Monday, April 4, 2016

दोस्ती साईकिल से २५: आँठवा शतक


दोस्ती साईकिल से १: पहला अर्धशतक
दोस्ती साईकिल से २: पहला शतक
दोस्ती साईकिल से ३: नदी के साथ साईकिल सफर
दोस्ती साईकिल से ४: दूरियाँ नज़दिकीयाँ बन गईं. . . 
दोस्ती साईकिल से ५: सिंहगढ़ राउंड १. . . 
दोस्ती साईकिल से ६: ऊँचे नीचे रास्ते और मन्ज़िल तेरी दूर. . . 
दोस्ती साईकिल से ७: शहर में साईकिलिंग. . . 
दोस्ती साईकिल से ८: सिंहगढ़ राउंड २! 
दोस्ती साईकिल से ९: दूसरा शतक. . . 
दोस्ती साईकिल से १०: एक चमत्कारिक राईड- नर्वस नाइंटी!  
दोस्ती साईकिल से ११: नई सड़कों पर साईकिल यात्रा!  
दोस्ती साईकिल से १२: तिसरा शतक- जीएमआरटी राईड 
दोस्ती साईकिल से १३: ग्रामीण सड़कों पर साईकिल राईड
दोस्ती साईकिल से: १४ "नई साईकिल" से नई शुरुआत
दोस्ती साईकिल से: १५: औंढा नागनाथ के साथ चौथा शतक
दोस्ती साईकिल से: १६: पाँचवा शतक- लोअर दुधना डैम
दोस्ती साईकिल से: १७: एक ड्रीम माउंटेन राईड- साक्री से नन्दुरबार
दोस्ती साईकिल से: १८: तोरणमाळ हिल स्टेशन पर साईकिल ट्रेक!
दोस्ती साईकिल से: १९: हौसला बढ़ानेवाली राईडस!
दोस्ती साईकिल से: २०: इंज्युरी के बाद की राईडस
दोस्ती साईकिल से: २१: चढाई पर साईकिल चलाने का आनन्द
दोस्ती साईकिल से: २२: सिंहगढ़ राउंड ३ सिंहगढ़ पर फतह!
दोस्ती साईकिल से: २३: नई हैं मन्जिलें. . नए है रास्ते नया नया सफर है तेरे वास्ते. . .
दोस्ती साईकिल से: २४: अप्रैल की गरमी में १४८ किलोमीटर



आँठवा शतक

११ अप्रैल २०१५ को १४८ किलोमीटर साईकिल चलायी और उसके बाद लिफ्ट ले कर औरंगाबाद पहुँच गया| वैसे यहाँ से और आगे साईकिल पर जाने का विचार था| पर कल की थकान के बाद वह छोडना पड़ा| अगले दिन जल्दी उठ कर औरंगाबाद के पास के हिल्स पर जाने की इच्छा थी| पर सुबह जल्दी न उठने के कारण वह नही हो पाया| बड़े लक्ष्य का पीछा करते समय ऐसी छोटी छोटी गलतियाँ भी महंगी होती है| सातत्य का अपना महत्त्व होता है| अगर 'यहाँ' आलस करूँगा, तो 'वहाँ' कीमत चुकानी होगी. . . खैर| औरंगाबाद में एक साईकिल मॉल में गया| यहाँ काफी एक्सेसरीज थी| लेकिन उतनी ही महंगी| साईकिलिंग के सम्बन्ध में आजकल कुछ लोग बहुत पैसे खर्च भी करते हैं| पचास हजार की साईकिल और तीन- चार हजार की एक्सेसरीज आम बात है. .





साईकिल के तकनिकी पहलूओं को धीरे धीरे सीख रहा हूँ| यह भी उतना ही‌ आवश्यक है| क्यों कि लदाख़ जैसे प्रदेश में सोलो साईकिल चलानेवाले को आल राउंडर होना पड़ता है- चलानेवाला वही, पंक्चर करनेवाला वही, मेकेनिक वही और डाक्टर भी वही! इसलिए सब तरह से तैयारी कर रहा हूँ| और उसी लिए इतनी धूप में भी साईकिल चला रहा हूँ| और कई बार खराब सड़कों पर भी चला रहा हूँ| ऐसे में और एक बड़ी राईड के लिए निकला| परभणी- जिंतूर- सिद्धेश्वर डैम- औंढा कार्नर- झिरो फाटा- परभणी ऐसा रूट लिया| पहले तो अन्दरूनी सड़कों से जानेवाला था, लेकिन उतना हौसला नही हुआ और उतनी सटीक जानकारी भी नही मिली|




एक बोरे में साईकिल का मुख्य हिस्सा!

जिन्तूर तक पहले भी गया हूँ| सुबह जल्दी निकलने के बाद जिन्तूर में नाश्ता किया| भीषण गर्मी है, इसलिए ओआरएस लगातार ले रहा हूँ| लेकिन उसके विशिष्ट स्वाद से धीरे धीरे ऊब आती है| इसलिए एक बोतल सादे पानी की भी रखी है| जिन्तूर के बाद पेट में तकलीफ होनी लगी और लूज मोशन की तकलीफ भी हुई| पेट्रोल पंप बड़ा काम आया! और अधिक ओआरएस लिया और आगे बढ़ा| जिन्तूर- औंढा जानेवाली यह सड़क बहुत देखी नही है| इसमें छोटी मोटी‌ चढाई है| आगे इस सड़क से थोड़ी दूरी पर सिद्धेश्वर डैम आता है| उस सड़क की पूछताछ करनी पड़ी| स्थानीय लोग अक्सर सही जानकारी नही दे पाते हैं| हमारे देश में कौनसी जगह कहाँ है यह वैज्ञानिक तरीके से बताना बहुत मुश्किल है! खैर!

आगे बढ़ता गया| दोपहर की गर्मी बहुत है| जल्द ही डैम के पास गया| यहाँ बहुत बच्चे पीछे लगे| एक- दो बच्चों ने साईकिल भी चलायी| साईकिल चलाते समय वाकई बच्चों का बहुत साथ मिलता है| उनकी प्रतिक्रियाएँ और उनके चेहरे देखने लायक होते हैं! अब अच्छी खासी थकान हो रही है| साईकिल चलाना धीरे धीरे कठिन हो रहा है| औंढा कार्नर पर एक होटल में अच्छा खाना खाया| राईड शुरू कर सात घण्टे हुए हैं और ९० किलोमीटर पूरे हो गए हैं| इसके बाद का चरण कठिन जाएगा| हालाकी सड़क पर यातायात बहुत कम होने के कारण चलाने में सुकून मिल रहा है|



डैम तक की सड़क मैप में नही है

थोड़ी देर बाद ऐसी नौबत आयी कि कुछ देर एक जगह पर थोड़ी देर विश्राम किया| कुछ देर शवासन किया और छाँव का आनन्द लिया और आगे बढ़ा| धीरे धीरे घर पास आ रहा है| झिरो फाटा पर नाश्ता किया| अब सिर्फ बीस किलोमीटर बचे हैं| लेकिन आगे निकलते ही पंक्चर हुआ! पहले तो हवा भर कर आगे बढ़ा| लेकिन पंक्चर ही है| इतनी गर्मी और थकी माँदी हालत में उसे ठीक करना होगा! लेकिन यही तो असली तैयारी होगी| पंक्चर निकाला| हाथों में बिल्कुल सफाई नही है, जैसे टूटी फूटी भाषा बोल रहा हूँ| जैसे तैसे पंक्चर बन गया और आगे बढ़ा| लेकिन. . . थोड़ी ही देर में वही हालत| अब घर मुश्कील से आठ किलोमीटर दूर है| लेकिन अब इतना थक गया हूँ कि कुछ सुझ नही रहा है| पंक्चर निकालने का प्रयास किया| लेकिन नही बन पाया| हवा उतर रही है| वैसे तो हवा भर कर भी जा सकता था- हर तीन- चार किलोमीटर के बाद हवा भरनी होगी- लेकिन उतना सोच नही पाया और सीधा लिफ्ट ले कर चल गया| इतनी बड़ी राईड करने के बाद आखरी आंठ किलोमीटर के लिए लिफ्ट लेनी पड़ी| कुल १३५ किलोमीटर हो गए- यह आंठवा शतक रहा| लेकिन समय भी बहुत लगा| सुबह छह बजे निकला, अब शाम के पाँच बज रहे हैं| लेकिन असली राईड में आनेवाले अनुभव की झलकी जरूर मिली| इस राईट के फोटो मिस हो गए हैं, इसलिए फोटो देने में असमर्थ हूँ|



अगला भाग २६: २०१५ की लदाख़ साईकिल यात्रा की तैयारी

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (05-04-2016) को "जय बोल, कुण्डा खोल" (चर्चा अंक-2303) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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