Thursday, June 18, 2015

साईकिल पर जुले लदाख़ भाग २- बुधखारबू- फोतुला- लामायुरू- खालत्सी- नुरला

०. साईकिल पर जुले लदाख़ भाग ०- प्रस्तावना 

१. साईकिल पर जुले लदाख़ भाग १- करगिल- मुलबेक- नमिकेला- बुधखारबू

 

३१ मई, रविवार की सुबह! मिलिटरीवालों के साथ काफी अच्छा आराम हुआ| कल के दिन पर अभी‌ भी विश्वास नही‌ हो रहा है| कल रात जवानों से काफी बातें हुई| पहले तो मन में थोड़ा डर भी था कि उनके साथ रहना है.. पर उन्होने बहुत अनौपचारिक व्यवहार किया| हाँ, सुरक्षा के नियम से सामान की जाँच हुई| मेरे पास मेरे आयडी कागज़ भी थे; पर उन्हे उसे देखने की आवश्यकता नही हुई| रात में उनकी बराक में रूकना अनुठा रहा| यह स्थान ३४०० मीटर से अधिक ऊँचाई पर है|‌ २७०० मीटर से एक ही‌ दिन में‌ ३४०० मीटर पर आने से ठण्ड तो जरूर लगी|‌ लेकिन साँस की कोई तकलीफ महसूस नही हुई| शरीर अधिकांश रूप से इस ऊँचाई के लिए अनुकूल होता गया| रात में बराक में‌ ही जवानों ने खाना बनाया| साथ मे बुखारी भी जल रही थी| वह शाम बहुत यादगार रही| सभी ने बहुत हौसला बढाया; अच्छा ख्याल रखा| उनके अनुभव भी शेअर किए|‌ जाड़े में यहाँ बहुत बरफ गिरती है| फिर भी कँप इसी स्थान पर चलता है| जाड़े में इतनी बरफ होती हैं कि बाहर जानेवाली साँस भी जमती है| यहाँ मिलिटरी के लिए काफी इन्तजाम किए हुए थे| उनका अलग राशन, इन्धन, गर्मी की प्रणालि सब आता है| फिर भी मेजर- लेफ्टनंट जैसे हौदे के अधिकारियों के लिए व्यवस्था कुछ साधारण सी लगी| यह नही‌ भूलना चाहिए कि यह एक दुर्गम क्षेत्र है और झोजिला हाल ही में अर्थात् बीस दिन पहले दस मई को खुला है| मनाली रोड़ खुलने के अभी तो आसार भी नही दिख रहे है| इसीलिए यहाँ चीजों की कुछ कमी होना स्वाभाविक है| मिलिटरी का 'वेट कँटीन' भी दिखा| मिलिटरी की दुनिया अन्दर से देखने से स्वयं को धन्यभागी मान रहा हुँ|

ऊँचाई बढ़ने के बावजूद ठीक नीन्द लगी| लेकिन सुबह तीन बजे आँख खुल गई| सवेरा होने में‌ अभी एक घण्टा है| धीरे धीरे जवान उठते गए| उनके ही‌ साथ मै भी तैयार हुआ| मिलिटरी के कँप में एक जगह 'कन्धों से मिलते हैं कन्धे कदमों से कदम मिलते हैं' भी सुनाई दिया! सुबह चारों ओर बर्फाच्छादित पहाड़ दिख रहे हैं| वाकई‌ मै आज किस अनोखे स्थान पर हुँ...

कल सत्तर किलोमीटर चलाने से विश्वास हो गया है कि मै आज भी करीब उतना ही चला सकता हुँ| आज सबसे पहले फोतुला पार करना है| फोतुला यह श्रीनगर- लेह सड़क का सर्वोच्च बिन्दु है| ऊँचाई लगभग ४१०० मीटर है| आज सत्तर किलोमीटर होते हैं तो कल लेह पहुँचा जा सकता है| उससे काफी उत्साह लग रहा है| कल की थकान महसूस नही हो रही है| जब ऐसे माहौल में हुँ, तो थकान भला कैसे महसूस होगी? सुबह जवानों ने आर्मी की रोटी खिलाई| बाद में कॅफेटेरिया में मॅगी भी खिलाई| यहाँ अभी मॅगी पर बॅन नही है| वरन् मॅगी यहाँ मेरे लिए बहुत उपयोगी है! जवानों ने सब तरह से आतिथ्य कर मुझे विदा किया| मेरे पास उन्हे देने के लिए कुछ नही है| कुछ चॉकलेट और काजू आदि है; वही दिया| उनमें से कुछ लोग अब कॉन्वाय में निकल रहे हैं...

यहाँ‌ से अब पहला लक्ष्य फोतुला पार करना है| यहाँ से फोतुला पंधरा किलोमीटर के करीब है| लेकिन फोतुला पार करने में समय लगेगा| उसके पहले आनेवाले किसी गाँव में दोबारा नाश्ता करना होगा| साईकिलिंग कई मायनों‌ में टेस्ट क्रिकेट समान है| जैसे बल्लेबाजी में पहले घण्टे में गेन्दबाजों का सम्मान करना पड़ता है; नई गेन्द घूमती है; स्विंग होता है; उसी प्रकार पहले घण्टे की साईकिलिंग कुछ धिमी‌ होती है| रात भर सोया शरीर कुछ सख्त होता है| धीरे धीरे वह चलने की धारा में ढल जाता है| पैर आसानी से चलने लगते हैं| धीरे धीरे साईकिलिंग कुछ आसान होती है| बुधखारबू के आगे पहला गाँव हंसाकोट है, पर वहाँ होटल नही है| आगे बढ़ा| रास्ते में मिलिटरी का बहुत बड़ा कॉन्वाय मिला| कई जवानों को सर झुकाकर और सॅल्युट कर अभिवादन किया| वे भी‌ उत्तर में सॅल्युट कर रहे हैं| वाकई ऐसे अनुभव शब्दों में कैसे बताएँ..

फोतुला की दूरी पता नही चल रही‌ है| लेकिन क्या नजारा है| पहाड़ में‌ दूर दूर तक बस्ती दिखाई दे रही है| वहाँ भेड़े घूम रही हैं| दो पहाड़ों के बीच से बहता पानी! किस्मत!!! करीब डेढ़ घण्टा चलने के बाद एक छोटा सा कस्बा आया|‌ यहीं‌ एक होटल है|‌ कम से कम चाय तो मिलेगा ही| देखा तो चाय तो था ही; आमलेट भी मिल रहा है| एक आमलेट खाया और एक पार्सल लिया| यह लदाख़ की एक खासियत है|‌ कितना भी छोटा दुकान हो; उसमें सभी चीजें मिलेगी| सम्भवत:‌ अण्डे होंगे तो आमलेट बन जाएगा| मॅगी, चिप्स और मूँगफली की चिक्की (गूड़पापड़ी) भी है! झोजिला कुछ ही‌ दिन पहले खुला होने के कारण शायद नया स्टॉक है|

अच्छे से नाश्ता कर आगे बढ़ा| अब फोतुला पार कर के लामायुरू तक भोजन नही मिलेगा| आगे बढ़ते ही फोतुला की दूरी दिखाई दी| मात्र ग्यारह किलोमीटर! और आगे तीन किलोमीटर तक साईकिल चलायी जा सकी|‌ अब आगे के आँठ किलोमीटर पैदल पार करने होंगे|‌ वह गाना याद आ गया- वहाँ‌ ना हाथी ना घोड़ा है बस पैदल ही जाना है! पैदल चलने के बाद संगीत शुरू किया| “जहाँ दूर नजर दौडाए आज़ाद गगन लहराए...”

चलने की कोई जल्दबाज़ी नही की| वरन् कुछ धीमे और टहलते टहलते ही‌ जाता रहा| क्यों कि अब मै लगभग ३८०० मीटर की ऊँचाई पर हुँ| यहाँ अगर समय बिताता हुँ तो आगे और ऊँचे "ला" के लिए मुझे सहायता होगी| इसलिए बिल्कुल पैरों की प्राकृतिक गति से बढ़ता गया| फोटो खींचने के बहाने से रूकता रहा|‌ साँस सामान्य ही है| लेकिन नजारे का क्या कहूँ! गाड़ी से जाना एक बात है और साईकिल से जाना बिल्कुल ही‌ दूसरी बात है! अब मुझे यह राष्ट्रीय राजमार्ग एक हायवे जैसा लग ही नही रहा है| मै तो उसे गाँवों और कस्बों‌ को जोड़नेवाली सड़क के तौर पर देख रहा हुँ|‌ और जैसे ही रफ्तार कम करते हैं; गहराई बढ़ती है| गाड़ी से न दिखनेवाले दृश्य दिख रहे हैं| चरवाहे भेडों को पहाड़ के अन्दर तक ले जा रहे हैं| जलधाराएँ पहाड़ से बिलखती नीचे आ रही हैं| दूर कहीं‌ बरफ दिख रही है...

आठ किलोमीटर पैदल जाने में‌ दो घण्टे लगे| ऐसे धीरे जाते समय बहुत छोटे लक्ष्य बनाता गया| एक बार व्ही व्ही एस लक्ष्मण ने एक साक्षात्कार में कहा था की अन्तिम क्रम के बल्लेबाजों के साथ साझेदारी करते समय उसका एक फॉर्म्युला होता था| वे बहुत छोटे छोटे लक्ष्य बनाते थे| जैसे अगले दो ओव्हर आउट नही होना; अगले आधे घण्टे में पाँच रन बनाना| उसी को ध्यान में‌ रख कर छोटे छोटे कदम उठाता गया|

फोतुला के पाँच किलोमीटर पहले भी चाय मिली| बिस्कुट भी खाए| आगे ठण्ड बढ़ने लगी| जीवन में पहली बार चार हजार मीटर की‌ ऊँचाई पर जा रहा हुँ| फोतुला! यहाँ पर पार्सल लिया आमलेट खाया| अब बड़ी‌ ढलान मिलेगी| वहाँ‌ से लामायुरू तक बड़ी‌ ढलान है| लामायुरू में कई पर्यटकों ने रोका| एक दक्षिण भारतीय अंकल बड़े उत्साहित हुए| वे भी‌ साईकिल चलाते हैं|‌ मुझे साईकिल पर आते देख उन्हे बड़ी खुशी हुई| आप भी साईकिलिंग कर सकते हैं, ऐसा विश्वास उन्हे दे कर आगे बढ़ा| कुछ पर्यटकों ने मेरे साथ सेल्फी भी खींची! लामायुरू में गोन्पा देखने का लक्ष्य नही है| लामायुरू में पर्यटकों का जमावड़ा देख लगा मानो मै लेह पहुँच ही गया| एकदम से माहौल बदल गया| कुछ दूरी पर जा कर फिर से शान्ति छा गयी|‌ आगे बढ़ा| ढलान जारी रही|‌ मूनलँड का भी नजदिक से दर्शन हुआ| वाकई कुदरत के करीब जाने के क्या क्या लाभ है! लेकिन इस मूनलँड को भी शहर की फटकार पड़ रही है|

अब सिन्धू नदी की प्रतीक्षा है| खालसी से सिन्धू नदी इसी सड़क के साथ आएगी| लामायुरू के बाद भी ढलान जारी रही| यदा कदा थोड़ी सी चढाई आती; पर ढलान जारी रही|‌ यहाँ रास्ता एक बहुत सँकरी घाटी से गुजर रहा है| खालसी नदी के किनारे होने के कारण न्यूनतम ऊँचाई पर होगा और इसलिए ढलान वहाँ तक जारी रहेगी| लेकिन क्या रमणीय घाटी है! अब तो निरन्तर नीचे उतरने का डर लग रहा है| एक पल के लिए लगा कि क्या मै रास्त भटक गया हुँ? पर कोई सूचना पट्ट तो नही आया है| बीच में‌ आवाजाही भी नही दिख रही है| एक पहाड़ी‌ नदी आ कर सड़क से जुड़ी|‌ जरूर यह सिन्धू से मिलने जा रही है.. आगे जा कर सूचना पट्ट मिला| यही सही रास्ता है| अब जल्द ही खालसी और सिन्धू का दर्शन होगा.. यहीं‌ पर बटालिक से आनेवाली सड़क भी मुख्य राजमार्ग से जुड़ेगी|

सिन्धू नदी का पहला दर्शन! तिब्बत से आनेवाली रमणीय धारा! अब लेह तक अधिकांश यात्रा इसी के साथ होगी| खालत्सी‌ गाँव खालसी से थोड़ा आगे है| यहाँ पर भी पूरा पर्यटकों का जमावड़ा है| चाय पी कर आगे बढ़ा|‌ यदि कल लेह पहुँचना है तो मुझे आज खालत्सी से और आगे बढ़ना होगा|‌ खालत्सी से लेह ९७ किलोमीटर है| आज नुरला रूकूँगा| नुरला में गेस्ट हाऊस है यह जानकारी मिली| नुरला अभी और बारह किलोमीटर आगे है|‌ अभी शाम के साढे पाँच बजे है; तो रोशनी की कोई समस्या नही है|‌ और तेज़ चढाई‌ भी नही है| सिन्धू नदी के रौरव के साथ आगे की यात्रा जल्द ही पूरी हुई| नुरला के बाद अगला गाँव चौबीस किलोमीटर दूर है- ससपोल| वहाँ आज नही जा सकूँगा| इसलिए नुरला ही ठीक है| नुरला में होटल तो महंगे हैं; पर होम स्टे मिल सकता है| और यही हुआ| एक सज्जन से थोड़ी‌ बात की| थोड़ी‌ ही देर में होम स्टे मिल गया| लदाख़ में कई गाँवों में इस प्रकार रूकने का इन्तजाम मिलता है| आज पहली बार किसी लदाख़ी घर में ठहर रहा हुँ| लदाखी गाँव छोटे छोटे होने पर भी बड़े सम्पन्न है|‌ घर भी पक्के और बड़े| साथ में माने और प्रेअर व्हील तथा प्रेअर फ्लॅग भी‌ है| घर में दो नन्ही सी प्यारी परियाँ मिली| घर के उपर के कमरे में रूकने की व्यवस्था हुई| सिन्धू नदी की पुलकित करनेवाली गूँज स्पष्ट सुनाई दे रही‌ है| आज भी अच्छी साईकिलिंग चला पाया| बुधखारबू से करीब ६५ किलोमीटर आया हुँ| लेकिन एक बात अवश्य है कि फोतुला के बाद करीब पच्चीस किलोमीटर की ढलान मिलने के बावजूद भी अधिक नही जा पाया हुँ| शायद दोपहर फोतुला के बाद कुछ खाना खाया नही है; उसकी वजह से ऊर्जा स्तर कुछ कम है| शाम को भी कुछ खाने की इच्छा नही हुई| साथ में बिस्कुट हैं; पर खाए नही गए|

जहाँ दूर नजर दौडाए.. आज़ाद गगन लहराए लहराए लहराए..
वक़्त झरना सा बहता हुआ गा रहा है यह कहता हुआ...
लामाजी
फोतुला आ रहा है!



लामायुरू



मूनलँड!
आज की साईकिलिंग का लेखाजोखा- दूरी ६५ किमी; चढाई करीब १७०० मी और ढलान २१०० मी

सिन्धू!!!





































































  

"तू मेरे साथ साथ आसमाँ‌ से आगे चल.. तुझे पुकारता है तेरा आनेवाला कल.. नई हैं मन्जिलें..  
नए हैं रास्ते.. नया नया सफ़र है तेरे वास्ते.. नई नई है ज़िन्दगी.."- सिन्धू

Wednesday, June 17, 2015

साईकिल पर जुले लदाख़ भाग १- करगिल- मुलबेक- नमिकेला- बुधखारबू

०. साईकिल पर जुले लदाख़ भाग ०- प्रस्तावना 

३० मई की सुबह करगिल में नीन्द जल्दी खुली| जल्दी से तैयार हुआ| आज मेरी पहली परीक्षा है| आज लदाख क्षेत्र में साईकिलिंग का आरम्भ होगा| आज के दिन के स्कोअर पर आगे का सब निर्भर करेगा| आज पता भी चल जाएगा कि लदाख में साईकिलिंग कर सकता भी हुँ या नही| कल रात के मुकाबले सुबह मन शान्त है| एक तरह की उत्तेजना है| कल तक करगिल से बटालिक और दाह के रास्ते लेह को जाने की योजना थी| बटालिक से जानेवाला रास्ता पीछले बार देखा नही था| और बटालिक के रास्ते जाने पर पहले ही दिन सिन्धू नदी का दर्शन होने की सम्भावना थी| उस रास्ते पर जाने के लिए पहले तो परमिट लगता था; लेकिन चूंकी अब लदाख में भारतीय पर्यटकों को कोई परमिट की आवश्यकता नही रही; इसलिए यहाँ भी परमिट आवश्यक नही होगा ऐसे सोचा था| पर करगिल में पूछताछ में पता चला कि शायद परमिट लगता है| कोई स्पष्ट नही बता पा रहा था| बात बिलकुल मध्य में अटकी| कुछ बोल रहे थे कि परमिट की कोई आवश्यकता नही; कुछ बोल रहे थे कि कमिशनर से परमिट लेना होगा| अत: कल शाम की शंकाकुशंकाओं के बीच तय किया कि बटालिक के बजाय मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग से मुलबेक के रास्ते ही आगे बढ़ूँगा|

सुबह जैसे ही होटल के बाहर निकला बून्दाबाँदी ने स्वागत किया| लदाख क्षेत्र में बारीश? फिर भी बारीश बहुत थोड़ी हो रही है| आगे बढ़ सका| कल करगिल आते समय द्रास में ३३०० मीटर की ऊँचाई पर कुछ समय जब रूका था, तब साँस लेने में थोड़ी तकलीफ आयी थी| कल करगिल में भी सड़क पर चलते समय या चढाई पर चलने के बाद थोड़ी साँस फूल रही थी|‌ लेकिन साईकिल चालू करने पर अब उतनी समस्या नही आ रही है| जरूर करगिल में रात बिताने का लाभ मिला| आज पहला ही‌ दिन है| आज बिल्कुल रूकते रूकते जाना है| आज मन कल जैसा निराश तो नही है; पर लग तो यही रहा है कि चालीस किलोमीटर दूर मुलबेक तक भी दिन में पहुँचू तो स्वयं को धन्य समझूँगा! धीरे धीरे आगे बढ़ता गया| सुरू नदी ने बड़ा हौसला दिया| पौन घण्टे में करगिल कस्बे के बाहर मुख्य सड़क पर पहुँचा| यहाँ आमलेट- चाय लिया|
करगिल युद्ध में क्षतिग्रस्त हुआ पेट्रोलपंप दिखा| यहाँ से रास्ता थोड़ा उपर उठता है| चलने में कुछ भी कठिनाई महसूस नही हो रही|‌ एक कठिनाई जरूर है- सामान ठीक से बान्धने की| अगर इसके पहले साईकिल पर कोई बड़ी यात्रा की होती; तो सामान बान्धने का अभ्यास हो जाता| खैर| थकान की बजाय सामान ठीक करने के लिए रूकना पड़ रहा है| लेकिन क्या नजारा है! वाकई विश्वास नही हो रहा है कि मै "यहाँ" साईकिल चला रहा हुँ. . . पहले दो घण्टों में ही बारह किलोमीटर हो गए! अब तो पहली चढाई भी पूरी हो गई| अब यहाँ से मुलबेक तक करीब सीधा ही रास्ता है| एक के बाद एक मोड़ आते जा रहे है| छोटे छोटे पहाड़ आ कर पीछे जा रहे है| बीच बीच में कुछ बस्ती भी है|
वाकई अब मै दोपहर में ही मुलबेक तक पहुँच सकता हुँ| क्या बात है! बीच में एक स्थान पर सड़क कच्ची है| लेकिन कुल मिला के बढिया सड़क| सुबह के बाद बारीश बिलकुल नही है| लेकिन आगे जाने पर एक जगह बारीश मिली| संयोग से एक टी स्टॉल भी मिला| वहाँ साईकिल को शेल्टर भी मिल गया| बारीश, ठण्ड, लदाख़ और ऐसे में चाय कि चुस्कियाँ! जल्दी ही बारीश रूक गई| फिर आगे बढ़ा| सड़क से गुजरनेवाले बाईकर्स बेस्ट लक देते; कभी हाथ से सॅल्यूट भी करते!
मुलबेक! यह वह स्थान है जहाँ से बौद्ध प्रभाव साफ दिखने लगता है| यहीं‌ से जुले जुले याने हॅलो/ नमस्ते शुरू हुआ! लदाख़ी माने नजर आने लगे| भगवान बुद्ध ने कहा था कि भविष्य में एक बुद्ध आएगा जो मैत्रेय याने मित्र स्वरूप होगा| यह विशाल मूर्ति उसी मैत्रेय बुद्ध का प्रतिक है| यहाँ बाईकर्स ने काफी तारीफ की; फोटो भी‌ खींचे| कुछ ने साईकिल चलायी|‌ बड़ी मुश्किल से आगे बढ़ा| होटल ढुँढ रहा था| मुलबेक गाँव के बच्चों ने भी रोकने का प्रयास किया| कुछ दूर पीछे भी आए| पीछली बार जब मै आया था तो मुलबेक के बाद एक जगह नेपाली होटल में खाना खाया था| आगे वाखा गाँव में वही होटल मिला| यहाँ जम कर खाना खाया गया| आलू के पराठें और सब्जी- दाल| करगिल से ४४ किलोमीटर पूरे हो गए हैं और अभी तक दोपहर के दो भी नही बजे हैं! तबियत खुश हो गई| एक बार लगा कि चलो यही रूक लेते हैं| पर सोचा कि अभी बहुत समय है और थकान भी बहुत कम है| इसलिए आगे बढना तय किया| आगे तुरन्त नमिकेला की चढाई शुरू होनेवाली है| अगला गाँव भी उसके बाद ही आएगा और रुकने का स्थान भी उसके बाद ही मिलेगा| लेकिन अभी बहुत समय है| नमिकला यदि पैदल भी चढना पड़े तो पार कर लूँगा| और रोशनी तो आठ बजे तक रहेगी|
वाखा से आगे बढ़ते ही नमिकेला की चढाई शुरू हुई|‌ लदाख़ी भाषा में 'ला' का अर्थ होता है पास या घाट| नमिकेला, झोजिला, फोतुला ये सभी 'ला' घाट है| और लदाख़ शब्द भी ला- दाख़ अर्थात घाटों का प्रदेश इस अर्थ को दर्शाता है| पहले पाँच किलोमीटर तो साईकिल चला पाया| लेकिन जब नमिकेला नौ किलोमीटर रहा तब पैदल चलना पड़ा| और यही ठीक है क्यों कि चढाई पर ज्यादा ऊर्जा खर्च करना भी ठीक नही| यहाँ सहजता से पार हुआ तो ऊर्जा दिन के अन्त में काम आ सकती है| सड़क पर जानेवाले कुछ लोग हाथों के इशारे से सराहना करते रहे| मोबाईल में संगीत शुरू किया और आगे बढता गया| वाकई मै अब ३५०० मीटर के उपर चढ रहा हुँ! मन में खुशी का ठिकाना नही है| चढाई की वजह से हर थोडे कदमों के बाद रूकना आवश्यक है| पहले तो छाँव देख कर वहीं रूक जाता| लेकिन जैसे ऊँचाई बढ़ती गई; मौसम ठण्डा हुआ| अब तो छाँव में रूकने के बजाय धूप में रूकने की नौबत आ गई! जब नमिकेला तीन किलोमीटर रहा तो सड़क समतल हो गई| नीचे के ग्राफ में देख सकते हैं| वहाँ उपर से आनेवाली हवा ने भी साथ दिया और फिर साईकिल पर बैठ गया| देखते देखते नमिकेला टॉप पहुँच गया| कुछ समय वहाँ रूक के आगे बढ़ा|
अब उतरने में मजा है! उतरना भी कठिन है| पेडल तो नही मारने पड़ेंगे; पर ब्रेक्स बड़ी सावधानी से लगाने होंगे| बीच बीच में ब्रेक्स को भी ब्रेक देना होगा नही तो वे गरम होंगे और नाराज होंगे| फिर भी सहजता से ही उतरता गया| कहीं पर भी इतनी तेज उतराई नही थी जिससे पैदल उतरना पड़ता| बीच में रूकते रूकते ढलान पार हो गई| अब शाम के छह बज रहे है| अब रूकने का ठिकाना ढूँढना है| पहला गाँव लगा वह काफी छोटा था| बाद में बटालिक वाली सड़क को जोडनेवाली एक सड़क भी आयी| लेकिन अभी होटल या गाँव नही आया है| अब बुधखारबू पास है| वहीं रूकने का होटल या होम स्टे मिल जाएगा| दिन के अन्त में अब अच्छी थकान होने लगी है| भूख उतनी नही लगी है लेकिन अब साधारण सी चढाई भी कठिन लग रही है| आगे तो मामुली सी चढाई पर भी पैदल जाना पड़ा| साथ में होने पर भी मैने कोई एनर्जी बार/ चॉकलेट या ओआरएस नही लिए हैं| शायद उसी कारण अब मामुली चढाई पैदल चढने की नौबत आयी है| लेकिन अब बुधखारबू पास ही है| सात बजे है, लेकिन अन्धेरा होने के पहले वहाँ पहुँच जाऊँगा|
लेकिन बुधखारबू में मकान तो मिले लेकिन होटल नही था| गोन्पा और गेस्ट हाउस भी थे; लेकिन वे बन्द थे| लोगों ने बताया कि आगे होटल मिलेगा| जैसे तैसे आगे बढ़ता गया| सोच रहा था अब तक कम से कम सत्तर किलोमीटर तो हो गए होंगे| पहले ही दिन सत्तर किलोमीटर! सुबह तो मै मुलबेक भी पहुँचने की स्थिति को लौटरी के समान मान रहा था| अब तो उसके भी आगे आया हुँ| लेकिन इस हौसले के बावजूद दिन के अन्तिम किलोमीटर आसान नही हुए| बुधखारबू गाँव भी धीरे धीरे पीछे चला जा रहा है| अब होटल कहाँ मिलेगा? यहाँ तो सब मिलिटरी के टीसीपी है- ट्रान्झिट कैंप्स| यहाँ होटल मिलना मुश्किल लग रहा है.. आगे एक मिलिटरी का कॅफे दिखा| वहाँ लिखा है- सिव्हिलिएन्स आर वेलकम| वहाँ जा के पूछताछ की| पहले तो उन्होने पूछा कि मै कौन हुँ, कहाँ से हुँ, कहाँ जा रहा हुँ| साईकिल पर? करगिल से? ओह हो| वे बहुत चकित हुए| संयोग से वह कॅफेटेरिया मराठा जवान चला रहे थे| उन्होने तुरन्त कहा, आप चिन्ता मत किजिए, हम आपकी व्यवस्था कर देते हैं| मैने कहा कि मेरे पास स्लीपिंग बैग है; मुझे मात्र थोड़ी सी जगह किसी होटल में चाहिए| उन्होने कहा, आप हमारे साथ ही रूक जाईए| हमारे ही गेस्ट बनिए| उन जवानों के बड़े अधिकारी भी वही थे| तुरन्त उनमें बात हुई| “करगिल से साईकिल पर" यह शब्द कारगर सिद्ध हुए और थोड़ी ही देर में मुझे सेना के जवानों के साथ रूकने का मौका मिला.. वाकई आज का दिन लगातार सरप्राईज दे रहा है| किस्मत किसे कहाँ ले आती है! जवानों के साथ पहले कई बार मिला था; रिलिफ कार्य में साथ भी था; लेकिन अब उनके ही टीसीपी में; उनकी ही बराक में रूकने का अवसर! सोने पे सुहागा! जल्द ही जवान मुझे उनकी बराक में ले गए| उन्होने कहा हम कभी कैंप के उस तरफ जाते समय भी अकेले नही जाते; कम से कम दो जने जाते हैं और आप अकेले आए हो! तारीफ पे तारीफ| मुझे महाराष्ट्र के मेजर- लेफ्टनंट जैसे अधिकारियों की बराक में ठहराया गया| मेरा गाँव परभणी- एक मेजर तो उसी जिले का है| फिर क्या! वे भी खुश और मेरी खुशी का तो ठिकाना ही नही है! वाकई जिन्दगी किसे कहाँ कहाँ ले जाती है! पहली बार अन्दर से मिलिटरी कैंप देख रहा हुँ| उनका रहन- सहन; उनकी जीवनशैलि करीब से देखने का अवसर मिला|
ऐसी यात्रा में घूमने के साथ ही ऐसा अवसर भी मिलता है जब हम लोगों को और प्रकृति को और अलग अन्दाज़ में जान सकते हैं| ऐसी पृष्ठभूमि बनती है जिसमें आम तौर पर न होनेवाली बातें हो जाती है| मिलना- जुलना होता है| यह शाम भी ऐसी ही अनुठी है| वाकई पहला दिन स्वप्नवत् रहा| क्या सच में मैने लदाख़ में सत्तर किलोमीटर साईकिल चलायी है...? ..और क्या वाकई मै मिलिटरी के जवानों के बीच हुँ?? “कन्धों से मिलते है कन्धे कदमों से कदम मिलते हैं.." पहले ही दिन सच हुआ है?

सुरू नदी के साथ साईकिलिंग आरम्भ


करगिल युद्ध की निशानी
नदी और उपर आती सड़क
वीरता के ऐसे अनगिनत स्थान जम्मू- कश्मीर- लदाख़ में है

















मैत्रेय बुद्ध















नमिकेला की चढाई
नमिकेला लगभग ३८०० मी


पहले दिन का लेखाजोखा| करगिल- बुधखारबू ७१ किमी और लगभग १९०० मी. चढाई और १००० मी. उतराई

Tuesday, June 16, 2015

साईकिल पर जुले लदाख़ भाग ०- प्रस्तावना

लदाख़! भारत का वह रमणीय क्षेत्र! वस्तुत: वह एक जगह या पर्यटन स्थल न हो कर एक अद्भुत दुनिया है! लदाख़ वह दुनिया है जिसमें बर्फाच्छादित पर्वत, नदियाँ, झरने, जंगल, दंग कर देनेवाली झीलें, रेगिस्तान यह सब है! मानो लदाख़ एक युनिव्हर्स है जिसमें ये सभी चीजें साथ देखी जा सकती हैं| चार बरस पहले जब इस विश्व का कुछ आस्वाद लिया था तब से यहाँ फिर जाने की बड़ी आकांक्षा थी| उसके बाद जब से विलक्षण भारतीय ट्रेकर और साहसी यात्री नीरज जाटजी की लदाख़ साईकिल यात्रा पढी, तब से मन में ठान लिया कि लदाख़ साईकिल पर ही जाना है| दो साल पहले की यह बात है| उनकी यात्रा देखते ही एक प्राथमिक गेअरवाली साईकिल खरीद ली| दस साल के विराम के बाद साईकिल की जीवन में वापसी हुई| धीरे धीरे साईकिल चलाने का हुनर पुनर्जीवित होता चला गया| एक दिन में दस, पच्चीस, चालीस, साठ किलोमीटर साईकिलिंग से आगे बढता गया| धीरे धीरे शतक भी हुआ| बीच बीच में साईकिलिंग खण्डित भी होती रही; और फिर से जीवित भी हुई| साईकिल उठाने के दो सालों के भीतर छह हजार किलोमीटर भी पूरे हो गए जिसमें सात शतक और बीस से अधिक अर्धशतक भी हुए| पीछले साल एक एडव्हान्स साईकिल- टारगेट फायरफॉक्स भी ले ली|

यही क्रम आगे बढता गया और धीरे धीरे विश्वास बढ़ने लगा कि लदाख़ साईकिल पर जाया जा सकता है| किस्मत से बाकी सब चीजें भी अनुकूल रही| धीरे धीरे लदाख़ का प्लैन बन गया| हालाकि जब भी साईकिल पर बड़ी यात्रा कर लौट आता तो अन्दर से आवाज आती- बस हो गया लदाख़ यहीं पर! जब कड़ाके की धूप में रास्ते पर हांफता पंक्चर निकालने की असफल कोशिश करता, तब लगता कि लदाख़ यही पर हो गया| साईकिल पर बड़ी यात्रा करना एक शिखर को पार करने जैसा लगा| शिखर पार करने के बाद उतर कर खाई के अन्धेरे से गुजरना पड़ता है| उस समय बिलकुल लगता की छोडो यह पागलपन| बहुत हुआ| लेकिन अगले दिन ऊर्जा लौट आती| यही क्रम चलता रहा| शिखर के बाद खाई आती रही और उसके बाद फिर शिखर| धीरे धीरे ग्रेड ५, ग्रेड ४ और ग्रेड १ की चढाई भी चढ पाया| महाराष्ट्र में तोरणमाळ और पुणे के पास सिंहगढ जैसी चढाई साईकिल पर पार की| बढते स्टॅमिना का पता इस बात से लगता था कि पहले तो छोटी सी चढाई भी‌ साईकिल पर पार नही होती थी; एक तिहाई दूरी साईकिल पर चलने के बाद पैदल चलना पड़ता था| लेकिन जैसे अभ्यास जारी रहा, वही चढाई साईकिल पर पार की; हालाकि तीन बार रूकना पड़ा| फिर वही चढाई बिना रूके पार की| बाद में चार बार वही चढाई बिना रूके साईकिल पर पार की| उसके भी बाद हायर गेअर पर भी उसे पार किया| इस प्रकार बढ़ते स्टॅमिना का अनुभव हुआ|
स्टॅमिना बढाने के साथ साईकिल के मॅकेनिक का काम भी सीखता गया| साईकिल खोलना- जोड़ना सीख गया| पहिए और पूरा ढाँचा अलग करना सीख गया| पंक्चर और प्राथमिक ब्रेक सेटिंग- गेअर प्रणालि भी सीख गया| पंक्चर सीखना भी मजेदार रहा| कई बार पंक्चर निकालने का देख कर लगता था कि इसमें क्या है? पर जब आधा दिन साईकिल चलाने के बाद वाकई सड़क के किनारे साईकिल खड़ी कर पंक्चर निकालने के लिए बैठा तो लोहे के चने चबाने जैसा लगा| पाँच- छह बार असफल होने के बाद पंक्चर लगाना आ गया| लेकिन यह बात अच्छी थी कि मैने स्वयं को पाँच- छह बार असफल होने के अवसर भी दिए| उससे ही तो सीखना हुआ|

लदाख़ जाने से पहले कम से कम लगातार आंठ दिन की कोई साईकिल यात्रा करने का सोचा| पर वैसा कर नही पाया| वह होता तो और अभ्यास हो जाता| उसके बिना ही सही, बाकी तैयारी जारी रखी| दिसम्बर २०१४ में नौ दिनों में कुल लगभग ५५० किलोमीटर साईकिल निरंतर चलाई थी| इस पूरी यात्रा में महाराष्ट्र के परभणी के साईकिलिंग ग्रूप के सदस्य; नीरज जाट जी और नांदेड के एक सायकलिस्ट ने काफी मार्गदर्शन दिया| २०१५ आते आते साईकिलिंग में सातत्य बढ़ गया| वजन भी धीरे धीरे कम हुआ| लदाख़ जाते समय साईकिल ट्रेन में फोल्ड कर रखने का काफी विचार किया| कई बार उसका जुगाड़ कर देखा| साईकिल दो मिनट में फोल्ड तो हो जाती; पर उसके पहिए बड़े होते| उनको बोरे में रखने में सफलता नही मिली| काफी सोच- विचार और मशक्कत के बाद साईकिल ट्रेन में पार्सल में रखने का निर्णय लिया| साईकिल में नयी चेन और मजबूत पर महंगे होनेवाले नए टायर्स और ट्युब डाल दी| अच्छे से सर्विसिंग करवा ली| यह योजना सोलो साईकिलिंग थी| सभी को इसका अचरज हुआ; काफी कुछ सुझाव भी झेलने पड़े| जाते समय एक्सेसरीज को ले कर भी काफी सुझाव झेलने पड़े| अन्दर से जिन बातों की आवश्यकता लगी, उन पर ही ध्यान दिया| आखिर सब कुछ होने के बाद २६ मई को लदाख़ जाने के लिए निकला|

मूल योजना मनाली- लेह जाने की थी| पर मई के अन्त तक खुलनेवाला मनाली- लेह रोड़ इस वर्ष खुला ही नही था| वरन् वहाँ अत्यधिक बरफ जमी थी| उसके जल्द खुलने के आसार नही थे| इसलिए श्रीनगर रोड़ से ही जाना पड़ा| सोचा की करगिल से साईकिलिंग शुरू करूँगा| वहाँ तक ट्रेन- बस- जीप से जाऊँगा| अम्बाला तक ट्रेन, फिर जम्मू तक बस, जम्मू से श्रीनगर जीप और श्रीनगर से करगिल जीप ऐसी यात्रा हुई| जम्मू- श्रीनगर के बीच ट्रॅफिक या 'स्थानीय' कारणों से रूकने की नौबत नही आयी और सीधा आगे बढ़ सका| साईकिल को ट्रेन से ले जाते समय भी काफी दिक्कतें आयी| हर बार कुछ ना कुछ जुगाड़ करना पड़ा| आखिर कर अम्बाला कँट से करगिल तक बिना रूके यात्रा हुई|

श्रीनगर से आगे सोनामार्ग और झोजिला में बड़ी बरफ मिली| गर्मियों के दिनों में इतनी बरफ थोड़ी अप्रत्याशित थी| निरंतर तीन दिन यात्रा कर २९ मई की रात करगिल पहुँचा| करगिल में एक सादा सा होटल ढूँढा और विश्राम करने लगा| खाने के लिए ठीक होटल नही मिला| जैसे तैसे बिस्कुट- चिप्स खा लिए| यहाँ एक मजे की बात यह है कि करगिल २७०० मीटर्स की ऊँचाई पर है जहाँ हवा थोड़ी विरली होती है| हवा का प्रेशर कम होता है| इसलिए चिप्स के पैकेट अन्दर से एअर टाईट लग रहे है! करगिल में सुरू नदी का नाद वाकई रोमांचकारी है| करगिल! एलओसी पर आज का बसेरा!

लेकिन इसके अलावा बाकी हौसला बिलकुल ही डाउन है| जम्मू के बाद पहाड़ी सड़क थी; उलटी होने की सम्भावना के चलते कुछ भी खाया नही गया है| यात्रा में भी कम ही खाना था| इसलिए ऊर्जा स्तर न्यूनतम है| मन में डर चरम सीमा पर है| आज तक जीवन में कभी भी २५०० मीटर्स से अधिक ऊँचाई पर ट्रेक या साईकिलिंग नही की‌ है| लदाख़ पहले भी गया हुँ पर वह जीप में| हिमालय में कुछ ट्रेक तो किए हैं; पर वे सब छोटे या मध्यम श्रेणि के थे और २५०० मीटर्स के नीचे ही थे| इन सब बातों के चलते मन में डर बढ़ता चला गया| नीचे कितनी भी साईकिल चलायी हो; यहाँ साईकिल चलाना एक अलग ही बात है|‌ कई बार लगा कि यहीं से वापस लौट चलो; आगे बढ़ना नामुमकीन सा है| यहाँ से कम से श्रीनगर तुरन्त पहुँचा जा सकता है! मन सतत सी-सॉ जैसे कूंदता रहा| रात में नीन्द भी नही आयी और अस्वस्थता में रात बढ़ती गई| देर रात कहीं नीन्द लगी. . . .

सोनामार्ग में साईकिल और बरफ
















झोजिला के पास बरफ







 
करगिल, साईकिल और सुरू नदी!















































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