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Friday, July 19, 2013

Tour de Godavari!

कहते है जीवन यह एक निरंतर चलनेवाली यात्रा है। पडाव कई हो; यात्रा निरंतर चलती है। कई बार हम पडावों को मंजिल भी समझ लेते है। परन्तु सच्चाई यही है कि जीवन की यात्रा हमेशा निरंतर चलती है।

जीवन में हम कई तरह के रास्तों से गुजरते हैं। रास्ते में कुछ यात्रीयों से मुलाकात होती है। ऐसे ही एक अपूर्व यात्री है श्री. नीरज जी जाट। खुद को ‘घूमक्कड’ कहलाने वाले नीरज जी वास्तव में ‘मॅन वर्सेस वाईल्ड’ की भारतीय आवृत्ति हैं! उन्होंने अब तक देश के लगभर हर राज्य में अनगिनत बार घूमक्कडी की है। हिमालय (उत्तराखण्ड, हिमाचल तथा जम्मु- कश्मीर- लदाख) में सैकडों बार दुर्गम क्षेत्रों में घूमक्कडी की है। वे है ही मुसाफीर। लेकिन मुसाफिर कितनी अद्भूत ऊँचाई के! हाल ही में उन्होने साईकिल से मनाली- लेह और लेह- श्रीनगर महायात्रा की। उनकी अद्भुत तथा अविश्वसनीय दास्तां यहाँ पढी़ जा सकती है। उनसे कुछ अलग तरिके से जीने की प्रेरणा मिलती है। वे हर संवेदनशील इन्सान को आवाहन करते हैं और आह्वान भी देते हैं।



  
                                                                                                                                                         
उनकी साईकिल यात्रा देख रहा नही गया और एक दिन साईकिल ले आया। पहाड का शौक तो है हि। पहाड जा कर आया हुँ और जाने की इच्छा है हि। पेट्रोल के दाम तो पहाड से भी अधिक ऊँचाईयों को छू रहे है। इस स्थिति में साईकिल एक सशक्त विकल्प के रूप में सामने आती है। साईकिल कई मायनों में उपयोगी है। एक तो इन्धन खर्चे की बचत। यह एक अच्छा व्यायाम भी है। तथा इससे हमारे जीवन का नियंत्रण करनेवाली तथाकथित आधुनिक जीवनशैली की बेहुदा रफ्तार को भी नियंत्रण में लाया जा सकता है। मंजिल से अधिक रोमांच सफर में आता है। तो फिर काहे को भेडचाल की तरह किसी छोटे मोटे लाभ की ओर दौडना? चलिए, एक साईकिल उठाते है और शुरू करते है यात्रा।

दस साल से साईकिल जीवन से बाहर हुईं थी। अर्थात् फिर से एक नयी पहल करनी पडी। धीरे धीरे शरीर साईकिल से जुडता गया। थोडे अभ्यास के पश्चात् एक दिन में पच्चीस किलोमीटर चलाई। हौसला बढा। फिर एक दिन चालिस किमी दूरी पूरी की। आते समय पैर भारी जरूर हो गए थे। पर हौसला और बढा।

अब बारी है टूर द गोदावरी की! अर्थात् घर से करीब ३२.५ किमी दूर गोदावरी के तट की सैर- परभणी (मध्य महाराष्ट्र) से गंगाखेड इस तहसील से आठ किलोमीटर पहले तक। जाने और आने के बाद कुल दूरी है ६५ किमी। साईकिलयात्रियों के लिए चुनौतिपूर्ण बिल्कुल भी नही है। पर नौसिखिए के लिए निश्चित एक हौसला देनेवाली यात्रा है। तो शुरू हुआ यह सफर।

हमारे लोगों की सोच अभी भी काफी स्थितिशील है। कितना भी कुछ कहिए, अभी कुछ भी उतना बदला नही है। सब कुछ वैसा ही है। रास्ते पर साईकिल और वह भी गिअर की साईकिल देख कर बच्चे चिल्लाते है, ‘वो देखो, गिअर वाली साईकिल!’ कुछ बच्चे तो साईकिल उठाते है और चक्कर लगाते है। शहर से जितने दूर जाओ, लोगों का अचरज बढता है। उन्हे कुछ अटपटा सा लगता है। इतनी दूर (हालांकि दूरी मात्र दस- बीस किलोमीटर ही हो) साईकिल पर? और उनके कौतूहल का जवाब भी उन्हें मिल जाता है- जरूर गिअर वाली होने के कारण यह खूब दौडती होगी। कुछ लोग तो नई चीज दिखने से कुछ ज्यादा ही उत्साहित होते हैं। एक ग्रामीण ने तो कहा, यह तो मोटरसाईकिल जैसी दौडती होगी। नई चीज दिखाई देने पर ऐसी प्रतिक्रिया! शायद वे अपनी सारी निराशाएँ, अपने सारे तनाव जैसे उसके सहारे व्यक्त करते है। उनको बडी बेसब्री से ऐसी चीज की तलाश है जो उन्हे सहारा देगी। इसलिए एक छोटी सी; पर नई चीज दिखाई पडने पर उनकी प्रतिक्रियाएँ उस चीज के बारे में कम और उनकी सोच के बारे में ज्यादा बताती है। खैर।

यात्रा सुबह साढेसात बजे शुरू की। पहले पाँच किलोमीटर काफी संघर्षपूर्ण थे। ऐसा लगा की आगे जाया ही नही जा सकेगा। एक धाबे पर रूक कर कॉफी पी। धाबा भी ऐसा जिसमें सिर्फ कॉफी थी। कुछ देर विश्राम किया। फिर निकला। धीरे धीरे चलता गया। और अब चलना आसान भी लगने लगा। शायद सुबह नीन्द से उठा और निकला; तो शरीर इतना ढिला नही था। जाहिर है, रात भर की नीन्द में शरीर थोडा सख्त हो जाता है। इसलिए शुरू में शरीर ने विरोध जताया। लेकिन अब पाँच किलोमीटर के बाद शरीर भी ढल गया है। अब वह मना नही कर रहा। बस चलना है। और आगे जाना है। जीपीएस से गति देखी; तो करीब पन्द्रह- सोलह किमी प्रति घण्टा थी। ठीक थी।

रास्ता तो सीधा है। कोई बडी चढाई या पहाड़ नही हैं। पर बीच बीच में आनेवाली छोटी चढाई भी दिक्कत खडी करती है। वहाँ जाना कठिन लगता है। पर यह भी जेहन में होता है कि इस चढाई के बाद ढलान आनेवाली है। उसके बारे में सोचते हुए और इधर उधर देखते हुए चढाई निकल जाती है और फिर ढलान! इस तरह से एक बार शरीर साईकलिंग के टेम्पो में आ जाता है। फिर क्या कठिनाई? बस चलते रहो। चढाई के बाद ढलान भी आएगी ही! लोगों की मुस्कान ऊर्जा से भर देती है।

  
थोडी देर में नाश्ते के लिए रूका। नाश्ते में कुछ वक्त था। और अधिक विश्राम हो गया। पैरों को आरामदायक स्थिति में छोड दिया। होटल छोटा सा ही था। और जाहिर है वहां थोडा कूडा था, गन्दगी भी थी। ऐसे समय होटल में आए दूसरे एक ग्राहक की रिंगटोन पर म्युझिक और फिर गाना बजा, ‘होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है....’ और जगजीत जी के इन स्वरों से उस स्थिति में भी एक अद्भुत माहौल बन गया! एकदम से स्थानांतरण ही हो गया। रिंग टोन तो आरम्भिक संगीत के साथ ही बन्द हुईं, पर स्मृति के आधार पर पूरे गाने का लुफ्त उठाया। और फिर दूसरे गाने मन ही मन सुने।

सूखे के बाद वर्षा से आई हुई कुदरती ताज़गी.....


वर्षा से पूरे खेत में पानी भर गया है..... उपरवाला भी देता है तो छप्पर फाड के!



































                    

 




                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                              
...अब करीब करीब आधी दूरी पार हो गई थी। हालांकि रफ्तार बहुत ज्यादा नही थी, फिर भी कोई दिक्कत की बात नही थी। एक गॅरेज पर साईकिल हवा से रिचार्ज की। देखा तो साईकिल के टायर का नॉब बिलकुल मोटरसाईकिल जैसा है। बच्चों को और उत्तेजना का कारण बन गया! गॅरेजवाले ने हवा भरने के पैसे भी नही माँगे और न ही देने का ख्याल मुझे रहा। अरसा हो गया था साईकिल में हवा भर कर।

धीरे धीरे चढाई- उतराई करते करते गोदावरी नदी का तट सामने आ ही गया। खुशी की लहर दौडी। करीब बत्तीस किलोमीटर पूरे किए। वहाँ फिर कुछ देर विश्राम। नदी में राख से सोना निकालनेवाले लोगों से बातचीत की। वे भी दंग रह गए बत्तीस किलोमीटर साईकिल से आए हुए को देख कर। नदी के कुछ फोटो लिए। पैर फैला कर उन्हे नियंत्रण से मुक्त किया। 



बारीश के पानी से ब्ढा हुआ जलस्तर



























साईकिल बाईक से कम नही है!





                                                                                                                                                     
वापस जाते समय कुछ खास दिक्कत नही हुईं। थकान के कारण गति जरूर कम हुईं थी। पर पीछली बार लौटते समय आखरी दस किलोमीटर का पडाव टेढी खीर था। उस वक्त पैरों ने और शरीर ने बिलकुल असहकार आन्दोलन किया था। इस बार शायद पैर भी थोडे आदि हो गए थे। थोडे अभ्यस्त हो गए थे। इसलिए वे चलते रहें। अब चला ही नही जा रहा, ऐसी स्थिति नही आईं। छोटे छोटे विश्राम करने जरूर पडें। पर रास्ता गुजरता गया। कुदरत ने बेहतर साथ निभाया। एक बूँद भी वर्षा नही हुईं। धीरे धीरे घर तक का रास्ता पार किया गया। कुल दूरी ६५ किलोमीट की लगभग सवा पाँच घण्टों में पार हो गई। उत्साह और बढा। 

....यह साईकिल चलाने का अनुभव टेस्ट क्रिकेट के बल्लेबाजी के जैसे था। टेस्ट क्रिकेट में बल्लेबाजी करते समय आपको नयी गेन्द का सामना करना पडता है। करीब एक घण्टे तक नयी गेन्द से बचना पडता है। उस समय हालात बल्लेबाजों को अनुकूल नही होते हैं। लेकिन अगर यह वक्त सुरक्षित बिता ले, तो फिर धीरे धीरे हालात अनुकूल हो जाते है। आपका शरीर भी लय में आ जाता है। ऐसा ही अनुभव यहाँ आया। अर्थात् बाद में थकान के और फिर नयी ऊर्जा के पडाव भी आते हैं। गति भी कम होती है। पर आप यात्रा पूर्ण कर सकते हैं। एक दूसरी यात्रा पर निकलने के लिए...... 



पानी पानी रे.....

























 













 


                                                                                                                     
इस साईकिल अभ्यास का एक उद्देश्य भी था। जल्द ही उत्तराखण्ड त्रासदी के पुनर्निर्माण कार्य में जुटी एक संस्था के साथ जाना है। वहाँ पहाड में कई गावों में चलना पडेगा। सामान पहुँचाना पडेगा। इसलिए शरीर के स्टॅमिना को थोडा तैयार करना पडेगा। उसे वॉर्म अप करना पडेगा। और शरीर पर एक सुखद सा तनाव जरूर महसूस हुआ। शरीर को कुछ अभ्यास मिल गया है। अब जाना है अगली यात्रा पर। उत्तराखण्ड के धारचुला परिसर में..........    




Thursday, March 22, 2012

वसईचा किल्ला

अर्नाळा किल्ला पाहून झाल्यानंतर अर्थातच नजरेपुढे येणारा किल्ला म्हणजे वसईचा किल्ला! हा एक भुईकोट व किना-यावरचा किल्ला आहे. किल्ल्याचा घेर अत्यंत विस्तृत असून मोठी वस्ती व परिसर किल्ल्याने व्यापलेला आहे. किल्ल्यावर जाण्यासाठी वसई स्टेशनपासून सतत बस चालू असतात.




इतिहासाचे मूक साक्षीदार......... आणि कर्तेसुद्धा......



वसई! वसईचा किल्ला! वसईचा किल्ला आठवला की चिमाजी अप्पा आठवतात आणि त्यांचे बोलही आठवतात- “किल्ला ताब्यात येत नसेल, तर मला तोफेच्या तोंडी देऊन किल्ल्यावर पाठवा!” १७३९ मध्ये तीन वर्षं पोर्तुगीजांशी लढल्यानंतर मराठ्यांनी चिमाजी अप्पांच्या नेतृत्वाखाली वसई किल्ला जिंकला... तत्कालीन मराठेशाहीतील ती एक मोठी मोहीम होती..... आज “त्या” दिवसांची साक्ष म्हणून आपल्यासाठी किल्ल्यावरील वास्तू व अवशेष आहेत.......

‘किल्ला बंदर’ बसचा शेवटचा स्टॉप किल्ल्याच्या अंतर्भागातच आहे. आपण किल्ल्यात आलो, हे नीट कळू नये, इतकी मोठी वस्ती किल्ल्यात आहे. बरीचशी वस्ती पारंपारिकच आहे. किल्ल्याच्या तीन बाजूंनी समुद्र असला, तरी इथून प्रत्यक्ष बीचवर जाता येत नाही. पण किल्ल्यामधून धक्क्यावर जाता येतं. पण तिथे बघण्यासारखं विशेष नाही.

स्टॉपवर उतरून दाटीवाटीच्या वस्तीतून विचारत विचारत धक्क्यावर पोचलो. वाटेतल्या लोकांच्या चेह-यावर “आमच्या विश्वात हा कोण आला?” असे विचित्र भाव जाणवत होते. धक्क्यावर फार काही नसल्यामुळे तिथून परत स्टॉपवर आलो आणि विरुद्ध दिशेने पुढे गेलो. तिथून मग किल्ल्याचं “किल्लेपण” जाणवायला सुरुवात झाली. भव्य, विशाल वास्तू अजूनही काही प्रमाणात प्रेक्षणीय आहेत. ढासळला असला तरीही भव्यता टिकून आहे.








रचनेचा रेखीवपणा जाणवतो.......

किल्ला फिरत फिरत पुढे जात होतो (म्हणजे स्टॉपपासून मागे). शांत आणि बराचसा निर्जन परिसर. आणि त्यामानाने वर्जित क्षेत्र असं घोषित केलेलं नसल्यामुळे मुक्त परिसर. एका एका वास्तूमध्ये फिरून पाहत होतो. किल्ल्याची भव्यता ह्या वास्तुंवरून येऊ शकते.


किल्ल्याची भव्यता...........


किल्ला व्यवस्थित जतन केल्यासारखा दिसतो.






ह्या मूर्त्या वेगळ्याच वाटतात ना?




पोर्तुगीज प्रभाव!!!

पक्क्या रस्त्यावरून काही संध्याकाळचे फिरायला आलेले लोक दिसत होते. परिसर शांत व प्रेक्षणीय आहे. किल्ल्याच्या आतमधील वास्तू, झाडी आणि दूरवर दिसणारा कोट.... हा रस्ता पुढे पुढे जात अजून एका धक्क्यापाशी पोचतो. एकदा एका संध्याकाळी ह्या धक्क्यावर आलो होतो; पण हा धक्का किल्ल्याच्या इतका आत (शेवटी) आहे, हे माहिती नव्हतं! धक्क्यामध्ये ब-यापैकी बोटी लावलेल्या होत्या. वीकेंड नसल्यामुळे त्या बोटी लोकांना घेऊन जात नव्हत्या. समोर वसईची खाडी दिसत होती व त्या पलीकडे भाईंदर आणि उत्तन दिसत होतं! तसंच डावीकडे दूरवर ट्रेनचा पांढरा ब्रिज आणि त्यावरून जाणा-या ट्रेन्स मुंग्यांसारख्या दिसत होत्या... तसंच त्याहून डावीकडे अंधुक असा कामणदुर्ग दिसत होता. कामणदुर्ग तुंगारेश्वर रांगेतला एक महत्त्वाचा किल्ला आहे आणि वसईने लोकलने नायगावच्या दिशेने जाताना डाव्या हाताला सहजगत्या त्याचं दर्शन होतं.


खाडी, तर आणि पल्याड भाईंदर- उत्तन


पांढरा पट्टा ट्रेनचा ब्रिज आहे.





































बीच किल्ल्याला लागून नाही. त्यामुळे खुला समुद्र व खुल्या समुद्रात सूर्यास्त पाहता आला नाही. पण हा धक्का शांत व स्वच्छ होता, त्यामुळे तिथे थोडा वेळ थांबता आलं...... पाण्यात उभं राहिल्यावर खाली अगदी लहान मासे फिरताना दिसत होते.........

धक्क्यावर थांबून परत आलो. येताना एक वाट डावीकडे वळलेली दिसली. तिथे परत किल्ल्याच्या वास्तु दिसत होत्या. काही जुन्या तोफा आणि अन्य जुनी सामग्री दिसत होती......... इथे किल्ल्याचा एक दरवाजा (चोरदरवाजा असावा) आहे. त्याच्या द्वारावर वैशिष्ट्यपूर्ण रचना होती. अर्थातच तो दरवाजा भक्कम होता. इथून पुढे बरंच आत जाता येतं. किल्ल्यातील विविध वास्तु दिसतात. काही अजूनही प्रेक्षणीय आहेत.


किल्ल्यामधील एकूण बांधकाम अवाढव्य असावं............


इतका काळ उलटून गेला असला तरीही मूळ पाया टिकून आहे.........


खडा स्तंभ





आकर्षक प्रवेशद्वार व कमान


तोफा?


दुर्गदैवत


मजबूत दरवाजा........... सावधान...... आत याल तर.....


हा रस्ता पुढे सरळ जाऊन आधी फिरलो होतो त्या रस्त्याला मिळत होत्या. किल्ल्यात शांतता असली तरी मधून मधून काही लोक फिरत होते. काही मुलं किल्ल्यात क्रिकेट खेळत होती. त्या भागात थोडा वेळ फिरून व थोडा “त्या भागाचा अनुभव” घेण्याचा प्रयत्न करून परत धक्क्याजवळ आलो व तिथून मागे वळलो. हा परिसर प्रसन्न आहे. सकाळी फिरायला येण्यासाठी आदर्श आहे. किल्ल्याचा घेर कित्येक किलोमीटर मोठा आहे. दूरवर मोकळ्या भागात क्रिकेट चालू होतं.


भारत: गल्ली तिथे क्रिकेट







चिमाजी अप्पा.........................

परत आल्यावर स्टॉपकडे न वळता समोर चिमाजी अप्पा स्मारकापाशी गेलो. हे स्मारक योग्य स्थितीमध्ये ठेवलं आहे. बघण्यासारखं आहे. चिमाजी अप्पा! अपराजित बाजीराव पेशव्यांचे बंधू आणि मराठ्यांचे मोठे सेनापती! त्या काळामध्ये मराठ्यांनी किती पराक्रम केले होते, ह्याची आज आपण कल्पनाही करू शकत नाही.... आज वेगवेगळ्या विचारधारांच्या, प्रतिकांच्या, झेंड्यांच्या, नेत्यांच्या नावांखाली स्वराज्याचा व गौरवास्पद इतिहासाचा पूर्ण कडेलोट झाला आहे! इतका संकुचित आणि उथळ विचार!!! भयानक स्थिती आहे......

ह्या संदर्भात एक आठवण. नुकतेच वाचण्यात आले की काही मराठी लोक मध्य प्रदेशामध्ये रावेरखेड इथे प्रतापी बाजीराव पेशव्यांच्या नदीच्या बुडीत क्षेत्रात जाण्याचा धोका निर्माण झालेल्या समाधीच्या दर्शनासाठी गेले होते. तिथे "पेशवा सरकार" ह्या शब्दांमधून स्थानिक लोकांचा बाजीराव पेशव्यांप्रती असलेला आदर त्यांना दिसला. महाराष्ट्रात आज बाजीराव पेशवा म्हंटलं तर लोक काय बोलतील.... पण मध्य प्रदेशाच्या आडवळणाच्या गावात हा आदर...... इतका वैभवशाली आणि कर्तृत्वसंपन्न मराठी इतिहास असूनही त्याला आज एक लेबल, एक चिन्ह, एक विचार, एक बाजू आणि एक जात ह्यांमध्ये मर्यादित करून बघण्याची डबक्याची मानसिकताच जास्त दिसते......... ह्या गदारोळात व अशांततेत “काही शाश्वत होतं आणि आजही ते आहे,” हा अनुभव आपल्याला अशा ऐतिहासिक ठिकाणीच येऊ शकतो....






चिमाजी अप्पा स्मारक बघून झाल्यानंतर सरळ पुढे फिरत जावंसं वाटलं. म्हणून त्या ऐतिहासिक घडामोडींचा अनुभव घेण्याचा प्रयत्न करत चालत पुढे गेलो. हा सर्व परिसर शांत व प्रसन्न होता. रात्र झाली असली तरी वर्दळ होती. दोन किलोमीटर चालल्यावर मग वसई गावचा मुख्य बस स्टँड आला व तिथून परतीची वाट.........










आगामी आकर्षण: गोरखगड...........

Monday, December 5, 2011

लदाखची भ्रमणगाथा: भाग ११ (अंतिम): “चुकलेल्या रस्त्यावरून” जाताना


संपूर्ण उत्तर भारतामध्ये तीव्र थंडी पडली असताना आणि कश्मीरची हिवाळी राजधानी जम्मुला हलवली जात असताना भ्रमणगाथेतला अंतिम भाग लिहितोय. खरं तर अंतिम भाग न म्हणता पुढील प्रवासाच्या पूर्वीचा व तात्पुरत्या विश्रामापूर्वीचा अंतिम भाग म्हणणं अधिक योग्य होईल..... संपूर्ण प्रवासामध्ये, प्रवास वर्णनाचं लेखन करताना आणि आत्तासुद्धा “त्या” प्रवासाच्या अनुभवाच्या अत्यंत थरारक व विलक्षण आठवणी सोबत आहेत....... जणू तो प्रवास मनावर कोरला गेलाय. तो अनुभव एकदाच आला होता; पण तो अनुभव सतत प्रत्ययास येतो आहे...



त्सो मोरिरी हा नितांत रमणीय ‘त्सो’ पाहून सोळा ऑगस्टच्या रात्री परत आलो. लेह- मनाली महामार्ग पांगच्या पुढे बंदच असल्यामुळे बरीच चर्चा झाल्यानंतर शेवटी विमानाने लेह- मुंबई असा थेट प्रवास करण्याचं ठरवलं तेव्हा मध्यरात्र उलटून गेली होती. पहाटे तीनला उठून तयारी करून विमानतळावर जायचं असल्यामुळे झोपायची इच्छाच झाली नाही. परत जाताना लेह- मनाली हा जगातला अत्यंत दुर्गम रस्त्यांपैकी एक असलेला मार्ग बघता येणार नाही ही खंत असली तरीही गेले दहा दिवस जे पाहिलं तेही अपूर्व असल्याचं समाधान व उत्तेजनासुद्धा होती......

लेह- मनाली महामार्गाबद्दलही थोडं सांगणं आवश्यक आहे. कारण हा रस्ता आमचा चुकला होता, आम्ही त्या विलक्षण अनुभवाला मुकलो होतो आणि ‘चुकलेल्या रस्त्या’वरूनच आमचं विमान जाणार होतं...... लेह- मनाली हा आज महामार्ग आहे आणि सुरक्षेच्या दृष्टीने अत्यंत महत्त्वाचा आहे. कारण लेह व दक्षिण- पूर्व लदाखला जोडणा-या दोन मार्गांपैकी तो एक आहे. १९८९ मध्ये वाहतुकीला खुला झाला व कालांतराने प्रवासी संख्या व व्यक्तीगत पर्यटक, गिर्यारोहक ह्यांची वर्दळ वाढत गेली. ह्या मार्गाने लेह- मनाली अंतर ४७५ किमी म्हणजे लेह- श्रीनगर अंतरापेक्षा थोडं जास्त आहे. ह्या मार्गावर लेह- कारू- उपशी (जिथपर्यंत जाण्याचं सौभाग्य आम्हांला लाभलं होतं)- तांगलांगला- पांग- सरचू- केलाँग- तंडी (इथे उपशीनंतरचा पहिला पेट्रोलपंप लागतो, फक्त २५० किमी अंतरानंतर!!)- बारालाच्छाला- रोहतांगला- मनाली असे टप्पे आहेत आणि चांगला, खार्दुंगला ह्यांसारखेच अत्यंत दुर्गम असे पाच ‘ला’ लागतात (तंगलंगला, लाचुलुंगला, बारालाच्छाला इत्यादि). महामार्गावर अत्यंत उंचीचे घाट व ठिकाणं आहेत व पर्वतांमध्येच मूरे प्लेन्स हे अद्भुत पठारही आहे.. मार्गावर शक्यतो दोन किंवा तीन मुक्काम करून प्रवास केला जातो. वाटेमध्ये राहण्याची सोय अत्यंत थोडी आहे आणि प्रवासामधील इतर आवश्यक गोष्टी- गॅरेज, सर्विसिंग, पंक्चर इत्यादि फार थोड्या प्रमाणात उपलब्ध आहेत. लदाखमधून हा रस्ता थेट हिमाचल प्रदेशातल्या मनालीपर्यंत येतो. रोहतांगला हा शेवटचा ला; त्याची उंची ३९७९ मीटर आहे; तिथून सुमारे ५० किमी अंतरावरचं मनाली शहर (उंची १९५० मीटर्स) पुसट दिसतं. मनाली शहर कुल्लू जिल्ह्यात आहे आणि कुल्लू गावाचं नाव ‘वसतीयोग्य प्रदेशातलं सर्वांत शेवटचं नगर’ ह्यावरून पडलेलं आहे. एका प्रकारे राहण्यायोग्य प्रदेश तिथे संपतो व पुढे सर्व दुर्गमच भाग आहे.....


लेह- मनाली रस्त्याचा नकाशा. नकाशा मोठा करून पाहण्यासाठी इथे क्लिक करावे.

हा मार्ग म्हणजे भारतातला अतिदुर्गम मार्गांपैकी एक. त्यामुळेच साहसी गिर्यारोहक, पर्वतात फिरणारे भटके ह्या प्रकारच्या लोकांसाठी ‘पंढरी’ किंवा ‘लॉर्डस’! त्यामुळे अलीकडच्या काळात अनेक भटके व साहस वेडे लोक इथे जातात. मनाली ते लेह किंवा उलट प्रवास करून प्रवासाचे चोचले पुरेपूर पुरवतात. ह्या मार्गावर इतर वाहतूक मर्यादितच. सेना आणि मालवाहतूक करणारे ट्रक्स हेच मुख्य असतात. विशेष म्हणजे श्रीनगर- लेह प्रमाणेच हा मार्गसुद्धा उन्हाळ्याच्या पाच महिन्यात सुरू असतो. जूनच्या सुरुवातीला तो खुला होतो व ऑक्टोबर अखेरीस बंद करावा लागतो. ह्या काळामध्ये हिमाचल प्रदेश परिवहन मंडळाच्या बस जातात. काही प्रवासी वाहतुकीच्या गाड्या पहाटे लेहवरून निघून अठरा तासांच्या सलग प्रवासाद्वारे न थांबता मनालीला पोचतात. पण जर नजारा पूर्ण बघायचा असेल, अनुभवायचा असेल, तर आणि सुरक्षेच्या दृष्टीनेसुद्धा हा प्रवास दोन किंवा शक्य असल्यास तीन टप्प्यांमध्येही केला जाऊ शकतो. इथे प्रवास करण्यासाठीसुद्धा प्रचंड पूर्वतयारी आवश्यक आहे. वाहनाची दुरुस्ती करण्यासाठी जवळजवळ काहीच सोय उपलब्ध नसल्याने सर्व साधने जवळ बाळगणे आणि काही किमान गोष्टींचं तरी प्रशिक्षण घेणं आणि बाईक असतील तर किमान पाचच्या गटाने प्रवास करणं हे तर आवश्यकच. काही काळापूर्वी सहा मराठी महिला- मुलींनी मुंबई- मनाली- लेह- श्रीनगर- मुंबई असा साडेसहा हजार किमीचा प्रवास पूर्ण केला होता! विशेष म्हणजे सर्व प्रवासामध्ये चालक एकच होती!!!

असा हा विलक्षण महामार्ग, त्यावरील ठिकाणं, नजारा आणि बर्फ (पावसामुळे तिथेही प्रचंड बर्फ बघायला मिळाला असता....) ह्यांना आम्ही मुकणार होतो. अर्थात फक्त काही काळासाठी. ह्या मोहिमेमधील अनुभव लक्षात घेऊन पुढील मोहिमेची आखणी लेहमध्येच सुरू झाली होती.......


...... पहाटे तीनला उठून आवरून घेतलं आणि चार वाजता हसनजींना उठवलं. ते मुद्दाम आमच्या खोलीजवळ येऊन झोपले होते. त्यांना उठवल्यावर सामान घेऊन हॉटेलच्या मुख्य रिसेप्शनजवळ आलो. आमच्यासाठी गाडी व ड्रायव्हर तयार ठेवला होता. चहासुद्धा त्यांनी तयार ठेवला. तोपर्यंत मोहंमद हुसैनजी व इतर सहकारीसुद्धा उठले..... लगोलग एक फोटोसेशन झालं. कारण विमानात जागा मिळाली असती, तर आम्ही लगेचच निघणार होतो......


गिरीशने घेतलेल्या ह्या फोटोत डावीकडून मी, हसनजी, मोहंमद हुसेन, परीक्षित आणि हसनजींचे सहकारी


परीक्षितने घेतलेल्या ह्या फोटोची वेळ पाहा!!

पहाटे पाचला बाहेर पडलो. आधी एटीएम सेंटरवर गेलो. स्टेट बँक, एचडीएफसी आणि जेके बँक सर्वच बंद होते. विमानतळावरच मिळेल, ह्या अपेक्षेने सरळ विमानतळावर गेलो. ड्रायव्हरच्या ऐवजी आम्ही ज्यांना जेमतेम तीन तास झोपू दिलं होतं, ते हसनजीच सोबत आले होते. विमानतळावर लवकरच पोचलो. लेह विमानतळ!!! लक्ष्यच्या पार्श्वभूमीवरची ही भ्रमणगाथा शेवटी लक्ष्यच्या सुरुवातीच्या शीर्षकगीताच्या दृश्यावर स्थिर होऊन तात्पुरती स्थगित होणार होती.............

विमानतळावर ब-यापैकी गर्दी होती. बरेच पर्यटक जात होते. गेटसमोर चारचाकींची दाटी झाली होती. गंमत म्हणजे तिथे सुरक्षा तपासणी करणारेसुद्धा मराठीच होते! विमानतळावर एका बाजूला गाडी लावून माझे मित्रद्वय आणि हसनजी तिकिट खिडकीपाशी गेले. विमानतळावर सैनिकांच्या रांगा दिसत होत्या. तिकिट मिळायला वेळ लागत होता व प्रवासाची अनिश्चितता संपत नव्हती. एकदा वाटत होतं, विमानाचं तिकिटच मिळू नये; म्हणजे एक- दोन दिवसांनी रस्ता खुला झाल्यावर आम्ही मनाली रस्त्यानेच गेलो असतो...... : )

बराच वेळाने माझे मित्र परत आले. सर्वांची कॅश गोळा केली व हसनजींच्या सांगण्यानुसार अधिक कॅशसाठी मोहंमद हुसेनही ५००० रूपये घेऊन आले. कारण लेह विमानतळावर एटीएम नव्हतं!!!! जी क्रेडिट कॅशची सुविधा दल सरोवरातल्या हँडी क्रॅफ्टसच्या दुकानामध्ये होती; ती मूलभूत सुविधा लेहच्या विमानतळावर नव्हती!! थोड्या वेळाने लगेच जाणा-या विमानाचं नाही; पण अकरा वाजताच्या विमानाचं तिकिट मिळालं. प्रवास लेह- दिल्ली व नंतर लगेच दिल्ली- मुंबई गोएअरच्या विमानाने होणार होता....... दिल्लीमध्ये विमान बदलून जायचं होतं......

त्यापेक्षाही लेहमध्ये अजून साडेतीन तास मिळाले, म्हणून विलक्षण आनंद झाला!!! परत आलो. परत सर्वांनाच भेटून आनंद झाला. त्यांच्याही चेह-यावर आनंद दिसत होता. थोड्या गप्पा झाल्या. हुसेनजींच्या वतीने निरोपाचा चहा झाला. फोटो काढले, पत्ते घेतले, दिले. परत एकदा बाहेर पडलो. एटीएममधून पैसे काढणे आणि हसनजी व हुसेनजी ह्यांच्यासाठी काही गिफ्ट घेणे, ह्या उद्देश होता. ह्यावेळी जे-के बँकेचं एटीएम चालू मिळालं. आझाद काश्मीर, फुटिरता, भारत द्वेष असा काही प्रकार न होता आम्हांला पैसे काढता आले, पैसे कापलेसुद्धा गेले नाहीत. फक्त त्यातून एका वेळी दोन दोन हजारच काढता येत होते. ते काढले व मार्केटमध्ये फिरलो. पण त्याहीवेळेस आम्हांला दुकान उघडं मिळालं नाही. शेवटी गिफ्टच्या ऐवजी रोख पैसेच द्यायचे असं ठरवून परत निघालो. अगदी ह्याही वेळेस मार्केटमध्ये फिरताना, आम्हांला न्यायला व सोडायला हसनजीच आले होते........

परत थोडा वेळ हॉटेलमध्ये थांबलो. गिफ्ट देऊ शकत नाही; म्हणून पैसे घ्यायला लावले. त्यांनी तात्पुरते तिकिटासाठी दिलेले पैसे परत केले. (तात्पुरत्या प्रवास विरामापूर्वीची) शेवटची गळाभेट झाली. मनसोक्त पाहुणचाराचा समारोपसुद्धा त्यांनी दिलेल्या निरोपाच्या नाश्त्याने व टॅक्सीऐवजी देण्यात आलेल्या त्यांच्या व्यक्तीगत गाडीच्या प्रवासानेच झाला...............

लेह विमानतळ............ विमानाचा प्रवास महाग नक्कीच होता. आम्हांला लेह- मुंबई एकूण प्रवासासाठी पंधरा हजार लागणार होते. पण जरी आम्ही लेह- श्रीनगर- जम्मु- दिल्ली- पुणे आलो असतो; तरीसुद्धा सर्व खर्च मिळून प्रत्येकी सुमारे नऊ हजार लागलेच असते. शिवाय विमान प्रवासामुळे पाच- सहा दिवस वाचत होते. त्यामुळे विमानप्रवासच ठीक वाटला. परत लेहला येताना मुंबई- लेह विमानप्रवास करायचा आणि लेह- करगिल, लेह- नुब्रा लेह- पेंगाँग- त्सोमोरिरी इत्यादि असं जायचं, असा विचार तेव्हाच मनात आला.

विमानतळावर औपचारिकता पूर्ण करून विमानात बसलो....... मनामध्ये असंख्य विचार येत होते........ अर्ध्यामध्ये डाव मोडला, अधुरी एक कहाणी अशी गत होऊन आम्ही परतत होतो...... वाईट वाटत होतं. असंही वाटत होतं, की आम्ही कदाचित मनाली- दिल्ली तरी फिरू शकलो असतो...... असंही वाटत होतं, की ह्या दुर्गम प्रदेशाचा, खडतर आयुष्यामध्ये जगत असलेल्या इथल्या लोकांचा, प्राचीन काळात इथल्या दुर्गम निसर्गाचा सामना करून इथे आलेल्या बौद्ध भिक्षुंसारख्या लोकांचा एक प्रकारे घोर अपमानच आम्ही विमानाने जाऊन करत होतो............... प्रवास ख-या अर्थाने संपला नव्हता; पण आम्ही तो अर्धवट टाकून परत येत होतो.........

विमान निघाल्यावर सर्वत्र हवाई नजारा सुरू झाला........ विमान उडाल्याबरोबर खालच्या खाणाखुणा व्यापक दृश्यामध्ये विलीन होऊन गेल्या....... पुढे लवकरच बर्फाची पांढरीशुभ्र दुलई सुरू झाली. फार मोठ्या प्रदेशामध्ये सर्वदूर बर्फाचं साम्राज्य दिसत होतं.... निश्चितच हवामान नेहमीपेक्षा फार वेगळं आणि बिकट होतं....... हे झांस्कर, हा दक्षिण लदाख, इथे हिमाचल असेल असे तर्क लढवत असतानाच बघता बघता विमान सपाट प्रदेशावर आलं आणि दिल्लीमध्ये उतरलंसुद्धा...... पुढचं विमान फार लवकर होतं; त्यामुळे ते मिळेपर्यंत धाकधुक होती....... पण टर्मिनल शोधून, तपासणी, चेक- इन व बोर्डिंग करून विमानात बसलोसुद्धा..... तिथेच एक मराठी मुलगा विमानतळाच्या स्टाफमध्ये दिसला! अशी मराठी सोबत प्रवासाच्या शेवटीपर्यंत मिळाली......






नजरों में हो..... गुजरता हुआ...... ख्वाबों का कोई....... क़ाफ“ला”...........


दिल्ली- मुंबई प्रवास वेळेत पार पडला व दुपारी साडेचार वाजता मुंबईला पोचलोसुद्धा........ विमानतळावर उतरलो व बाहेर आलो....... अत्यंत भंकस वाटत होतं. स्वर्गातून जमिनीवर आलो होतो...... एका शुद्ध, विशेष उंचीवरच्या पवित्र वातावरणातून अत्यंत निम्न दर्जाच्या, अशुद्ध परिस्थितीत आल्यासारखं वाटत होतं.....................

लेहमध्ये विमानाने गेल्यास तिथल्या परिस्थितीशी शरीराने जुळवून घेईपर्यंत त्रास होतो. तसाच त्रास अचानक मुंबईमध्ये आल्यानंतर झाला......... टॅक्सी मिळवून पुढे जाईपर्यंत निव्वळ वैताग झाला...... जणू एका सुरेख व नितांत रमणीय स्वप्नाचे तुकडे तुकडे होऊन वेदनादायी वास्तवाचं अक्राळविक्राळ दृश्य समोर आलं...... भ्रमणगाथा तात्पुरती संपली, शब्दच संपले.......

उपसंहार

भ्रमणगाथा संपल्यावर मागे वळून पाहताना स्पष्टपणे जाणवतं, की ज्या उद्देशाने व ज्या प्रेरणेने ही भ्रमणगाथा केली गेली, ते ब-याच प्रमाणात सफल झाले. जम्मु- काश्मीर आणि लदाख ह्या भागातले लोक, तिथला निसर्ग, तिथली परिस्थिती, सैनिक बंधू ह्यांच्याशी परिचय करणे, देशाचा तो भाग जाणून घेणे, सैनिकांसाठी एखादं छोटसं काम करणे, तिथल्या भव्य- दिव्य निसर्गाचा आनंद घेणे ही प्रमुख उद्दिष्टे ब-याच प्रमाणात पूर्ण झालीच; त्याबरोबर अन्यही ब-याच गोष्टी कळाल्या; ज्या सुद्धा ह्या मोहिमेच्या उद्दिष्टामध्ये अप्रत्यक्ष स्वरूपात होत्या. काश्मीर आणि पूर्वांचल- उत्तर पूर्व भारत; हे प्रमुख धगधगते प्रदेश! तसा आता सर्व देशानेच पेट घेतला आहे; तरीसुद्धा आग काश्मीर व पूर्वांचलामध्ये जास्त आहे. ह्या भागातले लोक, तो प्रदेश ह्यांच्यासाठी आपण काय करू शकतो का, हे थोडंसं तपासून पाहणे, हेही ह्या मोहिमेचं एक उद्दिष्टच होतं व तेही ब-याच प्रमाणात पूर्ण झालं. काश्मीर; विशेषत: लदाखच्या संदर्भात तरी बरंच काही करता येणं शक्य आहे; हे ह्या मोहिमेतून कळालं. तिथली स्थानिक संस्कृती, स्थानिक परंपरा, लोक ह्यांना पर्यटन व वैशिष्ट्यपूर्ण भौगोलिक परिस्थिती; हे माध्यम वापरून काही मदत केली जाऊ शकते व त्या माध्यमातून तो भाग भारताशी जास्त जवळ येईल आणि भारतीय त्याला अधिक आपलं मानतील; ह्यासाठी बरंच काही करता येईल, हे कळालं. सामान्य भारतीय त्यांना चिनी किंवा मंगोलियन/ युरोपियन ह्यांच्याप्रमाणे एक ह्या नजरेने नाही; तर आपलेच देशबांधव ह्या नजरेने बघतील ह्यासाठी काही प्रयत्न करता येऊ शकतो. लदाखी लोक व भारतातले इतर लोक ह्यांच्यामध्ये एक दुवा म्हणून काम करण्यासाठी कशा प्रकारचे प्रयत्न करावे लागतील; ह्याची एक प्राथमिक ओळख व प्राथमिक पातळीवरील समज ह्या मोहिमेमध्ये नक्कीच झाली. एका कल्पनेतून ह्या मोहिमेचा उदय झाला आणि ह्या मोहिमेने आणखी कित्येक कल्पना दिल्या...... आता येणा-या काळात ह्या कल्पनेवर काम करून ठोस आराखडा बनवाला लागेल व तो बनला की भ्रमणगाथेचा पुढील टप्पा सुरू होईल....



ह्या भ्रमणगाथेमध्ये जरी मुख्य तीन जण सहभागी असले; तरीही त्यामध्ये कित्येक लोकांचा सहभाग अत्यंत मोलाचा होता. वेगवेगळ्या प्रकारे अनेकांनी सहभाग दिला. नॉन स्ट्राईकर एंडवर राहून दिलेल्या त्यांच्या सहकार्याशिवाय ही मोहीम कदापिही शक्य नव्हती........... उल्लेखाची गरज नाही, कारण उल्लेखाची औपचारिकता कमीपणा आणणारी ठरेल. पण अनेक पातळ्यांवर, अनेक प्रकारे अनेकांचा हातभार ह्यामध्ये होता. अगदी लदाखला जाण्याची प्रेरणा तिथल्या फोटोंद्वारे व तिथे गेलेल्या टीमच्या ब्लॉगच्या माहितीद्वारे देण्यापासून ते बॅग भरेपर्यंत....... तांत्रिक माहिती व काँटॅक्टस देण्यापासून ते सर्व सूचना देऊन जमिनीवर आणण्यापर्यंत........ “काश्मीर”, “करगिल” अशा ठिकाणी जाऊ देण्यापासून फोटो घेण्याच्या आग्रहापर्यंत...... विशेष प्रकारची माहिती व सहकार्य देण्यापासून तयारी करून देण्यापर्यंत.... प्रवासवर्णन वाचून उत्तेजन देण्यापासून मौल्यवान सूचना करण्यापर्यंत.......

विशेष उल्लेख दोन केले पाहिजेत. पहिले अर्थातच हसनजी, हुसेनजी, हैदरभाई व लदाखचे सर्व लोक..... त्यांची सोबत म्हणजे शुद्ध माणुसकीचा अवर्णनीय अनुभव होता....... बाकी काहीच बोलायची गरज नाही. दुसरा उल्लेख म्हणजे माझा मित्र गिरीश...... माझ्या डोक्यातला किडा त्याने मानला, त्या कल्पनेवर मेहनत घेतली व त्यातूनच ही मोहिम साकार झाली व अर्धी असली तरी यशस्वी झाली...... त्याने फक्त मेहनतच घेतली नाही; त्याने नेतृत्वाची जवाबदारीसुद्धा घेतली, सर्व टेक्निकल प्रकारच्या गोष्टी व्यवस्थित संभाळल्या... तसंच त्याने फक्त ह्या जवाबदा-याच नाही; तर फोटो व व्हिडिओसुद्धा घेतले!!!  त्यामुळेच ही मोहिम अशा स्वरूपात संपन्न होऊ शकली........ परीक्षितने ह्या मोहिमेला बळकटी दिली व जवाबदारी विभागून घेतल्यामुळे ही मोहीम, ही भ्रमणगाथा अधिक संतुलित झाली, अधिक जोमदार झाली................ अशा प्रकारे तात्पुरत्या विरामासह ही भ्रमणगाथा संपन्न होत आहे.......... पुढील लदाख भ्रमणापर्यंत रामराम म्हणजेच जुले लदाख............





आगामी आकर्षण: झेपावे जरा उत्तरेकडे!