Showing posts with label विकास. Show all posts
Showing posts with label विकास. Show all posts

Tuesday, June 28, 2016

प्रकृति, पर्यावरण और हम १०: कुछ कड़वे प्रश्न और कुछ कड़वे उत्तर


प्रकृति, पर्यावरण और हम ५: पानीवाले बाबा: राजेंद्रसिंह राणा

प्रकृति, पर्यावरण और हम ६: फॉरेस्ट मॅन: जादव पायेंग

प्रकृति, पर्यावरण और हम ७: कुछ अनाम पर्यावरण प्रेमी!

प्रकृति, पर्यावरण और हम ८: इस्राएल का जल- संवर्धन
 
प्रकृति, पर्यावरण और हम ९: दुनिया के प्रमुख देशों में पर्यावरण की स्थिति


कुछ कड़वे प्रश्न और कुछ कड़वे उत्तर

पर्यावरण के सम्बन्ध में चर्चा करते हुए हमने कई पहलू देखे| वन, पानी और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संवर्धन के कई प्रयासों पर संक्षेप में चर्चा भी की| कई व्यक्ति, गाँव तथा संस्थान इस दिशा में अच्छा कार्य कर रहे हैं| लेकिन जब हम इस सारे विषय को इकठ्ठा देखते हैं, तो हमारे सामने कई अप्रिय प्रश्न उपस्थित होते हैं| पीछले लेख में जैसे बात की थी कि एक पेड़ के काटने का मार्केट में मिलनेवाला दाम एक पेड़ लगाने के लाभ से कई गुणा अधिक है| इसलिए हम चाहे कितने भी पेड़ लगाए या वन संवर्धन करें, उनके टूटने की गति उससे अधिक ही रहेगी| इस लेख में ऐसे ही कुछ कड़वे प्रश्न और कड़वे उत्तरों की बात करते हैं|

जैसा कि हमने देखा आज जो देश पर्यावरण के सम्बन्ध में अग्रणि हैं वे ऐसे ही देश हैं जहाँ मानवीय बर्डन प्रकृति पर कम है| अर्थात् अपार प्राकृतिक सम्पदावाले कम आबादी के देश| इसी तथ्य में एक अर्थ में इस पूरी समस्या की जड़ और उसका समाधान भी है| हमारी आबादी और उसका प्रबन्धन कैसे करना यह एक बहुत अप्रिय प्रश्न है| और उल्लेखनीय है कि कोई इस पर बात भी करना नही चाहता है| उल्टा आज तो हर समाज और हर राजनेता अपने अपने समाज के लोगों की संख्या बढ़ाने पर ही जोर दे रहे हैं| लेकिन अब स्थिति बहुत ही विपरित हो रही है| एक समय में 'हम दो हमारे दो' या 'हम दो हमारा एक' ऐसी बातें ठीक थी| आज के समय में प्रकृति पर इन्सान का बर्डन और इन्सान का इन्सान पर होनेवाला बर्डन देखते हुए वस्तुत: आज ऐसे कपल्स का सम्मान किया जाना चाहिए जो माता- पिता नही बनना चाहते हैं| सिर्फ सम्मान नही, सरकार द्वारा ऐसे लोगों के लिए इन्सेन्टिव भी शुरू किया जाना चाहिए| क्यों कि अगर इसी क्रम से आबादी बढ़ती रही तो आनेवाली पिढियों को कुछ भी नही मिलेगा| एक ज़माने में जैसे आक्रमक ताकतें सारी दुनिया पर आक्रमण करती थी, उसी तरह इन्सान पूरी धरती पर आक्रमण करता जा रहा है| इसलिए अगर कुछ ठोस परिवर्तन लाना हो तो इन्सान के द्वारा प्रकृति पर हो रहे आक्रमण को रोकना ही होगा और उसके लिए जनसंख्या कम करना एक बेहद अहम पहलू है|



Sunday, June 12, 2016

प्रकृति, पर्यावरण और हम ९: दुनिया के प्रमुख देशों में पर्यावरण की स्थिति


प्रकृति, पर्यावरण और हम ५: पानीवाले बाबा: राजेंद्रसिंह राणा

प्रकृति, पर्यावरण और हम ६: फॉरेस्ट मॅन: जादव पायेंग

प्रकृति, पर्यावरण और हम ७: कुछ अनाम पर्यावरण प्रेमी!

प्रकृति, पर्यावरण और हम ८: इस्राएल का जल- संवर्धन



दुनिया के प्रमुख देशों में पर्यावरण की स्थिति

इस्राएल की बात हमने पीछले लेख में की| इस्राएल जल संवर्धन का रोल मॉडेल हो चुका है| दुनिया में अन्य ऐसे कुछ देश है| जो देश पर्यावरण के सम्बन्ध में दुनिया के मुख्य देश हैं, उनके बारे में बात करते हैं| एनवायरनमेंटल परफार्मंस इंडेक्स ने दुनिया के १८० देशों में पर्यावरण की स्थिति की रैंकिंग की है| देशों में पर्यावरण का कार्य कैसे चल रहा हैं, इसका यह एक मापदण्ड कहा जा सकता है| इस रैंकिंग में सबसे उपर के पाँच देश ये हैं- फिनलैंड, आईसलैंड, स्वीडन, डेन्मार्क और स्लोवेनिया| और जो सबसे नीचले देश हैं वे ऐसे हैं- अफघनिस्तान, नायजर, मादागास्कर, एर्ट्रिया और सोमालिया| विशेष बात यह है कि जो देश सबसे उपरी हैं उनमें पाँच देश उत्तर युरोप के प्रगत देश हैं और सिर्फ स्लोवेनिया उनकी तुलना में थोड़ा कम प्रगत देश है| और सबसे नीचे होनेवाले देश मुख्य रूप से राजनीतिक अस्थिरता होनेवाले देश हैं| सौभाग्य की बात है कि इस देश में सबसे नीचले देशों की सूचि में भारत नही हैं| इस रैंकिंग के कई निकष हैं- जैसे सरकार पर्यावरण के लिए कितनी प्रतिबद्ध हैं, प्रदूषण का स्तर कैसा हैं, कार्बन इमिशन्स कितने अनुपात में हैं, प्रजातियों के संवर्धन की क्या स्थिति है, पानी की एवलिबिलिटी कैसी हैं आदि|



Saturday, May 21, 2016

प्रकृति, पर्यावरण और हम ५: पानीवाले बाबा: राजेंद्रसिंह राणा



पानीवाले बाबा: राजेंद्रसिंह राणा

सूखे और अकाल के रेगिस्तान में हरियाली जैसे लगनेवाले कुछ उदाहरण भी हैं! उनमें से एक है राजेन्द्रसिंह राणा जी अर्थात् भारत के पानीवाले बाबा (Waterman of India)! आज यह इन्सान कई राज्यों के अकाल से संघर्ष करता हुआ नजर आता है| पहले राजस्थान के कई गाँवों मे जोहड़ और जलस्रोतों को पुनरुज्जीवित करने के बाद आज वे देशभर जाते रहते हैं और लोगों को पानी के संग्रह का महत्त्व बताते हैं| साथ में कई सरकारी योजनाओं को भी मार्गदर्शन देते हैं| द गार्डियन ने उनका नाम उन ५० लोगों की‌ सूचि में रखा है जो इस ग्रह को बचा सकते हैं|

इस पानीवाले बाबा से मिलना हुआ महाराष्ट्र के नान्देड जिले के देगलूर गाँव में| देगलूर में विश्व परिवार नाम के एक संघटन के 'अकाल निवारण परिषद' में जाना हुआ| वहाँ पहली बार इन महामना से मिलना हुआ| उनके भाषण को सुनने का अनुभव अनुठा था| उन्हे सुन कर बहुत विशेष लगा| पहली बात तो वे बड़ी यात्रा कर आए| उनकी ट्रेन छह घण्टा लेट थी| ट्रेन के बाद दो घण्टे का सफर उन्होने किया| लोग काफी समय से प्रतीक्षा कर रहे थे, इसलिए बिना रेस्ट हाऊस गए, वे सीधा कार्यक्रम स्थल पर पहुँचे| और उनका एकदम अनौपचारिक शैलि का भाषण हुआ| भाषण कहना नही चाहिए, मैत्रीपूर्ण बातचीत कहनी चाहिए| उन्हे सुनते हुए लगा कि ऐसा यह कोई अपना जाना पहचाना डाक्टर है जो हमारी बीमारी का ठीक इलाज जानता है|





Wednesday, August 14, 2013

चेतावनी प्रकृति की: २

उत्तराखण्ड कार्य में सहभाग से संबंधित यह एक अंग्रेजी  नोट-

DO WE WANT TO LEARN FROM MEMORANDA OF THE NATURE?

Backdrop

This brief note highlights lessons that we should learn from situation in Uttarakhand and perhaps other parts of our country. When we talk about calamity in Uttarakhand, influence of media make us to believe that it is limited only to Kedarnath and Chardham Yatra and it is just a matter of relief and rescue of stranded pilgrims. But actual field experience unfolds before us the fact that this is of significantly vast dimension than it is generally perceived. Around 20 lakh Ha agricultural land is destroyed and a large scale terrain has become endangered. In fact it is an urgent and severe memorandum of the nature to us. The nature is trying hard to tell us that we have taken a wrong course and we should change its direction and if we do not, then we should be ready to bear with the disastrous consequences.

Definition of the Problem

While going for reconstruction work in Uttarakhand through an NGO called Maitri; it was thought that the team would have to distribute ration and other supplies; would have to treat the patients and extend their help, true, this did happen. Maitri group worked in around 20 villages near Jauljibi and Dharchula region in Pithauragarh district and health camps were conducted in almost all villages. People from these villages were given ration, food, clothes and other supplies. Maitri is working in collaboration with local government and NGOs such as Arpan in Askot. But what was seen was not limited to this. Distribution of food, ration, medicines, clothes, books, necessary supplies; conducting health camps; monitoring with governmental agencies and local partners can be seen as a very noble initiative; but it is rather primary kind of work. No doubt, it is needed at initial stages and as a short term strategy; but the situation is so grave that one should do much more than this kind of surface work.

We need to reconsider what the problem is. Mere floods and damage due to floods is a very superficial problem. Primary cause of the floods was concentration of clouds near Kedarnath and it was due to an event called Western Disturbance. Similar to Eastern coast storms and US tornados, a dense cloud pocket was formed near Kedarnath and adjacent glaciers and after its limit, it broke off and it resulted in very heavy rains in surrounding parts. When we have an East Coast storm, say in Machhalipattinam or Vishakhapattinam, we have cloudy and rainy environment in areas which are as distant as Madhya Pradesh and Maharashtra. That is the impact of such a climatic process. The same can be said about flash floods. Although, its epicenter was near Kedarnath, it had huge impacts in all nearby high mountain regions. This is the high altitude Himalayan range where many rivers originate. When it rains in huge proportions within short time, all these rivers and their tributaries and connecting water streams are bound to overflow and ultimately cause huge destruction. This destruction and ways to mitigate it; ways to reconstruct losses is what we can do at this level. But, this calamity, the real calamity is manmade and we need to go into the roots. We need to have a holistic understanding about the scenario. Ground experience reveals the following alarming facts.

Alarming Facts
  •           Himalayan region is a special class of topography and it needs to be maintained well with a well defined framework of development. If we can manage with restricted vehicles in Matheran and in Lavasa, why we cannot manage with low level of burden on this region?
  •  ·   After flash floods, it is seen that all recent settlements are endangered and unstable. Roads, lands and farms near river and slide- prone region are more or less unstable. Even villagers are afraid to live in their original places; but they are also equally hesitant to leave it for uncertain future.
  •       It came to know that climate in Himalayan region is changing sharply. Now even at high altitude such as 6000 meters instead of snowfall, it rains there. Actually there should be only snowfall at such high altitudes. It is a symbol that climate is changing significantly.
  •  ·    There have been large scale encroachment of man over nature and it  resulted in the form of small- scale destruction by newly formed mountain water streams. There are many examples where newly formed streams have displaced entire villages.
  •     Tree cutting and physical encroachment has led to large scale changes in patterns of water flow and soil erosion. Trees have been cut significantly and therefore, there is not much scope to retain water and soil in the mountains. Lack of trees has given way to more streams and soil erosion. Also, it is resulting in increase of landslides and rock falling.
  •      It is observed that rivers are trying to flow in a straight way and this is likely to destruct whatever comes into their ways. Flows of rivers such as Kaliganga, Dhauliganga are changing sharply and they are likely to displace more settlements. It is seen that there was unusually high temperature in mountains before this flashflood (It was 46 degrees Celsius in Haridwar in May, for example). It suggests that equilibrium of nature is disturbed.
  •       BRO (Border Roads Organization), army and other paramilitary forces are constructing roads, bridges and path- ways in a brilliant way. That is a great relief to villagers whose roads are destroyed and who need to be courageous enough to climb 5 or 10 kilometers in mountains and carry their ration on this improbable path. But these newly created roads are far from permanent. Conditions are such that all these settlements are likely to be hampered in next flood or landslide. When a road is created, some part of a mountain has to be destroyed and therefore its hold becomes loose inviting future trouble. Although Himalaya is highest mountain in the world, it is so unfastened that it can easily collapse in scarcity of trees and soil.
  •      Check dams were useful to control excess water from rivers and they have prevented some losses.
  •      It is seen that newly constructed iron bridges were destroyed by the rivers; but old foot ways were largely intact and in fact they have been the only access link to remote mountainous villages.
  •       Cattle, agriculture, horticulture and vegetation are also components that are adversely damaged and thereby huge gap is being created.


Conclusion

It can be said that now there are three key concerns- alternative livelihood, framework of sustainable development and rehabilitation. These things are extremely tricky that if Himalayan habitation continues to undergo changes like this, then we may not be far from situation where we would have to declare this entire region inhabitable.

And this message is not just for Himalayan region. It is for us also. Repeated floods in cities, collapse of highway and damage to life and property due to streams and rivers which are buried in their own beds, uneven rains, human burden over resources etc. are memoranda at a primary level. It is high time that we learn from this and reframe our framework of development. But do we really want to learn from this lesson?  What we can do is extend our small help to affected people of Uttarakhand. We can also rethink about our own environment and assess it for better alternatives.

For direct help, one can contact Maitri team: www.maitripune.net; maitri1997@gmail.com, 02025450882.

पिछला भाग: चेतावनी प्रकृति की: १
क्रमश: 

Friday, April 22, 2011

सामाजिक दीर्घकथा

भुमिका




“जनहितासाठी जनसंवाद” ही एक सामाजिक दीर्घकथा आहे. सामाजिक कथा ह्यामुळे आहे, की कथेची भुमिका, प्रयोजन सामाजिक हितासाठी आहे. समाजात जगताना असंख्य समस्या दिसतात. हताश होण्यासारखी स्थिती दिसते. एकूण चित्र बिकट असूनही ह्यामध्ये काही प्रकाशाचे किरण निश्चित पणे दृष्टीस पडतात. काही ठिकाणी प्रकाशाची बेटंही आपण बघू शकतो. टप्प्या टप्प्यात ही दीर्घकथा इथे देतो आहे.



ही दीर्घकथा हा एक प्रयत्न आहे हे प्रकाशाचे किरण वेगळ्या प्रकारे बघण्याचा; समाजाच्या नजरेत येतील अशा प्रकारे मांडण्याचा. ह्यामागची भुमिका हीच, की ह्या प्रकारच्या कामाची प्रेरणा आपण सर्वांना मिळावी. कारण ह्यात जे काही आहे, ते आपल्या जीवनातलंच आहे. त्यामुळे ह्याचा आपल्या जीवनाला लाभ मिळावा, आपल्या समस्यांच्या विरोधात लढताना आपल्याला बळ मिळावं, हीच सदिच्छा ह्यामागे आहे. ही दीर्घकथा म्हणजे समाजात विखुरलेले प्रकाश- कण वेचून त्यांना ठळक स्वरूपात समोर आणण्याचा प्रयत्न मात्र आहे.








१. कुसगांव



कुसगांव... मराठवाड्याच्या एका दुष्काळी जिल्ह्यात डोंगराच्या व नदीच्या कुशीत वसलेलं हे एक छोटं गांव. कुशीत वसलेलं म्हणून कुसगांव. गावाची ओळख म्हणून गावात असतात त्या गोष्टी इथेसुद्धा आहेत. एक प्राचीन जैन अतिशय क्षेत्र, दरवर्षी भरणारी जत्रा, पावसाच्या पाण्यावर अवलंबून असलेली शेती, सहा महिने ऊसतोडणीसाठी जाणारे मजूर आणि त्याबरोबरच गावाबाहेरील भटक्या समाजाची वस्ती, गावाच्या कोप-यातील बौद्ध वस्ती, कुठल्याशा जुन्या अपूर्ण धरण प्रकल्पाने बाधित झालेली जमीन आणि पाण्यासाठी व सरपणासाठी वणवण भटकणा-या मुली व महिला. गांव तसे लहानच, पण पंचायत स्वतंत्र आहे. गावात हर प्रकारचा समाज आपल्या आपल्या रितीने नांदतो.



स्वातंत्र्यानंतर इतके वर्ष होऊनही गाव होतं तसंच राहिलं. नाही म्हणायला प्रतापराव मास्तरांच्या काळात काही प्रयत्न झाले. त्याच्यातूनच गावात सामुहिक वर्गणी व श्रमदानातून समाजमंदीर व कच्च्या सडक्या बांधल्या गेल्या व सर्वप्रथम गावात शौचालयाचा शिरकाव झाला. परंतु प्रतापराव गेले आणि त्यांनी गावात रुजवलेली ही प्रगतीही गेली. प्रतापरावांच्या वेळी बिनविरोध निवडल्या गेलेल्या पंचायतीमध्ये आत्ताच्या काळात वेगवेगळ्य़ा समाजगटांमध्ये तंटे होत होते; अधून मधून खून पडत होते आणि नशेचा सुकाळ झाला होता.



आजचं गाव हे असं चार गावांसारखंच. सुस्त, निद्रिस्त आणि संथ. गावात अनेक समस्या होत्या; अनेक जणांना तरास होता; परंतु कोणालाच त्याचं काहीच वाटत नव्हतं. कदाचित हीच गावची समस्या होती. गावात गरीबी आणि बेकारी वाढत होती आणि ह्याचं एक कारण शेतीमधला नफा संपत चालला होता. शेत गावावर रुसलं होतं. त्यामुळे गावात तरुण मंडळी बेकार व निष्क्रीय अवस्थेत जगत होती. गावामध्ये जणू काही काळ गोठून गेला आहे, असंच वाटावं असं दृश्य होतं.



ह्या परिस्थितीमध्ये बदल झाल्याचं पहिलं चिन्ह तेव्हा दिसलं, जेव्हा चार डोंगर पल्याड असलेल्या निमगांवातल्या दौलतरावांनी गावातल्या तरुण मंडळींसोबत बातचीत केली. दौलतराव निमगावाला पुढे आणण्यासाठी प्रामाणिक प्रयत्न करणारे एक ग्रामस्थ होते. चार गोष्टी माहिती करून घ्याव्यात आणि लोकांना सांगाव्यात; एकमेकांना धरून काम करावं हा त्यांचा प्रयत्न. त्यांच्या प्रयत्नांमुळेच अख्खं गाव एकत्र आलं आणि गावानं श्रमदानातून पाण्याच्या साठ्यासाठी कोल्हापूरी बंधारा बांधला होता. तेव्हापासून आजूबाजूच्या दो- चौ गावांमध्ये दौलतरावांच्या म्हणण्याला किंमत आली. कधी मधी गावातल्या कार्यक्रमाला त्यांना बोलावणं येऊ लागलं.

असंच एका वेळी कुसगांवामध्ये दौलतरावांचं काही कामानिमित्त येणं झालं. नेहमीच्या सवयीप्रमाणे त्यांना लोकांना भेटायचं होतं. गावातलं काम झाल्यावर जायच्या आधी त्यांनी महादूला सांगितलं, “बाबा रे, हितं आलो व्हतो. कोनी चार दोन लोक असतील तर पारावर बोलीव. दोन गोष्टी बोलू.” महादू, किंबहुना महादूचे सर्व कंपू एकाच प्रकारचे होते. ते नावाला कुठं कुठं शिकत होते; काही जॉब करत असल्याचं सांगत होते; पण जास्त करून गावातच पडीक दिसायचे. तसा काही ना काही उद्योग प्रत्येकाला होता; पण काम फारसं कोणीच करत नव्हतं. त्यांना दौलतरावांनी बरोबर हेरलं, त्यांना कामाला लावायचं ठरवलं.



चार तोंडं आली अन दौलतरावांची मीटिंग सुरू झाली! पावण्या माणसाशी नेहमी बोलतात तसं बोलणं झालं. दौलतरावांनी एकेकाची चौकशी केली; कोण काय करतो; शिकतो आहे का काम करतो आहे; शेती कशी चालू आहे असं असं. प्रत्येकाचं बोलणं झाल्यावर शांतपणे सांगायला सुरुवात केली, “पोरांनो तुमी लय नशीबवान आहात. अन मग? लेकांनो तुमच्याकडे आज लई हत्यारं हाईत. तुमच्यासाठी आज लई गोष्टी चांगल्या हाईत. पन तुम्हांला त्याचं काहीच देनं ना घेनं. तुमी प्रतापरावांच्या गावातले नौजवान आहात. आज प्रतापराव असते, तर त्यांची मान शरमेनं खाली गेली असती. का जानार नाय? आज दर महिन्यामंदी यकदा तरी गावात चकमकी होत्यात, कोणी कोणाचं भलं पाहत नाही, कोणती योजना ग्रामपंचायतीत येत नाय अन आली तरी राबवनारे लोक ती राबवू देत नाहीत, बायांना उघड्यावर बसाया लागतय, गुरा- ढोरांना चराया जिमीन नाय. अन लेकांनो तुमी हितं निसतं बसून खाता. काय बी उद्योग नाय. मला ठावं हाय तुमी काय उद्योग करता ते. बोलू नगा.”



“नाय काका, असं नाय. आमी बी ह्याच गावच्या आयेचं दूद पिलं हाय, आमी गप बसनार नाय.” हनमंत, महादूचा दोस्त बोलला. “यकदम बराबर हाय. कोनी समजू नये आमी रिकामे बसतो. आज ना उद्या आमी आमचं पानी अख्ख्या दुनियेला पाजवू.” शिवा बोलला. “शिवा, तू नेमीच असं बोलतूस. पन काय करतोस?” महादू. त्यावर दौलतराव बोलले, “पोरांनो, तुमी जवान आहात. तुमच्यामंदी ताकत हाय, जोश हाय, जान हाय. पन तुमी त्याचा काय बी वापर करत नाय. दुसरं काय?” “मग काका, आमी काय करावं असं तुमाला वाटतं? तुमी बोलायचं अन आमी करायचं. दुसरं आमाला सांगू नगा.” महादू बोलला. “तुमच्या मनी काय आसल, तर बोला. आमी सम्दे ते करायला तयार हाय. कार रे महाद्या, हनमंता, शिव्या अन मुल्ला? बरोबर ना? सम्दे येतील संगं.” “हो हो, आमी हाय. तुमी काय करायचं तेवडं बोला. पुढचं आमी पाहतो.” मुल्ला बोलला.



“अरे पोरांनो, असं काय करायचं काय इचारता. तुमी सम्द बघत नाय का. बायांचे पान्यामुळं लय हाल व्हत्यात, गुरांना चारा नाय, शेतीत दम नाय, कुटली योजना गावामंदी येत नाय. अन काय करायचं इचारता? आरं हे सम्द आता आपल्यालाच करावं लागनार नाय का?”

“आपल्याला! आन ते कसं?” ह्या प्रकारे चर्चा रंगत गेली. जाता जाता दौलतराव बोलले, “तुमी गावातल्या जुन्या जानत्या मंडळींसंगं बसा. त्यांना इचारा. तुमी आपापसात बी इचार करा, कोन काय काय करू शकल? अन तुमाला काय मदत लागली तर मह्याकडं या. म्या कदी बी तुमच्या सोबतीला तयार हाय.”



दौलतराव निघून गेले अन तरुण मंडळींमध्ये चर्चा रंगू लागली. “यार त्यो बाबा तर बरोबर बोलत हूता. आपन काय तरी केलं पायजे. पन काय करावं? किर्तनं भजनं ठुवावीत का?” “आरं दोस्ता, किरतन अन भजनांनी काय होनार? समाज भक्तीमार्गाला हाय की, अजून किती हवा? आपल्याला काम उबं केलं पायजेल.” “काम, ते कसं? त्ये तरी सांग.” “आरं दोस्ता, त्यासाठी आपन श्रमदान केलं पायजे; गावाला यक करून काम केलं पायजेल.” हे सर्व बोलणं ऐकणारा महादू बोलला तसे इतर शांत झाले. “मला वाटत गड्यांनो, हे असलं काम आपन गावामंदी लय येळा केलं हाय. त्यातून थोडफार काम होतंया, चार लोक येक होतात, श्रमदान करत्यात, चार दिस यकत्र दिसत्यात. अन त्या नंतर मातर त्येच की. मंजे परत मागं फिरल्यावानी. त्यातून काय बी बदल दिसत नाय. आपल्याला काय तरी निराळं केलं पायजेल.” चार माणसांमध्ये जास्त न बोलणारा म्हणून मुल्ला प्रसिद्ध होता. त्याने तोंड उघडलं तसे सगळे जण तिकडं पाहू लागले. “दोस्तांनो, यक आयडिया हाय. आपन याच्यावर काय काम केलं तर?” “याच्यावर मंजे कशावर? तुज्या डोस्क्यावर?” “आरं दोस्तांनो, ऐकून तर घ्या. तुमी ते मनत्यात ना- आर.टी.आय. चं नाव ऐकलं हाय का?” “ह्यो नवीनच काय आता?” “अरे ह्यो आर. टी. आय. मंजे लय भारी अस्त्र हाय. आर.टी.आय. मंजे राईट टू यिन्फॉर्मेशन यॅक्ट.” “अन ते काय असतं?” “अरे, मंजे माहितीचा अधिकार. शिरलं का डोस्क्यात?” “हां, कुटं कुटं ऐकल्यावानी वाटतया बगा.”



मग त्यांना मुल्लाने माहितीच्या अधिकाराची त्याला होती तेवढी माहिती दिली. त्यामध्ये ज्यांना जेवढं जेवढं माहित होतं; त्याप्रमाणे प्रत्येकाने भर घातली. आपण ह्या अधिकाराला धरून काही काम करावं असं त्यांना वाटत होतं. ह्यावर अजून माहिती घेऊ, असं मोघमपणे म्हणून पोरं पांगले. लवकरच गाव चिडीचूप होऊन गेला.



मध्ये काही दिवस गेले. असंच एकदा मुल्लाला महादू भेटला. परत विषय निघाला. मुल्ला आणि महादू हे सामाजिक जाण असलेले आणि काही करावसं वाटणार्य़ाा तरुणांपैकी दोन होते. त्यांच्यात चर्चा झाली; बाकीच्यांना बोलावून बसायचं ठरलं. हनमंत गावात नव्हता; शिवा गावात होता; पण शेतात असल्यामुळे येऊ शकला नाही. गावातील चंदू, संतोष आणि सिद्धार्थ हे इतर तीन तरुण नव्यानेच ह्या चर्चेत आले. मुल्लानेच विषयाला सुरुवात केली, “आपण तरुण लोकंच गावामंदी काय तरी करून दावू शकतूया. आपन मायतीचा अधिकार वापरून गावामंदी लय भलं करू शकतू.” त्यावर चंदू बोलला, “मायतीचा अधिकार... त्यो वापरून कसं कसं करनार? असं करनार का, की एकेका पंचायत सदस्यानं, ग्रामसेवकानं काय काय काम केलं त्याची यादी मागवनार?” सिद्धार्थ बोलला, “ते तर लय भारी व्हईल. यांनी आत्ता पस्तोर किती रूपया खाल्ला हाय ते तरी बाहीर येईल.” त्यावर महादूने सर्वांना समाजावल, “ते तर बरोबर हाय. पर दोस्तांनो, मायतीचा अदिकार इतका बी सरल नाय. त्यात आपन मायती मागू शकतो; पर ती यायला लय टाईम लागतू. तव्हर काय हातावर हात चोळीत बसायचं का?” त्याला मुल्लाने उत्तर दिलं, “मग यक करू. आपण हाट धा जन जमून दौलतरावांकडं जाऊ; ते काय तरी मार्ग सांगतील.” त्यावर आत्तापर्यंत गप्प असलेला संतोष बोलला, “दौलतराव निमगांवचे? अरे त्यो लय भला मानूस हाय. मी त्याला चांगला वळखतू. त्यो लई कडक बाबा हाय. आपल्याला काय बोलाया आदी त्यो इचारल, तुमी किती जन आहात, गावात कन कन तुमा संग हाय, तुमच्या डोसक्यामंदी इचार तरी काय हाय? मंग त्यो आपली मदत करल. त्याआदी तो आपल्याला बोलनार बी नाय.” “आरं तिच्याला. हे तर अवघड हाय. आता रं कसं?” चंदू म्हणाला. त्याला उत्तर देताना सिद्धार्थ म्हणाला, “माहितीचा अधिकार... हत्यार तर लय भारी हाय. पर त्याला टाईम पायजे अन दबाव पायजे. निसता अधिकार हाय मनून कोनी मायती देत नाय. त्याला लय राडा करावा लागतो.” “गड्या, राडा? त्यो कसला?” मुल्लाला उत्तर देताना सिद्धार्थ म्हणाला, “एक हाय बगा. आपन मायतीच्या अधिकारावर जनसंवाद लावू शकतो. मी यकदा शेरामंदी गेलो व्हतो; तवा तितं बगितला व्हता. लय भारी पर्कार हाय बगा. त्यामंदी आपन ग्रामपंचायत, ग्रामसेवक, गावातले इतर सरकारी मानसं यांना एकत्र आनतो. गावासमोर सभा करतो. आनि त्या सभेमंदी गावातले लोक असत्यात. अन ते डायरेक्ट अधिकार्य़ांाला प्रश्न करत्यात. म्या जो जनसंवाद पायला व्हता, त्यामंदी माता-या बाया अधिका-याला जाब इचारत होत्या अन सांगत व्हत्या; हितं हितं तुआ इतका इतका पैसा खाल्ला हाय. अन त्या अधिका-याची जबान पूरी गप जाली व्हती. तवा लय मजा आला; लय लोक गोळा झाले अन लय परिनाम जाला बगा.” “आर तिच्यायला...... लेका, हे तर लय भारी दिसतया. काय महादू, काय ते ज-न-सं-वा-द तुला मायती का?” “हो मुल्ला, मायती हाय; पन कदी बगितलं नाय. यकदा पेपरात वाचलं व्हतं. तसा मामला जोरदार हाय. पन त्याला तयारी बी लागतीया. आपल्याला बरच कष्ट पडल. पन आपन करू. काय बी अवगड नाय.”



त्यावर मग पुढे चर्चा झाली आणि आणखी काही लोकांना एकत्र करून दौलतरावांना भेटायला जायचं ठरलं. पण सिद्धार्थने म्हंटल्याप्रमाणे नुसतं दौलतरावांकडे जाण्याआधी काही तयारी करणं आवश्यक होतं, म्हणून महादू, मुल्ला, सिद्धार्थ, चंदू, हनमंत, संतोष आणि इतर आधी गावातल्या एका माजी सरपंचांना भेटले. त्यांना असं असं सांगितलं. त्यांनाही कल्पना आवडली. गावातली चार पोरं एक होऊन काही करत आहेत; तर चांगलंच असं ते म्हणाले. त्यांनी सल्ला दिला, “गावातल्या सरपंचांना भेटा. महिला बचत गटाच्या मंडळींनाही भेटा. ज्यांना भेटाल त्यांना सांगा, आमी दौलतरावांना भेटाया जातूय. गावामंदी कोन कोन तयार हाय, कोन कोन या कामामंदी हाय असं इचारलं तर तुमचं नाव सांगू का, असं इचारा. दौलतरावास्नी सम्दा तालुका वळखतोय. सम्दे होच मनतील. असं समद्या गावातल्या लोकांना भेटून, अजून चार पोरं घेऊन मगच त्यांना भेटा. त्याचं वजन पडल. अन गावातल्या लोकांना बी वाटल, पोरं काय तरी खरच करत्यात; नाय तर नुसत्या गप्पांना कोन बी इचारत नाय.”



असं झाल्यावर सगळे पोरं गावातल्या बुजुर्गांना भेटले. इतके लोक पाहून आणि बाहेरच्या गावात जाऊन येणार म्हंटल्यावर मदतीला कोणी नाही म्हंटले नाही. तरीही अनेक लोक प्रश्नार्थक आणि शंकायुक्त नजरेने त्यांच्याकडे पाहत होते. वेळ ठरवून सगळे लोक दौलतरावांना भेटायला निमगांवला गेले. तिथल्या पारावर सर्वांनी बैठक मारली. गप्पा रंगू लागल्या........




क्रमश:






२. संवादाला सुरुवात

चर्चेचे प्रमुखपद अर्थातच दौलतरावांकडे होतं. त्यांनी पहिले सर्व तरुणांचं म्हणणं शांतपणे ऐकून घेतलं. त्यांना त्यांची कल्पना पूर्ण मांडू दिली. त्यांचं कौतुक करून त्यांच्या योजनेमध्ये आणखी भर घातली; आपल्या अनुभवाचे बोल सांगितले. ते म्हणाले, “आनंद होतोय तुमचा प्रयत्न पाहताना. ह्यातून नक्कीच काहीतरी चांगलं उभं राहील. तुमची कल्पना बी भारी हाय. म्या पायले हायेत काही जनसंवाद. त्यातून चांगला परिनाम व्हतो. त्यामंदी काही गोष्टी अजून असल्या पाहिजेत. एक तर आधीची तयारी लय मोठी लागल. लय धावपळ करावी लागल. दुसरं मंजे त्याचं नीट नियोजन करावं लागल. कारन जनसंवाद मंजे मोठा कार्यक्रम हाय. त्यात सर्व काही आलं पायजे. मंजे आदी जनसंवादाच्या पार्श्वभूमीवर आपल्याला काय तरी कार्यक्रम ठुवावा लागल; ज्यामंदी आपन जनसंवाद घेऊ शकतू. मग आसं करता येईल, की मायतीच्या अधिकारावर आपन एक सभा घेऊ आनि तितच जनसंवाद करू. मंजे सरकारी लोकांना अन पंचायत सदस्यांना बोलावू.” पोरं खुश होती. अनुमोदन देत होती. शिवानं विचारलं, “दादा यक सांगता का, जनसंवाद मंजे नक्की कोनामध्ये संवाद अन कोनामध्ये वाद हो?” सर्वांच्या चेह-यावर स्मितहास्य उमटले. “ते पाहा, जनसंवाद ही लय मोठी गोष्ट हाय. ह्यामंदी मुख्य म्हणजे सरकारी अधिकारी- त्यामंदी आपले पंच बी आले- अन जनता यांचा आमने सामने डायलॉग हाय. डायलॉग कसा, लय भारी. मंजे जनता सरकारला जाब इचारतीया. तुमी बोलला व्हता असं असं करतो; हितकी हितकी कामं करतो. अन अजून का केलं नाय? लोक त्यांच्या तक्रारी समोर मांडतात. त्यासाठी आपल्याला सम्दी तयारी करावी लागल. गावात कोनाच्या काय काय तक्रारी हायेत, ते पाहावं लागल. त्यासाठी लोकांना भेटून मायती गोळा करावी लागल. मायतीचा अधिकार वापरून सरकारकडून, जिल्हा परिषद मना, आमदार निधी मना, त्यातून किती किती रक्कम मंजूर हाय, तिचा वापर अन हिशेब किती हाय अन कितीचा हिशेब लागत नाय ते बी शोधावं लागल. लोकांना उबं राऊन तक्रार करायला तयार करावं लागल. ही गोष्ट सोपी नव्हं. लोक तयार होत नाहीत. ऐन टायमाला कच खातात. बाबांनो, तवा ह्या सम्द्या गोष्टी ध्यानात ठूवा.” सर्वांच्या मनात काही प्रश्न होते; त्यांना महादूने वाचा फोडली. “बाबा, यकदम बराबर हाय. पर ह्यो मामला तर लईच मोठा दिसतोया. आमांला जमल ना? आमाला ह्यामंदी नक्की काय काय करायला पायजे, त्याची सविस्तर मायती द्या ना.”

अशी एकूण चर्चा झाली. दौलतरावांनी पोरांसोबत सविस्तर चर्चा केली. सर्व बाबतीत मार्गदर्शन केलं. त्यांची जवाबदारी सांगितली. म्हणाले, “तुमी हे सम्द करनार. तुमाला लय काम करावं लागल. मदी मदी खर्च करावा लागल. लय धावपळ करावी लागल. अन सम्द्या गावातल्या लोकांना सोबत ठूवावं लागल. म्या संगं हायच; पन काम तुमी करनार; अन यकटं नाय; तर सम्द्या गावाला यकत्र आनून करनार.” मग त्यांनी त्यांच्याकडील जनसंवादाची डीव्हीडी पोरांना बघायला दिली. कुसगांवात २-३ जणांकडे डीव्हीडी प्लेयर होते; त्यामुळे ते न्यायची गरज पडली नाही. महादू, सिद्धार्थ आणि मुल्ला ह्यांनी सर्वांच्या वतीने जवाबदारी घेतली. त्यांना दौलतरावांनी अजून काही पुस्तिका व पेपरामधल्या बातम्या वाचायला दिल्या. मुख्य कामाची रूपरेषा ठरवून दिली. पुढची मीटिंग कुसगांवात घेऊ, असं ठरवून चर्चा संपली. दौलतरावांनी निवडक तरुणांना जवळच्या शहरातील स्वराज्य संस्थेत प्रशिक्षणासाठी पाठवण्याची तयारी दर्शवली. स्वराज्य संस्थेत त्यांना माहितीचा अधिकार व जनसंवाद पद्धत, ह्यावर दोन दिवसीय प्रशिक्षण देण्यात येणार होते; त्यासाठीचा खर्च दौलतराव करणार होते.



ह्या प्रकारे सुरू झालेल्या प्रयत्नातून पहिल्यांदाच कुसगांवामध्ये जनसंवाद घेण्यात येणार होता. दौलतरावांच्या बाहेरच्या मार्गदर्शनाखाली मुख्यत: महादू, सिद्धार्थ आणि मुल्लाच्या नेतृत्वाखाली गावातली तरुण मंडळीच हे काम करणार होती. उन्हाळ्याचे दिवस होते; त्यामुळे शेतात फार काम नव्हते आणि कॉलेजलाही सुट्ट्या होत्या. त्यामुळे हे तरुण वेळ काढू शकले. सर्वांच्या विचारांनुसार जनसंवादाचा दिवस वार्षिक जत्रेच्या समारोपाचा ठरवण्यात आला. त्यावेळी जास्तीत जास्त लोक गावात राहिले असते. त्याला अजून दीड महिना वेळ होता. त्या वेळेला लक्षात घेऊन तयारी सुरू करण्यात आली.



सिद्धार्थ, महादू आणि मुल्लाच्या लक्षात आले होते, की त्यांना अनेक पातळ्यांवर काम करावं लागणार होतं. एक तर गावाच्या विकासाच्या संदर्भातील व गावातील लाभार्थींसाठी असलेल्या सर्व सेवा, योजना व लाभांची माहिती गोळा करणे आवश्यक होते. त्यातून गावातील रूपरेषा स्पष्ट झाली असती. नक्की अन्याय कुठे होतो आहे; हे समजून त्याचा पाठपुरावा करता आला असता. परंतु वेळ कमी होता. म्हणून मग काही निवडक योजना/ सेवा ह्यांना पुढे ठेवून लाभार्थींना मिळालेल्या लाभाची माहिती गोळा केली जाऊ लागली. त्यामध्ये महिला- बाल कल्याण, आरोग्य, रोजगार हमी योजना, घरकुल योजना, दलित वस्ती सुधार योजना, पंचायतीने केलेल्या भटक्या विमुक्तांसाठीच्या योजना आदिंचा समावेश होता. व्यक्तिगत लाभार्थ्यांची माहितीही गोळा केली जाऊ लागली.



सहभागी तरुणांना आपले आपले काम समजण्यामध्येच १५ दिवस निघून गेले. हळु हळु मंडळींचा जम बसू लागला. ह्या कामातला उत्साह व क्षमता ह्यांचा विचार करून ५ जणांची निवड करून त्यांना प्रशिक्षणासाठी स्वराज्य संस्थेत पाठवले गेले. मुख्य काम तसेच चालू राहावे, म्हणून गावकर्यां नी महादूला थांबवून घेतले. महादूच्या पुढाकाराखाली गावातले तरुण नेटाने कामाला लागले. त्यामध्ये मुख्यत: गावात शेती/ इतर व्यवसाय करणारे आणि कॉलेज व शाळेत शिकणा-या तरुणांचा समावेश होता. गावामध्ये त्यांच्या काही बैठका झाल्या. माजी सरपंचांच्या सल्ल्यानुसार बचतगटामधील महिलाही त्यांच्यामध्ये सहभागी झाल्या.



प्रशिक्षणाला गेलेले तरुण परत आल्यानंतर गावात संध्याकाळी मोठी बैठक भरली. त्यामध्ये दौलतराव आले होते; तसेच कुसगांवामधले जुने जाणते लोक, बचत गटाच्या महिला, माजी सरपंच असेही जमले. बैठक जोरदार झाली. प्रशिक्षण घेतलेल्यांनी त्यांचे अनुभव सांगितले. त्यांना काय काय नवीन माहिती मिळाली ती त्यांच्या त्यांच्या भाषेत सांगितली. त्यामध्ये दौलतराव भर घालत होते. ‘स्वराज्य’ संस्थेमधील एक कार्यकर्ते जनसंवादाच्या एक दिवस आधी येऊन सर्व तयारीमध्ये सामील होणार आहेत, हे कळाल्यामुळे सर्वांना हुरूप आला. काम करणार्य़ां नी त्यांचे अनुभव सांगितले. चंदू म्हणत होता, “आमी काम करतो; तवा लोक आमाला लई परश्न इचारत्यात. ते मनत्यात हे काय काम हाय, कुनासाठी तुमी करता? तुमी कोनत्या पार्टीचे आहात? लोक इचारत्यात आमी जय महाराष्ट्रवाले का जय भीमवाले आहोत? मग आमी बोलतो की आमी दौलतराव दादांच्या सांगन्यानुसार काम करतो. तवा ते शांत व्हतात व मायती देतात.”



त्यावर दौलतराव मनाले, “आरं पोरा, हे सम्द्या गावाचं काम हाय. ते गावाच्या नावानंच चालू द्या ना. माझं नाव मंदी नगा घालू. अन लोकांना निसतं कोनत्या ना कोनत्या झेंड्याखाली/ पक्षाखाली काम करनारे लोक माहित हायेत. पन त्या पलीकडे जाऊन आपन कोना एका पक्षासाठी/ समाजासाठी काम न करता समद्या गावासाठी काम करत आहोत; हे त्यांना सांगितलं पायजे. आपल्याला का मायती हवी, कशासाठी, त्यांचा काय फायदा हे बी त्यांना बोललं पायजे. मंग त्यांच्या लक्षात येईल, की रं.” चर्चेमध्ये माहितीच्या अधिकाराच्या अर्जांवरही चर्चा झाली. मुल्ला म्हणाला, “आमी स्वराज्यमधून ये फारम आनले हायेत. त्यानं अर्ज भरून मायती गोळा करू. यळ लागत असला तरी फारम तर भरून ठूवू. समोरासमोर जाब इचारता येईल, की मायतीच्या अर्जावर काम तरी काय केलं.” जुन्या जाणत्या लोकांनीही चर्चेत भाग घेतला आणि त्यांच्या ओळखीच्या सरकारी माणसांची नावं दिली; ज्यामुळे सरकारी योजनांविषयी, मंजूर झालेल्या निधीविषयी माहिती गोळा करताना मदत झाली असती. चर्चेमध्ये सर्वांचे मत पडले, की आता गावातल्या कोणा तरी मोठ्या माणसाने ह्या कार्यक्रमाची जवाबदारी घेऊन समोर येणे आवश्यक झाले होते. त्यानुसार सर्वांनी आग्रह केल्यावर माजी सरपंच लक्ष्मणदादा तयार झाले. ते आणि त्यांनी पूर्वी स्थापन केलेलं ग्रामविकास प्रतिष्ठान ह्या कामात सर्व प्रकारे सामील होण्यास तयार झाले. हा कार्यक्रम ग्रामविकास प्रतिष्ठानच्या नावानं घेण्यात यावा, असं ठरलं. तसेच, कार्यक्रमात कोणाला बोलवावं, कोण अधिकारी माणसं असतील आणि बाजूच्या गावांमधून कोणाला बोलवावं हे सर्व ठरवण्यात आलं. रात्री उशीरापर्यंत चर्चा चालल्यामुळे गावामध्ये आपोआप एक उत्सुकता निर्माण झाली आणि वातावरण निर्माण होण्यास सुरुवात झाली.



त्यानंतर काही दिवसांनी परत महादू, सिद्धार्थ, हनमंत व मुल्ला ह्यांच्या टीममधील लोकांची एक विशेष बैठक झाली. त्यामध्ये सुमारे २० जण तरी होते. ह्या चर्चेची सूत्रं मुल्लाकडे होती. त्याने त्याच्या प्रशिक्षणाच्या आधारे अनेक गोष्टी मांडल्या. एक तर ह्या कामामध्ये पुढे बराच खर्च येणार होता. अनेक प्रकारची कामं वेळेच्या मर्यादेत करावी लागणार होती. त्यासाठी मग एकदा कामाचे स्वरूप स्पष्ट करून झाल्यावर वेगवेगळ्या समित्या स्थापन करण्यात आल्या. म्हणजे निधी संकलन समिती, माहिती संकलन समिती, प्रचार समिती, देखरेख समिती इत्यादि. देखरेख समिती प्रत्येक समितीच्या व सदस्याच्या कामावर व वेळेत ते पूर्ण होण्यावर देखरेख ठेवणार होती. प्रचार समिती गावामध्ये व गावाबाहेर कार्यक्रमाचा प्रचार करणार होती; सरकारी अधिकार्य़ां्ना संपर्क करून त्यांना बोलावणे, आसपासच्या गावांमधील लोकांना बोलावणे ही कामं करणार होती. माहिती संकलन समितीवर मिळालेल्या माहितीची नीट मांडणी करून योग्य कागदपत्र बनवण्याचंही काम होतं. निधी संकलक समिती गावकर्यांचना व्यक्तिगत भेटून त्यांच्याकडून शक्य त्या आर्थिक मदतीची व इतर मदतीची गरज मांडत होती. अर्थातच सर्व समित्यांमध्ये सदस्य समान होते; त्यामुळे कोणी कोणी ३-३ तर कोणी ४-४ समित्यांचे सदस्यही झाले.



आपल्या कामाला लोकांचा प्रतिसाद मिळावा म्हणून लोकांनी शक्कली लढवल्या. प्रचार समितीने गावाबाहेरच्या रस्त्यावरून जाणा-या महामंडळाच्या बसवर पत्रक चिटकवलं. शाळेत नोटिसी लावल्या. शाळा आणि अंगणवाडीतर्फे प्रत्येक घराला ह्या कामाची माहिती देण्यात आली. त्यामुळे लाभार्थींची माहिती गोळा करणे काहीसे सोपे झाले. निधी संकलन समितीनेही बरेच डोके चालवले. त्यांनी निधी गोळा करण्याचे दोन मार्ग ठरवले. एक तर प्रत्येक कुटुंबाकडील जमिनीच्या प्रमाणात पैसे द्यावेत; किंवा जर जमीन नसेल; तर घरातील कुटुंब संख्येच्या प्रमाणात पैसे द्यावेत असे लोकांना सांगण्यात आले. त्यामुळे बहुतेकांनी आपल्या जमिनीच्या व जमीन नसल्यस कुटुंब संख्येच्या प्रमाणात काही ना काही पैसे दिले. प्रत्येक जण पैसे देत असल्यामुळे शेठ, सावकार, जमीनदार लोकांनासुद्धा त्या प्रमाणात पैसे द्यावे लागले. कार्यक्रमाचे स्वरूपच माहितीचा अधिकार व योजनांमधील भ्रष्टाचार ह्या संदर्भात असल्यामुळे व प्रत्येकाचे हित त्याच्याशी निगडीत असल्यामुळे बहुतेकांनी सहकार्य केले. फार थोड्या लोकांनी पैसे दिले नाहीत. मग त्यांनी कार्यक्रमाच्या दिवशी पाण्याची व्यवस्था बघावी, पाहुण्यांच्या चहा- फराळाची व्यवस्था बघावी व तिथे थांबावं असे पर्यायसुद्धा निघाले.



अशी जनसंवादाची लाटच गावात निर्माण झाली आणि तेच काम करता करता दिवस भरभर निघून गेले. जनसंवादाला फक्त ८ दिवस राहिले.









३. पूर्वतयारी आणि.....





दौलतराव आणि इतर वयस्कर तसेच स्वराज्य संस्थेतील कार्यकर्ते ह्यांच्या संपर्कात महादू आणि इतर जण होतेच. त्यामुळे त्यांचे मार्गदर्शन मिळत राहिले आणि काम पुढे सरकत गेले. लाभार्थींच्या माहितीचे संकलन पूर्ण झाले. नियमानुसार, कागदोपत्री असलेल्या योजनेनुसार फारसा कुणालाच लाभ मिळालेला नव्हता. फक्त त्याची नोंद घेण्यात आली. त्यानुसार काही लाभार्थींना जनसंवादमध्ये बोलण्यासाठी प्रोत्साहन दिले गेले. टीममधील काही जण अशा लाभार्थींच्या (म्हणजे जे लोक लाभार्थी होते; पण त्यांना काहीच लाभ मिळालेला नव्हता); घरी जाऊन त्यांना भेटून बोलण्यासाठी तयार करू लागले. महिला बचत गट व महिला मंडळाच्याही सदस्या ह्या टीमच्या सोबत शक्य त्या प्रमाणात असत. त्यातून काही लोक तयार झाले. तर काही लोक भितीमुळे तयार होत नव्हते. अनेक प्रकारच्या योजनांच्या, सेवांच्या संदर्भात लाभार्थ्यांशी भेटी झाल्या.



काही वेळा ग्राम पंचायतीच्या सदस्यांच्या संदर्भातही वेगळा अनुभव आला. साधारणपणे ते विरोध करत नव्हते; पण काही बाबतीत त्यांनी माहिती देण्यास नकार दिला. ही माहिती त्यांना व्यक्तिगत त्रास देण्यासाठी वापरली जाईल, असं त्यांना वाटत होतं. तसेच काहीवेळा त्यांची कृत्येही त्यातून बाहेर येण्याची त्यांना भिती वाटत होती. त्यांना समजावण्याचं काम सिद्धार्थने केलं, “दादा, आम्हांला मायती पायजे. मायती कोनाच्या इरोधात नग हाय; तर काय काम जालं, किती काम अजून बाकी हाय, या करता हवी हाय. ह्यो जनसंवाद हाय, वाद- विवाद नाय. आमाला तुमाला संगं घेऊनच हा संवाद करायचा हाय.” कोणी कोणी मान्य करत होते. कोणी कोणी विरोधी सुरातच बोलत होते. ज्या लोकांचे काम न होण्यामध्ये त्यांचा हात होता; त्यांच्याबद्दलही ते जागरूक झाले, त्यांना चिंता वाटू लागली; की उद्या हेच लोक आपल्याला बोलतील. म्हणून मग काही प्रमाणात त्या लाभार्थींना धमकावणे, गप्प बसण्यास सांगणे, हेही सुरू झाले. दौलतरावांनी महादूला सावध केले आणि लाभार्थींना विश्वासात घेण्यास व आधार देण्यास सांगितले. त्यासाठी महादूने बचत गटांची मदत घेतली.



दौलतरावांनी आणखी एक मुद्दा मांडला, की हा जनसंवाद फक्त नकारात्मक बाबतीतील संवाद असू नये. तर त्यामध्ये चांगल्या गोष्टीसुद्धा समोर आल्या पाहिजेत. “उदारण द्याचंच जालं तर गावातले शिपाई दामूकाका. ते नेमीच सम्द्यांना सहकार्य करत्यात; त्यांच्याबद्दल आपण बोललं पायजे. निसतं कटु बोलून काम भागनार नाय ना; जे जे चांगलं असेल; ते बी जनसंवादात बोलू.”



गावातली जत्रा सुरू झाली. जनसंवादाची तयारी शिगेला पोचली होती. माहिती गोळा करण्याचे काम जवळपास झाले होते. लाभार्थी, सरकारी योजना, निधी, पंचायतीच्या योजना इत्यादीबद्दल आधी ठरवल्याप्रमाणे माहिती गोळा केली गेली. माहितीची मांडणीसुद्धा करण्यात आली. जनसंवादात जे लाभार्थी बोलणार होते; त्यांच्याकडून रंगीत तालिमही करण्यात आली. त्यावेळी तरी लोक बोलायला तयार होत होते. अर्थात, ही तालिम वेगळी आणि प्रत्यक्ष शेकडो लोकांसमोर बोलणं वेगळं, ह्याची कल्पना जाणकारांना होती.



तालुका स्तरावरील सरकारी अधिकार्यांपना निमंत्रण देण्यात आले. आसपासच्या गावामध्येही जनसंवादाची सूचना गेली होती. जत्रेच्या वातावरणामध्ये गावामध्येही जनसंवादाची भरपूर प्रसिद्धी करण्यात आली. कार्यकर्त्यांची शेवटची धावपळ सुरू झाली. जनसंवाद दोन दिवसांवर आल्यामुळे मंडप, बसायची व्यवस्था, पाण्याची व्यवस्था, माईक, स्पीकर्स, बॅनर इत्यादिंसाठी धावपळ सुरू झाली. दलित वस्ती आणि गावाबाहेरील भटक्या विमुक्त समाजातील वस्तीवरीलही माहिती गोळा करून झाली आणि तिथल्या लाभार्थींनीही बोलण्याचा सराव केला.



जत्रेच्या गडबडीमध्ये अखेर एक मोठी गोष्ट घडलीच. ग्राम पंचायतीच्या समोरील समाज मंदिरातील एका मौल्यवान मूर्तीची चोरी झाली. क्षणात सर्व परिस्थिती पालटली. गावामध्ये तणाव पसरला. पोलिस आले आणि त्यांनी नेहमीप्रमाणे भटक्या वस्तीवर जाऊन मिळेल त्याला अटक केली. साहजिकच वस्तीत तणाव पसरला आणि त्यांनी निदर्शन करण्यास सुरुवात केली. गावात राहणारेसुद्धा अस्वस्थ होऊन गेले आणि त्या निदर्शनांमुळे त्यांच्या अस्वस्थतेत भरच पडली. गावात पोलिस बंदोबस्त वाढला आणि जनसंवाद होऊ शकणार नाही, असे पोलिसांनी जाहिर केले. सर्वांच्या उत्साहावर फार मोठे विरजण पडले.

































४. जनहितासाठी जनसंवाद

पोलिसांनी जनसंवाद होणार नाही; असे घोषित केले असले, तरीही कार्यकर्त्यांनी आशा सोडली नव्हती. गावातल्या बुजुर्गांच्या भेटी घेतल्या गेल्या. एकत्रपणे कार्यकर्ते फिरून लोकांना शांत करू लागले. वडिलधारे लोक त्यांच्यासह गावभर फिरू लागले. हळुहळु लोक शांत झाले. मागे फिरले. तरीसुद्धा पोलिसांचे सांगणे होते, की भटक्या समाजातील लोकांनी व गावातील लोकांनी आपापसात संघर्ष करू नये, ह्यासाठी पोलिस बंदोबस्त ठेवून जनसंवाद रद्द केला पाहिजे. त्यावेळी बुजुर्ग एकत्र झाले आणि म्हणाले, “हा आम्ही व आमचे समाज- बांधव ह्यांच्यातील तणाव आहे; आम्ही मिळून हमी देऊ; मग जनसंवाद होऊ देता का?” प्रयत्न केल्यावर पोलिस अधिकारी म्हणाले, “मला भटक्या समाजातील चार लोक आणि गावातील चार जण ह्यांच्यासमोर एकत्र शपथपूर्वक हमी द्या, मग मी परवानगी देतो.” लगेचच गावातील कार्यकर्ते व काही बुजुर्ग भटक्यांच्या वस्तीवर गेले. तिथले लोक आधीच संतापलेले होते. ह्यांना सगळ्यांना एकत्र येताना पाहून ते पहिले तर धावूनच आले. मग ओळखीच्या चेहर्यां ना बघून व परिस्थिती समजून घेऊन शांत झाले. सिद्धार्थने त्यांना समवावले, “बाबांनो. तुमच्यावर आजवर लई अत्याचार झाला हाय. तुमचं दुखणं सरकार नाय पण आमी समजू शकतो. आमी तुमच्यासोबत आहोत. उद्या जनसंवाद होनार हाय; तो तुमच्या बी फायद्याचाच हाय. त्याच्यामंदी तुमी पोलिसांनी जे जे अन्याय तुमच्यावर केले हायेत, त्याबद्दल बोलू शकता. तुमाला भिन्याचं काय बी कारण नाय. सम्द गाव उद्या बोलनार हाय.” त्यांनाही धीर आला. त्यांच्यातील विशेष पीडित व्यक्तींची आधी माहिती घेतली गेली असल्यामुळे आणि ते बोलणार आहेत, ह्याची माहिती असल्यामुळे तेही शांत होण्यास व सहकार्य करण्यास तयार झाले. एकत्र पोलिसांना भेटून समाज- सदस्यांनी शांततेची हमी दिली आणि जनसंवाद होण्याचा मार्ग मोकळा झाला.



ह्या घटनेबद्दल नुकत्याच गावात आलेल्या स्वराज्यच्या कार्यकर्त्यांनी- महेशजींनी आनंद व्यक्त केला. पूर्वतयारीपासूनचे ते जनसंवादामध्ये सामील होणार होते आणि माहितीच्या अधिकारावर व्याख्यान देणार होते. त्यांच्या मार्गदर्शनाखाली कार्यकर्त्यांनी एकदा गोळा केलेल्या माहितीची उजळणी केली; त्यातील कच्च्या बाबी पक्क्या केल्या. कार्यक्रमाच्या संचालनाबद्दल चर्चा केली. ह्या सर्वांबद्दल मुक्कामासाठी गावात आलेल्या दौलतरावांनी समाधान व्यक्त केले. दुस-या दिवशी सकाळी ११ ला जनसंवाद सुरू होणार होता. तयारी व चर्चा रात्री उशीरापर्यंत चालू होत्या.



अखेर तो दिवस उजाडला. महिला मंडळाच्या सूचनेनुसार व नियोजनानुसार सकाळीच थाळीफेरीचे आयोजन केले गेले होते. शाळेतल्या मुला- मुलींनी मोठ्या उत्साहाने त्यात भाग घेतला. दवंडीही पिटण्यात आली. गावामध्ये उत्साहाचे वातावरण पसरले होते. अर्थात भितीमुळे व कालच्या चोरीमुळे काही जण नाराज होते व असंतुष्ट होते. मंडप व कार्यक्रमाची इतर व्यवस्था पूर्ण झाली. कार्यकर्त्यांनी धावपळ करून सर्व व्यवस्था चोख ठेवली. पेपरमध्ये बातमीसुद्धा आली असल्याने इतर गावांमधील ग्रामस्थही गावात आले होते. त्यांची व्यवस्था समित्यांचे सदस्य व गावकरी मिळून बघत होते. जो तो ठरवून दिल्याप्रमाणे काम करण्याच्या प्रयत्नात होता. नवीन लोक चुकत होते; पण शिकण्याचा प्रयत्न करत होते. वृत्तपत्रांचे बातमीदार व सरकारी अधिकारी येण्यास सुरुवात झाली. इतर गावांमधील आमंत्रितही आले. सरकारी अधिकारी मात्र कमी संख्येने आले आणि तेही उशीराच आले. त्यामध्येही मुख्यत: अंगणवाडी सेविका, एएनएम नर्स, ग्रामसेवक असे गाव पातळीवरील कर्मचारीच जास्त होते.



अखेर सर्व महत्त्वाच्या व्यक्तींच्या आगमनानंतर कार्यक्रमास सुरुवात झाली. लोक मोठ्या संख्येने गोळा होण्यास सुरुवात झाली होती. प्रारंभी सर्वांचे स्वागत करून लक्ष्मणदादांनी ग्रामविकास प्रतिष्ठानचा परिचय करून दिला. नंतर कार्यकर्त्यांचा परिचय झाला. पहिले सत्र महेशजींच्या माहितीच्या अधिकारावरील व्याख्यानाचे होते. दोन तासाच्या ह्या सत्रामध्ये महेशजींनी स्वराज्य संस्था, संस्थेने आयोजित केलेले जनसंवाद ह्याबद्दल थोडक्यात सांगून माहितीच्या अधिकाराबद्दल सविस्तर माहिती दिली; त्याचा उपयोग कसा कसा केला गेला, ते सांगितले.



ते सत्र संपता संपता लोकांमध्ये चुळबुळ वाढत गेली. लोक दाटीवाटीने येऊन बसत होते; त्यामुळे आणखी व्यवस्था करावी लागली. महादूने सूत्रे हातात घेतल्यावर परत एकदा लोकांनी नीट लक्ष देण्यास सुरुवात केली. गावाबद्दल प्राथमिक माहिती, जनसंवाद ही संकल्पना व कार्यक्रमाचे स्वरूप ह्याबद्दल थोडक्यात चर्चा केल्यानंतर महादूने एक एक सेवा/ योजना ह्यांचा आढावा घेण्यास सुरुवात केली. उपलब्ध आकडेवारी मांडण्यास सुरुवात केली. सरकारी अधिकार्यांवपुढे हे प्रश्न ठेवले जाऊ लागले. त्या माहितीला दुजोरा देण्यासाठी लाभार्थींना बोलावण्यात आले. आणि इथेच घोटाळा झाला. त्या परिस्थितीला, इतक्या विशाल जनसमुदायाला घाबरून लाभार्थींनी कच खाल्ली. इतके दिवस केलेली तयारी वाया जाते की काय, अशी शंका निर्माण झाली. तीन प्रकरणे झाली; तरी एकही लाभार्थी बोलायला तयार नव्हता. मुळातच फार जास्त लोक बोलायला तयार नव्हते. त्यामध्ये तीन जण बोलूच शकले नाहीत. आता फक्त ७-८ जण उरले. आणि पुढचा मुद्दा भटक्या समाजाला लाभ मिळण्याबद्दलचा होता.



ह्यावेळी मात्र भटक्या जमातीच्या सदस्याला घरकुल देण्याच्या मुद्द्यावरून वातावरण पेटले. निवेदकांनी सांगितले, की कागदोपत्री सरकारी रेकॉर्डनुसार ह्या गावात त्या समाजातील दोन सदस्यांना घरकुलाचा लाभ दिला गेला आहे. झाले; लोक आपापसात बोलायला लागले. कारण हे सत्य नाही; ही फार उघड बाब होती. लाभार्थी व्यक्तीला बोलण्यास सांगूनही ती व्यक्ती बोलू शकली नाही. त्या वेळी गडबडून तोंड उघडणे शक्य झाले नाही. पण ह्या वेळपर्यंत लोकांमध्ये कुजबूज सुरू झाली होती. हे सर्व बघून भटक्या समाजातीलच एक वृद्ध बाई उभी राहिली आणि तिने सरळ समोरच्या सरकारी अधिका-यावर हल्ला चढवला, “आरं पोरांनो तुमी जे मनता ते यकदम बराबर हाय बगा. या सरकारी हरामखोर लोकांनी आमच्यासाठी काय बी केलं नाय. एक बी घरकुल दिलं नाय. अन कागदावर दोन दोन दाखवितात. खोटारडे भडवे साले.” झाले; ठिणगीने पेट घ्यावा; त्याप्रमाणे अकस्मात जनसंवाद पेटला. लोकांची उत्सुकता प्रमाणाबाहेर वाढली. तो अधिकारी रागवला; त्याने तिच्यावर आगपाखड करण्यास सुरुवात केली. कार्यकर्त्यांनी कसे बसे त्याला शांत बसवले; इतर अधिकार्यां नीही त्यांची समजूत घातली. निवेदकानी पुढे म्हंटले, “माननीय अधिकार्यांवना विनंती की, त्यांनी ह्या प्रकरणामध्ये लक्ष घालावे. आता आपण पुढच्या मुद्द्याकडे जाऊया. मी संबंधित अधिकार्यांंना विनंती करतो, की त्यांनी प्रत्येक मुद्द्याची नोंद घेऊन त्याचे स्पष्टीकरण द्यावे.” अशा प्रकारे पुढील मुद्दे येत गेले.



रोजगार हमीच्या योजनेच्या संदर्भात गावातील परिस्थितीचा मुद्दा आला. तालुका अधिकारी व सरपंच ह्यांची मान शरमेने खाली गेली. कारण सरळ सरळ लोक त्यांच्यावर आरोप करत होते. आणि आता लोक बिनधास्तपणे बोलत होते आणि समान लाभार्थी एकत्र होऊन बोलत होते. उसने अवसान आणून अधिकारी “आम्ही ह्याची संपूर्ण चौकशी करू आणि संबंधितांना न्याय देण्यात येईल, ह्याचे आश्वासन देतो,” असे म्हणत होते. एकदुस-यावर जवाबदारी ढकलू पाहत होते. ह्यावेळी संतोष आणि इतर कार्यकर्ते चाललेल्या जन- संवादातील बारीकसारीक तपशील नोदवून घेत होते.



अखेर लाभार्थी बोलू लागले. आणि बरेच जण बोलले. त्यानंतर मग इतरही काही लोक बोलले. बचत गटाच्या महिलांनी अंगणवाडीतील स्थितीबद्दल मत मांडले. इतक्या तक्रारी समोर आल्याने वातावरण काहीसं तणावाचं झाले. वातावरण बघून चेव आल्याने काही लोकांनी खोटेसुद्धा आरोप केले. पण दौलतरावांनी मुल्लाला इशारा करून त्यांना थांबवण्यास सांगितले. नंतर काही लाभार्थी सकारात्मक अनुभवांबद्दल बोलले; तसं वातावरण काहीसं शांत झालं.



अखेर भटक्या समाजावर पोलिसांनी केलेल्या कारवाईबद्दल प्रस्तुतीकरण झालं. त्यामध्ये पुन: एकदा म्हाता-या बायांनी पोलिसांना शिव्यांची लाखोली वाहिली. त्या बायांना बोलताना पाहून इतर अनेकींना प्रेरणा मिळत होती. सगळ्या लोकांसमोर आणि वृत्तपत्राच्या प्रतिनिधीच्या उपस्थितीत संबंधितांना चौकशी करण्याचे आश्वासन द्यावे लागले. ज्यांनी माहितीच्या अधिकारावर कार्यवाही केली नव्हती; त्यांना ती करू असे सांगावे लागले. सर्व तक्रारींचे/ सकारात्मक अनुभवांचे टीपण करण्यात आले व त्याच्या प्रती संबंधित अधिकारी व वृत्तपत्र प्रतिनिधीला देण्यात आल्या.



दौलतरावांच्या समारोपाच्या व्याख्यानाने कार्यक्रमाची समाप्ती झाली: “आज आपल्या गावामध्ये आपण प्रथमच जनसंवाद घेतलेला आहे आणि तो यशस्वीही झाला आहे. जनसंवाद म्हणजे जनता आणि सत्ताधारी ह्यांमधील पूल आहे; दुवा आहे. तसेच, ह्यामुळे सत्ताधार्यां पुरत्या मर्यादित असलेल्या सत्तेमध्ये जनताही सहभागी होऊ शकते आणि तिला न्याय मिळण्यास मदत मिळते. ह्यामध्ये उपस्थित झालेल्या सर्व मुद्द्यांची आपण नोंद घेऊया आणि जोपर्यंत न्याय मिळत नाही; तोपर्यंत कोणत्याही बंधनाला व विरोधाला न मानता आपण आपली भुमिका ठामपणे आणि आग्रहाने मांडत राहूया. ह्या कामास हातभार लावणा-या समस्त ग्रामस्थांना माझे अभिवादन आणि शुभेच्छा.”



अशा प्रकारे अत्यंत जल्लोषाच्या व उत्साहाच्या वातावरणात जनसंवाद पार पाडला. जनहितासाठी जन- संवाद साकारला.



















































५. जनसंवादानंतर....



कार्यकर्त्यांचे काम अजूनही संपले नव्हते. आलेल्या सर्व लोकांची नोंद करून त्यांच्या व्यवस्थेकडे लक्ष द्यावे लागत होते. त्यांच्या लाभाच्या अनुषंगाने आगामी काळात काय करावे लागेल, ह्याची रूपरेषा त्यांना सांगायची होती आणि धीर द्यायचा होता. तसेच एक बातमी बनवून फोटोंसह ती वृत्तपत्राकडे पाठवायची होती. खर्चाचा हिशेब लावून मग सर्व आवराआवर करायची होती.



संध्याकाळपर्यंत ते आटोपल्यानंतर हळु हळु गाव शांत झालं. एका नव्या उत्साहामध्ये लोक आपल्या कामामध्ये मग्न झाले. महेशजी आणि दौलतरावांची निघण्याची वेळ जवळ आली. त्या आधी सर्व मुख्य कार्यकर्ते आणि ग्राम विकास प्रतिष्ठानच्या लक्ष्मणदादांच्यासोबत बातचीत सुरू झाली. प्रत्येकाने आपापल्या प्रतिक्रिया व्यक्त केल्या. कार्यकर्त्यांनी त्यांचे अनुभव सांगितले. सर्वांनी समाधान व्यक्त केले. त्यानंतर सूत्रे अर्थातच दौलतरावांकडे आली. त्यांनी सविस्तर चर्चा केली, “जनसंवाद चांगला जाला; हे खरं हाय; पन काम हितं संपत नाय. उलट आता तर खरं काम सुरू व्हतं हाय. ज्या ज्या लोकांची माहिती गोळा केली हाय, तिच्याबद्दल आता पुडं बी अपडेट राहावं लागल, त्यांच्याशी व सरकार बरुबर संपर्क ठूवावा लागल. कुटं कुटं लोक नाराज हायेत, भीतीत हायेत; त्यांना आधार द्यावा लागल. आजवर लय येळा असं बी जालं हाय, की जनसंवादनंतर अधिकारी बदला घेत्यात. त्याबद्दल सावध राहावं लागेल. आणि त्यासाठी एकी लागल. मनून गावामधले मतभेद गावात सोडवून घ्याला प्राधान्य द्यावं लागल; मंजे अधिकार्यांंसंगं बराबर लडता येईल. आदी भरलेल्या मायती अधिकारांच्या फारमची परत परत चौकशी करावी लागल, नवीन प्रकरणांकडे लक्ष द्यावं लागल.” ह्याप्रकारे जनसंवाद कार्यक्रमाची सांगता झाली.



भटक्या समाजातील अटक केलेल्या व्यक्तीला पोलिस सोडत नव्हते. परंतु गावची एकी आणि जनसंवादात दिलेल्या साक्षीमुळे त्यांच्यावर दबाव पडला आणि त्यांनी नमते घेतले. ग्रामस्थही शांत झाले होते.



त्यानंतर हळु हळु जनसंवादाचा परिणाम दिसायला लागला. एएनएम नर्स गावात आली, की बायांकडून तिला जागोजागी हटकले जाऊ लागले, “बाई, तू सम्दे औषधं बराबर देतीस ना? नीट देले नाही, तर आम्ही तुज्याबद्दल सगळ्यांना सांगू.” तिच गोष्ट अंगणवाडी सेविका आणि इतर सरकारी अधिकार्यांगची. आजवर त्यांना भिऊन असलेले, काहीसे दबून असलेले लोक त्यांना न घाबरता बोलत होते. त्यांच्या माहितीत भर पडल्यामुळे सरळ बोलत होते, की पैसे लपवू नका; नीट काम करा. अधिकार्यांतवर त्यांचा वचक बनण्यासारखी परिस्थिती निर्माण झाली.



पेपरात बातमी आली, फोटो आले; चार गावच्या लोकांनी आपापल्या गावामध्ये ह्याची प्रसिद्धी केली. सगळीकडे कुसगांवचं नाव झालं. तिथे जाणा-या अधिकार्यांचना लोक बोलू लागले, “कुसगांवामंदी नीट काम करतूस ना, तसंच हितं बी कर.” आणि जे लोक चांगले काम करत होते; त्यांना पहिल्यांदाच कौतुक होत असल्याचा अनुभव आला. हा परिणाम जसा जसा लोकांना माहित झाला; तसा तसा आपल्या गावातसुद्धा जनसंवाद व्हावा, ही कल्पना लोक बोलून दाखवू लागले. कुसगांवमधल्या टीमला लोक संपर्क करून त्यांचं मार्गदर्शन घेऊ लागले. हळु हळु हा प्रकार इतका वाढला, की कुसगांवच्या टीमला दुस-या गावात जाऊन मीटिंगा कराव्या लागल्या.



त्याचवेळी पावसाळा सुरू झाला, शेतीची कामं सुरू झाली व शाळा- कॉलेजही सुरू झाली. त्यातच नवीन गावांमधून बोलावणं येत असल्यामुळे महादूच्या नेतृत्वाखालच्या टीमची धावपळ होत होती. शेवटी एका मीटिंगमध्ये ह्यावर विषय निघाला. कुसगांवामध्ये लक्ष्मणदादांसोबत बातचीत सुरू झाली. पुढे काम कसं करायचं ह्याचा विषय निघाला. काही जण कंटाळले होते, काही जण शेती, व्यवसाय, कॉलेज ह्यामध्ये अडकले होते. आधीसारखा वेळ देणं काही जणांना जमत नव्हतं. काय मार्ग काढावा, कळत नव्हतं. मग लक्ष्मणदादांनी मार्ग सुचवला, “बाबांनो; तुमच्यातले जे चार प्रमुख हायेत- महादू हाय, मुल्ला- सिद्धार्थ, हनमंत हायेत- त्यांनी दुसरे उद्योग बंद केले तर कुटं बिघडतं? मी मन्तो, तुमी ग्राम विकास प्रतिष्ठानचंच काम करा. ते करून जमेल तितका दुसरा उद्योग करा. तुमी असंच काम करत राहाल, तर तुमाला रूपया कमवायची बी फिकर पडनार नाय. तुमी बगालच.” त्यावर महादू उत्तरला, “काका; आमचं ठीक हाय, आम्ही व्यवस्था करू. पन आता ह्यो काम म्होरं न्यायचं आसल, तर त्याला पैका तर पायजे की. तुमीच सांगा. किती धावाधाव करावी लागतीया, इतक्या लोकांना भेटावं लागतया. ते कसं करनार?” त्याच चर्चेतून मग एक पर्याय समोर आला. कुसगांव जरी लहान गाव असलं, तरी गावात शिक्षणाचं प्रमाण चांगलं होतं. कुसगांवचे लोक शिकून मोठ्या पदावर पोचले होते. बाहेर चांगल्या जागी होते. त्यांच्या सहाय्याने काही मार्ग निघेल, असा पर्याय समोर आला. मग मुल्लाने सूचवलं, “आपन एक गोस्ट करायची का? आपण संस्थेच्या नावानं लोकांना आवाहन करू; की तुमी संस्थेच्या नावानं दर दिसाला यक रूपया, दो रूपया, तीन रूपया असा वेगळा ठेवावा. प्रत्येकाने त्याच्या ऐपतीप्रमानं असं करावं आनि संस्थेला मदत करावी. गावातले लोक बी आले अन गावचे पन बाहेर असलेले लोक बी आले. दिसाला एक रूपया मंजे वर्षाला ३६५ रूपये, दिसाला दोन रूपये मंजे वर्षाला ७३० रूपये आसं.” बरीच चर्चा होऊन ही कल्पना मान्य झाली.



गांधी जयंतीनिमित्त भरणा-या ग्रामसभेमध्ये आणि महिला ग्रामसभेमध्ये ह्यावर गावातल्या आणि गावाबाहेरच्या लोकांना आवाहन करण्यात आलं. म्हणजे ज्याने शक्य असेल, त्या प्रमाणात दररोज ठराविक रूपये ह्या हिशेबाने एका वर्षासाठी दान द्यावं. आणि आश्चर्य झालं! गावातून कल्पना नव्हती इतका निधी गोळा झाला. असे ४० जण निघाले; जे म्हणाले आम्ही दररोज एक रूपया देतो. दररोज २ रूपये देणारे २५ जण निघाले; ३ रूपये देणारे १८ जण, ४ रूपये देणारे १० जण, ५ रूपये देणारे ३ जण आणि ६ रूपये देणारा एक महाभाग निघाला.





४० गुणिले १ गुणिले ३६५ = १४६००
२५ गुणिले २ गुणिले ३६५ = १८२५०
१८ गुणिले ३ गुणिले ३६५ = १९७१०
१० गुणिले ४ गुणिले ३६५ = १४३००
३ गुणिले ५ गुणिले ३६५ = ५३८५
१ गुणिले ६ गुणिले ३६५ = २१६०

एकूण रक्कम = ६१,२७१ रूपये फक्त!

इतकी मोठी रक्कम फक्त ९८ ग्रामस्थांच्या वार्षिक देणगीतून उभी राहिली. आणि देणा-यांची संख्या अजून खूपच जास्त होती. ह्याबद्दल दौलतरावांची प्रतिक्रिया उत्साहवर्धक होती. ते म्हणाले, “ही कमाई एका व्यक्तीची नाय किंवा एका कामाची बी नाय. ही कमाई गावकर्यां च्या विश्वासाची हाय. आपन जे काम करतूया, ते किती मोलाचं हाय ह्याबद्दल त्यांचं हे मत हाय. तवा आता कार्यकर्त्यांची जिम्मेदारी वाढतीया. मला वाटतं काही पैसा बचतीमंदी जावा, काही पैसा रोजच्या कामाला वापरावा आनि काही पैसा उद्योग/ धंदा ह्यासारख्या कामात बी लावावा. कारन पैसा एका जागी अडकला नाय पायजे. तो खेळत रायला पायजे; मग अजून वाढल. शक्य त्या प्रकारे त्याला हलता ठूवलं पायजे.”



ह्यावर बरीच चर्चा झाली. असे ठरले, की ह्यातील काही भाग बचतगटांना उद्योगासाठी कर्ज रूपाने द्यावा, काही भाग ग्रामोद्योगासाठी इच्छुक असलेल्या युवकांना कर्जाच्या स्वरूपात द्यावा आणि उरलेल्या भागाला मोठ्या कामाच्या खर्चासाठी व बचतीसाठी वापरावे. ह्याचवेळी नवीन जवाबदा-या पुढे येत असल्यामुळे ब-याच मीटिंगा झाल्या; टीममधल्या कार्यकर्त्यांना ग्राम विकास प्रतिष्ठानच्या मंडळावर घेण्यात आले आणि नवीन समित्या स्थापन करून त्याद्वारे काम सुरू झाले.

अजून एक गोष्ट मात्र मनासारखी होत नव्हती. ती ही की माहितीचे अधिकार अर्ज, सरकारी चौकशीचे प्रकार इत्यादि बाबतीत फारशी प्रगती नव्हती. मंडळींनी नेटाने लावून धरले होते; पण सरकारी आघाडीवर फारशी प्रगती नव्हती. परंतु जाणत्या मंडळींच्या सल्ल्यानुसार ह्यावेळी लोकांसोबतच्या कामावर- संपर्कावर आणि सरकारी कामाच्या निगराणीवर भर देण्याची गरज होती. त्याद्वारे योग्य तो दबाव होऊन ही कामं पुढे सरकली असती. परत परत जनसंवाद घ्यावा आणि आंदोलन करावं ही मागणी समोर येऊ लागली.



कुसगांवामध्ये नाही; मात्र इतर आसपासच्या गावांमध्ये सतत जनसंवाद भरवण्यास सुरुवात झाली. त्या निमित्ताने महादू व टीमला सतत वेगवेगळ्या गावांमध्ये येणं जाणं करावं लागू लागलं. हळुहळु हा प्रकार इतका वाढला, की त्यांच्या वेळेची बूकिंग सुरू झाली; “तुमी पुढच्या रविवारी तासगावांमंदी आलं पाहिजे, किनगांवला त्यानंतर कदी बी जावा,” ह्या प्रकारे. ह्या टीममध्ये एक जण नुकताच आला होता, तो होता सिद्धार्थचा भाऊ राजा. तो कॉलेजात शिकून आला होता. त्याने पथनाट्य स्पर्धांमध्ये भाग घेतला होता. लवकरच त्याने गावातल्या चार लोकांना हाताशी धरून पथनाट्य करण्यामध्ये पटाईत अशी टीम बसवली. आणि झालं की! ह्या टीमलासुद्धा गावागावांमधून मागणी येऊ लागली. माहिती अधिकार, पर्यावरण संरक्षण, रोजगार हमी योजना, आरोग्य पासून एचआयव्ही पर्यंत ते पथनाट्य करून लोकांना जागरूक करण्यास हातभार लावू लागले.



होता होता महादूची टीम व राजाची पथनाट्याची टीम, ह्यांना अक्षरश: नवनवीन कामे मिळायला लागली. वेगवेगळे लोक आणि संस्था त्यांना आमंत्रित करू लागल्या. अमुक गावांमध्ये ह्या ह्या विषयावर जनसंवाद किंवा सामाजिक लेखा अहवाल (सोशल ऑडिट) घ्यायचं असेल, तर मंडळी हजर! हळुहळु त्यांना ह्यातून अर्थप्राप्तीही मनासारखी होऊ लागली. मग शहरामध्ये कोण जातोय! शेती नाही तर हा उद्योग ह्यावरच निर्वाह करणे जमू लागले. ह्यातून गावाची ताकतही वाढत गेली आणि सरकार व अधिकारी गावाचे अधिक चांगले व नम्र सेवक बनले. आणि हे होता होता ग्राम विकास प्रतिष्ठानच्या देणगीच्या रक्कमेमध्ये व देणगीदारांमध्येही वाढ झाली. हळु हळु भांडवल वाढलं आणि त्यातून निर्माण होणारे लघु उद्योगही मोठे झाले. म्हणजेच-



होता मना मनांमध्ये संवाद ।
मिटे सर्व वाद- विवाद ।
उरे एकच गोष्ट निर्विवाद ।
सर्वांत चांगला सुसंवाद ॥

Friday, June 4, 2010

कर्वे: "वे" ऑफ लाईफ:

माझ्या आयुष्यात "कर्वे" (म्हणजे कर्वेनगर, कर्वे स्त्री शिक्षणसंस्था, कर्वे समाजसेवा संस्था, कर्वे पुतळा आदि) संबंधित गोष्टींचं स्थान फार विशेष आहे. इतकं, की "कर्वे"मध्ये येण्याआधीचं जीवन आणि नंतरचं जीवन असे दोन भाग करावे लागतील! गेल्या सुमारे चार वर्षांपासून जीवनचा मार्ग ("वे" ऑफ लाईफ) कर्वे झाला आहे. अनेक प्रकारे.....

सर्वांत पहिला कर्वे फॅक्टर म्हणजे कर्वेनगर. इथे आगमन आणि इथल्या वास्तव्याला सुरुवात कर्वे स्त्री शिक्षण संस्थेपासून झाली. त्यानंतर समाज सेवेमध्ये पदव्युत्तर शिक्षणासाठी महर्षी कर्वे समाज सेवा संस्था. हा सर्वांत मोठा कर्वे फॅक्टर; जणू अनेक कर्वे उपग्रह असलेला कर्वे गुरू ग्रह! शिक्षण, ज्ञान, मित्र, मैत्रिणी, नोकरी (आत्तापर्यंतच्या सर्व जॉब मिळण्यामध्ये कर्वे व्यक्तींचा वाटा होता), आत्मविश्वास, स्पष्टता, जीवनदिशा आणि जीवनसाथी ह्या काही जीवनावश्यक गोष्टी! ह्या सर्व गोष्टी कर्वे समाजसेवा संस्थेने नेहमीसाठी दिल्या! एका व्यक्तीसाठी म्हणून कर्वे संस्थेची ही केवढी महत्ता! इतकं भरभरून कोणाला कुठून मिळत असेल? जीवनाचा एक अत्यंत एंजॉयेबल भाग कर्वेमध्ये व्यतित झाला. अनेक आठवणी, प्रसंग, क्षण, "मंतरलेले दिवस" . . . . अनेक गोष्टी पहिल्यांदाच झाल्या आणि होतच राहिल्या....

आजही ही प्रक्रिया पुढे सुरू आहेच. कर्वे पुतळ्याजवळील वास्तव्य आणि तिथलाच ड्रायव्हिंग क्लास! आणि आता परत पी.एच.डी प्रवेशासाठीचे केंद्र म्हणून कर्वे समाजसेवा संस्थाच मिळाली! जणू जीवनाचा केंद्रबिंदू "कर्वे" आहे. सर्व जीवन त्याभोवती विणले जात आहे. ....

"कर्वे"आधीही जीवन होतंच आणि नंतरही आहेच. पण कधीकधी अशा गोष्टी घडतात की "आधी" आणि "नंतर" असा फरक करावा लागतो. उदा., दुसर्‍या महायुद्धाआधीचे जग आणि त्यानंतरचे जग. त्याप्रमाणे "कर्वे"चं स्थान अद्वितीय आहे. एकाकी किंवा दिशाहिन प्रवास करून आल्यानंतरचे जीवनामधील जणू एक जंक्शन; ज्यातून मिळालेल्या धारा जीवनधारा झाल्या; नेहमी सोबतीला आल्या. जीवनामध्ये जीवनधारा सोबत मिळण्याहून मोठी आनंदाची गोष्ट काय असेल?  समस्त "कर्वे" जगताला मानाचा मूजरा आणि पुढील वाटचालीसाठी मन:पूर्वक शुभेच्छा!