६: देवगिरी किला और औरंगाबाद में योग- चर्चाएँ
योग साईकिल यात्रा का पांचवा दिन, १५ मई की सुबह| कल बहुत बड़ा दिन था| लेकीन रात में अच्छा विश्राम हुआ और सुबह बहुत ताज़ा महसूस कर रहा हूँ| आज की साईकिल राईड छोटी ही है- सिर्फ ३७ किलोमीटर| और आज पाँचवा दिन होने के कारण यह बहुत ही मामुली लग रही है| कल शाम को योग साधकों से मिलना नही हुआ था| आज उनसे मिलूँगा| कल मुझे रिसिव करने के लिए जो साधक आए थे, उनमें एक साईकिल चलानेवाले भी थे| आज उनके साथ पहले औरंगाबाद के पास होनेवाले देवगिरी किले पर जाऊँगा| वहाँ श्री. खानवेलकर और कुछ योग साधक आएंगे जिनसे अनौपचारिक बात होगी|
सुबह ठीक साढ़ेपाँच बजे निकला| महेन्द्रकर सर भी तैयार थे| वे औरंगाबाद में साईकिल चलाते हैं| उनके साथ दौलताबाद अर्थात् देवगिरी किले की तरफ बढ़ा| कई दिन अकेले साईकिल चलाई थी, आज बात करते हुए जाना अच्छा लग रहा है| और साथ में औरंगाबाद एक हिल स्टेशन होने के कारण होनेवाला सुहावना मौसम, हरियाली और छोटे पहाड़ भी है! दौलताबाद अर्थात् देवगिरी किला! अतीत की गहराईयों में से उपर उठता हुआ एक शिखर! जाने कितने समय, कितने लोग देखे होंगे इस किले ने! भारत के इतिहास का एक पुख़्ता प्रतिक! इस किले के बारे में एक बात बहुत रोचक है| जब अलाउद्दीन खिलजी की सेना इस पर हमला करने के लिए आई थी, तो कुछ दिनों तक उन्हे यही लगा कि देवगिरी के पास जो शरणापूर की गढ़ी या टीला है, वही देवगिरी है! इसलिए वे इसी के पास कुछ दिनों तक लड़ते रहे और बाद में उन्हे पता चला कि देवगिरी किला तो और आगे हैं! देवगिरी के पास आते समय पहले शरणापूर का टिला ही दिखा और एक पल के लिए मै भी धोख़ा खा गया!


योग साईकिल यात्रा का पांचवा दिन, १५ मई की सुबह| कल बहुत बड़ा दिन था| लेकीन रात में अच्छा विश्राम हुआ और सुबह बहुत ताज़ा महसूस कर रहा हूँ| आज की साईकिल राईड छोटी ही है- सिर्फ ३७ किलोमीटर| और आज पाँचवा दिन होने के कारण यह बहुत ही मामुली लग रही है| कल शाम को योग साधकों से मिलना नही हुआ था| आज उनसे मिलूँगा| कल मुझे रिसिव करने के लिए जो साधक आए थे, उनमें एक साईकिल चलानेवाले भी थे| आज उनके साथ पहले औरंगाबाद के पास होनेवाले देवगिरी किले पर जाऊँगा| वहाँ श्री. खानवेलकर और कुछ योग साधक आएंगे जिनसे अनौपचारिक बात होगी|
सुबह ठीक साढ़ेपाँच बजे निकला| महेन्द्रकर सर भी तैयार थे| वे औरंगाबाद में साईकिल चलाते हैं| उनके साथ दौलताबाद अर्थात् देवगिरी किले की तरफ बढ़ा| कई दिन अकेले साईकिल चलाई थी, आज बात करते हुए जाना अच्छा लग रहा है| और साथ में औरंगाबाद एक हिल स्टेशन होने के कारण होनेवाला सुहावना मौसम, हरियाली और छोटे पहाड़ भी है! दौलताबाद अर्थात् देवगिरी किला! अतीत की गहराईयों में से उपर उठता हुआ एक शिखर! जाने कितने समय, कितने लोग देखे होंगे इस किले ने! भारत के इतिहास का एक पुख़्ता प्रतिक! इस किले के बारे में एक बात बहुत रोचक है| जब अलाउद्दीन खिलजी की सेना इस पर हमला करने के लिए आई थी, तो कुछ दिनों तक उन्हे यही लगा कि देवगिरी के पास जो शरणापूर की गढ़ी या टीला है, वही देवगिरी है! इसलिए वे इसी के पास कुछ दिनों तक लड़ते रहे और बाद में उन्हे पता चला कि देवगिरी किला तो और आगे हैं! देवगिरी के पास आते समय पहले शरणापूर का टिला ही दिखा और एक पल के लिए मै भी धोख़ा खा गया!