Monday, August 19, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति २: शिमला से नार्कण्डा

२: शिमला से नार्कण्डा 

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२५ जुलाई को ट्रेन से स्पीति- लदाख़ साईकिल यात्रा के लिए निकला| ट्रेन पर मुझे छोडने के लिए कई साईकिल मित्र और परिवारवाले आए| ट्रेन में चढ़ कर जल्द ही साईकिल का थैला बर्थ के नीचे रख दिया| बहुत आसानी से फोल्ड की हुई साईकिल और उसी थैले में काफी सामान भी बर्थ के नीचे चला गया! इससे बड़ी राहत मिली| अब साईकिल ट्रेन में से आसानी से ले जा सकता हूँ! साईकिल इस तरह फोल्ड करने के लिए उसका कैरीयर, दोनों पहिए, स्टैंड, सीट और दोनों पेडल निकालने पड़ते हैं| कल साईकिल इस तरह से थैले में भरने के लिए भी मित्रों ने सहायता की| अगले दो दिनों में शिमला तक की यात्रा करूंगा और उसके बाद २८ जुलाई से साईकिल चलाऊँगा| प्रयासपूर्वक मन को वर्तमान में ही रखा और ट्रेन की यात्रा का आनन्द लेने लगा|






सुपरफास्ट ट्रेन होने के बावजूद यह सचखण्ड एक्स्प्रेस बहुत धिमी रफ्तार से जा रही है| बीच में एक जगह देखा भी कि पटरी का कुछ काम चल रहा है और इसमें शायद मिट्टी डालने के लिए गधे का भी सहभाग लिया गया है! साथ में बैठे यात्री मेरे पिताजी को जाननेवाले थे! कुछ देर सह- यात्रियों के साथ मेरे अभियान के बारे में बात हुई| जल्द ही जॉब- प्रॉपर्टी- पॉलिटीक्स के मुद्दों पर बोलने लगे| मैने आराम करना शुरू किया और संगीत का आनन्द लेता रहा| थोड़ी देर बाद औरंगाबाद में ये यात्री उतर गए और एक छोटा परिवार मेरे कंपार्टमेंट में आया| देख कर लगा कि वे आर्मी में ही होंगे| बाद में यह सही साबित हुआ| औरंगाबाद के बाद मनमाड के पहले अंकाई- टंकाई का किला बहुत करीब से देखा| संयोग से बाकी कंपार्टमेंट खाली ही रहा| मुझे तो मेरी साईकिल के थैले से अन्य यात्रियों को सामान रखने में दिक्कत तो नही होगी, इसकी चिन्ता हो रही थी| लेकीन मेरा कम्पार्टमेंट अन्त तक आधा ही भरा! धीरे धीरे मिलिटरी के अफसर से बात हुई| उन्हे मेरे अभियान में बताया और कहा कि मै आर्मी के जवानों से भी मिलनेवाला हूँ| तब उन्होने अपने बारे में बताया| वे आर्मी हॉस्पिटल में काम करते हैं और पीस स्टेशन पर पंजाब में उनका पोस्टिंग है| अब तक डिस्टर्ब्ड एरियाज में उनकी पोस्टिंग नही हुई है| लेकीन इसका मतलब यह नही कि उन्हे दिक्कतें नही होती हैं| उन्होने कहा कि उनके जो बॉस है, वे उन्हे अपने कई काम बताते हैं; मनमानी भी करते हैं| ये जवान महाराष्ट्र के बीड जिले के रहनेवाले हैं और उनके गाँव से कई युवक आर्मी हॉस्पिटल में भरती‌ हुए हैं| रात में उनकी छोटी लड़की बहुत रोने लगी| जवान और उनकी पत्नि ग्रामीण इलाके से हैं, पहली बार ये दोनों अपनी छोटी बच्ची को ट्रेन से ले जा रहे हैं, इसलिए शायद उन्हे कुछ दिक्कत हुई| देर तक बच्ची रोती रही| आसपास बैठे यात्री कुछ चिन्तित हुए और अन्त में कुछ महिलाएँ आईं और उन्होने उस बच्ची को दुध दिया| उसकी माँ को भी समझाया| देर रात तक उसके रोने से सब लोग कुछ चिन्तित रहे| खैर|



बाकी ट्रेन यात्रा विश्राम में बीत गई और २६ जुलाई की दोपहर को अम्बाला कँट पहुँच गया| समय के आधा घण्टा पहले ट्रेन पहुँचने से साईकिल का थैला निकालने में कुछ कठिनाई हुई| स्टेशन पर खास भीड़ नही है| लेकीन इसी थैले को पास ही होनेवाले बस स्टैंड पर ले जाने में खासी दिक्कत हुई| एक तो लगातार एक दिन तक एसी की ठण्ड में बैठा था, अब अचानक से बहुत गर्म मौसम और उसमें ह्युमिडिटी से सामना हुआ| साईकिल का किट और अन्य एक बैग उसी थैले में होने के कारण उसका वजन सम्भवत: बीस किलो हुआ है| साथ ही और एक सैक मेरे पीठ पर भी है जो कि तीन- चार किलो की तो होगी ही| परभणी में ट्रेन में चढ़ते समय तो दिक्कत नही आई थी, अन्तर छोटा ही था और पीठ पर सैक भी नही थी| लेकीन अब गर्मी‌ और ह्युमिडिटी के बीच सिर्फ आधे- पौन किलोमीटर की दूरी पर होनेवाले बस स्टैंड पर इस थैले को ले जाना चने चबाने जैसा लगा! दस ही मिनट में इतना पसीना आया कि पूरा शर्ट और बाद में तो पैंट भी पसीने से लबालब हुई| इतनी छोटी दूरी में भी बार बार रूकना पड़ा| और सबसे बड़ी दिक्कत यह हुई कि अंबाला कैंट में दो घण्टे रूकने पर भी शिमला की बस नही मिली! शाम को दो बसें होंगी, ऐसा पता किया था| लेकीन डेढ घण्टा प्रतीक्षा करने के बाद भी बस नही मिली| तब हालत कुछ खराब होने लगी| एक तो पहाड़ में यात्रा करते समय उल्टी (वमन) होने की आशंका से मैने ज्यादा कुछ खाया नही था| उस कारण बहुत थकान होने लगी| और धीरे धीरे लगा कि अब बस मिल भी गई तो शिमला पहुँचते पहुँचते रात के दो बज जाएंगे| इसलिए फिर अंबाला में ही रूकने का निर्णय किया| मेरे परिवार और परिचित व्यक्तियों से अंबाला- शिमला आदि जगहों के कुछ व्यक्तियों से सम्पर्क हुआ था| उनसे बात की और जल्द ही उन्होने मेरे ठहरने की व्यवस्था की|

अंबाला में इस तरह रूकना कठिन रहा| एक तो साईकिल का थैला उठाने में जो थकान हुई, उसने कुछ डराया| क्या आगे जो होनेवाला है, उसका यह ट्रेलर है? वैसे मुझे आगे तो कई "ला" अर्थात् पहाड़ के घाट लगेंगे, लेकीन यह पहला ला- अंबा-ला ही कठिन गया! कष्टपूर्वक मन को शान्त रखा और विश्राम किया| अगले दिन सुबह ग्यारह बजे अंबाला के संजयजी ने मुझे शिमला की वॉल्वो में बिठा दिया| वॉल्वो की यात्रा सुखद रही| बस में से पहली बार चण्डीगढ़ देखा! चण्डीगढ़ से ही हिमालय की चोटियाँ दृग्गोचर हुईं! लदाख़ तो अभी बहुत दूर है, लेकीन हिमालय ने तो पहले ही दिन दर्शन दिया! परवाणू के तुरन्त बाद चढाई शुरू हुई! बाद में सोलन के पहले कुमारहट्टी पर बहुत बड़ा जाम भी लगा| चार घण्टों में मुश्कील से बस चार किलोमीटर आगे बढ़ी हो! लेकीन तब तक बेहद खूबसूरत नजारे शुरू हुए हैं! चारों ओर पहाड़ ही पहाड़! दूर कहीं नीचे दिखते बादल! पहाडों के बीच एक छोटी सी लकीर दिखाई दी जो असल में टॉय ट्रेन की पटरी है! अब देवदार वृक्ष भी शुरू हुए हैं, इसका मतलब है सड़क १६०० मीटर तक चढ़ गई है| ट्रैफिक जाम के बीच इन नजारों का आनन्द लेता रहा| एक ट्रक जाम में फंसी दिखी जो पानी की बोतलें शिमला ले जा रही हैं| शिमला के अकाल के बारे में तो सुना ही था, उसका सबूत भी मिला| जाम में एक साईकिलवाला भी चण्डीगढ़ की तरफ जाता दिखाई दिया| देर तक जब जाम नही खुला, तब चिन्ता होने लगी कि मै शिमला कब पहुँचूंगा? अगर शिमला में ठीक से विश्राम नही होता है तो कल मुझे रूकना होगा और अगले दिन नार्कण्डा के लिए निकलना होगा| क्यों कि शिमला में २२०० मीटर ऊँचाई पर ठीक से अक्लमटाईज होना आवश्यक है, विश्राम आवश्यक है|


पहाड़ में से जानेवाली पटरी

अद्भुत नजारे शुरू होने लगे!

लेकीन जाम जल्द ही खुल गया| एक जगह फ्लाय ओव्हर का काम चल रहा है, इसके कारण सड़क बहुत ही संकरी हुई है| वाहनों की लम्बी कतार हैं, बीच बीच में चालकों में तनातनी भी हो रही है| जब वो मोड़ क्रॉस किया, तब थोड़ी देर बाद सोलन आया| यहाँ पर एक घाट मिला| यहाँ सड़क अच्छी मिल गई| लेकीन बीच बीच में इतनी संकरी है कि चालक को वॉल्वो बस ले जाने के लिए अक्सर बस को पहले सड़क के बाए किनारे ले जा कर फिर बड़ा टर्न लेना पड़ रहा है| तब जा कर मुश्कील से यह इतनी बड़ी बस सड़क में समा पा रही है! हिमाचल के बस- चालकों के बारे में भी बहुत सुना था, उसका भी प्रमाण मिल गया! सोलन के आगे और ऊँचे पहाड़ शुरू हुए! ऐसे दुर्गम पहाड़ कि यहाँ सड़क का होना भी चमत्कार से कम नही है! और ऐसी सड़कों पर ड्रायवर साहाब वॉल्वो को दौड़ाए जा रहे हैं| यात्रा के इस चरण पर कुछ देर नही हुई और लगभग आंठ बजे शिमला आईएसबीटी पर पहुँच गया| शिमला में सब तरह बादल और धुन्द का माहौल है! वहाँ पर शिमला के नेटवर्क से परिचित हुए दो लोग मुझे रिसीव करने आए| उन्होने मेरे ठहरने की -व्यवस्था गेस्ट हाऊस पर की| भोजन करने के बाद काफी देर हो‌ गई, इसलिए साईकिल को खोला नही| अब कल सुबह ही साईकिल को असेंबल करूँगा| और अब अच्छा विश्राम भी होगा, उससे कल ही नार्कण्डा के लिए निकलूंगा|




सुबह जब रोशनी हुई, तब देखा कि मेरे कमरे के पीछे देवदार खड़े हैं! बाहर बादल फैले हुए हैं| जल्द ही साईकिल को असेम्बल किया| सारा सामान साईकिल पर बाँधा| अपेक्षा से अधिक समय इसमें लगा| पूरे सामान के साथ ट्रायल राईडस की तो थी, लेकीन ट्रायल और वास्तव में तो अन्तर होता ही है! सामान को बाँधने में कुछ चिन्ता भी हुई, लेकीन अन्त में निकलने के लिए तैयार हुआ! बाहर बूँदाबान्दी हो रही हैं! इस यात्रा में शुरू के कुछ दिन बारीश का बड़ा डर लग रहा है| और आज वैसे भी साईकिल चलाने का पहला दिन होने के कारण मन में आशंकाएँ तो बहुत हैं, निकलने में देर भी हुई है! लेकीन जैसे पेडलिंग स्टार्ट किया, धीरे धीरे शिमला में नार्कण्डा की सड़क ढूँढता हुआ शहर से आगे निकला, मन हल्का होता गया| ज्यादा सोचने के बजाय इन क्षणों को एंजॉय करने लगा| यहाँ बादल इतने नीचे आए हैं, कि जीपीएस काम ही नही कर रहा है और उस वजह से मेरा साईकिल app- strava भी काम नही कर रहा है| लेकीन मेरे पैर ठीक से चल रहे हैं| एक रात बिताने के बाद साँस लेने में भी कोई अडचन नही है| सुबह स्ट्रेचिंग और प्राणायाम किया उसका भी लाभ मिला है|



  
शुरू में तेज़ चढाई होने के कारण नीचले गेअर्स पर साईकिल चलाता रहा| यहाँ का माहौल ठीक महाराष्ट्र के सह्याद्री पर्वत जैसा लगा| बादल, बरसात और भूट्टा! कुछ देर तक चेहरे पर स्कार्फ जैसा मास्क पहना, लेकीन बाद में जब बहुत पसीना हुआ, तब उसे हटाया| रोशनी बहुत ही कम है, इसलिए साईकिल का टॉर्च और ब्लिंकर लगा कर ही चला रहा हूँ| जैसे १५- १८ किलोमीटर पूरे हुए, तब कुफ्री के बाद उतराई मिली| यहाँ की चढाई भी अच्छी थी और उसे पार करने पर हौसला बढ़ा| बीच में एक होटल पर दो साईकिलें दिखाई दी थी| जरूर और भी साईकिलिस्ट इसी सड़क पर यात्रा कर रहे हैं| यहाँ वाहनों पर प्रेअर फ्लैग्ज भी दिखने लग गए! लगभग ३१ किलोमीटर के बाद ठियोग में चाय- बिस्कीट लिया| सड़क के पास ही साईकिल लगा कर चाय का आनन्द लेने लगा| उतने में दो साईकिलिस्ट- एक कपल क्रॉस हुए| उन्होने मुझे हाथ दिखाया, मैने भी हैलो किया! यहाँ के ग्रामीणों की बोली बिल्कुल अलग लगी! आगे निकलने पर दो साईकिलिस्ट मुझे मिले| स्पेन से वे आए हैं और शिमला से स्पीति- मनाली तक जाएंगे| कुछ देर उनके साथ साईकिल चलाई| वे काफी अनुभवी हैं, भारत में, नेपाल में और तिब्बत में भी उन्होने साईकिल चलाई है| कुछ देर बाद उन्होने मुझे मेरे स्पीड से आगे जाने के लिए कहा|



... समय जरूर लग रहा है, लेकीन साईकिल चलाने में कोई दिक्कत नही हुई| थोड़ी देर बाद मौसम खुल गया, धूप भी मिली| दूर बादलों से घिरे गाँव भी दिखाई देने लगे| तब टॉर्च बन्द किया| और तब पता चला कि मेरा ब्लिंकर कहीं गिर गया है| कुछ समय तक दुख हुआ| लेकीन जल्द ही मौसम, नजारे और राईड की खुशी से यह दुख दूर हुआ| लगभग साढ़ेचार बजे नार्कण्डा में पहुँच गया| साढ़े सात घण्टे लगे| और नार्कण्डा में पहुँचने पर जो तेज़ बारीश शुरू हुई, उसे थमने में कई घण्टे लग गए| पहले एक होटल पर चाय पी, कमरे की पूछताछ की| फिर शिमला के लोगों से बात कर रेस्ट हाऊस में कमरा लेने का जुगाड़ कर लिया| बारीश इतनी तेज़ है कि थोड़ा भी आगे जाना कठिन है| रेस्ट हाऊस में अच्छे से विश्राम किया, खाना भी खाया| इस यात्रा का पहला दिन बहुत ही अच्छा गया| आज वैसे तो काफी चढ़ाई भी थी, २२०० मीटर से चल कर मै २७०० मीटर तक पहुँचा हूँ| लेकीन कोई दिक्कत नही हुई| नार्कण्डा में बारीश के कारण और थकान के कारण बाकी लोगों से ज्यादा बातचीत नही कर पाया| शाम को गाँव में थोडा घूम आया| मेरा हेल्मेट थैले में दबने से थोड़ा क्षतिग्रस्त हुआ था उसे टेप लगाई| कल के नाश्ते के लिए केले भी खरीदे| क्या दिन रहा यह! पहले दिन लगभग ६३ किलोमीटर साईकिल चलाई!


नार्कण्डा!



आज का रूट मैप

चढाई

अगला भाग: साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ३: नार्कण्डा से रामपूर बुशहर

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (21-08-2019) को "जानवर जैसा बनाती है सुरा" (चर्चा अंक- 3434) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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