा खासा गाँव है। और आगे गए। वहाँ भी एक धौली गंगा है। और तवाघाट में धौली गंगा और काली गंगा का संगम है। लेकिन अब मात्र तबाही का मन्जर है। कुछ भी बचा नही है। एक हिम्मतवाले चाचा खतरनाक जगह पर एक धाबा जरूर चला रहा हैं। पास में और एक दृश्य है। थोडा आगे जाने पर सेना के जवान एक ट्रॉली चला रहे हैं। यह संगम के पार जाने के लिए है। एक ट्रॉली में दो लोग एक समय पर जा रहे हैं और उसे रस्सीयों द्वारा खींचा जा रहा हैं। इसे देखते ही उसमें बैठने की इच्छा हुई। लेकिन अभी टीम लीडर और अर्पण के सदस्य पीछे से आ रहे हैं।
 
तवा घाट के ग्राउंड झिरो पर उसी धाबे के पास सब साथी इकठ्ठा हुए। अब यहीं तवा घाट का चिकित्सा शिविर शुरू होगा। धाबे में ही दो डॉक्टर बैठ गए हैं। रुग्ण भी आना शुरू हो गए। देखते देखते करीब पच्चीस रुग्णों को दवाईयाँ बतायी गयी। तब तक वहाँ के और लोगों से बातचीत हुई। अर्पण की दीदीयाँ महिलाओं और डॉक्टरों के बीच बातचीत में सहायता कर रही हैं। वैसे यहाँ की महिलाएँ डॉक्टरों से बहुत शर्माती नही हैं। एकाध को छोड दिया जाए तो महिलाएँ खुल कर बात करती है, ऐसा डॉक्टरों ने कहा। फिर भी, यहाँ महिला डॉक्टरों की आवश्यकता अत्यंत अधिक है। अगली टीम में महिला डॉक्टर हो, ऐसा प्रयास किया जा रहा है। करीब डेढ घण्टा वहीं शिविर चला।
अब यहाँ से हमें ग्राम खेला जाना है। रास्ता पूछते पूछते जाना पडेगा। अब हमें ट्रॉली पार करने का अवसर नही मिलेगा। नदी के उस पार एक सडक आगे जाती दिखाई दे रही है। वह नारायण आश्रम जाती है। लेकिन हम अब खेला जा रहे हैं। पैदल राह पहाड पर चढने लगी। नदी की गर्जना है पर अब नदी दूर जा रही हैं। मन में थोडा सुकून जरूर मिला! लेकिन यह रास्ता भी कम कठिनाई वाला नही है। इसकी भी टूट फूट हुई है। कुछ समय बाद एक पगडण्डी मिली जो सीधे उपर जा रही थी। इसी में चलना है। इसमें सिवाय चढा़ई के और दिक्कत नही है। बीच बीच में इक्का दुक्का लोग मिल रहे है। अब धूप भी तेज हो गई है...

और वह चढाई निरंतर आगे जा रही है। बीच बीच में थोडी ढलान मिलती है। थोडी देर विश्राम कर आगे निकलते हैं। ऐसे दो घण्टे चलते रहने पर खेला गाँव समीप आया। पर उसका यह तल्ला वाला याने नीचला हिस्सा था। मल्ला खेला तो और आगे है। लेकिन अब वहाँ नही जाना है। खेला गाँव के एक इंटर कॉलेज में चिकित्सा शिविर लगाया। छोटा और दुर्गम गाँव होने के बावजूद भी इस गाँव में इंटर कॉलेज है! ग्रामीणों को चलते चलते शिविर के आयोजन की सूचना दी। सब साथी चल के थके है- एक दो को छोड के। लेकिन अब थोडे विश्राम के बाद शिविर शुरू हुआ और लोग भी आने लगे। यहाँ हिन्दी सब को अच्छी आती है। इसलिए भाषा या संवाद में कोई कठिनाईं नही आयी। दोनों डॉक्टर रुग्णों की जाँच करते गए। बाकी लोग उनकी सहायता में हैं। लोग बडी़ संख्या में आए। पचास से उपर ही होंगे। वहीं एक घर में मॅगी का खाना खाया। मॅगी साथ में रखी ही थी।
शिविर समाप्त होने के पूर्व कुछ साथी आगे बढे। वहाँ एक ग्रामीण के घर पर काफी बातचीत हुईं। राशन की स्थिति पर चर्चा हुईं। तवा घाट से और अन्य जगह से राशन कैसे लाया जा सकता है, इस पर बात हुईं। यहाँ खेला में मुख्य रूप से रास्ता खण्डित होने से दिक्कत हैं। यह पानी से काफी उपर हैं। आगे के कुछ गाँवों में लैंड स्लाईड से जरूर कुछ नुकसान हुआ है। यहाँ सरकारी डॉक्टर कम ही आते हैं। हमारे डॉक्टरों ने बाद में बताया कि एक डॉक्टर आया भी था और वह शिविर बीच में ही छोड कर चला भी गया। खैर। खेला गाँव में रूकने का प्रबन्ध नही हैं। और गाँव पर अधिक भार न हो, इसलिए कुछ लोग आगे गरगुवा जाएंगे। गरगुवा की प्रधान हमें रास्ता दिखाएगी। यह भी पता चला कि अब यहाँ से रास्ता तिरछा है; चढाई वाला नही हैं। 

शाम ढलते समय खेला से निकले। तवा घाट करीब ९०० मीटर की ऊँचाई पर है। वहाँ से हम दो- ढाई घण्टे सीधी चढाई चलते आए हैं। निश्चित ही खेला की ऊँचाई २२०० मीटर से अधिक होगी। बाद में इसकी पुष्टी भी हुईं। यहा जाडे़ में बरफ गिरती है। वैसे तो यहाँ से ४००० मीटर ऊँची बर्फिली चोटियाँ दूर नही है। लेकिन बादलों का घूंघट उन्हे अब भी छिपाए हुए है। खेला से आगे रास्ता तिरछा ही था। बीच बीच में थोडी सी चढाई और फिर ढलान। आगे जा कर नदी का रौरव फिर से सुनाई पडने लगा। यह अब धौली गंगा है। नीचे बना एनएचपीसी का केंद्र और बाँध भी दूर से दिखाई देने लगा। रास्ता कठिनाई का नही है। रास्ते में थोडे से ही लोग- कुछ छात्र- मिलते हैं। छोटे छोटे गाँव आते हैं। रात्रि शुरू होते होते गरगुवा में पहुँच गए। यहाँ एक प्रपात को पार किया। उस पर लकडी की पुलिया है। अब इसका बिलकुल भी डर नही लगा। अब शरीर, आँखें एवम् मन को भी कुछ अभ्यास हो गया है। अब इतनी दिक्कत शायद नही आएगी। जैसे ही गाँव पहुँचे, बारीश शुरू हुईं। बारीश एक तरह से पूरा साथ दे रही थी। दिन शुरू होते ही बन्द और रात में तेज वर्षा!


गरगुवा की प्रधान जी के घर पर थोडा विश्राम किया। इस गाँव की स्थिति के बारे में पता किया। लोगों ने आँखो देखी सुनायी। १६ जून की वह काली रात... भारी तबाही के बीच इस बाँध का ढाँचा सुरक्षित रह गया है। सर ने कहा कि यदि यहा ढाँचा भी टूट गया होता, तो जौलजिबी भी नही बचता। राशन पर चर्चा हुईं। हेलिकॉप्टर से भी राशन लाया जा सकता है। मनकोट के पास बंगापानी में हेलिकॉप्टर से जैसे राशन डाला जा रहा है, वैसे यहाँ के भी कुछ गाँवों में डाला जा रहा हैं। हेलिकॉप्टर के लिए कोशिश करनी पडेगी। प्रधान जी की एक वीरांगना संस्था है। शायद वह यह काम कर सकें। सभी विकल्प देखे गए। इसमें गाँव की राजनीति की भी झलक देखने को मिली। लोग सब कुछ चाहते है; पर खुद पहल करने को राजी नही है। कुछ लोग तो संस्था के काम पर भी वहम कर रहे है। यह अक्सर दिखाई पडता है कि कितना भी कुछ करो; लोग अपनी ही सोच ले कर चलते है। उस समय सर ने पहली टीम द्वारा किए काम बताए। गरगुवा गाँव के कुछ घरों में मैत्री की पहली टीम के डॉक्टर आ गए थे। अर्पण की दीदीयों ने भी काम का स्पष्टीकरण दिया। वह शाम गरगुवा में बीत गईं। तेज बरसात चल रही थी। यहाँ और खेला में भी किसी भी फोन को नेटवर्क नही है। कुछ लोगों के पास नेपाली सिम चलते हैं। और यहाँ से दूर नारायण आश्रम जानेवाला रास्ता भी दिखाई देता है। यहाँ अगर बादल न होते, तो दृश्य और भी अद्भुत होता। डॉक्टर और अन्य साथी खेला में ही रूक गए हैं। 

अंतर्राष्ट्रीय सीमा: पुलिया से दिखनेवाली काली गंगा एवम् नेपाल का दारचुला


नेपाल!







































































मैत्री- गिरीप्रेमी द्वारा निर्मित पुलिया









































































































ध्वस्त तवा घाट- मात्र बोर्ड बचा है।



































ट्रॉली

विनाश














चिकित्सा शिविर!



    

       
खेला जानेवाला पैदल रास्ता











































































खेला में शिविर

प्रकृति अपनी ही धुन में














































Tuesday, September 3, 2013

चेतावनी प्रकृति की: ५


. . . चरमराती सामाजिक व्यवस्थाएँ और टूटता हुआ समाज. . . आज सभी जगह अशांति और अस्वस्थता जैसे आँख दिखा रही हैं। हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। केवल आर्थिक, प्रशासनिक तथा राजकीय परिप्रेक्ष्य ही नही, बल्की सामाजिक रिश्ते भी टूट रहे हैं। सच बात यह है कि इन्सान स्वयं से दूर जा रहा है। इन सब अस्वस्थ करनेवाले हालातों के बीच उत्तराखण्ड कार्य के चौथे दिन के बारे में बात करते हैं। 

३१ जुलाई के दिन धारचुला जाना है। दो दिन हुडकी, घरूडी और मनकोट जैसे गाँवों में काफी चलना पडा। हमारे सर की योजना हर दो दिनों बाद एक कम थकान वाला दिन हो, ऐसी है। इसलिए आज थोडी देर से निकलना है। और एक तरह से शारीरिक कार्य अधिक नही है। अनाज और राशन के दामों के बारे में निरंतर बातचीत चल रही है। अनाज और सब्जियों के दाम कुछ बढे हुए है। बैंक का खाता भी खोलना है। यह ‘मैत्री’ की ओर से सहायता करने आयी यह चौथी टीम है। आगे के दिनों का नियोजन भी है। इसलिए धन की आवश्यकता तो है हि। और यदि एटीएम काम नही कर रहे है, तो बैंक में खाता खोल कर वहाँ पैसे ट्रान्सफर किए जा सकते हैं। पर यह विकल्प भी उतना कारगर नही सिद्ध हो रहा है। अस्कोट में बैंक खाता खोलने में दिक्कत आयी। उनका सर्वर भी डाउन है। तो खाता सक्रिय होने में और वक़्त लगेगा।

अस्कोट से जौलजिबी तक पहुँचे। डॉक्टरों की टीम कल घरूडी़ रूकी। वहाँ उन्होने शिविर लिया। अब आज वे मनकोट जाएँगे। वहाँ शिविर ले कर उन्हे कई घण्टों का सफर कर वापस आना है। उन्हे आज भी आराम नही मिलेगा। जौलजिबी में गोरी गंगा एवम् काली गंगा का संगम होता है। जाहिर है, यहाँ भी तबाही हुई है। जौलजिबी वैसे थोडा़ बडा़ कस्बा है। यह पहले मानस सरोवर यात्रा का पहला पडा़व हुआ करता था। अब (या कहिए, इस साल की यात्रा रोकी जाने तक) धारचुला पहला मुख्य पडा़व है। जौलजिबी से जैसे ही आगे गए, रास्ते पर निर्वासित लोगों के टेंटस दिखे। वहाँ भी ‘अर्पण’ के दिदी लोगों के पहचान के लोग थे। बीच बीच में उनसे बात भी हुईं। उनकी जरूरतों का आंकलन भी किया गया। रोड की हालत बुरी है। दिल्ली धारचुला बस दिखी। धारचुला तक रास्ता खुल गया है। लेकिन तब भी वह बस धारचुला के कुछ पहले बलुआकोट तक ही जा रही है। जाहिर है, हालात अभी पूरे सामान्य नही बने हैं।

रास्ते में सर और अन्य साथीयों से बातचीत हुईं। ‘मैत्री’ की पहली टीम जब असेसमेंट के लिए आयी थी, तो उन्हे पूरा रास्ता चलना पडा़ था। क्यों कि तब यह रास्ता भी पूरा टूटा था। अब तो रास्ते बन रहे है और कुछ हद तक बन भी गए हैं। तब जौलजिबी के आगे पैदल ही जाना पडा था और वह रास्ता सामान्य बिलकुल भी नही था। नदी के उपर से और पहाड़ के बीच रेंगते हुए जानेवाला रास्ता। ऐसा रास्ता, जिसके बारे में हम शहर में सोच भी नही सकते हैं। ऐसे रास्तों पर चल कर पहली टीम ने सर्वेक्षण किया और काम शुरू किया। सर ने बताया कि उस समय का अनुभव और भी गहरा और विलक्षण था। अब तो रास्ते बन गए है। हालांकि धारचुला से आगे दोबाट से सडक टूटी हुई है और हमें भी ऐसे रास्तों पर कुछ अन्तर तो चलना है। लेकिन पहली टीम का अनुभव नि:संदेह अलग होगा। 

बातचीत में और एक बात सामने आयीं और वह यह कि यहाँ दूसरे क्षेत्रों से आए स्वयंसेवकों की तुलना में स्थानीय ग्रामीण स्वयंसेवक अधिक असरदार हो सकते हैं। क्यों कि पहाड़ पर चलना उनके लिए बाए हाथ का खेल है। लेकिन ऐसे स्वयंसेवक अधिक संख्या में नही मिल रहे हैं। दिक्कत सिर्फ यही नही है। प्राकृतिक रूप से भी है। पहाड़- हिमालय समुद्र के तल की मिट्टी से बना है तो वह इतना मजबूत है नही। इसलिए संतुलन बिगड जाने पर वह टूट जाता है। उसके पत्थर भी टूटते है। हाथ से तोडे जा सकते हैं। इतने वे नाज़ुक हैं। ऐसे में निर्माण का कार्य पुख़्ता होने में दिक्कतें अनेक है. . . 

बी.आर.ओ. और ग्रीफ के कार्य को देखना अद्भुत है। बडे बडे मशीनों से वे पहाड़ काट कर और सब मलबा हटा कर रास्ता बनाते है। रास्ते को साफ कर यातायात खुली करते हैं। जब भी वे सामने से गुजरते है, तब अपने आप ‘जय हिंद साब जी’ आवाज मुँह से निकल जाती हैं। इस रोड पर मिलिटरी के स्थानों का भी बडा नुकसान हुआ है। आय.टी.बी.पी. का एक युनिट पूरा बह गया। अब मात्र कुछ चिन्ह बचे हैं, जो दर्शाते हैं, कभी यहाँ एक दूसरी दुनिया थी. . . 

धारचुला जानेवाले इस मार्ग पर नया बस्ती, गोठी ऐसे गाँवों में बडी तबाही हुईं। अब बचे हुए लोग या तो रिश्तेदारों के पास गए है या फिर धारचुला में सरकारी आपदाग्रस्त शिविर में रहे हैं। यह शिविर भी हमें आज देखना हैं। इसमें नया बस्ती गाँव की कहानि कुछ और ही है। यह गाँव- जैसे नाम दर्शाता है- नया था। १९७२ की बाढ में मूल गाँव बह गया था। इसलिए इसे नए सीरे से बसाया गया। दुर्भाग्य से वह भी बच न पाया. . . 

दोपहर धारचुला पहुँचे। धारचुला कालीगंगा के किनारे बसा एक पहाडी तहसील का शहर है। शहर उसे पहाड़ के सन्दर्भ में ही कहा जा सकता है। जिले का यह सबसे उत्तरी तहसील है। इसकी सीमा के बाद तिब्बत शुरू होता है। हिमालय के शहरों में पाए जाने वाले गुण इसमें भी है। चढाई और ढलानवाला रास्ता। घनी आबादी। संकरी सडकें। मोटे मोटे घर। अन्जाने में करगिल और जोशीमठ की याद आयी। करगिल और जोशीमठ भी कुछ इसी तरह के नगर हैं. . . बस बादलों के कारण बर्फिली चोटियाँ नही दिखाई दे रही हैं। धारचुला के आस पास तीन हजार मीटर से अधिक ऊँचाई वाली कई बर्फिली चोटियाँ है। जाडे़ के मौसम में पिथौरागढ ही नही, बल्कि चंपावत और दन्या जैसे जगहों से भी बर्फिली चोटियाँ दिखती हैं। अभी तो सभी बर्फिली चोटियाँ बादल के घूँघट में लिपटी है। शायद यह तबाही उनसे देखी भी नही जाएगी. . . 

यहाँ से अब तिब्बत सीमा ज्यादा दूर नही है। तो लोगों के चेहरे भी अब कुछ कुछ वैसे दिख रहे हैं। एक अर्थ में भारत के पूर्वोत्तरी क्षेत्र (नॉर्थ ईस्ट) के लोगों जैसे। लग भी रहा है कि यह भी उसी का हिस्सा है। धारचुला में मिलिटरी के भी कई सारे युनिट हैं। तिब्बत सीमा से नजदिक होने के कारण और पहाड़ में समतल स्थान कम होने के कारण इस थोडे से समतल स्थान का मिलिटरी पूरा उपयोग करना चाहती है। धारचुला में ‘अर्पण’ के सदस्यों से परिचित एक दिदी के पास गए। यह तवा घाट से आगे के गरगुवा ग्राम की प्रधान है और धारचुला में रहती हैं। इनका थोडी चढा़ई पर बडा़ मकान है। नदी के उस पार का नेपाल दिखता है। नदी नीचले घरों के कारण दिखाई नही पड़ती है।
                                        
यहाँ काफी बातें पता चली। काली गंगा और धौली गंगा का तवा घाट कस्बे में संगम होता है। धौली गंगा नदी पर कुछ आगे एक बाँध बनाया गया है। वहाँ जलविद्युत का भी निर्माण होता है। एन. एच. पी. सी. (नॅशनल हायड्रो पॉवर कॉर्पोरेशन) का बडा केन्द्र वहाँ है। वहाँ बाँध होने के कारण धौली गंगा का प्रवाह कुछ सीमित रहा और तबाही होने के बावजूद उसका स्तर कम रहा। यदि यह बाँध न होता तो जौलजिबी तक सारा इलाका तबाह हुआ होता, ऐसा सुनने में आया। अब कालीगंगा नदी का प्रवाह भी बहुत बदलने लगा है। लोगों के पुनर्वास का बडा कठिन मसला अब सामने है। शासन के लिए भी यह बडी चुनौती है। पहाड़ में जगह की बहुत कमीं है और अब काफी स्थान असुरक्षित हो गए हैं और अब लोग भी वहाँ आवास करना नही चाहेंगे। पर वे उन्हे छोडना भी नही चाहेंगे। कौन अपनी जमीन और जायदाद छोडता है! एक विकल्प के तौर पर तराई का क्षेत्र- टनकपूर या फिर चण्डाल क्षेत्र आता है, ऐसा सुनने में आया। यहाँ वन पंचायत की जमीन है; सरकार पुनर्वास करा सकती है। पर दिक्कत यह है कि अभी तक टिहरी बाँध के विस्थापितों को ही जमीन नही मिली है। कुछ साल पहले मुन्सियारी के पास भी बाढ आयी थी। वहाँ के विस्थापितों को भी जमीन नही दी गईं है। और कुछ कहने की आवश्यकता नही है. . . वैसे भी सरकार नाम का संस्थान अब वैश्विक कंपनीयाँ और अन्य वैश्विक ताकतों का एजंट मात्र तो बना हुआ है। जमीन के लिए प्रतिस्पर्धा अत्यधिक है। फिर कैसे जमीन मिल सकेगी. . . यहाँ के सरकारी अफसरों के नेपाल में बार हैं। वहाँ जमीन का दाम कम है। सस्ती जमीन पर वे अपना बिजनेस देखने में व्यस्त हैं। फिर उन्हे कब जनता के सवालों को सुलझाने की फुर्सत होगी? अर्थात् कुछ लोग जरूर सक्रिय हैं। एक एसडीएम तो दिन जगह जगह जा कर रात लोगों से मिलते है, यह भी सुनने में आया। 

एक और बात सुनने में आयी कि यहाँ पंचायत राज प्रणाली में जिले के अन्दर न्याय पंचायत होती हैं। पिथौरागढ जिले में कुल ४४ न्याय पंचायत हैं। और ज्यादा तर गाँवों में ग्रूप ग्राम पंचायत होती हैं। स्वाभाविक है, क्यों कि गाव बिखरे जो होते हैं। इसी चर्चा में यह भी सुनने में आया कि अस्कोट से सटे अस्कोट वन परिक्षेत्र को भी काफी नुकसान पहुँचा। यहाँ हिरणों का एक मृगविहार था। वह भी विस्थापित हो गया। जगह जगह पशुओं का यही हाल है। गाय- बैल ही नही, खच्चर और पहाडी जीवन के अन्य जानवर भी बुरी तरह प्रभावित हैं। इन्हे कैसे पुनर्वास मिलेगा?? प्रभावित लोग ही अपने टेंटों में इनको भी साथ रख रहे हैं।

धारचुला के इंटर कॉलेज में सरकारी अस्पताल में आपदाग्रस्त शिविर लगा हैं। यहाँ करीब सौ परिवार और ढाई सौ तक लोग है। ये मुख्य रूप से न्यू सोबला, खेला, खेत, कंच्योती, पांगला ऐसे उपर के गाँवों से हैं। लैंड स्लाईड की वजह से उनके गाँव असुरक्षित बन गए हैं। कुछ तो बह भी गए है। लोग निरंतर आते और जाते भी रहते हैं। जहाँ इन्तजाम हुआ, वहीं चल दिए। इसलिए आँकडें बदलते हैं। सरकारी तौर पर इस आपदा को ‘दैवी आपदा’ कहा जाना खटका। यहा प्रबन्ध भी पर्याप्त नही था। कुछ कमरों में लोग रह रहे हैं। अपना खाना स्वयं बनाते हैं। और वह भी अपनी अपनी जाति के अनुसार। सभी एक साथ और एक जैसा खाना नही खा सकते हैं, इसलिए यह व्यवस्था करनी पडी. . . लोगों की खाने के सम्बन्ध में शिकायत थी। बच्चों के लिए दूध और हरी सब्जियाँ नही हैं। मात्र लौकी और आलु दिया जा रहा हैं। लोगों ने सिमला मिर्च और बैंगन चाहिए, ऐसा कहा। सोने के लिए एक मोटा फोम दिया है और उसमें काफी गर्म लगता है। इन दिनों यहाँ रात में वर्षा और दिन में गर्मी का कहर बरप रहा हैं। 

‘मैत्री’ और ‘अर्पण’ यहाँ हरी सब्जी, सोयाबीन, कपडें और दुध बाँटने का सोच रहे हैं। बजार में जितना आ रहा है, उतने में से ही खरीद कर देना पडेगा। दुध कम ही आ रहा हैं। हरी सब्जियों का भी यही हाल है। सरकारी अधिकारी और शिविर प्रभारी से भी बातचीत की। वे ठहरे नौकरशाही के बाशिंदे। उपर से आए आदेश के बिना कुछ भी नही कर सकते। फिर भी उनसे बात करना और उनको संस्था द्वारा दी जानेवाली मदद के बारे में बताना जरूरी था। इसी के बीच वहाँ के डी.एम, आ पधारे। उन्होंने झट से शिविर का चक्कर लगाया। कुछ लोगों से बातें की। जो लोग व्यवस्था के बारे में हमसे शिकायत कर रहे थे, उनको डी.एम. के सामने बोलने के लिए प्रेरित किया। पर उतनी हिम्मत वे नही जुटा पाए। फिर शिविर प्रभारी अधिकारी ने अकेले में बताया की, जो भी सामग्री बाँटनी है, वह रात में ही बाँटिए। क्यों कि सामग्री बंट रही है, यह देख कर यहाँ बहुत भीड आएगी और दिक्कत खडी करेगी। उन्होने बताया कि अभी भी कुछ लोग- जो प्रभावित नही हैं- मात्र सुविधाओं का लाभ लेने हेतु आए है। प्रभावितों का जहाँ मकान ही बह गया हो, वहाँ कागजात कैसे हो सकते हैं? इसलिए ये सभी कठिनाईयाँ है। प्रभावितों की कठिनाईयों का कोई अंत नही हैं। पशुधन के मुआवजे के लिए भी पशु के फोटो की आवश्यकता होती है। ऐसे में यदि किसी महिला के पास उसकी स्वयं की फोटो नही हो, तो कैसे वह अपने भैंस का फोटो रखेगी? सरकारी नियम बडे असंवेदनशील लगते हैं। दिक्कतों का सिलसिला कितना भी बडा हो, पहाड़ का मन उसका सामना करेगा। तबाही से राह भी निकालेगा। इतनी आपदा और इतनी तकलीफ के बावजूद लोग असहाय नही दिखे। ना ही वे सरकार पर अधिक निर्भर है। उनकी सोच में कुछ भी विवशता नही नजर आ रही है। और कोई करें न करें, वे स्वयं की सहायता जरूर करेंगे. . . 

. . . वह शाम काली गंगा की घनघोर गर्जना सुनते सुनते बीत गईं। नेपाल सामने ही है। कोई जोर से चिल्लाएगा तो नेपाल आवाज पहुँचेगी। नेपाल जाना है कल। उसके लिए मात्र एक छोटा सा ब्रिज चलना पडेगा। दो मिनट की तो बात है। नेपाल जैसे कोई विदेश न हो कर भारत का ही हिस्सा है। पर इसी नजदिकी के कारण काफी अवांछित तत्त्व इसका लाभ लेते हैं। यह भी सुनने में आया कि यहाँ सभी तरह की तस्करी बडे पैमाने पर होती हैं। ह्युमन ट्रैफिकिंग भी होती हैं। नशीलें पदार्थों की भी तस्करी होती हैं। सभी अनधिकृत काम करने का वो राजमार्ग है। यदि एक मुर्गी अवैध तरिके से नेपाल ले जानी है, तो उसका टिकट दस रूपए है!! धारचुला गाँव नेपाल में भी है। सामने दिखनेवाला शहर नेपाल का जिला मुख्यालय दारचुला है। 

. . .चारों तरफ अन्धेरा छाया है और उस अन्धेरे को चीरती हुई काली गंगा की गर्जना! रात में पहाड़ के बीचोबीच जगह जगह रोशनी के दिए जगमगा उठें हैं। अब डॉक्टरों की टीम कई घण्टों की पैदल यात्रा कर वापस लौटी होगी। कल वे भी हमें यहीं मिलेंगे। 

अस्कोट- जौलजिबी के रास्ते में दिखनेवाली गोरी गंगा


































नदी का कहर और रास्ते की दुर्दशा



विस्थापित शिविर और उसको जिंदा रखनेवाले चैतन्यपूर्ण बच्चें!

 
काली गंगा और धारचुला से दिखनेवाला नेपाल का दारचुला!





































































Sunday, September 1, 2013

चेतावनी प्रकृति की: ४

चेतावनी प्रकृति की: ४

यह नक्शा दिशा का कुछ ज्ञान करा सकता है। पिथौरागढ़- ओग्ला- अस्कोट- जौलजिबी- बरम- लुमती



ग्राम घरूडी़ के खुशीऔर हसीं के अविष्कार


































आते समय यही 'पुलिया' चुटकी में पार हो गईं!!



गोरी गंगा नदी और उसका रौद्र ताण्डव









































































. . . घरूडी़ में आपदा प्रभावित गाँवों का दर्द भीतर से देखने में आया। पहाड़ का जीवन कितना कठोर होता है, इसकी झलक मात्र मिली। मन में घरूडी़ गाँव से वापस लौटते समय उसी झरने और नदी के उपर के रास्ते का डर भी था। लेकिन एक बात तय कर ली, कि वापस जाते समय राह में सोचना नही है। जैसा भी रास्ता हो, चलना है। एक दिन घरूडी़ में बिताने से वहाँ पुष्करजी और गम्भीरजी से अच्छी दोस्ती भी हो गई थी। गाँव में सुबह ग्रामीणों ने आकर टीम लीडर सर से कुछ बात की। कुछ परेशानियाँ और कुछ शिकायतें बतायी। कुछ लोग ऐसे समय पर आक्रमक रूप से बात करते है। ऐसे ही मनकोट के एक ग्रामीण ने अपनी परेशानी बतायी और कुछ सुझाव दिए- गाँव में मीटिंग करनी चाहिए थी, सबको पूछना चाहिए था आदि। घरूडी के ग्रामीण भी थे। आगे के काम को ले कर बातचीत हुईं। ‘मैत्री’ और ‘अर्पण’ के सदस्यों ने आगे का कार्यक्रम बताया- कुछ हि दिनों में यहाँ राशन बांटना है। और डॉक्टर लोग तो आज ही आ रहे हैं। नदी पर पुलिया बनाने का विकल्प भी सामने है, पर वह काफी कठिन भी है। बातचीत में यह भी पता चला कि, घरूडी़ एवम् मनकोट से पुलिया न होने के कारण बच्चे स्कूल में नही जा पा रहे हैं। इसलिए अब कुछ बच्चे किराए पर लुमती में रह रहे हैं और स्कूल जा रहे हैं। एक पूलिया टूटने से इतना फर्क हो गया! गाँव में किराए से बच्चों का रहना आश्चर्यजनक है। यह बात भी पता चली कि, घरूडी़ गाँव में बिजली की आपूर्ति करने में ग्रामीणों की ही बडी़ भुमिका है। उन्होने स्वयं मेहनत की इसके लिए।

निकलते ही पता चला कि बरसात से रास्ता गिला हुआ है। फिर भी निकल पडें। और बिना रुके जल्दी चलते गए। बस हर कदम रखते समय अच्छे से देखना पड रहा है। जिस प्रकार हम बडी सडक पर वाहन चलाते समय निरंतर रास्ते पर आंखें बनाए रखते हैं, बिलकुल उसी प्रकार एक एक कदम रखना पड रहा है। एक मजे की बात ध्यान में आयी। यहाँ पर तो कोई भी वाहन नही चल सकता। चाहे कितना भी बडा और ताकतवर क्यों ना हो। यहाँ तो सिर्फ पैदल यात्रा ही सम्भव है। अर्थात् स्थिति बदलने पर हमें बडी बडी कारें- न जाने उन्हे क्या क्या नाम से पुकारते है- फोक्स वॅगन, तवेरा, होंडा सिटी और तत्सम- ये सब वाहन त्याग कर पैदल ही आना पडेगा। जैसे ‘यहाँ न हाथी न घोडा है, बस पैदल ही जाना है!’ दूसरी बात यह थी, कि जो आधुनिक तकनीक से रास्ते बनाए गए थे- पक्की सडक और लोहे की पुलिया आदि- वे तो टूट गए। पर जो उसके पहले से प्रचलित थे- पगडण्डीवाले रास्ते- वे अब भी बने है। वरन् ऐसे पैदल रास्तों का होना अब बडा किमती सिद्ध हो रहा हैं. . .

आते समय करीब डेढ घण्टे में हुड़की गाँव में पहुँच गए। हुड़की पहुँचने पर काफी सुकून का अनुभव हुआ। अब आगे की राह धरती के साथ जो थी! यहाँ कुछ ग्रामीणों से फिर बातचीत की। पीडितों की कुछ जानकारी ले ली। राशन के बारे में पूछा। हुड़की की पुलिया आज भी ठीक है। रेत का रास्ता थोडा क्षतिग्रस्त जरूर है। पर पुलिया से जौलजिबी- मुन्सियारी सड़क तक जाने का पैदल मार्ग बुरी तरह क्षतिग्रस्त है। उसका कुछ हिस्सा टूटा है। जाहिर है, यह रास्ता भी कभी भी बन्द हो सकता है. . .

हुड़की से जुडी़ कालिका (चामी) की पुलिया





























पैदल रास्ते की स्थिति!





























सड़क पर डॉक्टरों की टिम मिली। मन में संभ्रम निर्माण हुआ, कि क्या उनको कठिन राह के लिए प्रोत्साहित करें या फिर राह की दिक्कतें बता कर चौकन्ना करें? संक्षेप में उनको रास्ते की दास्तां सुना दी। शब्दों के बजाय चेहरा अधिक बोल गया। उन्होंने बताया कि उनका कल का रास्ता भी दुर्गम था। पहाड़ में गाँव के दो हिस्से होते है। तल्ला और मल्ला। तल्ला नीचला हिस्सा होता है (तल जैसा) और मल्ला उपर का हिस्सा होता है। डॉक्टर और उनके सहयोगी कल चामी और लुमती परिसर के गाँव के मल्ले में गए थे। तल्ला तो सड़क से जुडा होता है। पर मल्ला जाने के लिए उपर चढाई करनी पड़ती है। डॉक्टर और उनके साथी तो चिकित्सा शिविर के लिए कुछ सामान और दवाईयाँ भी ले गए थे। आज भी उन्हे ऐसी ही कठिन राह चलनी है। सहायता के लिए अर्पण सदस्य और कुछ ग्रामीण भी है। थोडी देर बात कर के उनसे विदा लिया।

पुलिया सड़क से जहाँ जुडी़ है, वही स्थान पर अर्पण के सदस्यों द्वारा कपडें बांटें गए। अर्पण के दिदी लोगों का ग्रामीणों से अच्छा परिचय है। हर किसी की आवश्यकता ध्यान में रखते हुए और वे सभी तरह के कपडें बांट रही है। सही सूचना के लिए उन्होने मिनी आँगनबाडी़ और एएनएम से सम्पर्क किया है। कपडें लेनेवालों में अधिकतर घरूडी़, हुड़की और मनकोट के ही लोग हैँ यहाँ। कुछ लोग तथा कथित ऊँची जाति के कारण कपडें नही भी ले रहें हैं। टीम के कुछ सदस्य कपडें बांटने में सहायता कर रहें है और कुछ सदस्य ग्रामीणों से बातचीत कर रहें है। उनकी मुसीबतों को समझ रहे हैं। आवश्यकताओं का आंकलन कर प्राधान्यक्रम बना रहे हैं। वैसे अर्पण और मैत्री टीम का प्राधान्यक्रम चिकित्सकीय सेवा और राशन है। फिर भी कुछ जगह कुछ लोगों को तिरपाल या टेंट भी दिए गए है और आगे दिए जाएंगे। और भी कई व्यक्तियों से बातचीत चल रही हैं। जितनी हो सके उतनी सहायता दी जाएगी। और वह भी सीधे ग्रामीणों को ही दी जाएगी।

कपडे बांटे जा रहे हैं।


नदी का कहर साफ देखा जा सकता है।


















































दोपहर में चामी से आगे लुमती गए। वहाँ एक जगह गम्भीरजी बता रहे है। वहाँ नदी का फैलाव थोडा कम है। वहाँ रस्सी डालने पर चर्चा हुई। एक जगह विद्युत विभाग द्वारा लगायी गई तार भी दिख रही है। यह वही रास्ता है, जो कल घरूडी़ में नदी पार से दिखाई दे रहा था. . . यहाँ की सड़क है पर काफी क्षतिग्रस्त है। जगह जगह बी.आर.ओ. काम कर रही हैं। बीच बीच में रुकना पड़ रहा है। मुन्सियारी मार्ग की यह सड़क बस लुमती तक ही शुरू हो पाई है। उसके आगे टूटी है। मुन्सियारी से भी इस तरफ टूटी है। मुन्सियारी मात्र थल के रास्ते से ही पिथौरागढ़ से जुडा है। यह रास्ता फिर से बनने के लिए काफी समय लगेगा. . .

जब लुमती में रुके थे, तब वहाँ की स्कूल छूटी। जब कपडें बांटे गए थे, तब वहाँ के एक परिवार से सम्बन्धित एक अनाथ लड़का यहीं की स्कूल में क्लास में था। दिदी लोगों नें इस बात का ठीक ख्याल रखा और उसे तुरन्त अच्छे कपडें दिए। ये सभी कपडें पहनने योग्य है, यह पहले देखा गया था। लुमती में चाय पिते समय सामने स्कूल के छात्र घर लौट रहे थे। एक नन्ही सी परी का फोटो खींचने से नही रहा गया। प्रकृति के जितना निकट जाते है, उतना कई उपहार मिलना शुरू होता है। खूबसुरती शायद उन्ही उपहारों में से एक है। यहाँ यह भी देखा कि, कितना छोटा लड़का भी क्यों न हो, उसे अपना रास्ता खुद चलना पडता है। स्कूल से घर जा रहा यह बच्चा शायद पहली कक्षा का ही होगा। पर वह अकेला दूर के घर की तरफ निकला है। एक- दो किलोमीटर से अधिक ही दूरी है। और घर सम्भवत: पहाड़ में ही है। लेकिन किसी को दिक्कत नही। ना ही उसके माता- पिता को और ना ही उस बच्चे को। पहाड़ की मिट्टी ही ऐसी कुछ खास है. . .

एक तार पार गई है।



































नन्ही परी और पहाड़ का बेटा


































"हाँ यही रस्ता है तेरा..... तूने अब जाना है....."

तबाही की छाति पर निर्माण कार्य!




















































पर्ते दर पर्ते उघड़ रही हैं. . . अब धीरे धीरे आपदा की धरातल की स्थिति पता चल रही हैं। हालांकि यह आपदा का ‘तल्ला’ है; सामने से पता लगनेवाला हिस्सा। आपदा का ‘मल्ला’ अर्थात् अन्दरूनी दास्तां तो बी.आर.ओ. और आर्मीवाले जाँबाज ही जानते होंगे. . . रास्ता बन भी जाता है, तो मुसीबतों का अन्त नही। रास्ता कभी भी टूट सकता है। वरन् कभी ना कभी टूटेगा। ग्रामीण यह बात जानते हैं। उन्हे पता है शायद आनेवाले समय में उन्हे अपने आवास के स्थान छोड़ने पडेंगे। खेती छूट जानेवाली है। जवाब या विकल्प कुछ भी नही है। कौन दे भी सकता है? चलिए, सड़कें तो कुछ दिनों में खुल जाएगी। पुलिया भी बनेगी। पर जो खेती गईं, जो लोग गए, उन्हे कैसे वापस लाया जा सकता हैं? पहाड़ में वैसे ही उपजीविका के साधनों की कमीं है। अब तो वें बहुत ही कम हो गए हैं। अब ज्यादा तो निर्माण कार्य से ही पैदा होंगे। यात्रा और पर्यटन बुरी तरह प्रभावित है। निर्माण कार्य ही एक तगडा़ विकल्प है। उसके लिए भी सरकार की इच्छा शक्ति चाहिए। पर बहुत बडा सवाल यह है- निर्माण की जानेवाली इमारतें, सड़कें और घर क्या बरकरार रहेंगे, या फिर ठीक सवाल शायद यह होगा- की वे कब तक बने रहेंगे?? और पहाड़ तोड़ कर जो सड़क बनायी जा रही है, वह तो बनते बनते ही उसके टूटने की तैयारी जैसे चल रही है। क्यों कि सड़क बनाने के लिए भी तो पहाड़ को बुरी तरह तोड़ना पड़ रहा है और तोड़ने से पहाड़ अस्थिर हो रहा है। उसकी घनता घट रही है. . . कई स्थानों पर लैंड़ स्लाईड़ की सम्भावना दिख रही है. . . एक तरह से यह आपदा एक माध्यम है, जिसके जरिए पहाड़ हमे चेता रहा है, कि अब जागो। होश में आओ। यही प्रकृति की चेतावनी है।

तबाही के बीच प्राकृतिक सौंदर्य


नदी का बदलता हुआ प्रवाह और नदी ने काटा हुआ ज़्मीन का हिस्सा


पहाड़ का भविष्य




















































































 

. . . लौटते समय कुछ देर जौलजिबी रूके। यहाँ कालीगंगा के पार सीधा नेपाल दिखाई दे रहा है। सीमाएँ- चाहिए जिला स्तरीय, राज्य स्तरीय या अंतर्राष्ट्रीय हो- वे मात्र लकिरें है, रेखाएँ है; यह महसूस हो रहा था। आप देखने पर फर्क नही कर सकते, कहाँ भारत है और कहाँ नेपाल। सब कुछ एक जैसा। वही पहाड़, वही पेड़ और वही प्रकृति।

रास्ते में अर्पण के दिदी लोगों से काफी बातचीत हुईं। अब तक उनसे दोस्ती हो गईं। इतने बिकट राह पर उन्होने ही तो मार्गदर्शन किया है! हमारे टीम लीड़र सर उनकी आयु, उनका अनुभव और उनके तजुर्बे को बीच में लाए बिना सबके साथ हसीं मजाक कर रहे है। ऐसे वातावरण में ही तो टीम वर्क होता है। सबका प्रयास एक हो जाता है। कोई अलग- थलग नही रहता। अर्पण के दिदी लोग भी काफी वर्षों से इस क्षेत्र में कार्यरत है। उनका कार्य क्षेत्र हालाँकि महिला सक्षमीकरण है, फिर भी उनकी अन्य विषयों की जानकारी भी अच्छी है। लोगों से इनका जुडाव बहुत सराहनीय है। सभी दिदी- लोग- महिलाएँ और बहनें पहाड़ से जुडी हैं। पहाड़ जैसी मजबूत हैं।





हेल्पिया पहुँचने पर अर्पण के कार्यालय के अन्य साथीयों से मिले। ‘मैत्री’ संस्था और हम लोग उनसे  अलग लग ही नही रहे हैं। सब आपस में मिल घुल गए है। कुछ समय परिसर में रुकने के पश्चात ओगला होते हुए मेर्थी गए। मेर्थी में आय.टी.बी.पी. का एक प्रशिक्षण केन्द्र है और इसलिए यहाँ का एटीम मशीन कार्यरत होने की उम्मीद थी। जौलजिबी और अस्कोट में तो मशीन बन्द था। मेर्थी के पास शाम के समय में युवा बच्चे सड़क पर दौड़ते नजर आए। यहाँ सौभाग्य से टीव्ही और अन्य शहरी मायाजाल कम होने के कारण लोग अब भी पुराने ढंग से सोचते है और जीते हैं। मिलिटरी का बडा आकर्षण है लोगों में। और यहाँ के गाँवों में एक्स- सर्विसमैन भी बहुत हैं। शायद इसी कारण जिन ग्रामीणों से मुलाकात हुई थी, उनकी सोच काफी बडी थी।

मेर्थी का एटीएम मशीन भी बन्द मिला। अब तो डीडी़हाट या फिर पिथौरागढ़ जाना पडेगा। वहाँ शायद यह भी हो सकता है कि एटीएम चालू हो, पर उसमें इस कार्य के लिए जितनी राशी निकालनी हो, उतनी उपलब्ध न हो। क्यों कि पहाड़ निपट ग्रामीण ढंग का है। यहाँ लोग एटीएम से पैसे ज्यादा निकालते नही होंगे। इसीलिए शायद एटीएम बन्द हैं और उनमें राशि भी पर्याप्त नही है। हमारे सर ने इसके लिए एक विकल्प यह ढूँढा कि अस्कोट में एसबीआय में एक खाता खोला जाए, इसके द्वारा राशि लायी और निकाली जा सकती है। यह भी एक आपदाग्रस्त क्षेत्र में राहत कार्य करते समय आनेवाली समस्या है।

सच्चा तीर्थ स्थान




विध्वंस. . . 


































. . . गाँव में बाँटने के लिए करीब तेरह टन राशन ट्रक के द्वारा पुणे से भेजा जा चुका है। अब कुछ यहाँ खरीदना है। उसी के लिए बात चल रही है। अलग अलग लोगों से दाम पूछे जा रहे है। अच्छी गुणवत्ता का राशन कम दाम में अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना है। अस्कोट में, पिथौरागढ़ में और अन्य स्थान पर भी दाम पूछे जा रहे हैं। कुछ लोगों ने बताया कि टनकपूर जैसे नीचले स्थान से भी सस्ते में राशन आ सकता है क्यों कि आता तो सब राशन मुख्य रूप से वहीं से हैं और वहाँ बडी मिल्स भी हैं। सभी विकल्प देखे जा रहे हैं।

स्थानीय साथी भी इसमें अहम भुमिका निभा रहे हैं। पहाड़ की एक और विशेषता दिखाई देती है। जहाँ जहाँ भी हम जाते- अस्कोट, जौलजिबी, बरम, ओगला, मेर्थी और अब मेर्थी के बाद सिंगाली- वहाँ वहाँ हमारे चालक और अन्य अर्पण साथीयों के पहचान के लोग मिल ही जाते। पहाड़ का स्वभाव एक छोटे कस्बे जैसा है। हर किसी का एक दूसरे के साथ अच्छा जुडा़व है। हर कोई एक दूसरे को जानता है। सिंगाली में राशन के दाम पूछे। दुकान के मालिक कई टन राशि लेने के सम्बन्ध में भी दाम बहुत घटाने के लिए राज़ी न थे। शायद अब आपदा के कारण बजार में तेज़ी है और इसलिए वे उसका लाभ उठाना चाहते हैं। खैर, कई सूत्रों के साथ राशन खरिदने पर बातचीत चल रही हैं, जल्द ही उचित दाम और सही गुणवत्ता का राशन मिल जाएगा। यह सब तो ठीक है। पर असली सवाल है पहाड़ और लोगों को कैसे बनाए रखना. . .

आशा की किरण- पेड एवम् हरियाली







क्रमश: