४: रामपूर बुशहर से टापरी
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२९ जुलाई की शाम रामपूर बुशहर में बिताई| दो दिन शिमला और नार्कण्डा में ठहरने के बाद यहाँ बहुत गर्मी हो रही है| शाम को कुछ समय के लिए लगा कि बुखार तो नही आया है| उस दिन ठिक से विश्राम नही हो पाया| रात बारीश भी हुई| ३० जुलाई की सुबह नीन्द खुली तो नकारात्मक विचार मन में हैं| शायद ठीक से विश्राम नही हो पाया है और शरीर जब ताज़ा नही होता, तो मन भी ताज़ा नही हो सकता है| दो दिनों की ठण्डक के मुकाबले यह गर्मी कुछ भारी पड़ रही है| बुखार जैसी स्थिति में क्या मै आगे चला पाऊँगा? बारीश के भी आसार लग रहे हैं| कुल मिला कर जब भी ऐसी साईकिल यात्रा की है, पहले दिन मन में जो तनाव होता है; जो शंकाएँ होती हैं, वो सब आज तिसरे दिन मन में हैं| कुछ समय के लिए लगा भी कि शायद आज टापरी जा भी नही पाऊँगा और उसके पहले ही झाकड़ी में ही हॉल्ट करना पड़ेगा| धीरे धीरे हिम्मत बाँधी| सामान भी साईकिल पर बान्धा| पहले दो दिन मै स्पेअर टायर को सीट के नीचे रख रहा था| पेडल चलाते समय वह पैर को चुभ रहा था| अभी उसको सामने हैंडल पर एडजस्ट कर दिया| ऐसे ही बाकी शंकाओं को भी थोड़ा एडजस्ट कर दिया| गेस्ट हाऊस में पराठा खा कर निकलने के लिए तैयार हुआ| जैसे ही निकला, सतलुज की गर्जना फिर तेज़ हुई| हल्की हल्की बून्दाबान्दी भी हो रही है| मन का एक हिस्सा तो बारीश भी चाहता है| क्यों कि अगर बारीश नही होती है, तो यहाँ की गर्मी में साईकिल चलाना कठीन ही होगा| उससे अच्छा है कि कुछ बारीश आ जाए|
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२९ जुलाई की शाम रामपूर बुशहर में बिताई| दो दिन शिमला और नार्कण्डा में ठहरने के बाद यहाँ बहुत गर्मी हो रही है| शाम को कुछ समय के लिए लगा कि बुखार तो नही आया है| उस दिन ठिक से विश्राम नही हो पाया| रात बारीश भी हुई| ३० जुलाई की सुबह नीन्द खुली तो नकारात्मक विचार मन में हैं| शायद ठीक से विश्राम नही हो पाया है और शरीर जब ताज़ा नही होता, तो मन भी ताज़ा नही हो सकता है| दो दिनों की ठण्डक के मुकाबले यह गर्मी कुछ भारी पड़ रही है| बुखार जैसी स्थिति में क्या मै आगे चला पाऊँगा? बारीश के भी आसार लग रहे हैं| कुल मिला कर जब भी ऐसी साईकिल यात्रा की है, पहले दिन मन में जो तनाव होता है; जो शंकाएँ होती हैं, वो सब आज तिसरे दिन मन में हैं| कुछ समय के लिए लगा भी कि शायद आज टापरी जा भी नही पाऊँगा और उसके पहले ही झाकड़ी में ही हॉल्ट करना पड़ेगा| धीरे धीरे हिम्मत बाँधी| सामान भी साईकिल पर बान्धा| पहले दो दिन मै स्पेअर टायर को सीट के नीचे रख रहा था| पेडल चलाते समय वह पैर को चुभ रहा था| अभी उसको सामने हैंडल पर एडजस्ट कर दिया| ऐसे ही बाकी शंकाओं को भी थोड़ा एडजस्ट कर दिया| गेस्ट हाऊस में पराठा खा कर निकलने के लिए तैयार हुआ| जैसे ही निकला, सतलुज की गर्जना फिर तेज़ हुई| हल्की हल्की बून्दाबान्दी भी हो रही है| मन का एक हिस्सा तो बारीश भी चाहता है| क्यों कि अगर बारीश नही होती है, तो यहाँ की गर्मी में साईकिल चलाना कठीन ही होगा| उससे अच्छा है कि कुछ बारीश आ जाए|