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Wednesday, January 7, 2026

Experiencing Kumaon Himalaya 3: Satgarh- A dream village in Himalaya!

✪  Sky watching in severe cold weather
✪  Farms on slope, small houses and distant villages obscured by fog!
✪  Trekking in serene nature
✪  Saffron snow- peaks in the evening
✪  "Watch, the tiger is standing there!"

Satgarh! Woke up at 4:30 am on 5th December. So severe cold outside! Sky watching from the terrace is next to impossible! It is almost trying to settle on a Perth pitch. But the sky is so mesmerizing! So the sky defied the cold weather. Although the Moon is shining brilliantly, it is now low in the West. There is bright Jupiter near the Moon. Sirius is low towards South. In the East, there are many stars. The Ursa Major are rising high in the sky! The Leo constellation is clear. I set the mobile for astrophotography. Hands are shaking. But oh beauty! What a blissful dawn! Slowly the birds started chirping!






Friday, January 2, 2026

Experiencing Kumaon Himalaya 2: Trekking in Pithauragarh

The morning of 3rd December! Yesterday I had to spend the night in the open at the bus stop. The bus had left at around 3 am. The ghat- journey at the dawn! The night was so long, I was wondering when will it last! But surprisingly the night was quickly over like a timelapse! When the bus stopped at Champawat for tea, it was twilight. Mountain ranges everywhere! Spiral roads! Sparse houses in the mountains and farming on the slopes! This road comes under Hirak project of "BRO". Then Lohaghat, Gurna and Pithauragarh! The road was not closed anywhere and there was not much traffic also. Reached Pithauragarh at 8:30 am.  

(Here you can listen this article.)

Relatives coming for the marriage are supposed to stay at one hotel. But this Pithauragarh! A city at around 1600 meter elevation. Snow- capped mountains are visible in the distance! I started my walk with the gentle sunshine. Asked directions to some boys and they showed me the short cut path- the walkway! Pahari people are very genuine. Had a wonderful small walk with them. Then met relatives from the side of my wife. It was a good meeting and dialogue. Later on I took ample rest. 

As it is December, the Sun sets here quite early! It is dark after 5:30 pm. The afternoon is not that cold, but the evening is very cold. I observed the night sky from the hotel terrace. There are plenty of city lights and also the Moon is almost full. So for clear sky, I need to wait a bit.

Tuesday, December 23, 2025

Experiencing Kumaon Himalaya 1: Preface

Hello! recently I had gone to the Himalaya for sky watching and for trekking. It was such a great experience, so overwhelming experience that I am compelled to write about it. I had gone to Uttarakhand for around 8 days. There was one marriage in Pithoragarh. So I had gone there. After that I went to Munsyari village which is around 100 KM from Tibet border. It is right in the middle of the Himalayas and it is surrounded by mountain peaks! 

Such a great experience it is always to go to the Himalaya! I left Mumbai on 1st December and my train took me to Bareilly in Uttar Pradesh. From Bareilly, I went to Tanakpur by bus. Incidentally just before arriving to Bareilly station, I observed a leopard in a Farm near Bareilly! So these days wild animals and leopards are everywhere. I could witness this. For sometime I had to stay at Tanakpur as the buses in the mountains in Himalaya do not travel at night. It was very cold but I had to wait at the bus stop. It was very much cold and it was just a glimpse of how the coming days would be like. 



(Here you can listen this article: https://open.spotify.com/episode/4GFJsmxWFKovgAMhKEh5t0?si=zu9mFrTzSKek7OzDy3z4Sg )

Monday, October 14, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ११ (अन्तिम): इस यात्रा का विहंगावलोकन

११ (अन्तिम): इस यात्रा का विहंगावलोकन
 

इस लेखमाला को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए|

७ अगस्त की सुबह बससे लोसर से निकला और शाम को मनाली पहुँचा| वास्तव में इस पूरी यात्रा का यह हिस्सा ही सबसे अधिक डरावना और रोचक भी लगा| बहुत ज्यादा बरफ भी‌ करीब से देखने का मौका मिला| अब बात करता हूँ इस पूरी यात्रा के रिलेवन्स की| पहले साईकिल से जुड़े पहलूओं के बारे में बात करता हूँ| सामाजिक विषयओं को लेकर इसके पहले भी मैने कुछ साईकिल यात्राएँ की हैं| लेकीन इस बार विशेष यह रहा कि पहली बार मेरी साईकिल यात्रा के लिए कई संस्थाएँ और लोग भी सामने आए| एक तरह की स्पॉन्सरशिप मुझे मिली| जैसा मैने पहले लेख में कहा था, स्पॉन्सरशिप एक आंशिक हिस्सा ही होती है, बाकी की तैयारी और प्रैक्टीस राईडस आदि से जुड़ा बहुत बड़ा खर्चा स्वयं ही करना होता है| फिर भी, इस तरह की स्पॉन्सरशिप प्राप्त करना एक साईकिलिस्ट के तौर पर मेरे लिए बड़ी बात है| मै फिर एक बार मन्थन फाउंडेशन, रिलीफ फाउंडेशन एवम् अन्य सब संस्थाएँ तथा व्यक्तियों को धन्यवाद देता हूँ जिन्होने कई तरह से इस यात्रा में सहयोग दिया, एक तरह का सहभाग भी लिया| हिमाचल प्रदेश में और अंबाला में भी मुझे कई लोगों से मदद लेनी पड़ी, उन्हे भी उनके सहयोग के लिए धन्यवाद! अगर इस तरह का सहयोग मुझे मिला न होता, तो मेरे लिए ऐसी यात्रा करना लगभग नामुमकीन होता| दूसरी बात साईकिल को लेकर मैने जो तैयारी की‌ थी, जो व्यवस्थाएँ की थी, वे सब कारगर साबित हुई| जैसे साईकिल को महंगे प्रचलित टायर्स के बजाय देसी लेकीन मजबूत टायर्स डाले थे| बहुत से पथरिले और खतरनाक रास्तों पर चलने के बावजूद एक भी पंक्चर नही हुआ! उसके साथ मैने साईकिल के लिए मेरे साईकिल मित्र और साईकिल रेसर शेख खुदूस से जो थैला बनवा लिया था, वो भी बहुत काम आया| इस तरह से अब ट्रेन में आसानी से साईकिल कहीं से कहीं ले जा सकता हूँ! एक परेशानी हमेशा के लिए हल हुई| साईकिल चलाने से जुड़ी बाकी तैयारी भी वैसे ही काम आई| साईकिल को भी धन्यवाद देता हूँ, उसने खूब साथ निभाया!






Monday, October 5, 2015

अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: १० इस मोड़ से जाते हैं . . (अन्तिम)

१. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: १ हिमालय की गोद में . . .  
२. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: २ नदियाँ पहाड झील और झरने जंगल और वादी   
३. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोS हिमालय: ३ चलो तुमको लेकर चलें इन फिजाओं में    
४. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोS हिमालय: ४ जोशीमठ दर्शन  
५. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ५ अलकनन्दा के साथ बद्रिनाथ की ओर      
६. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ६ औली जाने का असफल प्रयास और तपोबन यात्रा       
७. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ७ हिमालय की आज्ञा ले कर ऋषीकेश की ओर   
८. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ८ ऋषीकेश दर्शन   
९. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ९ ऋषीकेश से प्रस्थान
इस मोड़ से जाते हैं . . (अन्तिम) 

दिसम्बर को अहमदाबाद से अगली ट्रेन ले ली| यात्रा अब अन्तिम चरण में है| जल्द ही घर पहुँचूँगा| लेकिन जीवन की यात्रा तो अविरत चलती रहती है| जीवन तो चलता ही जाता है| धीरे धीरे यह वर्ष समाप्त होगा| यह वर्ष अनुठा रहा| कह सकता हुँ कि इस वर्ष पहली बार ट्रेकिंग की शुरुआत की| इसी वर्ष महाराष्ट्र के गोरखगड में पहली बार ट्रेकिंग किया और अब हिमालय में| वाकई जो नजारे देखे वे अद्भुत ही थे| जितनी बार हिमालय में गया हुँ उतनी बार अवाक् हुआ हुँ|

जैसे हिमालय के चरणकम पर बसें गाँवों से आगे बढते हैं, वैसे ही उसका विशाल स्वरूप दृग्गोचर होता है| एक के बाद एक शृंखलाएँ दृश्यमान होती है| कुदरत के करीब जाने पर वहाँ की ताज़गी और शान्ति आल्हादित करती है| लौटने पर भी हिमालय बुलावा देता ही रहता है| लौटते समय एक साथ दिखाई दिए वे हिमशिखर अब भी पुकार रहे हैं! हिमालय का सम्मोहन ऐसा है कि जो इसमें फंस गया वह ज्यादा दिनों तक उससे दूर नही रह सकता है. . .

अब फिर वही शहर की घिसी पिटी शृंखला. . वही काम धाम| जब पूरी यात्रा कर घर पहुँचा, तब पहले कुछ समय विश्राम किया| २३ दिसम्बर का दिन है| जैसे ही न्यूज देखे, एक समाचार ने बड़ा ही अस्वस्थ कर दिया| एक झटके से लगा कि जीवन में बहुत कुछ बदल रहा है| वह समाचार था सचिन तेण्डुलकर के एकदिवसीय संन्यास का| अप्रत्याशित बिल्कुल भी नही; लेकिन उतना ही अस्वस्थ करनेवाला| मेरे जैसे कई करोड़ लोग होंगे जिन्हे शायद उस दिन लगा हो कि अब बचपन वाकई समाप्त हो गया. . . वह क्षण ही इस पूरी यात्रा का भरत वाक्य है| उस क्षण में जैसे एक आर या पार की स्थिती हो गई| खैर|

करीब ढाई साल की हुई इस यात्रा का और एक महत्त्व भी है| दिसम्बर २०१२ में यह यात्रा करने के छह ही महिनों बाद उत्तराखण्ड में प्रलयंकारी बाढ़ आयी| जिन जिन स्थानों पर मै गया था- वहाँ भारी तबाही मची| पिथौरागढ़ जिले से ले कर कर्णप्रयाग, पिपलकोटि, जोशीमठ, विष्णुप्रयाग, बद्रिनाथ रोड़ और फिर टिहरी, ऋषीकेश आदि स्थानों पर भाई हानि हुई| बड़ी ही डरावनी तस्वीरें सामने आने लगी| जो स्थान मैने करीब से देखे, वे बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए| जोशीमठ के पास बने पनबिजली के केन्द्र हो या ऋषीकेश में गंगा रेसॉर्ट हो|

पश्चिमी विक्षोभ एक निमित्त बना और बरसों से मानव द्वारा पर्वत में किए गए अतिक्रमण की किमत चुकानी पड़ी| बड़ी संख्या में पेड़ कटते गए तो पर्वत में पानी पकड़ने की क्षमता कम हुई; मिट्टी फिसलने लगी| पहाड़ को तोड कर निर्माण कार्य बड़े पैमाने पर हुआ था; तो उससे पहाड़ नाज़ुक बने थे| क्लाएमेट चेंज और ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण भी पर्यावरण अब अनिश्चित सा हो गया है| इन सब कारणों से बड़ा विनाश हुआ| यह एक तरह से इन्सान को रोकने का कुदरत का तरिका है| जिन लोगों ने वह दर्द सहा हो, वही उसे समझ सकते हैं|

इसलिए अब इन्सान के पास थोड़े ही विकल्प है| एक तो इस हादसे से सीख कर स्वयं को नियन्त्रण में लाए और प्रकृति में कोई भी हस्तक्षेप न दे या. . . या फिर इससे बड़ी किमत चुकाने के लिए तैयार रहें| लेकिन जो लोग ऐसी आपदा को दैवी आपदा कहते हो, वे कैसे अपनी गलतियाँ मानेंगे| अत: इस मोड़ से अब दो ही रास्ते आगे जाते हैं| लेकिन गलतियों से सीखना इन्सान का स्वभाव नही है| खैर|

व्यक्तिगत तौर पर इस यात्रा ने मेरे लिए भी नए रास्ते बनाए| जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण दिया| ट्रेकिंग या साईकिलिंग में यह खास बात होती है कि रफ्तार कम हो जाती है| और हम सामान्य जीवन में तेज़ रफ्तार से जाते समय जिन चीजों से वंचित रहते हैं, उन्हे ट्रेकिंग में करीब से देख सकते हैं| बल्कि कहना होगा पहली बार उन्हे देख पाते हैं| किसी भी मार्ग पर यदि हम बाईक या कार से जाते हैं तो झटके में से निकल जाते हैं| लेकिन कभी उसी मार्ग पर टहलते हुए जाते हैं, तो दृष्टि अलग होती है| बारिकी से चीजें देख सकते हैं| और छोटी छोटी चीजों का अधिक आनन्द भी ले सकते हैं| एक ही छोटे से मार्ग में इतनी चीजें भी होती हैं, उसका अहसास हमें तब होता है| इसके साथ हमारा ध्यान भी गन्तव्य के बजाय देखने पर अर्थात् दृष्टि पर होने लगता है|



















 
सभी पाठकों को बहुत बहुत धन्यवाद दे कर नमन करते हुए अब इस लेखन को विराम देता हुँ| अगले किसी पड़ाव पर मिलने तक अलविदा, राम- राम! बहुत बहुत धन्यवाद!

Monday, September 28, 2015

अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ६ औली जाने का असफल प्रयास और तपोबन यात्रा


१. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: १ हिमालय की गोद में . . . 
२. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: २ नदियाँ पहाड झील और झरने जंगल और वादी
३. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोS हिमालय: ३ चलो तुमको लेकर चलें इन फिजाओं में

४. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोS हिमालय: ४ जोशीमठ दर्शन
५. अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ५ अलकनन्दा के साथ बद्रिनाथ की ओर


औली जाने का असफल प्रयास और तपोबन यात्रा
दिसम्बर. आज इस यात्रा का चरम् चरण होगा| आज औली जाना है| औली ही इस यात्रा का मुख्य आकर्षण है| औली एक स्कीइंग स्पॉट है| औली जाने का या इस पूरी यात्रा मुख्य उद्देश्य यह था कि, जाड़े के मौसम में उत्तराखण्ड में जहाँ सड़क खुली हो ऐसे ऊँचे स्थान पर जाना| पीछले साल ही लदाख़ जा कर आया था, इसलिए सोचा था कि उतनी नही; पर थोड़ी बहुत बरफ जरूर मिले| कल बद्रिनाथ रोड़ पर यह इच्छा काफी हद तक पूरी हो गई है| औली की ऊँचाई २७०० मीटर से ३००० मीटर तक है|
जोशीमठ से औली जाने के कम ही विकल्प है| एक विकल्प तो जीप बूक कर जाना है| अर्थात् यह बहुत महंगा है| वहाँ भी शेअर जीपें चलती हैं, ऐसा सुनने में तो आया, लेकिन वैसा कुछ दिखा नही| और एक रास्ता बचा था और वह था ट्रेक करते जाना| औली जोशीमठ से लगभग १८ किलोमीटर दूरी पर है| नीरजजाट जी के ब्लॉग से प्रेरणा ले कर पैदल जाने की योजना बनाई है| ट्रेक करने के भी दो विकल्प है| एक विकल्प है की सीधी सड़क से चलो- लाँग कट| इसमें १८ किलोमीटर चलना पड़ेगा| दूसरा विकल्प है कि पगडण्डी से चलो- शॉर्ट कट| इसकी दूरी लगभग साढ़ेसात किलोमीटर ही है| अर्थात् इसमें चढाई बहुत ज्यादा रहेगी| आज सड़क पर जा कर देखूँगा कैसे जा पाता हुँ|
शंकराचार्य के मन्दिर के पीछे से औली जाने का पैदल रास्ता जाता है यह नीरज जी के ब्लॉग पर पढ़ा था| लेकिन उस सड़क पर आगे जाने पर रास्ता खो गया| एक सज्जन से पूछा तो उसने बताया कि यह सड़क तो जंगलात जाती है; वहाँ से जाओ| फिर थोड़ी देर भटकने के बाद एक पगडण्डी से जुड़ा| यह पगडण्डी शॉर्ट कट की है| बीच बीच में यह मुख्य सड़क से भी जुड़ेगी| जैसे ही पगडण्डी उपर उठने लगी; नजारा बेहद सुन्दर होने लगा| दूर जोशीमठ के नीचे अलकनन्दा दिखाई दे रही है| और वो दुर्गम स्थान पर बंसा हुआ एक गाँव! लेकिन थोड़ी ही देर में कठिनाई आने लगी| पगडण्डी अच्छी थी| जो तजुर्बेकार ट्रेकर होंगे, वे तो कहेंगे कि यह तो पक्की सड़क ही है; पगडण्डी थोडे ही है! लेकिन मुझे कठिनाई हुई क्युंकि पगडण्डी में एक एक स्टेप की लम्बाई या ऊँचाई अधिक है| लगभग दो फीट की एक स्टेप और निरन्तर ऐसी स्टेप्स| जल्द ही थकने की नौबत आयी| थोड़ा चलना और फिर रूकना शुरू हुआ| जोशीमठ के उपरी हिस्से की बस्ती अब भी चल रही है| कुछ कुछ घर लग रहे है| एक जगह माँग कर पानी पिया| यहाँ भी पेडों पर अच्छे फूल हैं! लेकिन अब पैर लड़खड़ा रहे हैं|
यह इसलिए हो रहा है कि शायद मुझे ट्रेकिंग का पहले का कोई अनुभव नही है| कल मै जरूर उन्न्सीस किलोमीटर चला था; लेकिन वह पगडण्डी नही थी| और पण्डुकेश्वर में पगडण्डी पर थोड़ा ही चला तो दिक्कत हुई| यह वैसा ही शॉर्टकट हैं; जिसमें लम्बाई तो कम हैं; मगर ऊँचाई का अनुपात अधिक है| इसलिए अधिक ऊर्जा लग रही है और पैर जल्दी थक रहे हैं| और शायद कल की १९ किलोमीटर की ट्रेकिंग के कारण शरीर में पहले से ही ऊर्जा स्तर कम होगा| जो भी हो; अब बिल्कुल भी चढ़ा नही जा रहा है| जोशीमठ से सुबह ९ बजे निकला हुँ| दो घण्टों में मुश्किल से तीन- चार किलोमीटर आगे पहुँचा होऊँगा| रूकते रूकते चलने के बाद कुछ देर में मुख्य सड़क मिली| चलो, पगडण्डी से तो राहत मिली| लेकिन इतना थका हुँ कि अब इस सड़क पर चलने में भी दिक्कत हो रही हैं| थोड़ी देर रूक कर ऊर्जा आने की प्रतीक्षा की| लेकिन बात बन नही सकी और पैर बिल्कुल थक गए|
अब एक ही विकल्प बचा है कि कोई वाहन मिल जाए औली जानेवाला| चाय पीते पीते उसकी भी प्रतीक्षा की|‌ प्रायवेट टूरिस्ट गाडीयाँ तो जा रही हैं, लेकिन कोई गाड़ी रूक नही रही है| अब दोपहर के बारह बज रहे हैं| अगर घसीटते घसीटते चला भी जाऊँ; तो वहाँ पहुँचने में चार- पाँच घण्टे लगेंगे| अर्थात् वही रूकना होगा| और शायद औली में होटल इस समय या तो बन्द हैं या फिर बहुत महेंगे रेसॉर्ट है| इन दोनों के लिए मै तैयार नही हुँ| वैसे भी ट्रेकिंग की पहली ही कक्षा में मैने प्रवेश किया है| अत: और कोई उपाय न देख वापस जोशीमठ के लिए लौटना पड़ा|
मन स्वयं को कोस रहा है| लेकिन क्या करें! मेरी तैयारी शायद कम रही| या मेरी इच्छाशक्ती नाकाफी है| जो भी हो| उतरते समय कुछ शान्ति मिल रही है| उतरते समय मुख्य सड़क से आया और उसके बाद एक शॉर्ट कट लिया जो मिलिटरी एरिया से जाता है| जोशीमठ सिर्फ एक पर्यटक स्थान ही नही है, वरन् एक सैनिकी स्थान भी है| तिब्बत सीमा से ७५ किलोमीटर पहले इस स्थान पर सेना का बड़ा केन्द्र होना स्वाभाविक है| स्काउट का केन्द्र हैं; बीआरओ के भी कार्यालय यहाँ हैं| मिलिटरी एरिया से जाते समय एक जवान से पूछ लिया की साबजी इस रास्ते से जाने की परमिशन तो है ना| नही तो और मुसीबत हो जाती| खैर; यह सड़क जल्द ही जोशीमठ ले गई| रास्ते में मिलिटरी के कई युनिटस, क्वार्टर्स और कँटिन्स लगे| करीब एक घण्टे में जोशीमठ के स्टैंड पर पहुँच गया|
कुछ जीपें खड़ी हैं| एक पल के लिए लगा कि, क्या आज तपोबन जा सकूँगा? दोपहर के डेढ़ बज रहे हैं| शायद कोई जीप जानेवाली हो| पता किया तो तुरन्त जीप मिल गई| यह तपोबन गाँव जोशीमठ- मलारी सड़क पर स्थित है| इस तरफ जीपें इस गाँव तक चल रही है, ऐसा बताया गया| जोशीमठ से तपोबन लगभग बीस किलोमीटर होगा| एक नक्शे में तपोबन की ऊँचाई ३००० मीटर से अधिक बतायी गई थी, इसलिए तपोबन जाने की इच्छा थी|
नजारे अद्भुत ही हैं| एक और रमणीय स्थान की सैर! उत्तराखण्ड में जब भी जीप में बैठा; बड़े शानदार गाने बजते रहें| अब भी यही क्रम चल रहा है| नए शिखर दिखाई दे रहे हैं| लगभग एक घण्टे में तपोबन आ गया| एक छोटा सा गाँव| सड़क यहाँ से आगे भी खुली है| कम से कम अगले एक- दो गाँवों तक जरूर खुली होगी| लेकिन उतना चलने की इच्छा नही है| फिर भी तपोबन के पास थोड़ा घूम लिया| सड़क से लग कर कुछ दूरी पर एक मन्दिर है| वहाँ तक पैदल गया| सड़क के किनारे स्कूल भी हैं| फैली हुई बस्ती है| रोड़ निर्माण के कार्मिक भी दिख रहे हैं| टहलते टहलते उस मन्दिर तक पहुँचा| इसी सड़क की दिशा में आगे द्रोणगिरी पर्वत है!
मन्दिर के पास एक गर्म पानी का झरना (कुण्ड) मिला| प्रकृति की कृपा भी बहुत खुब है! जितना उसके पास जाओ; उसकी कृपा बढ़ती जाती है| यहाँ का माहौल बहुत ठण्डा होता है| शायद उसी से बचने के लिए कुदरत ने यहाँ गर्म पानी दे रखा है| लदाख़ में भी देखा था कि नुब्रा व्हॅली में पनामिक के पास भी गर्म पानी के झरने हैं| इतने ठण्डे मौसम में भी उस पानी से भांप आ रही हैं| थोड़ी देर वहाँ टहल कर कच्चे रास्ते से वापस मूड़ा| यहाँ पास से ही एक छोटी नदी भी बह रही है| उस पर भी काफी निर्माण कार्य चल रहा है| कच्ची सड़क मुख्य सड़क को समानान्तर है| बीच बीच में काम करनेवाले मजदूर दिखाई दे रहे हैं| थोड़ी ही देर में स्कूल की इमारत पास आई और वहीं से यह कच्ची सड़क मुख्य सड़क से जुड़ गयी|
तपोबन गाँव छोटा हो कर भी यहाँ पर मिनि बँक है| डाक का दफ्तर है| होटल हैं| जोशीमठ की जीप जल्दी ही मिलेगी| गाँव के लोग बहुत सरल हैं| यहाँ अभी तक टूरिजम का रोग नही फैला है| इसलिए होटल भी सस्ते हैं| यह सड़क मलारी गाँव जाती है जो तिब्बत सीमा से सटा है| हालाकि अभी मलारी के बहुत पहले ही सड़क बन्द हुई होगी| लेकिन एक बात जरूर लग रही है कि तपोबन की ऊँचाई शर्तिया ३००० मीटर नही होगी| उसके कम ही होगी| शायद जोशीमठ के बराबर होगी| लेकिन नजारे की खूबसुरती में कोई कमी नही है| वापसी में सड़क से अपूर्व नजारे दिखें| बी.आर.. सड़क को बनाए रखने के लिए निरन्तर कार्यरत है| आज भी बहुत बरफ दिखी; लेकिन वह सब दूर पहाड़ी पर| कल जैसी सड़क पर नही मिली| खैर|
पाँच बजे जोशीमठ पहुँचा| आज मेरा जोशीमठ का आखरी दिन है| कल ऋषीकेश के लिए निकल जाऊँगा| जोशीमठ में एक जगह पेठा दिखी| पूछा की क्या यह जोशीमठ का स्थानीय उत्पाद है, तो दुकानवाले ने कहा कि नही; यह तो आगरे की ही पेठा है! और दुकानवाला भी सहारनपूर का है| सर्दी‌ के मौसम में भी व्यापार चलता है| अब रात फैलने लगी है| जल्द ही डॉर्मिटरी में रजाई के भीतर हुँ| आज भी अच्छे नजारे देखने को मिले| लेकिन. . . औली नही जा पाया| मन में एक सवाल बार बार आ रहा है| कल मै बद्रिनाथ की ओर जाते समय आसानी से सात किलोमीटर की चढाई चढ़ गया, कोई परेशानी नही आयी| ऐसा लग रहा था कि मानो कोई मुझे खींच रहा है| लेकिन औली में तो लगा की कोई रोक रहा है. . . खैर| कोई बात नही; असफलता ही सफलता का पहला कदम होता है| रात के साथ ठण्ड भी बढ़ने लगी और नीन्द भी आने लगी| अब बस सुबह जल्दी उठ कर साढ़ेपाँच की ऋषीकेश की बस पकड़नी है. . .
शंकराचार्य मन्दिर से आगे जानेवाली पगडण्डी से पीछे देखने पर










नीचे जोशीमठ और सामने एक दुर्गम गाँव की ओर जाती सड़क
यही पगडण्डी. . .























मलारी रोड़ पर स्थित तपोबन!



मन्दिर के पास गर्म पानी का झरना










































अगला भाग: अस्ति उत्तरस्यां दिशि नाम नगाधिराजः पर्वतोs हिमालय: ७ हिमालय की आज्ञा ले कर ऋषीकेश की ओर