Friday, July 19, 2013

Tour de Godavari!

कहते है जीवन यह एक निरंतर चलनेवाली यात्रा है। पडाव कई हो; यात्रा निरंतर चलती है। कई बार हम पडावों को मंजिल भी समझ लेते है। परन्तु सच्चाई यही है कि जीवन की यात्रा हमेशा निरंतर चलती है।

जीवन में हम कई तरह के रास्तों से गुजरते हैं। रास्ते में कुछ यात्रीयों से मुलाकात होती है। ऐसे ही एक अपूर्व यात्री है श्री. नीरज जी जाट। खुद को ‘घूमक्कड’ कहलाने वाले नीरज जी वास्तव में ‘मॅन वर्सेस वाईल्ड’ की भारतीय आवृत्ति हैं! उन्होंने अब तक देश के लगभर हर राज्य में अनगिनत बार घूमक्कडी की है। हिमालय (उत्तराखण्ड, हिमाचल तथा जम्मु- कश्मीर- लदाख) में सैकडों बार दुर्गम क्षेत्रों में घूमक्कडी की है। वे है ही मुसाफीर। लेकिन मुसाफिर कितनी अद्भूत ऊँचाई के! हाल ही में उन्होने साईकिल से मनाली- लेह और लेह- श्रीनगर महायात्रा की। उनकी अद्भुत तथा अविश्वसनीय दास्तां यहाँ पढी़ जा सकती है। उनसे कुछ अलग तरिके से जीने की प्रेरणा मिलती है। वे हर संवेदनशील इन्सान को आवाहन करते हैं और आह्वान भी देते हैं।



  
                                                                                                                                                         
उनकी साईकिल यात्रा देख रहा नही गया और एक दिन साईकिल ले आया। पहाड का शौक तो है हि। पहाड जा कर आया हुँ और जाने की इच्छा है हि। पेट्रोल के दाम तो पहाड से भी अधिक ऊँचाईयों को छू रहे है। इस स्थिति में साईकिल एक सशक्त विकल्प के रूप में सामने आती है। साईकिल कई मायनों में उपयोगी है। एक तो इन्धन खर्चे की बचत। यह एक अच्छा व्यायाम भी है। तथा इससे हमारे जीवन का नियंत्रण करनेवाली तथाकथित आधुनिक जीवनशैली की बेहुदा रफ्तार को भी नियंत्रण में लाया जा सकता है। मंजिल से अधिक रोमांच सफर में आता है। तो फिर काहे को भेडचाल की तरह किसी छोटे मोटे लाभ की ओर दौडना? चलिए, एक साईकिल उठाते है और शुरू करते है यात्रा।

दस साल से साईकिल जीवन से बाहर हुईं थी। अर्थात् फिर से एक नयी पहल करनी पडी। धीरे धीरे शरीर साईकिल से जुडता गया। थोडे अभ्यास के पश्चात् एक दिन में पच्चीस किलोमीटर चलाई। हौसला बढा। फिर एक दिन चालिस किमी दूरी पूरी की। आते समय पैर भारी जरूर हो गए थे। पर हौसला और बढा।

अब बारी है टूर द गोदावरी की! अर्थात् घर से करीब ३२.५ किमी दूर गोदावरी के तट की सैर- परभणी (मध्य महाराष्ट्र) से गंगाखेड इस तहसील से आठ किलोमीटर पहले तक। जाने और आने के बाद कुल दूरी है ६५ किमी। साईकिलयात्रियों के लिए चुनौतिपूर्ण बिल्कुल भी नही है। पर नौसिखिए के लिए निश्चित एक हौसला देनेवाली यात्रा है। तो शुरू हुआ यह सफर।

हमारे लोगों की सोच अभी भी काफी स्थितिशील है। कितना भी कुछ कहिए, अभी कुछ भी उतना बदला नही है। सब कुछ वैसा ही है। रास्ते पर साईकिल और वह भी गिअर की साईकिल देख कर बच्चे चिल्लाते है, ‘वो देखो, गिअर वाली साईकिल!’ कुछ बच्चे तो साईकिल उठाते है और चक्कर लगाते है। शहर से जितने दूर जाओ, लोगों का अचरज बढता है। उन्हे कुछ अटपटा सा लगता है। इतनी दूर (हालांकि दूरी मात्र दस- बीस किलोमीटर ही हो) साईकिल पर? और उनके कौतूहल का जवाब भी उन्हें मिल जाता है- जरूर गिअर वाली होने के कारण यह खूब दौडती होगी। कुछ लोग तो नई चीज दिखने से कुछ ज्यादा ही उत्साहित होते हैं। एक ग्रामीण ने तो कहा, यह तो मोटरसाईकिल जैसी दौडती होगी। नई चीज दिखाई देने पर ऐसी प्रतिक्रिया! शायद वे अपनी सारी निराशाएँ, अपने सारे तनाव जैसे उसके सहारे व्यक्त करते है। उनको बडी बेसब्री से ऐसी चीज की तलाश है जो उन्हे सहारा देगी। इसलिए एक छोटी सी; पर नई चीज दिखाई पडने पर उनकी प्रतिक्रियाएँ उस चीज के बारे में कम और उनकी सोच के बारे में ज्यादा बताती है। खैर।

यात्रा सुबह साढेसात बजे शुरू की। पहले पाँच किलोमीटर काफी संघर्षपूर्ण थे। ऐसा लगा की आगे जाया ही नही जा सकेगा। एक धाबे पर रूक कर कॉफी पी। धाबा भी ऐसा जिसमें सिर्फ कॉफी थी। कुछ देर विश्राम किया। फिर निकला। धीरे धीरे चलता गया। और अब चलना आसान भी लगने लगा। शायद सुबह नीन्द से उठा और निकला; तो शरीर इतना ढिला नही था। जाहिर है, रात भर की नीन्द में शरीर थोडा सख्त हो जाता है। इसलिए शुरू में शरीर ने विरोध जताया। लेकिन अब पाँच किलोमीटर के बाद शरीर भी ढल गया है। अब वह मना नही कर रहा। बस चलना है। और आगे जाना है। जीपीएस से गति देखी; तो करीब पन्द्रह- सोलह किमी प्रति घण्टा थी। ठीक थी।

रास्ता तो सीधा है। कोई बडी चढाई या पहाड़ नही हैं। पर बीच बीच में आनेवाली छोटी चढाई भी दिक्कत खडी करती है। वहाँ जाना कठिन लगता है। पर यह भी जेहन में होता है कि इस चढाई के बाद ढलान आनेवाली है। उसके बारे में सोचते हुए और इधर उधर देखते हुए चढाई निकल जाती है और फिर ढलान! इस तरह से एक बार शरीर साईकलिंग के टेम्पो में आ जाता है। फिर क्या कठिनाई? बस चलते रहो। चढाई के बाद ढलान भी आएगी ही! लोगों की मुस्कान ऊर्जा से भर देती है।

  
थोडी देर में नाश्ते के लिए रूका। नाश्ते में कुछ वक्त था। और अधिक विश्राम हो गया। पैरों को आरामदायक स्थिति में छोड दिया। होटल छोटा सा ही था। और जाहिर है वहां थोडा कूडा था, गन्दगी भी थी। ऐसे समय होटल में आए दूसरे एक ग्राहक की रिंगटोन पर म्युझिक और फिर गाना बजा, ‘होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है....’ और जगजीत जी के इन स्वरों से उस स्थिति में भी एक अद्भुत माहौल बन गया! एकदम से स्थानांतरण ही हो गया। रिंग टोन तो आरम्भिक संगीत के साथ ही बन्द हुईं, पर स्मृति के आधार पर पूरे गाने का लुफ्त उठाया। और फिर दूसरे गाने मन ही मन सुने।

सूखे के बाद वर्षा से आई हुई कुदरती ताज़गी.....


वर्षा से पूरे खेत में पानी भर गया है..... उपरवाला भी देता है तो छप्पर फाड के!



































                    

 




                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                              
...अब करीब करीब आधी दूरी पार हो गई थी। हालांकि रफ्तार बहुत ज्यादा नही थी, फिर भी कोई दिक्कत की बात नही थी। एक गॅरेज पर साईकिल हवा से रिचार्ज की। देखा तो साईकिल के टायर का नॉब बिलकुल मोटरसाईकिल जैसा है। बच्चों को और उत्तेजना का कारण बन गया! गॅरेजवाले ने हवा भरने के पैसे भी नही माँगे और न ही देने का ख्याल मुझे रहा। अरसा हो गया था साईकिल में हवा भर कर।

धीरे धीरे चढाई- उतराई करते करते गोदावरी नदी का तट सामने आ ही गया। खुशी की लहर दौडी। करीब बत्तीस किलोमीटर पूरे किए। वहाँ फिर कुछ देर विश्राम। नदी में राख से सोना निकालनेवाले लोगों से बातचीत की। वे भी दंग रह गए बत्तीस किलोमीटर साईकिल से आए हुए को देख कर। नदी के कुछ फोटो लिए। पैर फैला कर उन्हे नियंत्रण से मुक्त किया। 



बारीश के पानी से ब्ढा हुआ जलस्तर



























साईकिल बाईक से कम नही है!





                                                                                                                                                     
वापस जाते समय कुछ खास दिक्कत नही हुईं। थकान के कारण गति जरूर कम हुईं थी। पर पीछली बार लौटते समय आखरी दस किलोमीटर का पडाव टेढी खीर था। उस वक्त पैरों ने और शरीर ने बिलकुल असहकार आन्दोलन किया था। इस बार शायद पैर भी थोडे आदि हो गए थे। थोडे अभ्यस्त हो गए थे। इसलिए वे चलते रहें। अब चला ही नही जा रहा, ऐसी स्थिति नही आईं। छोटे छोटे विश्राम करने जरूर पडें। पर रास्ता गुजरता गया। कुदरत ने बेहतर साथ निभाया। एक बूँद भी वर्षा नही हुईं। धीरे धीरे घर तक का रास्ता पार किया गया। कुल दूरी ६५ किलोमीट की लगभग सवा पाँच घण्टों में पार हो गई। उत्साह और बढा। 

....यह साईकिल चलाने का अनुभव टेस्ट क्रिकेट के बल्लेबाजी के जैसे था। टेस्ट क्रिकेट में बल्लेबाजी करते समय आपको नयी गेन्द का सामना करना पडता है। करीब एक घण्टे तक नयी गेन्द से बचना पडता है। उस समय हालात बल्लेबाजों को अनुकूल नही होते हैं। लेकिन अगर यह वक्त सुरक्षित बिता ले, तो फिर धीरे धीरे हालात अनुकूल हो जाते है। आपका शरीर भी लय में आ जाता है। ऐसा ही अनुभव यहाँ आया। अर्थात् बाद में थकान के और फिर नयी ऊर्जा के पडाव भी आते हैं। गति भी कम होती है। पर आप यात्रा पूर्ण कर सकते हैं। एक दूसरी यात्रा पर निकलने के लिए...... 



पानी पानी रे.....

























 













 


                                                                                                                     
इस साईकिल अभ्यास का एक उद्देश्य भी था। जल्द ही उत्तराखण्ड त्रासदी के पुनर्निर्माण कार्य में जुटी एक संस्था के साथ जाना है। वहाँ पहाड में कई गावों में चलना पडेगा। सामान पहुँचाना पडेगा। इसलिए शरीर के स्टॅमिना को थोडा तैयार करना पडेगा। उसे वॉर्म अप करना पडेगा। और शरीर पर एक सुखद सा तनाव जरूर महसूस हुआ। शरीर को कुछ अभ्यास मिल गया है। अब जाना है अगली यात्रा पर। उत्तराखण्ड के धारचुला परिसर में..........    




Sunday, April 21, 2013

ओशो: एक आकलन




ओशो! हाल ही में उनकी जीवनी पढने में आयीं। ओशो ने कभी किताबें नही लिखीं। उनकी कही जानेवाली किताबें उनके भाषणों का संग्रह है। इसी प्रकार उनकी जीवनी उनके कई हजार भाषणों में स्वयं के बारे में दिए गए कथन का संकलन मात्र है। यह एक तरह से बोली गयी जीवनी है जो कि १३०८ पृष्ठों में संकलित की गई है।

इस जीवनी को पढने का अनुभव अद्भुत है। ‘ओशो हमारी विचारधारा के विपरित है, वे गलत है अथवा वे मात्र सेक्स और ड्रग से ही सम्बन्धित है,’ ऐसा सोच कर हममें से कितने सारे लोग शायद ओशो को जानने से वंचित रह जाते होंगे। इसलिए इस जीवनी को पढने के पश्चात् मन में हुई प्रतिक्रियाओं को प्रस्तुत कर रहा हुँ। 

ओशो अथवा जो लोग उन्हे १९८९ के पूर्व जानते होंगे उनके लिए रजनीश.....  निश्चित रूप से एक असामान्य व्यक्तित्व।एक अलग किस्म के साधु अथवा संत। ओशो को जानने का प्रयास करते समय दिक्कत यह होती है, कि हम उन्हे अपने पूर्वग्रहों से बनाए गए दायरे में ही देखते है। और यह स्वाभाविक भी है। परंतु जैसे उनके बारे में आकलन बढता है, तब महसूस होता है, कि उनका व्यक्तित्व काफी व्यापक है। जैन परिवार में जन्मे वह जैन नही थे। भारत में जन्मे वह भारतीय नही थे। वरन् उनकी गरिमा इन सब मर्यादाओं से परे है।

अतीत में जैसे गुरू नानक साहाब और रामकृष्ण परमहंस जी ने जिस तरह का प्रयास किया था, कुछ उस तरह का परंतु उससे अधिक गहन तथा अधिक वैश्विक प्रयास ओशो ने किया। गुरू नानक और रामकृष्ण परमहंस ने हिंदु, मुस्लीम, ईसाई, बौद्ध आदि सभी धर्मों का सार तत्त्व निकाल कर उसे जोड कर एक सच्चे तत्त्व को प्रस्तुत करने का प्रयास किया था। इस दिशा में ओशो और आगे गए हुए प्रतीत होते है। उन्होने धर्म, सम्प्रदाय तथा परंपराओं के नाम पर संकुचित किए गए सार तत्त्व का एक अद्भुत संश्लेषण किया, उसे संग्रहित किया, उसे simplify एवम् amplify भी किया। आज की भाषा में, आज के इन्सान के लिए अनुकूल तरिके से विश्व के सामने रखा। भगवान बुद्ध ने जो बातें कही, वे यथार्थ है; पर उनके बाद पच्चीससौ साल बीत चुके है और मानव बदला है। यह ध्यान में रखते हुए उन्होने भगवान बुद्ध की बातों को आज के समय के अनुरूप सामने रखा। यही कार्य उन्होंने सभी धर्म, सम्प्रदाय तथा विचारधाराओं के साधु, संत तथा साक्षात्कारी व्यक्तियों के साथ किया। इसमें ख्रिश्चन, इस्लामी, बौद्ध, जैन, पारसी, सीख्ख और अन्य सभी मतों के महान व्यक्ति थे। वरन् संत पलटूदास, बोधिधर्म, अतिसा और भी कई ऐसे कई महान व्यक्ति थे, जिन्हे आज इतिहास की धूल ने हमारे नजरों से ओझल कर दिया है। उन्होने अज्ञात को ज्ञात तो किया ही, पर ज्ञात पर भी काफी प्रकाश डाला। 

ओशो की वाणि तथा उनका विवेचन सुनने योग्य है। उसका वर्णन शब्दों में करना ठीक नही होगा।

उनकी यह जीवनी उनके असामान्य जीवन को बारिकी से दर्शाती है। बचपन से ही वह तीक्ष्ण तथा दृढ प्रज्ञा के व्यक्ति थे। उनका बचपन, युवावस्था तथा आत्मसाक्षात्कार और फिर व्याख्याता और अध्यापक का कार्य विस्तार से बताया गया है। आचार्य के रूप में बीस साल तक देश में जनजागरण करने के पश्चात उन्हें उनके ‘अपने लोग’ मिल गए और उनके साथ उन्होने नव संन्यास आन्दोलन शुरू किया। पारंपारिक संन्यास जीवन  विरोधी था। उन्होने उस संन्यास के सभी कर्मकाण्ड तथा कालबाह्य तरिकों को छोड कर मात्र ध्यान पर आधारित तथा जीवन केन्द्रित संन्यास का समर्थन किया। वे खुद को कोई मसीहा, भगवान या कोई प्रेषित नही समझते थे। सभी व्यक्तियों के अन्दर बसे भगवान को पुकारने के लिए उन्होने खुद को भगवान कहना शुरू किया। खुद के आत्मसाक्षात्कार के अनुभव सामने रखे। वे समझाते है कि जैसे धर्मों में बताया गया है, वैसे आत्मसाक्षात्कार कोई सैकडों या हजार जन्मों के प्रयास का ही परिणाम नही है, अगर कोई चाहें तो इसी जीवन में स्वयं का साक्षात्कार कर सकता है। इस प्रकार उनका समस्त प्रतिपादन अनुठा और अपूर्व है और आज के समय के अनुकूल है। मूलत: वह जीवन विरोधी न हो कर जीवन केन्द्रित है। जीवन के सभी पहलूओं को स्वीकार करनेवाला है।

जैसे उनका कार्य बढता गया और नए नए ‘कम्युन’ बनते गए, वैसे राजनीतिक तथा धार्मिक सत्ताओं ने उनका विरोध करना शुरू किया। और यह स्वाभाविक भी था। क्यों कि बचपन से उन्हों ने इन लोगों के विरुद्ध जैसे युद्ध आरम्भ किया था। धर्मसत्ता (जिसमें सभी सम्प्रदाय एवम् परम्पराएँ शामील है) की स्थिति आज मूर्दाघर जैसी है, यह उनका कहना था। उन्होने धर्मसत्ता के अपराधों पर कठोर प्रतिपादन किया। सभी धर्मों के पण्डित और पुरोहित अपराधी है यह उनका कहना है। उन्होने पोप और अमरिका के उस समय के अध्यक्ष रेगन जैसे व्यक्तियों के बारे में भी कहा की वे बडे अपराधी है। एक आम आदमी के द्वारा यह कहा जाना नि:संशय काफी हिम्मत और वैचारिक प्रतिबद्धता का सूचक कहा जा सकता है।

उनके प्रबोधन के कारण लोगों का विश्वास दूर जाता हुआ देख कर राजनीतिक और धार्मिक सत्ताएँ बुरी तरह डर गईं और अमरिका में ओशो के कम्युन को नष्ट कर दिया गया। उन्हें काफी प्रताडना दे कर अमरिका से एक राजद्रोही जैसे निकाल दिया गया। अमरिकी सेना, पुलिस और सरकार उनके कार्य को रोकने के लिए ऐसे सामने आयी जैसे वह ओसामा जैसे किसी दुश्मन से लड रही हो। समूचे ख्रिश्चन जगत् एवम् अमरिका जैसी महासत्ता से ओशो की टक्कर वाकई पढने लायक है। एक अकेले जागे हुए इन्सान का भय इतनी महान सत्ता भी सह नही सकती इसका वह प्रमाण है। बुरी तरह पीडा दे कर और प्रजातंत्र के नाम के नीचे शैतानी ताकत के द्वारा कुचल कर और अंत में विषबाधा कर ओशो को अमरिका ने बाहर कर दिया। और फिर किसी भी देश में उनके कार्य को काफी समय तक ठीक चलने नही दिया। सोए हुए लोगों में इतना भय और इतना विलक्षण प्रभाव एक जागा हुआ इन्सान उत्पन्न कर सकता है, यह विश्व ने देखा। 


असामान्यता और अपने समय से आगे होने का एक परिणाम यह भी होता है, कि प्रचलित तथा पारंपारिक नजरें ऐसे अविष्कार का आकलन करने में असमर्थ होती हैं। जो कोई उन्हे अपने अपने नजरिए से देखता है और कही न कही उनको देखते समय पूर्व परम्परा से बनी धारणाएँ चरमराती हैं। इसकी एक प्रतिक्रिया तो रचनात्मक और नम्र हो सकती है कि चलिए, देखें इस इन्सान को जो हमारा सब कुछ हिला के रख दे रहा है। और दुसरी प्रतिक्रिया तो नकारात्मक होती ही है। जब भी हमें कुछ अलग दिखता है, तब हम उसे सकारात्मक नही तो नकारात्मक तरिके से देखते है। ओशो के साथ यही हुआ और यही हो रहा है। उनके अपूर्व विचारों को समझना आसान नही है और इसलिए ‘वह हमारी विचारधारा के विपरित है, मात्र सेक्स और ड्रग्ज के समर्थक है’ ऐसे पूर्वग्रहों में कई लोग फंस जाते है।

ओशो कहते है, उनका कार्य ऐसा है, कि वह हृदय को हिला के रख देगा। एक तो अत्यंत अनुकूल प्रतिक्रिया आएगी या फिर अत्यंत प्रतिकूल प्रतिक्रिया आएगी। या तो लोग उन्हे सुनते और देखते ही प्रभावित होंगे या फिर तिरस्कार करने लगेंगे। ओशो कहते है, यही उनकी ताकत है। प्रेम हो या तिरस्कार हो, हृदय से संवाद जरूर होगा। और यदि तिरस्कार भी कोई करता है, तो भी वह उनकी प्रक्रिया का भाग बन रहा है। क्यों कि तिरस्कार होने के कारण ऐसा व्यक्ति और कुछ लोगों के सामने उनके बारे में टिप्पणि करेगा और उससे कुछ और लोगों में उनके बारे में कौतुहल निर्माण होगा। ओशो कहते है, कि उनके साथ या तो आस्था या फिर तिरस्कार ये ही दो विकल्प है और मूलत: दोनो उनके कार्य के लिए अनुकूल है। उपेक्षा या अनास्था को अवसर है हि नही।

ओशो के बारे में कुछ जानना हो तो सबसे सही तरिका शायद उनके कुछ व्याख्यानों को पहले सुनना है। पूर्वग्रह और पहले के विचार जरूर होंगे, पर उन्हे थोडा दूर रख कर यदि हम उनके कुछ व्याख्यान सुनते है, तो शायद हम उनके विचारों के वैभव का रस ग्रहण कर सकेंगे। 

ओशो का सन्देश या उनका विचार संक्षेप में क्या है? वे यह नही कहते है कि मुझे एक गुरू की भाँति या एक पूजनीय प्रेषित की भाँति देखिए। मै एक मित्र जैसा हुँ जो आपको मात्र राह दिखा रहा हुँ। वे यह भी कहते है, कि मुझे मित्र भी मत कहिए, क्यों कि मित्र कहने से भी कुछ आसक्ती निर्माण होगी। वे कहते है, कि मै तो मात्र एक अंजान राही हुँ, जो आपको मात्र रास्ता दिखा रहा हुँ। मुझमें आसक्त या मुझे देखते रहने से अच्छा है कि आप मेरे द्वारा अनुभव लिए गए रास्ते पर आगे चलिए। 



WITNESSING




उनका जीवन सन्देश संक्षेप में कहना हो तो साक्षीभाव या जागरूकता कहा जा सकता है। वे कहते है, कि सब कुछ त्यागने की या जीवन को छोडने की आवश्यकता नही है। आवश्यकता जागने की है, साक्षी और सजग हो कर द्रष्टा बनने की है।

अधिक जानकारी

१.     उनके हिन्दी तथा अंग्रेजी व्याख्यान यहाँ नि:शुल्क उपलब्ध है।
२.     उनकी जीवनी यहाँ से डाउनलोड की जा सकती है।   


Sunday, January 6, 2013

अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: - २ नदीयाँ पहाड़ झील और झरने जंगल और वादी


नदीयाँ पहाड़ झील और झरने जंगल और वादी

जब समूचे उत्तर- मध्य भारत में ठण्ड का प्रकोप बढ रहा है, तब हिमालय दर्शन की यात्रा को इस कथन द्वारा फिर देखने का प्रयास करते है. . . पिथौरागढ़ !! वाकई में वहाँ काफी अधिक ठण्ड का प्रकोप चल रहा होंगा। तपमान में इतनी गिरावट आयी है कि राजस्थान में माउंट अबू, चुरू जैसे स्थानों पर पारा शून्य के नीचे चला गया है. . . .
























महान पर्वत से निकलती हुई महान धारा- रामगंगा थल के पास 

































पिथौरागढ़! श्रीविष्णू के दूसरे अवतार अर्थात कूर्मावतार की भूमि- कूर्माञ्चल अर्थात् कुमाऊँ का एक महत्त्वपूर्ण स्थान! पिथौरागढ़ में एक दिन रुकना था। महाराष्ट्र से आरम्भ हुई दो दिन की यात्रा में विराम था। वहाँ की ठण्ड बर्फबारी के इलाकों की ठण्ड सहने के लिए वाकई अच्छा अभ्यास दे रही थी। भला हिमालय के शिखरों में जाने का पूर्वाभ्यास इससे और अच्छा कैसे हो सकता था। एक बात और अलग थी। देश के मध्य भाग में वैसे तो सर्दी के दिनों में भी शाम को सात बजे तक रोशनी होती है। दिल्ली से आते हुए देखा था कि वहाँ तो साढे पाँच को ही अंधेरा छाने लगा था। और पिथौरागढ़ में तो और जल्दी दिन खतम हो गया। शाम के पाँच बजने तक ही लग रहा था की रात हो गई। इस हिसाब से कुमाऊँ मध्य भारत से तीन घण्टे आगे चल रहा है, ऐसा प्रतीत हो रहा था!

यहाँ से अब वास्तविक यात्रा का आरम्भ होना था। जाना था जोशीमठ से आगे बद्रीनाथ की ओर! जहाँ तक रास्ता साथ दे वहाँ तक। जोशीमठ के आसपास के कुछ स्थान देखने की योजना भी बनाई थी। जोशीमठ से पास में औली नाम का एक हिलस्टेशन है। उसे भारत के स्किइंग का सबसे अव्वल स्थान माना जाता है। अभी जनवरी २०१३ में वहाँ आशियायी पर्वतीय खेल भी होने है। औली के बारे में और जानने के लिए एक अनुठे पर्यटक तथा देशप्रेमी मुसाफिर का यह ब्लॉग पढा जा सकता है। इसी ब्लॉग से जानकारी ले कर औली के बारे में सोचा था। पर हम जो सोचते है, वैसा होता नही है और जो होता है वह तो बिना सोचे हो जाता है! खैर, पिथौरागढ़ से निकलने के समय तक तो सब कुछ पूर्वानुमान के अनुसार ही हो रहा था।

कडकडाती ठण्ड में सुबह पाँच बजे निकल कर रोडवेज बस अड्डे का रास्ता पकड लिया। एक ट्रकवाले भाईसाहाब ने लिफ्ट भी दे दी। और बस अड्डे पर बस भी तैयार खडी़ थी। बस के वाहक या खलासी थल मुवानी बागेश्वरकह कर पुकार रहे थे। वैसे तो यह बस बडी़ अजीब सी थी। एक साथ तीन रास्तों की वह बस थी। एक रास्ता था थल से मुनिसयारी तक। एक दिन पूर्व ही पढा था कि मुनिसयारी के चोटियों पर ही नही, वहाँ के बजार में भी बर्फबारी हुई है। तो इस बस का एक मार्ग था मुनिसयारी की ओर। दूसरा मार्ग थल से अलग होनेवाला था। थल जा कर यह बस फिर मुवानी, बागेश्वर, हल्द्वानी के रास्ते दिल्ली तक का लम्बा सफर करनेवाली थी। करीब करीब कहिए कि जैसे ट्रेन के दो दो रूट होते है, वैसे ही इस बस के भी थे। इसीलिए सीधे बागेश्वर का टिकट भी नही दिया। पहले थल तक का ही टिकट दिया।

फिर सुबह- या रात के अन्तिम प्रहर के मध्य में कहिए- साढे़ पाँच बजे बस निकली। अच्छी संख्या में यात्री साथ थे। सभी ठण्ड के लिए पुरजोर तैयारी किए हुए। जैसे बस निकली, वैसे ही बस में महफिल शुरू हुई। पर यह महफिल भी समय के अनुरूप थी। भोले बाबा के प्रदेश की यात्रा हो तब साथ में भोले के ही गीत होंगे ना! फिर गीतों की मालिका शुरू हुई। भगवान शिव, ताण्ड़व नृत्य कथा, देवी पार्वती द्वारा श्रीराम की परीक्षा लिए जाने की कथा आदि शुरू हुआ।





























सोमेश्वराय शिव सोमेश्वराय हर हर भोले नम: शिवाय!!
 
जरा लगना भी चाहिए ना की पहाडों की और भोले बाबा के प्रदेश की सैर हो रही है!

अंधेरे में ही पिथौरागढ़ के किनारे पर स्थित आयटीबीपी केन्द्र पार किया। सामने नजारा शुरू हुआ। पर अभी रात्रि का अन्तिम प्रहर अपनी चरम सीमा पर था। करीब डेढ घण्टे के पश्चात् बुंगाछीना से आगे आने पर रोशनी आई। युँ कहिए कि कुछ कुछ दिखने लगा। आगे से जो नजारा शुरू होता है, उसे शब्दों में कहना मुश्किल ही नही, नामुमकीन है!! नदियाँ पहाड़ झील और झरने जंगल और वादी! कुछ कहने के बजाय इन कुछ तस्वीरों को माध्यम बनाते है।

पहाड़ का क्या कहना! पहाड़ का हर बिन्दु है जैसे गहना!! यहाँ तो हर एक स्थान रमणीय है!!

रास्ते में रामगंगा नदी भी साथ चल आई। ऊँचे ऊँचे पहाडों के नीचे से गुजरती हुई धारा! इसी के तट पर बसा है थल। यहाँ से ॐ पर्वत और पास लग रहा था। फोटो खींचने का प्रयास किया, पर इतना ठीक नही आया।

 हम शायद मानस सरोवर नही देख सकते है, पर कम से कम ऐसा स्थान तो देख ही सकते है जहाँ से मानस सरोवर दिखता हो! थल गाँव का दृश्य। फोटो के मध्य में बस के ठीक उपर दिख रहा सफेद पर्वत ॐ पर्वत है।


थल से यात्रा फिर आगे चल पडी। अब दिन वास्तव में शुरू हुआ था। समय के अनुसार गाडी में बजनेवाले गीत भी बदले। पुराने हिंदी सिनेमा के गीतों की दूसरी अलग महफिल शुरू हुई। जो बात यहाँ पर है, कहीं पर नहीं! ऐसे पुराने जमाने के बेहतरीन गीत साथ निभा रहे थे। आगे एक जगह पर बिती रात हुई बरसात के कारण रास्ता बन्द हुआ था। रास्ते पर पत्थर गिरे थे। उन्हे निकालने का कार्य जारी था। पर उसमें लगनेवाले समय के कारण बस मूडी और फिर दूसरी तरफ से बागेश्वर की ओर चल पडी। 
























बस को रास्ता बदलना पडा

















































































































बस पलट कर बेरिनाग के पास से और चौकोडी घाट से जानेवाले रास्ते पर जाने लगी। लगातार एक से एक मनोरम नजारे दर्शन दे रहे थे। एक स्थान पर सामने केबिन (या युं कहिए बाल्कनी) में बैठे हुए लोगों ने अचानक देखा की बरफ गिर रही है। जी हाँ, चौकोडी घाट में बरफ गिर रही थी!! इसकी ऊँचाई २००० मीटर से अधिक है। और मौसम खराब होने से आयी हुई बारीश से यहाँ बर्फबारी हो रही थी। लेकिन बस न रूकने के कारण फोटो लिया नही जा सका। कुछ ही अन्तर में घाटी से नीचे उतरने पर बर्फ कम होती गई और पीछे रह गई। पहाड़ में रास्ते ऐसे ही है। एक पहाड़ चढिए, घाट से गुजरिए और फिर नीचे आ कर दूसरे पहाड़ को चढना शुरू किजिए। अर्थात् उपर जाने के लिए नीचे से ही जाना होगा। उपर जाने का रास्ता सीधा नही मिलेगा!

नजारें और ठण्ड के सर्द माहौल का लुफ्त मन तो काफी उठा रहा था, लेकिन फिर धीरे धीरे शरीर ने शिकायत करनी शुरू कर दी। बागेश्वर पहुँचते पहुँचते ठण्ड शरीर तक पहुँच गई थी। ठण्ड में ऐसा ही होता है। ठण्ड का असर थोडी देर बाद होता है। और तब मन और शरीर की प्रतिक्रियाएँ अलग अलग हो जाती है। बागेश्वर में शरयू नदी ने स्वागत किया। लेकिन बस अड्डा आगे था इसीलिए नदी को देखने का अवसर नही मिला।

बस से उतरने पर पहले चाय ढुँढा। ऐसे सर्द नजारों में चाय तो चाहिए ही। लेकिन बस अड्डे के पास दोनो तरफ चाय का होटल मिला ही नही। ग्यारह बज गए थे, इसीलिए सभी जगह में खाना ही था। ग्यारह बज तो गए थे, पर ऐसा लग रहा था कि अभी अभी सुबह हुई है! एक होटल में सब्जी रोटी ले ली और खाना आरम्भ किया। पर यह क्या? उंगलियाँ तो अकड सी गई है। खाने में बडी दिक्कत हो रही है! खाना पकड में ही नही आ रहा है। जैसे तैसे खाना मुँह में डाल दिया और फिर आगे जाने की बस ढुँढी। सीधे कर्णप्रयाग की बस तो अब नही थी। वैसे भी सीधे कर्णप्रयाग तक जाना था भी नही। जाना तो ग्वालदाम या बैजनाथ तक ही था। क्यों कि इस अद्भुत प्रदेश को थोडी सी गहराई में जा कर देखना था। बैजनाथ की प्राइवेट बस जल्द ही मिल गई। बागेश्वर से करीब बीस किलोमीटर दूरी पर बैजनाथ है। दोपहर का माहौल तो था नही, पर समय जरूर हुआ था। इसीलिए सोचा कि बैजनाथ में ही रुका जाए। और ग्वालदाम में रुकना महंगा होगा, यह बात भी पता चली थी।

बैजनाथ पहुँचने में ज्यादा समय नही लगा। वहाँ का मुख्य आकर्षण नागर शैली का मन्दीर समूह था। इसीलिए सह- यात्रियों से पूछताछ की। दो- तीन जनों से पूछ कर साफ साफ पता किया। लोग भी इतने सीधे और उम्दे थे, कि जैसे उतरने हेतु आगे जा कर खडा रहने के लिए चला, तो दो- तीन लोगों ने स्वयम् टिकिट निकालनेवाले वाहक या खलासी को बतायाँ, इसे ऐसा पूलिया के पहले उतार दो। कितने सरल और सीधे इन्सान!! प्रकृति से जुडा़व साफ तौर पर झलक रहा था . . .

बैजनाथ में उतरने के पश्चात शान्ति का अनुभव हुआ। पुलिया के ठीक पहले बस से उतरा। सामने से गोमती नदी बह रही थी . . . छोटा सा गाँव, भीड कम ही थी। शहर न होने के वजह से एक सरलता थी। यहाँ चाय भी तुरन्त मिल गई। वैसे तो पहाड़ में चाय में शक्कर के बजाय गूड़ या मिशरी का प्रयोग करते है। पर शहरी चाय ही पी ली। पास में ही मन्दीर था। चाय पिते हुए सभी जानकारी ले ली। कुमाऊँ मण्डल विकास निगम का सरकारी यात्री आवास भी दूर नही था।

गोमती के किनारे स्थित मन्दीर का दर्शन किया। फिर यात्री निवास जा कर सामान रख दिया। रात के रुकने का प्रबन्ध हो गया। फिर बैंजनाथ के दूसरे दो मन्दीरों को देखने के लिए वहीं घूमना हुआ। छोटा सा और शान्त पहाडी कस्बा! पूरा दृश्य वास्तव में रमणीय नजारा था। दूर बादलों की टोली नजर आ रही थी। बर्फवाले पहाड फिलहाल नीचले पहाडों के और बादलों के पीछे थे। इसके आगे शब्दों के बजाय ये तस्वीरें दृश्य का अनुभव करा देंगी। 


बैजनाथ में स्वागत करनेवाली गोमती. . . 



उत्तराखण्ड में कदम कदम पर पावन स्थान है. . . हर स्थान हर का है. . .



























इस मन्दीर के साक्ष्य में नजाने इस प्रवाहिता से कितना पानी गुजरा होगा . . . 








ये तो झाँकी है. . . .

लक्ष्मी नारायण मन्दीर











इतनी सुन्दर राह है, मन्जिल  तो कैसी होंगी. . .


भ्रामरी देवी का मन्दीर
























घडी में शाम के पाँच बजने को आए, फिर भी लग ही नही रहा था कि सुबह की दोपहर हुई और अब शाम भी होने लगी है। मानो यह प्रदीर्घ सुबह ही चल रही थी। अविस्मरणीय नजारें और सपने के गाँव का भली भाँति दर्शन कर अपरिहार्य चायपान का लुफ्त उठाया।  वहीं पर काफी सस्ती मूंगफली के सींग भी मिल गए। उत्तराखण्ड की पूरी यात्रा में हर जगह- रास्ते में- बस में- होटल में- इन मूंगफली ने दर्शन दिया और बडा साथ भी निभाया! जैसे यह दिन जल्द शुरू हुआ था, वैसे जल्द सीमटने भी लगा। साढे़- पाँच होते होते लग रहा था की पूरी रात हो गई है। यात्री आवास सुना था। दो- चार ही जने थे। उसमें से दो जन तो मन्दीर में मिल भी चुके थे। अकेले व्यक्ति को इतने दूर से देखने के लिए आते हुए देख कर उन्हे अचरज भी हुआ था। लेकिन जैसे ही रात का राज्य शुरू हुआ, बिस्तर ने आकर्षित किया और मध्य भारत के समय के करीब तीन घण्टे पहले ही दीपनिर्वाण कर लिया। लेकिन क्या समां था . . . . .     


























 
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