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Saturday, October 3, 2015

अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ९ ऋषीकेश से प्रस्थान

१. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: १ हिमालय की गोद में . . . 
२. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: २ नदियाँ पहाड झील और झरने जंगल और वादी  
३. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोS हिमालय: ३ चलो तुमको लेकर चलें इन फिजाओं में   
४. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोS हिमालय: ४ जोशीमठ दर्शन 
५. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ५ अलकनन्दा के साथ बद्रिनाथ की ओर    
६. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ६ औली जाने का असफल प्रयास और तपोबन यात्रा     
७. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ७ हिमालय की आज्ञा ले कर ऋषीकेश की ओर 
८. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ८ ऋषीकेश दर्शन
 

ऋषीकेश से प्रस्थान
२१ दिसम्बर सुबह जल्दी ऋषीकेश से ट्रेन लेनी है| ऋषीकेश से सुबह करीब सात बजे दिल्ली के लिए एक पॅसेंजर चलती है| इस ट्रेन से मुझे गाज़ियाबाद जंक्शन तक जाना है जहाँ परिवार के अन्य सदस्य मुझे मिल जाएंगे और वापसी की यात्रा शुरू होगी| ऋषीकेश स्टेशन यहाँ से करीब चार किलोमीटर दूर है| सोचा कि यह पैदल ही चलूँ| इस पूरी यात्रा में सम्भवत: चलने को प्राथमिकता दी थी, इसलिए आज भी पैदल चलना है| स्टेशन कितना दूर है, यह ठीक पता नही है, इसलिए सुबह सवा पाँच बजे ही निकला| बाहर बिल्कुल रात का अन्धेरा छाया है| 

धीरे धीरे चलने के कारण ठण्ड कम हुई| पीठ पर बड़ी सी बॅग है, इसलिए पसीना भी आया| थोड़ी देर में रोशनी फूटने लगी| लोग दिखने लगे| धीरे धीरे कोहरे से ढके पहाड़ भी दिखने लगे| आज इनसे विदा लेना है| मन में एक तरह की अशान्ति और इस बिरह के कारण खेद है| वाकई पिथौरागढ़ से शुरू हुई इस यात्रा में यहाँ तक बहुत कुछ देखने को मिला| इनकी स्मृतियाँ तो साथ रहेगी ही|

आगे जाने पर थोड़ी पूछ ताछ कर स्टेशन का रास्ता ढूँढ लिया| सुबह वातावरण में बड़ी ताजगी होती है| एक तो मानवीय उपद्रव न के बराबर होने के कारण प्रकृति अपने शुद्ध स्वरूप में मिलती है| पँछियों की चहचहाट, ताज़ा हवा, पेडों की सरसराहट और शीतल ठण्ड! जल्दी निकलने का लाभ मिला- टिकिट के पास कोई भीड़ नही है| टिकिट निकाल कर प्लॅटफॉर्म में गया| यहाँ एक ट्रेन खड़ी है| लेकिन पूछने पर किसी ने नही बताया कि यही दिल्ली पॅसेंजर है| कुछ लोग कह रहे हैं कि यह लक्सर तक जाएगी; फलाँ गाँव तक जाएगी| उस पर कुछ ठीक से लिखा भी नही है| स्टेशन पर काम करनेवाले से पूछा तो उसने बताया कि यही दिल्ली पॅसेंजर है| मन कितना चंचल होता है| दो मिनट पहले तक इतना अस्वस्थ और अब बिल्कुल निश्चिंत! मन तो बस एक पेंडुलम है जो इस तरफ से उस तरफ भागा जाता है. . .

समय पर ट्रेन शुरू हुई| कोहरे में लिप्त भूमि से आगे बढ़ने लगी| हरिद्वार के दर्शन ट्रेन से ही कर लिए| धीरे धीरे भीड़ बढ़ने लगी| यात्रियों में कई छात्र भी हैं| रूड़की के बाद ट्रेन ने उत्तराखण्ड छोड दिया| इस बार हिमालय से विदाई हो गई|

शाम की ट्रेन गाज़ियाबाद से रात दस बजे है| यह पॅसेंजर दो घण्टा भी लेट हुई तो भी सात बजेगी गाज़ियाबाद छोडेगी| ट्रेन अधिक लेट नही है| फिर भी मन में‌ थोड़ी असहजता जरूर है| परिवार के सदस्य भी सुबह टणकपूर से निकले हैं| वे गाज़ियाबाद में ही मिलेंगे और फिर आगे की यात्रा साथ होगी| ट्रेन कुप्रसिद्ध देवबन्द से गुजरी| जैसे जैसे दिल्ली पास आने लगा, ट्रेन की भीड़ बढ़ गई| अब तो यह मुंबई की लोकल जैसी भरने लगी है| शायद गाज़ियाबाद में उतरने में दिक्कत हो सकती है| हमेशा से मन में बड़े महानगरों के प्रति एक अस्वस्थ भाव रहा है| जितना हो सके, दिल्ली जैसे बड़े शहर टालने का प्रयास करता हुँ| एक तो कौनसी ट्रेन किस स्टेशन से छूटती है या कौनसी बस किस बस अड्डे से निकलती है, यह ठीक से पता करना मुश्किल होता है| और खर्चा भी बहुत होता है| इसलिए इस बार दिल्ली के बजाय गाज़ियाबाद से ही ट्रेन बदलने की योजना बनायी| जैसे गाज़ियाबाद पास आता गया, अस्वस्थता बढ़ने लगी| ट्रेन के दरवाजे के पास जाने के लिए मशक्कत करनी पड़ी| लेकिन सकुशल उतर गया|

यहाँ परिवार के सदस्यों से मिलना हुआ| उन्हे मै पिथौरागढ़ में ही छोड आया था| आंठ दिनों के बाद हम मिल रहे हैं| अब यहीं से रात अहमदाबाद की ट्रेन है| १६ दिसम्बर के काण्ड को हुए मात्र चार- पाँच दिन हुए हैं| इसलिए वह भी एक चिन्ता का विषय है| जल्द से जल्द दिल्ली क्षेत्र से निकलना चाहता हुँ| खैर| कोई परेशानी के बिना अहमदाबाद एक्स्प्रेस ले ली| अब इस यात्रा का अन्तिम चरण शुरू हुआ|

पिथौरागढ़ से निकलने के बाद की यात्रा अब भी जेहन में ताज़ा है| पहले दिन प्रात: साढ़ेपाँच बजे पिथौरागढ़ से बागेश्वर की बस ले ली| कोहरे के बीच यात्रा शुरू हुई| 'हर हर भोले नमो शिवाय' के साथ इस यात्रा का प्रारम्भ हुआ! चौकोरी के पास पहली बरफ दिखी| बागेश्वर से बैजनाथ स्थानीय बस में आया| वहाँ बस में उतरते समय कई लोगों ने आत्मीयता से रास्ता बताया| फिर बैजनाथ में भ्रमण| ग्वालदाम का अपूर्व नजारा| पिण्डर नदी और कर्णप्रयाग! फिर जोशीमठ- अलकनन्दा और बद्रिनाथ के पास बरफ! लौटते समय आज्ञा देनेवाले हिमालय के शिखर! अन्तत: ऋषीकेश में आश्रम और गंगा के दर्शन| यह मेरे जीवन का हिमालय का पहला छोटा सोलो ट्रेक था| बहुत मज़ा आया|

यथा समय ट्रेन अहमदाबाद पहुँची| यहाँ से अब और एक ट्रेन बदलनी है| सीधे मुंबई तक के ट्रेन का बूकिंग नही मिल पाया है| कुछ घण्टे अहमदाबाद में रूकने के बाद आगे निकले| वैसे तो जीवन में कहीं ठहरना होता ही नही| जो स्थान मन्जिल जैसा लगता है, वह भी एक सराय के अलावा कुछ नही होता है. . 


















Thursday, October 1, 2015

अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ८ ऋषीकेश दर्शन

१. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: १ हिमालय की गोद में . . . 
२. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: २ नदियाँ पहाड झील और झरने जंगल और वादी
३. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोS हिमालय: ३ चलो तुमको लेकर चलें इन फिजाओं में
४. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोS हिमालय: ४ जोशीमठ दर्शन
५. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ५ अलकनन्दा के साथ बद्रिनाथ की ओर
    

६. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ६ औली जाने का असफल प्रयास और तपोबन यात्रा    
७. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ७ हिमालय की आज्ञा ले कर ऋषीकेश की ओर
ऋषीकेश दर्शन

२० दिसम्बर की सुबह| अच्छा विश्राम मिला| आज कोई भागदौड नही है, इसलिए आराम से तैयार हुआ| होटल के पास ही गंगा का तट है| सुबह की ताज़गी और शान्ति से बहनेवाली गंगा की धारा. . . आज बस ऋषीकेश में घूमना है| कोई तय योजना नही है| बस ऋषीकेश में स्थित डिव्हाईन लाईफ सोसायटी आश्रम देखना है, इतना विचार है| साथ ही गंगा के तट पर भी टहलूंगा|

कल जब मोबाईल में न्यूज देखें और बाहरी दुनिया से फिर अवगत हुआ, तो १६ दिसम्बर में दिल्ली में हुए बलात्कार काण्ड की जानकारी मिली| वाकई हम कितने रुग्ण समाज में जीते हैं, इसका अहसास हुआ| यही ख्याल मन में आया कि इस दुर्घटना को किसी अन्जान गुनहगार द्वारा किया कृत्य नही मानना चाहिए, वरन् इसे ऐसे समझना चाहिए कि मेरे जैसा- आपके जैसा ही कोई आदमी या आदमियों की टोली ऐसा कृत्य कैसे कर सकती हैं| एक इन्सान ऐसा कैसे कर सकता है- मेरे जैसा कोई ऐसा कैसे कर सकता है| मै ही ऐसा कैसे कर सकता हुँ, यह देखना चाहिए, यह सोचना चाहिए| मनस्विद कहते हैं कि जो इन्सान रोज ग़ुस्सा करता है; वह ग़ुस्सा इकठ्ठा नही करता है| उसका ग़ुस्सा निरन्तर बहता रहता है; निकलता रहता है| लेकिन अगर कोई आदमी हो जो ग़ुस्सा तो करता हो, लेकिन उसे दबा कर बैठा हो या उसे उसे दबाना पड़ा हो; तो वह ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़ा होता है| यह भी वैसी ही बात है| एक जटिल सामाजिक रुग्णता| खैर|

दिन धीरे धीरे बढ़ने लगा| होटल में अच्छी सजावट है; अच्छे फूल खिले हैं| गंगा की गूँज भी अविरत सुनाई देती है| हिमालय के चरणतल पर फैली हुई विश्रान्त धारा! इस माहौल में मन में शान्ति अपनेआप आती है| इस होटल में रूकने से इस नजारे का लुफ्त तो ले सकता हुँ! नाश्ता करने के बाद ऋषीकेश में स्थित डिव्हाईन लाईफ सोसायटी आश्रम गया| ऋषीकेश में इस समय भीड़ तो कम है; लेकिन फिर भी एक शहर का ही अनुभव होता है| अतीत में यह स्थान और शान्त रहा होगा| डिव्हाईन लाईफ सोसायटी आश्रम की स्थापना स्वामी शिवानन्द जी ने की थी| दक्षिण भारत से आए स्वामी शिवानन्द जी पूर्व एशिया के मलाया में डॉक्टर थे और वहीं से वे साधना की खोज में हिमालय आए और फिर इस आश्रम के जरिए उन्होने आगे कार्य किया|

आश्रम में शान्ति और सादगी है| इस तरह का आश्रम मै इतने करीब से पहली बार देख रहा हुँ| देखने लायक स्थान है| स्वामीजी की जीवनि के बारे में जानकारी दी हुई है| उसके साथ प्रार्थना कक्ष, सभागार और ध्यान कक्ष भी है| एक शीतलता फैली हुई है| दोपहर तक उसी आश्रम में बैठ कर ध्यान किया| फिर वहीं कंप्युटर के कक्ष में सिडी पर स्वामीजी की जीवनि की फिल्म देखी|

दोपहर आश्रम के बाहर आ कर गंगा के तट पर टहला| यहाँ कई घाट है| आम लोग, पर्यटक, साधू सब घूम रहे हैं| गंगा नदी अपनी ही लय में अपने पथ पर बह रही है| हिमालय की कुछ छोटी चोटियाँ- द्वारपाल जैसे- सामने दिखाई पड़ रही है| बड़ी देर तक तट पर ही बैठा रहा| फिर थोड़ी देर आश्रम में आया और ध्यान किया| जब जाने का मन हुआ, तो वापस चलते चलते होटल में आया और विश्राम कर लिया| रात आश्रम में प्रवचन होनेवाला है; उसे भी जाऊँगा|

शाम गंगा नदी के साथ बिताई| एक बूँद के साथ गोमुख में प्रविष्ट होनेवाली धारा. . . यहाँ युवावस्था में दिखती है और यही नदी जब गंगासागर पहुँचती है, तो सागर ही होती है| वाकई नदी एक बहती- गतिमान जीवनधारा की सुन्दर प्रतिक है| नदी जीवन का सातत्य दर्शाती है| नदी जीवन का प्रवाह दर्शाती है| हमारी भाषा में नदी जैसा ही एक शब्द है- नाड़ी| नाड़ी शरीर में ऊर्जा का प्रवाह होता है| वैसे ही नदी जीवन का प्रवाह होती है| और जब ऐसी शान्त, धीमें से बहनेवाली नदी के पास आते हैं, तो अपने आप वैसा अनुभव भीतर भी होता है|

भोजन पश्चात् फिर आश्रम में गया| ठण्ड बढ़ रही है| पहाड़ में दिए जल उठे हैं| आश्रम में एक कार्यक्रम है| और आम जनता के लिए खुला है| वह देखते देखते ध्यान भी हो जाएगा| स्वामी शिवानन्द को करीब से देखनेवाली एक शिष्या अनुभव कथन कर रही हैं| जब वे छोटी थी, तब स्वामीजी के पास रहने का अवसर उन्हे मिला था| निवेदन सामान्य था फिर भी अच्छा लगा| और आश्रम के वातावरण से तो और भी शान्त लगा| वह कार्यक्रम समाप्त होते होते रात के साढ़े नौ बज गए हैं| ठण्ड बढ़ चुकी है| अब मै होटल तक पैदल ही जाऊंगा| करीब तीन- चार किलोमीटर का रास्ता होगा|

चलते चलते ऊर्जा मिलती गई| शहर में अब सन्नाटा छाने लगा है| होटल के पास रात में गंगा का पानी रोशनी से चमक उठा है| आज का दिन भी अच्छा जा रहा है| वाकई जिन्दगी किसे कब कहाँ ले आती है! कल अब यहाँ से निकलना है| पिथौरागढ़ गए हुए परिवार सदस्य कल दिल्ली पहुँचेंगे| मै भी उन्हे वहीं मिलूँगा| आज हिमालय के पास की यह अन्तिम रात|















आश्रम के ठीक सामने यह हॉस्पिटल
स्वामीजी की संक्षिप्त जीवनि























 



































































Wednesday, September 30, 2015

अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ७ हिमालय की आज्ञा ले कर ऋषीकेश की ओर


१. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: १ हिमालय की गोद में . . .
२. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: २ नदियाँ पहाड झील और झरने जंगल और वादी
३. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोS हिमालय: ३ चलो तुमको लेकर चलें इन फिजाओं में
४. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोS हिमालय: ४ जोशीमठ दर्शन
५. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ५ अलकनन्दा के साथ बद्रिनाथ की ओर
 
६.अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ६ औली जाने का असफल प्रयास और तपोबन यात्रा
 
हिमालय की आज्ञा ले कर ऋषीकेश की ओर

१९ दिसम्बर की सर्द सुबह! साढ़ेपाँच बजे डॉर्मिटरी से निकल कर बस स्टँड की तरफ पहुँचा| उनकी पुकार बड़ी दूर तक गूँज रही है| बस निकलने में दो मिनट है; इसलिए जा कर चाय ली जा सकती है| सीट पकड़ने का सवाल ही नही; क्यों कि उंगलियों पर गिने जा सकनेवाली सवारियाँ ही बैठी हैं| लेकिन ठण्ड. . . आज हिमालय से निकलने का दिन आ ही गया| अभी तकनिकी रूप से सुबह हो भी गई हो तो रात ही चल रही है| कम से कम एक घण्टा अन्धेरा रहेगा और तब तक आनेवाला नजारा छूट जाएगा| लेकिन उजाले के बजाय प्रतीक्षा धूप की है|

ठिठुरते हुए चाय पी ली और बस चल पड़ी| नजारा अन्धेरे में ही पीछे जाता रहा| बड़ी देर बाद उजाला हुआ और धूप खिलने तक तो बस पिपलकोटी पहुँच गई| अब जान में जान आ रही है| सुबह की धूप में हिमालय का नजारा और अलकनन्दा! चाहे बुद्धी कितना भी अस्वीकार करें; पहाड़ों में होने पर एक डर तो बना ही रहता है| रास्ता इतना दुर्गम है कि मन के नीचले तल में एक असुरक्षा की भावना होती ही है कि एक बार यहाँ से निकल कर मैदान में कब पहुँचूं... क्यों कि रास्ता इतना खतरनाक है. . वास्तव में इन्सान पंच महाभूतों से बना हुआ होता है और जब हम पहाड़ों में जाते है तो जागृत स्तर पर नही लेकिन अर्धजागृत मस्तिष्क में जरूर जमीन- धरती माँ की याद आती रहती है| बल्कि धरती से टूटे होने का भी अस्पष्ट ख्याल होता है| क्यों कि हम इन पाँच तत्त्वों से बने हुए हैं और इसलिए यदि हम ऐसी जगह जाए जहाँ हवा, पृथ्वी, अग्नि, जल और आकाश से हमारा सम्पर्क खण्डित हो जाए तो हम असहज होते हैं| समन्दर के नीचे, किसी बन्द टनेल में; किसी रोप वे में बैठे हुए यही तो महसूस होता है अलग अलग अनुपात में| शायद इसी वजह से घर में रोता हुआ छोटा बच्चा खुली हवा में ले जाने पर तुरन्त शान्त होता है| खैर|

जोशीमठ छोडने के बाद ऊँचाई निरंतर कम होती है; बाद में कोई भी ऊँचा स्थान नही है| लेकिन सड़क चढती और उतरती ही रहती है| एक पहाड़ी पार करने पर फिर दूसरी| उतरने के लिए भी चढना होगा; जैसे हिमालय में जाते समय एक चोटि पार करने के बाद खाई से गुजरना होता है. . . इसी लिए तो इसे नगाधिराज कहते हैं| जोशीमठ से ऋषीकेश की दूरी महज २५३ किलोमीटर है| लेकिन पहाड़ी रास्ता होने से पूरा दिन लगता है| बीच बीच में रास्ता अधिक दुर्गम भी दिख रहा है| नन्दप्रयाग, कर्णप्रयाग, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग! बीच में एक स्थान से बड़ा अपूर्व नजारा देखने को मिला| एक जगह पर हिमालय की रेखा साफ नजर आ रही थी| जैसे उत्तुंग पर्वत शिखर पुन: एक बार आशीर्वाद दे कर विदा कर रहे हो और इस दृश्य के पास ही नीचे घाटि से बहनेवाली गंगा नदी| जब पहली बार हिमालय के पास आया और जब पहली बार हरिद्वार के निकट गंगा नदी देखी थी; तो ऐसी शान्ति महसूस हुई थी| वाकई पहाड़ की हवा कुछ और है| यहाँ तक कि कहते हैं कि पहाड़ आम बस्ती का स्थान न हो कर ध्यान या साधना की भूमि ही है| इसी लिए इसे देवभूमि कहते हैं या कश्यप ऋषी का स्थान होने के कारण उस भूमि को कश्मीर कहा जाता है|

अब ऋषीकेश में एक- दो दिन ठहरना है| वहाँ गंगा के तट पर और एक आश्रम में जाऊँगा| यहाँ ऋषीकेश में वाकई हिमालय का चरणस्पर्श होता है| यहाँ हिमालय की सीमा जो है| ऋषीकेश पहुँचने तक दोपहर के चार बजे है| अर्थात् लगभग नौ- दस घण्टे लगे इस यात्रा में| बहुत थकान हो रही है| और कुछ उदासी भी छा रही है| कुदरत के पास जाते है तो उसकी कृपा से प्रसन्न हो उठते हैं और इसी कारण उससे दूर जाते समय अस्वस्थता तो होगी ही| ऋषीकेश पहुँचने पर एकदम शहर जैसा लग रहा है|

यहाँ भी सरकारी डॉर्मिटरी ढूँढी| एक जगह पसन्द नही आयी तो दूसरी डॉर्मिटरी चला गया| यह बिल्कुल गंगा के किनारे स्थित है| यह सरकारी डॉर्मिटरी वास्तव में एक रेसॉर्ट के भीतर है| इसलिए यहाँ दाम थोड़ा अधिक हैं- एक बिस्तर के २५० रूपए- लेकिन सुविधा बेहतर है| साथ ही गंगा से होटल गंगा से सटा है| रमणीय बनाया गया है| जब नदी ऊँचे पहाड़ों से गिरनेवाले झरनों की और प्रपातों की धारा के रूप में दौडती है तो उसका एक अलग रूप होता है| यहाँ गंगा के रूप में अनगिनत पहाड़ी धाराएँ शान्ति से बह रही‌ हैं| यह जीवन की ओर एक संकेत तो नही? जब हम उथले होते हैं; जब गिरते और उठते हैं; तो बहुत आवाज के साथ चलते हैं; संघर्ष होता हैं| लेकिन जब गहराई मिलती है और स्थिर होते हैं; तो बिल्कुल शान्त होते हैं|

ऋषीकेश में निवास की व्यवस्था तो हो गई; लेकिन मन अशान्त है| एक तो यहाँ से मोबाईल में इंटरनेट मिल गया| फिर वही शहर का घिसा- पिटा माहौल| कुछ लोगों को पहाड़ में जाते समय अक्लमटाईज़ होना पड़ता है| ऊँचाई- ठण्ड का आदि होना पड़ता है| शायद मुझे वापस शहर में आने के लिए थोड़ा अक्लमटाईज़ होना पड़ेगा| वह शाम नदी के पास ही बिती| यहाँ ठण्ड एकदम कम है| गंगा नदी कुछ सान्त्वना दे रही है, बता रही है कि तुम अब भी पहाड़ के करीब ही हो| आज के दिन अब ऋषीकेश में कहीं जाना नही होगा| मुश्किल से एक होटल में जा कर कुछ भोजन कर पाया| जैसे ही रात हुई, पहाड़ में कई स्थान रोशनी से भर गएं| पहाड़ के बीचोंबीच कितने लोग रहते हैं| एकाध वाहन गुजरता है|

कई बार यह भी महसूस किया है कि पहाड़ में जाने के पहले कितने दिन हम उस यात्रा के लिए तरसते हैं| चाहे कोई भी यात्रा हो| पिकनिक ही हो| लेकिन एक बार जब हम यात्रा में होते हैं; 'गन्तव्य' स्थान पर होते हैं; तो फिर मन भटकने लगता है| वापस चला जाता है| पहाड़ में घूमते हुए भी हमें शहर की और घर- कारोबार की याद अनिवार्य रूप से आती ही है| और अब पहाड़ से दूर आने पर पहाड़ की बड़ी याद आ रही है| खैर, पहाड़ के पास होने का अनुभव करने के अभी एक- दो दिन बचे हैं|


दूर हिमालय के शिखर और पास में बहती गंगा. . .


































































SHIVALIK THE JEWEL OF BRO!!
 
ऋषीकेश में ही तो पहाड़ी सड़क शुरू और समाप्त होती है. .