११ (अन्तिम): इस यात्रा का विहंगावलोकन
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७ अगस्त की सुबह बससे लोसर से निकला और शाम को मनाली पहुँचा| वास्तव में इस पूरी यात्रा का यह हिस्सा ही सबसे अधिक डरावना और रोचक भी लगा| बहुत ज्यादा बरफ भी करीब से देखने का मौका मिला| अब बात करता हूँ इस पूरी यात्रा के रिलेवन्स की| पहले साईकिल से जुड़े पहलूओं के बारे में बात करता हूँ| सामाजिक विषयओं को लेकर इसके पहले भी मैने कुछ साईकिल यात्राएँ की हैं| लेकीन इस बार विशेष यह रहा कि पहली बार मेरी साईकिल यात्रा के लिए कई संस्थाएँ और लोग भी सामने आए| एक तरह की स्पॉन्सरशिप मुझे मिली| जैसा मैने पहले लेख में कहा था, स्पॉन्सरशिप एक आंशिक हिस्सा ही होती है, बाकी की तैयारी और प्रैक्टीस राईडस आदि से जुड़ा बहुत बड़ा खर्चा स्वयं ही करना होता है| फिर भी, इस तरह की स्पॉन्सरशिप प्राप्त करना एक साईकिलिस्ट के तौर पर मेरे लिए बड़ी बात है| मै फिर एक बार मन्थन फाउंडेशन, रिलीफ फाउंडेशन एवम् अन्य सब संस्थाएँ तथा व्यक्तियों को धन्यवाद देता हूँ जिन्होने कई तरह से इस यात्रा में सहयोग दिया, एक तरह का सहभाग भी लिया| हिमाचल प्रदेश में और अंबाला में भी मुझे कई लोगों से मदद लेनी पड़ी, उन्हे भी उनके सहयोग के लिए धन्यवाद! अगर इस तरह का सहयोग मुझे मिला न होता, तो मेरे लिए ऐसी यात्रा करना लगभग नामुमकीन होता| दूसरी बात साईकिल को लेकर मैने जो तैयारी की थी, जो व्यवस्थाएँ की थी, वे सब कारगर साबित हुई| जैसे साईकिल को महंगे प्रचलित टायर्स के बजाय देसी लेकीन मजबूत टायर्स डाले थे| बहुत से पथरिले और खतरनाक रास्तों पर चलने के बावजूद एक भी पंक्चर नही हुआ! उसके साथ मैने साईकिल के लिए मेरे साईकिल मित्र और साईकिल रेसर शेख खुदूस से जो थैला बनवा लिया था, वो भी बहुत काम आया| इस तरह से अब ट्रेन में आसानी से साईकिल कहीं से कहीं ले जा सकता हूँ! एक परेशानी हमेशा के लिए हल हुई| साईकिल चलाने से जुड़ी बाकी तैयारी भी वैसे ही काम आई| साईकिल को भी धन्यवाद देता हूँ, उसने खूब साथ निभाया!

१०: एक बेहद डरावनी बस यात्रा
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५ अगस्त की शाम को बड़े बुरे हालत में लोसर पहुँचा! काज़ा से सुबह निकलते समय तो सोचा था कि काज़ा से लोसर और लोसर से कुंजुमला दर्रे तक जाऊँगा और वैसे ही वापस काज़ा को जाऊँगा| लेकीन सड़क और शरीर की स्थिति देखते हुए यह सम्भव नही है| इसलिए लोसर से ही बस लेनी होगी| और लोसर से मनाली की बस चलती है! लेकीन उसके लिए भी अच्छा विश्राम करना होगा| इसलिए तय किया कि लोसर में एक दिन विश्राम करूँगा और उसके बाद दूसरे दिन मनाली के लिए निकलूंगा| लोसर! स्पीति का तिसरा मुख्य गाँव और कुंजुमला दर्रे का बेस! यहाँ से ४५५० मीटर ऊँचाई का कुंजुमला दर्रा सिर्फ १९ किलोमीटर ही है| और वहाँ से सड़क बड़े ही दुर्गम क्षेत्र से बढ़ते हुए मनाली की ओर जाती है! स्पीति से यह सड़क लाहौल जाती है| लोसर में पहुँचने पर देखा कि मोबाईल टॉवर तो है! लेकीन नेटवर्क नही है| यहाँ बिजली बहुत अनियमित होती है, इसलिए जब बिजली आती है, तभी मोबाईल भी चलता है| इस यात्रा के पहले लगा था कि मोबाईल के बिना कुछ दिन विपश्यना जैसी स्थिति में गुजरने तो मज़ा आएगा| लेकीन यहाँ एक तरह से मोबाईल और कनेक्टिविटी का लगाव नही छुटता दिखाई दे रहा है| खैर| शाम को बिजली आई और थोड़ा नेटवर्क भी आया| लोसर में मेरे होटल में लिखा है- आप ४०७९ मीटर पर डिनर कर रहे हैं! लोसर में शाम तो थोड़ी अच्छी गई| लेकीन रात में बहुत ज्यादा ठण्ड बढ़ गई! रात को शेअरिंग सिस्टम के कमरे में हिमाचल के अन्य यात्री भी हैं| उनसे भी थोड़ी बात हुई|

अगली सुबह थोड़े आराम से नीन्द खुली| बहुत ज्यादा ठण्ड है! आज कुछ भी करना नही है| लेकीन साईकिल तो फोल्ड करनी होगी| कल सुबह मनाली की बस मिलेगी| सुबह दो बार चाय का आनन्द लिया| होटल में कमरा दूसरी मंजिल पर है और सामने बहुत सुन्दर दृश्य दिखाई देते हैं! मेरी स्थिति ठीक नही है, लेकीन कितनी सुन्दर जगह है यह! पास ही की पहाड़ी पर लोसर गोम्पा भी है| लेकीन वहाँ जाने की इच्छा नही हुई| चढाई भी है| सुबह काफी देर बाद ठण्ड थोड़ी कम हुई| मौसम भी ठीक नही है, बादल उमड़े हैं| ज्यादा तर समय पुराने जमाने के नोकिया मोबाईल में गाने सुनता रहा| इस छोटे से शुद्ध फोन ने इस यात्रा में बड़ा साथ दिया! दोपहर जब इच्छा हुई, तो साईकिल को फोल्ड कर दिया| फोल्ड कर साईकिल कॅरी केस अर्थात् बोरे में रख दी| बेचारा स्टैंड टूटा है| सुबह की बस का पता किया| यहाँ से मनाली के लिए बस निकलती है सुबह सांत बजे| यह बस है काज़ा से लोसर- ग्राम्फू- मनाली- कुल्लू! इसी बस से मनाली तक जाऊँगा और वहाँ से अंबाला| अब ट्रेन का टिकिट भी नया निकलना होगा| एक तरह से अब भी हताशा तो है, लेकीन this is part and parcel of the game! साईकिल चलाना या अन्य कोई भी खेल हो, उसमें तो ऐसी चीजें होती ही हैं| कभी रिटायर्ड हर्ट होना पड़ता है, कभी इंज्युरी होती है, कभी स्थिति खराब भी होती है| वैसे मेरी योजना २०- २१ दिन साईकिल चलाने की थी, लेकीन सिर्फ ८ दिन चला पाया| एक तरह से क्रिकेट की भाषा में चार टेस्ट की शृंखला का पहला मैच मैने जिता, दूसरे मैच के तीन दिन भी अच्छे गए और अन्त में वह मैच ड्रॉ हुआ और बाकी के दो मैच भी रद्द हुए| कुल मिला कर १-० रही यह शृंखला! और हताशा के बावजूद मुझे लगभग लोसर तक की इस अविश्वसनीय यात्रा का एक तरह से फक्र रहेगा, अचिव्हमेंट का एहसास भी रहेगा|

८: ताबो से काज़ा
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३ अगस्त को नाको से ताबो पहुँचा| ताबो बहुत शानदार गाँव लगा| छोटा सा, लेकीन सड़के अच्छी हैं, होटल- दुकान भी हैं, लेकीन फिर भी गाँव ही है| पर्यटक और विदेशी पर्यटक भी हैं, लेकीन फिर भी शान्त गाँव लगा| नाको से ताबो की ऊँचाई तो कम है, लेकीन घूमक्कड़ी के लिहाज से उसका "कद" नाको से अधिक है! ताबो का होम स्टे बहुत अच्छा रहा| जिस घर में मै ठहरा था, उन्होने रात में भी नीचे घर में ही खाने के लिए बुलाया| एक तरह का बहुत ही अपनापन यहाँ मिला| परिवारवालों से बातचीत भी हुई| स्पीति के स्थानियों का घर अन्दर से देखने को मिला| और जाहीर तौर पर तिब्बत का करीब होना पता चल रहा है| क्यों कि हम जिसे ड्रॉईंग रूम कहते हैं, वहाँ पर ध्यान और प्रार्थना के लिए नीचे गद्दे बिछाए हैं| या गद्दे जैसे आसन| एक साथ पन्द्रह लोग बैठ कर ध्यान कर सकें, ऐसी व्यवस्था है| आदरणीय दलाई लामा जी का फोटो और मन्त्र फ्लैग्ज तो हर तरफ है ही|
यहाँ व्हॉईस और डेटा दोनो का कुछ नेटवर्क मिलने से घर पर और मित्रों से दो दिन के बाद ठीक बात हो सकी| कई सारे समाचार भी मिले| जम्मू- कश्मीर में अभूतपूर्व परिस्थिति है| अमरनाथ यात्रा रोकी गई है और सभी पर्यटकों को वहाँ से निकलने के लिए कहा गया है| इससे मेरी यात्रा भी बीच में खण्डित होगी| क्यों कि बाद में मुझे मनाली- लेह हायवे से लेह की तरफ जाना है जो की मै नही जा पाऊँगा| और इतनी अभूतपूर्व परिस्थिति में सब तरह के रिस्ट्रिक्शन्स भी वहाँ होंगे| जब यह समाचार मिला, तो सच कहता हूँ, एक तरह से राहत ही मिली| क्यों की लगातार चल रही अनिश्चितताओं से भरी यात्रा का मानसिक दबाव भी बहुत बना था| जब पता चला की, मै लेह की तरफ आगे नही जा पाऊँगा, तो सच में एक तरह का सुकून ही मिला| शिमला से निकल कर ताबो तक पहुँच तो गया हूँ, लेकीन शारीरिक और मानसिक दृष्टि से अब बहुत थकान भी हुई है| इस समाचार ने एक तरह से इस यात्रा का रूख भी और दिशा भी बदल ही दी| बीच बीच में बारीश का अलर्ट भी चल रहा है| हिमाचल और जम्मू- कश्मीर की सीमा अभी बहुत दूर है| लेकीन तबियत को देखते हुए उस सीमा तक भी जा पाना कठीन लग रहा है| ४ अगस्त को ताबो से काज़ा के लिए निकला तो सब इस तरह से अनिश्चित बना हुआ है| हालांकी आज की यात्रा ज्यादा कठिन नही होगी, इस यात्रा का सबसे छोटा पड़ाव- सिर्फ ४७ किलोमीटर आज है|
साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति १: प्रस्तावना
सभी को नमस्कार! हाल ही में किन्नौर- स्पीति यात्रा साईकिल पर की| इसके बारे में अब विस्तार से लिखना आरम्भ कर रहा हूँ| हर साईकिल यात्रा काफी कुछ सीखा जाती है, समृद्ध कर जाती है| इस यात्रा में भी बहुत कुछ सीखने को मिला| एक तरह से स्पीति में साईकिल चलाने का सपना भी पूरा हुआ| यह साईकिल यात्रा सिर्फ एक साईकिल यात्रा न हो कर एक सामाजिक उद्देश्य होनेवाली यात्रा थी| स्वास्थ्य, फिटनेस, पर्यावरण इन बातों के बारे में जागरूकता का मैसेज दिया जाना तथा इन्ही विषयों पर विभिन्न लोगों और समूहों से बात करना भी इसका एक अंग था| पुणे की संस्था मंथन फाउंडेशन, रिलीफ फाउंडेशन और अन्य संस्थाएँ तथा सहयोगियों का कई तरह का सहयोग इस सोलो साईकिल यात्रा के लिए मिला| एक तरह से यह एक नई पहल थी| समाज के सहयोग के साथ और सामाजिक उद्देश्य को ले कर यह यात्रा हुई| इसके बारे में अलग अलग सोच हो सकती है| किसी को ऐसा भी लग सकता है साईकिल यात्रा करनी हो तो अपने ही बल पर क्यों नही करते, संस्था का और अन्य व्यक्तियों का सहयोग क्यों लेना चाहिए| यह भी एक राय हो सकती है| मेरे विचार से मैने इस बार थोड़ा नया करने की कोशिश की| एक विचार और एक थीम ले कर कई लोगों के पास गया| पुणे की मंथन फाउंडेशन और रिलीफ फाउंडेशन इन दो संस्थाओं ने इस अभियान और उसके सामाजिक मैसेज में रूचि ली| उनके अपील पर कई और संस्थाएँ और व्यक्तियों ने भी इसमें रुचि ली| इसमें और एक बात भी है| जब मै अकेला साईकिल चलाता हूँ, तो वह मेरे तक या सिर्फ मेरे सोशल मीडीया तक सीमित रहता है| लेकीन जब मै किसी संस्था के साथ, व्यापक समाज के सामने आ कर साईकिल चलाता हूँ, तो वह ज्यादा लोगों तक पहुँचता है| प्रिंट मीडिया से और अधिक अनुपात में सोशल मीडिया में आने से कई लोगों तक यह विचार पहुँचता है| और जहाँ तक यात्रा के खर्च में सहयोग का मुद्दा है, यह सहयोग बहुत आंशिक होता है| इस यात्रा के प्रत्यक्ष यात्रा में होनेवाले अनुमानित खर्च के लिए संस्थाएँ और व्यक्तियों से सहयोग मिला| लेकीन काफी खर्च तो अप्रत्यक्ष होता है- जैसे मैने यात्रा की तैयारी के लिए कई महिनों तक जो राईडस की, जो अभ्यास किए उसका खर्च तो अलग ही होता है| या छुट्टियों की वजह से भी जो एक तरह का आर्थिक नुकसान होगा, वह भी तो होता ही है| खैर|