Tuesday, October 1, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ८: ताबो से काज़ा

८: ताबो से काज़ा
 

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३ अगस्त को नाको से ताबो पहुँचा| ताबो बहुत शानदार गाँव लगा| छोटा सा, लेकीन सड़के अच्छी हैं, होटल- दुकान भी हैं, लेकीन फिर भी गाँव ही है| पर्यटक और विदेशी पर्यटक भी हैं, लेकीन फिर भी शान्त गाँव लगा| नाको से ताबो की ऊँचाई तो कम है, लेकीन घूमक्कड़ी के लिहाज से उसका "कद" नाको से अधिक है! ताबो का होम स्टे बहुत अच्छा रहा| जिस घर में मै ठहरा था, उन्होने रात में भी नीचे घर में ही खाने के लिए बुलाया| एक तरह का बहुत ही अपनापन यहाँ मिला| परिवारवालों से बातचीत भी हुई| स्पीति के स्थानियों का घर अन्दर से देखने को मिला| और जाहीर तौर पर तिब्बत का करीब होना पता चल रहा है| क्यों कि हम जिसे ड्रॉईंग रूम कहते हैं, वहाँ पर ध्यान और प्रार्थना के लिए नीचे गद्दे बिछाए हैं| या गद्दे जैसे आसन| एक साथ पन्द्रह लोग बैठ कर ध्यान कर सकें, ऐसी व्यवस्था है| आदरणीय दलाई लामा जी का फोटो और मन्त्र फ्लैग्ज तो हर तरफ है ही|
 

यहाँ व्हॉईस और डेटा दोनो का कुछ नेटवर्क मिलने से घर पर और मित्रों से दो दिन के बाद ठीक बात हो सकी| कई सारे समाचार भी मिले| जम्मू- कश्मीर में अभूतपूर्व परिस्थिति है| अमरनाथ यात्रा रोकी गई है और सभी पर्यटकों को वहाँ से निकलने के लिए कहा गया है| इससे मेरी यात्रा भी बीच में खण्डित होगी| क्यों कि बाद में मुझे मनाली- लेह हायवे से लेह की तरफ जाना है जो की मै नही जा पाऊँगा| और इतनी अभूतपूर्व परिस्थिति में सब तरह के रिस्ट्रिक्शन्स भी वहाँ होंगे| जब यह समाचार मिला, तो सच कहता हूँ, एक तरह से राहत ही मिली| क्यों की लगातार चल रही अनिश्चितताओं से भरी यात्रा का मानसिक दबाव भी बहुत बना था| जब पता चला की, मै लेह की तरफ आगे नही जा पाऊँगा, तो सच में एक तरह का सुकून ही मिला| शिमला से निकल कर ताबो तक पहुँच तो गया हूँ, लेकीन शारीरिक और मानसिक दृष्टि से अब बहुत थकान भी हुई है| इस समाचार ने एक तरह से इस यात्रा का रूख भी और दिशा भी बदल ही‌ दी| बीच बीच में बारीश का अलर्ट भी चल रहा है| हिमाचल और जम्मू- कश्मीर की सीमा अभी बहुत दूर है| लेकीन तबियत को देखते हुए उस सीमा तक भी जा पाना कठीन लग रहा है| ४ अगस्त को ताबो से काज़ा के लिए निकला तो सब इस तरह से अनिश्चित बना हुआ है| हालांकी आज की यात्रा ज्यादा कठिन नही होगी, इस यात्रा का सबसे छोटा पड़ाव- सिर्फ ४७ किलोमीटर आज है|



  



घर के प्रमुख ने मुझे नाश्ता करने के लिए सड़क पर का एक होटल बताया, कहा कि उनके यहाँ बनाने में देर होगी| ताबो में ही एक नेपाली महिला का होटल है| गरम आलू पराठा खा कर काज़ा के लिए निकला| मन में कितनी ही अनिश्चितताएँ क्यों ना हो, साईकिल चलाने पर धीरे धीरे हट जाती है| सुबह की रोशनी और ताज़गी! ताबो की ऊँचाई लगभग ३२६० मीटर है और काज़ा ३७०० मीटर्स पर है| अर्थात् मुझे धीरे धीरे लगातार चढ़ना होगा| लेकीन चूँकि यह इस यात्रा का सांतवा दिन है (साईकिल चलाने का सांतवा दिन), तो अब चढाई लगभग महसूस ही नही हो रही है| एक तरफ जहाँ शरीर की थकान है, वहीं दूसरी तरफ पेडलिंग बहुत आसान बन गया है| हिमाचल में शिमला से निकलने के बाद से देख रहा हूँ, हर गाँव में रेन शेल्टर होते हैं, जिन्हे वर्षा शालिका कहा जाता है| स्पीति! अद्भुत प्रकृति! जैसे जैसे और आगे जा रहा हूँ, बर्फ के शिखर पास आते जा रहे हैं| और हर तरफ विराने का विलक्षण सौंदर्य! हर तरफ वायु क्षरण के उदाहरण! वाकई यहाँ हवा को रोकनेवाले घटक कम है; आम तौर पर बादल कम होते हैं; पेड़ भी कम हैं| इस वजह से हवा बहुत तीव्रता से बहती है| इस यात्रा में कई बार लगा कि जैसे सड़क पर अगर झरना आ जाता है, तो साईकिल चलाना जितना कठिन होगा, वैसे ही हवा का झरना भी कभी कभी आ रहा है| लेकीन इन विरान दृश्यों में जो रौद्र रूप है, वह अनुठा है! और हरियाली सिर्फ नाम के वास्ते- नदी के आसपास के कुछ थोड़े गाँवों के पास|






इस यात्रा में हर रोज एक नदी का साथ मिलता रहा है| दूसरे दिन से चार दिन तक सतलुज और अब स्पीति! उसकी गर्जना का एक विडियो यहाँ देखा जा सकता है| अविश्वसनीय और अविस्मरणीय हैं ये पल! बीच बीच में कुछ यात्री छोड कर सड़क विरान ही है| जहाँ जहाँ मानवीय उपस्थिति हैं, वहाँ पर प्रेयर फ्लैग्ज और माने जरूर मिलते हैं! कुछ बुलेटवाले बाईकर्स मुझे हाथ से हैलो करते हैं, कोई रूक के बातचीत भी करते हैं| सड़क कभी कभी फिर एक बार बहुत ही संकरे स्थान से गुजर रही है| लेकीन अब डर बिल्कुल भी नही लगता है| उस मामले में शरीर और मन बिल्कुल आदि हो गए हैं| लगभग आधी दूरी पार करने पर पराठे के लिए एक होटल में ब्रेक लिया| स्पीति में पर्यटक बहुत आते हैं, विदेशी पर्यटक भी बहुत आते हैं| इस कारण यहाँ होटल की सुविधाएँ अच्छी हैं| लगभग हर गाँव में होम स्टे मिल जाते हैं| होम स्टे की सुविधा भी हर घर में नही होती है| एक तो उसके लिए एक लायसन्स होता है जिससे हिमाचल सरकार स्थानियों को अनुमति देता है| उसके साथ कुछ इन्तजाम भी करने होते हैं जैसे अलग से शौचालय, स्नान गृह आदि| 










फिर एक बार कच्ची सड़क से जाने का मौका मिला! एक जगह बायी तरफ से एक सड़क मिल रही है| यहाँ दिशा बतानेवाला कोई पट्ट नही है| लेकीन कुछ घर है, एक महिला भी दिखी जिनसे पूछा कि काज़ा की सड़क कौन सी है| उन्होने सीधा जाने के लिए कहा| बायी तरफ जानेवाली सड़क पिन व्हैली की तरफ जाएगी, यह भी बताया| यहाँ पिन नदी और स्पीति का संगम भी है| बीच बीच में जैसे छोटे गाँव लगते हैं, थोड़ी सी हरियाली और खेती दिखाई देती है| यहाँ बहुत समय के बाद लगा की अब सड़क जैसे मैदान में आ गई है| अब बहुत तीखी चढ़ाई या उतराई नही होगी! एक राहत की साँस ली| काज़ा तक की यात्रा सरल रही और वैसे आज की दूरी भी कम थी| इसलिए अपेक्षाकृत दोपहर दो बजे के पहले पहले काज़ा पहुँच गया! काज़ा के कुछ पहले अच्छी चढाई आयी| काज़ा में मोबाईल टॉवर भी ढूँढ रहा था और दिखाई भी दिया! काज़ा मार्केट में बस अड्ड़े के पास ही एक होटल में कमरे के बारे में पूछा| थोड़ी बातचीत करने के बाद होटलवाले ने अच्छा कमरा बताया| शेअरिंग डॉर्मिटरी में यह कमरा है| अगर बाकी बेडस पर लोग न आते हैं, तो कमरा मेरा ही रहेगा| बहुत सस्ते दाम में यह शेअरिंग बेड़ मिल गया| आज सिर्फ ४७ किलोमीटर साईकिल चलाई| अब तक सात दिनों में ४२७ किलोमीटर साईकिल चलाई है| वाकई अविश्वसनीय रही है यह यात्रा!






काज़ा! स्पीति का मुख्य केन्द्र| यह गाँव ताबो जैसा शान्त नही लगा| यहाँ भीड बहुत है| स्थानीय, भारत के दूसरे हिस्सों से आए मजदूर और अन्य कारोबारी और विदेशी भी बहुत संख्या में दिखे| नाको में दो दिन रहने के बाद ३७०० मीटर की ऊँचाई में कोई फर्क नही लग रहा है| काज़ा में स्पीति सिविल सोसायटी के एक सदस्य से सम्पर्क हुआ है| उनके पास रहने के लिए भी पूछा था, पर उनके कमरे हाय क्लास के है, पर्यटक के स्तर के है, घूमक्कड के स्तर के नही| उनसे मिलना भी है| मगर स्पीति में इन दिनों सबसे व्यस्ततम सीजन होता है| और यहाँ हर कोई हर तरह के काम करता है| जैसे एक ही व्यक्ति खेती भी करता है, होटल भी चलाता है, लोगों को घूमाने भी ले जाता है, टूअर्स भी आयोजित करता है और दुकान भी चलाता है| इस कारण उनसे मिलना नही हो पाया| संस्थाओं से मिलना नही हुआ, लेकीन यहाँ एक जरूर देखने में आया कि जगह जगह पर संस्थाएँ हैं| महिलाओं की भी संस्थाएँ हैं और महिला का समाज में सहभाग भी बहुत अच्छा है| मै जिनके साथ रूक रहा हूँ, वे होम स्टे भी एक महिला ही चलाती है| दुकान में भी वही बैठती है| खैर| काज़ा में मार्केट में जब टहल रहा था तो देखा की हर कोई जब सड़क से गुजरता है, तब वो प्रेयर व्हील को जरूर दाए से बाए घूमा कर ही आगे जाता है| इसे अच्छे भाग्य का प्रतिक माना जाता है|





४ अगस्त की शाम काज़ा में बीत गई| रात को फिर एक बार उसी होटल पर जा कर भोजन किया| संस्था के किसी सदस्य से मिलना नही हो पाया| गाँव के बहुत पास ऊँचे पर्वत हैं और एक पर्वत पर बरफ भी दिखाई दे रही है! आगे की यात्रा पर प्रश्नचिह्न बना हुआ है| जम्मू- कश्मीर तो बन्द हुआ ही है, लेकीन साथ ही मेरी तबियत भी बहुत ठीक नही है| आठ दिन में पैंट एकदम लूज हो गई है| क्यों कि हर रोज होटल का खाना उतना ठीक नही लग रहा है| साथ ही मौसम और पर्यावरण बिल्कुल अपरिचित है| और दिक्कत यह है कि शरीर कितना भी फिट क्यों हो, शरीर में तालमेल बिठाने की क्षमता चाहिए, adaptability चाहिए| उसकी थोड़ी कमी नज़र आ रही है| देखते हैं आगे कैसा होता है| It is now all ifs and buts. एक आँख मौसम पर भी रखनी पड़ रही है| हालांकी यहाँ पता चला कि लेह और मनाली से वाहन आ रहे हैं| काज़ा से मनाली के बीच बस भी चलती है| कल काज़ा से लोसर जाऊंगा!


आज का रूट


आज की चढाई


अगला भाग: साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ९: काज़ा से लोसर. . .

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