८: जालना- सिंदखेडराजा
योग साईकिल यात्रा का सांतवा दिन, १७ मई की सुबह| आज सिर्फ ३४ किलोमीटर दूर होनेवाले सिंदखेड राजा जाना है, इसलिए थोड़ी देर से निकला| निकलते समय जालना शहर में चलनेवाले दो योग वर्गों के साधकों से मिला| हर रोज कुछ साधक इन स्थानों पर योग करते हैं| उनसे मिल कर आगे बढ़ा| जालना के कुछ साधक मुझे विदा करने के लिए भी आए| अब एक तरह से यह यात्रा समापन की ओर बढ़ रही है| आज सांतवा दिन, इसके बाद सिर्फ चार दिन रहेंगे| लेकीन हमारा मन कितना दौड़ता है! आज सांतवा दिन शुरू भी नही हुआ कि मन तो पहुँच गया वापस! साईकिल चलाते समय भी मन दौड़ता रहता है| बहुत कम बार, बड़ी मुश्कील से वह साईकिल पर रूकता है और सिर्फ उस क्षण को देख पाता है| स्पीड, टारगेट, समय सीमा आदि के बारे में सोचे बिना बहुत मुश्कील से मन वर्तमान क्षण में ठहरता है| लेकीन इसी का नाम तो ध्यान है! एक समय कोई भी गतिविधि अगर पूर्ण रूपेण करते हैं, तो वह ध्यान बन जाता है| चाहे वह साईकिलिंग ही क्यो ना हो| लेकीन यह उतना ही कठीन भी है, क्यों कि हमारा मन बहुत जटिल होता है; उसके अक्सर अलग- अलग टुकड़े होते हैं| उन खण्ड- खण्डों को इकठ्ठा लाने का नाम तो ध्यान है| खैर|


योग साईकिल यात्रा का सांतवा दिन, १७ मई की सुबह| आज सिर्फ ३४ किलोमीटर दूर होनेवाले सिंदखेड राजा जाना है, इसलिए थोड़ी देर से निकला| निकलते समय जालना शहर में चलनेवाले दो योग वर्गों के साधकों से मिला| हर रोज कुछ साधक इन स्थानों पर योग करते हैं| उनसे मिल कर आगे बढ़ा| जालना के कुछ साधक मुझे विदा करने के लिए भी आए| अब एक तरह से यह यात्रा समापन की ओर बढ़ रही है| आज सांतवा दिन, इसके बाद सिर्फ चार दिन रहेंगे| लेकीन हमारा मन कितना दौड़ता है! आज सांतवा दिन शुरू भी नही हुआ कि मन तो पहुँच गया वापस! साईकिल चलाते समय भी मन दौड़ता रहता है| बहुत कम बार, बड़ी मुश्कील से वह साईकिल पर रूकता है और सिर्फ उस क्षण को देख पाता है| स्पीड, टारगेट, समय सीमा आदि के बारे में सोचे बिना बहुत मुश्कील से मन वर्तमान क्षण में ठहरता है| लेकीन इसी का नाम तो ध्यान है! एक समय कोई भी गतिविधि अगर पूर्ण रूपेण करते हैं, तो वह ध्यान बन जाता है| चाहे वह साईकिलिंग ही क्यो ना हो| लेकीन यह उतना ही कठीन भी है, क्यों कि हमारा मन बहुत जटिल होता है; उसके अक्सर अलग- अलग टुकड़े होते हैं| उन खण्ड- खण्डों को इकठ्ठा लाने का नाम तो ध्यान है| खैर|