Thursday, November 20, 2014

जन्नत को बचाना है: जम्मू कश्मीर राहत कार्य के अनुभव १३

आपदा की आपबिती

१६ अक्तूबर को प्रात: जल्दी दादाजी और अन्य साथी जम्मू के लिए निकलें| बनिहालवाला रोड़ १८ तारीख तक बन्द किया गया है| इसी लिए उन्हे मुघल रोड़ से ही जाना पड़ा| मुझे भी १९ अक्तूबर की सुबह निकलना है| शायद मुझे भी वहाँ से ही जाना पड़ेगा| एक विचार श्रीनगर से बनिहाल तक ट्रेन और वहाँ से आगे जीप से जाने का भी है| देखते हैं| अब मात्र तीन दिन बचें है| मन की धारा कितनी अजीब है| बचे दिनों को अधिक से अधिक काम में लाने के बजाय मन १९ अक्तूबर से आगे जा रहा है| वाकई, वर्तमान में ठहरना मन का स्वभाव ही नही| अस्तु|

आज पहला मुख्य काम सुबह का आश्रम का शिविर है| उसके बाद आगे का काम तय होगा| शिविर यथा क्रम हुआ| और रोज की‌ तरह आज भी पहले 'रुग्ण' आश्रम परिसर में कार्यरत कार्मिक ही हैं! आज करीब ६७ रुग्ण आए| कल आश्रम के ज्येष्ठ स्वामीजी भी आए हैं| इसलिए डॉक्टर सर को शिविर समाप्त होने के पश्चात् भी उनका बीपी देखना पड़ा| और उनके साथ दो- तीन लोग भी आए| दफ्तर जाने के लिए गाड़ी आने में देर होने के कारण हम वहाँ से पैदल चल पड़े| अब रास्ता पता हो गया है| लाल चौक से जा कर जेलम का एक पूल क्रॉस कर जाना है| डॉक्टर सर को तो शॉर्ट कट भी पता हो गया है| छोटी छोटी गलियों से जाते हुए पहुँच गए| आज गाड़ी पवनजी के साथ लाईटस वितरण के लिए भी जा रही हैं| आज शायद उनका वितरण समाप्त होगा|

थोडी ही देर में पता चला कि आज शाम का गाँव का शिविर नही होगा, क्यों कि गाड़ी नही है| कुछ गाडियाँ जम्मू भी गईं है| दोपहर में दफ्तर में आनेवाले कार्यकर्ताओं से बातचीत होती रही| डॉक्टर सर के निर्देश पर दवाईयों के बक्सों को ठीक से लगाने का काम किया| दवाईयाँ कुछ बिखर गईं हैं; इसलिए उन्हे ग्रूप में रखना है| आगे के शिविरों के लिए सेट भी बनाए| डॉ. देसाई सर और चार दिन तक रुकेंगे| लेकिन उनके बाद काम करने के लिए कोई डॉक्टर आने की सूचना अभी तक नही मिली है| अर्थात् प्रयास पुख़्ता किए जा रहे हैं कि और भी डॉक्टर आए| महिला डॉक्टर की भी काफी आवश्यकता है|

डॉक्टर सर के साथ काम करते समय उन्होने उनके अनुभव बताएँ| वस्तुत: वे ४ सितम्बर को श्रीनगर में ही थे| घूमने के लिए आए थे| जब वे पहलगाम गए, तभी बरसात काफी बढ़ चुकी थी| वहाँ से उन्हे लौटना मुश्किल हुआ और जैसे तैसे वे अवंतीपुरा तक ही आ सके जो श्रीनगर से करीब पच्चीस किलोमीटर दूर है| मिलिटरी ने रास्ता बन्द कर दिया था| चारा न होने पर उन्हे वहीं‌ रूकना पड़ा| उस समय के उनकी आपबिती काफी सोचने पर मजबूर करनेवाली है| वे और उनकी पत्नी होटल देखने के लिए गए| तब तक उनके साथ और दो ऐसे फंसे पर्यटक कपल भी आ गए थे| काफी देखने पर इन लोगों को एक होटल ठीक लगा| पर्यटकों की मजबूरी और विकल्पों की कमी देखते हुए उस होटलवाले ने दिन का पंधरासौ किराया प्रति परिवार बताया| लेडिज को यह होटल इतना ठीक नही लगा; इसलिए सामान वहाँ छोड कर दूसरा विकल्प देखने के लिए सब गए| पास ही में एक जगह उन्हे पाँच टिचर्स मिली जो जम्मू की थी| वे किराए से कुछ कमरों में रहती थी| कुछ लोगों को उन्होने पहले से आसरा दिया था| इन लोगों ने अपनी दिक्कत उन्हे बतायी और उन टिचर्स ने उन्हे भी आसरा दिया| बस दिक्कत यह थी कि इन तीन परिवारों को (जो कि तीन कपल्स थे) एक ही कमरे में रहना पड़ेगा जिसके लिए वे तुरन्त तैयार हुए| लेकिन जब सामान वापस लाने गए, तब उस होटलवाने ने मात्र सामान रखने के हजार रूपए लिए| आपदा में भी कुछ लोग इन्सानियत भूल कर लूटपाट करते हैं| उसी का यह उदाहरण था| खैर|

फिर वे तीन कपल्स कुछ दिन उन टिचर्स के पास रहें| टिचर्स जम्मू की थी और काफी सहृदय थी|‌ उनके घर का मालिक भी अच्छा था जिसने इन लोगों से सहयोग किया| उनके पास पर्याप्त राशन भी था जिससे आपत्ति के समय सबका गुजारा हो सका| रास्ता न खुलता देख कर सब परेशान हुए| जब तक मोबाईल्स चालू थे, तब तक डॉक्टर सर ने उनकी पहचान के एक व्यक्ति द्वारा फंसे होने की खबर मिलिटरी तक पहुँचाई| फिर एक दिन बाद मिलिटरी उन्हे लेने आयी| और मिलिटरी ने उन्हे हेलिकॉप्टर द्वारा चंडीगढ़ छोडा जहाँ से वे गोवा गए|‌ डॉक्टर सर बता रहे हैं कि लौटने पर उन्हे खुशी तो हुई ही; लेकिन थोड़ा अपराध भाव भी महसूस हुआ| एक तरह से वे डॉक्टर होते हुए भी आपदा से बच कर भाग गए थे| इसीलिए फिर उन्होने यहाँ सेवा के लिए आने का निर्णय किया! और अब अकेले होते हुए भी वे ही सब शिविर ले रहे हैं|

उनके अवंतीपुरा के वास्तव्य में उन्होने और कुछ चीजें‌ देखी|‌ जम्मू की टिचर्स के अवंतीपुरा के अनुभव कटु थे| एक तरह से मुश्किल से वे वहाँ रह रही थी| और दूसरी बात यह कि जब इन लोगों को निकालने के लिए हेलिकॉप्टर आया, तब मिलिटरी के लोगों से मिलना हुआ| तब लोग हेलिकॉप्टर में बैठने के लिए कतार में खडे थे और अपनी बारी के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे| तब वहाँ बैठा एक मिलिटरी अफसर बड़े तनाव में था| रोते आँखों से वह इस काम में होनेवाले तनाव के बारे में कह रहा था| यह भी कह रहा था कि कश्मिरियों को इतनी मदद करने पर भी वे हमें गालियाँ ही देते हैं| फिर उसने कश्मिरियों को कुछ उल्टा सीधा भी कहा| यह सुन कर पास ही बैठा हुआ एक कश्मिरी युवक उसके पास आ कर बहस करने लगा और कहने लगा कि कश्मिरियों को बदनाम मत करो| वह भी मिलिटरीवालों के बारे में उल्टा सीधा कहने लगा| वह कहने लगा कि मिलिटरी कई क्राईम करती हैं और सिर्फ भारत से आए टुरिस्टों की ही मदद कर रही है| बात से बात बढ़ती गई| अन्य लोग और अफसर बीच में‌ आए और जैसे तैसे मामला शांत हो गया| इस तरह की प्रतिक्रियाएँ आईसबर्ग का एक टुकड़ा जैसी होने पर भी अस्वस्थ करनेवाली हैं|

. . . बातचीत के साथ दवाईयाँ लगाने का काम भी पूरा हुआ| आज खाना बनाने में मुझे भी सहभाग लेना है और सब्जी और रोटियाँ बनानी है| साथ ही कार्यकर्ताओं से बातचीत भी हो रही है| ऐसी ही प्रतिक्रिया यहाँ के कुछ कार्यकर्ताओं में भी हैं| एक कार्यकर्ता ने यह भी कहा, जब हम लोग इसी दफ्तर में फंसे थे, तब हम खिड़की से मिलिटरी के हेलिकॉप्टर्स को हाथ दिखा कर उनका अभिवादन करते थे| तथा उन्हे खिड़की से तिरंगा भी दिखाते थे| उसी समय यहाँ आसपास रहनेवाले लोग उन्हे हाथ से दूर रहने का इशारा करते थे और कहते थे कि हमें‌ मिलिटरी की मदद की कोई ज़रूरत नही है| लेकिन जब मिलिटरी की नावें आती थी, यही लोग पहले थे जो उनके सामने जा कर मदद के लिए हाथ फैलाते थे| इन लोगों को मिलिटरी की मदद तो चाहिए; जो मिल रहा हो, वह सब चाहिए; पर बाद में उन्हे मिलिटरी को गालियाँ ही देनी है. . . .

दादाजी की कही‌ बात ऐसे में याद आती है| पहले ही दिन उन्होने कहा था कि हर परिवार में एक बन्दा बिगड़ा हुआ होता है| एक इन्सानी भूल या कमीं मानते हुए उसे माफ करना है| दादाजी ने जैसे एक सूत्र दिया था- 'हम यहाँ किसी को कुछ समझाने नही आए है, वरन् समझने आए है'; उसी प्रकार उन्होने और भी एक सूत्र बताया था- 'कुछ चीजें देखने पर भी अनदेखी करनी हैं|' ये चरमपन्थी प्रतिक्रियाएँ उसी श्रेणि में आती हैं| लेकिन इसका मतलब ऐसी प्रतिक्रियाओं के अस्तित्व को ही नकारना नही हैं| ऐसी प्रतिक्रियाएँ हैं; और उसके अनगिनत कारण भी हैं| किसी भी सिक्के के दो पहलूं होते हैं|‌ वैसे भी यहाँ पर है| और सच्चाई हमेशा हाथी जैसी बड़ी होती है और हमारे दृष्टिकोण एक एक हिस्से को देखनेवाले अन्धे के तरह होते हैं| इसलिए खुली आँखों से इन चीजों को वे जैसे हैं; वैसे देखना और समझना आवश्यक है| इतनी तो बात पक्की है कि जम्मू- कश्मीर कुछ सदियों से एक तरह की आपदा से गुजर रहा है- पीछड़ेपन की आपदा, शिक्षा की कमी की आपदा; अच्छे वातावरण की कमी की आपदा आदि आपदाओं का यह बड़ा लम्बा दौर हैं| जाहिर है ऐसी आपदा के पीडित लोगों में तनाव तो होगा ही| उसका एक मात्र उत्तर इस बड़ी आपदा को उतने ही बड़े पैमाने के कार्य द्वारा रोकना है| जैसे कितनी सख़्त चट्टान हो; धीरे धीरे पानी उसे भी बदलता है| और यह तनाव मात्र कश्मीर की बात नही है| देश में हर जगह हिंसाचार, भ्रष्टाचार, अत्याचार, माफिया राज, अपराध आदि अलग अलग तरह से यह हो ही रहा है|

. . रात को सबने मिल कर भोजन बनाया| इतने अधिक लोगों का खाना बनाने का अभ्यास नही होने के कारण कुछ कमीं भी रही; लेकिन मजा आ गया| भोजन बनाने का हुनर भी थोड़ा निखर गया| और भोजन तिखा होने से थोडी देर ठण्ड से राहत भी मिली| मै और डॉक्टर सर सोच रहे हैं कि कल शंकराचार्य मंदिर जाएँगे जो यहाँ से करीब आठ किलोमीटर पर एक चोटी पर हैं| सुबह जल्दी उठ कर जाएँगे तो तीन- चार घंटों में लौट सकते हैं जिससे शिविर को समय पर शुरू कर सकेंगे| लेकिन उसके लिए इतनी घनी ठण्ड में सुबह पाँच बजे निकलना होगा. . .





































क्रमश:
जन्नत बचाने के लिए अब भी सहायता की आवश्यकता है. . .   
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Sunday, November 16, 2014

जन्नत को बचाना है: जम्मू कश्मीर राहत कार्य के अनुभव १२


सैदपोरा में स्वास्थ्य शिविर

१५ अक्तूबर की‌ सुबह प्रोपोझल्स पर चर्चा हुई|‌ कुछ करेक्शन्स करने के बाद दादाजी ने उन्हे मेल कर दिया|‌ व्हिडिओ के लिए जो टेक्स्ट लिखा हुआ था, उसे भी‌ दादाजी‌ ने देखा| देखने के बाद उन्होने कहा कि, बुरा मत मानना पर इसमें अभी बहुत कुछ करना है| एक तरिका होता है सीधा बात कह देने का| इससे जानकारी पहुँचती हो; पर कहने की बात जीवन्त नही होती| दूसरा तरिका होता है किसी चीज को जीवित बना कर कहना| उसके बारे में उन्होने कई बातें बतायी| एक तो नॅरेशन के लिए जो शैलि चाहिए वह बच्चों की पुस्तिका- चन्दामामा की कथाओं सरिखी‌ होनी चाहिए| उसमें इंटरेस्ट बनाया जाता है| कहानि जैसे ढंग से बातें कही जातीं है जिससे पढ़नेवाले का इंटरेस्ट बनता है| दादाजी ने फिर कहा कि बिलकुल जल्दी नही है; आप समय लो और इस टेक्स्ट को लिखो| फिर उन्होने सेवा भारती के कुछ व्हिडिओज भी दिखाए| एकल विद्यालय अभियान पर 'दस्तक' नाम का व्हिडिओ बहुत ही रोचक लगा| संस्था के कश्मीर में चल रहे कार्य पर भी व्हिडिओ दिखाया| एक व्हिडिओ संस्था द्वारा अगस्त २०१० में लेह में किए गए राहत कार्य पर भी है| और एक व्हिडिओ अमरनाथ श्राईन आन्दोलन पर भी है; वह भी काफी रोचक है|‌ समय न रहते उसे देख नही सके|‌ दादाजी ने यह भी कहा कि डॉक्युमेंटेशन के साथ मै डॉक्युमेंटरी भी कर सकता हुँ| यह मेरे लिए एक नया डोमैन हो सकता है| काफी महत्त्वपूर्ण लगे उनके सुझाव|

दादाजी और अन्य साथी आज लौट रहे हैं| सुरेन्द्रजी ने शिविरों की जानकारी का दैनंदिन रिपोर्टिंग बता दिया| अब आज से इसे हमें मेंटेन करना होगा| आज भी पवनजी फॉगिंग के लिए जाएँगे| उन्होने बताया कि कल वे जहाँ गए थे, वहाँ सरकारी दफ्तरों का बुरा हाल था|‌ अब भी काफी कीचड़ वहाँ है| तेज बदबू के भीतर अफसर लोग काम करते हैं; इससे उनका सिर भी चकराता है| और जो अनुभव चिकित्सा शिविरों में आ रहा है, वहीं उन्हे भी आय| सरकारी अफसरों ने उन्हे कई स्थानों पर फॉगिंग करने के लिए कहा| उनमें से कई तो उनके अपने रिश्तेदारों के घर थे| घर घर जा कर टॉयलेट सहित कई स्थानों पर उन्हे फॉगिंग करना पड़ा| वे थोडे नाराज भी थे; लेकिन दादाजी ने उन्हे समझा दिया और आज वे फिर फॉगिंग के लिए तैयार है|

सुबह का शिविर आश्रम में यथाक्रम हुआ| कार्यकर्ता नही हैं; लेकिन अब उनकी‌ आवश्यकता भी नही| सब अच्छे से मॅनेज हो रहा है| वहाँ पहुँचते ही चाचाजी स्वागत करते हैं| बीच में चाय भी पिलाते हैं| अब धीरे धीरे कौनसी बीमारी के लिए क्या दवाईयाँ देनी है, यह भी‌ याद हो रहा है! एक पुलिसवाला रुग्ण आया था| उसे किसी ने बड़ी‌ बेरहमी से मारा था| पुलिस भी इन्सान होते हैं, यह देखने का मौका मिला| उन्हे अन्दरूनी चोट आयी थी जिसके लिए डॉक्टर सर ने दवाईं दी| बाहर सड़क पर कुछ नारेबाजी भी हो रही है; फिर भी शिविर चलता गया| अपेक्षा के अनुसार लोग आखिर तक आते रहें और जैसे तैसे समय के चलते शिविर रोकना पड़ा| तब तक ८३ रुग्ण हुए|

आज पुलवामा जिले के सैदपोरा गाँव में दूसरा शिविर होगा| उसके लिए हिलाल भाई, फयाज़ भाई, नज़ीर भाई आदि कार्यकर्ता भी साथ होंगे| और दादाजी आज श्रीनगर से जम्मू जा रहे हैं| इसका मतलब आज के बाद दफ्तर एकदम सुना सुना होगा| दादाजी की उपस्थिति से ही एक वातावरण बनता है|

सैदपोरा गाँव में पहुँचने तक दोपहर के चार बज चुके हैं| यह शिविर खुले ग्राउंड में लेने के बजाय कमरे में लेने का विचार है जिससे भीड नही होगी और एक समय एक ही रुग्ण देखा जाएगा| कार्यकर्ताओं ने विश्वास दिलाया कि इस बार इतनी भीड़ नही होगी| यथा समय शिविर शुरू हुआ| एक कार्यकर्ता के बड़े घर के एक कमरे में चालू हुआ| बाहर गेट पर बॅनर लगा है जिससे लोगों को पता चलेगा| एक बात यह है कि गाँव में इसकी सूचना बहुत पहले नही दी जा सकी| एक तो कार्यकर्ताओं का प्लॅनिंग उसी दिन होता है; एक दिन पहले नही होता है|‌ उन्हे भी कई काम होते हैं और कईं चीजें देखनी होती हैं| फिर भी एक बार शिविर शुरू होने पर लोग निरंतर आते रहते हैं| पूर्व में जब कई शिविर एक साथ होते थे और कई‌ डॉक्टर शिविर लेते थे, तब मस्जीदों से और मस्जिद कमिटियों के द्वारा शिविरों की घोषणा की जाती थी| यहाँ के गाँवों में एक बात और खास लगी कि ग्राम पंचायत के लेटरहेड अंग्रेजी में हैं! लोग हिन्दी अच्छी समझते है| हालाकि हमें कश्मिरी थोड़ी ही समझ आती है|

पीछले शिविर के मुकाबले यह शिविर ज्यादा नियंत्रित है; फिर भी भीड़ तो हो गई| करीब ८३ रुग्ण होने के बाद पंजीयन बन्द किया गया| फिर भी लोग आते ही रहें| काफी अन्धेरा होने पर रुकना पड़ा| रुग्ण न रुकते देख कर धीरे धीरे दवाईयाँ एम्ब्युलन्स में रख दी| फिर भी लोग नही माने| अब कार्यकर्ताओं को और पवनजी को लाईटस के वितरण की चिन्ता हो रही है| उन्हे इसी गाँव के एक मोहल्ले में- खोमेनी मोहल्ला- वितरण करना है| वह यहाँ से अधिक दूर नही है|‌

अब सड़कें सुनसान है और वितरण का काम शुरू होनेवाला है| लेकिन आज और समय लगेगा| क्यों कि जैसे ही उस मोहल्ले में पहुँचे, कई लोग सामने आए और कार्यकर्ताओं से माँग करने लगे| इस गाँव के अन्य वार्डों के लोगों को भी लाईटस और कँबल चाहिए| अब क्या करें? यह सोचने में ही काफी समय गया| एम्ब्युलन्स एक तरफ खड़ी की गई है| कार्यकर्ताओं में भी दो विचार हैं| कुछ बन्दे कह रहे हैं कि यदि कुछ पंगा होने की सम्भावना है तो वितरण टाल दो| दूसरे बन्दे कह रहे हैं कि कोई पंगा नही होगा, आज ही बाँटते है| यह पूरा काम ही काफी ट्रिकी है| काफी टेढ़ा है| कार्यकर्ताओं में से एक इसी गाँव के पंच है| वे कह रहे हैं कि कोई अड़चन नही होगी; वितरण कराते है| अगर नही करते हैं‌ तो लोग नाराज हो जाएँगे| फिर पंगा हो सकता है| इससे कुछ समय तनाव बन गया है| काफी सोच विचार के बाद तय किया गया कि लाईटस और कँबल बाँट ही देते है|

फिर छोटी मीटिंग हुई| फोटों खींचे गए|‌ लोग आते रहें और कुछ लोग शिकायत भी करते रहें| वितरण का काम चलता रहा और उसमें समय जाता रहा| डॉक्टर भी हैं, यह लोगों को पता चलते ही लोग बीमार होते और दवाईयाँ माँगते| निकलते समय कुछ लोगों को दवाईयाँ देनी पड़ी| लोग कई दवाईयाँ चाहते हैं| डॉक्टर सर ने विनम्रतापूर्वक उन्हे समझाया| जाते जाते भी अतिरिक्त लाईटस देने पड़े| पवनजी इससे काफी चिन्तित हुए| कश्मीर के हालात के बारे में बिना कोई जानकारी उन्हे यहाँ भेजा गया| रास्ते पर जमा हुआ पानी देख ने के बाद ही उन्हे फ्लड आये थे यह पता चला| डॉक्टर सर भी कह रहे हैं कि आगे से लाईटस वितरण के काम को शिविरों से अलग रखना चाहिए| हमें तब यही लगा कि कंपनी सेवा भारती के साथ जुड़ कर बड़ा मुनाफा कमा रही हैं| जम्मू से श्रीनगर तक १५० लाईटस लाना, यहाँ गाँव में जा कर उनका वितरण करना; कँपनी के ऑन ड्युटी बन्दे के ठहरने खाने का खर्चा आदि सब पैसे कंपनी ने बचाएँ| अर्थात् दादाजी इससे अन्जान नही हैं| वे कुछ अलग तरिके से सोचते हैं| लेकिन अब उन्हे और कार्यकर्ताओं को बताना पड़ेगा कि वितरण को शिविर से अलग रखना चाहिए|

रात में गाँव के भीतर की सड़कें सुनसान हो गई हैं| श्रीनगर भी धीरे धीरे ठण्ड की गिरफ्त में जा रहा हैं| पता चला कि दादाजी श्रीनगर से निकले थे; लेकिन कुछ काम बाकी होने से रूक गए| अच्छा लगा कि और एक दिन उनके पास सीखने के लिए मिलेगा| आज रात का भोजन मयूरजी ने बनाया है| महाराष्ट्रीयन पिठले बनाया हैं| और खाना अच्छा खासा तिखा हो गया जिससे कुछ समय के लिए ठण्ड गायब हुईं| भोजन चल ही रहा हैं जब मयूर जी ने कहा कि गोली की आवाज आ रही हैं| यहाँ श्रीनगर में यह आम बात है| आज सीआरपीएफ के शिविर पर भी लोगों ने नारेबाजी की हैं| उसी समय पता चला कि आज कुछ सरकारी अफसर दफ्तर में आए थे और कुछ दवाईयाँ ले जाना चाहते थे| दादाजी ने उन्हे समझाया और ऐसा करने से रोका| दादाजी से गाँव के अनुभव के बारे में बात हुई| डॉक्टर सर ने भी उनसे कहा कि वितरण के काम को अलग रखा जाना चाहिए जो उन्होने माना| दादाजी से मात्र बात करने से ही दिन के काम का जो सूक्ष्म तनाव था, वह दूर हो गया| हिलाल भाई के पिताजी आज भी हॉस्पिटल में ही हैं; उनकी वहाँ से छुट्टी नही हुई है| आज हिलाल भाई के रिश्तेदार और कुछ अन्य कार्यकर्ता भी दफ्तर में ही रुकेंगे| ठण्ड इतनी है कि लग रहा है तुरन्त कँबल ओढ़ कर नीन्द की शरण मे जाऊँ| 

बाढ़ के जख्म अब भी ताज़ा है|
























गाँव जानेवाली पक्की सड़क- कश्मीर के समृद्ध देहात की झलक










































 



क्रमश:

जन्नत बचाने के लिए अब भी सहायता की आवश्यकता है. . .   

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Saturday, November 15, 2014

जन्नत को बचाना है: जम्मू कश्मीर राहत कार्य के अनुभव ११

स्वास्थ्य शिविर में सहभाग और अन्य कार्य

१४ अक्तूबर की सुबह दादाजी से काफी बातें हुई| कल के अनुभव के बाद काफी प्रश्न मन में हैं; जिनका समाधान अब करना है| पहले दादाजी को गाँव का अनुभव विस्तार से बताया| दादाजी ने शांतिपूर्वक सुना और अपनी बात कही| उन्होने कहा कि सेवा भारती के कार्यकर्ता काफी टेस्टेड हैं; परिपक्व है| राहत कार्य के आरम्भ में ही उनको बड़ी एनजीओज द्वारा ऑफर दी गई थी; पर वे सेवा भारती के साथ ही जुड़े रहे| इसलिए उन्होने जिन लोगों को लाईटस और कँबल बाँटें; वह सोच समझ कर ही बाँटें| उन्होने बताया कि क्षतिग्रस्त गाँवों के परिवारों को लाईटस मिले और कँबल मिलें, यही बात हमें देखनी चाहिए| इसके बारे में चिन्ता की आवश्यकता नही है, ऐसा उन्होने कहा|‌ साथ में यह भी कहा कि, ९०% काम तो ठीक हैं; थोड़े से १०% काम में कुछ इधर- उधर हो सकता है जो कि स्वाभाविक है| और अगर ९९ लोगों को सहायता मिलती है और एक व्यक्ति को नही मिलती, तो वह अकेला व्यक्ति बहुत बड़ा शोरगुल करता है| इसलिए उसे अलग ढंग से देखना होगा| कश्मीर में सैलाब के बाद लोगों तक सहायता पहुँचाना इतना सरल भी नही है| फिर उनसे कंपनी की भुमिका के बारे में पूछा| उन्होने कहा कि मै तो ऐसा देखता हुँ कि उस कंपनी का यह नौजवान बन्दा हमारे काम में जुड़ गया है|‌ यहाँ पर फॉगिंग करनेवाला कोई नही था; वह इंजिनिअर है और फॉगिंग कर सकता है; अब कंपनी कुछ मार्केटिंग करती हो तो करें| आखिर यहाँ सभी लोग अपना अपना मार्केटिंग तो कर ही रहे हैं| उनकी बात जची|

पवनजी ने बाद में फॉगिंग कर के दिखाया| स्प्रेयिंग जैसा ही, पर एक अलग यंत्र से वह यह काम कर रहे हैं| उन्होने उसका डेमो भी दिया| कंपनी की ड्युटी पर होने के बावजूद वह सेवा भारती के काम में भी सम्मीलित हो रहे हैं|

सुबह में सुरेंद्रजी के साथ बैठ कर व्हिडिओ मिक्सिंग का काम भी हुआ| उन्होने अच्छा व्हिडिओ बना लिया है| फोटोज को कॅप्शन भी दिए गए हैं| जल्द ही यह पूरा हो जाएगा| मेरे कुछ प्रपोझल्स बनाने अभी बाकी हैं; कल रात में लेट आने से वह काम बाकी हैं| आज समय मिला तो उसे करेंगे| डॉ. देसाई सर के साथ में सुबह के शिविर के लिए दवाईयों के कुछ सेट बनाए| दोपहर के गाँव के शिविर के बारे में अभी कुछ तय नही हुआ है|‌ फयाज़ भाई बताएँगे|

आश्रम का शिविर अच्छा हुआ| कोई कार्यकर्ता न होने पर भी डॉक्टर सर और वहाँ के लोगों के सहयोग से ठीक हुआ| आज करीब ७७ रुग्ण आए| काफी बातें देखने को मिली| एक तो वहाँ आश्रम परिसर में काम करनेवाले लोग सबसे पहले आए| वे रोज ही पहले चेक अप करवाते हैं| वास्तव में हँसी आयी उनका एक तरह से बचकाना रूख देख कर| वे रुग्ण नही हैं; फिर भी शिविर शुरू होता देख कर उनको कुछ दर्द आदि होने लगते हैं! वे रुग्ण नही हैं; पर यह मानसिकता जरूर थोडी रुग्ण है| गाँवों में भी यही हुआ था| लोग छोटी छोटी चीजों के लिए बड़े उतावले होते थे| कोई पावडर दो; ओआरएस दो या बँडेड दो| या फिर वे लाईटस भी|‌ लाईटस की किमत दो हजार रूपए थी| और लोगों के घरों को घर कम बंगला कहना ज्यादा ठीक होता| इतने सम्पन्न होने के बावजूद बच्चों जैसे उतावले हो रहे थे| यह एक लेने की मानसिकता से उत्पन्न हुई बड़ी पुरानी बीमारी के लक्षण लगते हैं| इसके कई कारण भी होंगे|

शिविर में बँडेड, मास्क, मल्हम, टॉनिक आदि चीजें भी कुछ मात्रा में रखते हैं| लोग उन्हे भी लेना चाहते हैं| एक साथ कई मास्क लेना चाहते हैं| थोड़ा आवश्यक होगा ही; पर आवश्यकता से अधिक भी लोगों को चाहिए| और उनको मना करने पर नाराज होते हैं| उनको बताना पड़ता है कि अन्य जगहों के शिविरों के लिए यह हैं; तो भी ऐसे देखते हैं कि ये चीजें‌ लेना उनका अधिकार है| फिर डॉ. सर बड़े ही शांत स्वर में उनको समझाते है कि ये दवाईयाँ लोगों की डोनेशन्स से आयी हैं; अत: जो आया उसी में हमें देना है|

दोपहर तक गाँव के शिविर के बारे में फयाज़ भाई आदि कार्यकर्ताओं ने कुछ नही बताया इसलिए वापस दफ्तर में लौटें| दोपहर में दवाईयों के सेट बनाने का काम डॉ. सर के साथ मिल कर किया| प्राथमिक चिकित्सा के बक्से बनाएँ जिनमें ओआरएस, स्किजर, ऑइंटमेंट, क्लोरिन टॅबलेटस, बँडेड, कॉटन, बीपी एपरॅटस, दर्द का मल्हम आदि वस्तुएँ है| डॉ. सर बता रहे हैं कि कई महंगे इन्जेक्शन्स भी यहाँ है जो शिविर में उपयोग में नही लाए जा सकते हैं| उन्हे बड़े सरकारी हॉस्पिटल में देना पड़ेगा| कुछ दवाईयों का एक्सपायरी दिनांक भी करीब आ रहा है| डॉक्टर सर गूँज संस्था के एक केन्द्र पर भी जा कर कुछ दवाईयाँ ले कर आए| दोपहर में दवाईयों को ओर्गनाईझ करते रहें| आज शाम गाँव का शिविर नही होगा| कुछ अड़चन है, ऐसा कार्यकर्ता ने बताया| एक अड़चन यह भी है कि एम्ब्युलन्स चलाना जाननेवाले कई कार्यकर्ता हैं; पर हिलालभाई अकेले हैं जिनके पास लाईसन्स है| और उनके पिताजी कुछ दिनों से हॉस्पिटल में हैं|

दोपहर में ही दादाजी, फयाज़ भाई और जावेदजी के साथ कुछ चर्चा भी हुई| ये जावेदजी टंगमर्ग से हैं| उनकी एक एनजीओ भी है- नई किरन| वे एमएसडब्ल्यू कर रहे हैं और सेवा भारती के पुराने कार्यकर्ता है| गाना भी बढिया गाते हैं| उनकी‌ एनजीओ वूलर लेक की सफाई करना चाहती हैं| यह दल लेक जैसा ही एक बड़ा तालाब है जो कुछ सालों से घनी आबादी और निर्माण के कारण एकदम सीकुड़ गया है| बाढ़ आने के कुछ कारणों में कई कारण पानी पर किए हुए निर्माण कार्यों से भी जुड़े है|‌

चर्चा में कई बातें‌ तय हुईं| दादाजी कल शायद जम्मू जाएँगे| अब रिलिफ कार्य का मुख्य चरण समाप्त हुआ है| अब कार्यकर्ता भी धीरे धीरे लौटेंगे| इसलिए वे कुछ चीजें फयाज़ भाई और जावेदभाई को बता रहे हैं| श्रीनगर के स्वास्थ्य विभाग को राहत कार्य का रिपोर्ट देना है| तथा इन्जेक्शन्स किसी बड़े हॉस्पिटल में देने है| अगले छह माह के लिए एम्ब्युलन्स पर काम करने के लिए कोई डॉक्टर यहाँ आए ऐसा प्रयास चल रहा है| उसके लिए आवास सुविधा का आवेदन प्रशासन के पास देना है| क्यों कि अधिक समय आते हैं तो डॉक्टरों के लिए अच्छा आवास होना चाहिए| लाल चौक में एक यात्री निवास हैं; वहाँ पर भी राहत सामग्री का एक सेट देना है|‌ ये काम आनेवाले दिनों में करने है|

शाम का समय वह आवेदन लिखने में और प्रपोझल्स का काम करने में गया| आज दोपहर में पवनजी ने कई सरकारी दफ्तरों में फॉगिंग किया| वहाँ पर भी अफसरों ने उन्हे खूब काम दिया और कई जगह जा कर फॉगिंग करवाया| शाम को एक डिएसपी सेवा भारती में भी आए| उनसे दादाजी का अच्छा रॅपो है| उन्होने दवाईयों के सेट भी देखें| सेवा भारती दफ्तर के मकान मालिक निवृत्त पुलिस अफसर मिर्जा जी भी कुछ समय आ कर मिले| दफ्तर के पड़ोसी अंकल भी आज मिले| उनके कमरे में ही सभी दवाईयाँ रखी गईं हैं|

अब धीरे धीरे राहत कार्य का मुख्य चरण समाप्ति की ओर बढ़ रहा है| कार्यकर्ता भी‌ वापस जा रहे हैं| कल दादाजी, वर्मा जी, चाचू जी और सुरेंद्र जी लौट जाएँगे| आज रात का भोजन पवनजी ने बनाया| वाकई स्वादिष्ट बनाया है| उनके पास अनुभव की कमीं जरूर है; पर हुनर की नही| डॉ. सर से भी काफी बातें हो रही हैं| वे गोवा से आए हैं| पहले भी डॉ. प्रथमेश कर्पे गोवा से आए थे| देसाई सर गोवा के एक सम्भाग में रोटरी क्लब के प्रमुख है और आने से पहले उन्होने काफी धन भी इस कार्य हेतु जुटाया है| अब यहाँ पर वे दस दिन तक सहभाग देंगे|

श्रीनगर में एफएम रेडिओ अच्छा चलता है| आकाशवाणी के समाचार अच्छे सुनाई देते हैं| रात को सुफी संगीत भी होता है| मोबाईल नेटवर्क ठीक काम करता हैं| डेटा नेटवर्क मात्र श्रीनगर के कुछ स्थानों पर ही मिलता है| बाकी देखा जाए तो रिलिफ कार्य करने के स्थान में रहने और खाने- सोने की सुविधाएँ काफी अच्छी हैं| अब रिलिफ में‌ सहभाग के चार दिन और बचे हैं| 

रुग्ण सेवा करते हुए डॉ. देसाई सर



















शिविर के पास में ही श्रीनगर का मशहूर लाल चौक




































 





क्रमश:

जन्नत बचाने के लिए अब भी सहायता की आवश्यकता है. . .   

सहायता हेतु सम्पर्क सूत्र:
SEWA BHARTI J&K
Vishnu Sewa Kunj, Ved Mandir Complex, Ambphalla Jammu, J&K.
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Friday, November 14, 2014

जन्नत को बचाना है: जम्मू कश्मीर राहत कार्य के अनुभव १०

श्रीनगर और गंगीपोरा में स्वास्थ्य शिविर

१३ अक्तूबर की सुबह| आज डॉ. प्रज्ञा दिदी और डॉ. अर्पितजी वापस जाएँगे| उनके स्थान पर कल गोवा से डॉ. देसाई जी आए हैं| कल डॉ. प्रज्ञा दिदी और अर्पितजी ने मेडिसिन्स के कई सेट बनाए हैं| कल रात उन्होने वह काम किया| आज सुबह वे शंकराचार्य मंदीर देखने के लिए गए; लेकिन गाड़ी में स्पार्क होने से लौटना पड़ा| अब वे एअरपोर्ट जाएँगे| एक तरह से अब एक ही‌ डॉक्टर होंगे तथा उनके साथ फार्मासिस्ट भी नही होगा| फार्मसिस्ट चेतनजी भी आज ही निकल रहे हैं| इसलिए अब मुझे भी चिकित्सा शिविरों पर जाना होगा| अब तक कुछ दवाईयों के बक्से बनाने और उन्हे एम्ब्युलन्स में रखने के अलावा मेरा इसमें कुछ सहभाग नही था| अब बाकी दिनों में यही काम मुख्य होगा|

सुबह सुरेंद्रजी के साथ मिल कर फोटोज को कॅप्शन देने के लिए बात हुईं| व्हिडिओ का ड्राफ्ट तो उन्होने बनाया है; उसे और बेहतर बनाना है| फोटो के कॅप्शन दादाजी और सुरेंद्रजी तय कर रहे हैं| आज के शिविरों के लिए दवाईयों के सेट तैयार है; फिर भी और सेट बनाने पडेंगे| कल जैसे गोवा से डॉ. देसाई जी आए, वैसे जयपूर से युवा इंजिनिअर पवनजी भी आए हैं| वे सोलार लाईटस का वितरण कार्य करेंगे| उसके लिए कंपनी‌ से आए हैं| कल शायद वे श्रीनगर के शिविर में भी थे| कल डॉ. प्रज्ञा दिदी ने शिविर का काम डॉ. देसाई जी को हँड ओव्हर किया| और डॉक्टर आएँ इसके लिए सब लोग अपने अपने क्षेत्रों में सम्पर्क कर रहे हैं|

आज के पहले शिविर के लिए कल रात से ही दफ्तर में आए हुए दो कार्यकर्ता- जावेदजी और शाजिया दिदी आएँगे| आश्रम का शिविर अब रुटिन बन चुका है| आश्रम में भी कुछ दवाईयाँ रखी जाती हैं; संस्था का बैनर भी वहीं होता है| आश्रम परिसर के कुछ कार्मिक भी शिविर में सहयोग करते हैं| हालाकि मेरा पहला शिविर होने के कारण कुछ चिन्ता है| और फार्मसिस्ट भी नही है| साढ़े दस बजे तक शिविर की तैयारी हो गई| दवाईयाँ लगायी गई; बैनर लग गया| टेबल तो वहाँ के चाचाजी स्वयं लगाते है| शिविर शुरू हुआ| आज एक तरह से सब नया है| डॉक्टर भी कल ही आए हैं; उन्हे शिविर कार्यप्रणालि समझने में थोड़ा समय लग सकता हैं| शुरू में थोडी दिक्कतें आयी| सेवा भारती दफ्तर से दवाईयाँ लेते समय कैंची नही ली थी; और आश्रम में भी नही मिली; अत: उसे जा कर खरीदना पड़ा| सड़क पर दुकानें अब खुल गईं है| हालांकि उनके सामान की बड़ी हानि हुईं है| एक- दो आवश्यक दवाईयाँ सेट में नही मिल रही हैं| लेकिन डॉ. सर ने फिर अन्य दवाईयाँ से काम लिया|

श्री चन्द्र चिनार आश्रम में एक विशाल से चिनार वृक्ष के नीचे ही टेबल लगाया गया| धीरे धीरे रुग्ण आने लगे| सबसे पहले तो आश्रम परिसर के कार्मिक ही‌ आए| बाद में लोगों की भीड शुरू हुई| शाजिया दिदी रुग्णों का पंजीयन कर रही हैं; मै और जावेदजी दवाईयाँ निकाल कर दे रहे हैं| कई बार दवाईयाँ न मिलने पर डॉ. सर को भी ढूँढ के देनी पड़ रही है| यहाँ कई दिनों से शिविर चलने के कारण सभी लोगों को पता है| धीरे धीरे लोगों की संख्या बढती गए और कतार बनी| सब कुछ शांति से चल रहा हैं| इस स्थान की एक और विशेषता यह है कि यहाँ मेरे मोबाईल को इंटरनेट मिल रहा है जो दफ्तर में नही मिलता है| यहाँ‌ पर एक बात दिखी की आनेवाले मरिजों में अधिकतर सामान्य रुग्ण है| बहुत से रुग्णों को त्वचा की तकलीफें और बदन दर्द है| यहाँ अब भी सरकारी अस्पताल पूरे खुले नही हैं| इसलिए शिविर आवश्यक है|

करीब दो घण्टे शिविर चला और एक बजे के बाद धीरे धीरे बन्द करना पड़ा| साठ रुग्ण आए| शिविर समाप्त करना टेढी खीर है; क्यों कि लोग रूकते ही नही| उनका ताँता लगा ही‌ रहता है| धीरे धीरे समझा कर पंजीयन बन्द किया| दवाईयाँ अन्दर आश्रम में रख दी| तब जा कर लोग रूके| आश्रम में ही भोजन किया| भोजन के बाद और कुछ रुग्ण आए और उनको भी दवाईयाँ देनी पड़ी|

तब तक फयाज़ भाई और हिलालभाई हमें लेने के लिए आ गए| उनके साथ पवनजी भी है| उन्हे गाँव में‌ सोलार लाईटस का वितरण करना है| शहर में ही जावेदजी और शाजिया दिदी उतर गए| एक- दो दिन में ही‌ जावेदजी से अच्छी दोस्ती हो गई है| ये दोनो कार्यकर्ता गांदरबल के हैं और सेवा भारती से हाल ही में जुड़े है| मजे की बाद यह थी की शाजिया दिदी के बोलने में आए कुछ अंग्रेजी शब्द विदेशी एक्सेंट जैसे लगे| गाँव के शिविर के लिए हिलाल भाई, फयाज़ भाई और नज़ीर भाई साथ होंगे| यह शिविर गंगीपोरा गाँव में होगा जो श्रीनगर से करीब तीस किलोमीटर दूर है|

गाँव छोटासा है| यहाँ एक बार दिखी की कश्मीर के गाँव केरल के गाँवों जैसे है|‌ निरन्तर आबादी चलती रहती है| दो गाँवों के बीच बड़ा अन्तराल नही है| गाँव में पहुँचे तो कई प्रश्नार्थक चेहरों ने स्वागत किया| लोगों से कुछ बातचीत होने पर शिविर एक मस्जीद के प्रांगण में लेना तय हुआ| बॅनर लगे; एक कुर्सी लायी गई| लोग इकठ्ठा हुए थे| एम्ब्युलन्स से दवाईयों के बक्से उतारने तक भी भीड़ हुई| फयाज़ भाई ने कहा कि लाईटस अन्दर की तरफ रखो; वो इस गाँव में नही देने है| कुछ कँबल भी‌ हैं; जो लाईटस के साथ दूसरे गाँव में देने हैं| उन्हे लगभग छिपाते हुए दवाईयाँ निकाली और शिविर शुरू हुआ| लेकिन शहर और गाँव के शिविर में बड़ा अन्तर है| यहाँ लोगों की बड़ी भीड़ इकठ्ठी हुई है| सभी आयु के लोग- युवा, बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएँ| पंजीयन कर पर्ची बनाने के बावजूद लोग बड़ी भीड कर रहे हैं| दवाईयाँ निकाल कर देने में भी दिक्कत हो रही है| लेकिन डॉक्टर सर ने फिर काम सम्भाला और मरिजों को देखना शुरू कर दिया| साथ में हिलाल भाई और फयाज़ भाई हैं| शिविर चलता गया|

यहाँ जैसे ही कोई व्यक्ति आता; तो उसको अभिवादन करने हेतु 'सलाम वालेकुम' कहता हुँ| लेकिन 'सलाम वालेकुम' या उसके उत्तर में 'वालेकुम अस्सलाम' कहने के आदि नही होने के कारण बड़ी कठिनाई हुई|‌ एक तरह से अनकॉन्शस मन बीच में आया| लेकिन धीरे धीरे सरलता हुई| यहाँ नमस्ते की भाषा नही चलती; यहाँ अभिवादन के लिए 'सलाम वालेकुम' ही बोलना चाहिए| और इसमें मजहब या स्वाभिमान का कोई मुद्दा नही है| अगर हम तमिलनाडू में हैं; तो 'नमस्ते' के बजाय 'वणक्कम' ही कहना पड़ेगा| उसका स्वाभिमान से कोई सम्बन्ध नही है और नही होना चाहिए| पर एक कार्यकर्ता ऐसे भी है जो 'सलाम वालेकुम' नही कहना चाहते थे| अपनी अपनी सोच है, और क्या| लेकिन सामनेवाले के साथ कार्य करते हुए उसी की भाषा में बात करना स्वाभाविक होता है| खैर|

यह शिविर लम्बा खीचता गया| बीच बीच में मस्जीद से नमाज भी अदा की जा रही है| स्थानीय लोगों में अधिकतर लोग बात करने में रस नही लेते| कुछ युवा हैं जो मुस्कुराते हुए बात करते हैं| लेकिन करीब ढाई- तीन घण्टों तक शिविर चला लेकिन किसी ने पानी भी नही दिया| एक तरह की दूरी साफ महसूस हुई|‌ लेकिन रुग्ण बराबर आते रहें| महिलाएँ भी बड़ी संख्या में थी| और बेझिझक वह डॉक्टर सर से बात कर रही हैं| भाषा की अड़चन कहीं कहीं है; पर कार्यकर्ता उसके लिए तैयार हैं| यहाँ भी एक- दो दवाईयाँ नही मिलने के कारण वैकल्पिक दवाईयाँ देनी पड़ी| पवनजी ने पंजीयन का काम किया और फिर बाद में लोगों से बात करने लगे| वे बिलकुल नौजवान है और उन्हे पहले जॉब में मात्र तीन माह ही हुए हैं|

शिविर बन्द करने में बड़ी अड़चन हुई| अब तक कुछ लोगों ने अन्दर के कँबल देखे हैं और वे उसकी माँग कर रहे हैं| और रुग्ण है कि रूकने का नाम ही नही ले रहे हैं|‌ आखिर धीरे धीरे सब दवाईयाँ एम्ब्युलन्स में‌ रखनी पड़ी और फिर भी लोग नही माने| दो रुग्ण तो एम्ब्युलन्स में आए और दवाईयाँ ले गए| अर्थात् इसी की अपेक्षा थी|

अब दूसरे गाँव में जा कर लाईटस वितरण करना है|‌ गाँव का नाम शायद शेखपोरा है‌| वहाँ गाँव के सरपंच के घर थोड़े समय रूके| यहीं पर भी लाईटस और कँबल को एक तरह से छिपा कर रखा गया| और घर में एक मीटिंग हुई| उस समय बड़े स्वादिष्ट चाय से खिदमद की गई| बाद में और लोग आते गएँ और फिर बन्द दरवाजे में मीटिंग हुई|‌ फिर और लोग आने के बाद लाईटस का वितरण हुआ| उसके बाद और एक मीटिंग होने लगी| उस समय सरपंच के घर के बाहर कुछ लोग आए और कहने लगे कि आपने तो लाईटस सरपंच के रिश्तेदारों को ही दी| फिर फयाज़ भाई और अन्य कार्यकर्ताओं ने उन्हे किसी प्रकार समझा बुझा कर वापस भेजा| दूसरी मीटिंग बड़ी देर तक चली| वास्तव में इसमें हमारा रोल नही है| लाईटस देनेवाली कम्पनी का यह काम है| लेकिन रुकना पड़ा| फिर धीरे धीरे बात स्पष्ट हुई|‌ यह गाँव बड़ा है और लाईटस मात्र तीस देने थे; इसलिए सरपंच ने अपने रिश्तेदारों में ही वे बाँटें| बाद में निकलते समय कँबल दिए गए| और कुछ स्थानीय लोगों ने भी लाईटस माँगे और देने पड़े|

इससे मन में कई सवाल उठें| जैसा कल के वितरण के बारे में थोड़ी देर तक लगा था, यहीं पर भी लगा| आवश्यकताओं का आंकलन कैसे किया गया हैं और किनको लाईटस देने है, यह कैसे तय किया हैं? यही सवाल लाईटस की कंपनीवाले पवनजी से भी किया| लेकिन उनके पास उत्तर नही है| और एक तो वे नौजवान है; अभी अभी कॉलेज से जॉब में उतरे हैं| कंपनी ने बताया वही वे कर रहें हैं| कंपनी को सिर्फ लोगों को लाईटस बाँटने से मतलब हैं और उनके फोटो से (जिससे वे सीएसआर में इस कार्य को दिखा सकेंगे)| लेकिन जाहिर सी बात है कि आवश्यकताओं का आंकलन नही किया गया| और फिर सरपंच और प्रभावशाली कार्यकर्ताओं ने लाईटस ले लिए| बाद में उसी पर दस्तखत लिए गएं और उसी कारण निकलने में बड़ी देर हुई| उस समय काफी चिन्ताएँ हुई| एक तो स्थानीय लोग ज्यादा बात नही करते हैं| इसलिए कुछ समय यह क्या हो रहा है, इसका भी पता नही चला| जब यह पता चला कि सामान बिना आवश्यकता का मूल्यांकन किए ही दिया जा रहा है तो एक तरह ग़ुस्सा भी आया| पर कोई‌ कार्यकर्ता ने उसपर बात नही की| पवनजी भी‌ चिंतित हुएँ; क्योंकि कुछ लाईटस अतिरिक्त भी‌ देने पड़े| और डॉक्टर सर को भी लोग बार बार दवाई माँग रहे हैं| जैसे तैसे कुछ उपयोगी दवाईं हाथ में‌ देनी पड़ी| गाँव से निकलते समय रात के नौ बज चुके हैं| मन बिलकुल अशान्त है| इस पूरे मसले के बारे में‌ दादाजी से बात करनी पड़ेगी| और वे इसका स्पष्टीकरण जरूर करेंगे और उन्होने बाद में किया भी| लेकिन तब तक मन अशांत रहा| देखा जाए तो ऐसी स्थिति आपदाग्रस्त क्षेत्र में अप्रत्याशित नही कही जा सकती‌ है| कुछ मिलता है यह देखने पर लोगों की माँगे रूकती ही‌ नही है| यह मानवी स्वभाव है| शायद इसी लिए सेवा भारती ने सामग्री वितरण में अधिक काम नही किया| लेकिन इस पूरे विषय के कारण मन अशान्त बना रहा|

लौटते समय श्रीनगर में सड़कें सुनसान हो रही है| रात में सब लोग साथ हैं; इसलिए दादाजी से इस विषय पर बात नही की जा सकी| लेकिन मेरा मन अशान्त है, यह उन्होने तत्काल देखा| अब कल वे इसका उत्तर देंगे| लेकिन तब तक मन अशान्त रहेगा| देखते हैं|

चिनार वृक्ष के पास शिविर| डॉक्टर सर. कार्यकर्ता तथा रुग्ण


























दवाईयों के बक्से
मस्जीद के सामने शिविर| बॅनर के पास फयाज़भाई


























































क्रमश: 

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Thursday, November 13, 2014

जन्नत को बचाना है: जम्मू कश्मीर राहत कार्य के अनुभव ९

राहत कार्य में सहभाग का मध्यान्तर: अनन्तनाग और पहलगाम

२०१० में कुपवाड़ा के फर्जी मूठभेड़ मामले में ५ सेना के व्यक्तियों को उम्र कैद घोषित होने का समाचार मिलने के पश्चात् अनुभव की अगली कड़ी लिख रहा हुँ. . . १२ अक्तूबर के सुबह ठण्ड काफी बढ़ चुकी है| हालांकि श्रीनगर में बर्फबारी होने में अभी समय है| आज के दिन का काम एक तो राजौरी में कल चर्चा किए गए प्रोपोझल्स बनाना है और उसके साथ दादाजी ने सेवा भारती के राहत कार्य को दर्शानेवाले व्हिडिओ के लिए कमेंटरी भी लिखने के लिए कहा है| और अब फिल्ड में जाना है|

सेवा भारती के दफ्तर में इन दिनों गिरनार चाय चल रही हैं| जिनको खाना बनाना आता हैं, ऐसे कार्यकर्ता नाश्ता- भोजन बनाते हैं| इसके साथ कुछ स्थानीय कार्यकर्ता भी भोजन बनाने का काम करते हैं| सुबह दादाजी आज अनन्तनाग जाएँगे यह बताया गया| थोड़ी देर में दादाजी ने मुझे भी तैयार रहने के लिए कहा| जरूर आज वहाँ कुछ फूड पॅकेटस, फर्स्ट एड सहायता बॉक्स, राशन, दवाईयाँ आदि सामग्री ले जानी है|

पता चला की आश्रम के स्वामीजी भी साथ आ रहे हैं| श्रीनगर के लाल चौक के पास रेसिडन्सी रोड़ पर यह आश्रम है- श्री चन्द्र चिनार बड़ा आखाडा उदासीन आश्रम| यहीं पर श्रीनगर शहर के चिकित्सा शिविर हुए, कार्यकर्ता भी यहीं ठहरें थे और कई बार भोजन के लिए भी यहाँ पर कार्यकर्ता आते हैं| आश्रम जा कर स्वामीजी साथ आए और कुछ सामग्री भी‌ गाड़ी में रखी गई| स्वामीजी से परिचय था; क्योंकि वे भोजन समय सेवा करते थे और स्पष्ट स्वर में भोजन पूर्व प्रार्थना भी बताते थे| उनके साथ एक फोटोग्राफर भी‌ है| और हमारे आज के चालक हिलालभाई हैं| दादाजी को आज के काम के बारे में पूछा तो उन्होने इतना ही बताया कि अनन्तनाग में सामग्री बाँटनी है और कार्यकर्ताओं से मिलना है| जैसे श्रीनगर से पाम्पोर- अवन्तीपुरा रोड़ पर निकले रास्ते पर जमा हुआ पानी दिखा| फ्लड का पानी अब भी जमा है और एक- दो जगहों पर तो अब भी पम्प द्वारा निकाला जा रहा है| कई मकानों और दुकानों को हुआ नुकसान भी दिखाई दे रहा है| बताया गया कि मिलिटरी युनिटस को भी‌ बड़ा नुकसान हुआ| कई आस्थापनों की दीवारें ढह गईं|

सुबह कुछ स्थानों पर बड़ी धुन्ध है| ठण्ड तो है ही| अवन्तीपुरा में मिलिटरी के कई लोग दिखे| यहाँ एक प्राचीन सौर मन्दीर भी है| संगम स्थान के पास बड़ा कोहरा है| यहाँ झेलम का एक अन्य नदी से संगम होता है| पूरी नदी कोहरे में है| कौनसी नदी कहाँ से आती है इस पर कुछ बात हुई| संगम के पास ही सड़क पर क्रिकेट बॅट बनानेवाले कई दुकान दिखे| केसर और सेब के भी कई बागान दिखे| पहला पड़ाव अनन्तनाग ही है| वहाँ एक कार्यकर्ता के घर जाना हुआ| उनसे वहाँ की आवश्यकता पूछ कर एक बोरी दी गई जिसमें राशन आदि है| इन कार्यकर्ता के घर पर ही एक मस्जीद है और वहीं मन्दीर भी है| अनन्तनाग में प्राचीन अनन्तनाग मन्दीर भी गए| वहाँ भी दादाजी के परिचित लोग है; उनका भी हाल पूछा और थोडी सामग्री इधर भी‌ दी|‌ मन्दीर के बाहर मिलिटरी के जवान खडे हैं|‌ अनन्तनाग बड़ा शहर है; लेकिन गलियाँ बड़ी संकरीं है| कई जगह भीड है और कुछ मॉब भी बड़ी आवाज में बातें कर रहा हैं|

यहाँ से एक सड़क किश्तवाड़ जाती है| दूर पीर पंजाल की चोटियों पर बर्फ दिख रहा है| अगला पड़ाव अचाबल के पास विवेकानन्द केन्द्र की कश्मीर शाखा है| यहाँ पर भी‌ आवश्यकता को देखते हुए कुछ सामग्री दी गई| कुछ देर रूकना भी हुआ| यहाँ एक रामकृष्ण मिशन का आश्रम भी है| बताया गया की इस आश्रम के हाल ही में पंचत्व में विलीन हुए स्वामीजी को मिलने के लिए फारूख अब्दुल्ला और मेहबूबा मुफ्ती जैसी हस्तियाँ भी आती थी|

यह सब देखते हुए मन में सवाल आ रहा है कि क्या यह सामग्री बाँटना need based है? कुछ तरिके से आंकलन तो नही किया गया है| जहाँ जहाँ लग रहा है कि आवश्यकता है, वहाँ मदद दी जा रही है| सामाजिक विज्ञान तो कहता है कि पहले सर्व्हे करो; लोगों से मिल कर जरूरतों का मूल्यांकन करो; उनकी बातों से और निरीक्षण से जरूरतें तय कर उनके लिए काम करो| यहाँ ऐसा नही हो रहा है| और सम्भव भी नही है| राहत सरिखा काम करते समय कई काम इकठ्ठा करने होते है| सब कुछ किताबी तरिके से और परिपूर्णता में जा कर करने का समय नही होता| इसलिए common sense के आधार पर मदद बाँटी गई| और यदी कुछ सर्व्हे जैसे साधन का भी प्रयोग करते; तो उस पर भी निर्भर तो होना ही पड़ता| कुछ भी साधन/ तकनीक हो; तो उसपर यकीन करना पड़ता| शायद इससे अपने कॉमन सेन्स और समझ का सहारा लेना ठीक है|

कई काम इकठ्ठा हो रहे हैं; इसलिए दादाजी जगह जगह कार्यकर्ताओं और मित्रों से मिल भी‌ रहे हैं| आगे पहलगाम जाना है| रास्ते में ही मट्टन या मार्तण्ड गाँव है; अत: उसे भी देखने गए| यहाँ जाने के पहले छत्तीसिंगपूरा गाँव लगा जिसकी कल ही‌ बात हुई थी! कल उस समय उम्मीद नही थी कि अगले दिन सीधे उसी गाँव में‌ जाना होगा| दादाजी ने वहाँ जाने पर पूछा देखो कितने सरदार हैं| वाकई कई सारे सरदार दिखाई‌ दे रहे हैं| आगे मार्तण्ड में प्राचीन मन्दीर से सटा हुआ गुरूद्वारा भी‌ है| इसे पाँच मिनिट में देख लिया|

आगे लिद्दर नदी के पास से गुजरनेवाली सड़क से पहलगाम की ओर जाना हुआ! जगह जगह बर्फानी बाबा और हर हर महादेव लिखा है| यात्रा सीजन तो सितम्बर के पहले ही समाप्त हुआ था| एक बार लगा कि यहाँ भी कुछ कार्यकर्ताओं के पास जाना है| लेकिन वहाँ स्वामीजी का काम है और हमारी गाड़ी उन्हे ले जा रही है| वहाँ के एक होटल में उनके कोई परिचित है; जिनसे उनका कुछ काम है| एक तरह से आज राहत कार्य से हट कर अलग ही यात्रा हो रही है| मन में एक बार विचार आया कि ऐसा नही होना चाहिए| पर सोचा कि अच्छा काम करने के लिए एकाध दिन ब्रेक भी लिया तो कोई गलत नही है| इसीलिए फिर उस पर्यटन का आनन्द लिया| कश्मीर जाने के लिए निकला तब मित्र बोल भी‌ रहे थे कि तुम वाकई राहत कार्य के लिए जा रहे हो या पर्यटन के लिए? आज उनकी बात कुछ समय के लिए सच होगी! वैसे आनेवाले कई कार्यकर्ता आखरी एक- दो दिन घूमने गए थे| जब पहले बार दादाजी से मिलना हुआ, तब वे कुछ कार्यकर्ताओं को लदाख दिखाने के लिए लेह में ही बात कर रहे थे! उसी समय एक तरह से लदाख का स्मरण दर्शन हो गया (जैसे कभी कभी स्मरण स्नान करना पड़ता है; वैसे ही स्मरण दर्शन होता है!); आज पहलगाम की सुन्दरता देखना का अवसर है!

पहलगाम में वाकई अद्भुत नजारा है| चारों दिशाओं में  बर्फाच्छादित चोटियाँ और पास में ही लिद्दर की गर्जना| जिस होटल में कुछ समय रूके वह एक थ्री स्टार होटल है| काफी रमणीय बना हुआ है| वाकई शान्ति छायी है| होटल के अन्दर धीमे स्वर में बजाया जा रहा लाईट इन्स्ट्रुमेंटल म्युझिक भी इस शांति को और प्रगाढ बना रहा है. . . स्वामीजी के कारण इस बड़े ही हाय- फाय होटल में भोजन के लिए रूके| दादाजी इस महंगे होटल को बडे एंजॉय कर रहे हैं और वेटर लोगों को सेवा भारती के बारे में बता रहे हैं|

बाद में होटल के मालिक ने बताया की यहाँ पर भी आपदा ने कहर बरपाया है| पहलगाम में नुकसान कुछ भी नही हुआ; पर यहाँ का पूरा बिजनेस अब ठप पड़ा है| होटल में कई लाखों का बूकिंग हुआ था; सब कैंसल हुआ| अगर ग्राहक नही आए तो यह बड़ा सा हाय- फाय होटल चलाना लोहे के चने चबाने जैसा होगा| दिवाली के बाद ग्राहक आएँगे ऐसी उम्मीद वे कर रहे हैं| उनके श्रीनगर के होटल भी सुनसान है|‌ आपदा ने कॉरपोरेट क्षेत्र पर भी बड़ा कहर ढाया है|

लौटते समय लिद्दर पार कर के एक दूसरे रास्ते से बिजबेहेड़ा गए| सुनने में आया कि इस इलाके में आतंकियों का और अलगाववादियों का बड़ा क्षेत्र है| टुरिस्ट वाहन यहाँ से जाते हैं तो लोगों को कॅमरें बन्द करने के लिए और शीशें उपर रखने के लिए कहा जाता हैं और टुरिस्ट वाहन बीच में रुक भी नही सकते है| बिजबेहेड़ा से आगे फिर अवन्तीपुरा और पाम्पोर पहुँचे| एक जगह एक दादाजी की परिचित दिदी है; उनके घर गए| उनके पिताजी विवेकानंद केंद्र का काम करते थे| उनके घर में भी काफी नुकसान हुआ है| पहली मंजिल पर तो सब बह गया| जैसे तैसे वहाँ वे रह रहे हैं| दादाजी से उनका पुराना नाता है| वाकई दादाजी सबके दादाजी हैं! उनके यहाँ केसरयुक्त चाय मिली| यहाँ भी सामग्री की एक बोरी दी|

श्रीनगर में लौटते समय शाम हो गई है| आज का आधा दिन काम में और आधा दिन पर्यटन में गया| कश्मीर के कुछ दूसरे स्थान यात्रा हुई| शाम को दफ्तर में लौट कर कुछ देर दवाईयों को लगाने का काम हुआ| रात में डॉक्टर लोग भी आए- डॉ. प्रज्ञा दिदी और डॉ. अर्पित| कल वे जा रहे हैं| साथ में कई कार्यकर्ता भी है| स्थानीय लड़कें और लड़कियाँ भी आज दफ्तर में रूकेंगे| रात इकठ्ठा बैठ कर गुणदर्शन का कार्यक्रम भी हुआ| कई कार्यकर्ताओं ने गाए गाने यादगार लगे| कश्मिरी गाना- 'लब पे आती है बन के दुवाएँ तमन्ना मेरी' बढिया लगा| सभी ने कुछ ना कुछ गाया| 'बुम्बरो बुम्बरो शाम रंग बुम्बरो शाम रंग बुम्बरो आए हो किस बगिया से ओ ओ तुम' और कुछ कश्मिरी गाने भी गाए गएं जो वाकई सुन्दर लगे| उनकी मिठास के क्या कहने| दादाजी और चाचूजी ने जोक्स बताए और सहभाग लिया| जब डॉ. प्रज्ञा दिदी से अनुभवों के बारे में पूछा तो उन्होने इतना ही बताया कि बहुत कुछ सीखने को और देखने को मिला| कार्यकर्ताओं के बोलने में आ रहा था कि कुपवाड़ा में कुछ लोग अलगाववादियों से ताल्लुकात रखते हैं| इसलिए वहाँ जा कर शिविर लेना बड़ी बात है|

आज प्रोपोजल और कमेंटरी बनाने का काम नही हुआ| वह कल होगा| देखते हैं|
दरिया ए जेलम और पानी का स्तर



































अनन्तनाग मन्दीर























मार्तण्ड में मन्दीर और गुरुद्वारा

पहलगाम में लिद्दर नदी


पाम्पोर के कार्यकर्ता का क्षतिग्रस्त घर
अटका हुआ पानी और पहाड़ पर किए जानेवाले जुल्म


क्रमश: 

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