Monday, December 27, 2021

हिमालय की गोद में... (रोमांचक कुमाऊँ भ्रमंती) ६: गूंजी का हँगओव्हर

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२९ अक्तूबर की रात गूंजी‌ में सभी के लिए कठीन रही! एक तो अत्यधिक ठण्ड थी, साथ ही ऊँचाई लगभग ३३०० मीटर होने के कारण साँस लेने में भी कुछ दिक्कत हो रही थी| इसी कारण सोते समय कंबल सिर के उपर लेना सम्भव नही था, उसमें खतरा था| सभी लोग एक ही कमरे में अधिकसे अधिक कंबल आदि ले कर सोए| कितने अप्रत्याशित जगह पर हम है! और बिल्कुल भी अनप्लैन्ड तरीके से! लेकीन यह भी सच है कि अगर प्लैन किया होता तो शायद हम आते ही नही| क्यों कि सभी लोग उस अर्थ में घूमक्कड़ या ट्रेकर नही हैं| टूरीस्ट ही हैं| इसीलिए प्लैन नही किया, इसी लिए आ पाए| सभी लोग एक ही कमरे में होने से कुछ गर्मी मिली और छत लकड़ी का होने से भी लाभ मिला| हालांकी ठीक से नीन्द किसी की भी नही हुई| भोर होते होते सब जग गए थे| यहाँ के भोर का आकाश छूट न जाए, इसलिए मै बाहर आया! चाँद आसमाँ में‌ आया है और उसकी रोशनी में पास के शिखर अच्छे से चमक रहे हैं| बादल है, इसलिए तारे उतने ज्यादा नही दिखे|‌ लेकीन ठण्ड से उंगलियाँ जैसी ठिठुर गई हैं| और उससे भी बड़े मज़े की बात तो होटल के द्वार के पास रखी हुई बकेट का पानी जम गया है!! रात में होटलवाले ने थोड़ा दूर होनेवाला बाथरूम दिखाया था| वहाँ अन्दर प्लास्टीक के ड्रम का पानी लेकीन नही जमा है| उस ठण्ड में ब्रश करना भी टेढ़ी खीर है| जैसे तैसे अनिवार्य चीज़ें निपटा दी| कुछ मिनटों तक उंगलियाँ अकड़ सी गई थी| और साँस छोड़ना तो जैसे धुम्रपान ही बन गया है|





Wednesday, December 22, 2021

हिमालय की गोद में... (रोमांचक कुमाऊँ भ्रमंती) ५: है ये जमीं गूंजी गूंजी!


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२९ अक्तूबर की दोपहर! धारचुला पार करते ही मोबाईल नेटवर्क चला गया| अब सड़क भी पहाड़ में उपर उठ रही है और संकरी हो रही है| गूंजी जाना है, लेकीन सड़क कितनी दूर तक चल रही है, इसका अन्दाज़ा नही है| यहाँ के जानकार बता रहे हैं कि गूंजी तक अब गाडी चलती है| लेकीन मुझे शक है| इसलिए इसके आगे जो भी मिलेगा, पूरी तरह अप्रत्याशित होगा| तवा घाट के पास हमें एक परिचित मिले, वे सड़क पर हमारे लिए ही रूके थे| वे एक अर्थ में हमारी इस गूंजी यात्रा के संयोजक थे| उन्होने ही कहा था कि गूंजी जाईए, ॐ पर्वत देख आईए| वे हमारे लिए रूके थे और मिलते ही उन्होने हमारी गाडी चलाना शुरू किया| धीरे सड़क टूटने लगी थी, इसलिए हमारे ड्रायवर को उनके आने से राहत मिली| अब शुरू होता है एक रोमांचकारी यात्रा! 




यहाँ जॉईन हुए जितू जी वैसे तो पेशे से ड्रायवर हैं, लेकीन बिल्कुल ऑल राउंडर इन्सान| ड्रायवर, टूअर ऑपरेटर, टूरीस्ट गाडी, किसान, ट्रेकर इन सबमें कुशल| उन्होने फिर गूंजी के बारे में जानकारी दी| एक बार मैने उनसे पूछा कि अगर वास्तव में गूंजी तक जाया जात हो, तो इनर लाईन परमिट लगता होगा ना| उस पर उन्होने कहा कि उनकी पहचान है, इसलिए नही‌ लगेगा| फिर यहाँ की भीषण सड़कें, ड्रायवर्स कैसे चलाते हैं इसको ले कर वे बात करते रहें| तवा घाटच्या के कुछ आगे गूंजी की सड़क का अन्तिम होटल होनेवाला गाँव लगा| वहाँ दल- सब्जी राईस खा लिया| अब लोगों के चेहरे की शैलि में फर्क साफ नजर आ रहा है! और अब सड़क पर वाहनों में अधिक वाहन मिलिटरी के वाहन हैं!


 


Tuesday, December 14, 2021

हिमालय की गोद में... (कुमाऊँ में रोमांचक भ्रमण) ४: गूंजी की ओर प्रयाण...

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२८ अक्तूबर की सुबह बुंगाछीना- अग्न्या परिसर में अच्छा ट्रेक हुआ| यह गाँव ठीक पहाड़ के बीचोबीच है| बस बैठ कर नजारों को आँखों में संजोना है! सबके साथ बातें हो रही हैं| बातों बातों में बाघ के बारे में बहुत कुछ सुनने में आया| यहाँ उत्तराखण्ड और कुमाऊँ में शेर अक्सर दिखाई देते हैं| शेर यहाँ बिल्कुल भी अपरिचित नही है| बल्की तो नरभक्षक शेरों की कहानियाँ और उनकी शिकार करनेवाला विख्यात शिकारी जिम कॉर्बेट की कर्म भूमि कुमाऊँ ही है| हाल ही के वर्षों में शेर की दहशत फिर से बढ़ रही है| एक समय तो शेर थोड़े कम हो गए थे| जंगल जैसे टूटता गया, वैसे वन्य प्राणियों पर मुश्कील समय आया| उसमें शेर भी थे| लेकीन अब फिर से उनकी दहशत बढ़ गई है| सत्गड़ और इस अग्न्या जैसे गाँवों में भी शेर आता है और दिन में जो गाँव सुहावना और रमणीय लगता है, वह रात में सुनसान हो जाता है! रात में कोई आँगन के बाहर तक नही जाता है!


 

Monday, December 6, 2021

हिमालय की गोद में... (कुमाऊँ में रोमांचक भ्रमण)३: अग्न्या और बुंगाछीना गाँव में ट्रेक

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२७ अक्तूबर! रात जल्द सोने से नीन्द जल्द खुली| बड़ी भयंकर ठण्ड है! लेकीन भोर का माहौल और आकाश भी देखनी की बड़ी इच्छा है| इसलिए ठिठुरते हुए बाहर आया| आसमान में तारों के खूबसूरत नजारे हैं| अष्टमी का चन्द्रमा ठीक उपर है, जिससे सितारे कुछ कम दिखाई दे रहे है| कुछ देर तक मेरे छोटे टेलिस्कोप से आकाश दर्शन किया| सुबह भी नही हुई है और घर घर लोग उठे हुए दिखाई दे रहे हैं| सत्गड का आज दूसरा दिन| लेकीन आज यहाँ से दूसरे गाँव में जाना है| वापस यही आएंगे, इसलिए थोड़ा ही सामान ले जाएंगे| सब उठ कर तैयार होने के पहले जैसे तैसे सुबह का टॉर्चर- टास्क निपट दिया और छोटे ट्रेक के लिए निकला|





























Thursday, December 2, 2021

हिमालय की गोद में... (कुमाऊँ में रोमांचक भ्रमण) २: सत्गड परिसर में भ्रमण

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२६ अक्तूबर का दिन! अत्यधिक थकानेवाली यात्रा के बाद अच्छी नीन्द हुई| अलार्म ऑफ करने के बावजूद सुबह जल्दी नीन्द खुली| उजाला होने के पहले ही बाहर आया| अहा हा! सामने एक ही नजर में शब्दश: हजारो वृक्ष और घनी हरियाली! सत्गड से एक ही नजर में करीब तीन हजार देवदार वृक्ष तो दिख ही रहे हैं! अब पता चल रहा है कि हम देर रात कहाँ आए हैं| और महसूस हो रहा है कि हम कितने किस्मतवाले हैं| यहाँ के परिसर और दृश्यों का आनन्द लेते समय बड़ी ठिठुरन हो रही है| ब्रश करना भी जैसे एक टास्क है| टास्क नही, टॉर्चर! सुबह का फ्रेश होना सज़ा जैसे लग रहा है| ठण्ड पानी अत्यधिक ठण्डा जैसे वह जला रहा है| बड़ा दाह लग रहा है| दो दिनों की यात्रा के कारण कम से कम आज नहाना आवश्यक है| थोड़ी देर बाद सूर्य उपर आने पर और तपमान थोड़ा बढ़ने पर नहा लिया| लेकीन नहाने के लिए हुआ उबलता पानी भी सौम्य नही, शीतल लग रहा है! अर्थात् अत्यधिक ठण्डा पानी जला रहा है और उबलता हुआ पानी शीतल लग रहा है!



 

 

 

 

 

 


 

 

 

 

 

 


 

 

 

 

 

 

 

 

Tuesday, November 30, 2021

हिमालय की गोद में... (कुमाऊँ में रोमांचक भ्रमण) १: प्रस्तावना

हिमालय की गोद में... (कुमाऊँ में रोमांचक भ्रमण) १: प्रस्तावना

सभी को नमस्कार| हाल ही में उत्तराखण्ड के कुमाऊँ क्षेत्र में घूमने का अवसर मिला| यह एक तरह का संयोग होता है और अगर किस्मत में हो, तो ही इस तरह का घूमना होता है| अन्यथ कितनी भी योजना बना के घूमना नही होता है| हिमालय में घूमने की यह दसवी बारी थी| इस बार मौसम बहुत स्वच्छ था, इसलीए दूर के बर्फ शिखर दिखाई दे रहे थे| कई जगहों पर ट्रेकिंग कर सका| और सबसे बड़ी बात दुर्गम मानस सरोवर- कैलाश पर्वत मार्ग पर गूंजी और काला पानी जैसे स्थानों तक की दुर्गम यात्रा हो सकी| पीछले वर्ष २०२० में ही यहाँ जीप की सड़क बनी है| सड़क नही, जीप का ट्रेक ही है! वहाँ जाने का रोमांचकारी अनुभव मिला| वहाँ जाना जीप के लिए और जीप के ड्रायवर के लिए तो हॉलीवूड मूवी जैसा था| कई हॉलीवूड मूवीज में नही, कोई साहसिक मुहीम दिखाते हैं| ज्ल्द ही वह भटक जाती है और वह एक सर्वायवल मिशन बनता है! गूंजी और काला पानी का जीप ट्रेक ऐसा ही सर्वायवल मिशन बना! उसके बारे में विस्तार से लिखूँगा|
 


 

 

 

 

 

 

 


 

 

 

 

 

 

 

Friday, June 4, 2021

"राज" और "सिमरन": एक प्लॅटफॉर्म की कहानी


किसी रेल्वे जंक्शन का प्लॅटफॉर्म| वहाँ कई लोग ट्रेन में बैठ कर  यात्रा के लिए निकलते हैं| भागे भागे प्लॅटफॉर्म पर आते हैं, ट्रेन पकड़ते हैं और आगे निकल जाते हैं| पर यह सिर्फ रेल्वे स्टेशन पर ही नही घटता है| जीवन में ऐसे कई जंक्शन्स और अनगिनत प्लॅटफॉर्म होते हैं| प्लॅटफॉर्म एक माध्यम है जो हमें आगे ले जाता है| कभी स्कूल एक प्लॅटफॉर्म होता है और वहाँ विद्या मिलती है| कभी दु:ख एक प्लॅटफॉर्म होता है जो हमें आगे जाने के लिए सीखाता है|

जीवन भी एक प्लॅटफॉर्म है| ज्ञानी कहते हैं कि जीवन एक युनिवर्सिटी है| यहाँ इन्सान सीखते सीखते आगे जाता है| उसे एक प्लॅटफॉर्म से दूसरा ऐसे कई प्लॅटफॉर्म और कई ट्रेनें मिलती जाती हैं| ऐसे ही आगे बढ़ते हुए एक दिन साधक या शिष्य को गुरू की ओर ले जानेवाला प्लॅटफॉर्म मिलता है| यह कहानी उस प्लॅटफॉर्म की है| जब पहली बार गुरू साधक को पुकारता है, तब उसे तो भ्रम ही लगता है| लेकीन धीरे धीरे गुरू पुकारता रहता है| उसके बाद अदृश्य जरियों से गुरू शिष्य से मिलता है और उसका साथ देता रहता है| अहंकार और अज्ञान से भरा हुआ शिष्य का घड़ा गुरू एक एक अंजुली से खाली करता जाता है| और यह करते समय छलकने की आवाज़ भी नही होने देता है, कौन जाने, शिष्य नाराज होगा! ऐसा एक न दिखाई देनेवाला सत्संग शुरू होता है| एक सूक्ष्म शल्य- क्रिया शुरू होती है| और जब गुरू शिष्य को अपने पास पुकारता है, तो शिष्य को आना ही होता है| उसे गुरू के पास जाते समय कई बाधाएँ बीच में आ जाती है| उसका पूरा अतीत उसे रोकता है| लेकीन जब गुरू पुकारता है, तो उसे आना ही पड़ता है| शिष्य की इच्छा और आकांक्षाएँ गिर जाती है और सिर्फ गुरू के प्रति समर्पण की इच्छा बचती है| शिष्य की भाव दशा ऐसी हो जाती है-

मेरा है क्या, सब कुछ तेरा

जाँ तेरी, साँसें तेरी

तुने आवाज़ दी देख मै आ गई

प्यार से है बड़ी क्या कसम

या

मेरी आँखों में आँसू तेरे आ गए

मुस्कुराने लगे सारे ग़म

अब यहाँ से कहाँ जाएँ हम

तेरी बाँहों में मर जाएँ हम

Wednesday, May 26, 2021

मृत्यु का दंश

नमस्ते| आप सब कैसे हैं? सभी ठीक होंगे ऐसी आशा करता हूँ| इन दिनों हम जो भुगत रहे हैं, उसके बारे में कुछ विचार शेअर करता हूँ| इन दिनों हम लगातार मृत्यु से जुझ रहे हैं| हम में से कई लोगों ने उनके अपने खोए हैं| कई लोगों ने भीषण यातनाओं को सहा है| हमें वैसे तो आँख खोल कर मौत को देखने के लिए सीखाया नही जाता है| बचपन से ही हमें मौत को जानने ही नही दिया जाता है| मरघट भी गाँव के बाहर होता है और यह विषय कभी भी हमारी बातचीत में नही आता है|

लेकिन जब हम सजग होकर देखते हैं तो पता चलता है कि मौत शाश्वत चीज़ है| बल्की जीवन में मृत्यु जितना कन्फर्म है, उतना कन्फर्म बाकी कुछ भी नही है| धन, प्रतिष्ठा, सुख, सन्तोष, शान्ति ये चीज़ें मिलेगी या नही मिलेगी यह निश्चित कहा नही जा सकता है| लेकीन मौत निश्चित है| किसी का भी टिकट वेटिंग या आरएसी नही है, बल्की बिल्कुल कन्फर्म है| आज बुद्ध पूर्णिमा है| तथागत बुद्ध अपने भिक्षुओं को मौत पर ध्यान करने के लिए मरघट भेजते थे| दो दो महिनों तक वे भिक्षुओं को मरघट भेजते थे और कहते थे कि देखिए मौत को| देखिए जलनेवाली देह जो नष्ट हो रही है| और उसे सजग हो कर देखिए| इससे उन भिक्षुओं को समझ आता था कि, यहाँ अन्य कोई नही, खुद उनकी देह भी मर रही है, ऐसे ही मरनेवाली है|

जब हमारे प्रिय व्यक्ति का मृत्यु होता है, तो एक अर्थ में हमारा भी मृत्यु होता है| क्यों कि वह हमारा हिस्सा होता है या हम उसका हिस्सा होते हैं| इसलिए एक रिक्तता और सुनापन छा जाता है| लेकीन अगर हम सजग हो कर मौत को देख सकें, तो दूसरे व्यक्ति की मौत में हमें खुद की मौत भी दिखाई देती है| समाज ने तो हमें हमेशा से मौत को देखने से दूर रखा है| इसलिए हम खुली आँख से मौत देखना जानते नही है| लेकिन अगर हम थोड़ी हिंमत कर मौत को देख सके, तो होनेवाली हर मौत में हमें खुद की मौत दिखाई देने लगती है| और तब हमे वह सत्य समझता है कि हाँ, यहाँ हर व्यक्ति का मरना निश्चित है| जब हम दूसरे की मौत में खुद की ही मौत देख पाते हैं, हमारी मौत की ही खबर के तौर पर देखते हैं, तब धीरे धीरे उस मौत का दंश कम होता जाता है| भीतर से महसूस होता है कि जो कन्फर्म है, वह तो हो कर रहेगा, उसे इन्कार करने से कुछ भी नही होगा| और जब हम मौत को स्वीकार करते हैं, तब जीवन के दूसरे अर्थ हमारे लिए खुल जाते हैं| तब जब हम कोई असहाय और अति विकलांग रुग्ण देखते हैं, तो हमें भीतर से महसूस होता है कि एक दिन मेरा भी यही होनेवाला है| आज जो उस व्यक्ति के लिए सच है, वही मेरा भी कल का सच है|

Pain of death

Hello. How are you all? Hope all are fine. Just sharing some thoughts about the pain through which all of us are going. In these days, we are always confronting death. Many of us have lost their dear ones. Many of us have endured tremendous pain. Generally we are never taught to see death with open eyes. Mostly from childhood, we are kept away from death. Even the crematorium is outside the town and this topic never comes in our discussion.

Wednesday, April 28, 2021

Deep relaxation साठी योग निद्रा आणि ध्यान

सर्वांना नमस्कार. सर्व जण ठीक असतील अशी आशा करतो.

योगनिद्रा हा ध्यान म्हणजेच deep relaxation चा झोपलेल्या स्थितीमध्ये केला जाणारा प्रकार आहे. योगनिद्रेच्या अभ्यासाने शरीर रिलॅक्स होतं व मन शांत होतं. शरीराचे ताण व मानसिक स्ट्रेससाठीही उपयोगी आहे. शक्यतो डोक्याखाली उशी न घेता झोपलेल्या स्थितीमध्ये ३५ मिनिट दिलेल्या सूचना ऐकून सहजपणे करता येणारा हा ध्यान प्रकार आहे. आपल्या सोयीने चटई, सतरंजी किंवा गादीवर झोपून सकाळी, दुपारी किंवा संध्याकाळी किंवा झोपतानाही आपण हे करू शकता. शवासनात आडवे होऊन फक्त सूचनांनुसार स्वतःला रिलॅक्स करत जायचं आहे.  इथून आपल्याला सूचना डाउनलोड करून ऐकता येतील. हे एक music असलेलं guided meditation आहे. https://drive.google.com/file/d/12Ll2_N0IQgXACOMMduHP59VSJQOUQ8ja/view?usp=drivesdk

त्याशिवाय कोणत्याही प्रकारे कंफर्टेबल स्थितीमध्ये बसून करता येणारा ध्यानाचा- deep relaxation चा एक सोपा प्रकारसुद्धा मी घेतला आहे. हे अर्धा तासाचं खोलवरचं रिलॅक्सेशन आहे. इथून म्युझिकसह असलेल्या सूचना डाउनलोड करून ऐकता येतील:
https://drive.google.com/file/d/1VIdQ2AtUMbdkJVdnPyGgg58YyIx0EnX8/view?usp=sharing

अनेक जणांनी ह्या दोन्ही प्रकारांबद्दल फीडबॅक दिला आहे. तणाव, शारीरिक वेदना व अस्वस्थता असतानासुद्धा हे ऐकून बरं वाटलेलं आहे. आणि रिलॅक्स होण्यासाठी मदत झाली आहे. हे ऐकताना आपण शांत होणार असल्यामुळे हे ऐकताना आपला मोबाईलही शांत ठेवावा लागेल. सध्याच्या कठीण काळात खूप उपयोगी राहील. आपल्या जवळच्यांसोबत अवश्य शेअर करावं. धन्यवाद.


(योगनिद्रा व ध्यान निवेदक- निरंजन वेलणकर niranjanwelankar@gmail.com, 09422108376 सध्याच्या काळामध्ये अनेक लोकांच्या दु:खावर फुंकर घालणारा आणि मृत्युबद्दल विचारमंथन करणारा माझा लेख- http://niranjan-vichar.blogspot.com/2021/04/blog-post_28.html)

एक मृत्युपत्र


सर्वांना नमस्कार! हे एक प्रत्यक्षात लिहिलेलं पत्र आहे. एका काकाच्या मृत्युनंतर तीन महिन्यांनी त्याच्या आई- पत्नी (माझी आजी- मावशी) आणि मुलींना (माझ्या बहिणींना) लिहिलेलं. ह्यामधला आशय आपल्या सर्वांसोबत- आपल्या प्रत्येकासोबत शेअर करावासा वाटला म्हणून इथे देत आहे.

|| ॐ ||

दि. २७ एप्रिल २०१६

ती. आजी, ती. मावशी आणि मिताली- प्राजक्ता!

तुमच्याशी थोडं बोलायचं आहे. अगदी सविस्तर आणि मनमोकळेपणाने बोलायचं आहे. तुम्हांला माहितीच आहे की मी किती अबोल आहे! त्यामुळे समोरासमोर बोलताना मला कंठ फुटत नाही. म्हणून लिहून बोलतोय. खूप दिवसांपासून मनात होतं की तुमच्याशी बोलावं. अनेक गोष्टी आहेत. अनेक गोष्टी शेअर करायच्या आहेत. आणि तुमच्याशी बोलत असताना मी हे स्वत:शी सुद्धा बोलतोय. स्वत:ला ह्या गोष्टी परत सांगतोय.

मावशी आणि आजी, तुमच्याशी बोलताना जाणवतं की, तुम्ही सध्या स्वत:ला खूप कामात ठेवण्याचा प्रयत्न करता. सतत काही ना काही करता. प्रवचनं ऐकता. मावशीही म्हणते की, मनाला काही उद्योग हवा. मी समजू शकतो. पण त्याबरोबर हेही खरंच की आपण ज्या स्थितीतून जातोय, त्यामध्ये आपल्याला खूप त्रास होतोय आणि त्या स्थितीतून बाहेर पडायला खूप वेळ लागेल. किंवा कदाचित आपण पूर्णपणे त्यातून बाहेरही पडू शकणार नाही. मला एक- दोन गोष्टींकडे तुमचं लक्ष वेधून घ्यायचं आहे.

मी बॉसना लिहिलेल्या पत्रातही म्हणालो होतो तेच इथेही म्हणेन. बॉस शरीराच्या रूपाने आपल्यामध्ये नाहीत. पण शरीर काही अंतिम सत्य नाही. शरीर हा एक मुक्काम, शरीर एक तात्पुरता निवारा ना. आणि शरीर व नाम- रूप हे तर अगदी क्षणभंगूर. चेतना त्याहून जास्त महत्त्वाची जी २५ फेब्रुवारी १९५६ च्या आधी अस्तित्वात होती आणि ३१ जानेवारी २०१६ च्या नंतरही अस्तित्वात आहे. Form is temporary, formless existence is permanent. त्यामुळे त्या शरीराचा; त्या मनाचा; त्या नाम- रूपाचा जास्त विचार करणं त्रासदायक तर आहेच पण त्या चेतनेसाठीसुद्धा योग्य नाही. थोडं सविस्तर बोलतो.

आपण समुद्र किनाऱ्यावर उभे आहोत. आपल्याला सूर्य मावळताना दिसतो. हळु हळु सूर्य क्षितिजाखाली बुडतो. आपल्या दृष्टीने सूर्यास्त होतो. पण हा खरोखर सूर्याचा अस्त आहे का, सूर्याचा अंत आहे का? आपल्या नजरेने नक्कीच आहे. पण जर थोडी दृष्टी व्यापक केली; समजा आपण स्वत:ला अंतराळाच्या पातळीवर नेऊन बघितलं तर काय दिसेल? तर कळेल की सूर्याचा अस्त होतच नाही. फक्त आपण ज्या अँगलने बघत होतो, तिथून तो आता दिसत नाहीय. पण तो प्रकाशित आहेच, दुसऱ्या अँगलने दिसतोय. काही दुसरे लोक असतील ज्यांना तो सूर्योदय म्हणून दिसेल. मावशी- आजी तुम्ही इतके प्रवचनं ऐकता, वाचता, मला सांगा जन्म आणि मृत्यु हे एकाच नदीचे दोन किनारे नाहीत का? जन्म होतो तेव्हा कोणाच्या तरी मृत्युनंतरच तो होतो आणि जेव्हा मृत्यु होतो, तेव्हाही ती पुढच्या जन्माची, पुढच्या गतीची नांदीच नसते का? म्हणून त्याचं इतकं दु:ख करायचं का? आणि दुसरी गोष्ट म्हणजे नाम- रूपावरची इतकी आसक्ती त्या चेतनेच्या पुढच्या प्रवासात बाधा आणत असते. तुम्ही अनेक ठिकाणी वाचलं असेल की, जन्मलेल्या बाळाला पूर्व जन्माची स्मृती असते. किमान दिड वर्षापर्यंत. आणि मग हळु हळु नव्या जन्मातली नाती व प्रभाव त्याच्यावर असलेला मागच्या जन्माचा प्रभाव पुसून टाकतात. पण जेव्हा मूल बोलायला लागतं, तोपर्यंत ही पूर्वस्मृती काहीशी असते. आणि म्हणून आसक्ती असते. आणि ही आसक्ती त्या चेतनेच्या पुढच्या जन्मामध्ये बाधा निर्माण करू शकते.

Friday, April 23, 2021

जुन्या पिढीतली अभिनेत्री- विम्मी आणि तिची शोकांतिका

आज विमलेश अर्थात् विम्मी ह्या अभिनेत्रीचं नाव फारसं कोणाला आठवणार नाही. पण तिच्यावर चित्रित झालेली काही गाणी अजूनही प्रसिद्ध आहेत. सुनील दत्त आणि राजकुमारसोबतच्या "हमराज़" ह्या चित्रपटामधील तिच्यावर चित्रित झालेली ही गाणी आजही ऐकली- बघितली जातात आणि ह्या गाण्यांमध्ये एक हसरा चेहरा आपल्याला दिसतो.

हे नीले गगन के तले धरती का प्यार पले
ऐसे ही जग में आती हैं सुबहें ऐसे ही शाम ढले
 
तुम अगर साथ देने का वादा करो
मैं यूँही मस्त नग़मे लुटाता रहूं

आणि

किसी पत्थर की मूरत से मुहब्बत का इरादा है
परस्तिश की तमन्ना है, इबादत का इरादा है

पण तिच्या आयुष्यामध्ये ह्या गाण्यातली शेवटची ओळच खरी ठरली- वो क्या जाने की अपना किस क़यामत का इरादा है! अतिशय शोकांतिक तिचं आयुष्य ठरलं. पडद्यावरची एक प्रसिद्ध अभिनेत्री असूनही तिच्या आयुष्याचा शेवट अतिशय दुर्दैवी झाला. तिचं आयुष्य व तिच्या आयुष्याचा "हमराज़" जाणून घेण्याचा हा छोटा प्रयत्न.

१९४३ मध्ये पंजाबमध्ये एका शीख कुटुंबात तिचा जन्म झाला. पुढे शिवराज अग्रवाल नावाच्या एका उद्योगपतीसोबत तिने लग्न केलं आणि १९६१ मध्ये १८ व्या वर्षीच तिला मुलगा झाला. ह्या मुलाची कहाणीही अतिशय वेगळी आणि तीसुद्धा वेगळ्या प्रकारची शोकांतिका ठरली. शिवराज अग्रवालांच्या पार्ट्या कलकत्त्यामध्ये होत असताना एका पार्टीमध्ये विमलेशची भेट संगीतकार रवींसोबत झाली आणि त्यांनी शिवराज अग्रवाल आणि विमलेशला मुंबईला बोलावलं आणि बी आर चोप्रांसोबत तिची ओळख करून दिली. आणि बी आर चोप्रांच्या बॅनरचा चित्रपट तिला मिळाला! १९६७ साली आलेला "हमराज़" हा तो चित्रपट. ह्या चित्रपटामुळे ती सुप्रसिद्ध झाली आणि नायिका बनली! पदार्पणाच्या मॅचमधल्या शतकासारखी ही गोष्ट होती! परंतु काही‌ बॅटसमन पहिल्या मॅचमध्ये जितके रन्स करतात तितके कधीच पुढे करत नाहीत आणि त्यांना संधीही मिळत नाही. विम्मी म्हणून प्रसिद्ध झालेल्या विमलेशच्या बाबतीत तेच झालं.

Sunday, April 18, 2021

चंद्रमा और मंगल की लुका छुपी

सभी को नमस्ते| सब लोग ठीक होंगे ऐसी आशा करता हूँ| कल १७ अप्रैल की शाम को आकाश में चंद्रमा और मंगल ग्रह की सुन्दर लुका छुपी दिखाई दी| कुछ देर तक मंगल चंद्रमा के पीछे छुप गया था और बाद में बाहर आया| इसे वैज्ञानिक भाषा में occultation- पिधान कहते हैं| यह एक तरह का चंद्रमा ने किया मंगल ग्रह का ग्रहण ही था|

शाम को जब सूरज डूबा तब पहले से ही मंगल चंद्रमा के पीछे जा चुका था| ठीक ७ बज कर २१ मिनट पर वह चंद्रमा के बिम्ब के पीछे से दिखाई देने लगा| मेरी टेलिस्कोप से इस सुन्दर दृश्य के फोटो और विडियोज लेने का अवसर मिला| आँखों से भी यह दृश्य दिखाई दिया| लेकीन चंद्रमा मंगल से अत्यधिक तेजस्वी होने के कारण मंगल खुली आँखों से दिखाई देने के लिए और समय लगा और चंद्रमा से कुछ दूर आने के बाद ही मंगल दिखाई देने लगा| इन फोटोज और विडियोज का जरूर आनन्द लीजिए|



Tuesday, April 6, 2021

आकाशातील आश्चर्य: चंद्र मंगळाला झाकणार!

सर्वांना नमस्कार. सर्व जण ठीक असतील अशी आशा करतो. येत्या १७ एप्रिल २०२१ च्या शनिवारी संध्याकाळी आकाशामध्ये एक आश्चर्य बघायला मिळणार आहे. जेव्हा चंद्र एखाद्या ग्रहाला किंवा ता-याला झाकतो तेव्हा त्याला पिधान असं म्हणतात. १७ एप्रिलच्या संध्याकाळी चंद्र मंगळाला झाकणार आहे आणि नंतर आपल्याला मंगळ चंद्राच्या मागून परत येताना दिसणार आहे. महाराष्ट्रामध्ये आपल्याला चंद्राच्या मागे जाताना मंगळ दिसणार नाही, पण सायंकाळी ७ वाजून २१ मिनिटांनी चंद्राच्या मागून तो परत दृग्गोचर होताना दिसेल. पूर्व भारतामध्ये आगरताळासारख्या ठिकाणी मंगळ चंद्राच्या अप्रकाशित भागाच्या आड जातानाही‌ दिसू शकेल. पण महाराष्ट्रामध्ये अंधार पडला असेल तेव्हा मंगळ आधीच चंद्रामुळे झाकला गेलेला असेल.

नुसत्या डोळ्यांनी आणि अगदी सहजपणे ही घटना बघता येईल. आकाशामधील किती तरी गमती नुसत्या डोळ्यांनी बघता येतात. अतिशय दूरवरचे तारे, तारकागुच्छ, आकाशगंगा आणि ग्रहण, पिधान, युती, ता-यांच्या पार्श्वभूमीवर ग्रह व चंद्राची हालचाल अशा गोष्टी नुसत्या डोळ्यांनीही बघता येऊ शकतात.

हे बघण्यासाठी सूर्यास्ताच्या सुमारास पश्चिम आकाश व्यवस्थित दिसेल अशा ठिकाणी जाऊन थांबावं लागेल. त्या दिवशी सूर्यास्त ६.५३ ला होईल आणि त्यानंतर थोड्या वेळात ७.२१ ला मंगळ चंद्राच्या आडून बाहेर येताना दिसेल. तेव्हा पुरेसा अंधार असेल व त्यामुळे १.५ इतक्या प्रतीचा व मध्यम तेजस्वी असा मंगळ चंद्राच्या आडून आलेला दिसू शकेल. चंद्राची पंचमीची कोर असेल. चंद्र व मंगळ हे वृषभ राशीमध्ये व अग्नी ता-यापासून दक्षिणेला साधारण साडेपाच अंश म्हणजे आपण बघताना हात पूर्ण लांब केल्यास हाताची तीन बोटे मावतील इतक्या अंतरावर असतील. ह्यावेळी आपल्याला मृग नक्षत्र, ब्रह्महृदय तारकासमूह, रोहिणी नक्षत्र, कृत्तिका नक्षत्र, व्याध, पुनर्वसू नक्षत्र, प्रश्वा, सप्तर्षी आदि ठळक तारे व तारकासमूह सहजपणे बघता येतील. ह्या घटनेच्या तांत्रिक तपशीलांसाठी ही वेबसाईट बघता येईल.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

चंद्राच्या पलीकडून बाहेर येणारा मंगळ

Tuesday, January 19, 2021

OSHO!!!!!


(Never born, never died. Visited this planet between 11.12.1931- 19.01.1990)

Today is the death anniversary of Osho! On this day, 19th January, he left his body some 31 years ago! I feel very much emotional when I talk about him. I mean how to describe him, how to tell who he was! It makes me just speechless. But still making an attempt to write something.

Osho..... I met him in July 2012. It is said that when a disciple is ready, Guru suddenly appears. It was all of a sudden! Before that also, I had heard a thing or two about him, read some lines here and there. But then proper encounter took place. So much of it that life got divided- before July 2012 and after July 2012. I.e. Before Osho and after Osho. When I met him, I felt as if all my erstwhile knowledge and information became irrelevant. When I met him, when he came into my life or rather when he stormed into my life, I felt that I have found something new that changed all my framework, all my knowledge and upbringing.

Slowly slowly I started hearing his discourses. It took some time to start listening too. But through his soft and gentle voice, his sharp poise and narration, he makes everything so crystal clear. In short, I would say that what our general wisdom does to us is we divide everything in our life- we divide things or people or aspects such as good or bad. We sort of differentiate between all dimensions of life and then we choose certain ones and reject certain ones. But Osho gives us some insight to integrate life. Then life becomes a solved jigsaw puzzle- all pieces fall in place and an integral picture becomes visible!

Osho, in his own words has said that when a proper path is found, you can smell the air of the destination right from the first step. Indeed. That kind of a very life- shaking feeling came when I sort of came near him. “This is the thing. This is that!” That is what the mind shouts from within. And then it was he who was all over me. All my knowledge, intellect, mind mechanisms till then were very much useful for me to bring me to him. Everything sort of prepared me and helped me like a launchpad. I was prepared to receive him and to understand him. I know I was very lucky.

Okay, put simply, who Osho is? Osho is the modern enlightened master, rightly called the master of masters and who talks about meditation or spirituality in the very 20th century language terminology. He is the modern day Krishna, Jesus, Nanak or the similar enlightened ones. From Hinduism, Jainism, Buddhism to Christianity, Zen, Sufism and all kinds of spiritual traditions, he has spoken on every tradition and every major master in that tradition. Be it Vedanta, be it modern masters like Kabir, Nanak, Meerabai, George Gurdjeef, Jesus, Saint Augustine, Bodhidharma, Buddha, Zarathustra and similar blessed ones. He has spoken about all of them, about hundreds of such traditions. Right from Yoga to Tantra, from Bhakti to meditation. And he has given us the essence. He has brought us the most essentials.

Wednesday, December 23, 2020

माझ्या टेलिस्कोपमधून गुरू- शनी महायुती बघण्याचा थरार आणि अनुभव

सर्वांना नमस्कार!

नुकत्याच झालेल्या गुरू- शनी आकाशीय महायुतीचे माझ्या टेलिस्कोपमधून घेतलेले फोटो व व्हिडिओज शेअर करत आहे. प्रत्यक्ष बघण्याचा अनुभव हा खूप रोमांचक असतो आणि दोन दिवस लोकांच्या प्रतिक्रियांमधून तो रोमांच जाणवतही होता. फोटोमध्ये त्याची केवळ एक मर्यादित झलक मिळते. ते फोटोज व व्हिडिओज आपल्यासोबत शेअर करत आहे. हे फोटोज व व्हिडिओज मी परभणीमधून माझ्या स्टारट्रॅकर 114/500 रिफ्लेक्टर टेलिस्कोपमधून काढलेले आहेत. आणि टेलिस्कोपशिवायसुद्धा हे दोन्ही ग्रह एकमेकांना चिकटून असलेले बघणं आनंददायी होतं. काही जणांचं अनुमान होतं की, अतिशय कमी कोनीय अंतरामुळे ते दोन वेगळे दिसणार नाहीत व बघताना एकच डबल प्लॅनेट दिसेल. तसं काही झालं नाही. पण अगदी चिकटून असे छान दिसले! Two legands in the same frame असं ते दृश्य होतं! इतके महाकाय ग्रह असूनही ते आपल्या बघण्याच्या स्थानाच्या संदर्भात आकाशात असे जवळ येतात ही मोठी गोष्ट आहे! शक्यतो मोठ्यांचा अहंकारही मोठा असतो! पण हे दोघे महाकाय व हवेचे गोळे असलेले ग्रह अनेक दिवसांसाठी जवळ जवळ आलेले दिसत आहेत! आणि अजूनही किमान तीन- चार दिवस ते डोळ्यांनी खूपच जवळ दिसतील.




 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 



 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Tuesday, September 22, 2020

लव यू ज़िन्दगी: अदू का तीसरा जन्म दिन!!!!

पहले जन्म दिन का पत्र: एक प्रेमपत्र 

दूसरे जन्म दिन का पत्र: बच्चे मन के सच्चे


आज तुम बहुत बड़ी यानी तीन साल की हो गई हो! पीछले जन्म दिन को तुमने जो पर पहने थे, वैसे पर अब तुम्हारे फूट गए हैं! तुम्हारा जन्मदिन तुमने बहोत एंजॉय किया! दिन भर 'हॅपी बर्थडे टू यू' कहती रही! पीछले एक साल में तुम्हारा बढ़ना आश्चर्य से भर देता है! अभी अभी तो तुम बड़े लोगों जैसे बोलने लगी हो! सुना हुआ लगभग हर शब्द तुम्हे याद रहता है और बाद में अचानक ही तुम वह शब्द होनेवाला वाक्य बोलती हो! तुम्हे छोटी छोटी चीज़ें बारीकी से याद रहती है! लोग बहुत अच्छे याद रहते हो!

विगत साल की बेशुमार यादे हैं! अब भी तुम आईने जितनी ही निर्मल हो| अब भी तुम हमारा उतना ही लाड़ प्यार करती हो! सभी चीजों को खुशी से अपनाती हो| इस साल तो तुम्हारी स्कूल भी शुरू हुई! उसको लेकर मेरे मन में बहोत डर था| क्या तुम्हे स्कूल पसन्द आएगी, बस से वहाँ तुम जा सकोगी? क्या वहाँ एडजस्ट कर सकोगी? लेकीन तुम सब कुछ बहुत आसानी से और आनन्द से करती हो| स्कूल के पहले दिन से ही तुमने हिम्मत की| तीन साल की होने के पहले ही बस से स्कूल जाने लगी| सामने जो कुछ होता हो, उसे तुम खुशी से अपनाती हो- फिर वो माँ- पिता का दिन भर सामने न होना हो; बीच बीच में दूर जाना हो; स्कूल का माहौल हो; पास पडौस का वातावरण हो| पानी में जैसा गुण होता है- जिस पात्र में उसे डालते हैं, उसी का आकार वह धारण करता है; ठीक वैसी ही तुम हो!

तुम्हारी साथ अखण्ड रूप से साथ होती है- सभी मायनों में

“तू बिन बताए मुझे ले चल कहीं जहाँ
तू मुस्कुराए मेरी मन्जिल है वही"

ठीक इसी तरह से हम जो करते हैं; तुम्हे जो देते हैं; जो वातावरण देते है; जो परिस्थिति देती है; उसमें तुम उतनी ही‌ खुश होती हो| इस दृष्टि से बच्चा यह पालकों का प्रतिबिम्ब होता है| पालक जो देते है; उन सभी चीज़ों का रिफ्लेक्शन उसमें आता है| इसलिए वास्तव में बच्चे को निर्मल- निष्पाप रखना हो, तो पालकों को भी खुद को उतना ही शुद्ध रखना आवश्यक होता है| क्यों कि बच्चे को सबसे ज्यादा मिलनेवाला वातावरण परिवार ही होता है| यहीं पर बच्चा जो सुनता है, वो सब आत्मसात करता है| इसलिए खुद निर्मल और शुद्ध रहना, यह वास्तव में पालकों की जिम्मेदारी है| यह आदर्श पालकत्व है| आदर्श शब्द का मूल अर्थ आईना होता है| आईना माने ऐसी चीज़ जो खुद का कोई भी हस्तक्षेप किए बिना निर्मल और पारदर्शी पानी जैसा शुद्ध माध्यम होता है| अगर पालक ऐसे प्रमाणिक और निर्मल होंगे; तो ही वे बच्चे को वैसे वातावरण दे सकेंगे|

Thursday, September 17, 2020

अद्विका की आवाज

नमस्ते!

मेरी बेटी अद्विका की आवाज के कुछ उदाहरण यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ| जो भी वो सुनती है- कहानियाँ, कार्टून्स और गाने आदि, उन सबका आवाज उसके पास है| सिर्फ आवाज ही नही, वे एक्स्प्रेशन्स, वॉईस में उतार- चढाव आदि भी दिखाई देते हैं| इन स्वरों का आप भी आनन्द लीजिए| 

 

 

१. ढोल्या कुकर:      
    


२. मरमेड- मनीमाऊ:
    


३. निंजा हतोडी:
    


४. औ पा ब ई:
    


५. फुलों का तारों का सबका कहना है:
    

 
 
६. तीन बहनें साथ में फूटबॉल खेल रही हो ऐसा सिम्युलेशन:
    

अदू को मैने लिखे हुए पत्र: 

पहले जन्म दिन का पत्र: एक प्रेमपत्र 

दूसरे जन्म दिन का पत्र: बच्चे मन के सच्चे 

लव यू ज़िन्दगी: अदू का तीसरा जन्म दिन!!!! 

बहुत बहुत धन्यवाद!

Tuesday, September 15, 2020

बेटी को दूसरे जन्म दिन पर लिखा हुआ पत्र: बच्चे मन के सच्चे. . .

१८ सितम्बर २०१६

प्रिय अदू. . . .
 

पहले साल का पत्र

कल तुम्हारा दूसरा जन्मदिन था! तुम दो साल की हुई! कल का तुम्हारा नाचना, सेलिब्रेशन में हंसना, सब के साथ खेलना, गोल- गोल घूमना और बिना थके अथक स्टैमिना होना. . . असल में शब्द बहुत पीछे छूट जाते हैं| मुझे कल तुम्हारी और एक चीज़ बहुत विशेष लगी| वह तुम्हारे स्वभाव का ही हिस्सा है! तुम्हारी सरलता! सहज भाव! कैसे किसी का मन इतना सरल और शुद्ध हो सकता है? हाँ, हो सकता है| तुम्हे देखते हुए इसका अनुभव आता है| इसलिए कल की बर्थडे पार्टी बहुत ही मिठी थी|


अदू, विगत दो सालों में ऐसे कई अवसर आए जब जीवन सार्थक लगा| एक एक दृश्य आँखों के सामने प्रत्यक्ष अनुभव करता हूँ| जब तुम बहुत ही छोटी थी, तब तुम मेरी तरफ देख कर मुस्कुराई; हमने जीभ की भाषा में बात की! जब तुम्हे पहली बार उठाया वह क्षण| ऐसे अनगिनत क्षण तुम ले कर आई| तुम्हारे बारे में लिखते समय आँखें गिली हो जाती है| शब्द नही आ पाते है| तुमने कहा हुआ पहला शब्द! तुम्हारी हर एक लीला! वास्तव में नवसंजीवनी जैसा कुछ होगा तो वह तुम्हारा चैतन्यमय अस्तित्व! और सोने पर भी तुम्हारा शान्त और सन्तोषभरा चेहरा! अनगिनत यादें! पर लिखते समय शब्द नही फूटते है अदू|
 

असल में पालक के तौर पर तुम हमें ढाल रही हो| Child is the father of man. तुम्हारे जन्म के साथ हमारा भी पालक के तौर पर जन्म हुआ| और पालक ही नही, बल्की जीवन में नई दृष्टि लाने के सम्बन्ध में ही तुमने हमें जैसे नया जन्म दिया| आज तुम्हारे जन्म दिन के अवसर पर हम तुमसे क्या क्या सीख रहे हैं और सीख सकते हैं, यह तुमसे कहना चाहता हूँ| पीछली बार के पत्र में जो कहा था, उसे जोड़ कर आगे कहना चाहता हूँ|
 

बच्चों को ईश्वर द्वारा भेजे गए फूल क्यों कहते हैं, इसकी प्रतिति तुम्हे देखते समय आती है| शुद्धता क्या होती है, शान्ति- सन्तोष क्या होता है, यह तुम्हे देखते हुए पता चलता है| अब इसे शब्दों में कैसे कहूँ? तुम्हारे पहले मैने ज्यादा बच्चों को इतना करीब से देखा नही था| पर मुझे लगता है जो चैतन्य तुममें‌ है, जो प्रगाढ़ शान्ति है, वे सभी में होती है| अदू, मुझे याद है पीछले साल दिवाली के समय तुम पटाखों की आवाज सुनने जितनी बड़ी हो गई थी| पहली दिवाली को तो तुम बहुत छोटी गुडिया थी! इसकी वजह से तुम्हारे कान में रुई‌ डाली थी| लेकीन पीछली दिवाली के समय तुम ठीक से पटाखों की आवाज सुन पाई| और तुम भी उन्हे सरलता से सुनती थी| तुम्हे जैसे डर का पता ही ना हो| जिसके बारे में सम्भवत: छोटे बच्चे डरते है; उसे तो वो चाहिए होता है| फिर वह कोई जानवर होगा, अन्धेरा होगा या भूभू (कुत्ता) होगा! पटाखों के फूटने पर डरने के बजाय तुम मुस्कुराती थी! धुडूम! तुम्हारी यह सहजता मुझे सम्मोहित करती है अदू!
 

 

हमेशा देखा है कि तुम्हारे मन में सामने होनेवाली चीजों के बारे में एक सकारात्मक ओपननेस होता है| बहुत ही कम बार तुम किसी चीज़ को देख कर नही कहती हो या रोती हो| दुनिया की तरफ किस स्वस्थ दृष्टि से देखना चाहिए, यह तुमसे सीखना चाहिए| अगर कोई कुत्ता भौंक रहा हो या अचानक बिजली चली गई हो, तो भी तुम उतनी ही‌ प्रसन्न होती हो! प्रसन्नता यही तुम्हारा वास्तविक नाम होना चाहिए! अदू, मेरे लिए यह शब्दों में लिख पाना कठिन है| पर प्रयास करता हूँ| पीछले जन्म दिन के पश्चात् लगातार कुछ दिनों तक तुम्हारी सेहत स्वस्थ नही थी| चार- पाँच दिन तो तुम बहुत ही वीक हो गई थी| दिन भर सब तरफ भागदौड़ और शोरगुल करनेवाली तुम एकदम कमजोर हो गई, तुम्हारी किलकारियों की गूँज भी रूक गई थी| बाहर चलिए ना, कहनेवाली तुम बिल्कुल शान्त हो कर दिनभर सोती थी| उस समय चाहे तुम्हारा बोलना- हंसना कम हुआ हो, लेकीन फिर भी तुम्हारे चेहरे की मुस्कान कायम थी| उस समय भी भाई की तरफ देख कर तुम मुस्कुराती थी|


अदू, मुझे लगता है कि तुम्हारी प्रसन्नता अकारण है, इसलिए बाहर कुछ भी हो, तुम्हारा मन प्रसन्न ही रहता था और अब भी वैसा ही है| हमारी नजर में जहाँ खुशी की कोई किरण नही होती है, वहाँ भी तुम मुस्कुराती रहती हो| मुझे याद आता है, तुम जब बहुत छोटी थी, तब तुम साँप जैसे रेंगते रेंगते दूसरे कमरे में आती थी और मुझे ढूँढती थी| और मै दिखने पर कितना मुस्कुराती थी! कैसे प्यार करें, यह तुमसे सीखना चाहिए| पीछले साल में अनगिनत बार तुमने इस तरह ऊर्जा दी है| आज इन चीजों पर गौर करते हुए एक अर्थ में बहुत पश्चात्ताप होता है| अन्दर से तकलीफ होती है| तुम इतनी प्रसन्न, शान्त और आनन्दमय होते हुए भी हम हमारी सारी चिन्ताएँ, हमारे अनगिनत टेन्शन्स और जीवन के सभी प्रेशर्स- सब कुछ रबिश ले कर तुम्हारे तरफ जाते थे| कई बार तो तुमसे दूर जाना पड़ता था| और हर रोज के कामों में तुम्हे मनचाहा समय भी नही दे सकते हैं| हम मन में इतने तनाव लिए हुए होने पर भी तुमने कभी भी शिकायत नही की| को- ऑपरेटीव यह कोई उचित शब्द नही है, पर तुम बहुत को- ऑपरेट करती हो| एक बार तुम्हे बताने पर तुम समझ लेती हो| इसीलिए तुम्हे नानी के पास छोड़ कर हम दिनभर दूर जा सकते है, या युं कहना चाहिए कि तुम हमें जाने देती हो| इतना तुम्हारा मन बड़ा है; इतनी शान्ति तुम्हारे पास है| हमें बाय करते समय तुम्हे तकलीफ तो होती ही है| वह स्वाभाविक है| पर दूसरे पल तुम प्रसन्न चित्त होती हो|‌ चीज़ें जैसी हो, उन्हे उसी तरह से कैसे स्वीकारें, यह कला हमे भी सीखाओ ना! पीज अदू!

जीवन के संघर्ष, अनगिनत शोरगुल, मन के अनगिनत तनाव, विकार आदि से झुझने पर भी तुम्हे मिलने के बाद एक पल में वह सब कुछ भुलाया जाता है| अदू, हम जब छोटे थे, तब कॉमिक्स में पढ़ते थे कि कुछ ऐसे विलैन होते थे जिन पर वार करने पर वे अदृश्य या ट्रान्समिट हो जाते थे| उसी तरह हमारे मन के विकार और तनाव तुम्हे मिलते समय अदृश्य हो जाते है! ऐसा तुम्हारा पारस स्पर्श है कि लोहा होने के बावजूद उसका भी सोना होता है! तुमसे मिलने पर तुम्हे होनेवाला हर्ष, तुम्हारा खुशी से झूमना और भागना!! Really, child is the father of man. जैसे मैने पीछले पत्र में कहा था, हम तुम्हारे जितने लाड़- प्यार करते होंगे, उससे बहुत ज्यादा तुम ही हमें करती हो| तुममें होनेवाली अखण्ड प्रसन्नता और ऊर्जा! 

पालक कैसे होना चाहिए, यह तुम ही मुझे सीखा रही हो| अदू, मुझे याद आता है, जब मैने अकेले तुम्हे संभालना सीखा, तब शुरू में मुझे बहुत टेंशन था| मै वास्तव में घण्टे घण्टे का प्लैन करता था- तुम्हे पाँच मिनिट खिलौना दूंगा, दस मिनिट गैलरी में ले कर खड़ा रहूँगा, दस मिनिट खिड़की से सड़क दिखाऊँगा, पन्द्रह मिनिट घूमने ले जाऊंगा ऐसे! लेकीन तुमने उंगली थामी और एक एक चीज़ इस तरह सीखाई की सब कुछ आसान होता गया| मेरे बहुत से डर तुमने झूठे सिद्ध किए| पहले तुम्हे लेकर खिड़की या रेलिंग के पास खड़े रहने में मुझे बहुत डर लगता था| लेकीन तुमने सब कुछ आसान बना दिया| तुम्हारे कारण एक तरह का अनुशासन सीखना पड़ा और आगे भी सीखना होगा| क्यों कि तुम प्रकाशमान लौं जैसी तेजस्वी हो, वहाँ अन्धेरा ठहर ही नही सकता है| जहाँ तुम खेलती हो- बैठती हो, वहाँ तुम्हे ऐसी चीजें देनी होगी जिससे तुम्हे रोकनी की जरूरत ही नही हो| ‘यह करो,’; ‘यह मत करो' ऐसा किसी भी प्रकार से न बताते हुए तुम्हे मुक्त तरीके से खेलने देने की अरेंजमेंट करनी चाहिए| यह दृष्टि ही तुमने दी| और हमने तुम्हे जो भी कहा, तुमने कभी भी नही टाला| अदू, आज भी तुम्हारी आवाज उतनी ही‌ प्यारी और इनोसंट होती है, तुम आसानी से कहती हो- मै कुर्सी पर बैठूं? तेदी लाऊं? एक बार तुम्हे समझाने के बाद और तुम्हारी उस पर की स्वाभाविक प्रतिक्रिया आ जाने के बाद कभी भी तुमने किसी भी चीज़ के बारे में शिकायत नही की| वाकई, “इस क्षण में कैसे जीना चाहिए", यही तुमने दिखाया|


अर्थात् अब समाज में और जीवन के ढाँचे में आनेवाली चीजें तो आती हैं| कई बार वे अपरिहार्य भी होती हैं| समाज में रहते समय कई चीजें सीखनी होती है| इस कारण ऐसे अवसर पर तुम्हे रोकना और कई बार मना करना भी अपरिहार्य है| और तुम इतनी शार्प हो, इतनी तेज़ हो, कि जिससे तुम्हे अलग सीखाने या समझाने के बजाय तुम हमारे बर्ताव से ही बहुत कुछ लेती हो| जब हमारा कहा हुआ ही तुम कहती हो, तब तो हमें तुम्हे 'ऐसा मत कहो,’ कहना पड़ता है| जैसे हम ही तुम्हारे सामने "चूपचाप बैठो,” कहते हैं और बाद में तुम भी हमें वही सुनाती हो| उस समय हमे तुमसे कहते है कि ऐसा तो नही कहना चाहिए| यह एक उदाहरण है कि किस तरह खुली हुई सोच सिमट जाती है| जब तुम हवाई जहाज़ की आवाज सुनती हो तो चिल्लाती हो कि हवाई जहाज आया! उत्तेजित होती हो| लेकीन तुरन्त बाहर देखे बिना तुम ही कहती हो कि वह तो दिखता ही नही, बादलों में हैं! अदू . . .

अद्विका- अदू, स्वरा, गोड, साखर, छकुली, मनुली, पिकू ऐसे तुम्हारे कितने कुछ नाम है! जब तुम नन्ही सी थी, तब मुझे निन्ना कहती थी! कितनी मिठी आवाज में मुझे पुकारती थी, निन्ना! और अब निन्जन कहती हो| छोटे बच्चों को जन्म से ही‌ हर चीज़ में होनेवाला चैतन्य दिखाई देता है! तुम्हे भी वह दिखता है| इसलिए तुम्हे 'डरावने' खूंखार कुत्ते से भी डर नही लगता है| भौंकनेवाले डरावने कुत्ते के पास जा कर भी कितने प्यार से तुम उससे बात कर सकती हो! अदू, अच्छा शिक्षक वह होता है जो छात्रों की भी सही पहचान करा देता है और खुद को भी उनके सामने खोल देता है, खुद की भी पहचान करा देता है| इसी तरह तुम एक एक चीज़ें सिखाती हो जिसे पालक बनने का शास्त्र ही कहना चाहिए! शुरू में बहोत सी छोटी चीजें भी मुश्कील लगती थी| तुम्हे संभालते समय अगर तुम रोई, तो मै क्या करूं, ऐसा सवाल मन में आता था| पर अब बहुत आसानी से तुमने मुझे सीखाया कि क्या करना है| वही चीज़ है तुम्हारी पॉट्टी साफ करने की| लर्निंग बाय डूईंग! और यह करते समय हमेशा तुम साथ होती हो, तुम्हारी मुलायम पुकार होती है- ‘निन्ना!’ हमेशा तुम जिसकी बौछार करती हो, वह प्यार और अपनापन होता है. .
 

अदू! कई चीजें आँखों के सामने आती है| एक कार्यक्रम में तुम्हारा खिलना- हंसना और दौड़ना! और जब यह बच्ची दौड़ कर थक गई, तो वो रेंगनेवाली छोटी नन्ही परी हो गई! या एक टोपी पहनने के बाद तुम्हारा और भी छोटी बेबी जैसा दिखना! तुम्हे जब पहली बार मोटर साईकिल पर ले गया, तब का अनुभव! हर बार तुम्हारा खुशी से भर जाना! तुम्हे संभलते समय शुरु के दिनों में बहुत टेंशन होता था| जल्द ही तुमने हर एक चीज़ मुझे सीखाई| निन्जन, पानी दो, निन्जन बाहार चलें . . .
 

अदू, दो बार तुम बहुत बीमार हुई थी| उस समय भी तुम गोद में लेटते हुए कहती थी कि कौनसा गाना सुनना चाहती हो| दादी को गाना कहने के लिए कहती थी| बीमार होने के बावजूद भी कभी भी तुम लगातार रोती नही रही| हर समय तुम्हारी शान्ति कायम रहती थी| कड़वी दवा लेते समय भी तुम बहुत सहज होती हो| तुम उसे फैंक नही देती हो| या उससे रोती भी नही हो| इंजेक्शन भी हो, तुम सिर्फ एक मिनिट रोती थी| उसके बाद तुरन्त शान्ति और चेहरे पर मुस्कान! दादा के साथ और सबके साथ हमेशा तुम खेलती हो| तुम्हे लोग पसन्द आते हैं| और अदू, उस दिन तुमने जब घोषणा ही कर दी- "माँ, मुझे स्कूल जाना है!" मुझे बहुत ही अचरज हुआ!
अदू, तुम्हे कई बार हमारे कारण बहुत दूर दूर तक यात्राएँ करनी पड़ी| कई बार दिनों दिनों तक मम्मी से दूर रहना पड़ा| पर कभी भी तुमने शिकायत की नही| मन में आनेवाली प्रतिक्रिया कहने के बाद तुम हमेशा शान्त रह कर मुस्कुराती हो! मुझे याद है- घर में दु:खद घटना घटी थी, घर शोकमग्न था| पर सिर्फ तुम्हारी उपस्थिति के कारण ही वह वातावरण सहन किया जा सका| सब लोग बहुत दु:खमग्न थे, लेकीन तुम्हारी उपस्थिति मुस्कुराहट ले ही आई|
 

अदू, तुम्हारे साथ ट्रेकिंग करने में भी बड़ा मज़ा आता है! सड़क पर आनेवाली मज़ेदार चीज़ें तुम बहुत एंजॉय करती हो| कुत्ते, पंछी, तितली, पेड़, पहाड़, किड़े, घास, गाडियाँ, चाँद, तारे! और जम तुम्हे ले जाते समय मुझे पसीना आता है, तब कहती हो कि मै पोछ देती हूँ! और अक्सर कहती हो, नीचे छोड़ो, मै चलूँगी! चलाओ ना, चलाओ ना! मम्मी के साथ हिमालय में घूमते समय भी तुम कहती हो, नीचे छोड़ो, चलाओ ना| पास- पडौस के परिसर से तुम्हारा रिश्ता बिल्कुल पक्का है| चाहे वे खिलौने होंगे, कागज़ का टुकड़ा हो या तुम्हारा तेडी (टेडी बीअर) हो! तुम हम पर भी‌ उतना ही प्यार करती हो| हर एक में तुम्हे वही चैतन्य नजर आता है|
 

और छोटी चीज़ों में तुम्हे तो बहुत आनन्द आता है| पास से गुजरनेवाले जेसीबी का आवाज आने पर तुम दौड़ी चली आती हो! उसकी घर्र घर्र आवाज तुम्हे दूर से ही पता चलती है और तुम दौड़ी आती हो! फिर हम खिड़की में जा कर जेसीबी देखते हैं| जैसे ही‌ वह पास से गुजरता है, तुम उसे देख कर मुस्कुराती हो| धीरे धीरे वह आगे बढ़ता है| उसमें अक्सर गाना भी लगा हुआ होता है| (एक बार तो क्या कहूं मेरे बचपन का पसन्दीदा गाना लगा था- घूंघट की आड से! उस समय मैने जो महसूस किया, वो कह नही सकता . . !) और जेसीबी जाने तक तुम टकटकी लगा कर देखती रहती हो| अदू, तुम इतनी निष्पाप हो कि तुम्हे भौंकनेवाले कुत्तों से भी तकलीफ होती है| हमने रोने की सिर्फ एक्टींग भी की, तो तुम्हे सच में रोना आता है| खिलौनों में भी तुम्हे वही चैतन्य नजर आता है| तुम बताती हो, खिलौने को नीन्द आ रही है| फिर उसे गोद में ले कर तुम सुलाती हो! बाहर जाते समय तुम अक्सर कहती हो, मत जाओ, मत जाओ ना! इतना तुम्हारा प्यार है . . . जब टीवी पर सैराट का गाना लगता है, तब तुम फुदकती फुदकती नाचने लगती हो! जिंग जिंग कह के खुशी से झूम उठती हो! और मुझे उठा कर लेने के लिए कहती हो और हम साथ नाचते हैं! छोटी छोटी चीज़ों में इतना बड़ा चैतन्य देखने की सूक्ष्मदर्शी जैसी सूक्ष्म दृष्टि हमें तुमसे कैसे मिले, यह बड़ा प्रश्न है|
 

यह दृष्टि वैसे तो बहुत सीधी और वैसे बहुत कठीन भी है| क्यों कि हम वे ही चीजें देख सकते हैं जिनके लिए हमारी आंखों की खिडकियाँ खुली हुईं होती हैं और हमारी परिस्थिति उसके लिए अनुकूल होती है| अदू, तुम्हारा साथ मिलने के पहले मै छोटे बच्चों में होनेवाला चैतन्य इतना नही देख पाता था| जीवन के हर एक मोड़ पर हमारी दृष्टि अलग अलग होती है| हम जीवन के क्रम में जहाँ होते हैं, वहाँ से अगले पड़ाव के दृश्य हम देख सकते हैं| हमारी जो वासनाएँ होंगी, बलवान आवेग जिस तरह के होंगे, उस तरह हमारी दृष्टि होती है| एक ही बगीचे में अगर एक वैज्ञानिक और कवि साथ साथ जाते हैं, तो वे बिल्कुल ही अलग किस्म की चीजें देखेंगे| और यह भी होता है कि हम वही देखते हैं जिसे देखने की हमें इच्छा होती है| और जो देखने की हमारी इच्छा नही होती है, उसे हम देख नही पाते हैं| पर अदू, तुम्हारे साथ जीवन में पहले कभी भी जो नही देखा था, वह बहुत बड़ा दालन अब दिखाई देने लगा है! अनक्लटर्ड माइंड क्या होता है, शुद्ध ऊर्जा क्या होती है, यह देखने का मौका मिला है. . .
 

अदू, तुम्हारे प्यार और ममता से इतना भर जाता हूँ कि वास्तव में नतमस्तक होता हूँ| खाते समय तुम हमेशा एक निवाला हमें देती ही हो| इतनी तुम्हारी ममता है| इतनी आत्मीयता है| सिर्फ नतमस्तक होता हूँ| फिर समझ आता है कि तुम ही हमारी पालक हो, हमारी मार्गदर्शक हो| इसके बदले में तो कुछ भी नही किया जा सकता| और वह पात्रता अर्जित करना भी कठीन है| वह निर्दोष दृष्टि, वह शुद्ध और वर्तमान में होनेवाला मन! इसे कैसे ला सकता हूँ! इतनी अद्भुत सरलता! वाकई तुम्हारे खिलौने भी तुम्हारे लिए जीवित होते हैं| तुम इतनी निर्मल- निष्पाप हो, लेकीन मेरे मन में तो वासनाएँ और विकारों का घना जाल| तुम्हे तो हर चीज़ में चैतन्य नजर आता है, पर मुझे तो हर चीज़ में दोष नजर आता है| तुम्हारे पास हर एक चीज़ के लिए स्वीकृति है, तो मुझे हर चीज़ में कुछ अखरता है!
अदू, तुम्हारी बुद्धी इतनी तेज़ है कि तुम्हे हर चीज याद रहती है| जहाँ से हम वडा पाव लाते हैं, वहीं से जाते समय तुम अक्सर पूछती हो, वदा पाव लाओगे? गाना सुनते समय अपने आप तुम्हारे हाथ भी दाद देते हैं| तुम्हारे सारे बाल- गीत तुम्हे याद है और तुम्हारे कारण घर में सभी को भी! तुम लोगों को भी ऐसा ही याद रखती हो! और तुम मुझसे बहुत ज्यादा सोशल हो, इसकी सभी लोग सराहना करते हैं! मोबाईल में रिंगटोन के तौर पर कभी पहले लगाया हुआ गाना अचानक से बजा, तो भी तुम तुरन्त पहचानती हो और कहती हो- फोन आयी! गण बाप्पा के सामने से जाते समय तुम ही मुझे कहती हो, ‘जय बाप्पा करो!’ तुम इतनी तेज़ हो कि हम तुम्हारे सामने जो बोलते हैं, तुम्हे जो एक बार बताते हैं वो तुम पूरा याद रखती हो| इस कारण हमें जिम्मेदारी के साथ तुम्हारे सामने बोलना चाहिए| उतनी सजगता रखनी चाहिए|
 

विपश्यना साधना करते समय शुरू में मन के सब विकार उपर आ जाते हैं और अटके गटर में जैसे दुध की बून्द गिरी हो, उस तरह मन के दोषों की पृष्ठभूमि में जैसे सजगता का बिन्दू दिखाई देता है| लेकीन साथ ही वह उस गटर को मूल रूप में भी दर्शाता है| इसी तरह तुम्हारे साथ मन में होनेवाले अनगिनत विकार वाकई में महसूस होते हैं और वे विकार हैं, इसका पता चलता है| ऐसा इसलिए क्यों कि हमें‌ चीजों में फर्क समझने के लिए काँट्रैस्ट आवश्यक होता है| ब्लैकबोर्ड पर काले चॉक से लिखा तो उसे पढ़ा नही जा सकता है| ब्लैकबोर्ड पर लिखने के लिए सफेद चॉक ही आवश्यक होता है! तुम्हारा साथ होना इस सफेद चॉक जैसा है! मन में होनेवाले अनगिनत विकार तुम्हारी शुभ्रता में वास्तविक रूप से दिखने लगते हैं . . .
 

और ये विकार, ये तनाव और मन की अशान्ति और ये दोष सिर्फ दिखना काफी नही है| अखण्ड सजगता यह बिल्कुल अलग चीज़ हैं| विचारों के स्तर पर हम सब समझ रहे होते हैं| लेकीन उस पर वास्तविक अमल नही कर सकते हैं| हम अक्सर कहते हैं कि क्रोध बुरा होता है या क्रोध निरर्थक है| लेकीन ठीक समय पर क्रोध हमें अपने कब्जे में कर ही लेता है| अदू, एक कहानी तुम्हे कहता हूँ| बड़ी होने पर तुम उसे समझ पाओगी| एक गाँव में एक पुजारी रहता था| सबको लगता था कि वह बड़ा धार्मिक आदमी है| दिन रात वह उसके घर के सामने के मन्दीर में बालाजी इस देवता का जाप करता था| भोर में तीन घण्टे और शाम को तीन घण्टे उसका यह जाप और भजन बड़े शोरगुल के साथ चलता था| पास पडौस के लोगों को उससे बहुत तकलीफ होती थी| पर ईश्वर का भजन है, इसलिए कोई कुछ नही कहता था| उसके पास ही एक युवक रहता था| वह इस आदमी को जानता था| उसका वास्तविक नाम किसी को भी पता नही था, लेकीन वह बालाजी की अविरत उपासना करता था, इसलिए सभी लोग उसे बालाजी ही कहते थे| एक बार उस युवक ने तय किया कि उस आदमी को एक पाठ पढ़ा कर ही रहेगा| उसने कुछ दोस्तों को इकठ्ठा किया और उन्हे कुछ बताया| 

बालाजी के घर के सामने एक छोटा कुआ था| बालाजी रात में आंगन में ही खाट पर लेटा था| उस युवक ने देर रात दोस्तों को इकठ्ठा किया|‌ उन्होने बालाजी को खाट सहित चूपचाप उठाया और धीरे से उठा कर कुए के पास रख दिया| बालाजी नीन्द में ही था| फिर वे लोग कुछ दूरी पर जा कर रूके और उन्होने एक पत्थर फैंक कर बालाजी को जगा दिया| जिस क्षण वह जग गया, उसने कुआ देखा और जोर से दहाड़ मारी! उसकी चीख़ सुन कर आसपास के लोग जग गए! वह डर के मारे काँप रह था| तब वह युवक सामने आया और उसने बालाजी को पूछा, अब बताईए, आपने चीख क्यों मारी? आपको आपका बालाजी याद नही आया? आप उसकी इतनी भक्ति करते हैं, तो तुम्हे वह क्यों याद नही आया और डर ही क्यों लगा? बालाजी पहले तो बड़ा नाराज हुआ, लेकीन फिर शर्मिन्दा हुआ| हर रोज चिल्ला चिल्ला कर किया हुआ जाप भी मेरे मन में गहरे में नही जाता है और वहाँ का डर जस का तस रहता है, यह उसके समझ में आया| इसके बाद एक औपचारिकता जैसा किया जानेवाला उसका जाप उसने बन्द ही किया! और कुछ समय के बादतो वह बिल्कुल अलग इन्सान बन गया!
 

इस कारण से विचार और बुद्धी के स्तर पर ऐसी चीज़ों के बारे में सजग होना आसान है; लेकीन अन्तर्मन की गहराईयों में वह सजगता रखना बहुत कठीन है| और उसके लिए अविरत साधना और अविरत रिमाइंडर आवश्यक है| तभी यह सजगता गहरी जा सकेगी और किसी भी कठीन प्रसंग में- जागते हुए या नीन्द में भी- वह टिक सकेगी| अदू, तुम्हारी शुद्धता- तुम्हारी शुभ्रता आज है उसे वैसे ही बनाए रखना, उस पर कोई भी दाग़ या अन्धेरा न आने देना और निसर्ग ने तुम्हे हमे जिस शुद्ध स्वरूप में दिया है, उसे आगे भी सुरक्षित रखना, यह हमारी सच्ची जिम्मेदारी है| हालांकी कहते हैं ना कि प्रकृति में हर कोई मूल रूप से शुद्ध ही होता है, जन्म के समय शुद्ध ही होता है| लेकीन आगे बढ़ते हुए प्रकृति द्वारा दिया गया शुद्ध वस्त्र गन्दगी से मैला हो जाता है| प्राकृतिक नही, लेकीन यह सामाजिक नियम जैसी ही बात है| कोई विरले कबीर होते हैं जो अपना मूल स्वरूप प्राप्त करते हैं और कहते हैं 'ज्यों की त्यों धर दिनी चदरिया!' प्रकृति ने जो मूल स्वरूप दिया था, उसे वे कष्ट और साधना से फिर प्राप्त करते हैं| पर अदू, तुम्हारे कारण एक 'आशा' हमें मिली है कि जैसा तुम्हारा शुद्ध स्वरूप है, वैसा हमारा भी कभी था| आज उस पर धूल और मैल की कई पर्तें चढ़ी हुई है और गटर बहुत जाम हो गया है, लेकीन एक समय शुद्ध स्वरूप था, यह आज भी याद आता है| बचपन की धुन्धली यादें आज भी कहती हैं कि एक समय मुझे भी हर चीज़ में यही चैतन्य नजर आता था| अदू, तुम्हारे साथ होते हुए वह निर्मल दृष्टि हमें जरूर मिल सके, इतना आशीर्वाद तुम हमें जरूर देना. . .

इनको किसी से बैर नहीं
इनके लिए कोई गैर नहीं
इनका भोलापन मिलता
है सबको बांह पसारे
बच्चे मन के सच्चे. .  
सारी जग के आँख के तारे. .

धन्यवाद! 



Saturday, March 21, 2020

ओशो सम्बोधि दिन...

21 मार्च 1953 सद्गुरू ओशो का संबोधि दिन है...
 
"संबोधि दिवस पर आपका संदेश क्या है?"

आनंदित होओ। आनंद बांटो। और जो आनंदित है वही आनंद बांट सकता है, स्मरण रखो। दुखी दुख ही बांट सकता है। हम वही बांट सकते हैं जो हम हैं। जो हम नहीं हैं, उसे हम चाहें तो भी नहीं बांट सकते। इसलिए तो इस दुनिया में लोग ऐसा नहीं है कि दूसरों को सुख नहीं देना चाहते। कौन मां-बाप अपने बच्चों को दुख देना चाहता है! कौन पति अपनी पत्नी को दुख देना चाहता है! कौन पत्नी अपने पति को दुख देना चाहती है! कौन बच्चे अपने मां-बाप को दुख देना चाहते हैं!* *नहीं; लेकिन तुम्हारी चाह का सवाल नहीं है। दुख ही फलित होता है। नीम लाख चाहे कि उसमें मीठे आम लगें और कांटे लाख चाहें कि गुलाब के फूल हो जाएं, चाहने से क्या होगा? मात्र चाहने से कुछ भी न होगा। तो तुम चाहते हो कि लोगों को आनंदित करो, लेकिन कर तुम पाते हो केवल दुखी। चाहते तो हो कि पृथ्वी स्वर्ग बन जाए, लेकिन बनती जाती है रोज-रोज नरक।

इसलिए मैं तुमसे कहना चाहता हूं, यह मेरा संदेश है: इसके पहले कि तुम किसी और को आनंद देने जाओ, तुम्हें अपने भीतर आनंद की बांसुरी बजानी पड़ेगी, आनंद का झरना तुम्हारे भीतर पहले फूटना चाहिए। मैं तुम्हें स्वार्थी बनाना चाहता हूं।

Sunday, December 29, 2019

साईकिल कैसे चलाएं?

नमस्कार!

कई मित्र अक्सर बताते हैं कि उन्हे साईकिल चलानी है| कैसे चलानी है, यह भी पूछते हैं| उनके लिए यह एक लिख रहा हूँ| इसे कोई नियम नही समझा जाना चाहिए| ये सिर्फ मेरे अनुभव हैं| साईकिलिंग सीखते सीखते मैने जो अनुभव किया, उसके आधार पर आपसे यह बोलना चाहता हूँ| साईकिल चलाने में सबसे पहले बात आती है साईकिल की| लोग पूछते हैं कौनसी साईकिल चलानी चाहिए? इसका उत्तर अलग अलग हो सकता है| हर तरह की साईकिल बाज़ार में मिलती है| इसलिए पहले यह देखना चाहिए कि, हम कितनी चलानी चाहते हैं, किस प्रकार चलाना चाहते हैं| शहर में ही बस १०- १५ किलोमीटर तक ही चलाना चाहते हैं या ५० किलोमीटर और उसके आगे चलाना चाहते हैं| लोग अक्सर नई साईकिल की तरफ आकर्षित होते हैं| लेकीन ऐसे भी बहुत हैं जिन्होने बहुत महंगी साईकिलें खरीदी हैं और वे सब वैसी ही पड़ी हैं| इसलिए मेरा एक सुझाव रहता है कि शुरु में जो साईकिल मिलती हो, घर में हो, पडौसी के पास हो, जो भी उपलब्ध हो, उसे चलाना शुरू कीजिए| कम से कम एक महिने तक यह साईकिल चला कर देखिए कि आपको कितना मज़ा आता है| फिर आपकी जो रुचि होगी, आपको जितना मज़ा आएगा, उससे आप यह तय कर सकते हैं कि आपको कौनसी साईकिल चाहिए| और जब मैने एटलस साईकिल पर ५०० किलोमीटर का टूअर किया, तब से मै जानता हूँ कि साईकिल कोई भी हो, साईकिल के बजाय साईकिलिंग ज्यादा बड़ा होता है‌| साईकिल से साईकिल चलाना बढ़ कर होता है| साईकिल कौनसी भी हो, उसे चलाईए तो!

तो फिर शुरुआत कैसे करें? उसके लिए आपके फिटनेस के हिसाब से, आपकी सेहत के हिसाब से देखना होगा| जहाँ तक आप बहुत आसानी से साईकिल चला सकते हैं, चलाईए और शुरू कीजिए| किन किन लोगों के लिए यह आसानी सिर्फ दो- चार किलोमीटर तक होगी| कुछ लोग पहले दिन से १० किलोमीटर की राईड कर सकेंगे| जो भी आपके लिए आसान हो, उतनी दूरी तक साईकिल चलाईए| एकदम बहुत ज्यादा चलाने की जिद मत कीजिए| साईकिल या कोई भी व्यायाम हो, उसमें 'एकदम अचानक बहुत ज्यादा' कभी नही करना चाहिए और 'सहज- आसान' जो होगा, जहाँ तक होगा, उसे ही करते रहना चाहिए| अपने आप धीरे धीरे, ‘सहज- आसन' ही बहुत ज्यादा हो जाता है| और साईकिल चलाने के पहले और बाद में स्ट्रेचिंग करना चाहिए| स्ट्रेचिंग से पाँव के मसल्स ढिले हो जाते हैं, हल्के हो जाते हैं| जिससे बाद में पैर नही दुखते हैं| साईकिल चलाने के पहले और बाद में स्ट्रेचिंग और जहाँ सम्भव हो, वॉकिंग भी करना चाहिए| वॉकिंग भी‌ एक बहुत सुन्दर लेकीन unglamorous व्यायाम है| साईकिल के साथ वॉकिंग हो तो साईकिलिंग आगे बढ़ाने में आसानी होगी| और साईकिल चलाते समय आप आपकी राईड strava app पर रेकॉर्ड कर सकते हैं| इस app पर आपके मित्र साईकिलिस्ट या रनर भी मिल सकते हैं| App के इस्तेमाल से हमें सही समय, दूरी, स्पीड आदि का पता चलता है और हम प्रगति साफ देख सकते हैं|





















और जब आपको साईकिलिंग अच्छा लगने लगेगा, २० किलोमीटर से भी आगे साईकिल चलाने में मज़ा आने लगेगा, तब आप दूसरी साईकिल के बारे में सोच सकते हैं| सिंगल गेअर में भी फायरफॉक्स फिक्सी, बीएसए फोटॉन ऐसी अच्छी साईकिलें मिलती हैं| अगर आपको किसी चढाई के रास्ते पर साईकिल चलानी है या छोटे हिल रोड पर साईकिल चलानी है, तो आप गेअरवाली साईकिल ले सकते है‌ं| मार्केट में गेअर की साईकिलें लगभग आठ हजार रूपए के दाम से आगे मिलती हैं| आप उन्हे सेकंड हैंड भी खरीद सकते हैं| अगर आपके पास पहाड़ी या चढ़ाईवाली सड़क नही है, तो आपको गेअर के साईकिल की आवश्यकता नही है| लेकीन अगर आप गेअरवाली साईकिल लेना चाहते हैं, तो उसके बारे में भी बताता हूँ|

Wednesday, December 11, 2019

ओशो जयंती पर सद्गुरू नमन. . .

रुकी रुकी थी ज़िंदगी
झट से चल पड़ी
हुई खुशी से दोस्ती
मज़ा ले ले हर घड़ी

एक पल में सब कुछ मिल गया
सामने मंज़िल खड़ी...

...उसके सिवा कुछ याद नहीं
उसके सिवा कोई बात नहीं
उन ज़ुल्फो की छवो में
उन गहरी निगाहों में
उन क़ातिल अदाओं में
हुआ हुआ हुआ मैं मस्त
उसका नशा मै क्या कहूँ..
हर लम्हा मैं मस्त हूँ
वो दौडे है नस नस में
वो दौडे है रग रग में
अब कुछ न मेरे बस में
हुआ हुआ हुआ मैं मस्त..




इसी से जुड़े मेरे अन्य ब्लॉग: मेरे प्रिय आत्मन् और ओशो: एक आंकलन