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Wednesday, January 7, 2026

Experiencing Kumaon Himalaya 3: Satgarh- A dream village in Himalaya!

✪  Sky watching in severe cold weather
✪  Farms on slope, small houses and distant villages obscured by fog!
✪  Trekking in serene nature
✪  Saffron snow- peaks in the evening
✪  "Watch, the tiger is standing there!"

Satgarh! Woke up at 4:30 am on 5th December. So severe cold outside! Sky watching from the terrace is next to impossible! It is almost trying to settle on a Perth pitch. But the sky is so mesmerizing! So the sky defied the cold weather. Although the Moon is shining brilliantly, it is now low in the West. There is bright Jupiter near the Moon. Sirius is low towards South. In the East, there are many stars. The Ursa Major are rising high in the sky! The Leo constellation is clear. I set the mobile for astrophotography. Hands are shaking. But oh beauty! What a blissful dawn! Slowly the birds started chirping!






Monday, February 7, 2022

हिमालय की गोद में... (कुमाऊँ में रोमांचक भ्रमण) १०: ध्वज मन्दिर का सुन्दर ट्रेक

इस लेखमाला को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए|


४ नवम्बर को बूँगाछीना गाँव में‌ पूजा सम्पन्न हुई| उत्तराखण्ड के सामुदायिक लोक जीवन का अनुभव ले सका| उस कारण रिश्तेदारों से मुलाकातें हुईं- बातचीत हुई| आज लक्ष्मी पूजन है, इसलिए रात सत्गड पहुँचना है| सभी रिश्तेदारों से और बूँगाछीना के रमणीय परिसर से विदा ले कर हम निकले| दिवाली का दिन होने के कारण पिथौरागढ़ जानेवाली जीपें मिल नही रही हैं|‌ साथ ही यहाँ सरकारी रोडवेज बसों के कुछ ड्रायव्हर्स का स्ट्राईक भी चल रहा है| इसलिए बहुत देर तक सड़क पर राह देखते रहे| दोपहर की धूप में तो अच्छा लगा, लेकीन जब धीरे धीरे शाम ढलने लगी, तब स्वेटर पहनना पड़ा| अन्त में बूँगाछीना के ही एक सज्जन उनकी जीप से छोड़ने के लिए तैयार हुए| यहाँ पहाड़ी सड़कें हैं, इससे वाहनों के रेट बहुत ज्यादा हैं| सरकारी बस में लगभग एक किलोमीटर के लिए दो रूपए लगते हैं, तो शेअर जीप चार या पाँच रूपए लेती हैं| साथ ही पेट्रोल के दाम बढ़े है| और कोरोना के कारण आई हुई मन्दी| यहाँ का पर्यटन भी प्रभावित हुआ है| खैर|




Monday, October 5, 2015

अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: १० इस मोड़ से जाते हैं . . (अन्तिम)

१. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: १ हिमालय की गोद में . . .  
२. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: २ नदियाँ पहाड झील और झरने जंगल और वादी   
३. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोS हिमालय: ३ चलो तुमको लेकर चलें इन फिजाओं में    
४. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोS हिमालय: ४ जोशीमठ दर्शन  
५. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ५ अलकनन्दा के साथ बद्रिनाथ की ओर      
६. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ६ औली जाने का असफल प्रयास और तपोबन यात्रा       
७. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ७ हिमालय की आज्ञा ले कर ऋषीकेश की ओर   
८. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ८ ऋषीकेश दर्शन   
९. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ९ ऋषीकेश से प्रस्थान
इस मोड़ से जाते हैं . . (अन्तिम) 

दिसम्बर को अहमदाबाद से अगली ट्रेन ले ली| यात्रा अब अन्तिम चरण में है| जल्द ही घर पहुँचूँगा| लेकिन जीवन की यात्रा तो अविरत चलती रहती है| जीवन तो चलता ही जाता है| धीरे धीरे यह वर्ष समाप्त होगा| यह वर्ष अनुठा रहा| कह सकता हुँ कि इस वर्ष पहली बार ट्रेकिंग की शुरुआत की| इसी वर्ष महाराष्ट्र के गोरखगड में पहली बार ट्रेकिंग किया और अब हिमालय में| वाकई जो नजारे देखे वे अद्भुत ही थे| जितनी बार हिमालय में गया हुँ उतनी बार अवाक् हुआ हुँ|

जैसे हिमालय के चरणकम पर बसें गाँवों से आगे बढते हैं, वैसे ही उसका विशाल स्वरूप दृग्गोचर होता है| एक के बाद एक शृंखलाएँ दृश्यमान होती है| कुदरत के करीब जाने पर वहाँ की ताज़गी और शान्ति आल्हादित करती है| लौटने पर भी हिमालय बुलावा देता ही रहता है| लौटते समय एक साथ दिखाई दिए वे हिमशिखर अब भी पुकार रहे हैं! हिमालय का सम्मोहन ऐसा है कि जो इसमें फंस गया वह ज्यादा दिनों तक उससे दूर नही रह सकता है. . .

अब फिर वही शहर की घिसी पिटी शृंखला. . वही काम धाम| जब पूरी यात्रा कर घर पहुँचा, तब पहले कुछ समय विश्राम किया| २३ दिसम्बर का दिन है| जैसे ही न्यूज देखे, एक समाचार ने बड़ा ही अस्वस्थ कर दिया| एक झटके से लगा कि जीवन में बहुत कुछ बदल रहा है| वह समाचार था सचिन तेण्डुलकर के एकदिवसीय संन्यास का| अप्रत्याशित बिल्कुल भी नही; लेकिन उतना ही अस्वस्थ करनेवाला| मेरे जैसे कई करोड़ लोग होंगे जिन्हे शायद उस दिन लगा हो कि अब बचपन वाकई समाप्त हो गया. . . वह क्षण ही इस पूरी यात्रा का भरत वाक्य है| उस क्षण में जैसे एक आर या पार की स्थिती हो गई| खैर|

करीब ढाई साल की हुई इस यात्रा का और एक महत्त्व भी है| दिसम्बर २०१२ में यह यात्रा करने के छह ही महिनों बाद उत्तराखण्ड में प्रलयंकारी बाढ़ आयी| जिन जिन स्थानों पर मै गया था- वहाँ भारी तबाही मची| पिथौरागढ़ जिले से ले कर कर्णप्रयाग, पिपलकोटि, जोशीमठ, विष्णुप्रयाग, बद्रिनाथ रोड़ और फिर टिहरी, ऋषीकेश आदि स्थानों पर भाई हानि हुई| बड़ी ही डरावनी तस्वीरें सामने आने लगी| जो स्थान मैने करीब से देखे, वे बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए| जोशीमठ के पास बने पनबिजली के केन्द्र हो या ऋषीकेश में गंगा रेसॉर्ट हो|

पश्चिमी विक्षोभ एक निमित्त बना और बरसों से मानव द्वारा पर्वत में किए गए अतिक्रमण की किमत चुकानी पड़ी| बड़ी संख्या में पेड़ कटते गए तो पर्वत में पानी पकड़ने की क्षमता कम हुई; मिट्टी फिसलने लगी| पहाड़ को तोड कर निर्माण कार्य बड़े पैमाने पर हुआ था; तो उससे पहाड़ नाज़ुक बने थे| क्लाएमेट चेंज और ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण भी पर्यावरण अब अनिश्चित सा हो गया है| इन सब कारणों से बड़ा विनाश हुआ| यह एक तरह से इन्सान को रोकने का कुदरत का तरिका है| जिन लोगों ने वह दर्द सहा हो, वही उसे समझ सकते हैं|

इसलिए अब इन्सान के पास थोड़े ही विकल्प है| एक तो इस हादसे से सीख कर स्वयं को नियन्त्रण में लाए और प्रकृति में कोई भी हस्तक्षेप न दे या. . . या फिर इससे बड़ी किमत चुकाने के लिए तैयार रहें| लेकिन जो लोग ऐसी आपदा को दैवी आपदा कहते हो, वे कैसे अपनी गलतियाँ मानेंगे| अत: इस मोड़ से अब दो ही रास्ते आगे जाते हैं| लेकिन गलतियों से सीखना इन्सान का स्वभाव नही है| खैर|

व्यक्तिगत तौर पर इस यात्रा ने मेरे लिए भी नए रास्ते बनाए| जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण दिया| ट्रेकिंग या साईकिलिंग में यह खास बात होती है कि रफ्तार कम हो जाती है| और हम सामान्य जीवन में तेज़ रफ्तार से जाते समय जिन चीजों से वंचित रहते हैं, उन्हे ट्रेकिंग में करीब से देख सकते हैं| बल्कि कहना होगा पहली बार उन्हे देख पाते हैं| किसी भी मार्ग पर यदि हम बाईक या कार से जाते हैं तो झटके में से निकल जाते हैं| लेकिन कभी उसी मार्ग पर टहलते हुए जाते हैं, तो दृष्टि अलग होती है| बारिकी से चीजें देख सकते हैं| और छोटी छोटी चीजों का अधिक आनन्द भी ले सकते हैं| एक ही छोटे से मार्ग में इतनी चीजें भी होती हैं, उसका अहसास हमें तब होता है| इसके साथ हमारा ध्यान भी गन्तव्य के बजाय देखने पर अर्थात् दृष्टि पर होने लगता है|



















 
सभी पाठकों को बहुत बहुत धन्यवाद दे कर नमन करते हुए अब इस लेखन को विराम देता हुँ| अगले किसी पड़ाव पर मिलने तक अलविदा, राम- राम! बहुत बहुत धन्यवाद!

Wednesday, September 30, 2015

अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ७ हिमालय की आज्ञा ले कर ऋषीकेश की ओर


१. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: १ हिमालय की गोद में . . .
२. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: २ नदियाँ पहाड झील और झरने जंगल और वादी
३. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोS हिमालय: ३ चलो तुमको लेकर चलें इन फिजाओं में
४. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोS हिमालय: ४ जोशीमठ दर्शन
५. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ५ अलकनन्दा के साथ बद्रिनाथ की ओर
 
६.अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ६ औली जाने का असफल प्रयास और तपोबन यात्रा
 
हिमालय की आज्ञा ले कर ऋषीकेश की ओर

१९ दिसम्बर की सर्द सुबह! साढ़ेपाँच बजे डॉर्मिटरी से निकल कर बस स्टँड की तरफ पहुँचा| उनकी पुकार बड़ी दूर तक गूँज रही है| बस निकलने में दो मिनट है; इसलिए जा कर चाय ली जा सकती है| सीट पकड़ने का सवाल ही नही; क्यों कि उंगलियों पर गिने जा सकनेवाली सवारियाँ ही बैठी हैं| लेकिन ठण्ड. . . आज हिमालय से निकलने का दिन आ ही गया| अभी तकनिकी रूप से सुबह हो भी गई हो तो रात ही चल रही है| कम से कम एक घण्टा अन्धेरा रहेगा और तब तक आनेवाला नजारा छूट जाएगा| लेकिन उजाले के बजाय प्रतीक्षा धूप की है|

ठिठुरते हुए चाय पी ली और बस चल पड़ी| नजारा अन्धेरे में ही पीछे जाता रहा| बड़ी देर बाद उजाला हुआ और धूप खिलने तक तो बस पिपलकोटी पहुँच गई| अब जान में जान आ रही है| सुबह की धूप में हिमालय का नजारा और अलकनन्दा! चाहे बुद्धी कितना भी अस्वीकार करें; पहाड़ों में होने पर एक डर तो बना ही रहता है| रास्ता इतना दुर्गम है कि मन के नीचले तल में एक असुरक्षा की भावना होती ही है कि एक बार यहाँ से निकल कर मैदान में कब पहुँचूं... क्यों कि रास्ता इतना खतरनाक है. . वास्तव में इन्सान पंच महाभूतों से बना हुआ होता है और जब हम पहाड़ों में जाते है तो जागृत स्तर पर नही लेकिन अर्धजागृत मस्तिष्क में जरूर जमीन- धरती माँ की याद आती रहती है| बल्कि धरती से टूटे होने का भी अस्पष्ट ख्याल होता है| क्यों कि हम इन पाँच तत्त्वों से बने हुए हैं और इसलिए यदि हम ऐसी जगह जाए जहाँ हवा, पृथ्वी, अग्नि, जल और आकाश से हमारा सम्पर्क खण्डित हो जाए तो हम असहज होते हैं| समन्दर के नीचे, किसी बन्द टनेल में; किसी रोप वे में बैठे हुए यही तो महसूस होता है अलग अलग अनुपात में| शायद इसी वजह से घर में रोता हुआ छोटा बच्चा खुली हवा में ले जाने पर तुरन्त शान्त होता है| खैर|

जोशीमठ छोडने के बाद ऊँचाई निरंतर कम होती है; बाद में कोई भी ऊँचा स्थान नही है| लेकिन सड़क चढती और उतरती ही रहती है| एक पहाड़ी पार करने पर फिर दूसरी| उतरने के लिए भी चढना होगा; जैसे हिमालय में जाते समय एक चोटि पार करने के बाद खाई से गुजरना होता है. . . इसी लिए तो इसे नगाधिराज कहते हैं| जोशीमठ से ऋषीकेश की दूरी महज २५३ किलोमीटर है| लेकिन पहाड़ी रास्ता होने से पूरा दिन लगता है| बीच बीच में रास्ता अधिक दुर्गम भी दिख रहा है| नन्दप्रयाग, कर्णप्रयाग, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग! बीच में एक स्थान से बड़ा अपूर्व नजारा देखने को मिला| एक जगह पर हिमालय की रेखा साफ नजर आ रही थी| जैसे उत्तुंग पर्वत शिखर पुन: एक बार आशीर्वाद दे कर विदा कर रहे हो और इस दृश्य के पास ही नीचे घाटि से बहनेवाली गंगा नदी| जब पहली बार हिमालय के पास आया और जब पहली बार हरिद्वार के निकट गंगा नदी देखी थी; तो ऐसी शान्ति महसूस हुई थी| वाकई पहाड़ की हवा कुछ और है| यहाँ तक कि कहते हैं कि पहाड़ आम बस्ती का स्थान न हो कर ध्यान या साधना की भूमि ही है| इसी लिए इसे देवभूमि कहते हैं या कश्यप ऋषी का स्थान होने के कारण उस भूमि को कश्मीर कहा जाता है|

अब ऋषीकेश में एक- दो दिन ठहरना है| वहाँ गंगा के तट पर और एक आश्रम में जाऊँगा| यहाँ ऋषीकेश में वाकई हिमालय का चरणस्पर्श होता है| यहाँ हिमालय की सीमा जो है| ऋषीकेश पहुँचने तक दोपहर के चार बजे है| अर्थात् लगभग नौ- दस घण्टे लगे इस यात्रा में| बहुत थकान हो रही है| और कुछ उदासी भी छा रही है| कुदरत के पास जाते है तो उसकी कृपा से प्रसन्न हो उठते हैं और इसी कारण उससे दूर जाते समय अस्वस्थता तो होगी ही| ऋषीकेश पहुँचने पर एकदम शहर जैसा लग रहा है|

यहाँ भी सरकारी डॉर्मिटरी ढूँढी| एक जगह पसन्द नही आयी तो दूसरी डॉर्मिटरी चला गया| यह बिल्कुल गंगा के किनारे स्थित है| यह सरकारी डॉर्मिटरी वास्तव में एक रेसॉर्ट के भीतर है| इसलिए यहाँ दाम थोड़ा अधिक हैं- एक बिस्तर के २५० रूपए- लेकिन सुविधा बेहतर है| साथ ही गंगा से होटल गंगा से सटा है| रमणीय बनाया गया है| जब नदी ऊँचे पहाड़ों से गिरनेवाले झरनों की और प्रपातों की धारा के रूप में दौडती है तो उसका एक अलग रूप होता है| यहाँ गंगा के रूप में अनगिनत पहाड़ी धाराएँ शान्ति से बह रही‌ हैं| यह जीवन की ओर एक संकेत तो नही? जब हम उथले होते हैं; जब गिरते और उठते हैं; तो बहुत आवाज के साथ चलते हैं; संघर्ष होता हैं| लेकिन जब गहराई मिलती है और स्थिर होते हैं; तो बिल्कुल शान्त होते हैं|

ऋषीकेश में निवास की व्यवस्था तो हो गई; लेकिन मन अशान्त है| एक तो यहाँ से मोबाईल में इंटरनेट मिल गया| फिर वही शहर का घिसा- पिटा माहौल| कुछ लोगों को पहाड़ में जाते समय अक्लमटाईज़ होना पड़ता है| ऊँचाई- ठण्ड का आदि होना पड़ता है| शायद मुझे वापस शहर में आने के लिए थोड़ा अक्लमटाईज़ होना पड़ेगा| वह शाम नदी के पास ही बिती| यहाँ ठण्ड एकदम कम है| गंगा नदी कुछ सान्त्वना दे रही है, बता रही है कि तुम अब भी पहाड़ के करीब ही हो| आज के दिन अब ऋषीकेश में कहीं जाना नही होगा| मुश्किल से एक होटल में जा कर कुछ भोजन कर पाया| जैसे ही रात हुई, पहाड़ में कई स्थान रोशनी से भर गएं| पहाड़ के बीचोंबीच कितने लोग रहते हैं| एकाध वाहन गुजरता है|

कई बार यह भी महसूस किया है कि पहाड़ में जाने के पहले कितने दिन हम उस यात्रा के लिए तरसते हैं| चाहे कोई भी यात्रा हो| पिकनिक ही हो| लेकिन एक बार जब हम यात्रा में होते हैं; 'गन्तव्य' स्थान पर होते हैं; तो फिर मन भटकने लगता है| वापस चला जाता है| पहाड़ में घूमते हुए भी हमें शहर की और घर- कारोबार की याद अनिवार्य रूप से आती ही है| और अब पहाड़ से दूर आने पर पहाड़ की बड़ी याद आ रही है| खैर, पहाड़ के पास होने का अनुभव करने के अभी एक- दो दिन बचे है|


दूर हिमालय के शिखर और पास में बहती गंगा. . .


































































SHIVALIK THE JEWEL OF BRO!!
 
ऋषीकेश में ही तो पहाड़ी सड़क शुरू और समाप्त होती है. .