Showing posts with label पुरुष. Show all posts
Showing posts with label पुरुष. Show all posts

Saturday, December 29, 2018

एचआयवी एड्स इस विषय को लेकर जागरूकता हेतु एक साईकिल यात्रा के अनुभव १५. यात्रा के अनुभवों पर सिंहावलोकन

१५. यात्रा के अनुभवों पर सिंहावलोकन

इस लेख माला को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए|
 

एचआयवी और स्वास्थ्य इस विषय पर की हुई‌ साईकिल यात्रा मेरे लिए बहुत अनुठी रही| मुझे बहुत कुछ देखने का और सीखने का मौका मिला| यह सिर्फ एक साईकिल टूअर नही रहा, बल्की एक स्टडी टूअर भी हुआ| यह समस्या कितनी बड़ी है और इस पर काम भी कितना चल रहा है, यह मै समझ पाया और उसमें थोड़ा सहभाग भी‌ ले सका| कई‌ मायनों में मेरे लिए यह यात्रा अनुठी रही| साईकिलिंग के सम्बन्ध में भी‌ बहुत कुछ सीखने को मिला| आज तक की सबसे बड़ी और लगातार ज्यादा दिनों की साईकिल यात्रा हुई| और यह काफी‌ चुनौतिपूर्ण भी रही| शारीरिक कष्ट तो अभ्यास से हो जाते हैं, लेकीन मानसिक रूप से मै इतनी दूरी तक साईकिल चला पाया, यह मेरे लिए सन्तोष की‌ बात है| कई बार ऐसा लगा कि मेरी साईकिल यात्रा से लोग अपनी प्रसिद्धी भी चाह रहे हैं| लेकीन फिर सोचा कि चलने दो, क्या हर्ज है| मुझे इस यात्रा में इतना आनन्द आ रहा है, उन्हे उसमें आता होगा| कई बार ऐसे परीक्षा के क्षण आए जहाँ मन में लगा कि क्या वाकई मै साईकिल से प्रेम करता हूँ? साईकिल के प्रेम की कसोटी पर तो मै खरा उतरा! इस लिहाज़ से तो मै इस यात्रा में साईकिल की एक कक्षा से पास हो कर अगली कक्षा में पहुँचा! कई ऐसे क्षण आए जहाँ साईकिल चलाना कठिन हुआ| कई बार लगा भी कि यात्रा पूरी नही हो पाएगी| शुरू के दिन ऐसी कठिन स्थिति थी| पंक्चर ने भी तकलीफ दी, लेकीन इस यात्रा के बाद अब पंक्चर का डर कभी नही‌ लगेगा| कई दिनों तक लगातार चलनेवाली साईकिल यात्रा के लिए किस तरह शारीरिक एवम् मानसिक तैयारी करनी चाहिए, इसका बहुत अच्छा उदाहरण मुझे मिला|





अब बात करता हूँ इस पूरे विषय की| किसी भी समस्या या समाधान के लिए समाज की मानसिकता में गहराई तक जाना होता है| यह पूरा विषय कई मायनों में अन्य कुछ विषयों से जुड़ा है| जैसे स्त्री- पुरुष सम्बन्ध, स्त्री- पुरुष समानता और हमारे समाज की परिपक्वता| इसलिए इन पर भी थोड़ा विचार करना चाहिए| कुछ दशक पहले तक भारतीय सिनेमा में चुम्बन के दृश्यों पर सेंसॉर की पाबन्दी थी| लेकीन हत्या या गोली से मार डालने के दृश्यों पर कभी भी पाबन्दी नही थी| यह गलत तो है ही, लेकीन ऐसा क्यों है, यह भी समझना चाहिए| समाज में जिस चीज़ की बहुत छुपी आकांक्षाएँ होती हैं, दमन होता हैं, उसी को हम औपचारिक या सामाजिक मंच में गाली देते हैं; निन्दा करते हैं| स्वाभाविक प्रेम के अनुभव के प्रति समाज में बहुत ज्यादा दमन का भाव है| और शायद इतने ज्यादा दमन के कारण ही कुछ समय तक इस तरह के प्रेम- दृश्यों पर पाबन्दी होती थी या आज भी समाज की आँखों में ऐसे दृश्यों पर अलिखित पाबन्दी होती ही है| आज भी 'प्रेम' को एक सामाजिक मूल्य के रूप में देखा नही जाता है| प्रकृति की तरफ से देखा जाए तो पुरुष और स्त्री एक ही अखण्ड के दो खण्ड हैं और उनमें एक दूसरे के प्रति आकर्षण होता ही है| प्रकृति भी उन्हे पास लाना चाहती है| लेकीन हमारे आधुनिक समाज में कई बार बचपन से बच्चे- बच्ची एक दूसरे के साथ नही रहते हैं| साथ रहना मतलब सिर्फ घर में साथ होना नही है, बल्की साथ खेलना, साथ सोना, साथ रहना भी है| ऐसा न होने पर दोनों में एक दूरी और एक खाई बनती है| बाद में इसी के कारण तरह तरह के अफेअर्स होते हैं, महिलाओं पर अन्याय होता है; अत्याचार होता है| लेकीन एक उल्लेखनीय यह बात है कि आज भी जिन समुदायों में बचपन से बच्चे- बच्ची साथ रहते हैं और बाद में भी युवा लड़कें- लड़कियाँ पास ही रहते हैं; एक दूसरे के निकट होते हैं; वहाँ महिला अत्याचार का अनुपात बहुत ही कम है| आज भी ऐसे कई ग्रामीण और आदिवासी समाज हैं| जहाँ प्रकृति को जिस तरह स्त्री- पुरुष निकटता चाहिए वैसी रखी गई है, तोड़ी नही गई है, वहाँ हमें महिला पर अत्याचार या महिला पुरुषों से पीछड़ी होना आदि चीजें सुनने में भी नही मिलेगी| क्यों कि दोनों बिल्कुल साथ ही है| अगर लड़की लड़के के पास ही होती है, तो उसे उसके साथ छेडखानी की जरूरत ही नही पड़ेगी| जहाँ स्वाभाविक रूप से हाथ हाथ में लिया जा सकता हो, वहाँ छेडना असम्भव हो जाता है| लेकीन हम इतने प्राकृतिक ढंग से जीने से भटक चुके हैं| कई चीजें प्यार से; सॉफ्ट तरीके से की जा सकती हैं- जैसे दो बर्तन आपस में फंस जाते हैं| हम क्या करते हैं? थोड़ी देर उन्हे निकालने की कोशिश करते हैं और फिर ठोक- पीट करने लगते हैं| लेकीन अगर हम प्यार से उन्हे अलग करें, तो ठोक पीट की जरूरत भी नही होती है|