Monday, October 24, 2016

“मेरे प्रिय आत्मन् . . ."


ओशो. . . .

जुलाई २०१२ में ओशो मिले. . संयोग से पहले ही कुछ प्रवचनों में ध्यान सूत्र प्रवचन माला मिली| वहाँ से फिर 'एस धम्मो सनन्तनो', 'सम्भोग से समाधी तक', 'ताओ उपनिषद', 'अष्टावक्र महागीता', 'मै कहता आखं देखी' और अन्य बहुतसी मालाएँ सुनी. . . अब भी रोज सुनता हूँ| उसमें से इतना कुछ मिलता गया और मिल रहा है कि जुलाई २०१२ से एक नया ही जीवन शुरू हुआ है. . . जैसे जीवन के दो हिस्से हैं- जुलाई २०१२ के पहले और जुलाई २०१२ के बाद. . .

उस समय उनसे मिलना होने के पहले उनके बारे में थोड़ा थोड़ा सुना था, पढा था| पर कहते हैं ना कि सही‌ समय के पहले कुछ भी नही होता है| इसलिए पहले कई बार उनका नाम सुनने के बाद भी परिचय नही हुआ था| लेकिन तब परिचय हुआ; मिलना हुआ; जीवन में एक नई मिति प्रवेश कर गई| . .

उस ज़िन्दगी से कैसे गिला करे जिस ज़िन्दगी ने मिलवा दिया आपसे. .

ओशो कैसे थे, उन्होने क्या किया था, क्या वे वाकई महान थे, ऐसे तर्क मै नही करना चाहता हूँ| मै मेरे करीब के लोगों को इतना ही कहता हूँ कि ओशो सुनिए, पढिए, अनुभव लीजिए! थोड़ा स्वाद तो लीजिए! और फिर तय किजीए कैसे लगता है!

पीछले चार सालों में इतना कुछ मिला है कि कहा नही जा सकता है| वे जो बताते है वे जीवन से कितना करीब है, यह बार बार महसूस होता गया| वे जो बताते हैं, जो कहते हैं, उसकी प्रतिति बाहर किसी शास्त्र में नही, वरन् अपने जीवन के अनुभव में चप्पे चप्पे पर मिलती है, इसका अनुभव लिया. . .

फिर धीरे धीरे सब प्रेम गीतों का अर्थ ही बदल गया| प्रेमियों के गाने ठीक गुरू- शिष्य नाते के लिए भी लागू होने लगे| जैसे- गुरू शिष्य को कई जन्मों से पुकार रहे हैं-


जाईए आप कहाँ जाएंगे
 
ये नज़र लौट के आएगी

दूर तक आपके पीछे पीछे

मेरी आवाज चली जाएगी

 
या यह भी

तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई

युंही नही दिल लुभाता कोई

जाने तू या जाने ना माने तू या माने ना


ओशो के विचार कहना बहुत कठिन है| क्यों की वे सिर्फ विचार ही नही हैं, उनमें 'निर्विचारता' भी है| उनकी एक बात याद आती है| शुरू के दिनों में वे उनके प्रवचन का आरम्भ 'मेरे प्रिय आत्मन्' द्वारा करते थे और प्रवचन समाप्त होते समय कहते थे, "आपके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूँ, मेरा प्रणाम स्वीकार करें|लोग अपनी भगवत्ता पहचाने, यह उनकी अपेक्षा थी| और फिर १९७३ के बाद उन्होने स्वयं को भगवान कहना शुरू किया| उसका भी हेतु यही था कि सभी लोग भगवानस्वरूप ही है| सिर्फ वह देखने के लिए हिम्मत चाहिए| मै स्वयं को भगवान कहता हूँ और आपको भी स्वयं के बीच का ईश्वर देखने के लिए प्रेरित करता हूँ, ऐसा वे कहते हैं| उस समय उन्हे बहुतसे पत्र आए कि कि आप कैसे स्वयंघोषित भगवान हैं, स्वयं को कैसे भगवान कहते है आदि आदि| उस पर ओशो ने कहा, 'जब मै आपको प्रणाम करता था, आपमें भीतर बैठे परमात्मा को नमन करता था, तब एक ने भी मुझे 'क्यों' नही पूछा| क्योंकि वह आपके अहंकार के अनुकूल था| पर जब मैने मेरा उल्लेख भगवान ऐसा किया, तभी फिर आपने मुझे क्यों पूछा? तब तो एक ने भी नही पूछा था और इतने सारे पूछ रहे हैं|' उसके बाद उन्होने कहा कि भगवान न होने का विकल्प है ही नही| जो भी है, सब भगवानस्वरूप ही है| सिर्फ वह खुले आँखों से देखना या न देखना, इतना ही फर्क है|


ओशो को सुनते समय इतना कुछ मिलता गया कि जीवन के प्रति दृष्टि बदली| जीवन में हमें पसन्द न आने वाले, अनचाहे कई पहलू होते हैं| उनका स्वीकार करने की दृष्टि धीरे धीरे आई| जीवन के तनाव- संघर्ष तीव्रता से चले जा रहे हैं. . .


ओशो के प्रवचन में कुछ शिष्यों ने प्रश्न पूछते समय ऐसे गाने भी पूछे है-


कुछ दिल ने कहा, कुछ भी नहीं

 
कुछ दिल ने सुना, कुछ भी नहीं

 
ऐसी भी बातें होती हैं


उस पर ओशो कहते हैं कि असली संवाद मौन से ही होता है| शब्द तो सिर्फ माध्यम होते हैं|

 
एक ने उन्हे प्रश्न के तौर पर यह गाना ही पूछा
 

कोरा कागज़ था मन मेरा
 
लिख दिया नाम इसपे तेरा. . .
   

सुना आँगन था जीवन मेरा. . . 
 
बस गया प्यार जिसपे तेरा. . .

 
और


तुम अबसे पहले सितारों में बस रहे थे कहीं

तुम्हे बुलाया गया है जमीं पर मेरे लिए. . .


उस पर ओशो कहते हैं कि मै भी आप जैसा ही हूँ, पर मुझमें ऐसा कुछ है जो सितारों में से है और वह आपमें भी हो सकता है|


ओशो ने जो कहा है, वह बहुत विलक्षण है; युनिक है| सिर्फ विभन्न धर्मपंथ और साधना मार्ग के बारे में ही नही, उन्होने प्रचलित समाज; प्रोजेक्टेड ट्रूथ; देश-काल इसके बारे में जो भाष्य किया है; वह अ द् भु त और अ वा क करनेवाला है. . . उसे यहाँ कहने के बजाय जिन्हे इच्छा हो, उन्होने उसे ओरिजिनल सुनना/ पढना चाहिए (उसकी थोड़ी और चर्चा करनेवाला मेरा यह ब्लॉग)|


ओशो ने एक जगह कहा है कि आप मुझे गुरू भी मत मानिए और मित्र भी मत मानिए| सड़क पर जाते समय आपको मिलनेवाला कोई अन्जान राहगीर समझिए| मित्र भी मानेंगे तो मेरे प्रति आसक्त होंगे| मुझे एक अन्जान राहगीर समझ कर मुझमें आसक्त हुए बिना मै जो मार्ग दिखा रहा हूँ, सिर्फ उस पर आगे बढ़िए. . .


कहने जैसा बहुत कुछ है| वह भाव व्यक्त करनेवाले ये कुछ गाने| गुरू- शिष्य; अध्यात्म का सार इसका अर्थ दर्शानेवाले कुछ गाने और खास कर ६०- ७० के दशक के कुछ गानों में उस समय प्रवचन देनेवाले ओशो की उपस्थिति स्पष्ट महसूस होती है. . .

यहीं वो जगह है. . . यही वो फिज़ाएँ हैं. . .
 
यहीं पर कभी आप हमसे मिले थे. . .
 
इन्हे हम भला किस तरह भूल जाएं . .
 
यहीं पर कभी आप हमसे मिले थे. . .


खामोश है ज़माना, चुपचाप हैं सितारें 
आराम से है दुनिया, बेक़ल हैं दिल के मारे
 
ऐसे में कोई आहट, इस तरह आ रही है
जैसे की चल रहा हो, मन में कोई हमारे
 
या दिल धड़क रहा है, एक आस के सहारे. . .
 
आएगा, आएगा, आएगा. . आएगा आनेवाला



तुम पुकार लो. . .
 
तुम्हांरा इन्तज़ार है. . .

 
इन गानों में भी ठीक यही अर्थ महसूस होता है


अजनबी मुझको इतना बता दे
 
दिल मेरा क्यों परेशान है
 
देख के तुझको ऐसा लगे
 
जैसे बरसों की पहचान है . . .


मन अपने को कुछ ऐसे हल्का पाए
 
जैसे कन्धों पे रखा बोझ हट जाए
 
जैसे भोला सा बचपन फिरसे आये
 
जैसे बरसों में कोई गंगा नहाए. . .


धुल सा गया है ये मन
 
खुल सा गया हर बंधन
 
जीवन अब लगता है पावन मुझको. . .

 
जीवन में प्रीत है, होठों पे गीत है
 
बस ये ही जीत है सुन ले राही

 
तू जिस दिशा भी जा, तू प्यार ही लूटा
 
तू दीप ही जला, सुन ले राही. . .

 
यूं ही चला चल राही यूं ही चला चल
 
कौन ये मुझको पुकारे
 
नदियां पहाड़ झील और झरने, जंगल और वादी
 
इनमें है किसके इशारे . . .


. . . जिन्हे रस होगा, उन्हे ओशो को समझने का एक अच्छा मार्ग उनके प्रवचनों में बताई गई यादों का संग्रह कर बनाया उनका एक चरित्र| यह १३०५ पृष्ठ का पीडीएफ किताब यहाँ उपलब्ध है| जिन्हे रस होगा, वे उसे डाउनलोड कर शुरू के कम से कम १०० पृष्ठ पढ़ सकते है| ओशो के बारे में कई लोगों ने बहुत कुछ कहा है| पर मेरा अनुभव है कि ओशो के बारे में अन्य क्या कह रहे हैं, इसे थोड़ा साईड में रख कर ओशो खुद क्या कह रहे हैं, यह सुनना आरम्भ किया की धीरे धीरे शंकाएँ रहती ही नही है. . . . इसलिए जिन्हे कुछ आक्षेप हो या कुछ प्रश्न हो, उन्होने इस किताब के कम से कम पहले १०० पृष्ठ पढ कर अपनी राय बनानी चाहिए| धन्यवाद! :)

अन्त में भी एक गाना ही याद आता है-


उसके सिवा कोई याद नही. . . उसके सिवा कोई बात नही. . .
 
उन ज़ुल्फों की छाँव में. . . . उन कातिल अदाओं में,
 
इन गहरी निगाहों में. .
 
हुआ हुआ मै मस्त. . .

 
वो दौड़े है रग रग में, वो दौड़े है नस नस में
 
अब कुछ न रहा मेरे बस में हुआ हुआ मै मस्त. . .

Friday, October 14, 2016

उबंटू- लिनक्स के साथ तीन साल पूरे हुए . . .


लिनक्स (Linux) इस प्रकार की ऑपरेटिंग सिस्टम उबंटू (UBUNTU) साथ तीन साल पूरे हुए! हम में से अधिकतर लोग लैपटॉप या डेस्कटॉप पे विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम का प्रयोग करते होंगे| मोबाईल पर आज कल एंड्रॉईड ऑपरेटिंग सिस्टम अधिकतर चलती है| जब तीन चार साल पहले उबंटू लिनक्स के बारे में पता चला तो लगता नही था कि मै इसका इस्तेमाल कर सकूँगा| लेकिन धीरे धीरे इसे आत्मसात कर लिया और इसके फल भी चखे! थोड़े कड़वे और ज्यादा मिठे! आज इस सफर को याद करता हूँ|

उबंटू यह लिनक्स या युनिक्स बेस की ऑपरेटिंग सिस्टम का एक इंटरफेस हैं| या कहिए लिनक्स/ युनिक्स पद्धति का एक वर्शन है| उबंटू शब्द झुलू- आफ्रिकी भाषा से आता है और उसका अर्थ मानवीय परस्पर नाता या मानवीय दया होता है| यह एक दूसरे के साथ जुड़ाव दर्शाता है| सॉफ्टवेअर में काम करनेवाले मेरे प्रिय मित्र ने मेरी जानकारी में पहली बार उबंटू का अंगीकार किया| पहले वह भी विंडोज का प्रयोग करता था, फिर उसने विंडोज छोड कर उसके कंप्युटर पर उबंटू‌ डाल दिया| तब उसने मुझे धीरे धीरे उबंटू के बारे में बताना शुरू किया|





































Sunday, October 9, 2016

That's the way Mahi way!



Watching 'M. S. Dhoni: The untold Story' is a wonderful experience. . It is rightly said that we knew the man, but we did not know the journey. It really goes deep. It is not only his journey, but also in a way our own journey. Because legends such as MS or Sachin are not only individuals, they are collective phenomenon. It is not only that Sachin plays for 24 years, it is also that I live for 24 years where Sachin is a very much part of my life. This movie gives that wonderful experience- once up on a time again! It just relives you those memorable moments. . .

. . . My first encounter with M S was in December 2004 when he was playing his second or third ODI in Dhaka and he hit his first six. Then I watched a first class game of cricket, first time in my life, on 21st January 2005. It was a first class match in Deodhar Trophy in Nehru Stadium, Pune and players such as Sehwag and Kaif were playing. Of course, M S was largely unknown to me. When I entered the stadium, I was amazed to see that environment. I was too desperate to see the likes of Sehwags and Kaifs. My friend suddenly pointed out to one man who was running on the border of the ground, look, he is Dhoni! I looked, but did not know whom I was looking. . . Then his 148 runs against Pakistan and his 183* against Sri Lanka announced his arrival. . .

Such legends are part of our lives also. So when I look back at my famous M S moments, one more moment pops up from his early career. His strike against Dave Mohammad in a test match in West Indies! I clearly remember up to mid 2006, his ODI batting average was around 53 and the strike rate was 108! Even in the era of Tendulkars and Sehwags, it was extremely astonishing! It was said that he had just one gear- the fifth gear. . . Of course it was not too long when his poster arrived in my hostel room. अनहोनी को होनी कर दे होनी को अनहोनी ऐसा है धोनी!The epic moment of India winning World T 20 under him! His advertisements from 'On drive, off drive, now long drive' to 'let me remind it!' His persona, the charisma, the calmness...

But coming back to the movie, it gives great insights about the man and the journey. We knew the batsman, the captain cool, the wicketkeeper and the brand. But we seldom knew the man from within. This movie is certainly part of the elite class of movies such as Bhag Milkhaa Bhag and Mary Kom. It is very easy to see, perceive and respect the peak, but it is rather difficult to grasp the dark valleys from where such peak emerges. Therefore we should be thankful to this movie.

It is very easy to forget the morning sun when it is twilight. It is very easy to criticize in the context of downfall. Not only public, but our memory also is short in this regard. But if we allow our heart more space than our brain, we would deeply cherish innumerable M S moments of our life. In this sense, this movie serves as a great reminder to open our eyes and really see the legend which is now inevitably fading. Our memory is not a great device to understand deeper phenomenon. Our memory always moves ahead and shows us further journey. Time may be just a term for some, like they say age is just a number. But certainly time fades our memories. It blurs our vision. We tend to overlook and neglect the old for the attractive new. But something is necessary to help us improve our vision and correct our perspective.

When we try to see the complete picture, we realize that we were missing the actual person, the man hidden behind all glamour. It is easy to criticize defeats and losses. But it is rather difficult to see the efforts, the preparation, the journey out of the darkness. This movie is presented so well that even if you do not know cricket, you can still relate with it. As M S always says, it is the process which matters.

This movie really helps us to keep aside the statistics, the numbers and the glamour and see the core of M S Dhoni with open eyes. We always say that we should never forget our roots, we should remember where we belong to. This movie helps us understand how a champion arises, where he or she really belongs.

This movie gives clear messages regarding sport culture of our nation, the infrastructure and the struggles. Not only for emerging players, but also for well established players. One has to say that it makes certain bold statements such as case of dropping those stalwarts who are no longer good fielders. This movie does not shy away from making such bold and out of the box statements.
 

I have followed Dhoni's career closely, but still I felt good that the movie has shown minimum of his career and it has given more focus on the achiever than the achievements. One can criticize that the movie only shows M S and hardly gives any room to Sachin, Sehwag, Ganguli or Dravid. It is true. But their tales are well known and the movie brings forth the untold story.

And most importantly, although this movie revolves around one legend and one person, it is basically universal. It is the tale of everyone. Like one dialogue says, M S, you do not always get those balls which you can hit, you sometimes get bouncers that you have to duck. Therefore, in the deeper sense, this is untold story of everyone, all of us. Everyone has to go through similar circumstances.

One more aspect that I liked very much regarding this movie is that it is based on a very contemporary topic. It is not a movie which is related to some ancient king. The movie is related with the present times. M S is still playing cricket and is still the ODI captain. He is here and now. Therefore the movie helps us understand this here and now in a subtle way. This movie helps us remain in the present.

Tuesday, September 20, 2016

Nagmani Rao: The Sustained Inspiration

As an alumni of Karve Institute of Social Service, I shared this with fellow students. This is about one faculty of Karve Institute. This is written in the context of her retirement on 31st August 2016. 


Nagmani Rao: The Sustained Inspiration


Nagmani Rao! Those who have met her know her well, there is no need for any introduction! This is just a small attempt to recall her memories. This is a reflection regarding learning with her. This is based on what I saw of her, what I could understand and of course what I can recollect now. So this is just a random sampling and not complete in any way. In fact one should remember that sampling is always like a drop and the universe is like an ocean!

Days spent in Karve Institute- two years- are golden days for all of us. It was one of the initial days. The second interview during the admission! Mani madam was on the panel. I was under pressure and some questions were asked. Assertive questioning was there. But to my surprise, it was accompanied by attentive listening also. Mani Madam was not only asking many things, she was listening and basically she was recognizing what the student is saying. That must have helped many students like me to give that interview with confidence. 
 

Then the college started and the Director's address was given. Then in the rainy month of July 2006, lectures started. Already there were rumours that Mani madam is one of the most strict faculty… Her lecture in the orientation lectures stood out. The passion, the commitment and the simplified elaboration! In actual lectures, she was so different. She began with individual introduction. It was always one to one with her. She spent time to understand all of us and also helped us to understand her. She told us about her background, her experiences, her earlier movement around Sangli and what she likes to do in general. It was befitting that such a versatile personality was born in a town which was a railway junction, Manmad. When she had said, that she was too old, around fifty years old then, then we realized that she was going to be a different kind of teacher! She also shared her MSW days in TISS! One felt she was very close to the students and very informal also; despite this being a formal relation.


As the days passed, we had more interactions and slowly slowly she became one of my favourite teachers. And her concern for her students was visible. Despite of not being a natural Marathi speaker, she was speaking fluent Marathi and also Hindi. As a teacher, it must have been a lot of hard work for her not only to learn these languages, but also teach in them. But she was always committed to her students. Soon her lectures became very lively and interesting for the students. Because it was not just theory or just the subject matter, it was also her lively experience sharing and elaborations. She was teaching the subject of research. For most of the students it was a tough subject. But it was visible that she was taking every effort to make it simple for the students. Even in her research labs, she was taking every step to make the content available in the form which the students could understand. For this purpose, she ensured that every research lab group has someone who speaks Hindi and English and who can explain things to other group members. Being two extremities with a language barrier, she would care for the students from South India and also the students from the North East. This journey with Mani madam continued through the year, through the advanced orientation visits and many assignments! One thing is still clear before my eyes- the respect she has for the students, to their work and to their presentation! It is that respect which might have driven many students to do well in their study. Such respect and such acceptance for the students (who are mostly raw, undisciplined and careless)!


Tuesday, July 19, 2016

गुरू पूर्णिमा

गुरू पूर्णिमा! आज इस दिन का महत्त्व लुप्त सा हो गया है! लेकिन यह आज भी यथार्थ है| 

विवेकानंद कहा करते थे, एक सिंहनी गर्भवती थी। वह छलांग लगाती थी एक टीले पर से। छलांग के झटके में उसका बच्चा गर्भ से गिर गया, गर्भपात हो गया। वह तो छलांग लगा कर चली भी गई, लेकिन नीचे से भेड़ों का एक झुंड निकलता था, वह बच्चा भेड़ों में गिर गया। वह बच्चा बच गया। वह भेड़ों में बड़ा हुआ। वह भेड़ों जैसा ही रिरियाता, मिमियाता। वह भेड़ों के बीच ही सरक—सरक कर, घिसट—घिसट कर चलता। उसने भेड़—चाल सीख ली। और कोई उपाय भी न था, क्योंकि बच्चे तो अनुकरण से सीखते हैं। जिनको उसने अपने आस—पास देखा, उन्हीं से उसने अपने जीवन का अर्थ भी समझा, यही मैं हूं। और तो और, आदमी भी कुछ नहीं करता, वह तो सिंह—शावक था, वह तो क्या करता? उसने यही जाना कि मैं भेड़ हूं। अपने को तो सीधा देखने का कोई उपाय नहीं था; दूसरों को देखता था अपने चारों तरफ वैसी ही उसकी मान्यता बन गई, कि मैं भेड़ हूं। वह भेड़ों जैसा डरता। और भेड़ें भी उससे राजी हो गईं; उन्हीं में बड़ा हुआ, तो भेड़ों ने कभी उसकी चिंता नहीं ली। भेड़ें भी उसे भेड़ ही मानतीं।

ऐसे वर्षों बीत गये। वह सिंह बहुत बड़ा हो गया, वह भेड़ों से बहुत ऊपर उठ गया। उसका बड़ा विराट शरीर, लेकिन फिर भी वह चलता भेड़ों के झुंड में। और जरा—सी घबड़ाहट की हालत होती, तो भेड़ें भागती, वह भी भागता। उसने कभी जाना ही नहीं कि वह सिंह है। था तो सिंह, लेकिन भूल गया। सिंह से ‘न होने’ का तो कोई उपाय न था, लेकिन विस्मृति हो गई।

फिर एक दिन ऐसा हुआ कि एक बूढ़े सिंह ने हमला किया भेड़ों के उस झुंड पर। वह बूढ़ा सिंह तो चौंक गया, वह तो विश्वास ही न कर सका कि एक जवान सिंह, सुंदर, बलशाली, भेड़ों के बीच घसर—पसर भागा जा रहा है, और भेड़ें उससे घबड़ा नहीं रहीं। और इस के सिंह को देखकर सब भागे, बेतहाशा भागे, रोते—चिल्लाते भागे। इस बूढ़े सिंह को भूख लगी थी, लेकिन भूख भूल गई। इसे तो यह चमत्कार समझ में न आया कि यह हो क्या रहा है? ऐसा तो कभी न सुना, न आंखों देखा। न कानों सुना, न आंखों देखा; यह हुआ क्या?

वह भागा। उसने भेड़ों की तो फिक्र छोड़ दी, वह सिंह को पकड़ने भागा। बामुश्किल पकड़ पाया : क्योंकि था तो वह भी सिंह; भागता तो सिंह की चाल से था, समझा अपने को भेड़ था। और यह बूढ़ा सिंह था, वह जवान सिंह था। बामुश्किल से पकड़ पाया। जब पकड़ लिया, तो वह रिरियाने लगा, मिमियाने लगा। सिंह ने कहा, अबे चुप! एक सीमा होती है किसी बात की। यह तू कर क्या रहा है? यह तू धोखा किसको दे रहा है?

वह तो घिसट कर भागने लगा। वह तो कहने लगा, क्षमा करो महाराज, मुझे जाने दो! लेकिन वह बूढ़ा सिंह माना नहीं, उसे घसीट कर ले गया नदी के किनारे। नदी के शांत जल में, उसने कहा जरा झांक कर देख। दोनों ने झांका। उस युवा सिंह ने देखा कि मेरा चेहरा और इस बूढ़े सिंह का चेहरा तो बिलकुल एक जैसा है। बस एक क्षण में क्रांति घट गई। ‘कोई औषधि नहीं!’ हुंकार निकाल गया गर्जना निकल गई, पहाड़ कंप गये आसपास के! कुछ कहने की जरूरत न रही। कुछ उसे बूढ़े सिंह ने कहा भी नहीं—सदगुरु रहा होगा! दिखा दिया, दर्शन करा दिया। जैसे ही पानी में झलक देखी—हम तो दोनों एक जैसे हैं—बात भूल गई। वह जो वर्षों तक भेड़ की धारणा थी, वह एक क्षण में टूट गई। उदघोषणा करनी न पड़ी, उदघोषणा हो गई। हुंकार निकल गया। क्रांति घट गई।...

सदगुरु के सत्संग का इतना ही अर्थ होता है कि वह तुम्हें घसीट कर वहां ले जाये, जहा तुम उसके चेहरे और अपने चेहरे को मिला कर देख पाओ, जहां तुम उसके भीतर के अंतरतम को, अपने अंतरतम के साथ मिला कर देख पाओ। गर्जना हो जाती है, एक क्षण में हो जाती है।

अष्टावक्र महागीता, भाग-१, प्रवचन#११, ओशो

"गुरू शिक्षक नही होता| गुरू वह देता है जो तुम्हारे पास पहले से ही था और गुरू वह छीनता है जो तुम्हारे पास कभी था ही नही|" 



Tuesday, July 12, 2016

छुआछूत और शोषण के खिलाफ संघर्ष

छह दशक पूर्व भारत प्रजासत्ताक बना और उसने धर्म- निरपेक्ष समाजवादी संविधान का अंगीकार किया। इस संविधा के मूलभूत ढांचे में देश के नागरिकों को उनकी जाति, धर्म और लिंग इनका विचार न करते हुए समान अवसर दिए गये है। फिर भी भारत में जाति यह भेदभाव का सबसे बडा पारंपारिक प्रतिक है। आधुनिकता, नागरीकरण और दलितों के सशक्तीकरण का बडा दावा किया जाता है; फिर भी दलितों पर हिंसाचार में बढोतरी हो रही है।

उनके जीवन में सब प्रतिकूलता होते हुए भी कई लोग सामने आये है और बडी संख्या में दलित समुदायों ने आंबेडकर द्वारा दिखाए गए प्रबुद्ध भारत की संकल्पना आत्मसात की है; फिर भी इस देश में आज भी छुआछूत लक्षणीय अनुपात में अस्तित्व में है। आंतर- जातीय विवाहों की तरफ सिर्फ नकारात्मक दृष्टी से देखा नही जाता है, बल्कि पालक और रिश्तेदार किसी वेदना और दु: होते हुए उनके प्रियजनों की हत्या करने की हद तक गए देखे जा सकते है। आत्मसम्मान और प्रतिष्ठा इनके लिए दलित भुमिका सिर्फ पहचान की राजनीती बतायी जाती है और उनके पहचान की राजनीती भारत की राष्ट्रीय समस्या बनती है

कई लो कहते है कि साठ साल पहले जैसी थी वैसी छुआछूत आज दिखने में नही आती और उसके प्रकार बदल गए है। बाबासाहेब आंबेडकर, ज्योतीबा फुले, . व्ही. रामासामी नैकार इनके जैसे महान विभूति और वर्णाश्रम धर्म के मूलभूत तत्त्वों पर प्रश्न उपस्थित करनेवाले अन्य महान सामाजिक सुधारकों के प्रयासोंद्वारा यह हुआ और पीडितों के संघर्ष तथा जीने को नया मतलब प्राप्त हुआ। फिर भी इ आंदोननों में कई विरोधाभास सामने आए है और कई लोगों को लगता है, कि अब दलितों की समस्या सबलीकरण होना और (विकास की प्रक्रिया में) सहभाग लेना, इतनीही है और छुआछूत नाही। ऐसा होने पर भी, हमारी संसदीय संरचना के स हिस्सों में दलितों के समान और योग्य प्रतिनिधित्व की मांग का समर्थन करते हुए हम इस वास्तव परिस्थिती को शर्म के मारे नजर अंदाज नही कर सकते; की कुछ दलित समुदाय अत्यंत बिछडे हुए है और आज भी वे कई शतकों के पूर्व होनेवाले अन्याय से पीडित हैअन्याय के विरोध में संघर्ष करने हेतु नागरी अधिकारों के आंदोलनों की आवश्यकता है और वह सिर्फ दलितों का दायित्व नही

Sunday, July 10, 2016

आध्यात्मिक फिल्मी गाने

नमस्ते!

मेरी पसन्द के दो हिन्दी फिल्मी गाने जिनमें गहरा आध्यात्मिक अर्थ हैं| या यूँ कहे तो उनमें धर्म का सार हैं-

मै पल दो पल का शायर हूँ
पल दो पल मेरी कहानी है
पल दो पल मेरी हस्ती है
पल दो पल मेरी जवानी है ...

मुझसे पहले कितने शायर
आए और आकर चले गए...
कुछ आहें भर कर लौट गए
कुछ नग़मे गाकर चले गए...

वो भी एक पल का किस्सा थे
मैं भी एक पल का किस्सा हूँ
कल तुमसे जुदा हो जाऊँगा
जो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ
मैं पल दो पल का शायर हूँ ...

कल और आएंगे नगमों की
खिलती कलियाँ चुनने वाले
मुझसे बेहतर कहने वाले
तुमसे बेहतर सुनने वाले

कल कोई मुझको याद करे
क्यूँ कोई मुझको याद करे
मसरूफ़ ज़माना मेरे लिये
क्यूँ वक़्त अपना बरबाद करे
मैं पल दो पल का शायर हूँ …


(चित्रपट कभी कभी) 

और यह दूसरा गीत- 

मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया
हर फ़िक्र को धुवें में उडाता चला गया

बरबादियों का शौक मनाना फिजुल था, मनाना फिजुल था, मनाना फिजुल था,
बरबादियों का जश्न मनाता चला गया
मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया....

जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया, मुक़द्दर समझ लिया, मुक़द्दर समझ लिया
जो खो गया मैं उसको भुलाता चला गया
मैं जिंदगी का साथ निभाता चलाता गया...

गम और ख़ुशी में फर्क ना महसूस हो जहाँ, ना महसूस हो जहाँ, ना महसूस हो जहाँ
मैं दिल हो उस मुक़ाम में लाता चला गया...
मैं जिंदगी का साथ निभाता चलाता गया…

मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया
हर फ़िक्र को धुवें में उडाता चला गया...


(चित्रपट हम दोनों)

इन दो गीतों में धर्म का सार है; विपश्यना का सार हैं. . . 

Thursday, July 7, 2016

बारीश में साईकिल राईड का मज़ा


नमस्ते! २०१६ की बरसात शुरू हो चुकी है| बरसात के आने से मौसम का मिज़ाज बदल जाता है! एक ताज़गी आती है| ऐसे में साईकिल राईड करने का भी अलग मज़ा आता है| बरसात और किचड से थोडी परेशानी जरूर होती है, लेकिन सुन्दर दृश्य इसकी भरपाई करते हैं| प्रस्तुत हैं कुछ फोटोज ऐसी ही एक बरसाती राईड के| पुणे जिले के भण्डारा हिल नाम के छोटे हिल पर की गई यह साईकिल राईड|

















राईड छोटी हो या बड़ी हो, मज़ा तो आता है!

Monday, July 4, 2016

प्रकृति, पर्यावरण और हम ११: इन्सान ही प्रश्न और इन्सान ही उत्तर


प्रकृति, पर्यावरण और हम ५: पानीवाले बाबा: राजेंद्रसिंह राणा

प्रकृति, पर्यावरण और हम ६: फॉरेस्ट मॅन: जादव पायेंग

प्रकृति, पर्यावरण और हम ७: कुछ अनाम पर्यावरण प्रेमी!

प्रकृति, पर्यावरण और हम ८: इस्राएल का जल- संवर्धन

प्रकृति, पर्यावरण और हम ९: दुनिया के प्रमुख देशों में पर्यावरण की स्थिति

प्रकृति, पर्यावरण और हम १०: कुछ कड़वे प्रश्न और कुछ कड़वे उत्तर


इन्सान ही प्रश्न और इन्सान ही उत्तर

उत्तराखण्ड में हो रही‌ तबाही २०१३ के प्रलय की याद दिला रही है| एक तरह से वही विपदा फिर आयी है| देखा जाए तो इसमें अप्रत्याशित कुछ भी नही है| जो हो रहा है, वह बिल्कुल साधारण नही है, लेकिन पीछले छह- सात सालों में निरंतर होता जा रहा है| हर बरसात के सीजन में लैंड स्लाईडस, बादल फटना, नदियों को बाढ और जान- माल का नुकसान ये बातें अब आम हो गई‌ हैं| फर्क तो सिर्फ इतना है कि इन बदलावों का अनुपात तेज़ी से बढ रहा है| उनकी फ्रिक्वेन्सी बढ गई‌ है| नुकसान भी बहुत बढ रहा है| पर्यावरण पर हो रहे इन परिणामों को रोकने के क्या उपाय है? इन सभी प्रश्नों का उत्तर क्या है? उसका एक ही उत्तर है और वह है हम| हम ही‌ इसे रोक सकते हैं क्यों कि यह सब हमने ही किया है| चाहिए बरसात तबाही‌ ला रही हो, उस बरसात के कारण हम ही है और हम ही इसे चाहे तो रोक भी सकते हैं|

जैसे हमने पीछले लेखों‌ में चर्चा की, पर्यावरण और मानव के बीच काफी‌ तनाव है| मानव का पर्यावरण पर बर्डन बढ रहा है| अगर इन सभी बातों में परिवर्तन करना हो तो पर्यावरण के साथ तो काम करना ही होगा- जैसे पेड़ लगाने होंगे, जल संवर्धन के प्रयास करने होंगे, जंगल बचाने होंगे; लेकिन उसके साथ इन्सान की समझ और इन्सान की दृष्टी बढाने के भी प्रयास करने होंगे| तब जा कर धीरे धीरे इन्सान प्रकृति पर कर रहा है उस आक्रमण को समझ पाएगा और उससे यु- टर्न ले सकेगा| पर्यावरण की रक्षा का यह लाँग टर्म फोकस हो सकता है| शॉर्ट टर्म फोकस अर्थात् पर्यावरण के साथ काम करना होगा| इस लेख में इन्सान की दृष्टी और सजगता बढाने के प्रयासों पर एक नजर डालेंगे|