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Friday, October 11, 2013

चेतावनी प्रकृति की: ११ (अन्तिम)


. . . ८ अगस्त! 'मैत्री' तथा 'अर्पण' संस्थाओं की इस टीम का यह अंतिम दिन है| सहायता कार्य आगे भी जारी रहेगा| पर यह चरण अब समाप्त होगा| वैसे आगे की योजना भी तैयार हो रही है| महिला डॉक्टरों की टीम को लाने का प्रयास किया जा रहा है| आगे अब कई अन्य पहलूओं‌ पर काम करना है| अब आपत्ति प्रबन्धन के आरम्भिक चरण समाप्त होने पर दीर्घकालीन कार्य पर अधिक जोर दिया जाएगा| और अन्य भी‌ कुछ क्षेत्रों‌ में‌ असेसमेंट किया जा सकता है|
. . . जैसे ही‌ कार्य का अंतिम दिन आया और वह भी सबसे बड़ा दिन; तो हर एक को हल्के तनाव का अनुभव होने लगा| आखिर कर इतने बड़े पैमाने पर सामान को गाँवों में‌ ले जा कर बाँटना आसान काम तो नही होता है| और सड़क भी‌ चिंता का ही विषय है| पर अब पूरी टीम इकठ्ठा हो गई है|अर्पण के भी सभी सदस्य आ गए हैं| अन्य भी‌ साथी साथ है| सामान उठाने के लिए कुछ लोग भी ले लिए गए हैं| इससे इतनी परेशानी तो नही‌ आनी चाहिए| हाँ, कुछ ग्रामीण जरूर उत्तेजित हैं; भीड भी करेंगे| पर ऐसी स्थिति को सम्हालने का अनुभव भी तो टीम के पास है!
सुबह बहुत जल्दी निकले| स्टोअर पर सब इन्तजाम किया हुआ है| ऐसे स्थिति में अक्सर जो होता है, वह भी हुआ| कुछ लोग अधिक चिंतित होते हैं; कुछ पीछे रह जाते हैं| कहिं कुछ क्षणिक तनाव होता है| यह सामान्य बातें‌ हैं और किसी भी टीम में देखी जा सकती हैं| अचानक से तेज़ बारीश होने लगी|रास्ते पर भी कोहरा छा गया|लेकिन अब रूकने का समय नही है| हालांकि जौलजिबी पूल पर कुछ समय रुकना पड़ा| क्योंकि आगे एक जगह रास्ता बन्द है, ऐसी सूचना मिली| रात में‌ तेज बरसात हुईं है| जरूर पहाड़ से आनेवाले झरनों का बहाव बढा होगा| इसी वजह से आगे रास्ते पर तेज पानी गुजर रहा है| थोडी देर रुकने के बाद आगे निकले|
अब रास्ता बिलकुल जाना पहचाना हुआ है| फिर भी लग रहा है कि नदी में अधिक पानी है| उपर पहाड़ में तेज बरसात हुईं है| बीच बीच में रुकना पड़ रहा है| बरम के पहले एक जगह पानी का काफी बड़ा प्रपात रास्ते पर दिखाई पड़ा| इतना तेज पानी है कि टेम्पो उसमें से सामान के साथ नही जा पा रहे हैं| जीप बड़ी मुश्किल से उसमें से पार हो गईं| हालां कि बाकी लोग चल कर उसके पास ही बनी एक छोटीसी पैदल पुलिया से पार हो गए| लेकिन जीप को पार होते देख कर भी डर लग रहा था|उसके बाद वहाँ के अधिकारियों ने कुछ समय के लिए वाहनों को रोक दिया| जे.सी.बी. रास्ते के पत्थर हटा कर पानी के बहाव का मार्ग साफ कर रहा है| फिर भी काफी समय लगेगा| एक साहसी मोटरसाईकिलवाले ने उस प्रपात में गाड़ी डालने का जोखिम उठाया| आधे रास्ते तक आ कर उसे लौट जाना पड़ा| पानी का बहाव वाकई इतना तेज है कि वह बड़े बड़े पत्थरों‌ को भी उठा ले जा रहा है|जे.सी.बी. चलानेवाले का धैर्य तारीफ़ के क़ाबिल है! वहीं काफी देर तक रुकना पड़ा| काम चलता रहा; पानी का बहाव कम होता नजर नही आ रहा है| लेकिन जे.सी.बी. चलानेवालेने उस बहाव को चौडा किया; जिससे उसका बल थोड़ा फैल गया| अब शायद वह वाहनों‌ को इतना फैंक नही सकेगा| फिर एक एक कर वाहन शुरू हुए|आखिर कर हमारे टेम्पो और मिनि ट्रक भी पार आ गए . . .
अब तक कालिका पुलिया के पास हुड़की, घरूड़ी और मनकोट गाँवों के लोग इकठ्ठा हुए हैं| और भीड अक्सर अनियंत्रित होती है| वहाँ‌ पहुँचने पर एक स्थान पर टेम्पो और ट्रक रोक कर पास ही दूसरे स्थान पर टेबल लगाया| वहाँ पर लोग अपने कूपन दिखाने लगे| तब तक टेम्पो और ट्रक में से हर परिवार के लिए पॅकेट बनाना चालू‌ हुआ| जल्द ही यह व्यवस्था बन गईं|एक के बाद एक परिवार आने लगे| आरम्भिक हड़बड़ाहट के पश्चात् सब ठीक होने लगा| एक चिंता यह है, कि कुछ और सामग्री का एक टेम्पो पीछे है, उसे आना अभी बाकी है| और रास्ते में रुकावट बढ सकती है| लेकिन अभी सामग्री पर्याप्त है| इसलिए यहाँ पर दिक्कत नही आएगी| एक बार वितरण कार्य शुरू होने पर हर एक सदस्य ने अपना अपना मोर्चा सम्हाल लिया| कोई ट्रक में से गठरियां नीचे दे रहा है; कोई टेबल पर कूपन्स देख कर लोगों‌ को आगे भेज रहा है| कोई लोग एक ही बार सामान ले रहे हैं, इस पर ध्यान दिए हुए है| कोई भीड को नियंत्रित कर रहा है| जल्द ही सामान ले जाने वाले लोग लौटने लगे|धीरे धीरे नदी के पार वे पहुँच गए|इस वितरण कार्य का सबसे कठिन हिस्सा उस सामान को- पैतीस किलो की गठरी को घर तक ले जाना ही है! और उसमें‌ लोग खरे उतर रहे हैं! दिक्कत होने के बावजूद वे सामान उठा रहे हैं| महिलाएँ भी इसमें‌ पीछे नही है| ग्रामीण आपस में मिल कर उसे ले जा रहे हैं. . .
इस प्रकार वितरण का पहला हिस्सा पूरा हुआ| कुछ लोगों‌ ने समस्या खडी करनी चाही| पर उन्हे समझाया गया| सुचि में नाम न होनेवाले गाँव के वास्तविक ग्रामीणों को भी सामान बाँटा गया|हर परिवार को चावल, सूजी, शक्कर, तेल आदि निर्धारित किया हुआ सामान दिया गया| इसके पहले गाँवों में अर्पण के सदस्यों‌ की निगरानी में महिलाओं‌ के लिए सैनिटरी नैपकिन्स भी दिए गए थे|
यह सब होते होते दोपहर होने को आयी| सभी परिवार पूरे होने के पश्चात् वहाँ से लुमती के लिए निकले| रास्ते में चामी में भीड़ इकठ्ठा हुयी है| उन्हे बता कर आगे जाने के लिए निकले| लुमती के ठीक पहले एक जगह पर रास्ता बन्द है| वहाँ कुछ समय बितने पर निर्णय कर लिया गया कि अब वितरण यहीं‌ करना पडेगा| लोगों को सन्देस भेजा और वे आने भी लगे| यहाँ‌ भी बी.आर.ओ. का बड़ा काम चल रहा है| पीछले वितरण काम के जैसे ही यहाँ व्यवस्था बनते देर नही लगी| पीछे से आ रहे सामान की प्रतीक्षा जरूर है| लुमती ग्राम के लोगों‌ को भी काफी‌ दूरी पैदल चल के आना पड़ा| और अब सामान ले कर भी‌ जाना है| लेकीन उसके लिए उन्होने तरकीब निकाली|कुछ लोग साथ में‌ डोर लाए हैं| वे गठरियों‌ को अब कमर या पीठ पर बांध कर ले जाएंगे| अपेक्षाकृत तरिके से काम चलता रहा|स्थानीय लोग भी सहायता कर रहे हैं. . .
अब बस एक गांव बाकी है|वहां का वितरण होने पर इस चरण का कार्य पूरा हो जाएगा| लुमती का काम पूरा कर चामी आ गए| भीड अब अनियंत्रित हो रही है| लेकिन सर और अर्पण के सदस्यों ने लोगों को समझाया| टेम्पो और ट्रक गाँव के एक तरफ रख दिए| बस आनेवाले दूसरे टेम्पो की प्रतीक्षा है| क्यों कि अब कुछ चीजें खतम हुईं है| तब तक चामी का स्टोअर भी फायनल किया गया| अब यहाँ बाँटने पर सामान बाकी रहा, तो उसे इधर ही रखा जा सकता है| पीछे रुका हुआ टेम्पो आने पर वापस टेबल लगा कर एक के बाद एक परिवारों को कूपन दे कर सामान दिया जाने लगा| इसमें कुछ युवक भी सहायता के लिए आगे आए| जैसे काम पुरा होते गया, वैसे सभी के उपर नजर आनेवाला हल्का सा तनाव भी कम हो गया|
टीम में‌ काम करने की खास बात यह है कि हर कोई अपने अपने तरिके से हाथ बँटाता है| कोई लोगों‌ को सामान बान्धने में‌ सहायता कर रहा है; कोई सामान की गिनती कर रहा है; देख रहा है कि कुछ समाप्त तो नही हो रहा| इस पूरे काम में दो बातें‌ सबसे अहम थी| एक तो परिवारों की सही सुचि बनाना और सुचि में जिनका नाम नही है; पर जो गाँव के निवासी‌ है: उनको परख कर कूपन देना| दूसरी बात थी भीड को नियंत्रित करना| यह बातें स्वाभाविक रूप से होती गयी| इस काम में साथ आए टेम्पो तथा ट्रक के चालक; सामान उठाने के लिए बुलाए गए लोग आदि ने भी अच्छा सहयोग दिया| इस काम के समय पुलिस को भी रखा गया था|उन्होने ने भी सहयोग दिया. . .
वापस जाते समय भी रास्ते पर रुकना पड़ा| बरम के पास के जल प्रपात का स्तर और बहाव अब कम हुआ है| इसलिए रुके बिना आगे जा सके|मन में कई विचार है| जो कुछ देखने में‌ आया, वह काफी सोचने के लिए मजबूर करनेवाला है| इस चरण का काम तो पूरा हो रहा है; पर आगे भी बहुत काम करना पड़ेगा| सर ने जैसे कहा है; कि लोगों‌ को सामग्री पहुंचाना; शिविर आयोजित करना; दवाईयाँ बाँटना आदि काम मात्र प्राथमिक स्तर के हैं| आवश्यक है हि; मगर पहले चरण के वे काम हैं|इसके बाद अब पैरवी के स्तर पर; जल प्रवाह के संशोधन के स्तर पर और उपजीविका के स्तर पर भी बहुत कुछ काम किया जाना चाहिए| और इतना ही नही, मूलत: हमें‌ प्रकृति की इस चेतावनी से सीख लेनी चाहिए| जीवनशैली तथा विकास की परिभाषा पर गहराई से सोचना चाहिए|क्योंकि प्रकृति को नुकसान पहुंचाने के लिए हम इकठ्ठे ही‌ तो जिम्मेदार है| जगत् में‌ सब घटनाएं एक दूसरे से सम्बन्धित हैं|इसलिए एक स्थान पर भी यदि पर्यावरण में‌ इतना बड़ा तनाव हो; तो उसका अर्थ यही‌ है; कि प्रकृति में‌ बड़े पैमाने पर बदलाव हो रहें‌ है| इसी लिए जैसा पहले कहा जा चुका है; हर एक को विकास तथा जीवनशैली के बारे में‌ गहराई से सोचने की आवश्यकता है|
. . . आखरी दिन काफी भावनाप्रधान रहा| हेल्पिया में पहुंचने पर सर ने विशेष प्रकार से सभी का हौसला बढाया| अर्पण तथा मैत्री- सभी के लिए सभी ने उल्हास के साथ 'थ्री चिअर्स' किया|मतभेदों‌ को भुलाते हुए एक सकारात्मक सोच के साथ वह कार्य पूरा हुआ| सर और अन्य एक मित्र पीछे रुकनेवाले है| बाकी मित्र वापस लौटेंगे|
वाकई ज़िन्दगी में कुछ दिन ऐसे आते है; की पीछे हमे लगता है कि क्या वे दिन वास्तविक थे? या हमने सपना तो नही‌ देखा? ये दिन भी वैसे ही हैं| इतना कुछ इतने कम दिनों‌ में देखने को मिला|जो किया, वह काम वैसे तो साधारण सा हि है| कोई विशेष बात नही‌ है| पर अक्सर रुग्ण को दवा के साथ दुवा और साथ होने की‌ भी आवश्यकता होती है| हौसला बढाने की आवश्यकता होती है| कोई कुछ भी कहें, वास्तव में कोई दुर्बल या असहाय नही‌ होता है और ना हि कोई बहुत समर्थ या शक्तिशाली जो कि दूसरे को मदद दे सकें| यहां हर कोई एक सामान्य यात्री है| इसमें‌ एक ही‌ बात हो सकती है- एक दूसरे का कुछ पल साथ दिया जा सकता है| और कुछ भी नही| खैर|
२८ जुलाई से ८ अगस्त के इन दिनों के पहले भी मैत्री‌ ने काफी कार्य किया| उसके बाद भी कार्य बरकरार है| अब भी कई पहलूओं‌ पर कार्य हो रहा है| केदारनाथ में‌ समारोह शुरू होने के बाद भी‌ पुनर्निर्माण का कार्य समाप्त नही हुआ है| वरन् अब गहरा काम शुरू‌ हुआ है| और यह एक आह्वान भी‌ है| आव्हान इस बात का है कि किस प्रकार प्रकृति को हानि पहुँचाए बिना वहाँ मानवी गतिविधियाँ चलायी जाए| रहन- सहन और उपजीविका चलायी जाए| इसके लिए विकल्प ढुंढने चाहिए‌ और वैकल्पिक विकास नीती के बारे में‌ भी अत्यधिक सोचना चाहिए. . .
उन दिनों की यादें तो कईं है; पर लेखनसीमा यहीं पर ठीक है|

वितरण के लिए जा रहा सामान
 
तेज़् बहाव का जल प्रपात
























वितरण स्थान पर आए हुए ग्रामीण
 
टीम वर्क



























































यह युद्ध अभी समाप्त नही हुआ है| इसके बारे में‌ आगे जानने के लिए तथा सहयोग लेने के लिए सम्पर्क कर सकते है-
www.maitripune.net; maitri1997@gmail.com, ०२० २५४५०८८२.

Friday, February 17, 2012

विकासाच्या विविध वाटा व काही प्रश्न


आज विकासाचे विविध प्रवाह आपल्याला दिसतात. अनेक पातळीवर अनेक पद्धतीने विकासाची प्रक्रिया पुढे चाललेली दिसते. विकासामध्ये सरकार, स्वयंसेवी संस्था व अन्य सामाजिक- आर्थिक घटक कार्यरत असलेले दिसतात. ह्या परिस्थितीमधील काही बाबींना विचारात घेण्याचा एक छोटासा प्रयत्न ह्या लेखातून करतो.

पार्श्वभूमी

आज सामाजिक आणि राजकीय तसंच आंतरराष्ट्रीय परिस्थितीसुद्धा कमालीची गुंतागुंतीची झाली आहे. तुकड्या- तुकड्यामध्ये न बघता आपण घटना आणि घटकांची व्याप्ती समजून घेण्याची गरज आहे. उदाहरणार्थ जागतिक अर्थव्यवस्थेमधील बदल, गेल्या काही वर्षांतली तिची वाटचाल आणि त्या अनुषंगाने जागतिकीकरण- खाजगीकरण आणि उदारीकरणानंतर होणारी आपल्या राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थेची ओढाताण ह्या गोष्टी व ह्यातून दिसणा-या पडद्यामागील गोष्टी (उदा., जागतिक बँकेचा देशामधील हस्तक्षेप, भारतीय अंदाजपत्रकामध्ये परकीय व्यक्तींचा प्रभाव नव्हे भारतीय अंदाजपत्रकावर परकीय लोकांचे नियंत्रण, विदेशी कंपन्यांमुळे देशाच्या सार्वभौमत्वाला पोचलेला धोका इत्यादी इत्यादी..........) समजून घेतल्या पाहिजेत.



सरकार अनेक प्रयत्न करत आहेच. पण खरोखर सरकार देशाच्या भल्याचा प्रयत्न करण्याच्या स्थितीमध्ये किती आहे, हेही बघितलं पाहिजे. आज १९९० नंतर बावीस वर्षांमध्ये भारताने विविध आंतरराष्ट्रीय कराराचे साखळदंड बांधून घेतले आहेत. त्याची मोठी किंमत शेतक-यांच्या आत्महत्या आणि कष्टकरी जनतेचे हाल ह्या प्रकारे आपण मोजत आहोत. त्यामुळे सरकारमधल्या काही लोकांनी जरी काही चांगलं काम करायचं म्हंटलं, काही चांगले निर्णय घेण्याचं ठरवलं, तरीही ते तसे लागू होण्यातही असंख्य अडथळे आहेत व जरी असे काही निर्णय लागू झाले तरीही नोकरशाही आहेच.

सरकारचे प्रयत्न बरेचसे एकसुरी असले तरी स्वयंसेवी संस्था व आंदोलनांचे प्रयत्न मात्र ब-याच प्रमाणात वेगळे आणि उल्लेखनीय आहेत. इथेही एक गोष्ट लक्षात घेतली पाहिजे. भावनिक अतिरेक आणि अंधश्रद्धा ह्या दृष्टीने कोणत्याही गोष्टीकडे न पाहता शक्यतो खुल्या व ब्लँक मनाने बघण्याचा प्रयत्न केला पाहिजे. आज आपल्याला दिसणारे बहुतांश लोक एखाद्या विचारांशी, एखाद्या प्रतिकाशी, विचारधारेशी स्वत:ला जोडून इतरांपासून स्वत:ला पूर्णपणे तोडताना दिसतात. म्हणजे अमुक अमुक एक गोष्ट असेल तर त्या संदर्भातील प्रत्येक गोष्ट ग्रेट आणि त्याच्यापासून लांब असलेली प्रत्येक गोष्ट चुकीची असा कंफर्टेबल समज केला जातो. उदाहरणार्थ, बीएसपी खूपच चांगली आहे, असा समज आणि अंधश्रद्धा. किंवा नर्मदा बचाओ आंदोलन खूपच वाईट आहे किंवा खूपच महान आहे, अशी टोकाची भुमिका.

कोणताही निर्णय व निष्कर्ष न काढता गोष्टी जशा आहेत, तशा म्हणजेच अपूर्ण व ब-या वाईट स्वरूपात पाहणं अवघड आहे पण आवश्यकसुद्धा आहे. आज नेमकं हेच होत नाही. तेव्हा शक्यतो खुल्या नजरेने जमेच्या आणि कमकुवत बाजूंचा विचार करण्याचा प्रयत्न करायला हवा. ब्लॅक किंवा व्हाईट नाही तर ग्रे छटा बघण्याचा प्रयत्न करायला हवा. पुढील काही प्रसंगांद्वारे आपण विकासाच्या काही वाटा बघण्याचा प्रयत्न करू.

प्रसंग एक: गुजरात आणि देशाच्या अन्य भागातील फरक 

एकदा नंदुरबार जिल्ह्यामध्ये एका शेतकरी मंडळाची स्थापना केली गेली. असं मंडळ स्थापन करावं, ही प्रेरणा त्या शेतक-यांना गुजरातमधील एका शेतकरी समूहाच्या कामावरून मिळाली होती. स्थापना व उद्घाटनाच्या कार्यक्रमाला प्रमुख पाहुणे म्हणून त्यांनी त्या गुजराती शेतकरी समूहाच्या एका शेतक-याला बोलावलं. उद्घाटनाचा कार्यक्रम अर्थातच एका गावात आयोजित केला गेला होता. खेडेगावच होतं. कार्यक्रम सुरू झाला. काही भाषणं झाली आणि वीज गेली. पण काही गडबड झाली नाही, संबंधितांनी तयारी करूनच ठेवली होती. लगेच मेणबत्त्या पेटवल्या आणि कार्यक्रम चालू राहिला. थोड्या वेळाने गुजराती शेतक-याला दोन शब्द बोलण्याचा आग्रह झाला. आधी तो नाही नाही म्हणाला व अधिक आग्रह केल्यावर बोलायला उभा राहिला.

“हे शेतकरी मंडळ बंद करून टाका!”

सर्व चकीत झाले. पुढे तो बोलला, “आज इथे शेतक-यांचा कार्यक्रम चालू आहे आणि वीज गेली. ही वीज जाण्याची ठरलेली वेळ नव्हती. तरीसुद्धा तुमच्यापैकी एकानेही वीज वितरण केंद्राला फोन केला नाही आणि तक्रार केली नाही. तुम्ही लगेच मेणबत्त्या लावून शांत बसला. जर चुकीच्या प्रकारे तुमच्या कार्यक्रमाच्या वेळी गेलेली वीजसुद्धा तुम्हांला सुरू करता येत नसेल, तर मग तुम्ही मंडळामधून काय काम करणार?” इतकं बोलून तो थांबला नाही.

“एक तर अशी गोष्ट गुजरातमध्ये कधीच होणार नाही. शेतक-यांचा कार्यक्रम असताना वीज बंद केलीच जाणार नाही. आणि जरी वीज बंद पडली, तरी आम्ही शेतक-यांनी लगेच तक्रार नोंदवली असती व सतत फोन करून लगेचच वीज चालू करून घेतली असती.”

किती बोलकं हा प्रसंग आहे! देशाचा अन्य भाग आणि गुजरात कसे आहेत, हेच ह्यात दिसतं! गुजरातमध्ये अशा कितीतरी गोष्टी आहेत. तिथलं सरकार, प्रशासन कमालीच कल्याणकारी आणि लोक- केंद्रित आहे. स्वप्नवत वाटावं इतकं लोकाभिमुख आहे. सर्व अद्ययावत सोयी व व्यावसायिकता प्रशासनामध्ये दिसते. सर्व व्यवस्था चोख ठेवली जाते. ह्याबद्दल आणखी एक प्रसंग.


प्रसंग दोन: असं आपल्याकडे कधी होईल?

एकदा एका महिलेला सरकारी अधिका-याकडून अपेक्षित सहकार्य मिळालं नाही. सरकारी कामात अडचण आली तर लावण्यासाठी एक फोन नंबर दिला होता. तिने तो लावला आणि फोनवर सरळ मुख्यमंत्रीच आले! मोदी समोर आहेत, हे कळाल्यावर तिला धक्काच बसला आणि तिने फोन ठेवला. पण दहा मिनिटातच तिच्या फोनवर फोन आला आणि मोदीच बोलत होते. फोन का ठेवला, समस्या काय ह्याची त्यांनी चौकशी केली. त्यानंतर एका तासामध्येच संबंधित सरकारी अधिका-याचं माफीपत्र त्या महिलेला मिळालं!!

कदाचित हे उदाहरण अतिरंजित असेल. परंतु अशी कित्येक उदाहरणं गुजरातमध्ये दिसतात, अनुभवता येतात. विकास जर करायचाच ठरवला तर करता येतो, हे त्यातून दिसतं. प्रशासन, प्रशासनातील माणसं सक्षम आणि जबरदस्त हे तर जाणवतंच, पण गुजराती उद्योगी आणि सक्रिय मानसिकताही तिथे दिसते. कारण छोट्या छोट्या गोष्टींमध्ये तिथे उद्योगी वृत्ती आहे. क्रियाशीलता आहे. मुख्य म्हणजे निरर्थक गोष्टींवर अखंडपणे भांडण्याची व डबक्यात पडून राहण्याची वृत्ती फार नाही. अर्थात ह्याची कारणंसुद्धा आहेत. ऐतिहासिक व सांस्कृतिक दृष्टीने गुजरात मोठ्या प्रमाणात समृद्ध व संपन्न आहे. त्यामुळेच देण्याची वृत्ती व क्रियाशील मानसिकता अधिक दिसते. गुजराती लोक जगभर पसरलेले आहेत. त्यामुळे साहजिकच त्यांच्यामध्ये क्षुद्र तंटे व संकुचित मानसिकता कमी दिसते.

त्यामुळे सरकारी यंत्रणा, प्रशासन, लोक, उद्योग जगत हे सर्व एका दिशेने प्रयत्न करताना दिसतात व त्यातून परिणामही मिळालेले दिसतात. गुजरात भारतातील महासत्ता होण्याच्या मार्गावर आहे. आज खंबायतच्या आखातावर अवाढव्य पंचवीस किलोमीटरचा पूल बांधण्याचं काम चालू आहे. त्यामुळे पश्चिम दक्षिण गुजरातचं मुंबई व महाराष्ट्रापासूनचं अंतर तब्बल साडेतीनशे किमी कमी होणार आहे आणि अर्थव्यवस्थेला मोठीच चालना मिळणार आहे ..... तसंच नंदुरबारमधल्या पवनचक्क्यांमध्ये निर्माण होणारी वीजसुद्धा गुजरातच खरेदी करतो. पण त्याबरोबरच नंदुरबारमधल्या लोकांनी मोबाईल व्हॅनला कॉल केल्यास तीही गुजरातची सीमा ओलांडून येते, कारण देण्याबाबत ते कंजुष नाहीत.

अर्थात गुजरात काही Land of Rajanikanth नाही! (खरं पाहता रजनीकांतचा लँड म्हणजे आपला महाराष्ट्र................ आणि तरीसुद्धा तो असा......) त्यामुळे तिथेही अनेक कमतरता आहेतच, त्रुटी आहेतच. गुजरातमध्ये मुख्य पश्चिम मध्य भाग सोडला तर मोठा भाग आदिवासी आणि एक तृतीयांश भाग वाळवंटी आहे. काही समूहांमध्ये गरिबीही मोठ्या प्रमाणात आहे. गुजरातमध्ये ज्या गोष्टी चालल्या, त्या देशाच्या इतर भागात चालतीलच, असं नाही. कदाचित मोठ्या प्रमाणातसुद्धा चालणार नाहीत. तरीही गुजरातमधल्या विकासाच्या प्रयत्नांचं महत्त्व कमी होत नाही. त्यामधून आपल्याला शिकण्यासारखं बरंच काही आहे.


स्वयंसेवी आणि समाजसेवी संस्था!
 
गेल्या काही वर्षांमध्ये सर्वत्र संस्था मिथून चक्रवर्तीच्या चित्रपटाच्या वेगापेक्षा अधिक वेगाने स्थापन झाल्या आहेत. एनजीओजसाठी स्वयंसेवी संस्था हा शब्द ज्याने वापरला, त्याच्या दूरदृष्टीचं कौतुक करावं तितकं कमी आहे. स्वयंसेवी म्हणजे स्वत:ची सेवा करणा-या संस्था, असाच अर्थ आज जास्त ‘अर्थपूर्ण’ आहे!! अशा स्वयंसेवी संस्थांची दुकानदारी आज कमालीची फोफावत आहे. मोठ्या मोठ्या संस्था फक्त स्वत:च्या फायद्यासाठी आणि कोणत्या तरी सामाजिक समस्येचं नाव घेऊन पैसे (किंवा एक प्रकारची सॉफिस्टिकेटेड भीक) मिळवताना दिसतात. ज्या क्षणी पैसा मिळणं थांबतं तेव्हा लगेच त्यांचं कामही थांबतं, कारण हे ‘प्रोफेशनल’ ना!

त्याउलट काही संस्था खरोखर समाजसेवी संस्था आहेत. समाजाकडून, सरकारकडून, देणगीदारांकडून व फंडिंग एजन्सीजकडून काहीही न घेता जास्त परिणामकारक आणि जास्त टिकाऊ काम करून दाखवतात. त्यांचं काम ब-याच प्रमाणात जास्त खोलवर असतं. निव्वळ टारगेट ओरिएंटेड कामापेक्षा त्याचा पाया जास्त मजबूत असतो. प्रसंगी हलाखीमध्येसुद्धा ह्या संस्था उभ्या राहतात. हळुहळु काम वाढवत नेतात. दुकानदार संस्थांसारखा त्यांचा भर प्रोजेक्टवर किंवा ठराविक ऍक्टिव्हिटीज ठराविक संख्येने पूर्ण होण्यावर नसून मानवी संबंध, खरेखुरे प्रश्न (फक्त कंडोम वाटप किंवा अमुक अमुक संख्येमधील लोकांना प्रशिक्षण देणं किंवा ठराविक संख्या गाठणं ह्याहून जास्त वास्तवातील प्रश्न) सोडवण्याच्या दिशेने असतो. वेगवेगळ्या विचारधारेमध्ये किंवा वैचारिक प्रवाहामध्ये अशा संस्था सापडतात. त्यांचं काम जास्त भक्कम असतं आणि ब-याच प्रमाणात स्वयंपूर्ण असतं. आज अशा स्वयंपूर्ण संस्थांचीच जास्त गरज आहे. कारण स्थानिक पातळीवर जास्त काम उभं राहात असल्यामुळे त्यातून लोक व समाजाची घडण जास्त होऊ शकते. अर्थात व्यावहारिक गरजांची कुचंबणा, कार्यकर्त्यांकडून अवाजवी अपेक्षा आणि कधी कधी कार्यकर्त्यांचं शोषण आणि प्रोफेशनल कौशल्यांमध्ये कमतरता ह्या कमकुवत बाजू त्यामध्ये दिसतातच.

विकासाचे आर्थिक आणि जीवनशैलीशी निगडीत पैलू

विकासाच्या आर्थिक आणि जीवनशैलीशी निगडीत पैलूंचीचाही विचार करावा लागेल. आज जगातील बहुतांश अर्थव्यवस्था कमी किंवा अधिक प्रमाणात संकटात आहेत. आर्थिक स्थिरतेची चर्चा सुरू आहे. ह्यावेळी आर्थिक बाबींचा विचार करणं महत्त्वाचं झालं आहे. अमेरिका किंवा विकसित अशा युरोपातले देश आज कर्जबाजारी होण्याच्या संकटात का आहेत? ह्याचं सरळठोक उत्तर ग्राहक केंद्रित जीवनशैली (Consumer central lifestyle) आहे. म्हणजेच वेगळ्या भाषेत चंगळवाद आणि त्याचे भाईबंद. थोडक्यात सतत कशाचा ना कशाचा उपभोग घेण्याची सवय लावायची, त्यासाठी सवलती द्यायच्या (आमदनी अठन्नी खर्चा रूपया असं करू द्यायचं!) आणि त्यांचं गुलाम करून झाल्यावर त्या सवलती व अनुकूलता रद्द करायच्या. ही प्रवृत्ती इतक्या मोठ्या प्रमाणात वाढली की, अमेरिकेसारखं सर्वशक्तीमान राष्ट्र त्यामुळे संकटग्रस्त झालं. कार, बंगले, मौजमजा, सुट्ट्या ह्यासाठी लोकांना सवलती दिल्या, कर्ज दिली पण उपभोगाच्या अतिरेकामुळे परतफेडीची क्षमता कमी झाली. त्यामुळे मग अर्थव्यवस्था कर्जबाजारी झाली. अर्थात ही फक्त एक बाजू झाली. त्यात अनेक इतरही घटक आहेतच.

पण विकासाचा विचार करताना आर्थिक बाबीमध्ये शाश्वतता बघितली पाहिजे. तरच तो विकास शाश्वत होईल. बाहेरून मोठ्या प्रमाणात फंडस आणून छोटसं काम केल्यास तो विकास नाहीच, पण भ्रष्टाचारच होतो आणि त्यातून अर्थव्यवस्थाही डळमळीत होते. त्यापेक्षा शून्यातून किंवा कमीत कमी गुंतवणूकीतून उभं केलेलं छोटं कामही जास्त महत्त्वाचं आणि अर्थव्यवस्थेला बळकटी देणारं असेल. त्यातून नवीन भांडवल/ कार्य/ उद्यम उभा राहू शकेल. त्यातून कशावर तरी अवलंबून राहण्याच्या वृत्तीऐवजी उद्योगी आणि क्रियाशील वृत्ती वाढीस लागेल. आज नेमक्या अशाच गोष्टींची आवश्यकता आहे आणि तेच कमी प्रमाणात दिसतं.

आणि त्याला योग्य जीवनशैलीचीही जोड दिली पाहिजे. नाही तर उभं झालेलं काम टिकणार नाही, त्याला तडे जातील किंवा त्यातून अपेक्षित तो परिणाम न साधला जाता काम वाया जाईल. आर्थिक संदर्भात उभा राहिलेला पैसा खेळता राहावा आणि तो देशामध्येच राहावा. नॉन प्रॉडक्टिव्ह इन्व्हेस्टमेंटमध्ये किंवा उपयोगी नसलेल्या कामी तो जाऊ नये. फक्त खर्च करण्यासाठी पैसे कमावले जाऊ नयेत. परस्पर पूरक पर्यावरणाप्रमाणे एका गोष्टीतून दुस-या गोष्टीला चालना मिळावी. ही तत्त्वं खरं तर आपल्याला अजिबात नवीन नाहीत. प्रश्न त्यांचा विचार आजच्या जीवनशैलीमध्ये आणि अर्थव्यवस्थेमध्ये करण्याचा आहे.

ग्राहक केंद्रित जीवनशैलीचा प्रवाह अत्यंत तीव्र आहे. सर्व जगच त्या दिशेने चालत आहे. पण जर ती दिशा आपल्याला योग्य वाटत नसेल, तर त्यापेक्षा वेगळी आणि स्वत:ची दिशा निवडण्याचा प्रयत्न आपण केला पाहिजे. त्यासाठी विकासाच्या बेटांवर म्हणजेच महानगरांमध्ये न पळता विकासाचं स्वराज्य निर्माण केलं पाहिजे. हा प्रत्येकाने स्वत:च्या आणि आसपासच्या थोड्या तरी लोकांच्या पातळीवर सोडवण्याचा प्रश्न आहे. समाजावर, देशावर आणि जगावर ‘Liability’ होण्यामध्ये भर घालण्याऐवजी ‘Asset’ मध्ये भर घालण्याचा प्रयत्न करणं कधीही चांगलं आहे. त्यामुळे शक्यतो स्वदेशी, आर्थिकदृष्ट्या सक्षम (कर्जबाजारी नसलेल्या) आणि स्थानिक पातळीवर योगदान देणा-या लहान- सहान उद्योगांना सुरू करून अशा इतर गोष्टींना चालना देण्याची सर्वाधिक आवश्यकता आहे. ख-याखु-या विकसित देशांनी (उदा., जपान, जर्मनी, जे इतरांच्या लूटीवर विकसित झाले नव्हते) हेच केलं आहे आणि अजूनही ते हेच करत आहेत. हे कसं करायचं, कशा प्रकारे करायचं हे पुढचे प्रश्न आहेत. आणि म्हणून पर्यायाने गाड्या, बंगले (फ्लॅटस) आणि त्यासोबत येणा-या अधिकाधिक ग्राहक केंद्रिततेला चालना द्यायची का आपल्या पद्धतीने स्वयंपूर्णतेकडे जाण्याचा प्रयत्न करायचा, हे प्रत्येकाने विचारपूर्वक ठरवलं पाहिजे. विकासाच्या बेटांपेक्षा विकासाचं लहान असलेलं स्वराज्यच चांगलं. कारण ही बेटं एखाद्या नाही तर दुस-या लाटेच्या तडाख्यामध्ये कोसळू शकतात; पण संतुलनावर आधारित स्वराज्य टिकण्याची जास्त शक्यता असते.

उपसंहार

आज संपूर्ण समाजसेवी असणं शक्यच नाही. तशी आवश्यकताही नाही, कारण त्यामुळे समाज परावलंबी बनेल. परंतु स्वयंसेवी आणि समाजसेवी (स्वत:चा विकास आणि समाजाचा विकास) ह्यामध्ये योग्य संतुलन निश्चितच असावं. विकासाच्या ह्या वाटा खडतर असल्या तरी त्या शाश्वत असण्याची शक्यता जास्त आहे. आणि म्हणून त्या वाटांवर असलेल्या अप्रिय आणि अनपेक्षित प्रश्नांची उत्तरं शोधली पाहिजेत. हे  काम अवघड असलं तरी अशक्य नाही. कारण इतिहासामध्ये अगदी अलीकडचा काळ सोडला तर नेहमीच आपण स्वत:च्या तंत्रज्ञानावर आणि जीवनपद्धतीवर - स्वदेशीवर भर दिलेला आहे. गरज आहे ती त्यावर आधारित विकासाच्या परिभाषेची व प्रतिमानाची (Paradigm of development) जाणीव करून घेण्याची व त्या दिशेने जाण्याची.

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