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Wednesday, August 18, 2010

Surrender to Virender !!

Surrender to Virender: वीरेंदर सेहवाग

जो लोग क्रिकेट जानते है; उन्हे वीरेंदर सेहवाग के बारे में कुछ भी बताने की आवश्यकता नही है । नाम ही काफी है । आधुनिक क्रिकेट खेलनेवालों मे दो बार 300 से अधिक रन्स करनेवाला तथा तीन बार 290 की दहलीज तक पहुंचने वाला; शीघ्र गति से सभी प्रकार के क्रिकेट में बल्लेबाजी करनेवाला; "चौका"नेवाली कन्सिस्टन्सी से सभी परिस्थितियों में रन्स करनेवाला और आज सबसे ज्यादा आकर्षक शैली के लिए जाने जाने वाला यह एकमेव बल्लेबाज है । कहना पडता है कि वीरेंदर सेहवाग बिलकुल मूल स्वभाव का (Indigenous) बल्लेबाज है । जैसे कहते है; महाभारत में कृष्ण ने अर्जुन को कहा था 'यह सूर्य है और यह जयद्रथ;' उस प्रकार सेहवाग हमेशा यह बल्ला; यह गेंद और यह सीमारेखा; यही ठान के रन्स ठोंकता है । वीरू; उसे सार्थ रूप से कहते है ।

सेहवाग की महानता इतनीही नही है कि वह श्रेष्ठ बल्लेबाज तथा खिलाडियों की श्रेणि में आता है । सेहवाग एक सोंच है । सेहवाग एक दृष्टिकोन है । कैसी भी परिस्थिती हो; उसकी सोंच स्थिर रहती है । उसके मन को दबाव दबा नही सकता; उसके मन को uncluttered अर्थात् खुला; किसी भी तरह के पूर्वग्रह न रखनेवाला; अपनी शैली से ही निरंतर खेलनेवाला इस तरह से जाना जाता है । यह निश्चित रूपसे ही एक महान गुण है; जिसकी सराहना ही नही; अनुकरण किया जाना चाहिए ।

सेहवाग एक प्रतिक है जो सिस्टम के विरुद्ध जानेवालों का प्रतिनिधि है । कहते है; सेहवाग को पैर हिलाना नही आता; उसका फूटवर्क ठीक नही है; वो किताबी तरिके से नही खेल सकता । मानते है; पर उससे फर्क क्या पडता है । यहाँ पर एक अलग मुद्दा आता है । हम किनको ज्यादा महत्त्व देंगे ? जो किताबी तरिके से खेलते है; तंत्रशुद्ध तरिके से; निर्दोष तरिके से खेलते है उनको; या जो सबसे अधिक प्रभाव के साथ खेलते है; जो अधिक परिणाम देते है और सकारात्मक सोंच दिखाते है ? टेक्निक सेहवाग के पास भी है; किताबी तरिके से वह भी खेलता है; पर उसका खेलना सिर्फ उस ढाँचे में नही बैठता । उससे अलग है । जाहिर है कि कई परिस्थितियों मे उनका खेल खतरे से भरा होता है । अनिश्चितताओं के मध्य चलता है । पर उनके इसी खेल के कारण भारत को विशेष विजय हासिल हुए है ।

सेहवाग का महत्त्व यह भी है कि वह खुद की सोंच से चलनेवालों का उदाहरण है । परिस्थिती कितनी भी विरान हो; प्रतिकूल हो; उसे फर्क नही पडता है और नाही उसके खेल पर फर्क पडता है । आज कल जमाना स्टिरिओटायपिंग का है । कहते है ना; आज सफल होना है; तो ये ये करना पडेगा; डॉक्टर, इंजिनिअर, एम.बी.ए. बनना पडेगा; ये ये एक्साम्स देने पडेंगे; ये ये क्लासेस लगाने पडेंगे। इस तरह की अवधारणाएँ समाज मानसिकता में व्याप्त है । पर वीरू इस मानसिकता से हमें बाहर लाता है । कुछ अलग; खुद के मन का सुनते हुए करने की प्रेरणा देता है ।

जैसे क्रिकेट में सेहवाग है; उस तरह उसका रोल करनेवाले की हर क्षेत्र में आवश्यकता है । सब लोग सिस्टम के साथ जाने लगेंगे; तो सिस्टम बिगड सकता है; और उस तरह जीने में मजा नही । जो सभी कर रहे है; हमेशा जैसे होता है; उस प्रकार से न चल कर कुछ अलग करनें मे; खुद कुछ प्रयोग करने में; खुद की खोज करनें में अधिक संतोष मिलता है और सेहवाग इसका सर्वाधिक प्रभावशाली उदाहरण है । आज जो मूल्य आदर्श माने जाते है- स्वाधीनता; खुद की सोच से चलना; दवाब के आगे न झुकना; किसी भी परिस्थिती में अपने दायित्व पर डटे रहना; संघर्ष करना; सातत्यपूर्ण रूप से कार्यरत रहना; विशेष प्रकार से परिणाम लाना; दीर्घ समय तक जुझना आदि मूल्य एवं आदर्श सेहवाग में ठूस ठूस के भरे है । इसी लिए हमें अपने अपने क्षेत्र में वीरू बनना चाहिए; वीरता उसी में समायी है । 

Thursday, July 1, 2010

सुंदर जीवन का महामार्ग: Reevaluation Co-counselling अर्थात् पुनर्मूल्यांकन सह- समुपदेशन

सुंदर जीवन का महामार्ग: Reevaluation Co-counselling अर्थात् पुनर्मूल्यांकन सह- समुपदेशन


यह नाम सुनके लग सकता है कि यह कोई जटिल समुपदेशन प्रक्रिया अथवा टेकनिक है । पर ऐसा है नही । यह अत्यंत सरल एवम् प्रत्यक्ष रूप से सभी द्वारा करने योग्य अभ्यास तथा वर्तन का दृष्टीकोण है । यह किसी प्रकार की मानसशास्त्रीय या मानसिक विज्ञान की जटिल प्रणाली नही है । यह तो सामान्य जीवन में आम आदमी द्वारा  ढुंढी गई, विकसित की गई और अपनायी गई सोंच है । और जब इसको एक थिअरी तरह लिखा गया; तब उसे पहले किसी सिद्धांत अथवा थिअरी से न जोडते हुए पूरी तरह नए सीरे से लिखा गया । इसलिए इसे जानने तथा अपनाने के लिए किसी भी मानसशास्त्रीय अभ्यास की आवश्यकता नही है । आईए, इसको समझ लेते है; जिससे हमारा जीवन कुछ इसी छवि की भाँति सुंदर हो सकता है ।





(लद्दाख में सिंधु नदी)

इस दृष्टीकोण को कुछ इस प्रकार बताया जा सकता है । इसके कुछ तत्त्व है की, मानव जन्मत: अत्यंत बुद्धिमान, अत्यंत सहकारिता करनेवाला, प्रेम करनेवाला तथा अत्यंत कार्यक्षम है । युं कहें कि उसमें सकारात्मकता ठूस ठूस के भरी हुई है । यदि वह मानव है, इन्सान है (चाहे कैसा भी हो); तो वह बहोत अच्छा है । यह सोंच बताती है कि जन्मत: इतने अच्छे होते हुए भी सामाजिकीकरण (सोशलायझेशन) की प्रक्रिया में हमारे इन गुणों पर एक तरह का अंधेरा सा छा जाता है । और यह अंधेरा इसलिए छा जाता है, क्यों कि बुद्धि तथा भावनाएं का गठजोड होता है । यदि हमारी भावनाएं क्षतिग्रस्त हो गई; तो बुद्धि भी ठीक से काम नही कर पाती । युं कहें कि भावनाए सामान्य- नैसर्गिक- अवस्था में है; तोही बुद्धी ठीक रूप से कार्यरत रहती है । जैसे गुस्सा किया व्यक्ति ठीक से बोल भी नही पाता या पढ नही सकता ।

जन्मत: इतने सक्षम, इतने समृद्ध होते हुए भी हम बुरी स्थिती से गुजरते है । यह इसलिए होता है, कि हममें परिस्थितीवश (गलत तरह के सामाजिकीकरण और सामाजिक  संस्कारों से) कई भावनिक अवरोध- इमोशनल ब्लॉकेजेस उत्पन्न होते है । इससे हमारी बुद्धी एवम् क्षमताए अवरुद्ध हो जाती है और ठीक से काम नही कर पाती । इनको दबी हुई, व्यक्त न की गई भावनाए कह सकते है । जैसे कभी हम गहरे तनाव का अनुभव करते है, किसी चीज को बुरी तरह चाहते है । पर यदि हमने इन भावनाओं को दबा के रखा, उनको व्यक्त नही किया; तो उनका बोझ बनता है जिससे बुद्धि कुंठित होती है  । क्यों कि बुद्धी एवम् भावनाओं का नाता गाडी के क्लच और गेअर जैसा है । भावनाएं क्लच है तो बुद्धि और क्षमताएं गेअर जैसी है । बिना क्लच का ठीक से प्रयोग किए गेअर काम नही करता और गाडी दौड नही सकती ।

इसलिए यह सोच बताती है, कि हमारी जितनी दबी हुई भावनाएं, तनाव है, उनको सामने लाना चाहिए, उन्हे व्यक्त करना चाहिए, देखना चाहिए । इतना होने पर काफी हद तक उनका प्रभाव घट जाता है और हमारे शरिर एवं मन में निसर्गत: जो रिकव्हरी प्रक्रियाए चल रही होती है (जैसे कि ऑक्सीजन की कमी होने पर मुंह खोल के जम्हाई लेना, अधिक उष्ण हवामान में शरिर को ठंडा रखने हेतु अधिक पसीने का बहना आदि); उनको सहायता मिलती है और आगे का काम शरिर एवम् मन अपने आप, हमें बिना पता चले कर सकता है । 

पर हम आदतों और मान्यताओं के शिकार होने के कारण भावनाओं की अभिव्यक्ती पर रोक लगा देते है । जब किसी इन्सान को थकान की वजस से और ऑक्सीजन की कमी की वजह से जम्हाई आती है; तो हम कहते है कि देखो कितना आलसी और असंस्कृत है । और ऐसा करने से वास्तविक और नैसर्गिक रिकव्हरी- पुनर्भरण की प्रक्रिया कोही रोक देते है जो कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है । और ऐसा कई जगह पर कई बार होता है । यदि छोटा बच्चा रोता है तो उसे रोना बन्द करने के लिए कहते है । जिससे उसकी वेदना व्यक्तही नही होती और अंदर ही अंदर दब जाती है । यदि वह रोता है तो उसकी वेदना बाहर आ जाएगी, व्यक्त हो जाएगी और क्षीण हो जाएगी जिससे उसकी नैसर्गिक शक्ती उसको सरलता से ठीक कर देगी । पर हम ऐसा नही होने देते । 

बच्चों को हम कम से कम रोने की मोहलत है । लेकिन हमारी मान्यताओं और आदतों की ग़ुलामी बडे लोगों को रोने भी नही देती, अपनी भावनाएं व्यक्त करने नही देती । और जो नैसर्गिक भावनाएं है, नैसर्गिक प्रक्रियाएं है, उनको रोक देती है जिससे असंतुलन उत्पन्न होता है और इसी तरह के असंतुलन की मात्रा बढ जाने पर वो हमारी बुद्धी को ग्रहण लगाती है । और हम जानते है कि अगर क्लच खराब हो गया; तो गेअर बदल ही नही सकते । भावनाओं के अवरोध से बुद्धि अपाहिज होती है ।

इसलिए यह सोच बताती है कि हमें भावनाओं को मुक्त हो कर देखना चाहिए, उनके अस्तित्व को समझना चाहिए । दुसरों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए, सुनने और समझने की शक्ति बढा कर दुसरों को उनके भावनिक अवरोध से मुक्त होने में सहायता करनी चाहिए । जब हम भावनाओं के बोझ से या पूर्वग्रहों से अर्थात बायस से मुक्त होना आरम्भ करेंगे तो हमें खुद की क्षमताओं का एहसास होगा । इसिलिए इस सोच का नाम पुनर्मूल्यांकन है । जिंदगी के सफर में हमारी भावनाओं के बोझ से बुद्धी और क्षमताओं पर आए हुए ग्रहण को हटाने पर हम फिरसे अपनी क्षमताओं का आकलन कर सकते है; उनको जान सकते है । और यह करने का तरिका को-काउन्सिलिंग- सह समुपदेशन है । अर्थात खुद की भावनाएं, दर्द, समस्याओं को समझना, उनको व्यक्त करना और दुसरों को सुन कर, उनके कहने का आकलन एवम् सम्मान कर उनको उनके भावनिक बोझ से फ्री करना । कहते है कि भावनाएं भी इन्सानों की तरह होती है । उनको व्यक्त करने से, महत्त्व देने से जैसे इन्सान स्तुति सुन कर खुशी से  भर जाता है, वैसे ही भावनाएं भी अपना अवरोध हटा कर सहयोग करती है ।

इसलिए चाहें कितनी पुरानी, तीव्र भावना हो; कितनी ही अप्रिय, अनचाही या वेदनादायी भावनाएं हो; उनको समझना चाहिए, देखना चाहिए और उचित रूप से व्यक्त करना चाहिए । इससे निसर्ग का संतुलन बनाने का काम काफी हद तक आसान हो जाएगा और हमें चैन की राहत मिल जाएगी । उस भावना के बोझ द्वारा कुंठित और रुकी हुई बुद्धी खुल जाएगी; आगे जा पाएगी । भावना और बुद्धी के संबंध में यह सोच विपश्यना के काफी करीब है, उससे सुसंगत है ।

इसके बारे मे अधिक जानकारी प्राप्त करनी हो तो संपर्क कर सकते है: http://www.rc.org/
वैसे यह थिअरी तो मुख्य रूप से इतनी ही है और इसको अपनाना आवश्यक है । और इसे हम सतत, किसी समय अपना सकते है । अभी जो भावनाएं हमारे मन में आ रही है, उनको देख सकते है, समझ सकते है, यह कह सकते है, की वो कोई गलत बात नही है, नैसर्गिक रूप से हमारे मन मे आ रही है, अत: उनसे परेशान होने की आवश्यकता नही है । इसी प्रकार देखने के लिए  दुसरों को की सहायता उनको सुन कर, समझ कर कर सकते है । इसी प्रकार के अभ्यास और प्रॅक्टिस से हम जो भावनाएं हिंस्र/ राक्षसी रूप लेती है, उनको भी सामान्य कर सकते है ।

यदि इसको एक कोर्स द्वारा करने में रुचि हो तो क्लास के बारे में पूछने  के लिए संपर्क कर सकते है: niranjanwelankar@gmail.com

पाठकों को पूरा पढने के लिए धन्यवाद और बिनती की यदि आपको यह बात अच्छी लगती है तो कृपया इसे अपने तकही सीमित न रखें !