✪ Arangetram- Testing of the disciple and the final step towards entering public life
✪ Glorious Shabdam, Varnam, Kirtanam, Tillana and Mangalam
✪ Inspiring journey of years of hard work and persistence
✪ Big dreams and giant leaps of Vaishnavi from Parbhani, Maharashtra
✪ Stout Guru- bitter from outside, butter from inside
✪ Nritya and music- a thought stopping experience
✪ Gathering of veteran teachers and near ones
When a disciple is ready, Guru appears. When the disciple is really ready, the Guru disappears! A few days ago it was Guru Purnima day. Today on 28th July, one could experience the manifestation of Guru- disciple relation, its various expressions and what a Gurukula means. The occasion was the Arangetram Nritya- Yoga ceremony of Ms. Vaishnavi Kapre, the disciple of Guru Swapna Ratnalikar Kurdukar and her Rukhminidevi Kala Kshetra. Arangetram is the final examination of the disciple in Bharatnatyam and the ceremony for his or her entry into the public life and for bestowing her with blessings. My acquaintance with Ms. Vaishnavi is this- She is the daughter of my English teacher of Standard VI, Tanuja Kapare who had made me cry and! And her father Balkrishna Kapre, the P.T. teacher also had made me afraid! But she is significantly more than being their daughter and I came to understand this across the ceremony. In short, Vaishnavi is manifold- she is a meditator of Art of Living programme, she is a Yoga teacher, an architect engineer, a Bharatnatyam dancer and much more! Her dedication from a young age, her toiling and her persistence with her efforts was there to see. My sir and madam also had encouraged her without limits and provided her opportunities. This example of toiling so hard for so long and with such perseverance should be regarded inspirational in these days.
The programme was amazing, but also I could meet many teachers. Teachers who had taught me as a kid and as a college student. I felt gratitude towards all the Gurus. Parbhani in central Maharashtra was a small town of those days. Therefore there were many people whom I knew. This made the ceremony more special. Another unique aspect was that right from the anchor and the photographer- everyone was honoured and respected. Needless to say, even the photographer herself was a Bharatnatyam dancer! Along with the dance, company of Mrudangam, Flute (Bansari) and violin and renowned singers, light arrangements, succinct anchoring, selected short discourses made this ceremony more marvelous. One aspect of the anchoring is worth mentioning- there were many veterans on the stage. They too were given best wishes for their further journey after mentioning their contributions. Persons who supported Vaishnavi in her journey and other seniors from the field of music were present. One person was missed badly and he is none other than a film editor from Parbhani, Saumitra Dharasurkar.
Before talking about Vaishnavi's presentations, it is worth talking about her Guru Swapna Ratnalikar- Kurdukar. She was also known to me, the daughter of my favourite mathematics teacher Ratnalikar sir and she was also Bharatnatyam Guru for my two sisters! Her Rukhminidevi Kala Kshetra is working just like a modern day Guru kula. Her narration revealed hard work done by her disciple Vaishnavi, her struggle while doing Bharatnatyam and also doing Architecture at the same time, her difficulties under the guidance of the strict Guru and her journey towards this stage. A Guru hammers a pot in the making from outside, but also gives the warmth from inside. Then the ceremony unfolded the way in which she had prepared Vaishnavi. Under her Guru, Vaishnavi had made so great efforts that today she looks just effortless in her performance!
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Sunday, July 28, 2024
Bharatanatyam Arangetram- Nritya Yoga ceremony!
Friday, July 19, 2013
Tour de Godavari!
कहते है जीवन यह एक निरंतर चलनेवाली यात्रा है। पडाव कई हो; यात्रा निरंतर चलती है। कई बार हम पडावों को मंजिल भी समझ लेते है। परन्तु सच्चाई यही है कि जीवन की यात्रा हमेशा निरंतर चलती है।
जीवन में हम कई तरह के रास्तों से गुजरते हैं। रास्ते में कुछ यात्रीयों से मुलाकात होती है। ऐसे ही एक अपूर्व यात्री है श्री. नीरज जी जाट। खुद को ‘घूमक्कड’ कहलाने वाले नीरज जी वास्तव में ‘मॅन वर्सेस वाईल्ड’ की भारतीय आवृत्ति हैं! उन्होंने अब तक देश के लगभर हर राज्य में अनगिनत बार घूमक्कडी की है। हिमालय (उत्तराखण्ड, हिमाचल तथा जम्मु- कश्मीर- लदाख) में सैकडों बार दुर्गम क्षेत्रों में घूमक्कडी की है। वे है ही मुसाफीर। लेकिन मुसाफिर कितनी अद्भूत ऊँचाई के! हाल ही में उन्होने साईकिल से मनाली- लेह और लेह- श्रीनगर महायात्रा की। उनकी अद्भुत तथा अविश्वसनीय दास्तां यहाँ पढी़ जा सकती है। उनसे कुछ अलग तरिके से जीने की प्रेरणा मिलती है। वे हर संवेदनशील इन्सान को आवाहन करते हैं और आह्वान भी देते हैं।
उनकी साईकिल यात्रा देख रहा नही गया और एक दिन साईकिल ले आया। पहाड का शौक तो है हि। पहाड जा कर आया हुँ और जाने की इच्छा है हि। पेट्रोल के दाम तो पहाड से भी अधिक ऊँचाईयों को छू रहे है। इस स्थिति में साईकिल एक सशक्त विकल्प के रूप में सामने आती है। साईकिल कई मायनों में उपयोगी है। एक तो इन्धन खर्चे की बचत। यह एक अच्छा व्यायाम भी है। तथा इससे हमारे जीवन का नियंत्रण करनेवाली तथाकथित आधुनिक जीवनशैली की बेहुदा रफ्तार को भी नियंत्रण में लाया जा सकता है। मंजिल से अधिक रोमांच सफर में आता है। तो फिर काहे को भेडचाल की तरह किसी छोटे मोटे लाभ की ओर दौडना? चलिए, एक साईकिल उठाते है और शुरू करते है यात्रा।
दस साल से साईकिल जीवन से बाहर हुईं थी। अर्थात् फिर से एक नयी पहल करनी पडी। धीरे धीरे शरीर साईकिल से जुडता गया। थोडे अभ्यास के पश्चात् एक दिन में पच्चीस किलोमीटर चलाई। हौसला बढा। फिर एक दिन चालिस किमी दूरी पूरी की। आते समय पैर भारी जरूर हो गए थे। पर हौसला और बढा।
अब बारी है टूर द गोदावरी की! अर्थात् घर से करीब ३२.५ किमी दूर गोदावरी के तट की सैर- परभणी (मध्य महाराष्ट्र) से गंगाखेड इस तहसील से आठ किलोमीटर पहले तक। जाने और आने के बाद कुल दूरी है ६५ किमी। साईकिलयात्रियों के लिए चुनौतिपूर्ण बिल्कुल भी नही है। पर नौसिखिए के लिए निश्चित एक हौसला देनेवाली यात्रा है। तो शुरू हुआ यह सफर।
हमारे लोगों की सोच अभी भी काफी स्थितिशील है। कितना भी कुछ कहिए, अभी कुछ भी उतना बदला नही है। सब कुछ वैसा ही है। रास्ते पर साईकिल और वह भी गिअर की साईकिल देख कर बच्चे चिल्लाते है, ‘वो देखो, गिअर वाली साईकिल!’ कुछ बच्चे तो साईकिल उठाते है और चक्कर लगाते है। शहर से जितने दूर जाओ, लोगों का अचरज बढता है। उन्हे कुछ अटपटा सा लगता है। इतनी दूर (हालांकि दूरी मात्र दस- बीस किलोमीटर ही हो) साईकिल पर? और उनके कौतूहल का जवाब भी उन्हें मिल जाता है- जरूर गिअर वाली होने के कारण यह खूब दौडती होगी। कुछ लोग तो नई चीज दिखने से कुछ ज्यादा ही उत्साहित होते हैं। एक ग्रामीण ने तो कहा, यह तो मोटरसाईकिल जैसी दौडती होगी। नई चीज दिखाई देने पर ऐसी प्रतिक्रिया! शायद वे अपनी सारी निराशाएँ, अपने सारे तनाव जैसे उसके सहारे व्यक्त करते है। उनको बडी बेसब्री से ऐसी चीज की तलाश है जो उन्हे सहारा देगी। इसलिए एक छोटी सी; पर नई चीज दिखाई पडने पर उनकी प्रतिक्रियाएँ उस चीज के बारे में कम और उनकी सोच के बारे में ज्यादा बताती है। खैर।
यात्रा सुबह साढेसात बजे शुरू की। पहले पाँच किलोमीटर काफी संघर्षपूर्ण थे। ऐसा लगा की आगे जाया ही नही जा सकेगा। एक धाबे पर रूक कर कॉफी पी। धाबा भी ऐसा जिसमें सिर्फ कॉफी थी। कुछ देर विश्राम किया। फिर निकला। धीरे धीरे चलता गया। और अब चलना आसान भी लगने लगा। शायद सुबह नीन्द से उठा और निकला; तो शरीर इतना ढिला नही था। जाहिर है, रात भर की नीन्द में शरीर थोडा सख्त हो जाता है। इसलिए शुरू में शरीर ने विरोध जताया। लेकिन अब पाँच किलोमीटर के बाद शरीर भी ढल गया है। अब वह मना नही कर रहा। बस चलना है। और आगे जाना है। जीपीएस से गति देखी; तो करीब पन्द्रह- सोलह किमी प्रति घण्टा थी। ठीक थी।
रास्ता तो सीधा है। कोई बडी चढाई या पहाड़ नही हैं। पर बीच बीच में आनेवाली छोटी चढाई भी दिक्कत खडी करती है। वहाँ जाना कठिन लगता है। पर यह भी जेहन में होता है कि इस चढाई के बाद ढलान आनेवाली है। उसके बारे में सोचते हुए और इधर उधर देखते हुए चढाई निकल जाती है और फिर ढलान! इस तरह से एक बार शरीर साईकलिंग के टेम्पो में आ जाता है। फिर क्या कठिनाई? बस चलते रहो। चढाई के बाद ढलान भी आएगी ही! लोगों की मुस्कान ऊर्जा से भर देती है।
थोडी देर में नाश्ते के लिए रूका। नाश्ते में कुछ वक्त था। और अधिक विश्राम हो गया। पैरों को आरामदायक स्थिति में छोड दिया। होटल छोटा सा ही था। और जाहिर है वहां थोडा कूडा था, गन्दगी भी थी। ऐसे समय होटल में आए दूसरे एक ग्राहक की रिंगटोन पर म्युझिक और फिर गाना बजा, ‘होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है....’ और जगजीत जी के इन स्वरों से उस स्थिति में भी एक अद्भुत माहौल बन गया! एकदम से स्थानांतरण ही हो गया। रिंग टोन तो आरम्भिक संगीत के साथ ही बन्द हुईं, पर स्मृति के आधार पर पूरे गाने का लुफ्त उठाया। और फिर दूसरे गाने मन ही मन सुने।
जीवन में हम कई तरह के रास्तों से गुजरते हैं। रास्ते में कुछ यात्रीयों से मुलाकात होती है। ऐसे ही एक अपूर्व यात्री है श्री. नीरज जी जाट। खुद को ‘घूमक्कड’ कहलाने वाले नीरज जी वास्तव में ‘मॅन वर्सेस वाईल्ड’ की भारतीय आवृत्ति हैं! उन्होंने अब तक देश के लगभर हर राज्य में अनगिनत बार घूमक्कडी की है। हिमालय (उत्तराखण्ड, हिमाचल तथा जम्मु- कश्मीर- लदाख) में सैकडों बार दुर्गम क्षेत्रों में घूमक्कडी की है। वे है ही मुसाफीर। लेकिन मुसाफिर कितनी अद्भूत ऊँचाई के! हाल ही में उन्होने साईकिल से मनाली- लेह और लेह- श्रीनगर महायात्रा की। उनकी अद्भुत तथा अविश्वसनीय दास्तां यहाँ पढी़ जा सकती है। उनसे कुछ अलग तरिके से जीने की प्रेरणा मिलती है। वे हर संवेदनशील इन्सान को आवाहन करते हैं और आह्वान भी देते हैं।
उनकी साईकिल यात्रा देख रहा नही गया और एक दिन साईकिल ले आया। पहाड का शौक तो है हि। पहाड जा कर आया हुँ और जाने की इच्छा है हि। पेट्रोल के दाम तो पहाड से भी अधिक ऊँचाईयों को छू रहे है। इस स्थिति में साईकिल एक सशक्त विकल्प के रूप में सामने आती है। साईकिल कई मायनों में उपयोगी है। एक तो इन्धन खर्चे की बचत। यह एक अच्छा व्यायाम भी है। तथा इससे हमारे जीवन का नियंत्रण करनेवाली तथाकथित आधुनिक जीवनशैली की बेहुदा रफ्तार को भी नियंत्रण में लाया जा सकता है। मंजिल से अधिक रोमांच सफर में आता है। तो फिर काहे को भेडचाल की तरह किसी छोटे मोटे लाभ की ओर दौडना? चलिए, एक साईकिल उठाते है और शुरू करते है यात्रा।
दस साल से साईकिल जीवन से बाहर हुईं थी। अर्थात् फिर से एक नयी पहल करनी पडी। धीरे धीरे शरीर साईकिल से जुडता गया। थोडे अभ्यास के पश्चात् एक दिन में पच्चीस किलोमीटर चलाई। हौसला बढा। फिर एक दिन चालिस किमी दूरी पूरी की। आते समय पैर भारी जरूर हो गए थे। पर हौसला और बढा।
अब बारी है टूर द गोदावरी की! अर्थात् घर से करीब ३२.५ किमी दूर गोदावरी के तट की सैर- परभणी (मध्य महाराष्ट्र) से गंगाखेड इस तहसील से आठ किलोमीटर पहले तक। जाने और आने के बाद कुल दूरी है ६५ किमी। साईकिलयात्रियों के लिए चुनौतिपूर्ण बिल्कुल भी नही है। पर नौसिखिए के लिए निश्चित एक हौसला देनेवाली यात्रा है। तो शुरू हुआ यह सफर।
हमारे लोगों की सोच अभी भी काफी स्थितिशील है। कितना भी कुछ कहिए, अभी कुछ भी उतना बदला नही है। सब कुछ वैसा ही है। रास्ते पर साईकिल और वह भी गिअर की साईकिल देख कर बच्चे चिल्लाते है, ‘वो देखो, गिअर वाली साईकिल!’ कुछ बच्चे तो साईकिल उठाते है और चक्कर लगाते है। शहर से जितने दूर जाओ, लोगों का अचरज बढता है। उन्हे कुछ अटपटा सा लगता है। इतनी दूर (हालांकि दूरी मात्र दस- बीस किलोमीटर ही हो) साईकिल पर? और उनके कौतूहल का जवाब भी उन्हें मिल जाता है- जरूर गिअर वाली होने के कारण यह खूब दौडती होगी। कुछ लोग तो नई चीज दिखने से कुछ ज्यादा ही उत्साहित होते हैं। एक ग्रामीण ने तो कहा, यह तो मोटरसाईकिल जैसी दौडती होगी। नई चीज दिखाई देने पर ऐसी प्रतिक्रिया! शायद वे अपनी सारी निराशाएँ, अपने सारे तनाव जैसे उसके सहारे व्यक्त करते है। उनको बडी बेसब्री से ऐसी चीज की तलाश है जो उन्हे सहारा देगी। इसलिए एक छोटी सी; पर नई चीज दिखाई पडने पर उनकी प्रतिक्रियाएँ उस चीज के बारे में कम और उनकी सोच के बारे में ज्यादा बताती है। खैर।
यात्रा सुबह साढेसात बजे शुरू की। पहले पाँच किलोमीटर काफी संघर्षपूर्ण थे। ऐसा लगा की आगे जाया ही नही जा सकेगा। एक धाबे पर रूक कर कॉफी पी। धाबा भी ऐसा जिसमें सिर्फ कॉफी थी। कुछ देर विश्राम किया। फिर निकला। धीरे धीरे चलता गया। और अब चलना आसान भी लगने लगा। शायद सुबह नीन्द से उठा और निकला; तो शरीर इतना ढिला नही था। जाहिर है, रात भर की नीन्द में शरीर थोडा सख्त हो जाता है। इसलिए शुरू में शरीर ने विरोध जताया। लेकिन अब पाँच किलोमीटर के बाद शरीर भी ढल गया है। अब वह मना नही कर रहा। बस चलना है। और आगे जाना है। जीपीएस से गति देखी; तो करीब पन्द्रह- सोलह किमी प्रति घण्टा थी। ठीक थी।
रास्ता तो सीधा है। कोई बडी चढाई या पहाड़ नही हैं। पर बीच बीच में आनेवाली छोटी चढाई भी दिक्कत खडी करती है। वहाँ जाना कठिन लगता है। पर यह भी जेहन में होता है कि इस चढाई के बाद ढलान आनेवाली है। उसके बारे में सोचते हुए और इधर उधर देखते हुए चढाई निकल जाती है और फिर ढलान! इस तरह से एक बार शरीर साईकलिंग के टेम्पो में आ जाता है। फिर क्या कठिनाई? बस चलते रहो। चढाई के बाद ढलान भी आएगी ही! लोगों की मुस्कान ऊर्जा से भर देती है।
थोडी देर में नाश्ते के लिए रूका। नाश्ते में कुछ वक्त था। और अधिक विश्राम हो गया। पैरों को आरामदायक स्थिति में छोड दिया। होटल छोटा सा ही था। और जाहिर है वहां थोडा कूडा था, गन्दगी भी थी। ऐसे समय होटल में आए दूसरे एक ग्राहक की रिंगटोन पर म्युझिक और फिर गाना बजा, ‘होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है....’ और जगजीत जी के इन स्वरों से उस स्थिति में भी एक अद्भुत माहौल बन गया! एकदम से स्थानांतरण ही हो गया। रिंग टोन तो आरम्भिक संगीत के साथ ही बन्द हुईं, पर स्मृति के आधार पर पूरे गाने का लुफ्त उठाया। और फिर दूसरे गाने मन ही मन सुने।
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| सूखे के बाद वर्षा से आई हुई कुदरती ताज़गी..... |
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| वर्षा से पूरे खेत में पानी भर गया है..... उपरवाला भी देता है तो छप्पर फाड के! |
...अब करीब करीब आधी दूरी पार हो गई थी। हालांकि रफ्तार बहुत ज्यादा नही थी, फिर भी कोई दिक्कत की बात नही थी। एक गॅरेज पर साईकिल हवा से रिचार्ज की। देखा तो साईकिल के टायर का नॉब बिलकुल मोटरसाईकिल जैसा है। बच्चों को और उत्तेजना का कारण बन गया! गॅरेजवाले ने हवा भरने के पैसे भी नही माँगे और न ही देने का ख्याल मुझे रहा। अरसा हो गया था साईकिल में हवा भर कर।
धीरे धीरे चढाई- उतराई करते करते गोदावरी नदी का तट सामने आ ही गया। खुशी की लहर दौडी। करीब बत्तीस किलोमीटर पूरे किए। वहाँ फिर कुछ देर विश्राम। नदी में राख से सोना निकालनेवाले लोगों से बातचीत की। वे भी दंग रह गए बत्तीस किलोमीटर साईकिल से आए हुए को देख कर। नदी के कुछ फोटो लिए। पैर फैला कर उन्हे नियंत्रण से मुक्त किया।
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| बारीश के पानी से ब्ढा हुआ जलस्तर |
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| साईकिल बाईक से कम नही है! |
वापस जाते समय कुछ खास दिक्कत नही हुईं। थकान के कारण गति जरूर कम हुईं थी। पर पीछली बार लौटते समय आखरी दस किलोमीटर का पडाव टेढी खीर था। उस वक्त पैरों ने और शरीर ने बिलकुल असहकार आन्दोलन किया था। इस बार शायद पैर भी थोडे आदि हो गए थे। थोडे अभ्यस्त हो गए थे। इसलिए वे चलते रहें। अब चला ही नही जा रहा, ऐसी स्थिति नही आईं। छोटे छोटे विश्राम करने जरूर पडें। पर रास्ता गुजरता गया। कुदरत ने बेहतर साथ निभाया। एक बूँद भी वर्षा नही हुईं। धीरे धीरे घर तक का रास्ता पार किया गया। कुल दूरी ६५ किलोमीट की लगभग सवा पाँच घण्टों में पार हो गई। उत्साह और बढा।
....यह साईकिल चलाने का अनुभव टेस्ट क्रिकेट के बल्लेबाजी के जैसे था। टेस्ट क्रिकेट में बल्लेबाजी करते समय आपको नयी गेन्द का सामना करना पडता है। करीब एक घण्टे तक नयी गेन्द से बचना पडता है। उस समय हालात बल्लेबाजों को अनुकूल नही होते हैं। लेकिन अगर यह वक्त सुरक्षित बिता ले, तो फिर धीरे धीरे हालात अनुकूल हो जाते है। आपका शरीर भी लय में आ जाता है। ऐसा ही अनुभव यहाँ आया। अर्थात् बाद में थकान के और फिर नयी ऊर्जा के पडाव भी आते हैं। गति भी कम होती है। पर आप यात्रा पूर्ण कर सकते हैं। एक दूसरी यात्रा पर निकलने के लिए......
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| पानी पानी रे..... |
इस साईकिल अभ्यास का एक उद्देश्य भी था। जल्द ही उत्तराखण्ड त्रासदी के पुनर्निर्माण कार्य में जुटी एक संस्था के साथ जाना है। वहाँ पहाड में कई गावों में चलना पडेगा। सामान पहुँचाना पडेगा। इसलिए शरीर के स्टॅमिना को थोडा तैयार करना पडेगा। उसे वॉर्म अप करना पडेगा। और शरीर पर एक सुखद सा तनाव जरूर महसूस हुआ। शरीर को कुछ अभ्यास मिल गया है। अब जाना है अगली यात्रा पर। उत्तराखण्ड के धारचुला परिसर में..........
Sunday, April 25, 2010
......... माणसाचे मोठेपण
पाऊलखुणा . . .
माणसाचे मोठेपण अनेकदा जवळ असण्यामुळे किंवा कुटुंबीय असण्यामुळे समजत नाही, हे किती खरे आहे. ह्याची प्रचिती आता येते आहे. तसेच माणूस समजून घेणे, हेही किती कठिण आहे, ते समजतं आहे. माझे आजोबा कै. नाना वेलणकरांबद्दल लोकांच्या आठवणी ऐकताना ही गोष्ट जाणवत राहते. त्यांच्या निर्वाणानंतर अनेकांकडून त्यांच्या आठवणी ऐकताना; त्या उत्तुंग व्यक्तीमत्त्वाची उंची जाणून घेताना जाणवतो तो अज्ञभाव. जवळचा, रोजचा असलेला माणूस समजून घेण्यामध्ये आपण किती कमी पडतो; ते लक्षात येतं.
नातवांच्या डोळ्यांपुढील आजोबांची प्रतिमा फारशी आकर्षक नाही. १९९९ नंतर वाढत जाणारे विस्मरण आणि वृद्धापकाळामुळे आलेले परावलंबन आणि शैथिल्य, हेच नजरेसमोर येते. कारण त्यांच्या खर्या कर्तृत्वाच्या साक्षीदार ह्याआधीच्या तीन पिढ्या आहेत. आजोबांना क्रिकेट आवडत असल्यामुळे क्रिकेटच्या भाषेत बोलायला आक्षेप नसावा. आमच्या समोर असलेली आजोबांची प्रतिमा म्हणजे एखाद्या मॅरॅथॉन इनिंगच्या शेवटच्या टप्प्यावरील स्थिती. त्यामुळे साहजिक त्यावरून त्या इनिंगचे मोजमाप करता येत नाही. पण जे आम्ही बघू शकलो नाही; ते काय होते; ते आता समजतं आहे. 86 वर्षे आयुष्य हे ते ८६रन्सच्या आणि ८६च्या स्ट्राईक रेटने खेळलेल्या इनिंगप्रमाणे जगले. ह्या जीवनाची व्याप्ती आणि खोली किती प्रचंड आणि गहिरी होती, हे समजून घेण्याचा आमचा प्रवास आता सुरू झाला आहे. अनेक प्रकारांमध्ये “the first of its kind” असे ते जगले. त्यांच्याकडून घेण्यासारखे प्रचंडच आहे. परंतु आमची जवाबदारी आता आहे, आता आमची वेळ आहे. जी ज्योत आमच्यापर्यंत येता येता मंदावली; किंवा अधिक योग्य शब्दांमध्ये आमची दृष्टी त्या ज्योतीची “प्रभा” समजण्याएवढी समर्थ नव्हती; त्या ज्योतीचा प्रकाश समजून घेऊन पुढे पुढे तेवत ठेवण्याचे कार्य आमच्यासमोर आहे. आणि म्हणून आता समोर येणारे आजोबांचे चरित्र हे पाऊलखुणांप्रमाणे आहे. पाऊलखुणा केवळ स्मृतीमय, रम्य आठवणी नसतात; त्यांमध्ये पुढील कार्याला दिशा देण्याची क्षमता असते. त्यांच्या आठवणी आम्हाला ती दिशा नक्कीच दाखवतील. ज्या गोष्टींसाठी, मूल्यांसाठी, लोकांसाठी आजोबा असे जगले; त्यांना अभिवादन!
त्यांच्या प्रेरक आठवणींमधील हा एक छोटासा भाग दै. लोकसत्ता आणि लेखक शेषराव मोहिते, ह्यांच्या सौजन्याने इथे सादर आहे -
नाना वेलणकर
शेषराव मोहिते
"प्रत्येक योगासनाचे फायदे काय, ते नाना एखादं स्तोत्र म्हणाल्यासारखं सांगत. त्यांचं घर आमचं हक्काचं झालं. कुठल्याही कामाचा कसला गाजावाजा नाही; त्यागाचा डांगोरा नाही..इतरांच्या विचारसरणीचा आदर करणे आणि त्याची त्याची जीवनशैली त्याच्या त्याच्या पद्धतीने अंगीकारून तशी वाटचाल करण्यास प्रोत्साहन देणे हा फार मोठा दुर्मिळ गुण नानांकडे होता."
... राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचे परभणीतील ज्येष्ठ कार्यकर्ते, कृषी महाविद्यालयाच्या देखण्या इमारतीचा आराखडा बनविणारे नाना वेलणकर यांचे अलीकडेच निधन झाले. एका सुहृदाची त्यांना ही आदरांजली..
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचे ज्येष्ठ कार्यकर्ते नाना वेलणकर यांच्या निधनाची बातमी सोमवारी वाचली. मनातून चरकलो. परभणीला ज्या ज्या वेळी जाणे होई, त्या त्या वेळी ठरविलेले असे की, या वेळी नानांच्या घरी जाऊन त्यांची भेट घ्यायची! पण प्रत्येक वेळी ते राहूनच गेले. ही बातमी वाचली आणि अपराधभाव मनात दाटून आला.
परभणीतील रामकृष्णनगरमधील नानांचं घर. शंकरनगर झोपडपट्टीला लागून. परभणीला शिकायला होतो तेव्हा माझं आणि माझ्यासोबतच्या आठ-दहा तरी मित्रांचं हक्काचं, कधीही मनाला वाटेल तेव्हा जाऊन नानांसोबत गप्पागोष्टी करीत बसण्याचं जिव्हाळ्याचं ठिकाण होतं. अनेक सैरभैर क्षणी आम्ही या घरात, घराच्या अंगणात एकत्र आलो होतो. संध्याकाळी गावातून फिरून येताना किंवा लंगडय़ा मावशीच्या मेसमधून जेवून येताना थोडी वाट वाकडी करून नानांच्या घरी जाऊन येणं हा आमचा परिपाठ होता.
नानांची आणि माझी ओळख कशी झाली? त्यांचे वय तर माझ्या वडिलांहून अधिक. संघाच्या कार्यकर्त्यांचे प्रत्येक तरुण पिढीतील कार्यकर्त्यांशी संबंध असतातच म्हणावे, तर माझ्या बाबतीत तेही खरे नव्हते. मी नानांच्या घरी जाई. त्यांच्याशी खूप वेगवेगळ्या विषयावर बोलणे होई. पण नानांनी मला कधी शाखेवर येण्याचे सुचविले नाही की आग्रह केला नाही.
मी पहिल्यांदा परभणीला कृषी विद्यापीठात शिकायला गेलो, तेव्हा दहावीच्या वर्गात असताना डास चावून झालेल्या हिवतापाने खूप अशक्त झालो होतो. विद्यापीठाच्या ‘हेल्थ सेंटर’मध्ये जाऊन सगळ्या तपासण्या केल्या. रक्त तपासलं, इंजेक्शनचा पंधरा दिवसांचा ‘कोर्स’ पूर्ण केला. तेव्हा थोडी तब्येत सुधारली. मग हळूहळू इतरांचं बघून जिम्नॅशियममध्ये जाऊन व्यायामास सुरुवात केली. माझ्या ‘धूळपेरणी’ या कादंबरीत या प्रसंगाचे चित्रण आले आहे. एके दिवशी पाहिलं तर जिम्नॅशियमच्या शेजारच्याच हॉलमध्ये कुणी तरी एक शिक्षक पांढरी हाफपँट आणि वरती पांढरा टी-शर्ट घातलेले. योगासनाचा वर्ग घेत होते. मी दारात उभा राहून आतलं ते दृश्य पाहत होतो. शिक्षकाच्या सूचनेनुसार आतील पन्नास-साठ मुलं एकाग्रतेनं आसनं करीत होती. आपणही आत जाऊन त्यांच्यात सामील व्हावं असं वाटायला लागलं. पण मन धजेना. मुलं तर आपल्याच हॉस्टेलची; पण हे योगासनं शिकविणारे ‘सर’ कोण आहेत माहीत नाही. वाटायलं, ‘जाऊ द्या, बळंनं कुठं घुसावं. आपण आपला रोजचा व्यायाम करून हॉस्टेलवर निघून जावं.’ पण त्या जागेवरून हलावसंही वाटेना.
दोन-तीन दिवस असेच गेले. एके दिवशी मी असाच त्या दारात उभा होतो आणि पाठीमागून येऊन कुणी तरी माझ्या खांद्यावर हात ठेवला. मी चमकून वळून पाहिले. प्रसन्न मुद्रेनं माझ्याकडं पाहत योगासनं शिकवायला येणारे ‘सर’ म्हणाले, ‘‘का रे! तू रोज दारात उभा राहून नुसता पाहातच असतोस. तुलाही यायचंय का योगासनं करायला?’’ मी थोडासा गोंधळून म्हणालो, ‘‘फी किती असते?’’ ते हसून म्हणाले ‘‘लेका, तुला मी फी घेतो म्हणून कुणी सांगितलं! चल, आजपासून तूही ये.’’
मला मनातून खूप आनंद झाला. तरी माझी भीड चेपायला खूप दिवस लागले आणि मग त्या योगासनाच्या वर्गाची आणि तो वर्ग घेणाऱ्या नाना वेलणकरांची कायमचीच साथसंगत जमली. नानांविषयी मी सगळ्या माझ्या बॅचमधल्या मुलांना सांगायला लागलो. तर किरण चालुक्य म्हणाला, ‘‘तुम्हाला माहिताय का? नाना वेलणकर संघाचे आहेत आणि त्यांची दोन मुलं सध्या आणीबाणीत आर.एस.एस.वर बंदी असल्याने मिसाखाली जेलमध्ये आहेत.’’ मला तेव्हा संघाविषयी काही फारशी माहितीच नव्हती. तेव्हा मी म्हणालो, ‘‘म्हणजे ग्रेटच की राव!’’ तर किरण म्हणाला, ‘‘म्हणजे तुम्हाला काहीच माहिती नाही असं दिसतंय अजून.’’ मी गप्प बसलेला बघून किरण आणखी म्हणाला, ‘‘तुम्ही एक गोष्ट लक्षात ठेवा. तिकडं संघाच्या शाखा भरविण्यावर बंदी आहे म्हणून इकडं हे योगासनाचे वर्ग घे, शिबिर घे असे उद्योग करीत आहेत. उद्या आणीबाणी उठली की तुम्हालाही संघाच्या शाखेवर बोलावतील. मी अधिक काही बोलत नाही. पण त्यांच्या फार नादी लागू नका. शेवटी तुमची मर्जी!’’
किरण, प्रवीण माझे पाटर्नर. किरणचे वडील आधी शेतकरी कामगार पक्षाचे आमदार. जिल्हा बँकेचे अध्यक्ष. काँग्रेसमध्ये. प्रवीणचे वडील तर पंधरा वर्षांपासून काँग्रेसचे आमदार. इथं आल्यापासून मी किरणनं सांगितलेली कुठलीही गोष्ट ओलांडून मनानं काही करीत नव्हतो. पण योगासनाच्या वर्गाबाबत त्याचं मी काहीही ऐकायचं नाही असं ठरवलं. एक तर त्या संघाबिंघाचं आपल्याला काही फारसं देणं-घेणं नाही आणि नाना वेलणकर योगासनं शिकविताना प्रत्येक आसनाचे फायदे काय काय आहेत ते इतक्या लयदारपणे, एखादं स्तोत्र म्हणाल्यासारखं सांगत की ते नुसतं ऐकतच राहावं वाटे.
नंतर आणीबाणी उठली. आम्ही कृषी विद्यापीठात छात्र युवा संघर्ष वाहिनीची शाखा सुरू केली. त्यात नानांनी हिरीरीनं भाग घेतला. मग आम्ही हक्कानं नानांच्या घरी जायला लागलो. ते कधी हॉस्टेलवर यायला लागले. मग हे नेहमीचंच झालं. पुढे शेतकरी संघटनेची चळवळ झंझावातासारखी आली. आंदोलनं, लाठय़ा, काठय़ा, जेल, सभा, मेळावे, अधिवेशनं हे करून दमून भागून आलं की, नानांचं घर हे हक्काचं, विसाव्याचं, सुख-दु:खं बोलून हलकं करण्याचं ठिकाण झालं.
नानांची मुलगी वासंती. आमच्याबरोबर नेहमी वादविवाद, वक्तृत्व स्पर्धाना शिवाजी महाविद्यालयाकडून असायची. तिचं पदवीपर्यंतचं शिक्षण झालं आणि तिने मध्य प्रदेशमधील आदिवासी विभागात दोन वर्षे जाऊन राहण्याचा निर्णय घेतला. नानांनी इतक्या सहजपणे संमती दिली की आम्ही आश्चर्यचकित झालो. आधीच एक मुलगा आसाममध्ये असाच पूर्ण वेळ काम करायला गेलेला. कृषी विद्यापीठात आम्ही वासंतीचा सत्कार करून निरोप दिला.
नानाजी देशमुखांच्या उत्तर प्रदेशमधील गोंडा जिल्ह्य़ातील कामाविषयी आणि दीनदयाळ संस्थेविषयी नानांची आस्था अधिक. दोन-चार वेळा त्यांनी नानाजींशी माझी भेट घडवून आणली. कदाचित बीड जिल्ह्य़ात नानाजी देशमुख जे काम करू इच्छित होते, त्यात मी सहभागी व्हावं असं नाना वेलणकरांना मनातून कुठे तरी वाटत असावं. पण माझी विचार करण्याची पद्धत, शेतकरी संघटनेचं माझं काम, त्या संघटनेतील माझं स्थान याविषयी त्यांना पूर्ण कल्पना होती. म्हणूनच वयाचं खूप मोठं अंतर बाजूला सारून ते माझ्याशी सदैव मित्रत्वाच्या नात्यानेच वागले. इतरांच्या विचारसरणीचा आदर करणे आणि त्याची त्याची जीवनशैली त्याच्या त्याच्या पद्धतीने अंगीकारून तशी वाटचाल करण्यास प्रोत्साहन देणे हा फार मोठा दुर्मिळ गुण नानांकडे होता.
संघाची सर्व मोठी माणसं तेव्हा परभणीत आली म्हणजे नानांकडेच थांबत. त्या काही जणांची बौद्धिकंही आम्ही ऐकली. पण जे मनाला पटले नाही ते स्वच्छ आणि स्पष्ट शब्दात नानांना आम्ही सांगत असू. तेही तितक्याच खेळकरपणे प्रतिवाद करीत. पण शक्यतो मतभेदांच्या मुद्दय़ांपेक्षा सहमतीच्या मुद्दय़ावर काय करता येईल याचाच नेहमी विचार करीत असत.
नाना पेशाने इंजिनीअर. नागपूरच्या खरे आणि तारकुंडे या बांधकाम व्यावसायिकांनी १९६०मध्ये परभणीच्या कृषी महाविद्यालयाच्या इमारतीच्या बांधकामाची सुरुवात केली, तेव्हा या बांधकामाचे स्थापत्य अभियंता म्हणून नारायण गोविंद वेलणकर परभणीत दाखल झाले आणि नंतर ते ‘नाना’ या नावानेच ओळखले जाऊ लागले. कृषी महाविद्यालयाची एवढी देखणी इमारत आणि त्या इमारतीचा आराखडा नानांनी बनविला होता, हे त्यांनी आम्हाला कधी सांगितलं नाही आणि त्यांचं निधन होईपर्यंत आम्हाला माहीतही नव्हतं. नानांनी आयुष्यभर केलेल्या अनेक कामांचेदेखील असंच असण्याची शक्यता आहे. कामाचा कसला गाजावाजा नाही; त्यागाचा डांगोरा नाही.
आता जेव्हा केव्हा परभणीला जाणे होईल तेव्हा नानांच्या घरी निश्चित जाईन. पण तिथे प्रसन्न चित्ताने हसून स्वागत करायला नाना असणार नाहीत. ही रुखरुख कायमची राहून गेली. दुसरी एक रुखरुख मनाला सतावते आहे. नाना तुम्ही संघाचे होता; आयुष्यभर संघाचेच राहिलात म्हणून तुमच्या कार्याचे नीट मोजमापच झाले नाही की काय? मनात येऊन जाते अशी एक शंका. त्याची खंत बाळगण्याचा तुमचा स्वभाव नव्हता हे मला माहीत आहे. पण तुम्ही गेल्यावर तरी तुमचे मोठेपण आम्हाला कळो! अपेक्षा एवढीच.
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