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Wednesday, May 13, 2026

सुट्टीतलं शिबिर- आनंदाचे डोही आनंद तरंग!

✪ एक, दोन, तीन... “बाय!”
✪ थक्क करणारी मुलं आणि त्यांचा उत्साह
✪ निसर्ग रहस्ये उलगडणार्‍या व मुलांची "नस जाणणा-या" डॉक्टर स्नेहलताई
✪ किडे, वनस्पती, पानं, खेकडे अन् काजव्यांचं अद्भुत जग
✪ मुलांसोबत मोठ्यांचं लहान होणं आणि शिकणं
✪ पुस्तकवेडे आणि हॅरी पॉटरचे भक्त गण
✪ खजिन्याचा शोध आणि सोबत केलेली धमाल
✪ चंद्र- सूर्य, तारे आणि दोन गुरू
✪ “तुमच्यासाठी पण आईस्क्रीम आहे!”
✪ अविस्मरणीय जोडसाखळी, विष- अमृत आणि लंगडी

नमस्कार. नुकतंच मुलांसाठीचं अडीच दिवसीय शिबिर शिळिंबमधल्या अंजनवेलला झालं. मुलांचं शिबिर घेण्याचा अनुभव खूप आनंददायी आणि वेगळा होता. मुलांची विलक्षण ऊर्जा, उत्साह, त्यांची प्रसन्नता आणि मस्ती जवळून बघता आली. शिबिरामध्ये अविस्मरणीय अशा आठवणी मिळाल्या. त्या शब्दबद्ध करण्याचा हा प्रयत्न. 

मुलांसाठी आकाश दर्शन, फन- लर्न किंवा गणित- विज्ञानातील गमती असे उपक्रम अनेक वर्षांपासून करत असलो तरी शिबिर असं हे दुसरंच. मागच्या वर्षी मुलांचं शिबिर जिथे झालं होतं त्या शिळिंबमधल्या अंजनवेलमध्येच हे शिबिर झालं. ह्यावेळी शिबिरामध्ये मुलांसाठी कला कौशल्य कार्यशाळा घेणार्‍या अमृताताई ढगे एका सत्रासाठी आल्या. पर्यावरण, शिक्षण आणि योग क्षेत्रात मोठा अनुभव असलेल्या व मुलांसाठी वाचन- निसर्ग भ्रमंती असे उपक्रम करणार्‍या डॉ. स्नेहलताई देवकर- पाठकसुद्धा पूर्ण वेळ शिबिरात होत्या. लहान मुलांसाठी सत्र घेणार्‍या नेहाताई देशपांडेसुद्धा शिबिरात पूर्ण वेळ होत्या. त्यामुळे कला कौशल्ये, रेखाटन, निसर्ग वाचन, अभिनय, परिसर भ्रमंती आणि अभ्यास अशी वेगळी मेजवानीही मुलांना मिळाली. आम्हा तिघांसोबत अंजनवेलमधले सर्व जणसुद्धा शिबिरामध्ये होतेच.

Friday, September 5, 2025

४३ दिवस हिमालयात अडकलेला माणूस!

🏔️ वैद्यकीय शिक्षण घेत असलेला ऑस्ट्रेलियन जेम्स स्कॉट
🏔️ "तिथे" ३ दिवसांहून जास्त काळ कोणीही तग धरू शकणार नाही
🏔️ बहीण जोआनचं प्रेम व तिने केलेली प्रयत्नांची पराकाष्ठा
🏔️ कराटेतून मिळालेलं शरीर, प्रसंगावधान, शिस्त आणि धैर्याची कसोटी
🏔️ सोबतीला जीवाभावाच्या माणसांच्या आठवणी, प्रेम आणि फक्त बर्फ!
🏔️ छोट्या गोष्टींमधून साध्य केलेलं आत्मबळ 
🏔️ ध्यानाद्वारे अचूक जागा सांगणारे रिनपोचे थरंगू लामा
🏔️ ऑस्ट्रेलियन लोकांची हिंमत, आत्मविश्वास आणि हट्ट
🏔️ "तू देव आहेस, कारण कोणीच माणूस इथे असा राहू शकत नाही!"
🏔️ सुटकेनंतरचा अनपेक्षित घटनाक्रम

नमस्कार! नुकतंच "Lost in the Himalayas- James Scott's 43- day ordeal" हे पुस्तक वाचलं! त्याबद्दलचा एक पोडकास्ट आधी ऐकला होता. आजच्या "विद्यार्थी दिनी" ह्या पुस्तकातून शिकण्यासारखं खूप आहे! अतिशय थरारक हे पुस्तक आहे! आणि आकाराने थोडं मोठं असलं तरी सर्व गोष्टी वर्तमानात दिल्या आहेत, त्यामुळे हे पुस्तक एकदा धरलं की सोडता येत नाही. नेपाळमध्ये एका अभ्यास भेटीसाठी आलेला जेम्स स्कॉट, २२ वर्षांचा ऑस्ट्रेलियातला वैद्यकीय विद्यार्थी! काही दिवसांच्या सुट्टीमध्ये तो नेपाळला येतो. सुट्टीत एक छोटा ट्रेक करतो. काही दिवसांनी दुसरा ट्रेक करायला जातो आणि हरवतो! अनेक दिवस होऊनही काही संपर्क नाही म्हणून अखेर त्याची बहीण जोआन त्याच्या शोधासाठी नेपाळला येते! हे पुस्तक दोघांनीही लिहीलं आहे. मुख्य मुख्य दिवसांचे घटनाक्रम दोघांच्या वर्णनातून कळतात.

(हा इथे स्पॉटीफायवर ऐकता येईल.) 

 
 

Monday, July 4, 2016

प्रकृति, पर्यावरण और हम ११: इन्सान ही प्रश्न और इन्सान ही उत्तर


प्रकृति, पर्यावरण और हम ५: पानीवाले बाबा: राजेंद्रसिंह राणा

प्रकृति, पर्यावरण और हम ६: फॉरेस्ट मॅन: जादव पायेंग

प्रकृति, पर्यावरण और हम ७: कुछ अनाम पर्यावरण प्रेमी!

प्रकृति, पर्यावरण और हम ८: इस्राएल का जल- संवर्धन

प्रकृति, पर्यावरण और हम ९: दुनिया के प्रमुख देशों में पर्यावरण की स्थिति

प्रकृति, पर्यावरण और हम १०: कुछ कड़वे प्रश्न और कुछ कड़वे उत्तर


इन्सान ही प्रश्न और इन्सान ही उत्तर

उत्तराखण्ड में हो रही‌ तबाही २०१३ के प्रलय की याद दिला रही है| एक तरह से वही विपदा फिर आयी है| देखा जाए तो इसमें अप्रत्याशित कुछ भी नही है| जो हो रहा है, वह बिल्कुल साधारण नही है, लेकिन पीछले छह- सात सालों में निरंतर होता जा रहा है| हर बरसात के सीजन में लैंड स्लाईडस, बादल फटना, नदियों को बाढ और जान- माल का नुकसान ये बातें अब आम हो गई‌ हैं| फर्क तो सिर्फ इतना है कि इन बदलावों का अनुपात तेज़ी से बढ रहा है| उनकी फ्रिक्वेन्सी बढ गई‌ है| नुकसान भी बहुत बढ रहा है| पर्यावरण पर हो रहे इन परिणामों को रोकने के क्या उपाय है? इन सभी प्रश्नों का उत्तर क्या है? उसका एक ही उत्तर है और वह है हम| हम ही‌ इसे रोक सकते हैं क्यों कि यह सब हमने ही किया है| चाहिए बरसात तबाही‌ ला रही हो, उस बरसात के कारण हम ही है और हम ही इसे चाहे तो रोक भी सकते हैं|

जैसे हमने पीछले लेखों‌ में चर्चा की, पर्यावरण और मानव के बीच काफी‌ तनाव है| मानव का पर्यावरण पर बर्डन बढ रहा है| अगर इन सभी बातों में परिवर्तन करना हो तो पर्यावरण के साथ तो काम करना ही होगा- जैसे पेड़ लगाने होंगे, जल संवर्धन के प्रयास करने होंगे, जंगल बचाने होंगे; लेकिन उसके साथ इन्सान की समझ और इन्सान की दृष्टी बढाने के भी प्रयास करने होंगे| तब जा कर धीरे धीरे इन्सान प्रकृति पर कर रहा है उस आक्रमण को समझ पाएगा और उससे यु- टर्न ले सकेगा| पर्यावरण की रक्षा का यह लाँग टर्म फोकस हो सकता है| शॉर्ट टर्म फोकस अर्थात् पर्यावरण के साथ काम करना होगा| इस लेख में इन्सान की दृष्टी और सजगता बढाने के प्रयासों पर एक नजर डालेंगे|





Tuesday, June 28, 2016

प्रकृति, पर्यावरण और हम १०: कुछ कड़वे प्रश्न और कुछ कड़वे उत्तर


प्रकृति, पर्यावरण और हम ५: पानीवाले बाबा: राजेंद्रसिंह राणा

प्रकृति, पर्यावरण और हम ६: फॉरेस्ट मॅन: जादव पायेंग

प्रकृति, पर्यावरण और हम ७: कुछ अनाम पर्यावरण प्रेमी!

प्रकृति, पर्यावरण और हम ८: इस्राएल का जल- संवर्धन
 
प्रकृति, पर्यावरण और हम ९: दुनिया के प्रमुख देशों में पर्यावरण की स्थिति


कुछ कड़वे प्रश्न और कुछ कड़वे उत्तर

पर्यावरण के सम्बन्ध में चर्चा करते हुए हमने कई पहलू देखे| वन, पानी और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संवर्धन के कई प्रयासों पर संक्षेप में चर्चा भी की| कई व्यक्ति, गाँव तथा संस्थान इस दिशा में अच्छा कार्य कर रहे हैं| लेकिन जब हम इस सारे विषय को इकठ्ठा देखते हैं, तो हमारे सामने कई अप्रिय प्रश्न उपस्थित होते हैं| पीछले लेख में जैसे बात की थी कि एक पेड़ के काटने का मार्केट में मिलनेवाला दाम एक पेड़ लगाने के लाभ से कई गुणा अधिक है| इसलिए हम चाहे कितने भी पेड़ लगाए या वन संवर्धन करें, उनके टूटने की गति उससे अधिक ही रहेगी| इस लेख में ऐसे ही कुछ कड़वे प्रश्न और कड़वे उत्तरों की बात करते हैं|

जैसा कि हमने देखा आज जो देश पर्यावरण के सम्बन्ध में अग्रणि हैं वे ऐसे ही देश हैं जहाँ मानवीय बर्डन प्रकृति पर कम है| अर्थात् अपार प्राकृतिक सम्पदावाले कम आबादी के देश| इसी तथ्य में एक अर्थ में इस पूरी समस्या की जड़ और उसका समाधान भी है| हमारी आबादी और उसका प्रबन्धन कैसे करना यह एक बहुत अप्रिय प्रश्न है| और उल्लेखनीय है कि कोई इस पर बात भी करना नही चाहता है| उल्टा आज तो हर समाज और हर राजनेता अपने अपने समाज के लोगों की संख्या बढ़ाने पर ही जोर दे रहे हैं| लेकिन अब स्थिति बहुत ही विपरित हो रही है| एक समय में 'हम दो हमारे दो' या 'हम दो हमारा एक' ऐसी बातें ठीक थी| आज के समय में प्रकृति पर इन्सान का बर्डन और इन्सान का इन्सान पर होनेवाला बर्डन देखते हुए वस्तुत: आज ऐसे कपल्स का सम्मान किया जाना चाहिए जो माता- पिता नही बनना चाहते हैं| सिर्फ सम्मान नही, सरकार द्वारा ऐसे लोगों के लिए इन्सेन्टिव भी शुरू किया जाना चाहिए| क्यों कि अगर इसी क्रम से आबादी बढ़ती रही तो आनेवाली पिढियों को कुछ भी नही मिलेगा| एक ज़माने में जैसे आक्रमक ताकतें सारी दुनिया पर आक्रमण करती थी, उसी तरह इन्सान पूरी धरती पर आक्रमण करता जा रहा है| इसलिए अगर कुछ ठोस परिवर्तन लाना हो तो इन्सान के द्वारा प्रकृति पर हो रहे आक्रमण को रोकना ही होगा और उसके लिए जनसंख्या कम करना एक बेहद अहम पहलू है|



Sunday, June 12, 2016

प्रकृति, पर्यावरण और हम ९: दुनिया के प्रमुख देशों में पर्यावरण की स्थिति


प्रकृति, पर्यावरण और हम ५: पानीवाले बाबा: राजेंद्रसिंह राणा

प्रकृति, पर्यावरण और हम ६: फॉरेस्ट मॅन: जादव पायेंग

प्रकृति, पर्यावरण और हम ७: कुछ अनाम पर्यावरण प्रेमी!

प्रकृति, पर्यावरण और हम ८: इस्राएल का जल- संवर्धन



दुनिया के प्रमुख देशों में पर्यावरण की स्थिति

इस्राएल की बात हमने पीछले लेख में की| इस्राएल जल संवर्धन का रोल मॉडेल हो चुका है| दुनिया में अन्य ऐसे कुछ देश है| जो देश पर्यावरण के सम्बन्ध में दुनिया के मुख्य देश हैं, उनके बारे में बात करते हैं| एनवायरनमेंटल परफार्मंस इंडेक्स ने दुनिया के १८० देशों में पर्यावरण की स्थिति की रैंकिंग की है| देशों में पर्यावरण का कार्य कैसे चल रहा हैं, इसका यह एक मापदण्ड कहा जा सकता है| इस रैंकिंग में सबसे उपर के पाँच देश ये हैं- फिनलैंड, आईसलैंड, स्वीडन, डेन्मार्क और स्लोवेनिया| और जो सबसे नीचले देश हैं वे ऐसे हैं- अफघनिस्तान, नायजर, मादागास्कर, एर्ट्रिया और सोमालिया| विशेष बात यह है कि जो देश सबसे उपरी हैं उनमें पाँच देश उत्तर युरोप के प्रगत देश हैं और सिर्फ स्लोवेनिया उनकी तुलना में थोड़ा कम प्रगत देश है| और सबसे नीचे होनेवाले देश मुख्य रूप से राजनीतिक अस्थिरता होनेवाले देश हैं| सौभाग्य की बात है कि इस देश में सबसे नीचले देशों की सूचि में भारत नही हैं| इस रैंकिंग के कई निकष हैं- जैसे सरकार पर्यावरण के लिए कितनी प्रतिबद्ध हैं, प्रदूषण का स्तर कैसा हैं, कार्बन इमिशन्स कितने अनुपात में हैं, प्रजातियों के संवर्धन की क्या स्थिति है, पानी की एवलिबिलिटी कैसी हैं आदि|



Monday, June 6, 2016

प्रकृति, पर्यावरण और हम ८: इस्राएल का जल- संवर्धन


प्रकृति, पर्यावरण और हम ५: पानीवाले बाबा: राजेंद्रसिंह राणा

प्रकृति, पर्यावरण और हम ६: फॉरेस्ट मॅन: जादव पायेंग

प्रकृति, पर्यावरण और हम ७: कुछ अनाम पर्यावरण प्रेमी!


इस्राएल का जल- संवर्धन

इस्राएल! एक छोटासा लेकिन बहुत विशिष्ट देश! दुनिया के सबसे खास देशों में से एक! इस्राएल के जल संवर्धन की चर्चा करने के पहले इस्राएल देश को समझना होगा| पूरी दुनिया में फैले यहुदियों का यह देश है| एक जमाने में अमरिका से ले कर युरोप- एशिया तक यहुदी फैले थे और स्थानिय लोग उन्हे अक्सर 'बिना देश का समाज' कहते थे| यहाँ तक कि युरोप और रूस में यहुदियों को दुश्मन समझ कर उन्हे देश से निकाला गया| खास कर द्वितीय विश्व युद्ध में यहुदियों पर ढाए गए जुल्म! साठ लाख से अधिक यहुदियों को तो नाझी जर्मनी ने मार दिया| जिस समाज का अपना देश नही था- जो अलग अलग देशों में बिखरे थे; जिनकी अपनी पहचान नही थी उस समाज १९४८ में एक नया देश बन गया!

अक्सर कहा जाता है कि कोई बात अगर एक छोर तक जाती है, तो उसमें बिल्कुल विपरित छोर के गुणधर्म आ जाते हैं| जैसे सैकडों वर्षों तक यहुदियों ने मुसीबत, संघर्ष और चुनौतियों का सामना किया और इसीके कारण उनका देश खड़ा हुआ जो उस समाज के स्थिति के ठीक विपरित है- सशक्त, समर्थ और बड़ी पहचानवाला! जैसे अगर कोई अंगुलीमाल जैसा क्रूर और खूंखार हो जाता है, तो उस छोर से- उस एक्स्ट्रीम से उसका सन्त बनना दूर नही होता है| बस एक ही बात चाहिए कि उस इन्सान या उस चीज़ को उस छोर के अन्त पर पहुँचना चाहिए| जो लोग वाकई धनवान होते हैं; सम्पत्ति अर्जित करते हैं, वे ही एक दिन उस धन- दौलत के मोह से छूट भी सकते हैं| जैसे पानी अगर १०० डिग्री तक गरम हो, तो ही भांप बनता है; कुनकुने पानी में वह बात नही होती है| उसी तरह जिस समाज को बुरी तरह सैकडों सालों तक लताडा गया, जीसस को सूली देने की सजा दिन्हे दो हजार सालों तक मिलती रही; आखिर कर उनकी किस्मत ने करवट ले ली| १९४८ में इस्राएल का जन्म हुआ|



Tuesday, May 31, 2016

प्रकृति, पर्यावरण और हम ७: कुछ अनाम पर्यावरण प्रेमी!


प्रकृति, पर्यावरण और हम ५: पानीवाले बाबा: राजेंद्रसिंह राणा

प्रकृति, पर्यावरण और हम ६: फॉरेस्ट मॅन: जादव पायेंग


कुछ अनाम पर्यावरण प्रेमी!

एक बार एक सज्जन पहाडों में चढाई कर रहे थे| उनके पास उनका भारी थैला था| थके माँदे बड़ी मुश्किल से एक एक कदम चढ रहे थे| तभी उनके पास से एक छोटी लड़की गुजरी| उसने अपने छोटे भाई को कन्धे पर उठाया था और बड़ी सरलता से आगे बढ़ रही थी| इन सज्जन को बहुत आश्चर्य हुआ| कैसे यह लड़की भाई का बोझ ले कर चल रही है जब कि मुझे तो एक थैला ले जाना दुभर हो रहा है? उन्होने लड़की से पूछा तो उसने बताया कि यह मेरे लिए बोझ नही है, मेरा भाई है| उसका भला कैसे बोझ होगा? तब उनके समझ में आया| यह कहानि बिल्कुल अर्थपूर्ण है| जब तक हम किसी बात को पराया समझते हैं, तब तक वह हमारे लिए बोझ होता है, कर्तव्य होता है| लेकिन जब उसी बात को हम अपनाते हैं; अपना मानते हैं, तो वह सरल और सहज होता है|

ठीक यही बात पर्यावरण के सम्बन्ध में भी हैं| आज हम कितना समझते हैं कि पर्यावरण की रक्षा करना बड़ा कठिन हैं; बहुत मुश्किल काम हैं; लेकिन हमारे बहुत नजदीक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिससे विश्वास मिलता है कि पर्यावरण की रक्षा करना उतनी भी कठिन बात नही है| जैसे कई लोग आज मानते हैं- कई किसानों की यह धारणा है कि गाय को संभलना; गाय का पालन करना आज बहुत कठिन हो गया है| आज गौपालन 'viable' नही हैं| आज वह एक 'asset' नही, बल्की एक 'liability' है| लेकिन थोड़ी आँखें खुली रखी तो हमे दिखाई देता है कि यह अपरिहार्य नही है| आज भी ऐसे घूमन्तू समुदाय (nomadic tribes) हैं जो स्वयं बुरी स्थिति में होने के बावजूद गायों को पालते हैं| उनके लिए गाय कोई वस्तु नही; उनका स्वयं का ही एक अंग है| कुदरत से ताल्लुक रखनेवाले समुदायों में यह भी देखा जाता हैं कि चाहे उनके खाने के लिए कुछ हो ना हो, जो भी अतिथि उनके पास जाएगा, भूखा नही जाएगा| इन्सान तो दूर, वे कुत्ते को भी भूखा नही रखेंगे| अपनी सम्पदा उसके साथ भी शेअर करेंगे|





Wednesday, May 18, 2016

प्रकृति, पर्यावरण और हम ४: शाश्वत विकास के कुछ कदम


प्रकृति, पर्यावरण और हम १: प्रस्तावना
प्रकृति, पर्यावरण और हम २: प्राकृतिक असन्तुलन में इन्सान की भुमिका
प्रकृति, पर्यावरण और हम ३: आर्थिक विकास का अनर्थ

शाश्वत विकास के कुछ कदम

जैसा हमने पहले देखा, आज बड़े पैमाने पर प्रकृति में असन्तुलन बढ़ रहा है| ह्युमन चेंज के कारण पर्यावरण बदल रहा है| मानव के अस्तित्व मात्र से पर्यावरण में बहुत बदलाव हो रहे हैं| ग्लेशियर्स पीघल रहे हैं, समुद्र के स्तर बढ़ रहे हैं, बेमौसम बरसात हो रही है और भी बहुत कुछ हो रहा है| ऐसे में प्रश्न उठता है कि अगर यह संकट इतना बड़ा है और पूरी मानवता इसके लिए जिम्मेदार है, तो इसमें से रास्ता कैसे निकाले? जैसे ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण पूरी पृथ्वी के इन्सानों से जुड़े हैं| अगर उसे रोकना होगा, तो सबको बदलना होगा| यह सम्भव नही दिखता| शहर के लिए जितने पेड़ काटे जा चुके हैं, वे फिर से लगाना और बढ़ाना सम्भव नही लगता है| एक तरफ तो वह राह है जो तनाव की ओर आगे जा रही है| और दूसरी राह है सन्तुलन की| लेकिन वह सम्भव ही नही दिखती है| क्यों कि अगर नदी की पूरी जल धारा एक दिशा में जा रही हो, तो भला कोई कितनी देर उससे संघर्ष कर पाएगा?

लेकिन हताश होने की आवश्यकता नही है| प्रकृति में इतना भी असन्तुलन नही है कि हम कुछ भी नही कर सकते हैं| माना की बहुत सी चीजें प्रभावित हुई हैं, बहुत सी चीजें हमारे व्यक्तिगत नियंत्रण में नही हैं| लेकिन ऐसी भी बहुत चीजें है जो हम कर सकते हैं| उदाहरण लेते हैं ओला वृष्टी का या बेमौसम बरसात का| जब भी कभी ओला वृष्टी होती है या बेमौसम बरसात होती है, तो किसानों की बहुत हानि होती है| और यह होता ही रहेगा| अब बदले हुए पर्यावरण में सूखा, बाढ़, बेमौसम बरसात आदि सब चीजें होती ही जाएगी| इसके बारे में सजग होना पड़ेगा| इन चीजों के लिए तो हम कुछ नही कर सकते हैं| लेकिन हम हमारे खेत के लिए तो बहुत कुछ कर सकते हैं| खेत में सही तकनिकों के प्रयोग द्वारा मिट्टी की क्षमता सन्तुलित रख सकते हैं, फसलों को इस प्रकार स्वस्थ तरीके से ले सकते हैं जिससे अगर एक या दो फसलें जाती भी हैं, तो भी कम नुकसान होगा| हम कम गिरनेवाली या न गिरनेवाली बारीश के लिए कुछ नही कर सकते हैं; लेकिन हम यह तो कर सकते हैं कि जो बारीश गिरेगी, उसका पानी बचा सकते हैं| और इतनी क्षमता प्रकृति ने अब भी हमें दी हुई है| ऐसे ही कामों का एक उदाहरण यहाँ देखेंगे|







Saturday, May 14, 2016

प्रकृति, पर्यावरण और हम ३: आर्थिक विकास का अनर्थ


प्रकृति, पर्यावरण और हम १: प्रस्तावना

प्रकृति, पर्यावरण और हम २: प्राकृतिक असन्तुलन में इन्सान की भुमिका

आर्थिक विकास का अनर्थ

आज हम जिसे विकास कहते हैं वह वास्तव में क्या है? आज हम कहते हैं कई देश विकसित हैं और कई देश विकासशील हैं| या ऐसा कहते हैं कि इस सरकार के पाँच सालों में राज्य का कुछ भी विकास नही हुआ| विकास का 'अर्थ' क्या है? विकास की प्रचलित धारणा पश्चिमी सभ्यता से आयी है और वह मूलत: आर्थिक विकास पर आधारित है| विकास माने आर्थिक विकास- आर्थिक क्षमता का विकास; अर्थव्यवस्था का विस्तार| शहर, उद्योग, उत्पाद और कन्ज्युमिंग से होनेवाला विकास| इस दिशा के रुपान्तरण को विकास कहा जाता है| जैसे पहले किसी के पास पाँच हजार तनख्वाह की जॉब थी और अब उसके पास दस हजार की जॉब है तो उसे इस धारणा में विकास माना जाएगा| लेकिन इस धारणा की सबसे बड़ी खामी यही है कि उसमें कई सारे अन्य पहलूओं पर गौर नही किया जाता है| कई अण्डरकरंटस ध्यान में नही लिए जाते हैं|



Thursday, May 12, 2016

प्रकृति, पर्यावरण और हम २: प्राकृतिक असन्तुलन में इन्सान की भुमिका


प्रकृति, पर्यावरण और हम १: प्रस्तावना

प्राकृतिक असन्तुलन में इन्सान की भुमिका

पीछले लेख में हमने देखा की कुदरत के कानून द्वारा प्रकृति चलती है| उसकी एक व्यवस्था होती है| अगर इस व्यवस्था पर तनाव आ जाए, तो प्रकृति में भी परिवर्तन आता है| जैसे गुरुत्वाकर्षण एक नियम है| अगर हम टेढा चलेंगे तो इस नियम के कारण ही गिरेंगे| उसी प्रकार हम और प्रकृति के बीच हमारे कारण तनाव हो सकता है| और इसी वजह से जैसे गलत ढंग से चलने के कारण जैसे गुरुत्वाकर्षण गिराता हुआ दिखाई देता है, उसी तरह हमारी गलतियों के कारण प्रकृति प्राकृतिक आपदाएँ जैसे सूखा, बाढ, बेमौसम बारीश या भूकम्प ला रही है| इस लिहाज़ से क्लाएमेट चेंज को ह्युमन चेंज कहा जाना चाहिए| क्यों कि इन सब बदलावों की जड़ मानव ही है| जैसा पीछले भाग में कहा गया, मानव में उपर उठने की या नीचे गिरने की अद्भुत क्षमता है और इसलिए मानव का अस्तित्व बहुत खास बनता है| मानव कुदरत की बेहतर रक्षा भी कर सकता है और उसे तहस नहस भी कर सकता है|



Sunday, May 8, 2016

प्रकृति, पर्यावरण और हम १: प्रस्तावना


प्रकृति, पर्यावरण और हम १: प्रस्तावना

प्रस्तावना

आज पर्यावरण में कई जगहों पर उथल- पुथल नजर आती है| देश के कई हिस्सों में सूखे का कहर बरस रहा है, पहाडियों‌ में वृक्ष जल रहे हैं और पूरे जगत में भूकम्प आ रहे हैं, कहीं तुफान तो कहीं पहाड़ धस रहे हैं| हमारे देश की बात करते हैं तो सूखे की समस्या चरम पर है| ऐसे में मन में ख्याल आता है कि इन सब के लिए हम क्या कर सकते हैं? इस विषय पर आपसे कुछ कहना चाहता हूँ| अब तक इस विषय से सम्बन्धित जो समझा है वह आपसे कहना चाहता हूँ|

सूखे के समन्ध में दिखनेवाली समस्या मूल समस्या का दृश्य रूप है| समस्या का दिखनेवाला और उजागर होनेवाला रूप है| लेकिन वास्तव में यह समस्या उससे बहुत गहन है| उसके कई सारे आयाम हैं| पहले इन सब आयामों को समझना चाहिए| तभी हम इस पूरी परिस्थिति को समझ सकेंगे| इस लेखमाला द्वारा प्रकृति, पर्यावरण और हम इन्सान इस विषय पर कुछ बातचीत करने की इच्छा है| उपर से दिखनेवाली चीजें अलग होती हैं और जब हम गहराई में जा कर देखने की कोशिश करते हैं, तो कई नयी चीजें दिखाई देती हैं|



Saturday, June 9, 2012

जाऊया थोडे निसर्गाकडे

आपण निसर्गाच्या एकदम कुशीत जाऊ शकत नाही. सर्वच जणांना दरी- खो-यांमध्ये किंवा रानावनात फिरण्याचा आनंद घेता येऊ शकत नाही. परंतु शहरामध्ये पर्वती गांव सारख्या मध्यवर्ती आणि गजबजलेल्या परिसरात असूनही अगदी निसर्गाच्या जवळ गेल्यासारखा अनुभव पुण्यातील तळजाई टेकडी परिसरातील वनक्षेत्रात फिरताना नक्की येऊ शकतो...






मन शांत करणारे ठिकाण


जाऊ थोडे निसर्गाकडे



फिरण्यासाठी/ जॉगिंगसाठी उत्तम स्थान

ह्या परिसरात प्रचंड जैवविधता आणि अप्रतिम सृष्टीसौंदर्य आहे.


कोणत्याही ऋतूमधील अप्रतिम निसर्ग

कसे, कधी, का?सकाळी साधारण ५.३० ते ८ आणि संध्याकाळी ५ ते ७.३० हे सुरू असते. पुण्यात पर्वती गावातून पुढे टेकडीचा चढ सुरू होतो. प्रसिद्ध ठिकाण असल्यामुळे पुण्यात असूनही टेकडीचा पत्ता सांगितला जाईल, अशी अपेक्षा करता येऊ शकते.... टेकडीपर्यंत बस जात नाही; परंतु टेकडीचा चढ हासुद्धा रम्य परिसर आहे आणि कित्येक लोक तो पूर्ण चढ चढून नंतरही टेकडीवर फिरतात. टेकडीवर वनक्षेत्रात फिरण्याच्या कित्येक वाटा आहेत आणि सर्व परिसर अत्यंत नितांतसुंदर, शांत आणि रमणीय आहे. मनसोक्त चालल्यावर तिथेच नाश्त्याची सोयसुद्धा आहे. निसर्गापासून दूर राहणा-यांनाही निसर्गाच्या जवळ नेणारा हा एक सुंदर फेरफटका होऊ शकतो...


ही अप्रतिम प्रकाशचित्रं गिरीशने घेतली आहेत.



Tuesday, May 17, 2011

दरीदरीतून नाद गुंजला...............

काही काही अनुभव असे असतात की जे फक्त फील करता येतात आणि त्याद्वारे आपण स्वत:ला चार्ज करू शकतो. असेच काही अनुभव म्हणजे दरी- खो-यांमधल्या महाराष्ट्रामधील भटकंती. नुकताच अशी भटकंती करण्याचा योग आला.

महाराष्ट्रातल्या समृद्धतेचा संपन्न वारसा लाभलेला एक प्रमुख जिल्हा म्हणजे कोल्हापूर..... इथे निसर्गाचे सर्व बाबतीतले ऐश्वर्य दिसते. सह्याद्रीचा घाट व पर्वतमय प्रदेश..... त्याला वर्णन करण्यास शब्द नाहीत. ह्या प्रकारे त्याचं वर्णन करायचा प्रयत्न करणं म्हणजे इंद्रियातीत गोष्टीला इंद्रियांद्वारे समजून घेणं आहे.

विशाळगडाची पायवाट................... संपूर्ण घनदाट झाडी, रस्त्याच्या दोन्ही बाजूंना जणू जंगलच.............. आव्हान देणारा रस्ता आणि आकर्षक निसर्ग..... आणि त्यानंतर एका ठिकाणाहून होणारे चाळीस कोस तरी परिसरातील कोकणाचे (रत्नागिरी जिल्हा) दर्शन..... सर्वच अद्भूत.... निसर्गामुळे मानवी उंची वाढल्याचीही व सह्याद्रीप्रमाणे मनांचीही उंची वाढल्याची उदाहरणे दिसतात.

कोल्हापूरप्रमाणेच निसर्गाने समृद्ध असलेला पण काहीसा अँटी क्लायमॅक्स असलेला नंदुरबार जिल्हा..... सातपुडा...... उत्तर व दक्षिण ह्यामधील सीमारेषा म्हणजे सातपुडा आणि नर्मदा.... सातपुड्याच्या अजस्र रांगा.... अत्यंत आव्हानात्मक घाट आणि डोंगर.... इतका बिकट निसर्ग असूनही त्यामध्ये हस-या चेह-याने राहणारे आदिवासी....

हा परिसर, ही भ्रमंती म्हणजे शुद्ध प्राणवायूप्रमाणेच शुद्ध जगणं आणि शुद्ध सौंदर्य मिळवण्याची संधी. तो अनुभव शब्दामधून तर पकडता येत नाहीत. आणि तो अनुभव फोटोमध्येसुद्धा घेता येत नाही. कारण तो निसर्ग सर्व अनुभवत असताना, मनाने व मनामध्ये 'फील' करत असताना फोटो घेण्याची शुद्ध सर्वांनाच राहत नाही.

तरीसुद्धा फूल नाही, फुलाची पाकळी नाही, पण काही परागकण म्हणून हे काही फोटो. 







ते सर्व अनुभवणे, फील करणे ही एक मोठी गोष्ट आहे. त्यातून फोटो घेणे, ते उतरवून घेणे, ही वेगळी व पुढची गोष्ट आहे.

कोल्हापूर अजूनही हिरवागार आहे. परंतु सातपुडा- नंदुरबार मात्र पूर्णपणे ओरबाडला गेलेला आहे. त्यामुळे कोल्हापूरचा निसर्ग आव्हान देतो आणि नंदुरबार- सातपुडा आव्हान देतो आणि आवाहनही करतो. 

अजून खूप फिरण्याची इच्छा आहे. काश्मीर हिमालयापासून संपूर्ण भारत. देखते है आगे आगे होता है क्या.

Friday, February 25, 2011

आपला नैसर्गिक वारसा संकटात आहे...

आपले स्वागत आहे!!
हे काही माहितीचे संकलन आहे. महत्त्वाचे वाटले म्हणून शेअर करत आहे.

आपला नैसर्गिक वारसा संकटात आहे:


वन्य जीवनासाठीचे राष्ट्रीय मंडळ (एनबीडब्ल्यूएल) ही एक फारशी परिचित नसलेली ऑक्टोबर 2003 मध्ये निर्माण केली गेलेली स्वायत्त सरकारी संस्था आहे. हीची स्थापना सुधारित वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 2002मधील तरतुदींअंतर्गत केली गेली होती आणि ह्या मंडळाचे अध्यक्ष पंतप्रधान आहेत. ह्याचा उद्देश तीन राष्ट्रीय उद्याने आणि जैवविविधतेच्या विशेष स्थानांशी (हॉट स्पॉट्स) संबंधित योजनांचे पुनर्लेखन करणे हे आहे. एखाद्या क्षेत्राचे पुनर्लेखन (डिनोटिफिकेशन) करणे म्हणजे तो भाग आता संरक्षित क्षेत्र नाही आणि तो व्यापारी विकासासाठी वापरला जाऊ शकतो. पुनर्लेखन करण्यात येणारे तीन राष्ट्रीय उद्यान हे आहेत: जैसलमेरजवळील वाळवंट राष्ट्रीय उद्यान, अरुणाचल प्रदेशातील निम्न सुबनसिरी नदीचे खोरे आणि पिठोरागढ, उत्तराखंडमधील असकोट मुस्क हरिण अभयारण्य. ह्यामुळे वृक्ष आणि वन्य प्राणी ह्यांची निर्दय कत्तल होणार आहे. चौथ्या संरक्षित क्षेत्राचे भवितव्य- गोविंद राष्ट्रीय उद्यान- उत्तरकाशी, उत्तराखंड; जे हिमालयन पक्ष्यांच्या 150 दुर्मिळ प्रजातींचे घर आहे- आजही अनिश्चित आहे.



‘भारत प्रगतीपथावर (इंडिया शायनिंग)’च्या काळात मृत्यूच्या वाटेवरील संकटात सापडलेल्या आणि नामशेष होण्याच्या मार्गावर असलेल्या आणि दलदलीच्या परिसरात राहणा-या प्रजाती अशा आहेत: ग्रेट इंडियन बुस्टर्ड, गंगेच्या प्रदेशातील डॉल्फिन, स्नो लिओपर्ड (बर्फ चित्ता), वाघ, मस्क हरिण, काळे बदक, क्लाउडेड लिओपोर्ड, स्नो लोरिस, हिमालयीन ताहर, मोनाल फिसन्ट, सिवेट मांजर, संगमरवरी मांजर, कॅप्ड लंगूर, गोल्डन महसीर, काळे अस्वल, वेस्टर्न ट्रॅगोपन, दाढीवाले घुबड, कॉमन सँडिपर.



स्थापनेपासूनच एनबीडब्ल्यूएल एकाच उद्देशासह काम करत आहे: विकास क्षेत्र बनवण्याच्या नावाखाली आणि कॉर्पोरेट जगतातील लहरी/ इच्छा पूर्ण करण्याच्या नावाखाली उद्याने आणि अभयारण्ये ह्यांच्या पुनर्लेखनासाठी रबरी शिक्का मारून अनुमती देणे. आपल्या नैसर्गिक वारशावरील हल्ला अत्यंत व्यापक आहे आणि आता निर्माण होणारा प्रश्न हा आहे की किती विकास पुरेसा म्हणता येईल? आणि तो विकास कोणासाठी विकास असेल?



डायनॉसॉरसच्या मृत्यूनंतर आलेली नामशेष होण्याची सर्वांत विपरित मोठी लाट आपणच थांबवू शकतो:

बैजी हा एक आनंदी, ताज्या पाण्यातील डॉल्फिन आहे; जो एकेकाळी यांगत्से नदीच्या हजारो मैलाच्या परिसरात मोठ्या संख्येने राहात होता. आता तो जगातील नामशेष होण्याच्या मार्गावरील सर्वांत मोठ्या आकाराचा प्राणी आहे. गेल्या शतकातील वाढत्या प्रदूषणाच्या कचाट्यात सापडल्यामुळे आणि असीमित मासेमारीमुळे 1980 पर्यंत त्याची लोकसंख्या फक्त 400 इतकी उरली; 1993 मध्ये ती 150 झाली आणि आता 100पेक्षा कमी आहे. की हा प्राणी वन्य प्रदेशात येत्या दशकात टिकेल का, ह्याबद्दल प्राणीशास्त्रज्ञांना शंका आहे. बैजीचे नामशेष होण्यामधील सर्वांत जवळच्या प्रतिस्पर्ध्यांमध्ये सुमात्रान रहिनोसर्स (संभवत: 500 आज जीवंत असावेत) आणि चीनमधील जायंट पँडा (1000 पेक्षा कमी) हे आहेत.



जेव्हा ह्या प्रजातींमधील अंतिम सदस्याचा मृत्यू होतो किंवा कॅलिफॉर्निया कॉन्डॉरप्रमाणे, ज्याला वनातून काढून एका बंदिस्त फलन कार्यक्रमात ठेवले गेले; तेव्हा आपण खात्रीपूर्वक सांगू शकतो; की प्रसारमाध्यमे त्याची नोंद घेतील. परंतु नामशेष होणा-या प्रत्येक प्राणी व्यक्तिमत्त्वाचे काय? जीवशास्त्रज्ञ वनस्पतींच्या आणि लहान प्राण्यांच्या हजारो प्रजातींची नावे सांगू शकतात; जी नुकतीच नामशेष झाली किंवा नामशेष होण्याच्या मार्गावर आहेत.



जगातील सर्वांत दुर्मिळ पक्षी स्पिक्स मॅकाव आहे, मध्य ब्राझीलच्या जंगलातील नदी किनार्यां्वर तळहाताएवढे असे फक्त एक किंवा दोन पक्षी आज आहेत. सर्वांत दुर्मिळ वनस्पती हवाईची कूकची कूकी आहे; जे एक लहान झुडूप आहे आणि त्याची फुले गडद नारिंगी- लाल रंगाची असतात. एकेकाळी ह्या प्रदेशात मोलोकओई ज्वालामुखीचे शुष्क उतार होते. आज त्यातील फक्त अर्थे झुडुपे शिल्लक आहेत आणि त्यांच्या शाखा इतर संबंधित प्रजातींच्या समूहांवर आरोपित केल्या गेल्या आहेत. कूकचा कूकी ह्या जीवशास्त्रीय तुरुंगातील शेवटचे काही दिवस जगत असेल. ह्या झुडुपाला सहाय्य करण्याच्या संबंधित शास्त्रातील तज्ज्ञांच्या सर्वोत्तम प्रयत्नांनंतरही जमिनीमध्ये पेरलेल्या कोणत्याही फांदीला मुळे फुटली नाहीत.



जगाभोवती जीन्सपासून प्रजातींपर्यंतच्या पर्यावरण व्यवस्थेसह पूर्ण विविधतेसह असलेले जीवन, अशी व्याख्या केली जाणारी जैवविविधता आज संकटात आहे. ह्या समस्येला हाताळताना गेल्या दोन दशकांमधील संवर्धन तज़्ज्ञांनी त्यांचे मुख्य लक्ष स्वतंत्र प्रजातींपासून संपूर्णपणे संकटात सापडलेल्या निवासस्थानावर (हॅबिटाट) केंद्रित केले; जे नष्ट झाल्यास अनेक प्रजाती नष्ट होतील. उदाहरणार्थ, अमेरिकेमधील अशा विशेष स्थानांमध्ये (हॉट स्पॉट) दक्षिण कॅलिफॉर्नियामधील किनार्यायचा भाग येतो, फ्लोरिडामधील दलदलीचा प्रदेश येतो आणि अलाबामा आणि इतर दाक्षिणेकडील राज्यांमधील धरणे झालेल्या आणि प्रदूषित झालेल्या नदी व्यवस्थासुद्धा येतात. जगातील सर्वाधिक विशेसः स्थान असलेल्या देशांमध्ये इक्वेडोर, माडागास्कर आणि फिलिपाईन्स ह्यांचा समावेश होतो; पण ह्यावर एकमत नाही. प्रत्येक देशामध्ये त्याच्या समृद्ध पावसाळी जंगलातील दोन तृतीयांश किंवा अधिक वनाचा नाश झाला आहे आणि उरलेला भाग मोठ्या आक्रमणाचा सामना करत आहे.



तज्ज्ञ लोकांचे म्हणणे सरळ आहे: अशा क्षेत्रांमधील संवर्धनाच्या प्रक्रियेवर लक्ष केंद्रित करून कमीत कमी आर्थिक खर्चात जास्तीत जास्त जैव विविधतेला वाचवता येऊ शकते. जर प्रादेशिक नियोजनाअंतर्गत ह्या प्रयत्नांना राजकीय प्रक्रियेचा भाग बनवता आले, तर जैवविविधतेचा बचाव करण्यास लोकांचे सर्वाधिक संभाव्य समर्थन मिळू शकेल.



जगातील विशेष क्षेत्रांमध्ये स्थानिक लोकसंख्येचे व्यापक प्रमाणात नामशेष होणे नित्याची बाब आहे. त्यामध्ये पुढील आहेत:



 मलेशियन द्वीपकल्पातील ताज्या पाण्यातील माशांच्या स्वतंत्र प्रजातींपैकी 266 पेक्षा अधिक प्रजाती.

 फिलिपाईन्समधील लेक लेनाओमधील 18 पैकी 15 व्शिष्ट मासे आणि सेबू ह्या फिलिपाईन बेटावरील 14 पक्ष्यांच्या प्रजातींपैकी अर्ध्या प्रजाती.

 सोसायटी द्वीपसमूहातील मूरीया ह्या स्थानिक ट्री- स्नेल प्रजातींमधील सर्व. जवळच्या ताहिती आणि हवाई बेटांमधील ह्या प्रजातीसुद्धा जलद गतीने नामशेष होत आहेत.

 इक्वेडोरमधील एका पर्वताच्या रांगेवर वाढणार्या् 90 पेक्षा अधिक वनस्पतींच्या प्रजाती. ह्याचे कारण म्हणजे 1978 ते 1986 काळात झालेली वनाची संपूर्ण कटाई.



ह्या नोंद झालेल्या उदाहरणांची संख्या काहीच नाही. नामशेष होण्याचा एकूण दर ठरवणे दुर्दैवाने अत्यंत अवघड आहे. मोठ्या पक्ष्यांसारखे आणि सस्तन प्राण्यांसारखे काही गट हे इतरांपेक्षा नामशेष होण्यास जास्त संवेदनशील आहेत. एका किंवा दोन ताज्या पाण्याच्या प्रवाहापुरत्या मर्यादित असलेल्या माशांच्या बाबतीतही तसेच आहे. किटकांचे आणि लहान प्राण्यांमधील बहुतांश प्रजाती लक्ष ठेवण्यासाठी अत्यंत अवघड आहेत; त्यामुळे त्यांची नेमकी संख्या कळू शकत नाही. परंतु तरीही, विश्लेषणाच्या अनेक अप्रत्यक्ष वापरणारे जीवशास्त्रज्ञ सामान्यत: एकमत होतात, की जागतिक पातळीवर आणि कमीत कमी जमिनीवर होमो सेपिएन्सचे आगमन होण्याआधीच्या तुलनेत आज प्रजाती 100 पट वेगाने नामशेष होत आहेत.



उष्ण कटिबंधातील पर्जन्यावर आधारित वने हे ह्या प्रकारच्या सर्वाधिक हानीचे क्षेत्र आहे. जरी एकूण जमीन असलेल्या पृष्ठभागापैकी फक्त 6% भागात ते असले तरीही त्यांच्यामध्ये संपूर्ण जगात आढळणार्याल वनस्पती आणि प्राण्यांच्या प्रजातींपैकी अर्ध्या प्रजाती आढळतात. 1980च्या दशकामध्ये पर्जन्यावर आधारित वने साफ होण्याचा आणि जळण्याचा दर दर वर्षी 1% होता; हे प्रमाण आयर्लंड ह्या संपूर्ण देशाच्या आकारमानाएवढे आहे आणि विनाश होण्याची गती आता वाढत असावी. अशा निवासस्थानाची हानी झाल्यास ग्रहावरील राखीव जैव विविधता मोठ्या संकटात सापडते. ह्याचा अर्थ दर वर्षी 0.25% किंवा अधिक वन्य प्रजाती तत्काल होणा-या किंवा लवकरच होणा-या नष्टचर्यामध्ये ढकलल्या जात आहेत. दराशिवाय हे प्रत्यक्ष संख्येच्या दृष्टीने किती असेल? जर आज बर्याधच प्रमाणात मानवाने हस्तक्षेप न केलेल्या वनांमध्ये 10 दशलक्ष प्रजाती असतील, जे काही शास्त्रज्ञांचे मत आहे, तर वार्षिक नुकसान लाखोंमध्ये आहे. जर “फक्त” 1 दशलक्ष प्रजाती जरी असतील, तरी होणारे नुकसान हजारोंमध्ये आहे.



दिलेल्या नैसर्गिक निवासस्थानाचे क्षेत्र आणि त्यामध्ये राहण्यास सक्षम असलेल्या प्रजातींची संख्या ह्यामधील संबंधांवर ही अनुमाने आधारित आहेत. ही अनुमाने कदाचित कमीच असतील. वस्तीस्थानाचे संपूर्णपणे होणारे उच्चाटन, हे नामशेष होण्यामागचे मुख्य कारण आहे. परंतु शिकार, वनस्पती आणि प्राण्यांच्या अतिरिक्त कापणीसह आक्रमक (एक्सोटिक) विदेशी पक्षी आणि त्यांच्यासह असलेले आजार हे विनाशाच्या प्रक्रियेमध्ये कारक म्हणून थोडेसेच मागे आहेत.



हे सर्व घटक एकमेकांसह अत्यंत गुंतागुंतीच्या प्रकारे काम करतात. जेव्हा असे विचारले, की कशामुळे कोणत्या विशिष्ट प्रजाती नामशेष होतात, तर जीवशास्त्रज्ञ ओरिएंट एक्स्प्रेसमधील खून अशा प्रकारचे उत्तर देण्याची शक्यता आहे: त्या सर्वांनी ते केले. उष्णकटीबंधीय देशांमधील एक सर्वसाधारण क्रम ओसाड प्रदेशात रस्त्यांची उभारणी करण्यापासून सुरू होतो. ह्याचे उदाहरण म्हणजे 1970 आणि 1980च्या दशकामध्ये ब्राझीलमधील ऍमेझॉनच्या रोन्डोनिया राज्यातील साफ केलेला प्रदेश. जमिनी मिळवण्याची इच्छा असलेले लोक त्यामध्ये येतात, रस्त्याच्या दोन्ही बाजूच्या पर्जन्य वनाला साफ करतात, परकीय वनस्पती लावतात व परकीय प्राणी आणतात आणि अधिक अन्नासाठी जंगली प्राण्यांची शिकार करतात. अनेक स्थानिक प्रजाती दुर्मिळ बनतात आणि काही संपूर्णपणे नामशेष होतात.


मानवाच्या लोकसंख्यावाढीची किंमत जगातील वनस्पती आणि प्राणीजीवन चुकवत आहे. जे मानवाचा समोरासमोरचा स्वार्थ सर्वाधिक महत्त्वाचा मानतात, त्यांना ही चुकवलेली किंमत स्वीकारार्ह वाटते.



परंतु लक्षात घेतले पाहिजे, की आपण निर्मितीच्या मर्यादेला नष्ट करत आहोत आणि त्याद्वारे सर्व भविष्यकालीन पिढ्यांना आपल्याला जे पाहायचे सौभाग्य मिळाले होते, ते पाहण्यापासून वंचित ठेवत आहोत. सध्या जैव विविधतेत होत असलेली हानी मेसोझोइक युगाच्या अस्ताच्या 65 दशलक्ष वर्षांनंतरची सर्वांत मोठी हानी आहे. त्यावेळी आजच्या वैज्ञानिक समजानुसार, एका किंवा अधिक मोठ्या उल्केच्या टकरीच्या परिणामामुळे वातावरण काळे झाले, पृथ्वीवरील बरेचसे पर्यावरण बदलून गेले आणि डायनॉसॉर्स नामशेष झाले. त्यातून सेनोझोइक युग किंवा सस्तन युगाची सुरुवात आणि उत्क्रांतीच्या नवीन टप्प्यास सुरुवात झाली. आज नामशेष होण्याचा जो उद्रेक आपण घडवत आहोत, तो जर आपण योग्य निवड केली तर सुधारला जाऊ शकतो. जर आपण योग्य निवड केली नाही, तर पुढील शतकामध्ये सेनोझोइक युगाचा अंत घडेल आणि जैवशास्त्रीय दारिद्र्यामुळे ओळखले जाणारे एक नवीन युग सुरू होईल. त्याला एर्मोझोइक कालखंड म्हणजेच एकटेपणाचे युग म्हणता येऊ शकेल.



अनुक्रमे असलेल्या तीन प्रकारच्या गोष्टींना नकार देऊन लोक प्रजाती नामशेष होण्याच्या परिस्थितीला उत्तर देतात:

1. पहिले म्हणजे, साधे- का चिंता करायची? नामशेष होणे नैसर्गिक आहे. इतिहासातील गेल्या 3 कोटी वर्षांपेक्षा अधिक कालावधीपासून प्रजाती नामशेष होत आहेत आणि त्यामुळे जीवावरणाचे स्थायी नुकसान झालेले नाही. उत्क्रांतीमध्ये नेहमीच नामशेष होणार्याु प्रजातींच्या स्थानी नवीन प्रजाती आल्या आहेत.

वरील सर्व विधाने सत्य आहेत; परंतु त्यामध्ये बिकट सत्य आहे. मेसोझोइक उद्रेकानंतर आणि 400 दशलक्ष वर्षांनंतर येणार्यात आधीच्या प्रत्येक मोठ्या उद्रेकानंतर उत्क्रांतीला आपत्ती येण्याआधीच्या विविधतेला प्राप्त करण्यासाठी सुमारे 10 दशलक्ष वर्षे लागली. तितका मोठा व प्रदीर्घ वाट पाहण्याच्या कालखंडाचय दृष्टीने आणि आपण एकाच जीवनकालात केलेल्या मोठ्या हानीच्या प्रमाणात आपले वंशज ह्याचे वर्णन चांगले कसे करतील? ‘आम्हांला फसवले!’ त्याहून वाईट हे आहे, की आधीच्या युगामध्ये उत्क्रांतीने जी भुमिका पार पाडली, ती भुमिका ती कृत्रिम घटकांनी प्रदूषित झालेल्या आजच्या गर्दीच्या काळात पार पाडू शकत नाही.



2. नकाराच्या दुस-या टप्प्यावर जाताना लोक विचारतात, आपल्याला इतक्या विविध प्रजातींची गरजच काय? जर त्यातील बहुसंख्य ढेकुण, रानटी झुडुपे आणि किटक असतील, तर का त्यांची पर्वा करावी?



जगातील भीतिदायक परिस्थितीला खोडून काढणे सोपे आहे. हे विसरणे शक्य आहे, की एका शतकापेक्षा अलीकडच्या काळात आधुनिक संवर्धन आंदोलनाच्या उदयाच्या आधी, जगातील स्थानिक पक्षी आणि सस्तन प्राण्यांना अत्यंत निष्ठुर औदासीन्यासह हाताळले गेले. नैसर्गिक जगतातील लहान गोष्टींच्या मूल्याचे महत्त्व अनिवार्य प्रकारे स्पष्ट झालेले आहे. पर्यावरणीय व्यवस्थांवर अलीकडच्या काळात झालेले प्रयोग पर्यावरणशास्त्रज्ञांची दीर्घकाळची शंका खरी होती, ह्याला दुजोरा देतात: पर्यावरण व्यवस्थेमध्ये जर प्रजातींची संख्या अधिक असेल, तर तिची उत्पादनशीलता अधिक असते आणि दुष्काळ किंवा इतर नैसर्गिक आपत्तींमध्ये टिकून राहण्याची तिची क्षमता अधिक असते. आपले पाणी साफ करण्यासाठी, आपण श्वास घेतो ती हवा निर्माण करण्यासाठी आपण सक्रिय पर्यावरणीय व्यवस्थेवर अवांबून आहोत; त्यामुळे जैवविविधता ही निष्काळजीपणे दुर्लक्ष करण्यासारखी गोष्ट नाही.



वस्तीयोग्य (हॅबिटेबल) पर्यावरण निर्माण करण्याव्यतिरिक्त, वन्य प्रजाती अशा उत्पादनांचे स्रोत आहेत; जे आपले जीवन टिकवण्यासाठी सहाय्य करतात. ह्यातील कोणतीही सुविधा औषधोत्पादनाबद्दल नाही. जगातील औषधविक्रेत्यांद्वारे दिले जात असलेल्या औषधांपैकी 40% पेक्षा अधिक मूलत: वनस्पती, प्राणी, किटक आणि सूक्ष्मजीवांपासून बनणारे पदार्थ आहेत. उदाहरणार्थ, ऍस्पिरिन, हे जगात सर्वांत जास्त वापरले जाणारे औषध सॅलिसिक आम्लापासून बनवले जाते; जे की मेडोस्वीट ह्या प्रजातींमधून मिळते.



एकूण प्रजाती किंवा जीवांचे फार छोट्या प्रमाणात- शक्यतो 1% पेक्षा कमी- आजवर औषधे म्हणून उपयोगी पडणार्याा नैसर्गिक औषधी उत्पादनांसाठी परीक्षण केले गेले आहे. प्रतिजैविके आणि मलेरियाविरुद्धचे कारक ह्यांच्याबद्दल असा शोध घेण्याची तातडीची गरज आहे. आज सर्वाधिक वापरले जाणारे घटक आता कमी परिणामकारक होत आहेत; कारण रोगाला कारणीभूत ठरणार्याा जैविक घटक ह्या औषधांना जनुकीय विरोध विकसित करत आहेत. उदाहरणार्थ बॅक्टेरियन स्टाफिलोकोकस हे अलीकडेच सक्षम प्राणघातक रोग करणारे म्हणून पुढे आले आहे आणि न्युमोनिया होण्यास कारण्यास कारणीभूत ठरणारे सूक्ष्मजीव अधिक घातक बनत आहेत. असे म्हंटले गेले आहे, की प्रतिजैविकांचे युग आता संपुष्टात आले आहे. खात्रीपूर्वक नाही; पण वैद्यकीय संशोधक जलद गतीने वाढणा-या प्राणघातक रोगकारकांच्या विरोधातील शर्यतीमध्ये स्वत:ला समर्थ करण्यास असफल ठरत आहेत; आणि हे निश्चितच अधिक गंभीर होत जाणार आहे. 21 व्या शतकातील वैद्यकशास्त्रातील नवीन शस्त्रे शोधण्यासाठी त्यांना वन्य प्रजातींचा आणखी व्यापक शोध घेणे बंधनकारक झाले आहे.



प्रत्येक प्रजाती, हा उत्क्रांतीमधील श्रेष्टतम घटक आहे आणि त्यातून महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक ज्ञानाचा मोठा साठा मिळतो; कारण ती जिथे असते; तिथल्या पर्यावरणामध्ये तिचे संपूर्ण अनुकूलन झालेले असते. आज जगणार्या प्रजाती हजारांपासून लक्षावधी वर्षांचे आयुष्य असलेल्या आहेत. इतक्या मोठ्या संख्येतील पिढ्यांमधील बिकट परिस्थितीतून तरलेले त्यांचे जनुक त्यांच्यामधील जीवांना निर्वाह आणि पुनरुत्पादन ह्यामध्ये सहाय्य करण्यासाठी थक्क होण्यासारख्या गुंतागुंतीच्या जैवरासायनिक प्रक्रिया उभ्या करतात.



3. इतके सगळे होऊनही नकाराची तिसरी घंटा अशा प्रकारची असते: आत्ता सर्व प्रजातींचे संरक्षण करण्यासाठी का धावपळ करायची? आपल्याला त्याहून अधिक महत्त्वाची कामे आहेत. प्राणीसंग्रहालयात सजीव नमूने (स्पेसिमन्स) जीवंत ठेवून आणि बर्फावरील वनस्पतीशास्त्रीय उद्याने का ठेवायची नाहीत; त्यामुळे त्यांना नंतर जंगलात सोडता येईल. ह्यातील गंभीर सत्य हे आहे, की जगातील आजची सर्व प्राणीसंग्रहालये सस्तन प्राणी, पक्षी, सरपटणारे प्राणी आणि भूजलचर ह्यांच्या जास्तीतजास्त फक्त 2000 प्रजाती टिकवून ठेवू शकतात. आणि आज अशा 24 000 ज्ञात प्रजाती आहेत. जगातील वनस्पतीशास्त्रीय उद्यानेसुद्धा एक चतुर्थांश दशलक्ष वनस्पतींचय प्रजातींमुळे अधिकच जास्त अपुरे ठरतील. संकटात सापडलेल्या काही थोड्या प्रजातींसाठी हे माध्यम विशेष महत्त्वाचे आहे. ते द्रव नायट्रोजनमध्ये गर्भ गोठवण्यासारखे आहे. परंतु अशा उपायांनी संपूर्ण समस्या सोडवण्यापर्यंत पोचता येत नाही.



ह्यामध्ये आणखी समस्या ही आहे की किटक, बुरशी आणि पर्यावरणदृष्ट्या छोटे असलेले अत्यंत महत्त्वाचे सूक्ष्मजीव ह्यांच्या संरक्षणासाठी कोणीही आजवर योजना बनवलेली नाही. आणि एकदा वैज्ञानिकांनी प्रजातींना स्वतंत्र ठेवण्यास सुरुवात केली, तर ज्यामध्ये अनेक प्रजाती वास करत होत्या त्या अस्तित्वात राहणार नाही. वाघ आणि गेंडा भातावर जगू शकत नाहीतल ह्या उदाहरणातून हे स्पष्ट होईल.





आपण काय करू शकतो?

त्यामुळे वैज्ञानिक आणि संवर्धनवाद्यांचा निष्कर्ष एकसमान आहे: वन्य प्रजातींचे संरक्षण करण्याचा एकमेव मार्ग म्हणजे त्यांना त्यांच्या मूळ वस्तीस्थानामध्ये जतन करणे. किती जलद गतीने अशी वस्तीस्थाने संपुष्टात येत आहेत हे लक्षात घेता प्रत्यक्ष उपाय सुद्धा निराश करण्याइतके अवघड काम असेल. कित्येक पर्यावरणीय व्यवस्था आधीच नष्ट झाल्या आहेत आणि इतर प्रदूषित झाल्या आहेत.



ह्या सर्व अडचणींमध्येही काही सकारात्मक विचार केला जाऊ शकतो. योग्य त्या उपायांसह आणि त्यांचा वापर करण्याच्या इच्छेसह, पर्यावरणाच्या हानीची गती कमी केली जाऊ शकते आणि कदाचित पुढे जाऊन थांबवलीसुद्धा जाऊ शकते. त्वरित घेण्याच्या काही अत्यंत महत्त्वपूर्ण उपायांची माहिई 1992 पृथ्वी परिषद, रिओ डि जानेरो मध्ये युरोपियन युनियन आणि 156 देशांनी स्वाक्षरी केलेल्या जैव विविधतेच्या जाहिरनाम्यामध्ये नमूद केले गेलेले आहेत. जागतिक पातळीवर जैव विविधतेचा मद्द्याबद्दल जागरूकता होण्यामध्ये ह्या परिषदेने निर्णायक भुमिका बजावली. संवर्धनाच्या प्रयत्नांना गती देण्यामध्ये तिने उत्प्रेरकाची भुमिका पार पाडली; तसेच विशेषत: उष्णकटिबंधीय देशांना खडबडून जागे केले; जिथे जैव विविधता सर्वाधिक समृद्ध आणि सर्वाधिक संकटात आहे.



हाताखाली असलेल्या पहिल्या टप्प्यांपैकी पहिला टप्पा म्हणजे एकेका देशानुसार जैव विविधतेचे सर्वेक्षण करणे, नामशेष होण्याच्या विशेष क्षेत्रांना नेमके ओळखणे, हा आहे. उद्याने आणि संरक्षित क्षेत्रे ठरवताना अशी माहिती वापरल्यास मोठ्या संख्येतील संकटात सापडलेल्या पर्यावरण व्यवस्था आणि प्रजातींचा बचाव करता येऊ शकेल. पक्षी संवर्धनासाठीच्या आंतरराष्ट्रीय संस्थेद्वारे पक्ष्यांच्या वितरणाबद्दलचा आढावा घेतला गेला आहे आणि त्यामध्ये कोणत्याही जैवघटकासाठी उपलब्ध असू शकणा-या सर्वोत्तम तथ्यांचा वापर केला गेला आहे. ह्या आढाव्यामध्ये निदर्शनाला आले आहे, की जगातील 20% प्रजाती ह्या 2% जमिनी क्षेत्रावर वास्तव्याला आहेत. त्या क्षेत्रांमधील नैसर्गिक पर्यावरणाचे संरक्षण केल्यास पक्षी नामशेष होण्याच्या दरामध्ये मोठी घट होऊ शकेल. तसेच, त्या वस्तीस्थानापुरत्या मर्यादित असलेल्या मोठ्या संख्येतील प्राण्यांना आणि वनस्पतींनाही त्यातून संरक्षक कवच मिळेल.



नैसर्गिक पर्यावरणात आज उरलेल्या प्रजातींच्या शेवटच्या घटकाचे संरक्षण करण्यासाठी फक्त वैज्ञानिक माहिती पुरेशी नाही. मोठ्या प्रमाणातील आर्थिक आणि राजकीय अडथळेसुद्धा पार करावे लागतील. वाढणार्या लोकसंख्येला नवीन जमीन आणि अधिक अन्न उत्पादनाची आवश्यकता पडते. अत्यंत गरीब असलेल्या लोकांच्या प्राधान्यक्रमामध्ये त्यांच्या देशातील वनस्पती आणि प्राणी घटकांचे संरक्षण करणे समाविष्ट नसते. खाजगी मालकांकडून मोठ्या प्रमाणात जमीन विकत घेण्यासाठी आणि नंतर संरक्षणाचा खर्च भागवण्यासाठी व राखीव क्षेत्राच्या निगराणीसाठी निधी उभा करावा लागतो. स्थानिक लोकांचा सहयोग मिळवण्यासाठी, त्यांच्या पर्यावरणाला आरोग्यपूर्ण अवस्थेत टिकवण्यासाठीचे आणि त्यांना वन्य क्षेत्रांचे महत्त्व समजावून सांगण्यासाठी शैक्षणिक उपक्रमांची आवश्यकता असते. आधीच ज्या जमिनीवर ते वास्तव्य करत आहेत, त्यावर अधिक चांगल्या प्रकारे जगण्यासाठी गरीबांचे सहाय्य केले जाणे आवश्यक ठरते.



ह्या एकमेकांच्या विरोधातील संघर्षाच्या गोंधळातून एक नवीन प्रकारचा पर्यावरणवाद आला आहे. त्यामध्ये जगातील वनस्पती व प्राणी घटकांच्या मूल्यांना मानवतेचा नैसर्गिक वारसा म्हणून फक्त सौंदर्यवादी दृष्टीने न पाहता श्रीमंती आणि आर्थिक स्थैर्याचा स्रोत म्हणूनही पाहिले जाते. बाल्यावस्थेत असलेले जैव विविधता औद्योगिक क्षेत्र हे अनेक आघाड्य़ांवर आता आकाराला येते आहे. अमेरिकेमध्ये 20 पेक्षा अधिक औषधी निर्माण करणार्यात कंपन्यांनी खाजगी आणि राष्ट्रीय संशोधन संस्थांसोबत भागीदारी केली आहे ज्याचा उद्देश पर्जन्य वनांमध्ये आणि इतर वस्तीस्थानांमध्ये नवीन औषधांसाठी “रासायनिक अन्वेषण” करणे, हा आहे.



पर्यावरणीय पर्यटनाने (इको टूरिझम) सर्वांत आकर्षक वन्य क्षेत्राला पैसे देणार्या पर्यटकांसाठी खुले केले आहे. अनेक विकसनशील देशांमध्ये हा अर्थार्जनाचा सर्वांत मोठा स्रोत बनला आहे. संरक्षित क्षेत्रे आणि आजूबाजूच्या परिसराला बाह्य आघातप्रतिबंधक क्षेत्र (बफर झोन) निर्माण करण्यासाठी वापरले जाते आहे; जिथे स्थानिक लोकांना शाश्वत शेती करण्यासाठी आणि संकटात सापडलेल्या प्रजातींसाठी सर्वाधिक संरक्षणाच्या अंतर्गत मुख्य क्षेत्राला जपण्यासाठी बंदिस्त मुख्य क्षेत्र निर्माण केले जाते आहे. आधी संपूर्णपणे तोडण्यासाठी नियोजन केलेले काही वन्य प्रदेश आता निवडक प्रकारे विकसित किंवा तोडले जात आहेत आणि नंतर त्यांच्या नवनिर्मितीला सहाय्य केले जात आहे. ह्या पद्धतीतून अधिक दीर्घकालीन नफा मिळत असल्यामुळे त्यांचा व्यापक प्रमाणात स्वीकार केला जाईल, अशी अपेक्षा आहे.



संवर्धन आणि आर्थिक विकासाला एकत्र आणणारा जैव विविधतेतील नवीन दृष्टीकोन अर्थातच परिपूर्ण असण्यापासून लांबच आहे आणि कोणत्याही देशात संपूर्णपणे वापरला जात नाही. परंतु ही एक आश्वासक सुरुवात आहे. ह्यातील काही सुरुवातीचे प्रकल्प नाट्यमयरित्या यशस्वी ठरले आहेत. जीवशास्त्रीय दृष्टीने गरीब झालेल्या भवितव्याच्या ऐवजी ते एक वेगळा मार्ग दाखवतात.

जगातील लोकसंख्या 5.7 अब्ज असताना आणि आपण पुढील शतकात जाईपर्यंत तिची वाढ अशीच होण्याची खात्री असताना, मानवतेने एका धोकादायक पर्यावरणीय वळणावरील प्रवासास सुरुवात केली आहे. आपण आशा करू, आपण खात्रीपूर्वक ह्यावर विश्वास ठेवू, की आपल्या प्रजाती आपल्या प्रवेशानंतर दुस-या बाजूला अधिक चांगल्या स्थितीमध्ये आणतील. मानव म्हणून शक्य असेल त्या पातळीपर्यंत आपल्याला आपल्या उरलेल्या जीवनात हे ध्येय घेणे आवश्यक आहे. तसेच हीच वेळ आहे, जेव्हा आपण पर्यावरणीय र्हाधस आणि लोकशाहीमधील नाजुक संबंध वाढवले पाहिजेत.



सारांश:

विकासाच्या संकल्पनेशी पर्यावरणाचा अत्यंत जवळचा संबंध आहे. सर्व प्रकारची आर्थिक वाढ आणि तंत्रज्ञानातील प्रगती औद्योगिकीकरण झालेल्या समाजांमधील मूलभूत घटक आहेत. मूलभूत अर्थशास्त्रानुसार, विकास नेहमीच आर्थिक वाढीसोबत जोडलेला आहे आणि त्याचा परिणाम म्हणून त्यामधून सहकार्याच्या ऐवजी प्रतिस्पर्धा निर्माण झालेली आहे.



आज प्रदूषण, लोकसंख्येची भरमसाठ वाढ आणि नैसर्गिक संसाधनांच्या अमर्याद वापरमुळे औद्योगिकीकरण झालेल्या देशांमधील पर्यावरणीय र्हाआस वाढला आहे आणि पर्यावरणीय संरक्षणाच्या संकल्पनेचा उदय झाला आहे.



पारंपारिक टप्प्यानंतरच्या समाजांमध्ये पर्यावरण आणि आरोग्य ह्या जवळजवळ सममूल्य संकल्पना झाल्या आहेत. आज मानवाने त्याच्या बाह्य पर्यावरणामध्ये आणलेल्या बदलांमुळे आणि शरीर आणि आत्म्याचे नियंत्रण करण्याच्या त्याच्या प्रयत्नांमुळे मानवी जीवनामध्ये आता अनेक मोठे बदल घडत आहेत. आरोग्याचा विचार न करता आता पर्यावरणाबद्दल बोलणे शक्य नाही आणि पर्यावरणाचा विचार न करता आरोग्याबद्दलही बोलणे शक्य नाही.



भारतामध्ये विशेषत: गेल्या काही वर्षांमध्ये पर्यावरणीय मुद्दे हे मुख्य राजकीय कृती आणि चर्चेमधील ठळकपणे दिसणारे महत्त्वपूर्ण घटक बनले आहेत.



पर्यावरणीय संकटाचे मुख्य कारण म्हणून भांडवलशाहीला बघितले जाते. निसर्गातील घटनाचक्र कशा प्रकारे बदलत आहे आणि तंत्रज्ञानामुळे मर्यादित होऊन भांडवलशाहीय संचयाच्या अटळ श्रृंखलेमध्ये कसे बदलत आहे, ह्याचे वर्णन करणार्याव अनेक अभ्यासांनी कित्येक वर्षांपासून ह्या दृष्टीकोनाचे समर्थन केले आहे. जैव तंत्रज्ञान, नाशक बीज ह्यांसारखी काही उदाहरणे पुढे ठेवली जात आहेत. भांडवलशाहीच्या परिणामांद्वारे निर्माण झालेल्या ह्या संकटाला ‘दुसरी विसंगती’ म्हणून ओळखले गेले; ज्यामध्ये भांडवल स्वत:ची सामाजिक आणि पर्यावरणीय परिस्थिती बिघडवते आणि संपुष्टात आणते आणि नफा आणि संचयाच्या आधारावर पुनरुत्पादन करण्याच्या स्वत:च्या क्षमतेला धोका निर्माण करते. दुसर्यास शब्दांमध्ये आम्लयुक्त पाऊस, पर्यावरणातील बदल, अतिरिक्त मासेमारी, वन्यजीवनाचा नाश, वनांचा नाश, अणू- कचरा संकलन इत्यादि घटकांना सर्वसाधारण मानवतेसाठीचे संकट म्हणूनच नाही; तर भांडवलशाही पुनरुत्पादनासाठीचे संकट म्हणून मुख्यत: आणि मूलभूत प्रकारे बघितले जाते.



गेल्या कित्येक दशकांमध्ये पर्यावरणीय आंदोलनांमध्ये किंवा पर्यावरणाच्या विषयावर आधारित लोकांच्या चळवळींमध्ये मोठ्या प्रमाणात वृद्धी झाली आहे आणि ती भारत आणि इतर देशांमधील पार्श्वभूमीवर पुरेशा स्पष्ट प्रकारे बघितली जाऊ शकते. त्यातील महत्त्वपूर्ण आंदोलनांमध्ये ह्यांचा समावेश होऊ शकेल: चिपको आंदोलन- हिमालयातील वन्यनाशाचा विरोध करणारे आंदोलन; नर्मदा बचाओ आंदोलन- टिहरी आणि कोअल करो- मोठ्या धरणांच्या विरोधातील संघर्ष; छिलिका बचाओ आंदोलन- कोळंबी माशाच्या शेतीच्या बाजूने टाटा कंपनीच्या आणि राष्ट्रीय मासेमारी कामगार मंडळाच्या विरोधातील संघर्ष- मासेमारीच्या व्यापारीकरणाच्या विरोधातील संघर्ष आणि इतर.



जगातील लोकसंख्या 5.7 अब्ज असताना आणि आपण पुढील शतकात जाईपर्यंत तिची वाढ अशीच होण्याची खात्री असताना, मानवतेने एका धोकादायक पर्यावरणीय वळणावरील प्रवासास सुरुवात केली आहे. आपण आशा करू, आपण खात्रीपूर्वक ह्यावर विश्वास ठेवू, की आपल्या प्रजाती आपल्या प्रवेशानंतर दुसर्याप बाजूला अधिक चांगल्या स्थितीमध्ये आणतील. मानव म्हणून शक्य असेल त्या पातळीपर्यंत आपल्याला आपल्या उरलेल्या जीवनात हे ध्येय घेणे आवश्यक आहे. तसेच हीच वेळ आहे, जेव्हा आपण पर्यावरणीय र्हाशस आणि लोकशाहीमधील नाजुक संबंध वाढवले पाहिजेत.



असे असले तरीही, सर्व संकल्पनात्मक बदलांच्या पलीकडेही अत्यंत अवघड काम शिल्लक राहते; पर्यावरण आणि विकास हे राजकीय चर्चेचे विभक्त भाग नाहीत. ते एका व्यापक स्थानिक, प्रादेशिक, राष्ट्रीय आणि आंतरराष्ट्रीय व्यवस्थेचे व राजकीय आणि आर्थिक सत्ता संरचनेचे एकमेकांवर अवलंबून असलेले भाग आहेत. जर आपण कधी एकटे असू, तर आता आपण एकटे नाही. ह्या ग्रहावर काही जरी घडत असले, तर आपल्या व्यक्तिगत आणि सामुदायिक जीवनावर, जगण्याच्या परिस्थितीवर आणि आपण जगाकडे बघतो त्या दृष्टीकोनावर त्याचा परिणाम होईल.