✪ Connection with Bagalkote!
✪ Beautiful Ghatprabha river
✪ Meeting massive Krishna river
✪ Bipolar village- Kolhar
✪ Acclimatization of the body and the mind
Hello all. There was long gap in writing my experiences related to cycling done in September- October 2022. Due to sky watching activities and other works, I was not able to write next part. Also I was enjoying early morning running feast and glorious foggy rides these days. It is a never to be missed joy! So writing these blogs slightly slipped behind. The cycling expedition itself was completed in 18 days, but writing those experiences is still going on! So you can imagine which is more easy. :) But people who were with me in this process reminded me again. So now finding time for this. It makes my eyes teary when I recall experiences during this 1500 km expedition. So many people were there with me, nature accompanied me beautifully! That Chorla ghat, then Sironcha- Gadchiroli forest and affectionate people everywhere1 The cycle also supported me and remained not out till last. This cycling expedition was actually a joyous pilgrimage into nature. Outline of this cycle expedition can be read here. Through this article, sharing my joy of this nature pilgrimage with you all.
...Yesterday, on 26th September as I could not find a shelter at the planned village, I had to ride 18 kms more to find a shelter in Lokapur. So accidentally, instead of 90 kms, it was a hundred with 108 kms! I had good rest in Lokapur. As there was no contact persons or organizations in Lokapur, there was no interaction. I took food in the evening and took rest. Our body has a miraculous strength. Yesterday was the third day, now I am used to the cycling. Now I get less tired. Also, the body is getting adjusted to things such as new place of every next day, different food, mosquitos etc. So I could get good rest in the night. Of course, as this expedition involved back- to back riding, not a single day I could have complete 100% rest. But the mind and the body is used to that also.
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Wednesday, January 18, 2023
Cycling in 4 states on single gear cycle 5: Lokapur- Bagalkote- Kolhar (71 kms)
Monday, October 14, 2019
साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ११ (अन्तिम): इस यात्रा का विहंगावलोकन
११ (अन्तिम): इस यात्रा का विहंगावलोकन
इस लेखमाला को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए|
७ अगस्त की सुबह बससे लोसर से निकला और शाम को मनाली पहुँचा| वास्तव में इस पूरी यात्रा का यह हिस्सा ही सबसे अधिक डरावना और रोचक भी लगा| बहुत ज्यादा बरफ भी करीब से देखने का मौका मिला| अब बात करता हूँ इस पूरी यात्रा के रिलेवन्स की| पहले साईकिल से जुड़े पहलूओं के बारे में बात करता हूँ| सामाजिक विषयओं को लेकर इसके पहले भी मैने कुछ साईकिल यात्राएँ की हैं| लेकीन इस बार विशेष यह रहा कि पहली बार मेरी साईकिल यात्रा के लिए कई संस्थाएँ और लोग भी सामने आए| एक तरह की स्पॉन्सरशिप मुझे मिली| जैसा मैने पहले लेख में कहा था, स्पॉन्सरशिप एक आंशिक हिस्सा ही होती है, बाकी की तैयारी और प्रैक्टीस राईडस आदि से जुड़ा बहुत बड़ा खर्चा स्वयं ही करना होता है| फिर भी, इस तरह की स्पॉन्सरशिप प्राप्त करना एक साईकिलिस्ट के तौर पर मेरे लिए बड़ी बात है| मै फिर एक बार मन्थन फाउंडेशन, रिलीफ फाउंडेशन एवम् अन्य सब संस्थाएँ तथा व्यक्तियों को धन्यवाद देता हूँ जिन्होने कई तरह से इस यात्रा में सहयोग दिया, एक तरह का सहभाग भी लिया| हिमाचल प्रदेश में और अंबाला में भी मुझे कई लोगों से मदद लेनी पड़ी, उन्हे भी उनके सहयोग के लिए धन्यवाद! अगर इस तरह का सहयोग मुझे मिला न होता, तो मेरे लिए ऐसी यात्रा करना लगभग नामुमकीन होता| दूसरी बात साईकिल को लेकर मैने जो तैयारी की थी, जो व्यवस्थाएँ की थी, वे सब कारगर साबित हुई| जैसे साईकिल को महंगे प्रचलित टायर्स के बजाय देसी लेकीन मजबूत टायर्स डाले थे| बहुत से पथरिले और खतरनाक रास्तों पर चलने के बावजूद एक भी पंक्चर नही हुआ! उसके साथ मैने साईकिल के लिए मेरे साईकिल मित्र और साईकिल रेसर शेख खुदूस से जो थैला बनवा लिया था, वो भी बहुत काम आया| इस तरह से अब ट्रेन में आसानी से साईकिल कहीं से कहीं ले जा सकता हूँ! एक परेशानी हमेशा के लिए हल हुई| साईकिल चलाने से जुड़ी बाकी तैयारी भी वैसे ही काम आई| साईकिल को भी धन्यवाद देता हूँ, उसने खूब साथ निभाया!

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७ अगस्त की सुबह बससे लोसर से निकला और शाम को मनाली पहुँचा| वास्तव में इस पूरी यात्रा का यह हिस्सा ही सबसे अधिक डरावना और रोचक भी लगा| बहुत ज्यादा बरफ भी करीब से देखने का मौका मिला| अब बात करता हूँ इस पूरी यात्रा के रिलेवन्स की| पहले साईकिल से जुड़े पहलूओं के बारे में बात करता हूँ| सामाजिक विषयओं को लेकर इसके पहले भी मैने कुछ साईकिल यात्राएँ की हैं| लेकीन इस बार विशेष यह रहा कि पहली बार मेरी साईकिल यात्रा के लिए कई संस्थाएँ और लोग भी सामने आए| एक तरह की स्पॉन्सरशिप मुझे मिली| जैसा मैने पहले लेख में कहा था, स्पॉन्सरशिप एक आंशिक हिस्सा ही होती है, बाकी की तैयारी और प्रैक्टीस राईडस आदि से जुड़ा बहुत बड़ा खर्चा स्वयं ही करना होता है| फिर भी, इस तरह की स्पॉन्सरशिप प्राप्त करना एक साईकिलिस्ट के तौर पर मेरे लिए बड़ी बात है| मै फिर एक बार मन्थन फाउंडेशन, रिलीफ फाउंडेशन एवम् अन्य सब संस्थाएँ तथा व्यक्तियों को धन्यवाद देता हूँ जिन्होने कई तरह से इस यात्रा में सहयोग दिया, एक तरह का सहभाग भी लिया| हिमाचल प्रदेश में और अंबाला में भी मुझे कई लोगों से मदद लेनी पड़ी, उन्हे भी उनके सहयोग के लिए धन्यवाद! अगर इस तरह का सहयोग मुझे मिला न होता, तो मेरे लिए ऐसी यात्रा करना लगभग नामुमकीन होता| दूसरी बात साईकिल को लेकर मैने जो तैयारी की थी, जो व्यवस्थाएँ की थी, वे सब कारगर साबित हुई| जैसे साईकिल को महंगे प्रचलित टायर्स के बजाय देसी लेकीन मजबूत टायर्स डाले थे| बहुत से पथरिले और खतरनाक रास्तों पर चलने के बावजूद एक भी पंक्चर नही हुआ! उसके साथ मैने साईकिल के लिए मेरे साईकिल मित्र और साईकिल रेसर शेख खुदूस से जो थैला बनवा लिया था, वो भी बहुत काम आया| इस तरह से अब ट्रेन में आसानी से साईकिल कहीं से कहीं ले जा सकता हूँ! एक परेशानी हमेशा के लिए हल हुई| साईकिल चलाने से जुड़ी बाकी तैयारी भी वैसे ही काम आई| साईकिल को भी धन्यवाद देता हूँ, उसने खूब साथ निभाया!
Thursday, June 28, 2018
एटलस साईकिल पर योग- यात्रा भाग १२: मानवत- परभणी
१२: मानवत- परभणी
योग साईकिल यात्रा का अन्तिम दिन- २१ मई की सुबह| आज यह यात्रा समाप्त होगी! मेरे लिए यह पूरी यात्रा और हर पड़ाव बहुत अनुठे रहे है| मेरे लिए बहुत कुछ सीखने जैसा इसमें मिला| बहुत लोगों से और साधकों से मिलना हुआ| कुल मिला कर एक अविस्मरणीय यह यात्रा रही है| इसके बारे में विस्तार से अगले अन्तिम लेख में बात करूँगा| अभी बात करता हूँ इस यात्रा के साईकिल चलाने के अन्तिम दिन की| मानवत- परभणी दूरी छोटी है, इसलिए रास्ते में रूढि गाँव के योग- शिविर पर जाना हुआ| मानवत से इस शिविर तक मेरे साथ श्री पद्मकुमारजी कहेकर जी भी आए| रूढ़ी गाँव में स्वामी मनिषानन्द जी का आश्रम है और यहाँ पर मिटकरी सर योग शिविर लेते हैं| मिटकरी सर से कल मिलना भी हुआ था| सुबह छह बजे इस शिविर में पहुँचा| लगभग पच्चीस- तीस बच्चे योग कर रहे हैं| थोड़ी उनसे बातचीत की| आश्रम में स्वामीजी से मिलना हुआ| उनका आशीर्वाद प्राप्त हुआ| यह भी इस यात्रा की एक खास बात रही| कई तरह के एनर्जी फिल्डस और डॉ. प्रशान्त पटेल अर्थात् स्वामी प्रशांतानंद जी जैसे कई दिग्गज साधकों का भी सत्संग मिला|


योग साईकिल यात्रा का अन्तिम दिन- २१ मई की सुबह| आज यह यात्रा समाप्त होगी! मेरे लिए यह पूरी यात्रा और हर पड़ाव बहुत अनुठे रहे है| मेरे लिए बहुत कुछ सीखने जैसा इसमें मिला| बहुत लोगों से और साधकों से मिलना हुआ| कुल मिला कर एक अविस्मरणीय यह यात्रा रही है| इसके बारे में विस्तार से अगले अन्तिम लेख में बात करूँगा| अभी बात करता हूँ इस यात्रा के साईकिल चलाने के अन्तिम दिन की| मानवत- परभणी दूरी छोटी है, इसलिए रास्ते में रूढि गाँव के योग- शिविर पर जाना हुआ| मानवत से इस शिविर तक मेरे साथ श्री पद्मकुमारजी कहेकर जी भी आए| रूढ़ी गाँव में स्वामी मनिषानन्द जी का आश्रम है और यहाँ पर मिटकरी सर योग शिविर लेते हैं| मिटकरी सर से कल मिलना भी हुआ था| सुबह छह बजे इस शिविर में पहुँचा| लगभग पच्चीस- तीस बच्चे योग कर रहे हैं| थोड़ी उनसे बातचीत की| आश्रम में स्वामीजी से मिलना हुआ| उनका आशीर्वाद प्राप्त हुआ| यह भी इस यात्रा की एक खास बात रही| कई तरह के एनर्जी फिल्डस और डॉ. प्रशान्त पटेल अर्थात् स्वामी प्रशांतानंद जी जैसे कई दिग्गज साधकों का भी सत्संग मिला|
Monday, June 18, 2018
एटलस साईकिल पर योग- यात्रा भाग ९: सिंदखेड़ राजा- मेहकर
९: सिंदखेड़ राजा- मेहकर
योग साईकिल यात्रा का आंठवा दिन, १८ मई की सुबह| सुबह ठीक साढ़ेपाँच बजे निकला| आज कुछ अन्धेरा है| गर्मियों के दिनों में सुबह साढ़ेपाँच बजे रोशनी हो जाती है, लेकीन आज कुछ मिनटों तक अन्धेरा रहा| पहली बार ऐसा हो रहा है| और सिंदखेड़ राजा से मेहकर जानेवाला यह हायवे पुणे- नागपूर मार्ग भी है, इसलिए यहाँ बहुत तेज़ रफ्तार से ट्रैवल्स की बसें जा रही हैं| इसलिए कुछ मिनटों तक अन्धेरे का थोड़ा डर लगा| उसके साथ तेज़ गति से जानेवाले और बहुत पास से गुजरनेवाले ट्रक्स| आखिर जब आधे घण्टे बाद धीरे धीरे रोशनी आती गई, कुछ सुकून मिला| अब तक की योग चर्चाएँ याद आ रही है| एक जगह पर एक योग साधिका ने कहा था कि मेरा बेटा बहुत भागदौड़ करता था, उससे कुछ शान्ति के लिए मैने योग शुरू किया और बाद में बेटा भी योग करने लगा! एक जगह एक योग शिक्षक ने हमारी खाने के आदतों के बारे में बहुत अच्छी टिपणि की थी| उन्होने कहा था कि हम अगर खाना खा रहे है तो हमे ऐसा खाना चाहिए- अगर हमें आम बहुत पसन्द है, तो उसे बहुत धीरे से, उसे देखते हुए, उसका पूरा आनन्द लेते हुए खाना चाहिए| जैसे आम को देखना, उसका सुगन्ध लेना, धीरे धीरे उसका स्वाद लेना| अगर हम इस तरह खाते हैं तो बहुत थोड़ा सा खाना भी शरीर के लिए पर्याप्त होता है| इससे ध्यानपूर्वक खाना खाया जा सकता है और अतिरिक्त खाना भी नही खाया जाएगा!


योग साईकिल यात्रा का आंठवा दिन, १८ मई की सुबह| सुबह ठीक साढ़ेपाँच बजे निकला| आज कुछ अन्धेरा है| गर्मियों के दिनों में सुबह साढ़ेपाँच बजे रोशनी हो जाती है, लेकीन आज कुछ मिनटों तक अन्धेरा रहा| पहली बार ऐसा हो रहा है| और सिंदखेड़ राजा से मेहकर जानेवाला यह हायवे पुणे- नागपूर मार्ग भी है, इसलिए यहाँ बहुत तेज़ रफ्तार से ट्रैवल्स की बसें जा रही हैं| इसलिए कुछ मिनटों तक अन्धेरे का थोड़ा डर लगा| उसके साथ तेज़ गति से जानेवाले और बहुत पास से गुजरनेवाले ट्रक्स| आखिर जब आधे घण्टे बाद धीरे धीरे रोशनी आती गई, कुछ सुकून मिला| अब तक की योग चर्चाएँ याद आ रही है| एक जगह पर एक योग साधिका ने कहा था कि मेरा बेटा बहुत भागदौड़ करता था, उससे कुछ शान्ति के लिए मैने योग शुरू किया और बाद में बेटा भी योग करने लगा! एक जगह एक योग शिक्षक ने हमारी खाने के आदतों के बारे में बहुत अच्छी टिपणि की थी| उन्होने कहा था कि हम अगर खाना खा रहे है तो हमे ऐसा खाना चाहिए- अगर हमें आम बहुत पसन्द है, तो उसे बहुत धीरे से, उसे देखते हुए, उसका पूरा आनन्द लेते हुए खाना चाहिए| जैसे आम को देखना, उसका सुगन्ध लेना, धीरे धीरे उसका स्वाद लेना| अगर हम इस तरह खाते हैं तो बहुत थोड़ा सा खाना भी शरीर के लिए पर्याप्त होता है| इससे ध्यानपूर्वक खाना खाया जा सकता है और अतिरिक्त खाना भी नही खाया जाएगा!
Tuesday, June 5, 2018
एटलस साईकिल पर योग- यात्रा: भाग ५: अंबड - औरंगाबाद
५: अंबड- औरंगाबादयोग साईकिल यात्रा का चौथा दिन, १४ मई की सुबह| आज अंबड से औरंगाबाद जाना है| सुबह अंबड के कुछ योग साधकों से मिलना हुआ| यहाँ कुछ लोग व्यक्तिगत रूप से क्लास लेते हैं| उनसे मिलकर आगे बढ़ा| आज भी सड़क आधी दूरी तक भारत से ही जाएगी और हायवे आने के बाद फिर इंडिया शुरू होगा! आज पहली बात तो खुद को बहुत धन्यवाद दे रहा हूँ कि मै इस यात्रा पर साईकिल पर आया, क्यों कि अगर गाडी से आता तो इस दिशा में कभी भी नही आता! आज यह सड़क रोहीलागड़ से जाएगी| रोहीलागड़ यह आज एक छोटा सा कस्बा है लेकीन अतीत में यहाँ पर बौद्ध गुंफाएँ थी| रोहीलागड़ के पास ही जांबुवंतगड भी है जिसका सम्बन्ध श्रीकृष्ण के समय के जाम्बुवन्त से है, ऐसा कहा जाता है| आज पहले इस रोहीलागड़ को देखने की उत्सुकता थी| इंटरनेट पर इसके बारे में खोजा था, पर कुछ खास मिला नही| अंबड से निकलने के बाद से ही सड़क विराने से रोहीलागड़ के तरफ बढ़ रही है| कल जैसा ही शान्त विराना और प्रकृति का साथ! बीच बीच में लगनेवाले बहुत ही छोटे गाँव!


Saturday, June 2, 2018
एटलस साईकिल पर योग- यात्रा: भाग ४: परतूर- अंबड
४: परतूर- अंबड
योग साईकिल यात्रा का तिसरा दिन, १३ मई की सुबह| रात में अच्छा विश्राम हुआ है और कल जो योग साधकों से मिलना हुआ था, उससे भी बहुत ऊर्जा मिली है| इस यात्रा के लिए उत्साह और भी बढ़ गया है| कल जहाँ ठहरा था वह परतूर गाँव! इसे वैसे तो परतुड़ भी कहा जाता है| और महाराष्ट्र और भारत के इतिहास में भी इस गाँव से जुड़ा एक घटनाक्रम है| १७६१ में पानिपत में मराठा सेना और अब्दाली के बीच पानिपत का तिसरा युद्ध हुआ| जब मराठा सेना इस युद्ध के लिए निकली थी, तो तब वह यहाँ परतूड़ में थी| परतूड़ में पेशवा सदाशिवरावभाऊ की अगुवाई में मराठा सेना ने निज़ाम की सेना को मात दी थी| यहीं मराठा सेना को अब्दाली और नजीबखान रोहीला की सेना ने मराठा सरदार दत्ताजी शिंदे को मात देने की की खबर मिली और सीधा परतूड़ से ही मराठा सेना दिल्ली के लिए निकली थी|


योग साईकिल यात्रा का तिसरा दिन, १३ मई की सुबह| रात में अच्छा विश्राम हुआ है और कल जो योग साधकों से मिलना हुआ था, उससे भी बहुत ऊर्जा मिली है| इस यात्रा के लिए उत्साह और भी बढ़ गया है| कल जहाँ ठहरा था वह परतूर गाँव! इसे वैसे तो परतुड़ भी कहा जाता है| और महाराष्ट्र और भारत के इतिहास में भी इस गाँव से जुड़ा एक घटनाक्रम है| १७६१ में पानिपत में मराठा सेना और अब्दाली के बीच पानिपत का तिसरा युद्ध हुआ| जब मराठा सेना इस युद्ध के लिए निकली थी, तो तब वह यहाँ परतूड़ में थी| परतूड़ में पेशवा सदाशिवरावभाऊ की अगुवाई में मराठा सेना ने निज़ाम की सेना को मात दी थी| यहीं मराठा सेना को अब्दाली और नजीबखान रोहीला की सेना ने मराठा सरदार दत्ताजी शिंदे को मात देने की की खबर मिली और सीधा परतूड़ से ही मराठा सेना दिल्ली के लिए निकली थी|
Wednesday, April 20, 2016
दोस्ती साईकिल से २७: २०१५ की लदाख़ साईकिल यात्रा पर दृष्टिक्षेप. . .
दोस्ती साईकिल से १: पहला अर्धशतक
दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . .
दोस्ती साईकिल से ५: सिंहगढ़ राउंड १. . .
दोस्ती साईकिल से ६: ऊँचे नीचे रास्ते और मन्ज़िल तेरी दूर. . .
दोस्ती साईकिल से ७: शहर में साईकिलिंग. . .
दोस्ती साईकिल से ८: सिंहगढ़ राउंड २!
दोस्ती साईकिल से ९: दूसरा शतक. . .
दोस्ती साईकिल से १०: एक चमत्कारिक राईड- नर्वस नाइंटी!
दोस्ती साईकिल से ११: नई सड़कों पर साईकिल यात्रा!
दोस्ती साईकिल से १२: तिसरा शतक- जीएमआरटी राईड
दोस्ती साईकिल से १३: ग्रामीण सड़कों पर साईकिल राईड
दोस्ती साईकिल से: १४ "नई साईकिल" से नई शुरुआत
दोस्ती साईकिल से: १५: औंढा नागनाथ के साथ चौथा शतक
दोस्ती साईकिल से: १६: पाँचवा शतक- लोअर दुधना डैम
दोस्ती साईकिल से: १७: एक ड्रीम माउंटेन राईड- साक्री से नन्दुरबार
दोस्ती साईकिल से: १८: तोरणमाळ हिल स्टेशन पर साईकिल ट्रेक!
दोस्ती साईकिल से: १९: हौसला बढ़ानेवाली राईडस!
दोस्ती साईकिल से: २०: इंज्युरी के बाद की राईडस
दोस्ती साईकिल से: २१: चढाई पर साईकिल चलाने का आनन्द
दोस्ती साईकिल से: २२: सिंहगढ़ राउंड ३ सिंहगढ़ पर फतह!
दोस्ती साईकिल से: २३: नई हैं मन्जिलें. . नए है रास्ते नया नया सफर है तेरे वास्ते. . .
दोस्ती साईकिल से: २४: अप्रैल की गरमी में १४८ किलोमीटर
दोस्ती साईकिल से: २५: आँठवा शतक
दोस्ती साईकिल से: २६: २०१५ की लदाख़ साईकिल यात्रा की तैयारी
२०१५ की लदाख़ साईकिल यात्रा पर दृष्टिक्षेप. . .
लदाख़ की साईकिल यात्रा! एक सपना सच होने जा रहा था| २६ मई को महाराष्ट्र से निकला था| मनाली- लेह रोड़ खुलने में काफी देर होने के कारण करगिल से जाना पड़ा| करगिल में साईकिलिंग शुरू करते समय मन में आशंकाओं का तुफान जैसे था| शंकाओं से मन लगभग तितर- बितर हुआ था| लेकिन साईकिल उठायी और चल पड़ा| साथ देने के लिए तो स्वर्णिम नजारे थे ही|
धीरे धीरे आगे बढ़ता गया| बाद में अच्छी साईकिल चलायी और लेह भी पहुँच गया| लेकिन उसके बाद आगे नही जा सका| रास्ते खुले नही थे और मौसम भी अनुकूल नही था| माईनस में तपमान लदाख़ की गर्मियों के लिहाज़ से अप्रत्याशित था| और तीन दिन साईकिल चलाने के बाद जैसे मानसिक थकान हो गई| इसलिए और आगे नही जा पाया| लेकिन फिर भी, अगर जाने के पहले मुझे किसी ज्योतिषी ने बताया होता की, तुम लदाख़ में चार अर्धशतक करोगे और तीसरे ही दिन करगिल से लेह पहुँच जाओगे, तो मै उसे लाटरी जैसा ही मानता| आईए, एक नज़र डालते हैं उन चार अर्धशतकों पर|



Friday, April 8, 2016
दोस्ती साईकिल से २६: २०१५ की लदाख़ साईकिल यात्रा की तैयारी
दोस्ती साईकिल से १: पहला अर्धशतक
दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . .
दोस्ती साईकिल से ५: सिंहगढ़ राउंड १. . .
दोस्ती साईकिल से ६: ऊँचे नीचे रास्ते और मन्ज़िल तेरी दूर. . .
दोस्ती साईकिल से ७: शहर में साईकिलिंग. . .
दोस्ती साईकिल से ८: सिंहगढ़ राउंड २!
दोस्ती साईकिल से ९: दूसरा शतक. . .
दोस्ती साईकिल से १०: एक चमत्कारिक राईड- नर्वस नाइंटी!
दोस्ती साईकिल से ११: नई सड़कों पर साईकिल यात्रा!
दोस्ती साईकिल से १२: तिसरा शतक- जीएमआरटी राईड
दोस्ती साईकिल से १३: ग्रामीण सड़कों पर साईकिल राईड
दोस्ती साईकिल से: १४ "नई साईकिल" से नई शुरुआत
दोस्ती साईकिल से: १५: औंढा नागनाथ के साथ चौथा शतक
दोस्ती साईकिल से: १६: पाँचवा शतक- लोअर दुधना डैम
दोस्ती साईकिल से: १७: एक ड्रीम माउंटेन राईड- साक्री से नन्दुरबार
दोस्ती साईकिल से: १८: तोरणमाळ हिल स्टेशन पर साईकिल ट्रेक!
दोस्ती साईकिल से: १९: हौसला बढ़ानेवाली राईडस!
दोस्ती साईकिल से: २०: इंज्युरी के बाद की राईडस
दोस्ती साईकिल से: २१: चढाई पर साईकिल चलाने का आनन्द
दोस्ती साईकिल से: २२: सिंहगढ़ राउंड ३ सिंहगढ़ पर फतह!
दोस्ती साईकिल से: २३: नई हैं मन्जिलें. . नए है रास्ते नया नया सफर है तेरे वास्ते. . .
दोस्ती साईकिल से: २४: अप्रैल की गरमी में १४८ किलोमीटर
दोस्ती साईकिल से: २५: आँठवा शतक
२०१५ की लदाख़ साईकिल यात्रा की तैयारी
१९ अप्रैल को शतक करने के बाद अगले दिन नान्देड शहर के एक साईकिलिस्ट के पास गया| वे रेस की साईकिल दौडाते हैं| उन्होने साईकिल रिपेअरिंग पर बहुत जानकारी दी, फिटनेस और आहार के बारे में भी बताया| उनके पास जाने के लिए भी कुछ दूरी साईकिल पर गया| साईकिल बस पर रखने का भी अभ्यास किया! साईकिल का रिपेअरिंग सीखना वैसे तो बहुत बड़ी बात है| अभी मै पंक्चर भी ठीक नही निकाल पा रहा हूँ| हर रोज साईकिल की ट्युब निकाल कर पंक्चर चेक करने का अभ्यास शुरू किया है| धीरे धीरे प्रगति हो रही है| एलेन की खरीदी जो साईकिल के लगभग हर हिस्से को खोल सकती हैं! अब साईकिल पूरी डिसमेंटल कर सकता हूँ| हालाकि कभी कभी उसे फिर से बन्द करने में कठिनाई होती है! बाद में पता चला कि फोर्क को खोलना नही चाहिए| वैसे सिर्फ टायर्स और सीट अलग करने के बाद भी साईकिल बिल्कुल अलग दिखती है| खैर|
छोटी राईडस जारी रही| लदाख़ के लिए निकलने के लिए सिर्फ एक महिना बचा है| मन में बहुत उत्सुकता और थोड़ा तनाव भी है| यहाँ कितनी भी तैयारी कर लूँ, लेकिन क्या २५००- ३०००- ५००० मीटर से अधिक ऊँचाई पर मै साईकिल चला पाऊँगा? और लदाख़ के पहले एक ५-६ दिन लगातार साईकिल चलाने की राईड भी नही कर पा रहा हूँ| इसलिए तनाव बहुत अधिक है| लेकिन उतना मज़ा भी आ रहा है| साईकिल चलाना और उसके तकनिकी पहलू सीखना जारी रहा| धीरे धीरे पंक्चर भी आ रहा है|


Monday, April 4, 2016
दोस्ती साईकिल से २५: आँठवा शतक
दोस्ती साईकिल से १: पहला अर्धशतक
दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . .
दोस्ती साईकिल से ५: सिंहगढ़ राउंड १. . .
दोस्ती साईकिल से ६: ऊँचे नीचे रास्ते और मन्ज़िल तेरी दूर. . .
दोस्ती साईकिल से ७: शहर में साईकिलिंग. . .
दोस्ती साईकिल से ८: सिंहगढ़ राउंड २!
दोस्ती साईकिल से ९: दूसरा शतक. . .
दोस्ती साईकिल से १०: एक चमत्कारिक राईड- नर्वस नाइंटी!
दोस्ती साईकिल से ११: नई सड़कों पर साईकिल यात्रा!
दोस्ती साईकिल से १२: तिसरा शतक- जीएमआरटी राईड
दोस्ती साईकिल से १३: ग्रामीण सड़कों पर साईकिल राईड
दोस्ती साईकिल से: १४ "नई साईकिल" से नई शुरुआत
दोस्ती साईकिल से: १५: औंढा नागनाथ के साथ चौथा शतक
दोस्ती साईकिल से: १६: पाँचवा शतक- लोअर दुधना डैम
दोस्ती साईकिल से: १७: एक ड्रीम माउंटेन राईड- साक्री से नन्दुरबार
दोस्ती साईकिल से: १८: तोरणमाळ हिल स्टेशन पर साईकिल ट्रेक!
दोस्ती साईकिल से: १९: हौसला बढ़ानेवाली राईडस!
दोस्ती साईकिल से: २०: इंज्युरी के बाद की राईडस
दोस्ती साईकिल से: २१: चढाई पर साईकिल चलाने का आनन्द
दोस्ती साईकिल से: २२: सिंहगढ़ राउंड ३ सिंहगढ़ पर फतह!
दोस्ती साईकिल से: २३: नई हैं मन्जिलें. . नए है रास्ते नया नया सफर है तेरे वास्ते. . .
दोस्ती साईकिल से: २४: अप्रैल की गरमी में १४८ किलोमीटर
आँठवा शतक
११ अप्रैल २०१५ को १४८ किलोमीटर साईकिल चलायी और उसके बाद लिफ्ट ले कर औरंगाबाद पहुँच गया| वैसे यहाँ से और आगे साईकिल पर जाने का विचार था| पर कल की थकान के बाद वह छोडना पड़ा| अगले दिन जल्दी उठ कर औरंगाबाद के पास के हिल्स पर जाने की इच्छा थी| पर सुबह जल्दी न उठने के कारण वह नही हो पाया| बड़े लक्ष्य का पीछा करते समय ऐसी छोटी छोटी गलतियाँ भी महंगी होती है| सातत्य का अपना महत्त्व होता है| अगर 'यहाँ' आलस करूँगा, तो 'वहाँ' कीमत चुकानी होगी. . . खैर| औरंगाबाद में एक साईकिल मॉल में गया| यहाँ काफी एक्सेसरीज थी| लेकिन उतनी ही महंगी| साईकिलिंग के सम्बन्ध में आजकल कुछ लोग बहुत पैसे खर्च भी करते हैं| पचास हजार की साईकिल और तीन- चार हजार की एक्सेसरीज आम बात है. .


Monday, March 28, 2016
दोस्ती साईकिल से २४: अप्रैल की गरमी में १४८ किलोमीटर
दोस्ती साईकिल से १: पहला अर्धशतक
दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . .
दोस्ती साईकिल से ५: सिंहगढ़ राउंड १. . .
दोस्ती साईकिल से ६: ऊँचे नीचे रास्ते और मन्ज़िल तेरी दूर. . .
दोस्ती साईकिल से ७: शहर में साईकिलिंग. . .
दोस्ती साईकिल से ८: सिंहगढ़ राउंड २!
दोस्ती साईकिल से ९: दूसरा शतक. . .
दोस्ती साईकिल से १०: एक चमत्कारिक राईड- नर्वस नाइंटी!
दोस्ती साईकिल से ११: नई सड़कों पर साईकिल यात्रा!
दोस्ती साईकिल से १२: तिसरा शतक- जीएमआरटी राईड
दोस्ती साईकिल से १३: ग्रामीण सड़कों पर साईकिल राईड
दोस्ती साईकिल से: १४ "नई साईकिल" से नई शुरुआत
दोस्ती साईकिल से: १५: औंढा नागनाथ के साथ चौथा शतक
दोस्ती साईकिल से: १६: पाँचवा शतक- लोअर दुधना डैम
दोस्ती साईकिल से: १७: एक ड्रीम माउंटेन राईड- साक्री से नन्दुरबार
दोस्ती साईकिल से: १८: तोरणमाळ हिल स्टेशन पर साईकिल ट्रेक!
दोस्ती साईकिल से: १९: हौसला बढ़ानेवाली राईडस!
दोस्ती साईकिल से: २०: इंज्युरी के बाद की राईडस
दोस्ती साईकिल से: २१: चढाई पर साईकिल चलाने का आनन्द
दोस्ती साईकिल से: २२: सिंहगढ़ राउंड ३ सिंहगढ़ पर फतह!
दोस्ती साईकिल से: २३: नई हैं मन्जिलें. . नए है रास्ते नया नया सफर है तेरे वास्ते. . .
अप्रैल की गरमी में १४८ किलोमीटर
मार्च में अच्छी साईकिलिंग हुई| अब लदाख़ यात्रा का ट्रेन का बूकिंग भी कर लिया है| अभी भी दो महिने है तैयारी के लिए| राईडस जारी रही| एक बड़ी राईड के उद्देश्य से ११ एप्रिल २०१५ को सुबह निकला| आज २०० किलोमीटर करने का लक्ष्य है| परभणी से जिंतूर- जालना- औरंगाबाद ऐसे जाऊँगा|साईकिल चलाते समय भी एक ही ख्याल मन में है- तैयारी कैसे आगे बढ़ायी जाए? लदाख़ यात्रा की तैयारी के कई पहलू है| पहली बात साईकिलिंग का अभ्यास और फिटनेस- स्टैमिना| उसके लिए भी कई बाते हैं जैसे साईकिलिंग के साथ जंपिंग, पूरक योगा, प्राणायाम और स्ट्रेचिंग| मै साईकिलिंग और योगा तो रेग्युलर कर रहा हूँ, लेकिन स्ट्रेचिंग और वार्म अप जैसे एक्सरसाईज अभी किए नही हैं| और कुछ चीजें अनुभव से पता चली वो करता हूँ- जैसे शाम को राईड होने के बाद पैर दीवार पर रख कर लेटना, पैरों को साईकिलिंग के विपरित मूवमेंट होने के लिए पादसंचालनासन जैसे कुछ योगासन और मुख्य रूप से प्राणायाम अर्थात् साँस का अभ्यास| लेकिन इस दिशा में अभी बहुत कुछ किया जा सकता है| दूसरी बात साईकिल का रिपेअरिंग सीखना| वहाँ भी अभी बहुत कुछ करना है| हालाकि मन में जो बात सबसे कठिन लगती थी, वह चढ़ाई पर साईकिलिंग है और उसमें मै एक स्तर तक पहूँच गया हूँ| खैर|


Thursday, March 24, 2016
दोस्ती साईकिल से २३: नई हैं मन्जिलें नए हैं रास्ते. . नया नया सफर है तेरे वास्ते. .
दोस्ती साईकिल से १: पहला अर्धशतक
दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . .
दोस्ती साईकिल से ५: सिंहगढ़ राउंड १. . .
दोस्ती साईकिल से ६: ऊँचे नीचे रास्ते और मन्ज़िल तेरी दूर. . .
दोस्ती साईकिल से ७: शहर में साईकिलिंग. . .
दोस्ती साईकिल से ८: सिंहगढ़ राउंड २!
दोस्ती साईकिल से ९: दूसरा शतक. . .
दोस्ती साईकिल से १०: एक चमत्कारिक राईड- नर्वस नाइंटी!
दोस्ती साईकिल से ११: नई सड़कों पर साईकिल यात्रा!
दोस्ती साईकिल से १२: तिसरा शतक- जीएमआरटी राईड
दोस्ती साईकिल से १३: ग्रामीण सड़कों पर साईकिल राईड
दोस्ती साईकिल से: १४ "नई साईकिल" से नई शुरुआत
दोस्ती साईकिल से: १५: औंढा नागनाथ के साथ चौथा शतक
दोस्ती साईकिल से: १६: पाँचवा शतक- लोअर दुधना डैम
दोस्ती साईकिल से: १७: एक ड्रीम माउंटेन राईड- साक्री से नन्दुरबार
दोस्ती साईकिल से: १८: तोरणमाळ हिल स्टेशन पर साईकिल ट्रेक!
दोस्ती साईकिल से: १९: हौसला बढ़ानेवाली राईडस!
दोस्ती साईकिल से: २०: इंज्युरी के बाद की राईडस
दोस्ती साईकिल से: २१: चढाई पर साईकिल चलाने का आनन्द
दोस्ती साईकिल से: २२: सिंहगढ़ राउंड ३ सिंहगढ़ पर फतह!
नई हैं मन्जिलें नए हैं रास्ते. . नया नया सफर है तेरे वास्ते. .
१६ मार्च २०१५ को सिंहगढ़ सवा घण्टे में करने के बाद हौसला बहुत बढ़ा| साईकिल पर लदाख़ यात्रा सम्भव लगने लगी| विश्वास आ गया| अब इस दिशा में आगे बढ़ना है| मेरे साईकिल गुरू नीरज जाट उसके लिए मार्गदर्शन दे रहे हैं| वे बता रहे हैं कि अब साईकिल का स्टैमिना बढ़ाने के साथ साथ साईकिल का रिपेअरिंग भी सीखना चाहिए| पंक्चर, गेअर सेटिंग, ब्रेक सेटिंग आदि आना चाहिए| यह भी तैयारी का उतना ही महत्त्वपूर्ण पहलू है|
अगले दिनों में साईकिलिंग चालू रहा| परभणी के आसपास की सड़कों पर कई अर्धशतक हो गए| परभणी के एक साईकिल मैकेनिक से सहायता ले कर रिपेअरिंग भी सीखना चालू किया| साईकिल के दोनो टायर्स कैसे अलग करते हैं, यह समझ लिया| दोनो टायर्स और सीट अलग करने पर साईकिल बिल्कुल अलग दिखाई देती है| इससे बस पर उसे ले जाने में भी सहायता होगी| अब साईकिल का मड गार्ड हटा दिया है| ट्रक पर जैसे लाल इंडीकेटर लगा होता हैं, वैसा ही इंडिकेटर साईकिल पर भी लगाया है जिससे रात में भी साईकिल दूर से दिख जाए| हालाकि अब रिपेअरिंग भी पूरी सीखनी है|


Saturday, March 19, 2016
दोस्ती साईकिल से २२: सिंहगढ़ राउंड ३ सिंहगढ़ पर फतह!
दोस्ती साईकिल से १: पहला अर्धशतक
दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . .
दोस्ती साईकिल से ५: सिंहगढ़ राउंड १. . .
दोस्ती साईकिल से ६: ऊँचे नीचे रास्ते और मन्ज़िल तेरी दूर. . .
दोस्ती साईकिल से ७: शहर में साईकिलिंग. . .
दोस्ती साईकिल से ८: सिंहगढ़ राउंड २!
दोस्ती साईकिल से ९: दूसरा शतक. . .
दोस्ती साईकिल से १०: एक चमत्कारिक राईड- नर्वस नाइंटी!
दोस्ती साईकिल से ११: नई सड़कों पर साईकिल यात्रा!
दोस्ती साईकिल से १२: तिसरा शतक- जीएमआरटी राईड
दोस्ती साईकिल से १३: ग्रामीण सड़कों पर साईकिल राईड
दोस्ती साईकिल से: १४ "नई साईकिल" से नई शुरुआत
दोस्ती साईकिल से: १५: औंढा नागनाथ के साथ चौथा शतक
दोस्ती साईकिल से: १६: पाँचवा शतक- लोअर दुधना डैम
दोस्ती साईकिल से: १७: एक ड्रीम माउंटेन राईड- साक्री से नन्दुरबार
दोस्ती साईकिल से: १८: तोरणमाळ हिल स्टेशन पर साईकिल ट्रेक!
दोस्ती साईकिल से: १९: हौसला बढ़ानेवाली राईडस!
दोस्ती साईकिल से: २०: इंज्युरी के बाद की राईडस
दोस्ती साईकिल से: २१: चढाई पर साईकिल चलाने का आनन्द
सिंहगढ़ राउंड ३ सिंहगढ़ पर फतह!
चढाई पर साईकिल चलाने का विश्वास बढ़ा है| अब बड़ी परीक्षा देनी है- सिंहगढ़! लेकिन तुरन्त सिंहगढ़ पर साईकिल चलाने की हिम्मत नही हुई| उसके पहले और थोड़ा अभ्यास करना चाहता हूँ| और राईडस जारी रही| राष्ट्रीय महामार्ग ४ पर कुछ राईडस की| टनेल के भीतर साईकिल चलाने का आनन्द लिया| टनेल के भीतर की लाईटस बन्द होने के कारण लगभग पूरे अन्धेरे में चलायी! फिर जैसे जैसे टनेल समाप्त होता है, धीरे धीरे रोशनी आ जाती है! सिंहगढ़ के बेस की राईड की| इस राईड के दौरान लगा कि साईकिल की गति अब भी कम है| राईडस का क्रम निरंतर जारी रखना चाहिए|


Thursday, December 17, 2015
दोस्ती साईकिल से १०: एक चमत्कारिक राईड- नर्वस नाइंटी!
दोस्ती साईकिल से १: पहला अर्धशतक
दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . .
दोस्ती साईकिल से ५: सिंहगढ़ राउंड १. . .
दोस्ती साईकिल से ६: ऊँचे नीचे रास्ते और मन्ज़िल तेरी दूर. . .
दोस्ती साईकिल से ७: शहर में साईकिलिंग. . .
दोस्ती साईकिल से ८: सिंहगढ़ राउंड २!
दोस्ती साईकिल से ९: दूसरा शतक. . .
एक चमत्कारिक राईड- नर्वस नाइंटी!
८ फरवरी को दूसरा शतक होने के बाद कुछ दिन विराम आया| छोटी दूरी तक साईकिल चलाने की इच्छा नही हुई| इन दिनों मुझे छोटी पर नियमित राईडस का महत्त्व भी पता नही था| इसलिए विचार बड़ी राईडस का ही करता था| दिनों दिन डे- ड्रिमिंग चलता| शीघ्र ही अगली यात्रा की योजना बन गई| समन्दर का बड़ा आकर्षण मन में है| इसलिए सोच रहा हूँ कि समन्दर के तट तक साईकिल चलाऊँ| पुणे से कोंकण में दिवे आगार तक जाने की योजना बनायी| मेरे घर से करीब १६० किलोमीटर दूरी है| पहले १२१ और ११२ किलोमीटर चलाने के कारण १६० किलोमीटर करने का हौसला है| और इस राईड में मुझे घाट उतर कर कोंकण में जाना है| इसलिए करीब २० किलोमीटर की उतराई भी मिलेगी| इंटरनेट से सारी जानकारी जुटायी और तैयार हुआ|
२३ फरवरी २०१४| इस बार सुबह होने के पहले ५.३० बजे ही बाहर निकला| पहली बार एक इंडिकेटर लाईट का प्रयोग किया| साईकिल पर बोतल लगाने के लिए एक छोटा स्टँड भी लगाया है| सुबह की घनी ठण्ड| थोड़ी ही दूर जाते ही बोतल गिरी| फिर उसे बैग में ही रखा| अन्धेरे में ही राष्ट्रीय राजमार्ग ४ पर साईकिल चलाना शुरू किया| एक इंडिकेटर रखा है और एक टॉर्च जैसा लाईट भी लिया है| लेकिन जल्द ही ये दोनो पर्याप्त नही साबित हुए| करीब डेढ घण्टे तक अन्धेरे में ही साईकिल चलायी| हायवे पर चलाते समय दिक्कत आयी, लेकिन आगे और पीछे के वाहनों की रोशनी भी थी| बारह किलोमीटर बाद हायवे छोडा तब मुश्किल बढी, क्योंकि अब रोशनी बिल्कुल ही कम है| और बीच में तेज़ रफ्तारवाले वाहन अचानक से सामने आ रहे है| उससे आँखें चुन्धिया जा रही है| करीब डेढ घण्टे के बाद धीरे धीरे उजाला होने लगा| तब तक एक पाँचवे ग्रेड की चढाई पार हो गई|



Friday, December 11, 2015
दोस्ती साईकिल से ९: दूसरा शतक. . .
दोस्ती साईकिल से १: पहला अर्धशतक
दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . .
दोस्ती साईकिल से ५: सिंहगढ़ राउंड १. . .
दोस्ती साईकिल से ६: ऊँचे नीचे रास्ते और मन्ज़िल तेरी दूर. . .
दोस्ती साईकिल से ७: शहर में साईकिलिंग. . .
दोस्ती साईकिल से ८: सिंहगढ़ राउंड २!
दूसरा शतक. . .
१६ जनवरी को सिंहगढ़ जाने के बाद साईकिलिंग जारी रखी| १९ जनवरी को पुणे के पास ही चाकण तक साईकिल से गया| और इसी राईड के दौरान जीवन का एक स्वर्णिम क्षण आया- "गूड न्यूज" इसी राईड के बीच पता चली| जीवन का एक नया पर्व शुरू होने जा रहा है! और इस घड़ी में भी साईकिल साथ है| अब अर्धशतक करना एफर्टलेस हो गया है| बाद में चाकण से पुणे लौटते समय एक दूसरे आळंदी- विश्रांतवाडी- पुणे इस रास्ते से गया| शहर के अत्यधिक पास हो कर भी वीरान सड़क मिली| साईकिल पर यात्रा करने से बहुत सी सुन्दर और अन्जान सड़के पता चल रही है| इसी समय साईकिल का पहला सर्विसिंग भी करवा लिया| वैसे साईकिल बड़ी ही सख्त जान है| हजार किलोमीटर से अधिक चलाने के बाद भी उसे कुछ नही हुआ है| खैर
कुछ दिन नियमित रूप से साईकिल चलायी| ज्यादा नही, छोटी पन्द्रह- बीस किलोमीटर की ही राईड करता रहा| लेकिन फिर गैप तो आनेवाला है| थोड़े दिन साईकिल नही चला पाया| अब फिर मन में बड़ी राईड की इच्छा हो रही है| अब लग रहा है कि और एक शतक करना चाहिए| पहला शतक हो कर अरसा हुआ है| अर्धशतक तो बहुत हो गए, उन्हे गिनना भी छोड दिया| लेकिन शतक का अब भी इन्तजार है| इसलिए एक बड़ी राईड की योजना बनायी| और योजना बनाना मन का बड़ा ही पसन्दीदा काम है| डे ड्रिमिंग! योजना बनाते समय का गणित अलग ही होता है| जो योजना बनायी थी, उसे देख कर अब भी हंसी आती है! इतनी साईकिलिंग करने के बाद और साईकिलिंग की गति तथा प्रक्रिया की जानकारी होने के बाद भी एक मूढताभरी योजना बनायी| सोचा की सीधा डबल सेंचुरी करूँगा| पुणे से महाबळेश्वर जा कर वापिस आऊँगा| जाते समय एकसो दस और आते समय एकसो दस किलोमीटर करूँगा| इसमें कंटिन्जन्सी प्लैन यह भी था की लौटते समय थक गया तो बस या जीप से आऊँगा! लेकिन वास्तव में जो हुआ, वह बिल्कुल ही अलग था!



इस राईड की जाते समय की चढाई और उतराई
दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . .
दोस्ती साईकिल से ५: सिंहगढ़ राउंड १. . .
दोस्ती साईकिल से ६: ऊँचे नीचे रास्ते और मन्ज़िल तेरी दूर. . .
दोस्ती साईकिल से ७: शहर में साईकिलिंग. . .
दोस्ती साईकिल से ८: सिंहगढ़ राउंड २!
दूसरा शतक. . .
१६ जनवरी को सिंहगढ़ जाने के बाद साईकिलिंग जारी रखी| १९ जनवरी को पुणे के पास ही चाकण तक साईकिल से गया| और इसी राईड के दौरान जीवन का एक स्वर्णिम क्षण आया- "गूड न्यूज" इसी राईड के बीच पता चली| जीवन का एक नया पर्व शुरू होने जा रहा है! और इस घड़ी में भी साईकिल साथ है| अब अर्धशतक करना एफर्टलेस हो गया है| बाद में चाकण से पुणे लौटते समय एक दूसरे आळंदी- विश्रांतवाडी- पुणे इस रास्ते से गया| शहर के अत्यधिक पास हो कर भी वीरान सड़क मिली| साईकिल पर यात्रा करने से बहुत सी सुन्दर और अन्जान सड़के पता चल रही है| इसी समय साईकिल का पहला सर्विसिंग भी करवा लिया| वैसे साईकिल बड़ी ही सख्त जान है| हजार किलोमीटर से अधिक चलाने के बाद भी उसे कुछ नही हुआ है| खैर
कुछ दिन नियमित रूप से साईकिल चलायी| ज्यादा नही, छोटी पन्द्रह- बीस किलोमीटर की ही राईड करता रहा| लेकिन फिर गैप तो आनेवाला है| थोड़े दिन साईकिल नही चला पाया| अब फिर मन में बड़ी राईड की इच्छा हो रही है| अब लग रहा है कि और एक शतक करना चाहिए| पहला शतक हो कर अरसा हुआ है| अर्धशतक तो बहुत हो गए, उन्हे गिनना भी छोड दिया| लेकिन शतक का अब भी इन्तजार है| इसलिए एक बड़ी राईड की योजना बनायी| और योजना बनाना मन का बड़ा ही पसन्दीदा काम है| डे ड्रिमिंग! योजना बनाते समय का गणित अलग ही होता है| जो योजना बनायी थी, उसे देख कर अब भी हंसी आती है! इतनी साईकिलिंग करने के बाद और साईकिलिंग की गति तथा प्रक्रिया की जानकारी होने के बाद भी एक मूढताभरी योजना बनायी| सोचा की सीधा डबल सेंचुरी करूँगा| पुणे से महाबळेश्वर जा कर वापिस आऊँगा| जाते समय एकसो दस और आते समय एकसो दस किलोमीटर करूँगा| इसमें कंटिन्जन्सी प्लैन यह भी था की लौटते समय थक गया तो बस या जीप से आऊँगा! लेकिन वास्तव में जो हुआ, वह बिल्कुल ही अलग था!



इस राईड की जाते समय की चढाई और उतराई
Thursday, December 3, 2015
दोस्ती साईकिल से ८: सिंहगढ़ राउंड २!
दोस्ती साईकिल से १: पहला अर्धशतक
दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . .
दोस्ती साईकिल से ५: सिंहगढ़ राउंड १. . .
दोस्ती साईकिल से ६: ऊँचे नीचे रास्ते और मन्ज़िल तेरी दूर. . .
दोस्ती साईकिल से ७: शहर में साईकिलिंग. . .
सिंहगढ़ राउंड २!
जनवरी २०१४ में साईकिलिंग जारी रही, लेकिन उसमें सातत्य नही ला पाया| ७ जनवरी को एक छोटी राईड की| साईकिलिंग में गैप आने के बावजूद भी अब हौसला बढ़ गया है| शायद जो योगासन और प्राणायाम कर रहा हूँ (सप्ताह में हर रोज न सही लेकिन कम से कम चार बार) और जो जंप्स लगा रहा हूँ, उससे स्टॅमिना जरूर बढ गया है| अब डिएसके का छोटा क्लाइंब बहुत आसानी से पार कर सकता हूँ| अब फिर एक बार सिंहगढ़ जाने का विचार है| चार माह बाद फिर सिंहगढ़ जाने का विचार इसलिए है कि मै २०१४ के जून- जुलाई में लदाख़ में साईकिल चलाना चाहता हूँ| उसके लिए मै कितना तैयार हूँ और पीछले मुकाबले सिंहगढ़ पर कैसे जा सकता हूँ, यह वही जा कर पता चलेगा|
१६ जनवरी को दिन खुलने से पहले निकल गया| जाड़े के दिन हैं, तो बहुत ठण्ड भी है| इसलिए स्वेटर पहना है| लेकिन दस मिनट साईकिल चलाने के बाद ही पसीना आ गया, तो स्वेटर कैरिअर पर रखना पड़ा| वैसे पसीना भी एक तरह का फिटनेस इंडिकेटर है| जितना स्टॅमिना अच्छा होगा, उतना पसीना देर से आएगा| साँस भी देर से फूलेगी| अगर स्टॅमिना कम हो, तो तीन मंजिल चढने के बाद भी पसीना आ सकता है; लेकिन अगर स्टॅमिना अच्छा और मजबूत हो, तो उतने में पसीना नही आएगा| खैर|


Tuesday, December 1, 2015
दोस्ती साईकिल से ७: शहर में साईकिलिंग
दोस्ती साईकिल से १: पहला अर्धशतक
दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . .
दोस्ती साईकिल से ५: सिंहगढ़ राउंड १. . .
दोस्ती साईकिल से ६: ऊँचे नीचे रास्ते और मन्ज़िल तेरी दूर. . .
शहर में साईकिलिंग
१९ अक्तूबर को ६३ किलोमीटर साईकिल चलायी थी| उसमें बहुत अधिक चलना भी हुआ| बड़ी राईड के बाद अक्सर यह होता है की कभी कभी अगली राईड की इच्छा चली जाती है| बड़ी राईड में शरीर के साथ मन भी थक जाता है| इसलिए तुरन्त कोई बड़ी राईड नही की जा सकी| उसके बाद कुछ दिनों का गैप भी आया| किसी भी काम में यही होता है| जैसे एक्सरसाईझ- हम कुछ दिन नियमित रूप से करते हैं, फिर अचानक लय टूट सी जाती है| कुछ दिनों का गैप आता है| किसी ना किसी वजह से ऐसा हो जाता है|


दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . .
दोस्ती साईकिल से ५: सिंहगढ़ राउंड १. . .
दोस्ती साईकिल से ६: ऊँचे नीचे रास्ते और मन्ज़िल तेरी दूर. . .
शहर में साईकिलिंग
१९ अक्तूबर को ६३ किलोमीटर साईकिल चलायी थी| उसमें बहुत अधिक चलना भी हुआ| बड़ी राईड के बाद अक्सर यह होता है की कभी कभी अगली राईड की इच्छा चली जाती है| बड़ी राईड में शरीर के साथ मन भी थक जाता है| इसलिए तुरन्त कोई बड़ी राईड नही की जा सकी| उसके बाद कुछ दिनों का गैप भी आया| किसी भी काम में यही होता है| जैसे एक्सरसाईझ- हम कुछ दिन नियमित रूप से करते हैं, फिर अचानक लय टूट सी जाती है| कुछ दिनों का गैप आता है| किसी ना किसी वजह से ऐसा हो जाता है|


Friday, November 27, 2015
दोस्ती साईकिल से ६: ऊँचे नीचे रास्ते और मन्ज़िल तेरी दूर. . .
दोस्ती साईकिल से १: पहला अर्धशतक
दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . .
दोस्ती साईकिल से ५: सिंहगढ़ राउंड १. . .
ऊँचे नीचे रास्ते और मन्ज़िल तेरी दूर. . .
सिंहगढ़ से आने के बाद एक दिन तक ऊर्जा बहुत क्षीण हुई| साईकिल को शरीर अभी पूर्ण रूपेण अभ्यस्त न होने के कारण थोड़ा बुखार जैसा भी लगा| उस दिन तो और किसी बड़ी राईड की इच्छा ही मिट गई| पर जल्द ही दूसरी बड़ी राईड की योजना बनायी| सिंहगढ़ पर जाने के चार दिन बाद १९ अक्तूबर २०१३ को अगली राईड के लिए निकला| इस बार भी एक बड़े घाट की योजना बनायी| पुणे से लदाख़ में साईकिलिंग के लिए जानेवाले लोग सिंहगढ़ के साथ पाबे घाट नाम के स्थान पर भी जाते हैं| इसलिए यहाँ जाना तय किया| साथ ही एक किला- तोरणा- देखने का भी विचार है|



दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . .
दोस्ती साईकिल से ५: सिंहगढ़ राउंड १. . .
ऊँचे नीचे रास्ते और मन्ज़िल तेरी दूर. . .
सिंहगढ़ से आने के बाद एक दिन तक ऊर्जा बहुत क्षीण हुई| साईकिल को शरीर अभी पूर्ण रूपेण अभ्यस्त न होने के कारण थोड़ा बुखार जैसा भी लगा| उस दिन तो और किसी बड़ी राईड की इच्छा ही मिट गई| पर जल्द ही दूसरी बड़ी राईड की योजना बनायी| सिंहगढ़ पर जाने के चार दिन बाद १९ अक्तूबर २०१३ को अगली राईड के लिए निकला| इस बार भी एक बड़े घाट की योजना बनायी| पुणे से लदाख़ में साईकिलिंग के लिए जानेवाले लोग सिंहगढ़ के साथ पाबे घाट नाम के स्थान पर भी जाते हैं| इसलिए यहाँ जाना तय किया| साथ ही एक किला- तोरणा- देखने का भी विचार है|



Tuesday, November 24, 2015
दोस्ती साईकिल से ५: सिंहगढ़ राउंड १. . .
दोस्ती साईकिल से १: पहला अर्धशतक
दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . .
सिंहगढ़ राउंड १. . .
एक माह में अच्छी साईकिलिंग होने के बाद अब सिंहगढ़ जाना है| इन दिनों मै जहाँ रहता हूँ- डिएसके विश्व, धायरी, वहाँ से सिंहगढ़ सिर्फ २१ किलोमीटर दूर है| यहाँ से दिखता भी है और बहुत पास लगता है| लेकिन बीच में बहुत बड़ी चढाई है| लगभग नौ किलोमीटर में ६०० मीटर ऊँचाई चढनी है| इसलिए पहले तो जाने की बिल्कुल हिम्मत नही होती थी| वैसे हिम्मत तो अब भी नही हो रही है; लेकिन अब साईकिल के साथ एक दिवानगी सी लग रही है| सिंहगढ़ के पास से जानेवाले रास्तों से कई बार गया| मै सिंहगढ़ को बस देखता रहा| सिंहगढ़ मुझे पुकारता रहा| आज वह दिन आया|
सिंहगढ़! महाराष्ट्र के इतिहास की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण स्थान! सत्रहवी शताब्दि में कितनी वीरता का अविष्कार यहाँ हुआ| छत्रपती शिवाजी द्वारा सिंहगढ़ को मुक्त किया जाना| फिर वह शत्रु के पास जाना और फिर १६७० में शिवाजी महाराज के स्वराज्य में उसका पुनरागमन! उसके लिए किया हुआ वीरतापूर्ण संघर्ष! जितना उसके बारे में सोचता हूँ, हैरान होता हूँ| और सिंहगढ़ की आज की स्थिति का क्या कहें? सिंहगढ़ का इलाका आज गलत कारणों से ही जाना जाता है| होटल, बार और कई अवैध काम वहाँ होते हैं| खैर| लेकिन इन सब के बावजूद आज सिंहगढ़ ट्रेकर्स और इतिहास प्रेमियों का तीर्थ स्थान है और आगे भी रहेगा|



दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . .
सिंहगढ़ राउंड १. . .
एक माह में अच्छी साईकिलिंग होने के बाद अब सिंहगढ़ जाना है| इन दिनों मै जहाँ रहता हूँ- डिएसके विश्व, धायरी, वहाँ से सिंहगढ़ सिर्फ २१ किलोमीटर दूर है| यहाँ से दिखता भी है और बहुत पास लगता है| लेकिन बीच में बहुत बड़ी चढाई है| लगभग नौ किलोमीटर में ६०० मीटर ऊँचाई चढनी है| इसलिए पहले तो जाने की बिल्कुल हिम्मत नही होती थी| वैसे हिम्मत तो अब भी नही हो रही है; लेकिन अब साईकिल के साथ एक दिवानगी सी लग रही है| सिंहगढ़ के पास से जानेवाले रास्तों से कई बार गया| मै सिंहगढ़ को बस देखता रहा| सिंहगढ़ मुझे पुकारता रहा| आज वह दिन आया|
सिंहगढ़! महाराष्ट्र के इतिहास की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण स्थान! सत्रहवी शताब्दि में कितनी वीरता का अविष्कार यहाँ हुआ| छत्रपती शिवाजी द्वारा सिंहगढ़ को मुक्त किया जाना| फिर वह शत्रु के पास जाना और फिर १६७० में शिवाजी महाराज के स्वराज्य में उसका पुनरागमन! उसके लिए किया हुआ वीरतापूर्ण संघर्ष! जितना उसके बारे में सोचता हूँ, हैरान होता हूँ| और सिंहगढ़ की आज की स्थिति का क्या कहें? सिंहगढ़ का इलाका आज गलत कारणों से ही जाना जाता है| होटल, बार और कई अवैध काम वहाँ होते हैं| खैर| लेकिन इन सब के बावजूद आज सिंहगढ़ ट्रेकर्स और इतिहास प्रेमियों का तीर्थ स्थान है और आगे भी रहेगा|



Monday, November 23, 2015
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नजदिकीयाँ बन गई. . .
दोस्ती साईकिल से १: पहला अर्धशतक
दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दूरियाँ नजदिकीयाँ बन गई. . .


Thursday, November 19, 2015
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
नदी के साथ साईकिल सफर



सितम्बर के पहले हप्ते में शतक करने के बाद कुछ दिन अन्तराल आया| इन दिनों पुणे में अधिक रहना होता था| इसलिए २० सितम्बर २०१३ को साईकिल पुणे में मंगा ली| यह साईकिल की पहली बस यात्रा रही! बिना कुछ हुए साईकिल पहुँच गई| फिर उस बस अड्डे से साईकिल को पुणे के फ्लॅट तक १७ किलोमीटर ले गया| बड़े शहर में साईकिल चलाने का थोड़ा डर जरूर था, लेकिन कोई कठिनाई नही आयी| सिर्फ एक दिक्कत आयी कि सुबह ११ बजे की धूप में डिहायड्रेशन हुआ| चलते समय एक बार रूका और अचानक बड़ी थकान महसूस हुई| थोड़ी देर विश्राम करना पड़ा| ऐसा लगा मानो थकान के कारण होश खोने के कगार पर था| लेकिन सही समय पर विश्राम करने के कारण और पानी पीने के कारण राहत मिली| ऐसा अनुभव पहले भी आया था जब चौथे मंजिल पर बहुत सा सामान रखने के लिए उपर- नीचे चला था| शायद शरीर में ऊर्जा की खपत एकदम से बढ़ने के कारण और पानी कम होने के कारण ऐसा हुआ हो| खैर|
पुणे में जहाँ उस समय रहता था, वह डिएसके विश्व एक छोटी चढाई पर स्थित है| साईकिल लाते समय पहली बार वह चढाई पर गया| वैसे तो है छोटी ही; एक किलोमीटर का चढाईभरा रास्ता और बस सबसे छोटा ५ वे ग्रेड का घाट| लेकिन वह भी नही चढ पाया| जैसे ही चढाई शुरू हुई, थोड़ी ही देर में पैदल जाने की नौबत आयी| इतना ही नही, पैदल जाते समय रूकना भी पड़ा! अब पुणे के पास की पहाडी सडकों पर क्या हाल होनेवाला है, यह भी पता चला|
सत्रह किलोमीटर चलाने के बाद अगले दिन २१ सितम्बर को पास के खडकवासला डॅम पर गया| एन.डी.ए. के पास यह डॅम है| यह राईड अच्छी रही| चौदह किलोमीटर साईकिल चलायी| चढाई को देखते हुए डेढ घण्टा जरूर लगा, लेकिन नजारा अच्छा था| वापस घर आते समय वह डिएसके की चढाई पैदल ही चढनी पड़ी| और उसी में इतना थक जाता था कि दोपहर या शाम को वापिस नीचे जाने की इच्छा भी नही होती थी|
अगले दिन २२ सितम्बर को बड़ी राईड करने की सोची| डिएसके विश्व से छब्बीस किलोमीटर दूर वाकड तक| यह यात्रा राष्ट्रीय राजमार्ग ४ से की| इस पर भी चढाई का रास्ता है और छोटे क्लाइंब भी है| लेकिन ये यात्रा बिना पैदल चले पूरी की| जाकर और आकर कुल बावन किलोमीटर हुए| लगभग चार घण्टे लगे| लेकिन अच्छा विश्वास भी आया| लगातार तीसरे दिन साईकिल चलाने से शरीर भी थोड़ा अभ्यस्त हो गया| और चढाईवाले रास्तों पर भी इतना चला सकता हूँ, इससे खुशी हुई| लेकिन थकान के कारण फिर तुरन्त बड़ी राईड करने की इच्छा नही हुई| यह अनुभव बार बार आता रहा| एक बड़ी राईड करो की अगली राईड करने की इच्छा अधमरी सी हो जाती| लेकिन फिर एक- दो दिनों में इच्छा फिर मन में आती है| २३ सितम्बर को पास ही राष्ट्रीय राजमार्ग पर छोटी राईड की| यहा एक रिजरवॉईर है| छोटा तालाब| मज़ा आया| लगातार चार दिन साईकिल चलाना हुआ| इसका फायदा भी मिला| अब डिएसके की चढाई आधी साईकिल पर चला पा रहा हूँ| लेकिन बाद में पैदल ही जाना पड़ता है|
एक दिन विश्राम किया और अगले दिन बड़ी राईड करने का प्लॅन बनाया| स्वयं का प्रायवेट प्रोफेशन होने के कारण यह सम्भव हुआ| २५ सितम्बर को सुबह निकला| आज एक डॅम की तरफ ही जाना है| और उसके साथ कई छोटी चढाईयाँ और पहाड़ी सडकों पर जाना है| सुबह खडकवासला डॅम के पास अच्छा कोहरा मिला| वहाँ मिलिटरी के कई युनिटसभी है| परिसर रमणीय है| यहाँ प्रगाढ़ शान्ति मिली| यहाँ से बेहद सुन्दर नजारे शुरू हुए| सड़क भी सुनसान होती गई|
अब रास्ता मुठा नदी के साथ ही आगे बढ रहा है| पास ही सिंहगढ़ दिखाई दे रहा है! सिंहगढ़! यह एक बहुत बढ़िया घाट सड़क है| वहाँ जाने का मन तो करता है; लेकिन उसके लिए पहले पात्र बनना होगा! साईकिल लेने का एक कारण लदाख़ में साईकिल चलाना भी है और पुणे से लदाख़ में साईकिल चलाने के लिए जानेवाले सिंहगढ़ पर ही प्रॅक्टिस करते हैं और कहते हैं कि सिंहगढ़ की चढाई डेढ घण्टे में पूरी करना लदाख़ में साईकिल चलाने का 'क्वालिफिकेशन' है! पर सिंहगढ़ तो दूर; उससे छह गुणा छोटी डिएसके विश्व की चढाई भी मुझसे नही चढ़ी जा रही है| इसलिए पहले अपनी हैसियत बनानी पड़ेगी. . .

बादलों से घिरा सिंहगढ़. .

एक गाँव पार करने के बाद थोड़ी लम्बी चढाई आयी| उसने काफी तकलीफ दी| मुश्किल से सबसे नीचले गेअर पर उसे पार कर पाया| योगोदा आश्रम के पास से सड़क गुजरी| गति कम ही है; लेकिन चलाने में कोई कठिनाई नही आ रही है| चढाई पर जरूर वक्त लग रहा है| पानशेत डॅम के पास पहुँचने में लगभग तीन घण्टे लगे| दूरी है लगभग ३२ किलोमीटर| थकान जरूर लग रही है; लेकिन और आगे जाने की इच्छा है| पानशेत डॅम में अच्छा पानी है| बरसाती सीजन के कारण और भी मजा आ रहा है| थोड़ी देर रूक के पानशेत डॅम से आगे दूसरे रास्ते की ओर बढ़ा| अब दूसरी सड़क से वापस लौटूँगा|





इस सड़क पर बी.एस.एफ. का एक युनिट भी है| आगे एक पहाड़ पर नीलकण्ठेश्वर महादेव मन्दीर देखना है| एक ब्लॉग पर उसके बारे में पढ़ा था| यह सड़क भी शानदार और सुनसान है| यहाँ की सड़कें किसी बड़े रोड़ से जुड़ी नही है; इसलिए सुनसान हैं| वह मन्दीर एक चोटी पर स्थित है| चढाई बड़ी ही है; इसलिए साईकिल नीचे एक गाँव में खड़ी की और पैदल चल पड़ा| यह तीन किलोमीटर की चढाई भी अच्छी खासी निकली| यहाँ पर जीप और बाईक आती हैं| लेकिन सड़क कच्ची ही है| और पार्किंग के उपर भी कच्ची सड़क जाती है| जैसे जैसे मन्दीर पास आता गया नीचे का नजारा और रमणीय होता गया| अब वही डॅम बहुत उपर से दिखाई दे रहा है| मन्दीर में पहुँचते समय उतरने के बारे में कुछ डर लगने लगा| क्योंकि सड़क कच्ची थी| उसमें पैर फिसलने का डर है!









मन्दीर में कोई भी नही दिखाई दे रहा है| लेकिन इस मन्दीर में काफी पुतलें बने है| मन्दीर घूमते घूमते अचानक आवाज सुनाई दी| एकदम से चौंक गया| लेकिन तब देखा की अन्दर तो कई लोग हैं| फिर थोड़ा सुकून मिला| अब उतरते समय किसी के साथ ही उतरूँगा| दोपहर का एक बज रहा है| इसलिए अधिक समय न गंवाते हुए निकला| दो सज्जन साथ मिले| पैर बिना फिसले उतर गया| मेरा पैदल पगडण्डी के रास्ते पर ट्रेकिंग का अनुभव न के बराबर है| उतरते समय एक मरा हुआ साँप देखा| अब जल्द से जल्द निकलना है| अभी काफी दूरी पार करनी है|
अपेक्षाकृत आगे की यात्रा कठिन होती गई| बीच में रास्ता भी पूछना पड़ा| यह सड़क अब खडकवासला डॅम के उस तरफ से जा रही है| एक अर्थ में इस डॅम की परिक्रमा हो जाएगी! बीच बीच में विश्राम जरूर करना पड़ा| लेकिन बहुत ज्यादा तकलीफ नही हुई| शाम के पहले डिएसके विश्व में पहूँच गया| छह किलोमीटर पैदल और ६६ किलोमीटर साईकिलिंग के साथ यह और एक अर्धशतक पूरा हुआ| इसका रूट यहाँ पर देखा जा सकता है| लेकिन उस समय अर्धशतक के एहसास के बजाय थकान का ही अहसास है| आखरी चरण में तो एक डेस्परेशन आता है कि कब घर पहूँचता हूँ| और इतनी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा खर्च हो जाती है कि अगले राईड के बारे में कुछ भी सोचना सम्भव नही होता है! खैर| संयोग से चार ही दिन बाद फिर पानशेत जाना हुआ| इस बार दो मित्रों के साथ पहली ग्रूप राईड की| उसका भी अलग मज़ा आया| अब अच्छा विश्वास बढ़ने लगा है|


अगला भाग: ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गई. . .


सितम्बर के पहले हप्ते में शतक करने के बाद कुछ दिन अन्तराल आया| इन दिनों पुणे में अधिक रहना होता था| इसलिए २० सितम्बर २०१३ को साईकिल पुणे में मंगा ली| यह साईकिल की पहली बस यात्रा रही! बिना कुछ हुए साईकिल पहुँच गई| फिर उस बस अड्डे से साईकिल को पुणे के फ्लॅट तक १७ किलोमीटर ले गया| बड़े शहर में साईकिल चलाने का थोड़ा डर जरूर था, लेकिन कोई कठिनाई नही आयी| सिर्फ एक दिक्कत आयी कि सुबह ११ बजे की धूप में डिहायड्रेशन हुआ| चलते समय एक बार रूका और अचानक बड़ी थकान महसूस हुई| थोड़ी देर विश्राम करना पड़ा| ऐसा लगा मानो थकान के कारण होश खोने के कगार पर था| लेकिन सही समय पर विश्राम करने के कारण और पानी पीने के कारण राहत मिली| ऐसा अनुभव पहले भी आया था जब चौथे मंजिल पर बहुत सा सामान रखने के लिए उपर- नीचे चला था| शायद शरीर में ऊर्जा की खपत एकदम से बढ़ने के कारण और पानी कम होने के कारण ऐसा हुआ हो| खैर|
पुणे में जहाँ उस समय रहता था, वह डिएसके विश्व एक छोटी चढाई पर स्थित है| साईकिल लाते समय पहली बार वह चढाई पर गया| वैसे तो है छोटी ही; एक किलोमीटर का चढाईभरा रास्ता और बस सबसे छोटा ५ वे ग्रेड का घाट| लेकिन वह भी नही चढ पाया| जैसे ही चढाई शुरू हुई, थोड़ी ही देर में पैदल जाने की नौबत आयी| इतना ही नही, पैदल जाते समय रूकना भी पड़ा! अब पुणे के पास की पहाडी सडकों पर क्या हाल होनेवाला है, यह भी पता चला|
सत्रह किलोमीटर चलाने के बाद अगले दिन २१ सितम्बर को पास के खडकवासला डॅम पर गया| एन.डी.ए. के पास यह डॅम है| यह राईड अच्छी रही| चौदह किलोमीटर साईकिल चलायी| चढाई को देखते हुए डेढ घण्टा जरूर लगा, लेकिन नजारा अच्छा था| वापस घर आते समय वह डिएसके की चढाई पैदल ही चढनी पड़ी| और उसी में इतना थक जाता था कि दोपहर या शाम को वापिस नीचे जाने की इच्छा भी नही होती थी|
अगले दिन २२ सितम्बर को बड़ी राईड करने की सोची| डिएसके विश्व से छब्बीस किलोमीटर दूर वाकड तक| यह यात्रा राष्ट्रीय राजमार्ग ४ से की| इस पर भी चढाई का रास्ता है और छोटे क्लाइंब भी है| लेकिन ये यात्रा बिना पैदल चले पूरी की| जाकर और आकर कुल बावन किलोमीटर हुए| लगभग चार घण्टे लगे| लेकिन अच्छा विश्वास भी आया| लगातार तीसरे दिन साईकिल चलाने से शरीर भी थोड़ा अभ्यस्त हो गया| और चढाईवाले रास्तों पर भी इतना चला सकता हूँ, इससे खुशी हुई| लेकिन थकान के कारण फिर तुरन्त बड़ी राईड करने की इच्छा नही हुई| यह अनुभव बार बार आता रहा| एक बड़ी राईड करो की अगली राईड करने की इच्छा अधमरी सी हो जाती| लेकिन फिर एक- दो दिनों में इच्छा फिर मन में आती है| २३ सितम्बर को पास ही राष्ट्रीय राजमार्ग पर छोटी राईड की| यहा एक रिजरवॉईर है| छोटा तालाब| मज़ा आया| लगातार चार दिन साईकिल चलाना हुआ| इसका फायदा भी मिला| अब डिएसके की चढाई आधी साईकिल पर चला पा रहा हूँ| लेकिन बाद में पैदल ही जाना पड़ता है|
एक दिन विश्राम किया और अगले दिन बड़ी राईड करने का प्लॅन बनाया| स्वयं का प्रायवेट प्रोफेशन होने के कारण यह सम्भव हुआ| २५ सितम्बर को सुबह निकला| आज एक डॅम की तरफ ही जाना है| और उसके साथ कई छोटी चढाईयाँ और पहाड़ी सडकों पर जाना है| सुबह खडकवासला डॅम के पास अच्छा कोहरा मिला| वहाँ मिलिटरी के कई युनिटसभी है| परिसर रमणीय है| यहाँ प्रगाढ़ शान्ति मिली| यहाँ से बेहद सुन्दर नजारे शुरू हुए| सड़क भी सुनसान होती गई|
अब रास्ता मुठा नदी के साथ ही आगे बढ रहा है| पास ही सिंहगढ़ दिखाई दे रहा है! सिंहगढ़! यह एक बहुत बढ़िया घाट सड़क है| वहाँ जाने का मन तो करता है; लेकिन उसके लिए पहले पात्र बनना होगा! साईकिल लेने का एक कारण लदाख़ में साईकिल चलाना भी है और पुणे से लदाख़ में साईकिल चलाने के लिए जानेवाले सिंहगढ़ पर ही प्रॅक्टिस करते हैं और कहते हैं कि सिंहगढ़ की चढाई डेढ घण्टे में पूरी करना लदाख़ में साईकिल चलाने का 'क्वालिफिकेशन' है! पर सिंहगढ़ तो दूर; उससे छह गुणा छोटी डिएसके विश्व की चढाई भी मुझसे नही चढ़ी जा रही है| इसलिए पहले अपनी हैसियत बनानी पड़ेगी. . .

बादलों से घिरा सिंहगढ़. .

एक गाँव पार करने के बाद थोड़ी लम्बी चढाई आयी| उसने काफी तकलीफ दी| मुश्किल से सबसे नीचले गेअर पर उसे पार कर पाया| योगोदा आश्रम के पास से सड़क गुजरी| गति कम ही है; लेकिन चलाने में कोई कठिनाई नही आ रही है| चढाई पर जरूर वक्त लग रहा है| पानशेत डॅम के पास पहुँचने में लगभग तीन घण्टे लगे| दूरी है लगभग ३२ किलोमीटर| थकान जरूर लग रही है; लेकिन और आगे जाने की इच्छा है| पानशेत डॅम में अच्छा पानी है| बरसाती सीजन के कारण और भी मजा आ रहा है| थोड़ी देर रूक के पानशेत डॅम से आगे दूसरे रास्ते की ओर बढ़ा| अब दूसरी सड़क से वापस लौटूँगा|



इस सड़क पर बी.एस.एफ. का एक युनिट भी है| आगे एक पहाड़ पर नीलकण्ठेश्वर महादेव मन्दीर देखना है| एक ब्लॉग पर उसके बारे में पढ़ा था| यह सड़क भी शानदार और सुनसान है| यहाँ की सड़कें किसी बड़े रोड़ से जुड़ी नही है; इसलिए सुनसान हैं| वह मन्दीर एक चोटी पर स्थित है| चढाई बड़ी ही है; इसलिए साईकिल नीचे एक गाँव में खड़ी की और पैदल चल पड़ा| यह तीन किलोमीटर की चढाई भी अच्छी खासी निकली| यहाँ पर जीप और बाईक आती हैं| लेकिन सड़क कच्ची ही है| और पार्किंग के उपर भी कच्ची सड़क जाती है| जैसे जैसे मन्दीर पास आता गया नीचे का नजारा और रमणीय होता गया| अब वही डॅम बहुत उपर से दिखाई दे रहा है| मन्दीर में पहुँचते समय उतरने के बारे में कुछ डर लगने लगा| क्योंकि सड़क कच्ची थी| उसमें पैर फिसलने का डर है!









मन्दीर में कोई भी नही दिखाई दे रहा है| लेकिन इस मन्दीर में काफी पुतलें बने है| मन्दीर घूमते घूमते अचानक आवाज सुनाई दी| एकदम से चौंक गया| लेकिन तब देखा की अन्दर तो कई लोग हैं| फिर थोड़ा सुकून मिला| अब उतरते समय किसी के साथ ही उतरूँगा| दोपहर का एक बज रहा है| इसलिए अधिक समय न गंवाते हुए निकला| दो सज्जन साथ मिले| पैर बिना फिसले उतर गया| मेरा पैदल पगडण्डी के रास्ते पर ट्रेकिंग का अनुभव न के बराबर है| उतरते समय एक मरा हुआ साँप देखा| अब जल्द से जल्द निकलना है| अभी काफी दूरी पार करनी है|
अपेक्षाकृत आगे की यात्रा कठिन होती गई| बीच में रास्ता भी पूछना पड़ा| यह सड़क अब खडकवासला डॅम के उस तरफ से जा रही है| एक अर्थ में इस डॅम की परिक्रमा हो जाएगी! बीच बीच में विश्राम जरूर करना पड़ा| लेकिन बहुत ज्यादा तकलीफ नही हुई| शाम के पहले डिएसके विश्व में पहूँच गया| छह किलोमीटर पैदल और ६६ किलोमीटर साईकिलिंग के साथ यह और एक अर्धशतक पूरा हुआ| इसका रूट यहाँ पर देखा जा सकता है| लेकिन उस समय अर्धशतक के एहसास के बजाय थकान का ही अहसास है| आखरी चरण में तो एक डेस्परेशन आता है कि कब घर पहूँचता हूँ| और इतनी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा खर्च हो जाती है कि अगले राईड के बारे में कुछ भी सोचना सम्भव नही होता है! खैर| संयोग से चार ही दिन बाद फिर पानशेत जाना हुआ| इस बार दो मित्रों के साथ पहली ग्रूप राईड की| उसका भी अलग मज़ा आया| अब अच्छा विश्वास बढ़ने लगा है|

अगला भाग: ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गई. . .
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