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Tuesday, November 4, 2014

जन्नत को बचाना है: जम्मू कश्मीर राहत कार्य के अनुभव ३


राहत कार्य का आंकलन

६ अक्तूबर की सुबह! श्रीनगर में सुखद ठण्ड है| आज श्रीनगर में ईद का जश्न होगा और यहाँ सेवा भारती के सभी कार्यकर्ता अपने घर में ईद का जश्न मनाएँगे| एक तरह से यह उनके लिए छुट्टी का दिन है| हालांकी वे दोपहर सेवा भारती के दफ्तर आएँगे और काम में जुटेंगे| पर दोपहर तक उनकी व्यस्तता के कारण आज गाँवों में चिकित्सा शिविर नही होंगे| देशभर से आए डॉक्टर भी एक तरह से आज थोडा विश्राम करेंगे और दवाईयाँ लगाने में जुटेंगे| आज मुझे एक तो सब कार्य को समझना है; सभी से परिचय आगे बढाना है और रिपोर्ट बनाना है| रिपोर्ट के मुख्य बिन्दु दादाजी ने बता दिए हैं| अब उसे मुझे लिखना है| इसके लिए संस्था के लॅपटॉप पर कुछ दैनिक रिपोर्ट, फोटोज, व्हिडिओज आदि जानकारी है|

सवेरे से ही पास में अजान की गूँज सुनाई दे रही है| पास ही कहीं मस्जिद है| यह ध्वनि एक तरह से वातावरण को जिन्दा बना रही है| कल रात दो कमरों में करीब पच्चीस कार्यकर्ता लोग ठहरे थे| अपने अपने समयानुसार वे तैयार हुए| जिनके पास खाना परोसने का हुनर है, वे चाय- नाश्ता बना रहे हैं| अब धीरे धीरे एक एक से परिचय हो रहा है| अभी तक के राहत कार्य का जाएजा लेते लेते बातचीत हो रही है|

सुबह दादाजी से बात हुई तो उन्होने कुछ अटपटी बात कही| कुछ बातें‌ साफ कर दी| उन्होने कहा, 'वास्तव में रिलिफ वर्क कुछ किया नही जा सकता| आप कैसे कुछ करोगे जब इतनी बड़ी तबाही होती है? पानी सब कुछ ले गया| इसे हम कैसे भर सकते हैं? हाँ हम हमसे जितनी सहायता हो, जितना दर्द बाँटा जा सकता हो, उतना हम अवश्य कर रहे हैं|' बात अटपटी लगी| यहाँ आने तक मन में यही धारणा थी कि रिलिफ के विभिन्न पहलूओं पर काम करना होगा- जैसे पहाड़ पर दूर दराज के गाँवों में जाना, राशन बाँटना, तात्कालिक शेल्टर्स के लिए सहायता करना, टर्पोलिन (तिरपाल) देना, सरकारी लोगों के साथ लोगों की आवश्यकताओं के बारे में पैरवी करना, गाँव- गाँव जा कर नुकसान का आंकलन करना, राहत सामग्री की आवश्यकता जान कर उसे भेजनेवाले लोगों तक उसे पहुँचाना, मिलिटरी के साथ टेंटस बनाना, कूड़ा साफ करना आदि| पर यहाँ कुछ अलग दिखाई पड़ रहा है| दादाजी ने दो टूक कहा- 'जिस अर्थ में तुम समझते हो, उस अर्थ में हम रिलिफ काम नही कर रहे हैं| हम हमारे तरिके से जो सम्भव हो रहा है, वह कर रहे हैं| और नुकसान इतना ज्यादा है| अगर कुछ राहत सामग्री बाँटनी चाहें तो भी नही बाँट सकेंगे| क्योंकि अगर एक गाँव में ३०० परिवारों को हानी हुई है, तो सिर्फ १०० कँबल बाँटने से नही चलेगा| इसलिए हम ज्यादा ध्यान चिकित्सा शिविरों पर दे रहे हैं| कुछ सामग्री जरूर बाँट रहे हैं; पर वह सामग्री लोगों द्वारा पहले ही भेजी हुई है|'

सेवा भारती के राहत कार्य के फोटो देखने से साफ पता चल रहा है कि वे लोग पहले दिन से सक्रिय है| जब नैकपूरा के पास- श्रीनगर से करीब बीस किलोमीटर दूरी पर- जेलम नदी का बाँध टूटा, तब याने ७ सितम्बर को श्रीनगर में सैलाब के पानी ने ताण्डव शुरू किया| तब पूरा शहर जलमग्न हुआ| सेवा भारती के कार्यकर्ता पहले ही दिन से सक्रिय थे| जितना उस समय किया जा सकता था किया गया| आस- पास के कुछ लोग करीब पन्द्रह दिन तक संस्था के दफ्तर की दुसरी मंजिल पर महफूज रूके| जहाँ तक कार्यकर्ता लोग जा सकते थे, वहाँ गए और उपलब्ध राशन बाँटा| जब सेवा भारती दफ्तर का दरवाजा टूटा, तो उसकी नाव बनायी गई और उससे जलमग्न इलाकों में सेवा भारती कार्यकर्ता जाते रहें| जहाँ नाव नही थी, वहाँ पर भी कार्यकर्ताओं ने पानी में जा कर मदद की और लोगों को कन्धों पर उठा कर सुरक्षित स्थान पर भी ले आए| कश्मीर में तीन हजार से अधिक लोगों को सेवा भारती कार्यकर्ताओं ने रिस्क्यू किया| आपदा के पहले चरण में जम्मू क्षेत्र में भी भीषण स्थिति थी| तवी के ताण्डव में संस्था ने जम्मू बस अड्डे पर लंगर लगाया| फंसे हुए लोगों की जानकारी देने के लिए हेल्पलाईन चालू की| श्रीनगर शहर में कई स्थानों पर क्लोरीन का स्प्रे भी किया गया है| बाद पानी कम होने पर चिकित्सा शिविर भी शुरू हुए| अब तक (६ अक्तूबर तक) सौ से अधिक शिविरों द्वारा पन्द्रह हजार से अधिक रुग्णों पर इलाज किया जा चुका है| अब भी सबसे अधिक जोर चिकित्सा शिविरों पर ही है| आपदा हो कर आज एक माह पूरा हो रहा है| अभी तक कोई इपिडेमिक नही आया| उसे टालने में सेवा भारती के डॉक्टरों की भी भुमिका है|

सेवा भारती दफ्तर में रह कर पीछले एक साल से कार्यरत महाराष्ट्र के एक कार्यकर्ता- मयूर पाटील ने बाढ़ के कहर को बयाँ किया- "६ सितम्बर से हम लोग फंसे थे| सेवा भारती दफ्तर की पहली मंजिल पूरी पानी में गई| हमारे साथ दो पडौसी परिवार भी बच्चों साथ आ कर रूके| संयोग से संस्था के दफ्तर में सिलिंडर और चांवल था| उससे गुजारा हो सका| हम पानी गर्म कर पीते थे| हमारे कार्यकर्ता इस सामने दिख रही गली में नाव से जा रहे थे| एक दिन मिलिटरीवाले भी आए; हमने उनसे सिर्फ पानी लिया| हमारा दुनिया से सम्पर्क कट गया था| बिजली नही थी, मोबाईल भी बन्द थे| चालू भी होते तो भी फर्क न पड़ता| पहली मंजिल पानी के नीचे जाने से इतने बुरे हाल थे कि पूछो मत| उपर के टॉयलेट में भी पूरा पानी फैला था| हमने जैसे तैसे वे दिन निकाले| कुछ लोग तो हिंमत खोने लगे थे| रात को भी नीन्द ग़ायब होने लगी| पडोस में रेंट से रहनेवाले अंकल ने हमारा हौसला बढाया| उनके साथ हम खाना बनाते थे| १८ तारीख को पानी कम होने के बाद मै नीचे जा सका| तब घरवालों से बात हुई|” यह नौजवान परिवार में इकलौता लड़का होने पर भी पीछले एक साल से अधिक समय से यहीं कार्यकर्ता का काम कर रहा है| और सभी तरह के काम कर रहा है| दफ्तर की देखभाल, पानी भरना, चाय- भोजन बनाना (और वो भी बीस- पच्चीस लोगों के लिए!), दफ्तर में रिलिफ काम का समन्वयन देखना, दवाईयाँ ठीक लगाने में डॉक्टरों की सहायता करना आदि. . .

ऐसे और भी कार्यकर्ता यहाँ हैं| कोई दस दिन के लिए आए हैं; कोई पन्द्रह दिनों से आए हुए हैं| इन्दौर की विदुषी दिदी भी ऐसी ही एक दबंग कार्यकर्ता है| अकेले के बलबूते पर इन्दौर से सीधी चलीं आयी| उन्होने सेवा भारती के बारे में आने पर ही जाना| अब वे यहाँ रिलिफ कार्य का पूरा अकाउंटस देख रही हैं| और ऐसा देख रही है की घण्टों तक बिना हिले काम कर रही है|

जैसे दिन बढता गया, कार्यकर्ताओं से और बातें हुई| रिपोर्ट लेखन भी चल रहा है| दादाजी ने और अटपटी बात कही- 'तुम्हारा रिपोर्टिंग और डॉक्युमेंटेशन का काम यहाँ नही चलेगा| तुम्हारी तकनीक यहाँ नही काम आएगी| यहाँ तुम्हे हमारे तरिके से काम लेना होगा|' फिर उन्होने समझाया कि रिपोर्ट लिखना हो तो वह बिलकुल रुखा और मात्र जानकारी सरिखा नही होना चाहिए| उसे जीवन्त होना चाहिए और धरातल पर चल रहे सभी कार्य उसमें रिफ्लेक्ट होने चाहिए| वैसे तो उपलब्ध जानकारी के आधार पर रिपोर्ट लिखना दो घण्टों का काम है; पर वह यांत्रिक होगा| उसमें इस काम की गहराई नही आएगी| इसलिए दादाजी लगातार रिपोर्ट में बदलाव बताते रहें और काम जारी रहा|

यह उनकी एक खास शैलि भी है| जो कोई उनके पास आता है, उसे वे पहले एकदम अटपटे तरिके से बात करते हैं| किसी को कहते है कि तू बिलकुल बेवकूफ है! कई लोग उनपर क्रोध भी करते हैं| लेकिन दादाजी कहते हैं कि यह उनका एक तरिका है लोगों को चुनने का और तराशने का| जो लोग शुरू में एक तरह की उपर से निगेटिव्ह दिखनेवाली बात सुन कर और उसका सामना करने पर भी दादाजी के पास ही रहते हैं, वे अच्छा काम करते हैं, ऐसा दादाजी का मानना है| एक तरह से यह आनेवालों लोगों के इण्डक्शन का एक छोटासा एक्सरसाईझ है! दादाजी के बात करने का तरिका अनुठा है| बंगाली लहेजे की हिन्दी (ऑनुभव, इसके ऑनुसार कॉरना आदि प्रयोग) और थोड़ी पंजाबी मिर्च! उनकी आयु युवा कार्यकर्ताओं से लगभग तीन गुना अधिक है| उनका तजुर्बा बहुत बड़ा है| फिर भी वे दोस्त- भाई जैसे बात करते हैं| तिखी नोंक झोक होती है| बड़ी मिठी बहस भी करते हैं| दोस्त जैसे झगड़ते भी हैं| लेकिन यह करते करते पूरे कार्य का समायोजन करते हैं| इसके ही कारण यदि किसी पर वे कभी कठोर शब्द का भी प्रयोग करते हैं, तो भी कोई आहत नही होता है|

दिन भर यही क्रम जारी रहा| कुछ कार्यकर्ताओं के साथ मिल कर रिपोर्ट लिखता गया| फोटो चुनने का काम जारी रहा| दोपहर में स्थानीय कार्यकर्ता ईद का जश्न मना कर दफ्तर आ गए| कईयों ने मिठाईयाँ खिलाई और ईद मुबारकबात भी दी| गले मिले| शाम को एक कार्यकर्ता ने व्हिडिओ रिपोर्ट बनाने हेतु स्थानीय कार्यकर्ताओं के साक्षात्कार लिए| उसमें भी कुछ बातें पता चली| कश्मीरी बोली सुनना भी अनुठा अनुभव है! अभी कुछ परिचय के बावजूद स्थानीय कार्यकर्ता आँखे मिला कर बात नही कर रहे हैं|

रात को भोजन के लिए रेसिडन्सी रोड पर स्थित आश्रम गए| रात के अन्धेरे में श्रीनगर में पैदल जाते हुए जेलम नदी (स्थानिक भाषा में दरिया ए जैलम) दिखी| कुछ सडकों के फूटपाथ पर कूड़ा और स्लरी जैसा मलबा पड़ा हुआ है| अन्दर की सड़कों पर बाढ़ के निशाँ दिख रहे हैं| अर्थात् उपर से देखनेवाले को लगेगा कि श्रीनगर में तो आम हालात शुरू हो रहे हैं| रात के अन्धेरे में भी शंकराचार्य मंदीर चमक उठा है| आते समय पता चला कि आज ईद का जश्न होने के कारण कुछ लोगों ने जूलूस निकाला था| यहाँ श्रीनगर में जूलूस, नारेबाज़ी और रॅलियाँ रोज की बात है| सुनने में आया कि लोगों ने पाकिस्तान का झण्डा फहराया और फिर सुरक्षा बलों ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया| लाठी चार्ज भी किया| हाल ही में श्रीनगर में इसिस का भी झण्डा फहराया गया है| स्थानीय लोगों के अनुसार ऐसे समाचार यहाँ आम बात है|

देखा जाए तो आज के दिन में कुछ खास नही हुआ| लेकिन कई कार्यकर्ताओं से मिलना हुआ| उनके अनुभव सुनें| कुछ लोगों से दोस्ती भी हुई|‌ कई बार आप ऐसे लोगों से मिलते हैं जिनसे मिलते ही एक तो दूरी का अनुभव होता है या फिर यदा कदा दोस्ती का भी अनुभव होता है| देश भर से आए हुए युवा कार्यकर्ता निश्चित रूप से महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं| “बूँद बूँद मिलने से बनता एक दरिया है!"

मुझे आगे का काम भी बताया गया है| अब तक के राहत कार्य का एक रिपोर्ट और पाम्पलेट बनाना है| उसके लिए दादाजी मुझे उनके साथ जम्मू आने को कह रहें हैं| वहाँ एक मीटिंग भी है| कुछ दिन जम्मू जाना होगा| उसके बात फिर आगे का काम तय होगा| रिलिफ वर्क में यही होता है- Everything can happen and anything also can happen. मन में अब भी कुछ प्रश्न है| देखते हैं क्या होता है| आज रात जल्दी सोना होगा क्यों कि कल सवेरे तीन बजे श्रीनगर से निकलना है| क्यों कि जम्मू में शाम को मीटिंग अटेंड करनी है| और बनिहालवाला रोड अब भी जाम है| इसलिए मुघल रोड से ही जाना होगा. . . 

रोगों की रोकथाम हेतु स्प्रे फोटो- https://www.facebook.com/sewabhartijk



























पुलवामा में टुटा हुआ एक आशियाँ फोटो- https://www.facebook.com/sewabhartijk


























बडगाम जिले के एक गाँव में शिविर फोटो- https://www.facebook.com/sewabhartijk

























व्हिडिओज-
जावेद भाई द्वारा राहत कार्य की जानकारी
फयाज भाई का निवेदन

क्रमश: 
जन्नत बचाने के लिए अब भी सहायता की आवश्यकता है. . .  सहायता हेतु सम्पर्क सूत्र:
SEWA BHARTI J&K
Vishnu Sewa Kunj, Ved Mandir Complex, Ambphalla Jammu, J&K.
www.sewabhartijammu.com 
Phone:  0191 2570750, 2547000
e-mail: sewabhartijammu@gmail.com, jaidevjammu@gmail.com
 

Friday, October 31, 2014

जन्नत को बचाना है: जम्मू कश्मीर राहत कार्य के अनुभव २


राहत कार्य सहभाग की पहली शाम

५ अक्तूबर की‌ शाम! श्रीनगर पहुँचने पर सेवा भारती का कार्यालय देखा| यह एक रिटायर्ड पुलिस अफसर का मकान है जिसे संस्था ने किराए पर लिया है| दो मंजिला घर है| बताया गया कि पहली मंजिल पूर्ण रूपेण जलमग्न हुई थी| अब भी एक- दो स्थानों पर फर्श पर किचड़ दिख रहा है| यहाँ ७ सितम्बर से १८ सितम्बर तक पानी भरा था| फिर वो धीरे धीरे कम होता गया| अब निचले कमरों में मेडिसिन्स, राशन, खाने के पॅकेटस और अन्य राहत सामग्री रखी हुई है| कुछ कमरों में कार्यकर्ता भी ठहरे हैं| घर में उपर जानेवाली सिढी की लकड़ी भी पानी के निशान बयाँ कर रही है| उपर के कमरों में ज्यादा कार्यकर्ता ठहरे हैं| दफ्तर उपर ही है| करीब पच्चीस कार्यकर्ता तो यहाँ होने चाहिए|

सेवा भारती का राहत कार्य देखनेवाले बुजुर्ग कार्यकर्ता ने पहुँचते ही स्वागत किया| वास्तविक नाम अलग है, पर उन्हे यहाँ सभी लोग दादाजी नाम से ही बुला रहे हैं| वे वैसे तो हैं बंगाल के; पर दस वर्षों से कश्मीर में ही रहते हैं और बंगाली लहेजे की हिन्दी तथा ठेठ पंजाबी बोलते हैं| आने से पूर्व उन्हे फोन पर पूछा था कि किस प्रकार कार्य करना है बताईए सो तैयारी कर के आ सकूँ| तब उन्होने कहा था, बीरे! बस तुम अपना तन, मन और बुद्धी के साथ आना! अब धीरे धीरे यहाँ क्या किया जा रहा है और मुझे क्या करना है यह पता चलेगा| दादाजी ने बताया की, एक मीटिंग होने जा रही है जिसका मुझे रिपोर्ट लिखना है| श्रीनगर में ही प्रसिद्ध लाल चौक के पास रेसिडन्सी रोड पर एक पुराना आश्रम है| वहाँ सेवा भारती के कई डॉक्टर और कार्यकर्ता ठहरे हैं और कुछ दिनों से वहाँ हर रोज एक चिकित्सा शिविर भी होता है| वहीं पर आज रात सभी डॉक्टरों की एक मीटिंग है जिसमें वे अपने अनुभव शेअर करेंगे| उसमें सभी से परिचय भी हो जाएगा|

जैसे ही उन कार्यकर्ताओं से मिलना हुआ, मानो साठ घण्टों की यात्रा शरीर भूल ही गया| एकदम से ताज़गी महसूस हुई| मीटिंग में बातचीत भी काफी गर्म रही| देश के कई राज्यों से आए डॉक्टर्स और कार्यकर्ताओं ने अपने अनुभव सामने रखें| अभी तक कश्मीर के बाढ प्रभावित सभी जिलों में चिकित्सा शिविर हुए हैं- कुपवाडा, गांदरबल, बांदीपोरा, पुलवामा, श्रीनगर, अनंतनाग, बड़गाम आदि| यहाँ सेवा भारती के स्थानीय कार्यकर्ता साथ में होते हैं जो एकल विद्यालय प्रकल्प में अध्यापक, क्षेत्र प्रमुख जैसे तौर पर कार्य करते हैं| एकल विद्यालय देशभर में दूर- दराज के इलाकों में एक अध्यापक का विद्यालय चलानेवाला बड़ा अभियान है| इसी को ले कर सेवा भारती धरातल तक पहुँची है| इतना ही नही, जब सैलाब आया, तब आर्ट ऑफ लिव्हिंग और बाबा रामदेव की संस्था ने भी सेवा भारती के कार्यकर्ताओं को राहत के लिए एक तरह से खरीदने की कोशिश की थी| इन कार्यकर्ताओं को बड़े 'ऑफर' दिए गए और पैसे भी दिए गए| क्यों कि यहाँ धरातल पर काम करनेवाले ऐसे कार्यकर्ता कम ही होंगे| पर वे सेवा भारती के साथ ही रहें| ऐसे दो स्थानीय कार्यकर्ता और दो या अधिक डॉक्टर एक एक गाँव में जा कर शिविर लेते हैं|

चर्चा में डॉक्टर और व्हॉलंटिअर्स के कई समूह किए गए हैं| हर एक समूह का व्यक्ति आ कर बात कह रहा है| अधिक डॉक्टरों ने लोगों की मेहमान नवाज़ी के बारे में बताया और कहा कि चिकित्सा शिविरों के बारे में लोग काफी सन्तुष्ट थे| कुछ गाँवों में शिविर देर रात तक चलने के कारण उन्हे रूकना भी पड़ा| उसके लिए कार्यकर्ता और स्थानीय लोग काफी उत्साहित थे| कहीं कहीं बाढ़ से क्षतिग्रस्त हुए मकानों में लोग एक ही कमरे में रह रहे थे| फिर भी उन्होने इन डॉक्टरों की अच्छी ख़िदमद की| कुछ डॉक्टरों के कहने में आया कि लोग शिविर समाप्त होने के बाद भी आ रहे थे| लगातार दवाईयाँ मांग रहे थे और कुछ जगहों पर तो अगले दिन जाते जाते भी लोग दवाईयाँ मांग रहे थे|

कुछ शिविर चरमपंथियों के इलाकों में हुए ऐसा बताया गया| 'इंडियन डॉग्ज गो बॅक' का बोर्ड भी एक डॉक्टर ने देखा| कई डॉक्टरों ने यह भी बताया की, रात में जब वे घरों में ठहरे थे, तब तिखी बातें भी सुनने को मिली| एक- दो मामलों में डॉक्टरों को भारत सरकार के बारे में बहोत कुछ सुनना पड़ा जिस पर वे मौन रहें| एक डॉक्टर असम के थे, उन्होने बताया की जब लोग भारत सरकार की शिकायत कर रहे थे, तब वे बोलने के लिए बाध्य हुए और उन्होने लोगों को बताया की, असम में भी काफी बाढ़ हुई है और वहाँ केंद्र सरकार ने पांच हजार करोड़ सहायता की घोषणा की जब की कश्मीर को तब तक इक्किस हजार करोड़ की राशि घोषित हुई थी| ऐसे इक्का- दुक्का मामलें बताए गए| एक ने तो यह भी बताया कि जब उसने राहत कार्य के लिए कश्मीर आने का फैसला किया तो घरवालों ने इस 'पागलपन' के लिए उसे धिक्कारा| एक ने तो अपना बीमा परिवारवालों को सौंपा| 'एक ना एक दिन मौत आएगी ही, वही मौत कश्मीर में लोगों को सहायता करते समय आती है तो क्या हर्ज,' यह भी किसी ने सोचा था!

चर्चा के अन्त में दादाजी ने सबका हौसला बढाया| कुछ डॉक्टरों को आए अप्रत्याशित अनुभवों के बारे में उन्होने समझाया कि देखिए, हर घर- हर परिवार में ऐसा व्यक्ति जरूर होता है जो सबसे अलग होता है| हर जगह पर एकाध तो बिगड़ा बच्चा होता ही है जो नशा करता है; झगडा करता है| वैसे ही यहाँ पर भी कुछ लोग हैं| उन्होने समझाया कि जैसे माँ अपने बिगड़े बच्चे पर भी उतना ही वरन् अधिक प्रेम करती है, वैसे ही ऐसी सोच के बारे में हमारे विचार होने चाहिए| उन्होने जोर दे कर यह भी कहा कि इक्का दुक्का लोगों की वजह से हमें सभी लोगों के बारे में राय नही बनानी चाहिए| दादाजी ने यह भी बताया कि कुछ शिविर तो आतंकवादियों के गढ़ में भी हुए| एक शिविर पुलवामा जिले में होना था, वो एक दिन बाद करना पड़ा क्योंकी उसी गाँव में एनकाउंटर हुआ था| दादाजी ने बताया की जैसी झारखण्ड में, महाराष्ट्र में और अन्य राज्यों में भी गोली चलती है, वैसी यहीं पर भी चलती है! उसकी इतनी फिकर नही करनी चाहिए| दादाजी ने कहा यहाँ हमें किसी को कुछ समझाना नही है; वरन् लोगों को समझना है!

एक डॉक्टर ने एक सीक्ख परिवार के बारे में बताया जो कि उस गाँव का एकमात्र सीक्ख परिवार था| उनके बाकी परिवार वहाँ से बाहर निकले; पर वे अब भी वहीं डटे हैं| चर्चा के अन्त में एक साथी को रहा न गया और उन्होने आंसूभरे आँखों से बताया कि अरसे के बाद पहली बार वे अपने गाँव के काफी करीब गए| वे कश्मिरी हिन्दु थे और वादी से कश्मिरी हिन्दुओं के निकलने के बाद पहली बार अपने गाँव के करीब गए| यहाँ श्रीनगर में भी वे बिना डर के घूम रहे हैं; जो कि पहले नही होता था| उन्होने विश्वास जताया कि इस प्रकार बाढ़ के कारण पूरे देश से डॉक्टर और कार्यकर्ता आए हैं तो और भी बहुत परिवर्तन क्यो नही हो सकता है!

देर रात वह मीटिंग समाप्त हुई और काफी लोगों से परिचय हुआ| यहाँ देश के लगभग हर हिस्से से लोग आए हैं| दो डॉक्टर चेन्नै से आए हैं| उन्हे तो सेवा भारती के बारे में कुछ भी पता नही था| बस, बाढ़ में फंसे लोगों को मदद करना है यह ठान कर वे श्रीनगर पहुँचे| सेवा भारती के बारे में उनको टॅक्सीवाले ने ही बताया! इसी प्रकार कई लोग पहली बार सेवा भारती से जुड़े है| लेकिन अब सब साथ है| गुजरात से भी कई सिनिअर डॉक्टर और इंटर्नशिप करनेवाले डॉक्टर आए है| नॅशनल मेडिको ऑर्गनायजेशन अर्थात् एनएमओ ने भी काफी डॉक्टरों को भेजा है|

अब कार्य के बारे में काफी कुछ पता चला है| लेकिन इसके साथ मन में कुछ सवाल भी है| अधिकांश डॉक्टरों ने बताया कि शिविरों का लोगों को अच्छा लाभ हुआ| पर थोड़े ही डॉक्टरों ने वाकई लोगों की आवश्यकता क्या थी इसके बारे में कुछ कहा| मन में प्रश्न आया कि कहीं ऐसा तो नही कि लोगों की जरूरत और कुछ हो| मन में बार बार इस राहत कार्य की तुलना पीछले साल उत्तराखण्ड की बाढ में किए गए राहत कार्य से हो रही है| उस समय परिस्थितियाँ और चुनौतियाँ बिलकुल अलग थी| वहाँ तब रास्ते टूटे थे; कनेक्टिव्हिटी सबसे अहम मुद्दा था| नदी के बगल में से और दुर्गम पहाड़ी राहों से जैसे तैसे पार होना पड़ता था| यहाँ तो कनेक्टिव्हिटी पूरी है; सड़कें अच्छी स्थिति में है| यह भी सुनने में आया कि सभी जगह कार्यकर्ता वाहन से ही जा रहे हैं; कहीं पर दूर तक पैदल चलने की स्थिति नही है| और एक बात भी जेहन में आयी कि उस समय राहत कार्य जिसके साथ किया था, वह पुणे की मैत्री संस्था थी जो कि राहत कार्य में एक तरह से स्पेशलाईज्ड है और यहाँ सेवा भारती शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका आदि मुद्दों पर काम करनेवाली संस्था है| अत: पीछले साल के कार्य में और इसमें कुछ भेद तो अवश्य होगा...

जो कुछ भी हो, अब सबके साथ मिल कर काम करना है| कुछ साथी रात को आश्रम में ही ठहर गए और दादाजी एवं अन्य साथियों के साथ मै फिर से मगरमल बाग़ स्थित सेवा भारती कार्यालय में गया| रात को लुभावनी ठण्ड है और आसमाँ साफ है; कई परिचित सितारे रात की रौनक बनाए हुए हैं. . . कल सवेरे नीचे से पानी भरना है| अब भी पानी और बिजली की थोड़ी किल्लत है|

राहत कार्य में जुटे डॉक्टर्स, कार्यकर्ता और कई मान्यवर


























गांदरबाल में खीर भवानी आर्मी कँपस में शिविर| फोटो- https://www.facebook.com/sewabhartijk
एक शिविर का दृश्य फोटो- https://www.facebook.com/sewabhartijk


















































जन्नत बचाने के लिए अब भी सहायता की आवश्यकता है. . . 
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e-mail: sewabhartijammu@gmail.com, jaidevjammu@gmail.com 

क्रमश: