Thursday, September 12, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ६: स्पिलो से नाको

६: स्पिलो से नाको
 

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३१ जुलाई शाम को स्पिलो में होटलवाले युवकों‌ से अच्छी‌ बात हुई| यहाँ‌ से अब बौद्ध समुदाय ही मुख्य रूप से हैं| रहन- सहन और खाना भी लदाख़ जैसा लग रहा है| किन्नौर के इस दूरदराज के क्षेत्र में गाँव यदा कदा ही होते हैं| इसलिए हर एक गाँव में होटल, राशन, होम स्टे, बैंक आदि सब सुविधाएँ होती हैं| यहाँ पर पहले ब्लास्टिंग और सड़क की स्थिति का पता किया| मेरे जाने के बाद परसो स्पिलो के कुछ आगे ब्लास्टिंग किया जाएगा| सड़क फिलहाल तो ठीक है| स्पिलो में अच्छा नेटवर्क मिल रहा है, इसलिए आगे के रूट के बारे में कुछ पता किया| जब इंटरनेट पर पूह (पू) गाँव के बारे में देखा, तो पता चला कि १९०९ में‌ यहाँ तक- हिमालय में इतने अन्दर तक एक विदेशी‌ आया था और उसने निरीक्षण किया कि पूह (पू)‌ में सभी लोग तिब्बती बोलते हैं! अगले दिन याने १ अगस्त को मुझे वही‌ं से जाना है| सुबह निकलने के पहले जब प्रेयर व्हील के पास टहल रहा था, तब कुछ लोगों ने मुझसे बात की| उन्होने मेरे अभियान के बारे में जानना चाहा, बाद में रूचि भी ली| श्री नेगी जी से बात हुई| उन्होने मुझे आज के नाको के होटल का भी सम्पर्क दिया| मुझे शुभकामनाएँ भी दी| सुबह आलू- पराठे का नाश्ता करने के बाद निकला| आज शायद बीच में होटल कम ही लगेंगे, इसलिए बिस्कीट और केले भी ले लिए| कल के मुकाबले आज अच्छी धूप खिली है, आसमाँ नीला नजर आ रहा है| स्पिलो छोडते समय तो मुस्कुरा रहा हूँ....







स्पिलो के तुरन्त बाद ब्लास्टिंग वाली जगह आयी| सड़क बहुत क्षतिग्रस्त है| और अब लगातार प्रमाण मिल रहा है कि इसे दुनिया की सबसे दुर्गम सड़क क्यों कहते हैं| बिल्कुल बंजर सड़क! और टूटे फूटे और टूटते पहाड़! बिल्कुल पथरिली सड़क! और आज लगातार चौथे दिन भी सतलुज की गूँज! हालांकी आज सतलुज- स्पीति का संगम लगेगा और उसके बाद सतलुज को छोड कर मै स्पीति की शरण लूँगा| राजकीय रूप से नाको किन्नौर में आता है, लेकीन प्राकृतिक रूप से संगम के बाद स्पीति वैली शुरू हो जाएगी| कल और परसो के अनुभव से आज की महा- दुर्गम सड़क के लिए तैयार हूँ... ब्लास्टिंग वाला पैच लगभग तीन- चार किलोमीटर तक है| उसके बाद एक टीला लगा और वहाँ पर तिब्बती प्रेअर फ्लैग्ज लहरा रहे हैं| इसका मतलब जरूर यह पुराने जमाने का कोई ला होगा- कोई छोटा पास होगा| इसके बाद सड़क अच्छी मिलेगी| और वैसा ही हुआ|‌ कुछ देर के लिए अच्छी- सुरक्षित सड़क मिली! बीच बीच में बीआरओ के कर्मी छोड़ कर अब बाकी के वाहन बहुत ही कम नजर आ रहे हैं| अचानक कहीं से हिमाचल परिवहन की एक बस आती हैं! 'देवभूमि हिमाचल' के बस चालकों को मेरा सलाम!







आज मौसम साफ होने के कारण ऊँची चोटियाँ नजर आ रही है| और अब हिमाच्छादित शिखर भी बार बार नजर आने लगे हैं| हिमाचल के कुछ हिस्सों में बारीश की चेतावनी जारी की है| लेकीन यहाँ बारीश का मौसम नही है| बारीश के आसार बिल्कुल न होने से अब काफी हद तक निश्चिंत हूँ| बारीश के डर वाला प्रदेश मैने पार किया है| इसके आगे लाहौल तक ज्यादा बारीश नही मिलेगी| स्पिलो के होटलवालों ने भी यही कहा था| कुछ देर तक तो बादल रहित निला आसमाँ देख कर अच्छा लगा| लेकीन कुछ देर बाद धूप की वजह से गर्मी भी होने लगी| और सड़क सतलुज के साथ ही बढ़ रही है| तो पानी की धारा पास में मौजुद होने के कारण ह्युमिडिटी भी है|





अब इन्तजार है पूह (पू) गाँव का| क्यों कि आज की सड़क ऐसी है जहाँ गाँव बहुत ही कम मिलेंगे| और होटल- सिर्फ चाय- बिस्कीट वाले होटल भी कम ही होंगे| पूह के कुछ पहले मिलिटरी युनिटस लगे|‌ कुछ होटल बन्द है| गर्मी से कुछ थकान होने लगी है| सामने एक सड़क पहाड़ पर चढती दिखाई दे रही है| मेरे मैप के अनुसार खाब संगम तक तो लगभग समतल सड़क होगी| और यह सड़क पूह गाँव के अन्दर की‌ तरफ जा रही है| यह देख कर राहत मिली| गाँव के पहले पारंपारिक माने भी दिखा (एक सफेद पत्थर जैसी दिखनेवाली बौद्ध रचना)| अब होटल की तलाश है| एक दो होटल बन्द दिखे| यहाँ‌ बहुत ट्रक्स खड़े दिखे| जगह जगह बीएसएफ के युनिटस भी है| जवानों से भी थोड़ी बातचीत हो रही है| यह इलाका अब इनर लाईन परमिट का है| कल पोवारी के पास ही परमिट की जगह है| चूँकी भारतीय नागरिक बिना परमिट के जा सकते हैं, इसलिए मुझे जाने दिया| विदेशियों के पासपोर्ट और परमिट यहाँ देखे जाते हैं| मिलिटरी युनिटस के बीच पूह गाँव कब खतम हुआ पता ही‌ नही चला| और ट्रकवालों ने बताया कि अगला होटल खाब में ही मिलेगा जो की अभी भी १३ किलोमीटर दूर है! होटल से बजाय मुझे पानी की ज्यादा जरूरत है| खाने के लिए तो केले और बिस्कीट है ही| एक जगह रूक कर केले और बिस्कीट खाए| गर्मी के कारण पानी बार बार पी रहा हूँ| और बोतल में साथ लिया पानी लगभग खतम हुआ है| और काफी देर से सड़क किसी प्राकृतिक पीने योग्य झरने के करीब से नही गुजरी है| अचानक एक जगह पानी का हैंडपंप दिखा| सड़क के पास कुछ नीचे है| जा कर उससे पानी भरने की कोशिश की| कई बार उसे उपर- नीचे करने के बाद थोड़ा पानी मिला| उतना पानी बोतल में भर लिया| तब लगा कि पंप को उपर- नीचे करने की मेहनत ज्यादा है, उससे मिलनेवाला पानी कम ही है! फिर भी थोड़ा पानी पी लिया और भर लिया... अब प्रतीक्षा है खाब अर्थात् स्पीति- सतलुज के संगम की...



अब तिब्बत सीमा मुश्कील से बीस किलोमीटर दूर है! आगे अब हिमाच्छादित पर्वत भी दिखाई दे रहे हैं! वाह! तिब्बत! कितने विलक्षण प्रदेश से यह यात्रा हो रही है! यहीं पर कुछ जे-के 10 नंबर प्लेट होनेवाली गाडीयाँ दिखी| कल मोबाईल में न्युज में पढ़ा था कि जम्मू- कश्मीर में दस हजार से अधिक पैरा मिलिटरी फोर्सेस को भेजा गया है| जरूर वहाँ पर कुछ हो रहा है| खैर| आज मै सतलुज से विदा लूँगा| इसलिए सतलुज के कुछ देर तक दर्शन करता रहा| रामपूर बुशहर से तीस किलोमीटर पहले से ले कर अब तक मै सतलुज के साथ ही चल रहा हूँ! और इतनी दूरी पार करने के बाद सतलुज भी अब कम चौडाई वाली पहाड़ी धारा बन गई है| रमणीय तो है ही, कुछ कुछ जगहों से बहुत डरावनी भी लगती है! हरे भरे हिमालय से ले कर अब शुष्क और रुखा- सुखा हिमालय! नजारों का आनन्द तो ले ही रहा हूँ, लेकीन थोड़ी देर बाद वापस थकान होने लगी| मुझे अभी अच्छा फ्युएल चाहिए| अच्छे से नाश्ता करना चाहिए| और नाश्ता करने का होटल मिला| एक सड़क दुब्लिंग गाँव की तरफ जा रही है| यहाँ सतलुज पर एक ब्रिज भी है| वहीं पर एक अच्छा सा होटल मिला| और विशेष बात यह है कि होटल में श्रेया घोषाल है! वाह! बाद में रफी साहाब भी मिले| उनका गाना बहुत ही उचित समय पर बजा- मन्जिल से राहें बड़ी ऐसा कुछ गाना था| गाना परिचित था, लेकीन पंक्तियाँ भूल गया हूँ| किन्नौर में कई होटलों में महिलाएँ अधिक दिखती हैं| यहाँ भी एक महिला ही थी| उन्होने मेरे लिए पराठा बनाया| चाय- बिस्कीट और पराठे का नाश्ता किया| आगे के गाँव के बारे में उनसे पूछा| उन्होने बताया कि आगे संगम पर (खाब ब्रिज) होटल होगा और उसके बाद का गाव आएगा और उसके बाद नाको| पूह के कुछ पहले तक मोबाईल नेटवर्क था, यहाँ मोबाईल भी अवाक् हो गया|





निकलने के बाद खाब के पहले के बीएसएफ के कुछ युनिटस लगे| एक जे- के रायफल्स का भी युनिट लगा| मुख्य सड़क- राष्ट्रीय महामार्ग २२२ के उपर पहाड़ी पर वहाँ जानेवाली सड़कें दिखी| और पास ही तिब्बत के पर्वत! जल्द ही खाब ब्रिज आ गया| यहाँ गाँव जैसा कुछ भी नही है| सिर्फ संगम पर ब्रिज है| स्पीति नदी! यहाँ सतलुज में समानेवाली स्पीति नदी बिल्कुल पहाड़ी नदी है| तेज गर्जना के साथ कून्दती- उफनती नदी! यहाँ से तिब्बत मुश्कील से १० किलोमीटर दूर होगा| तिब्बत के शिखर तो दिख ही रहे हैं! वाह! मानो जीवन को सार्थक बनानेवाला अनुभव लग रहा है यह| ब्रिज क्रॉस करने के बाद स्पीति के साथ जो सड़क आगे बढ़ने लगी, उसके बारे में क्या कहूँ! कुछ समय के लिए तो यह सड़क सड़क लगी ही नही| ऐसा लगा मानो यह एक ट्रेकिंग का पथ है- सिर्फ ट्रैक है जो नदी के साथ साथ पहाड़ पर उपर चढ़ रहा है! इतनी संकरी सड़क और बाजू में बहुत डरानेवाली स्पीति! इतनी छोटी सड़क   और तेज़ बहनेवाली हवा! इससे नियम- अनुशासन को कुछ समय के लिए भूल कर दाए तरफ रह कर ही साईकिल चलाने लगा| यहाँ वाहनों की आवाजाही बहुत ही कम है, इसलिए ऐसा कर पा रहा हूँ| सड़क इतनी छोटी है कि अगर कोई कार या जीप भी आ जाए, तो उसको जगह देने के लिए मुझे जगह ढूँढनी पड़ रही है और कुछ पलों तक रूकना पड़ रहा है! ऐसी सड़क पर बस और ट्रक भी चलते हैं! वाह! संगम हमेशा नीचला स्थान होता है| इसका मतलब कि संगम के बाद चढाई शुरू होती है| शुरू में यह चढाई तिखी है| फिर कुछ समय के बाद कुछ हल्की हुई| और सड़क भी स्पीति से उपर उठ कर पहाड़ में अन्दर की‌ तरफ आई| अब स्पीति कुछ नीचे बहती नजर आ रही है| लेकीन फिर भी एक तरफ खाई है ही| यहाँ जो फोटो खीचे हैं, वे डर- डर कर खींचे हैं या एक्स्पोजर से कुछ दूर आ कर खींचे हैं|


खाब ब्रिज के बाद की स्पीति!






कुछ चढ़ाई जब पूरी हुई, तब सामने का दृश्य दिखने लगा| सामने कई मोड ले कर सड़क फिर उपर उठती नजर आ रही है| कम से कम सांत- आठ लूप और होंगे! और हर एक लूप लगभग आधे किलोमीटर का होगा| यहाँ अब खाई का एक्स्पोजर तो कम हुआ है, लेकीन चढाई डरावनी लग रही है! और एक अर्थ में तो यकीन नही हो रहा है कि मै "ऐसे" सड़क पर और "ऐसी" चढ़ाई पर भी‌ साईकिल चला सकता हूँ! यहाँ भी सड़क का काम निरंतर चल रहा है| बीच बीच में बेचारे कमनसीब कार्मिक मिलते हैं| उन्हे नमस्ते कहता हूँ| कुछ कुछ लोगों को आश्चर्य होता है, कुछ कुछ तो यंत्रवत हो गए हैं| यहाँ सड़क कच्ची है, बीच बीच में छोटे पत्थर भी है| इससे गति बहुत ही कम है| लेकीन... लेकीन नजारों का क्या कहना! अब मै ऐसे दुर्गम पहाड़ के बीच हूँ जहाँ से चारों तरफ ऊँचे पहाड़ नजर आते हैं| बहुते से हिम शिखर अब दिखाई दे रहे है| और जैसे सड़क उपर चढ़ रही है, वैसे स्पीति नदी और ज्यादा नीचे नजर आ रही है| यहाँ ऐसे लगा कि एक स्थान पर पहले सड़क नदी के पास ही थी, लेकीन सम्भवत: वह सड़क बह गई, इसलिए नई सड़क पहाड़ पर उपर चढनेवाली बनानी पड़ी| संगम के बाद सात किलोमीटर के लिए समय लगा सवा घण्टा! बिल्कुल अवाक् करनेवाला यह अनुभव! शायर मेरे जीवन की सबसे कठिन राईडस में से एक- May be one of the life time toughest ride! यकीन ही नही हो पा रहा है कि मै यहाँ इस स्थिति में साईकिल चला रहा हूँ! खाब संगम लगभग २६०० मीटर पर है; वहाँ से यह सड़क ७ किलोमीटर में आधा किलोमीटर अर्थात ५०० मीटर उपर उठी है| अब स्पीति की ध्वनि भी ठीक से सुनाई नही देती, दूर कहीं पाताल में वह बह रही है| यह यात्रा बिल्कुल पाताल से पहाड़ की यात्रा रही! कुछ कुछ मोड पर नीचे की सड़क दिखती है| यकीन ही नही हो रहा कि मै "वहाँ" से उपर आया हूँ! बीच बीच में बिस्कीटस खाता रहा, पानी पीता रहा| लेकीन ५०० मीटर का ऊँचाई का फर्क बड़ा होता है| इससे बहुत थकान होने लगी| और मौसम भी बीच बीच में ठण्डा होने लगा| इससे शरीर के तपमान नियंत्रित करनेवाली प्रक्रिया पर असर होने लगा| अभी गर्मी, अभी ठण्ड ऐसा लगने लगा| अब इन्तजार है का गाँव का| वैसे नाको यहाँ से बस १८ किलोमीटर दूर है| लेकीन पहले मुझे अब ठीक से भोजन ही करना होगा| मुश्किल हालात में का गाँव पहुँचा! यहाँ अच्छा होटल भी मिला! अगर यह होटल यहाँ नही होता, तो....






नदी से उपर आनेवाली सड़क का एक हिस्सा!
 

होटलवाले लोगों ने मेरी बड़ी सहायता की| पहले तो पूछताछ की, फिर पानी- खाना दिया| सबसे बड़ी बात की मुझे अकेला नही महसूस होने दिया| करीब डेढ घण्टा यहाँ पर रूका| बिस्कीट के साथ दो चाय लिए|‌ सब्जी- चावल भी लिया| यहाँ एक सरदारजी भी बैठे थे| उनकी कार यहीं कहीं फेल हो गई है| वे सोच रहे है कि मिसिंग की कम्प्लेंट करेंगे| क्यों कि यहाँ से टो कर ले जाने का खर्च बहुत बड़ा होगा! होटल में आदरणीय दलाई लामा जी का फोटो देख कर थोड़ी राहत मिली! Don't be a gama in the land of Lama! होटलवाले ने मुझे बताया कि लोसर- ग्राम्फू के बीच की सड़क बारीश के कारण बन्द हुई है, कुछ लोग लोसर से वापस आए है| होटल में जब बैठा था तो होटलवाले और स्थानीय लोगों की बातचीत सुनी| वे एक दूसरे को नमस्कार कहने के लिए जुले जुले ही कह रहे हैं! तब पूछा कि लदाख़ में तो जुले जुले कहते हैं, स्पीति में भी ऐसा ही कहते हैं (किन्नौर होने के बावजूद प्राकृतिक रूप से स्पीति शुरू होने के कारण)? तब उन्होने बताया की स्पीति ही नही, किन्नौर में भी जुले जुले ही कहते हैं!! बड़ा अच्छा लगा| जुले किन्नौर और जुले स्पीति! बाद में होटलवाले ने बताया कि यहाँ से नाको तक भी चढाई है, लेकीन इतनी ज्यादा नही| मुझे तो लग रहा है कि लगातार सात- आठ किलोमीटर मै चढा हूँ, २६०० मीटर से ३२०० मीटर तक तो आ गया होऊंगा| और नाको ३७०० मीटर पर है| मतलब १६ किलोमीटर में ४००- ५०० मीटर चढना है, यानी उतनी तिखी चढाई नही होनी चाहिए! लेकीन यह अनुमान काफी गलत था! क्यों कि का गाँव से आगे थोड़ी उतराई भी है! और अब ३१०० मीटर से अधिक ऊँचाई पर साईकिल चलाना अलग भी है!







का से निकलने के बाद के दो- तीन किलोमीटर आसान गए| लेकीन फिर धीरे धीरे दिक्कत होने लगी| सड़क की चढाई उतनी तीव्र नही लगी| लेकीन २५०० मीटर पर पेडल पर जो फोर्स मिलता था, वो अब ३१०० मीटर से अधिक ऊँचाई पर नही मिल रहा है| क्यों कि यहाँ हवा सामान्य की तुलना में लगभग ६२% ही होती है| इससे साँस फूलने लगी| और थकान भी अधिक होने लगी| फिर भी बिल्कुल साईकिल चला ही नही पा रहा हूँ, ऐसी स्थिति नही है| सबसे नीचले गेअर में १-१ में साईकिल चला पा रहा हूँ! यह भी आश्चर्य से कम नही है मेरे लिए| धीरे धीरे आगे बढ़ता रहा|‌ राहत की बात एक रही कि का से आगे अब सड़क बहुत अच्छी है| जय बीआरओ! यहाँ भी कुछ कुछ लूप्स लगे| ऐसी ही एक चढाई पर शिमला के बाद पहली महाराष्ट्र की गाडी दिखी! अब तक तो एमपी या गुजरात वाली गाडियाँ भी करीबी मालुम होने लगी थी! हाथ से इशारा किया तो वे भी रूके| थोड़ी देर बात हुई| उन्होने मेरे फोटो निकाले; मेरा हाल पूछा| पाँच मिनट उनसे बात कर अच्छा लगा| एक कार और दो बाईकर्स शिमला से मनाली जा रहे हैं| सड़क और भी उपर बढ़ने पर स्पीति तो सिर्फ एक रेखा के रूप में पाताल में नजर आ रही है! चढाई पर दो बुलेटवाले भी मिले| वे थायलंड के हैं| उनकी बुलेट बहुत गर्म होने के कारण वे रूक गए| यहाँ एक तरफ हवा चले और बादल आए तो बहुत ठण्ड लग रही है और जब धूप फैले तो उतनी ही गर्मी भी!






देखा एक "खाब" तो ये सिलसिले हुए (चढाईयों के)!
 

एक सड़क यहाँ से नीचे उतर कर चांगो गाँव की तरफ जा रही है| रूखे बंजर पहाड़ के बीच खाई में जो हरियाली नजर आती है, यह वही गाँव है| यहाँ दो महिलाओं को सड़क पूछी| उपर जानेवाली सड़क से ही मुझे नाको जाना है! यहाँ से नाको आठ किलोमीटर होगा| लेकीन पूरी सड़क चढाईयुक्त| एक एक लूप पार होने पर नीचे बैठी दो महिलाएँ और वह मोड़ छोटा दिखने लगा| नीचे के बुलेटवाले भी दिखते रहे| मेरे उपर पहुँचने तक वो मुझे क्रॉस नही हुए| सांस लेने के लिए हवा कम है, लेकीन ठण्ड लगने के लिए नही! ठण्ड और गर्मी की लुकाछिपी जारी रही| बड़ी ही धिमी लय में साईकिल चलाता रहा| इतनी कठिनाईयों के बावजूद एक पल के लिए भी नही लगा कि पैदल जाना होगा| साईकिल पर ही जाता रहा| इस यात्रा में आगे कैसी राईडस हो ना हो, यह आज की राईड मेरे लिए जीवनभर की उपलब्धि रहेगी!







दोपहर जब शाम होने लगी तो बादल मण्डलाने लगे| कुछ देर बाद आसपास की पहाडियों पर भी काले बादल नजर आने लगे| कुछ बून्दाबान्दी भी हुई| इससे और ठण्ड लगने लगी| अब तक गर्मी के कारण मास्क नही लगाया था| क्यों कि वह पहनने से मुझे तुरन्त पसीना आता है और साँस लेने में भी कठिनाई होती है| और पतले टी- शर्ट के उपर कोई जॅकेट भी नही पहन सकता हूँ| इसलिए ऐसे ही उस ठण्ड को झेलना पड़ा| बीच में बीआरओ की कई ट्रक्स पास हुईं| उनको सैल्युट किया तो वे भी मुझे सैल्युट कर रहे हैं! वाह! क्या दिन चल रहा है आज का! ऐसा लग रहा है कि नाको इस सड़क पर एक ऊँचा स्थान है और वहाँ से सड़क फिर नीचे जाएगी| इसलिए नाको तक चढाई जारी रहेगी| नाको के कुछ पहले मलिंग नाम के गाँव का पट्ट आया| कुप्रसिद्ध मलिंग नाले का यही गाँव होगा| यहाँ से भी नाको और आगे है| बड़ी मुश्कील से बढ़ता रहा| जब कुछ घर आए, खेत लगे तब लगा कि आ गया नाको| लेकीन यह नाको नही है! नाको तो और उपर है| रूकते रूकते जाते जाते चलता रहा| आखिर कर शाम के पौने छह बजे नाको के पास पहुँचा| सड़क पर कुछ होटल मिले| मुझे नाको के जिस होटल का नाम बताया था, उसके बारे में पूछा| पूछताछ में उसी होटल में भी होम स्टे होता है, यह पता चला| वहीं का कमरा देखा और थोड़ा मोल भाव कर ले लिया| उस समय लगभग बुखार जैसी स्थिति है| पहुँच तो गया हूँ, लेकीन हालत नाज़ुक ही है| इसीलिए तय किया कि अगले दिन नाको में ही विश्राम करूँगा| विश्राम और अक्लमटायजेशन भी| क्यों कि २५०० मीटर से ३७०० मीटर पर आया हूँ|‌ ऐसे ही आगे बढ़ूँगा, तो शरीर को और कठिन जाएगा| एक दिन रूकने के बाद आगे बढ़ूँगा तो शरीर तब तक एडजस्ट हो जाएगा!





लेकीन क्या दिन रहा यह! आज लगभग ६३ किलोमीटर साईकिल चलाई और इस तरह पाँच दिनों में लगभग ३१७ किलोमीटर पूरे हो गए! आज की चढाई अनुमान से बहुत ज्यादा निकली| जब साईकिल रूट मैप बनाए थे और चढाईयों का अनुमान किया था, तो आज की चढाई अधिक तो थी ही, लेकीन इसी की तुलना में शिमला- नार्कण्डा की भी‌ चढाई‌ थी जो मैने आराम से पार की थी| जरूर उस अनुमान में- उस मैप में कुछ गलती रही होगी! लेकीन कितनी अविश्वसनीय राईड रही! मुझे अभी भी विश्वास नही हो रहा है और सम्भावना है कि भविष्य में भी कभी आसानी से विश्वास नही होगा कि मैने "यहाँ" साईकिल चलाई है! इस यात्रा के ५ दिन पूरे हुए| लगभग २०- २१ दिनों की योजना में से पहले ५ दिन तो योजना जैसे ही बिते| मानो चार टेस्ट मैच में से मैने पहला मैच जीत लिया हो| वाकई यह बहुत बड़ी टेस्ट है और मै पास हो गया हूँ! लेकीन अब विश्राम चाहिए| बुखार जैसी स्थिति से रिकवर होना चाहिए| देखते हैं आगे क्या होता है|



आज का रूट


चढाई



अगला भाग: साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ७: नाको से ताबो

1 comment:

  1. बहुत बारीकी से यात्रा का वर्णन किया है, लग रहा है जैसे आँखों देखी हो। सचमुच! इतनी कठिन चढ़ाई वाली यात्रा साईकिल से करना बड़े ही साहस का कार्य है। बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं आपकी सम्पूर्ण यात्रा की सफलता के लिए....

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