प्रस्तावना
नमस्ते!
हाल ही में मैने और एक साईकिल यात्रा पूरी की| यह योग प्रसार हेतु साईकिल यात्रा थी जिसमें लगभग ५९५ किलोमीटर तक साईकिल चलाई और लगभग योजना के अनुसार ही यह यात्रा पूरी हुई (सिर्फ कुछ कारण से एक पड़ाव कम हुआ)| मध्य महाराष्ट्र के परभणी जिले में कार्यरत 'निरामय योग प्रसार एवम् अनुसंधान संस्था' तथा उसके कार्य का विस्तार को ले कर यह यात्रा थी| मध्य महाराष्ट्र के परभणी, जालना, औरंगाबाद एवम् बुलढाणा जिलों में काम करनेवाले योग- कार्यकर्ता, योग अध्यापक इनसे इस यात्रा में मिलना हुआ| अब इस यात्रा का विवरण लिखना शुरू कर रहा हूँ|
पहली बात तो यह है कि किसी भी विषय का प्रसार करना हो, तो कई मुद्दे उपस्थित होते हैं| सीधा प्रसार हमेशा ही कारगर साबित नही होता है| कई लोग बार बार आग्रह करने पर उस चीज़ की तरफ जा सकते हैं, पर यह सभी के लिए लागू नही होता है| मेरा अपना उदाहरण यही है कि जब जब मुझे किसी चीज़ के बारे में आग्रह किया गया, अक्सर मैने उससे दूर ही गया| इसलिए योग प्रसार करना इतनी सरल बात नही है| मेरा विश्वास प्रत्यक्ष प्रसार के बजाय अप्रत्यक्ष प्रसार में हैं| किसी को योग कीजिए, ऐसा बताने के बजाय खुद उसे करते रहने में है| और इस यात्रा में भी कुछ ऐसा ही हुआ| जैसे यह एक साईकिल यात्रा है और साईकिल सन्देश और साईकिल प्रसार भी इसका एक अन्दरूनी पहलू है| मैने किसी से भी नही कहा कि साईकिल चलाईए, लेकीन हर जगह कुछ लोग अपने आप साईकिल चलाते दिखे! इसके साथ हर जगह पे योग- साधकों से बहुत अच्छा मिलना हुआ| योग का एक अर्थ जोड़ है और इस पूरी यात्रा में भी कई लोगों से जुड़ना हुआ| हर गाँव में कार्यकर्ताओं की टीम में भी नए लोग कहीं कहीं जुड गए| यह साईकिल यात्रा उनके जुड़ने के लिए एक माध्यम बनी| अप्रत्यक्ष और अपरोक्ष रूप से योग को बढ़ावा मिला| एक साईकिल पर आए यात्री से मिल कर कार्य करनेवाले कार्यकर्ताओं का भी हौसला बढ़ा| इसका श्रेय साईकिल को जाता है, उसमें होनेवाले इनोवेशन को जाता है|

इस साईकिल पर तैयारी करते हुए!
नमस्ते!
हाल ही में मैने और एक साईकिल यात्रा पूरी की| यह योग प्रसार हेतु साईकिल यात्रा थी जिसमें लगभग ५९५ किलोमीटर तक साईकिल चलाई और लगभग योजना के अनुसार ही यह यात्रा पूरी हुई (सिर्फ कुछ कारण से एक पड़ाव कम हुआ)| मध्य महाराष्ट्र के परभणी जिले में कार्यरत 'निरामय योग प्रसार एवम् अनुसंधान संस्था' तथा उसके कार्य का विस्तार को ले कर यह यात्रा थी| मध्य महाराष्ट्र के परभणी, जालना, औरंगाबाद एवम् बुलढाणा जिलों में काम करनेवाले योग- कार्यकर्ता, योग अध्यापक इनसे इस यात्रा में मिलना हुआ| अब इस यात्रा का विवरण लिखना शुरू कर रहा हूँ|
पहली बात तो यह है कि किसी भी विषय का प्रसार करना हो, तो कई मुद्दे उपस्थित होते हैं| सीधा प्रसार हमेशा ही कारगर साबित नही होता है| कई लोग बार बार आग्रह करने पर उस चीज़ की तरफ जा सकते हैं, पर यह सभी के लिए लागू नही होता है| मेरा अपना उदाहरण यही है कि जब जब मुझे किसी चीज़ के बारे में आग्रह किया गया, अक्सर मैने उससे दूर ही गया| इसलिए योग प्रसार करना इतनी सरल बात नही है| मेरा विश्वास प्रत्यक्ष प्रसार के बजाय अप्रत्यक्ष प्रसार में हैं| किसी को योग कीजिए, ऐसा बताने के बजाय खुद उसे करते रहने में है| और इस यात्रा में भी कुछ ऐसा ही हुआ| जैसे यह एक साईकिल यात्रा है और साईकिल सन्देश और साईकिल प्रसार भी इसका एक अन्दरूनी पहलू है| मैने किसी से भी नही कहा कि साईकिल चलाईए, लेकीन हर जगह कुछ लोग अपने आप साईकिल चलाते दिखे! इसके साथ हर जगह पे योग- साधकों से बहुत अच्छा मिलना हुआ| योग का एक अर्थ जोड़ है और इस पूरी यात्रा में भी कई लोगों से जुड़ना हुआ| हर गाँव में कार्यकर्ताओं की टीम में भी नए लोग कहीं कहीं जुड गए| यह साईकिल यात्रा उनके जुड़ने के लिए एक माध्यम बनी| अप्रत्यक्ष और अपरोक्ष रूप से योग को बढ़ावा मिला| एक साईकिल पर आए यात्री से मिल कर कार्य करनेवाले कार्यकर्ताओं का भी हौसला बढ़ा| इसका श्रेय साईकिल को जाता है, उसमें होनेवाले इनोवेशन को जाता है|

इस साईकिल पर तैयारी करते हुए!