दूसरे जन्म दिन का पत्र: बच्चे मन के सच्चे
आज तुम बहुत बड़ी यानी तीन साल की हो गई हो! पीछले जन्म दिन को तुमने जो पर पहने थे, वैसे पर अब तुम्हारे फूट गए हैं! तुम्हारा जन्मदिन तुमने बहोत एंजॉय किया! दिन भर 'हॅपी बर्थडे टू यू' कहती रही! पीछले एक साल में तुम्हारा बढ़ना आश्चर्य से भर देता है! अभी अभी तो तुम बड़े लोगों जैसे बोलने लगी हो! सुना हुआ लगभग हर शब्द तुम्हे याद रहता है और बाद में अचानक ही तुम वह शब्द होनेवाला वाक्य बोलती हो! तुम्हे छोटी छोटी चीज़ें बारीकी से याद रहती है! लोग बहुत अच्छे याद रहते हो!
विगत साल की बेशुमार यादे हैं! अब भी तुम आईने जितनी ही निर्मल हो| अब भी तुम हमारा उतना ही लाड़ प्यार करती हो! सभी चीजों को खुशी से अपनाती हो| इस साल तो तुम्हारी स्कूल भी शुरू हुई! उसको लेकर मेरे मन में बहोत डर था| क्या तुम्हे स्कूल पसन्द आएगी, बस से वहाँ तुम जा सकोगी? क्या वहाँ एडजस्ट कर सकोगी? लेकीन तुम सब कुछ बहुत आसानी से और आनन्द से करती हो| स्कूल के पहले दिन से ही तुमने हिम्मत की| तीन साल की होने के पहले ही बस से स्कूल जाने लगी| सामने जो कुछ होता हो, उसे तुम खुशी से अपनाती हो- फिर वो माँ- पिता का दिन भर सामने न होना हो; बीच बीच में दूर जाना हो; स्कूल का माहौल हो; पास पडौस का वातावरण हो| पानी में जैसा गुण होता है- जिस पात्र में उसे डालते हैं, उसी का आकार वह धारण करता है; ठीक वैसी ही तुम हो!
तुम्हारी साथ अखण्ड रूप से साथ होती है- सभी मायनों में
“तू बिन बताए मुझे ले चल कहीं जहाँ
तू मुस्कुराए मेरी मन्जिल है वही"
ठीक इसी तरह से हम जो करते हैं; तुम्हे जो देते हैं; जो वातावरण देते है; जो परिस्थिति देती है; उसमें तुम उतनी ही खुश होती हो| इस दृष्टि से बच्चा यह पालकों का प्रतिबिम्ब होता है| पालक जो देते है; उन सभी चीज़ों का रिफ्लेक्शन उसमें आता है| इसलिए वास्तव में बच्चे को निर्मल- निष्पाप रखना हो, तो पालकों को भी खुद को उतना ही शुद्ध रखना आवश्यक होता है| क्यों कि बच्चे को सबसे ज्यादा मिलनेवाला वातावरण परिवार ही होता है| यहीं पर बच्चा जो सुनता है, वो सब आत्मसात करता है| इसलिए खुद निर्मल और शुद्ध रहना, यह वास्तव में पालकों की जिम्मेदारी है| यह आदर्श पालकत्व है| आदर्श शब्द का मूल अर्थ आईना होता है| आईना माने ऐसी चीज़ जो खुद का कोई भी हस्तक्षेप किए बिना निर्मल और पारदर्शी पानी जैसा शुद्ध माध्यम होता है| अगर पालक ऐसे प्रमाणिक और निर्मल होंगे; तो ही वे बच्चे को वैसे वातावरण दे सकेंगे|