Friday, June 15, 2018

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा भाग ८: जालना- सिंदखेडराजा

८: जालना- सिंदखेडराजा
योग साईकिल यात्रा का सांतवा दिन, १७ मई की सुबह| आज सिर्फ ३४ किलोमीटर दूर होनेवाले सिंदखेड राजा जाना है, इसलिए थोड़ी देर से निकला| निकलते समय जालना शहर में चलनेवाले दो योग वर्गों के साधकों से मिला| हर रोज कुछ साधक इन स्थानों पर योग करते हैं| उनसे मिल कर आगे बढ़ा| जालना के कुछ साधक मुझे विदा करने के लिए भी आए| अब एक तरह से यह यात्रा समापन की ओर बढ़ रही है| आज सांतवा दिन, इसके बाद सिर्फ चार दिन रहेंगे| लेकीन हमारा मन कितना दौड़ता है! आज सांतवा दिन शुरू भी नही हुआ कि मन तो पहुँच गया वापस! साईकिल चलाते समय भी मन दौड़ता रहता है|‌ बहुत कम बार, बड़ी मुश्कील से वह साईकिल पर रूकता है और सिर्फ उस क्षण को देख पाता है| स्पीड, टारगेट, समय सीमा आदि के बारे में सोचे बिना बहुत मुश्कील से मन वर्तमान क्षण में ठहरता है| लेकीन इसी का नाम तो ध्यान है! एक समय कोई भी गतिविधि अगर पूर्ण रूपेण करते हैं, तो वह ध्यान बन जाता है| चाहे वह साईकिलिंग ही क्यो ना हो| लेकीन यह उतना ही कठीन भी है, क्यों कि हमारा मन बहुत जटिल होता है; उसके अक्सर अलग- अलग टुकड़े होते हैं| उन खण्ड- खण्डों को इकठ्ठा लाने का नाम तो ध्यान है| खैर|





आज जहाँ जा रहा हूँ, वहाँ पहले कभी नही गया हूँ| आज बुलढ़ाणा जिले में जाऊँगा और विदर्भ प्रदेश भी शुरू होगा| होटल में नाश्ता करते समय भी भाषा में हुआ परिवर्तन दिखाई दे रहा है| यहाँ पहली बार पोहे का नाश्ता किया| होटलवाले को मेरी यात्रा के बारे में बताया| बताया कि तीनसौ से अधिक किलोमीटर हुए हैं और ऐसी यात्रा कर के आगे जा रहा हूँ| वह बहुत प्रभावित हुआ और उसने मुझे शुभकामनाएँ दी| हाथ पर रखने के लिए कुछ नही सुझा तो मुझे सौंफ के सॅचेटस दिए| उसकी यह कृति मामुली सी लग सकती है, लेकीन मुझे मामुली नही लगी| छोटे से छोटा सहभाग भी महत्त्वपूर्ण है|

बून्द बून्द मिलने से बनता एक दरिया है|
बून्द बून्द सागर है, वर्ना यह सागर क्या है!

सड़क पर साईकिल चलाते समय ऐसे अनुभव आते हैं| कभी कभी तो सड़क के कुत्तों के बारे में भी मन में कृतज्ञता भाव आता है| क्यों कि उन्होने मुझे रोका नही, जाने दिया! ऐसा कहते हैं कि, किसी भी भाव से मन में कृतज्ञता का भाव आ रहा हो तो उसमें डूबना चाहिए! वैसे इस बात को वे ही समझ सकते हैं जिन्होने कभी अन्धेरे में कुत्तों के पास से साईकिल चलाई हो या कुत्तों के पास से रनिंग की हो! खैर|

अब तक पीछले छह दिनों में मैने कई चढाईभरी सड़कों पर साईकिल चलाई है, लेकीन अब तक कोई घाट नही लगा है| पहले दिन जरूर नेमगिरी घाट था, लेकीन वह मै साईकिल पर नही चढ़ पाया था| आज वह कमी भी पूरी हो गई| दूर सड़क उपर चढ़ती दिखाई दी और जालना जिला समाप्त होते होते छोटा सा घाट लगा| मामुली सा ही है- लम्बाई मुश्कील से एक डेढ़ किलोमीटर है, लेकीन विपरित दिशा से बहनेवाली हवा ने चलाना थोड़ा मुश्कील किया है| इसलिए साथ में रखे अमृत के दो ग्लास पिए- अर्थात् दो लिक्विड एनर्जाल के सॅचे खतम किए और घाट चढ़ने लगा| इतने दिन लगातार साईकिल चलाने से ही इसे चला पा रहा हूँ| नेमगिरी का घाट शायद पहला दिन और अत्यधिक गर्मी के कारण नही चढ पाया था| फिर भी बड़ी मुश्कील से लगभग चलने की स्पीड पर यह घाट पार किया| इस एटलास साईकिल की और एक उपलब्धी हो गई! अन्य गेअर की साईकिलों के लिए यह बहुत मामुली घाट है, लेकीन इस साईकिल पर यह एक मुश्कील घाट है|


छोटा घाट




अब प्रतीक्षा है सिंदखेड़ राजा की! यह गाँव शिवाजी‌ महाराज की माताजी- रानी जिजाबाई का है| एक अर्थ में यह महाराष्ट्र का मातृतीर्थ है| महाराष्ट्र ही नही पूरे भारत के इतिहास के एक अपूर्व व्यक्तित्व की अनुठी धरोहर है! सिंदखेड़ राजा आने के पहले जिजाऊ सृष्टी नाम का स्थान लगा| यहाँ एक म्युजियम है| फटाफट उसे देख कर आगे बढ़ा| माता जिजाबाई के नाम का भी एक खास अर्थ है- जिजा का अर्थ होता है साथी! एक तरह से मराठा और भारत के इतिहास के उस दौर की यह संगिनी है, उस इतिहास की जन्मदात्री है! योग का एक अर्थ शक्ति भी है और इसी लिए जब यह रूट तय हुआ, तब इस स्मारक को देखना था| सिंदखेड़ राजा में पहुँचने पर पहले वहाँ के जन्मस्थल का दर्शन किया| यह एक राजवाड़ा है| यहीं पर मुझे श्री मेहेत्रे जी ने रिसीव किया| आज उनके पास ही ठहरूँगा| श्री मेहेत्रे जी सिंदखेड राजा के एक ऑल राउंडर कार्यकर्ता है| कई विषयों पर उनकी संस्था सेवा कार्य करती है, उसके साथ वे सेंद्रीय खेती, वृक्षारोपण, पर्यावरण आदि विषयों पर भी काम करते हैं| अण्णा हजारे जी द्वारा उन्हे पुरस्कार दिया गया है (संयोग से मेरी पत्नी आशा को भी अण्णा हजारे जी ने एक पुरस्कार दिया है)| तथा वे पतंजलि योग पीठ के कार्यकर्ता भी हैं और उन्हे श्री रामदेव जी का सत्संग भी मिला है| ऐसे अनुठे व्यक्तित्व से मिलना हुआ|






प्राचीन धरोहर!

सिंदखेड़ राजा के साधकों द्वारा स्वागत!


एक छोटा सा घाट

आज सिर्फ ३४ किमी चलाई|

आज जिनके पास ठहरा हूँ वे श्री चौधरी है| उनकी एक रिश्तेदार एक साईकिलिस्ट महिला है जिन्होने २०० किलोमीटर साईकिल एक दिन में चलाई है| इस तरह की साईकिल यात्रा को बीआरएम कहते हैं| उनसे भी बात हुई| शाम की मीटिंग बहुत देर बाद शुरू हुई| यहाँ जालना के चैतन्य योग केंद्र के सिर्फ मेहेत्रे जी ही है| वे अभी चैतन्य योग केंद्र में सीख रहे हैं| उन्हे जालना के योग केन्द्र के बारे में कैसे पता चला, यह भी एक मज़ेदार बात है| एक बार वे परभणी आकाशवाणि केन्द्र पर एक योग कार्यक्रम सुन रहे थे| वह कार्यक्रम निरामय संस्था के द्वारा किया जा रहा था जिसमें उनका नंबर भी बताया गया| उसी नंबर पर मेहेत्रे जी ने सम्पर्क किया, क्यों कि वे योग शिक्षक का कोर्स करना चाहते थे| तब परभणी के निरामय के लोगों ने उन्हे जालना के चैतन्य योग केन्द्र के बारे में बताय और उन्होने वह कोर्स शुरू किया| पास के अन्य एक गाँव से चैतन्य के एक योग छात्र भी मीटिंग के लिए आए| इनके अलावा मीटिंग में आर्ट ऑफ लिविंग् एवम् पतंजलि योग पीठ के साधक अधिक संख्या में है|
 

अब तक की चर्चाओं जैसी ही यह चर्चा रही| लेकीन आज शायद मै कुछ थका हूँ, इसलिए इस बार चर्चा में उतना अधिक सहभाग नही ले पाया| और कुछ हद तक चर्चा की गुणवत्ता सभी सहभागियों पर भी निर्भर करती हैं| मेरा काम तो ज्यादा सुनना और चल रहे काम को समझना है| यहाँ मुख्य रूप से पतंजलि और आर्ट ओफ लिव्हिंग का काम चलता है| यह एक तहसील का गाँव होने पर भी यहाँ स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता बढ़ रही है| क्यों कि यहाँ‌ पर भी ऐसी स्थिति आ गई है जहाँ लोग कार से जिम जा कर वहाँ साईकिल चलाने लगे हैं! पेंडुलम जैसे उल्टा होता है, वैसे ही अब लोग साईकिल के बारे में सोच रहे हैं| चर्चा साधारण रही और आज पहली बार चर्चा में एक भी महिला का सहभाग नही था| लेकीन यहाँ का जो काम चल रहा है, वह अच्छा लगा| मेहेत्रे जी विद्यालय के शिक्षक है, लेकीन कई तरह से सामाजिक काम भी करते हैं| ऐसे कार्यकर्ता विरला होते हैं| उनसे मिल कर अच्छा लगा|

अगर आप चाहे तो इस कार्य से जुड़ सकते हैं| कई प्रकार से इस प्रक्रिया में सम्मीलित हो सकते हैं| अगर आप मध्य महाराष्ट्र में रहते हैं, तो यह काम देख सकते हैं; उनका हौसला बढ़ा सकते हैं| आप कहीं दूर रहते हो, तो भी आप निरामय संस्था की वेबसाईट देख सकते हैं; उस वेबसाईट पर चलनेवाली ॐ ध्वनि आपके ध्यान के लिए सहयोगी होगी| वेबसाईट पर दिए कई लेख भी आप पढ़ सकते हैं| और आप अगर कहीं दूर हो और आपको यह विचार ठीक लगे तो आप योगाभ्यास कर सकते हैं या कोई भी व्यायाम की एक्टिविटी कर सकते हैं; जो योग कर रहे हैं, उसे और आगे ले जा सकते हैं; दूसरों को योग के बारे में बता सकते हैं; आपके इलाके में काम करनेवाली योग- संस्था की जानकारी दूसरों को दे सकते हैं; उनके कार्य में सहभाग ले सकते हैं|

निरामय संस्था को किसी रूप से आर्थिक सहायता की अपेक्षा नही है| लेकीन अगर आपको संस्था को कुछ सहायता करनी हो, आपको कुछ 'योग- दान' देना हो, तो आप संस्था द्वारा प्रकाशित ३५ किताबों में से कुछ किताब या बूक सेटस खरीद सकते हैं या किसे ऐसे किताब गिफ्ट भी कर सकते हैं| निरामय द्वारा प्रकाशित किताबों की एक अनुठी बात यह है कि कई योग- परंपराओं का अध्ययन कर और हर जगह से कुछ सार निचोड़ कर ये किताबें बनाईं गई हैं| आप इन्हे संस्था की वेबसाईट द्वारा खरीद सकते हैं| निरामय संस्था की वेबसाईट- http://www.niramayyogparbhani.org/ इसके अलावा भी आप इस प्रक्रिया से जुड़ सकते हैं| आप यह पोस्ट शेअर कर सकते हैं| निरायम की वेबसाईट के लेख पढ़ सकते हैं| इस कार्य को ले कर आपके सुझाव भी दे सकते हैं| मेरे ब्लॉग पर www.niranjan-vichar.blogspot.in आप मेरी पीछली साईकिल यात्राएँ, अन्य लेख आदि पढ़ सकते हैं| आप मुझसे फेसबूक पर भी जुड़ सकते हैं| बहुत बहुत धन्यवाद!


अगला भाग: सिंदखेडराजा- मेहकर

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (17-06-2018) को "पितृ दिवस के अवसर पर" (चर्चा अंक-3003) (चर्चा अंक-2997) (चर्चा अंक-2969) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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