Wednesday, June 17, 2015

साईकिल पर जुले लदाख़ भाग १- करगिल- मुलबेक- नमिकेला- बुधखारबू

०. साईकिल पर जुले लदाख़ भाग ०- प्रस्तावना 

३० मई की सुबह करगिल में नीन्द जल्दी खुली| जल्दी से तैयार हुआ| आज मेरी पहली परीक्षा है| आज लदाख क्षेत्र में साईकिलिंग का आरम्भ होगा| आज के दिन के स्कोअर पर आगे का सब निर्भर करेगा| आज पता भी चल जाएगा कि लदाख में साईकिलिंग कर सकता भी हुँ या नही| कल रात के मुकाबले सुबह मन शान्त है| एक तरह की उत्तेजना है| कल तक करगिल से बटालिक और दाह के रास्ते लेह को जाने की योजना थी| बटालिक से जानेवाला रास्ता पीछले बार देखा नही था| और बटालिक के रास्ते जाने पर पहले ही दिन सिन्धू नदी का दर्शन होने की सम्भावना थी| उस रास्ते पर जाने के लिए पहले तो परमिट लगता था; लेकिन चूंकी अब लदाख में भारतीय पर्यटकों को कोई परमिट की आवश्यकता नही रही; इसलिए यहाँ भी परमिट आवश्यक नही होगा ऐसे सोचा था| पर करगिल में पूछताछ में पता चला कि शायद परमिट लगता है| कोई स्पष्ट नही बता पा रहा था| बात बिलकुल मध्य में अटकी| कुछ बोल रहे थे कि परमिट की कोई आवश्यकता नही; कुछ बोल रहे थे कि कमिशनर से परमिट लेना होगा| अत: कल शाम की शंकाकुशंकाओं के बीच तय किया कि बटालिक के बजाय मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग से मुलबेक के रास्ते ही आगे बढ़ूँगा|

सुबह जैसे ही होटल के बाहर निकला बून्दाबाँदी ने स्वागत किया| लदाख क्षेत्र में बारीश? फिर भी बारीश बहुत थोड़ी हो रही है| आगे बढ़ सका| कल करगिल आते समय द्रास में ३३०० मीटर की ऊँचाई पर कुछ समय जब रूका था, तब साँस लेने में थोड़ी तकलीफ आयी थी| कल करगिल में भी सड़क पर चलते समय या चढाई पर चलने के बाद थोड़ी साँस फूल रही थी|‌ लेकिन साईकिल चालू करने पर अब उतनी समस्या नही आ रही है| जरूर करगिल में रात बिताने का लाभ मिला| आज पहला ही‌ दिन है| आज बिल्कुल रूकते रूकते जाना है| आज मन कल जैसा निराश तो नही है; पर लग तो यही रहा है कि चालीस किलोमीटर दूर मुलबेक तक भी दिन में पहुँचू तो स्वयं को धन्य समझूँगा! धीरे धीरे आगे बढ़ता गया| सुरू नदी ने बड़ा हौसला दिया| पौन घण्टे में करगिल कस्बे के बाहर मुख्य सड़क पर पहुँचा| यहाँ आमलेट- चाय लिया|
करगिल युद्ध में क्षतिग्रस्त हुआ पेट्रोलपंप दिखा| यहाँ से रास्ता थोड़ा उपर उठता है| चलने में कुछ भी कठिनाई महसूस नही हो रही|‌ एक कठिनाई जरूर है- सामान ठीक से बान्धने की| अगर इसके पहले साईकिल पर कोई बड़ी यात्रा की होती; तो सामान बान्धने का अभ्यास हो जाता| खैर| थकान की बजाय सामान ठीक करने के लिए रूकना पड़ रहा है| लेकिन क्या नजारा है! वाकई विश्वास नही हो रहा है कि मै "यहाँ" साईकिल चला रहा हुँ. . . पहले दो घण्टों में ही बारह किलोमीटर हो गए! अब तो पहली चढाई भी पूरी हो गई| अब यहाँ से मुलबेक तक करीब सीधा ही रास्ता है| एक के बाद एक मोड़ आते जा रहे है| छोटे छोटे पहाड़ आ कर पीछे जा रहे है| बीच बीच में कुछ बस्ती भी है|
वाकई अब मै दोपहर में ही मुलबेक तक पहुँच सकता हुँ| क्या बात है! बीच में एक स्थान पर सड़क कच्ची है| लेकिन कुल मिला के बढिया सड़क| सुबह के बाद बारीश बिलकुल नही है| लेकिन आगे जाने पर एक जगह बारीश मिली| संयोग से एक टी स्टॉल भी मिला| वहाँ साईकिल को शेल्टर भी मिल गया| बारीश, ठण्ड, लदाख़ और ऐसे में चाय कि चुस्कियाँ! जल्दी ही बारीश रूक गई| फिर आगे बढ़ा| सड़क से गुजरनेवाले बाईकर्स बेस्ट लक देते; कभी हाथ से सॅल्यूट भी करते!
मुलबेक! यह वह स्थान है जहाँ से बौद्ध प्रभाव साफ दिखने लगता है| यहीं‌ से जुले जुले याने हॅलो/ नमस्ते शुरू हुआ! लदाख़ी माने नजर आने लगे| भगवान बुद्ध ने कहा था कि भविष्य में एक बुद्ध आएगा जो मैत्रेय याने मित्र स्वरूप होगा| यह विशाल मूर्ति उसी मैत्रेय बुद्ध का प्रतिक है| यहाँ बाईकर्स ने काफी तारीफ की; फोटो भी‌ खींचे| कुछ ने साईकिल चलायी|‌ बड़ी मुश्किल से आगे बढ़ा| होटल ढुँढ रहा था| मुलबेक गाँव के बच्चों ने भी रोकने का प्रयास किया| कुछ दूर पीछे भी आए| पीछली बार जब मै आया था तो मुलबेक के बाद एक जगह नेपाली होटल में खाना खाया था| आगे वाखा गाँव में वही होटल मिला| यहाँ जम कर खाना खाया गया| आलू के पराठें और सब्जी- दाल| करगिल से ४४ किलोमीटर पूरे हो गए है और अभी तक दोपहर के दो भी नही बजे हैं! तबियत खुश हो गई| एक बार लगा कि चलो यही रूक लेते हैं| पर सोचा कि अभी बहुत समय है और थकान भी बहुत कम है| इसलिए आगे बढना तय किया| आगे तुरन्त नमिकेला की चढाई शुरू होनेवाली है| अगला गाँव भी उसके बाद ही आएगा और रुकने का स्थान भी उसके बाद ही मिलेगा| लेकिन अभी बहुत समय है| नमिकला यदि पैदल भी चढना पड़े तो पार कर लूँगा| और रोशनी तो आठ बजे तक रहेगी|
वाखा से आगे बढ़ते ही नमिकेला की चढाई शुरू हुई|‌ लदाख़ी भाषा में 'ला' का अर्थ होता है पास या घाट| नमिकेला, झोजिला, फोतुला ये सभी 'ला' घाट है| और लदाख़ शब्द भी ला- दाख़ अर्थात घाटों का प्रदेश इस अर्थ को दर्शाता है| पहले पाँच किलोमीटर तो साईकिल चला पाया| लेकिन जब नमिकेला नौ किलोमीटर रहा तब पैदल चलना पड़ा| और यही ठीक है क्यों कि चढाई पर ज्यादा ऊर्जा खर्च करना भी ठीक नही| यहाँ सहजता से पार हुआ तो ऊर्जा दिन के अन्त में काम आ सकती है| सड़क पर जानेवाले कुछ लोग हाथों के इशारे से सराहना करते रहे| मोबाईल में संगीत शुरू किया और आगे बढता गया| वाकई मै अब ३५०० मीटर के उपर चढ रहा हुँ! मन में खुशी का ठिकाना नही है| चढाई की वजह से हर थोडे कदमों के बाद रूकना आवश्यक है| पहले तो छाँव देख कर वहीं रूक जाता| लेकिन जैसे ऊँचाई बढ़ती गई; मौसम ठण्डा हुआ| अब तो छाँव में रूकने के बजाय धूप में रूकने की नौबत आ गई! जब नमिकेला तीन किलोमीटर रहा तो सड़क समतल हो गई| नीचे के ग्राफ में देख सकते हैं| वहाँ उपर से आनेवाली हवा ने भी साथ दिया और फिर साईकिल पर बैठ गया| देखते देखते नमिकेला टॉप पहुँच गया| कुछ समय वहाँ रूक के आगे बढ़ा|
अब उतरने में मजा है! उतरना भी कठिन है| पेडल तो नही मारने पड़ेंगे; पर ब्रेक्स बड़ी सावधानी से लगाने होंगे| बीच बीच में ब्रेक्स को भी ब्रेक देना होगा नही तो वे गरम होंगे और नाराज होंगे| फिर भी सहजता से ही उतरता गया| कहीं पर भी इतनी तेज उतराई नही थी जिससे पैदल उतरना पड़ता| बीच में रूकते रूकते ढलान पार हो गई| अब शाम के छह बज रहे है| अब रूकने का ठिकाना ढूँढना है| पहला गाँव लगा वह काफी छोटा था| बाद में बटालिक वाली सड़क को जोडनेवाली एक सड़क भी आयी| लेकिन अभी होटल या गाँव नही आया है| अब बुधखारबू पास है| वहीं रूकने का होटल या होम स्टे मिल जाएगा| दिन के अन्त में अब अच्छी थकान होने लगी है| भूख उतनी नही लगी है लेकिन अब साधारण सी चढाई भी कठिन लग रही है| आगे तो मामुली सी चढाई पर भी पैदल जाना पड़ा| साथ में होने पर भी मैने कोई एनर्जी बार/ चॉकलेट या ओआरएस नही लिए है| शायद उसी कारण अब मामुली चढाई पैदल चढने की नौबत आयी है| लेकिन अब बुधखारबू पास ही है| सात बजे है, लेकिन अन्धेरा होने के पहले वहाँ पहुँच जाऊँगा|
लेकिन बुधखारबू में मकान तो मिले लेकिन होटल नही था| गोन्पा और गेस्ट हाउस भी थे; लेकिन वे बन्द थे| लोगों ने बताया कि आगे होटल मिलेगा| जैसे तैसे आगे बढ़ता गया| सोच रहा था अब तक कम से कम सत्तर किलोमीटर तो हो गए होंगे| पहले ही दिन सत्तर किलोमीटर! सुबह तो मै मुलबेक भी पहुँचने की स्थिति को लौटरी के समान मान रहा था| अब तो उसके भी आगे आया हुँ| लेकिन इस हौसले के बावजूद दिन के अन्तिम किलोमीटर आसान नही हुए| बुधखारबू गाँव भी धीरे धीरे पीछे चला जा रहा है| अब होटल कहाँ मिलेगा? यहाँ तो सब मिलिटरी के टीसीपी है- ट्रान्झिट कैंप्स| यहाँ होटल मिलना मुश्किल लग रहा है.. आगे एक मिलिटरी का कॅफे दिखा| वहाँ लिखा है- सिव्हिलिएन्स आर वेलकम| वहाँ जा के पूछताछ की| पहले तो उन्होने पूछा कि मै कौन हुँ, कहाँ से हुँ, कहाँ जा रहा हुँ| साईकिल पर? करगिल से? ओह हो| वे बहुत चकित हुए| संयोग से वह कॅफेटेरिया मराठा जवान चला रहे थे| उन्होने तुरन्त कहा, आप चिन्ता मत किजिए, हम आपकी व्यवस्था कर देते हैं| मैने कहा कि मेरे पास स्लीपिंग बैग है; मुझे मात्र थोड़ी सी जगह किसी होटल में चाहिए| उन्होने कहा, आप हमारे साथ ही रूक जाईए| हमारे ही गेस्ट बनिए| उन जवानों के बड़े अधिकारी भी वही थे| तुरन्त उनमें बात हुई| “करगिल से साईकिल पर" यह शब्द कारगर सिद्ध हुए और थोड़ी ही देर में मुझे सेना के जवानों के साथ रूकने का मौका मिला.. वाकई आज का दिन लगातार सरप्राईज दे रहा है| किस्मत किसे कहाँ ले आती है! जवानों के साथ पहले कई बार मिला था; रिलिफ कार्य में साथ भी था; लेकिन अब उनके ही टीसीपी में; उनकी ही बराक में रूकने का अवसर! सोने पे सुहागा! जल्द ही जवान मुझे उनकी बराक में ले गए| उन्होने कहा हम कभी कैंप के उस तरफ जाते समय भी अकेले नही जाते; कम से कम दो जने जाते हैं और आप अकेले आए हो! तारीफ पे तारीफ| मुझे महाराष्ट्र के मेजर- लेफ्टनंट जैसे अधिकारियों की बराक में ठहराया गया| मेरा गाँव परभणी- एक मेजर तो उसी जिले का है| फिर क्या! वे भी खुश और मेरी खुशी का तो ठिकाना ही नही है! वाकई जिन्दगी किसे कहाँ कहाँ ले जाती है! पहली बार अन्दर से मिलिटरी कैंप देख रहा हुँ| उनका रहन- सहन; उनकी जीवनशैलि करीब से देखने का अवसर मिला|
ऐसी यात्रा में घूमने के साथ ही ऐसा अवसर भी मिलता है जब हम लोगों को और प्रकृति को और अलग अन्दाज़ में जान सकते हैं| ऐसी पृष्ठभूमि बनती है जिसमें आम तौर पर न होनेवाली बातें हो जाती है| मिलना- जुलना होता है| यह शाम भी ऐसी ही अनुठी है| वाकई पहला दिन स्वप्नवत् रहा| क्या सच में मैने लदाख़ में सत्तर किलोमीटर साईकिल चलायी है...? ..और क्या वाकई मै मिलिटरी के जवानों के बीच हुँ?? “कन्धों से मिलते है कन्धे कदमों से कदम मिलते हैं.." पहले ही दिन सच हुआ है?

सुरू नदी के साथ साईकिलिंग आरम्भ


करगिल युद्ध की निशानी
नदी और उपर आती सड़क
वीरता के ऐसे अनगिनत स्थान जम्मू- कश्मीर- लदाख़ में है

















मैत्रेय बुद्ध















नमिकेला की चढाई
नमिकेला लगभग ३८०० मी


पहले दिन का लेखाजोखा| करगिल- बुधखारबू ७१ किमी और लगभग १९०० मी. चढाई और १००० मी. उतराई

6 comments:

  1. Nice article. Keep it up Niranjan!

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  2. वाह, उम्मीद से दुगना। सायकिलिंग का अभ्यास रंग ला रहा है।

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  3. नीरज से ज्यादा अच्छा लिखा है सलाम ।

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