Tuesday, September 15, 2020

बेटी को दूसरे जन्म दिन पर लिखा हुआ पत्र: बच्चे मन के सच्चे. . .

१८ सितम्बर २०१६

प्रिय अदू. . . .
 

पहले साल का पत्र

कल तुम्हारा दूसरा जन्मदिन था! तुम दो साल की हुई! कल का तुम्हारा नाचना, सेलिब्रेशन में हंसना, सब के साथ खेलना, गोल- गोल घूमना और बिना थके अथक स्टैमिना होना. . . असल में शब्द बहुत पीछे छूट जाते हैं| मुझे कल तुम्हारी और एक चीज़ बहुत विशेष लगी| वह तुम्हारे स्वभाव का ही हिस्सा है! तुम्हारी सरलता! सहज भाव! कैसे किसी का मन इतना सरल और शुद्ध हो सकता है? हाँ, हो सकता है| तुम्हे देखते हुए इसका अनुभव आता है| इसलिए कल की बर्थडे पार्टी बहुत ही मिठी थी|


अदू, विगत दो सालों में ऐसे कई अवसर आए जब जीवन सार्थक लगा| एक एक दृश्य आँखों के सामने प्रत्यक्ष अनुभव करता हूँ| जब तुम बहुत ही छोटी थी, तब तुम मेरी तरफ देख कर मुस्कुराई; हमने जीभ की भाषा में बात की! जब तुम्हे पहली बार उठाया वह क्षण| ऐसे अनगिनत क्षण तुम ले कर आई| तुम्हारे बारे में लिखते समय आँखें गिली हो जाती है| शब्द नही आ पाते है| तुमने कहा हुआ पहला शब्द! तुम्हारी हर एक लीला! वास्तव में नवसंजीवनी जैसा कुछ होगा तो वह तुम्हारा चैतन्यमय अस्तित्व! और सोने पर भी तुम्हारा शान्त और सन्तोषभरा चेहरा! अनगिनत यादें! पर लिखते समय शब्द नही फूटते है अदू|
 

असल में पालक के तौर पर तुम हमें ढाल रही हो| Child is the father of man. तुम्हारे जन्म के साथ हमारा भी पालक के तौर पर जन्म हुआ| और पालक ही नही, बल्की जीवन में नई दृष्टि लाने के सम्बन्ध में ही तुमने हमें जैसे नया जन्म दिया| आज तुम्हारे जन्म दिन के अवसर पर हम तुमसे क्या क्या सीख रहे हैं और सीख सकते हैं, यह तुमसे कहना चाहता हूँ| पीछली बार के पत्र में जो कहा था, उसे जोड़ कर आगे कहना चाहता हूँ|
 

बच्चों को ईश्वर द्वारा भेजे गए फूल क्यों कहते हैं, इसकी प्रतिति तुम्हे देखते समय आती है| शुद्धता क्या होती है, शान्ति- सन्तोष क्या होता है, यह तुम्हे देखते हुए पता चलता है| अब इसे शब्दों में कैसे कहूँ? तुम्हारे पहले मैने ज्यादा बच्चों को इतना करीब से देखा नही था| पर मुझे लगता है जो चैतन्य तुममें‌ है, जो प्रगाढ़ शान्ति है, वे सभी में होती है| अदू, मुझे याद है पीछले साल दिवाली के समय तुम पटाखों की आवाज सुनने जितनी बड़ी हो गई थी| पहली दिवाली को तो तुम बहुत छोटी गुडिया थी! इसकी वजह से तुम्हारे कान में रुई‌ डाली थी| लेकीन पीछली दिवाली के समय तुम ठीक से पटाखों की आवाज सुन पाई| और तुम भी उन्हे सरलता से सुनती थी| तुम्हे जैसे डर का पता ही ना हो| जिसके बारे में सम्भवत: छोटे बच्चे डरते है; उसे तो वो चाहिए होता है| फिर वह कोई जानवर होगा, अन्धेरा होगा या भूभू (कुत्ता) होगा! पटाखों के फूटने पर डरने के बजाय तुम मुस्कुराती थी! धुडूम! तुम्हारी यह सहजता मुझे सम्मोहित करती है अदू!
 

 

हमेशा देखा है कि तुम्हारे मन में सामने होनेवाली चीजों के बारे में एक सकारात्मक ओपननेस होता है| बहुत ही कम बार तुम किसी चीज़ को देख कर नही कहती हो या रोती हो| दुनिया की तरफ किस स्वस्थ दृष्टि से देखना चाहिए, यह तुमसे सीखना चाहिए| अगर कोई कुत्ता भौंक रहा हो या अचानक बिजली चली गई हो, तो भी तुम उतनी ही‌ प्रसन्न होती हो! प्रसन्नता यही तुम्हारा वास्तविक नाम होना चाहिए! अदू, मेरे लिए यह शब्दों में लिख पाना कठिन है| पर प्रयास करता हूँ| पीछले जन्म दिन के पश्चात् लगातार कुछ दिनों तक तुम्हारी सेहत स्वस्थ नही थी| चार- पाँच दिन तो तुम बहुत ही वीक हो गई थी| दिन भर सब तरफ भागदौड़ और शोरगुल करनेवाली तुम एकदम कमजोर हो गई, तुम्हारी किलकारियों की गूँज भी रूक गई थी| बाहर चलिए ना, कहनेवाली तुम बिल्कुल शान्त हो कर दिनभर सोती थी| उस समय चाहे तुम्हारा बोलना- हंसना कम हुआ हो, लेकीन फिर भी तुम्हारे चेहरे की मुस्कान कायम थी| उस समय भी भाई की तरफ देख कर तुम मुस्कुराती थी|


अदू, मुझे लगता है कि तुम्हारी प्रसन्नता अकारण है, इसलिए बाहर कुछ भी हो, तुम्हारा मन प्रसन्न ही रहता था और अब भी वैसा ही है| हमारी नजर में जहाँ खुशी की कोई किरण नही होती है, वहाँ भी तुम मुस्कुराती रहती हो| मुझे याद आता है, तुम जब बहुत छोटी थी, तब तुम साँप जैसे रेंगते रेंगते दूसरे कमरे में आती थी और मुझे ढूँढती थी| और मै दिखने पर कितना मुस्कुराती थी! कैसे प्यार करें, यह तुमसे सीखना चाहिए| पीछले साल में अनगिनत बार तुमने इस तरह ऊर्जा दी है| आज इन चीजों पर गौर करते हुए एक अर्थ में बहुत पश्चात्ताप होता है| अन्दर से तकलीफ होती है| तुम इतनी प्रसन्न, शान्त और आनन्दमय होते हुए भी हम हमारी सारी चिन्ताएँ, हमारे अनगिनत टेन्शन्स और जीवन के सभी प्रेशर्स- सब कुछ रबिश ले कर तुम्हारे तरफ जाते थे| कई बार तो तुमसे दूर जाना पड़ता था| और हर रोज के कामों में तुम्हे मनचाहा समय भी नही दे सकते हैं| हम मन में इतने तनाव लिए हुए होने पर भी तुमने कभी भी शिकायत नही की| को- ऑपरेटीव यह कोई उचित शब्द नही है, पर तुम बहुत को- ऑपरेट करती हो| एक बार तुम्हे बताने पर तुम समझ लेती हो| इसीलिए तुम्हे नानी के पास छोड़ कर हम दिनभर दूर जा सकते है, या युं कहना चाहिए कि तुम हमें जाने देती हो| इतना तुम्हारा मन बड़ा है; इतनी शान्ति तुम्हारे पास है| हमें बाय करते समय तुम्हे तकलीफ तो होती ही है| वह स्वाभाविक है| पर दूसरे पल तुम प्रसन्न चित्त होती हो|‌ चीज़ें जैसी हो, उन्हे उसी तरह से कैसे स्वीकारें, यह कला हमे भी सीखाओ ना! पीज अदू!

जीवन के संघर्ष, अनगिनत शोरगुल, मन के अनगिनत तनाव, विकार आदि से झुझने पर भी तुम्हे मिलने के बाद एक पल में वह सब कुछ भुलाया जाता है| अदू, हम जब छोटे थे, तब कॉमिक्स में पढ़ते थे कि कुछ ऐसे विलैन होते थे जिन पर वार करने पर वे अदृश्य या ट्रान्समिट हो जाते थे| उसी तरह हमारे मन के विकार और तनाव तुम्हे मिलते समय अदृश्य हो जाते है! ऐसा तुम्हारा पारस स्पर्श है कि लोहा होने के बावजूद उसका भी सोना होता है! तुमसे मिलने पर तुम्हे होनेवाला हर्ष, तुम्हारा खुशी से झूमना और भागना!! Really, child is the father of man. जैसे मैने पीछले पत्र में कहा था, हम तुम्हारे जितने लाड़- प्यार करते होंगे, उससे बहुत ज्यादा तुम ही हमें करती हो| तुममें होनेवाली अखण्ड प्रसन्नता और ऊर्जा! 

पालक कैसे होना चाहिए, यह तुम ही मुझे सीखा रही हो| अदू, मुझे याद आता है, जब मैने अकेले तुम्हे संभालना सीखा, तब शुरू में मुझे बहुत टेंशन था| मै वास्तव में घण्टे घण्टे का प्लैन करता था- तुम्हे पाँच मिनिट खिलौना दूंगा, दस मिनिट गैलरी में ले कर खड़ा रहूँगा, दस मिनिट खिड़की से सड़क दिखाऊँगा, पन्द्रह मिनिट घूमने ले जाऊंगा ऐसे! लेकीन तुमने उंगली थामी और एक एक चीज़ इस तरह सीखाई की सब कुछ आसान होता गया| मेरे बहुत से डर तुमने झूठे सिद्ध किए| पहले तुम्हे लेकर खिड़की या रेलिंग के पास खड़े रहने में मुझे बहुत डर लगता था| लेकीन तुमने सब कुछ आसान बना दिया| तुम्हारे कारण एक तरह का अनुशासन सीखना पड़ा और आगे भी सीखना होगा| क्यों कि तुम प्रकाशमान लौं जैसी तेजस्वी हो, वहाँ अन्धेरा ठहर ही नही सकता है| जहाँ तुम खेलती हो- बैठती हो, वहाँ तुम्हे ऐसी चीजें देनी होगी जिससे तुम्हे रोकनी की जरूरत ही नही हो| ‘यह करो,’; ‘यह मत करो' ऐसा किसी भी प्रकार से न बताते हुए तुम्हे मुक्त तरीके से खेलने देने की अरेंजमेंट करनी चाहिए| यह दृष्टि ही तुमने दी| और हमने तुम्हे जो भी कहा, तुमने कभी भी नही टाला| अदू, आज भी तुम्हारी आवाज उतनी ही‌ प्यारी और इनोसंट होती है, तुम आसानी से कहती हो- मै कुर्सी पर बैठूं? तेदी लाऊं? एक बार तुम्हे समझाने के बाद और तुम्हारी उस पर की स्वाभाविक प्रतिक्रिया आ जाने के बाद कभी भी तुमने किसी भी चीज़ के बारे में शिकायत नही की| वाकई, “इस क्षण में कैसे जीना चाहिए", यही तुमने दिखाया|


अर्थात् अब समाज में और जीवन के ढाँचे में आनेवाली चीजें तो आती हैं| कई बार वे अपरिहार्य भी होती हैं| समाज में रहते समय कई चीजें सीखनी होती है| इस कारण ऐसे अवसर पर तुम्हे रोकना और कई बार मना करना भी अपरिहार्य है| और तुम इतनी शार्प हो, इतनी तेज़ हो, कि जिससे तुम्हे अलग सीखाने या समझाने के बजाय तुम हमारे बर्ताव से ही बहुत कुछ लेती हो| जब हमारा कहा हुआ ही तुम कहती हो, तब तो हमें तुम्हे 'ऐसा मत कहो,’ कहना पड़ता है| जैसे हम ही तुम्हारे सामने "चूपचाप बैठो,” कहते हैं और बाद में तुम भी हमें वही सुनाती हो| उस समय हमे तुमसे कहते है कि ऐसा तो नही कहना चाहिए| यह एक उदाहरण है कि किस तरह खुली हुई सोच सिमट जाती है| जब तुम हवाई जहाज़ की आवाज सुनती हो तो चिल्लाती हो कि हवाई जहाज आया! उत्तेजित होती हो| लेकीन तुरन्त बाहर देखे बिना तुम ही कहती हो कि वह तो दिखता ही नही, बादलों में हैं! अदू . . .

अद्विका- अदू, स्वरा, गोड, साखर, छकुली, मनुली, पिकू ऐसे तुम्हारे कितने कुछ नाम है! जब तुम नन्ही सी थी, तब मुझे निन्ना कहती थी! कितनी मिठी आवाज में मुझे पुकारती थी, निन्ना! और अब निन्जन कहती हो| छोटे बच्चों को जन्म से ही‌ हर चीज़ में होनेवाला चैतन्य दिखाई देता है! तुम्हे भी वह दिखता है| इसलिए तुम्हे 'डरावने' खूंखार कुत्ते से भी डर नही लगता है| भौंकनेवाले डरावने कुत्ते के पास जा कर भी कितने प्यार से तुम उससे बात कर सकती हो! अदू, अच्छा शिक्षक वह होता है जो छात्रों की भी सही पहचान करा देता है और खुद को भी उनके सामने खोल देता है, खुद की भी पहचान करा देता है| इसी तरह तुम एक एक चीज़ें सिखाती हो जिसे पालक बनने का शास्त्र ही कहना चाहिए! शुरू में बहोत सी छोटी चीजें भी मुश्कील लगती थी| तुम्हे संभालते समय अगर तुम रोई, तो मै क्या करूं, ऐसा सवाल मन में आता था| पर अब बहुत आसानी से तुमने मुझे सीखाया कि क्या करना है| वही चीज़ है तुम्हारी पॉट्टी साफ करने की| लर्निंग बाय डूईंग! और यह करते समय हमेशा तुम साथ होती हो, तुम्हारी मुलायम पुकार होती है- ‘निन्ना!’ हमेशा तुम जिसकी बौछार करती हो, वह प्यार और अपनापन होता है. .
 

अदू! कई चीजें आँखों के सामने आती है| एक कार्यक्रम में तुम्हारा खिलना- हंसना और दौड़ना! और जब यह बच्ची दौड़ कर थक गई, तो वो रेंगनेवाली छोटी नन्ही परी हो गई! या एक टोपी पहनने के बाद तुम्हारा और भी छोटी बेबी जैसा दिखना! तुम्हे जब पहली बार मोटर साईकिल पर ले गया, तब का अनुभव! हर बार तुम्हारा खुशी से भर जाना! तुम्हे संभलते समय शुरु के दिनों में बहुत टेंशन होता था| जल्द ही तुमने हर एक चीज़ मुझे सीखाई| निन्जन, पानी दो, निन्जन बाहार चलें . . .
 

अदू, दो बार तुम बहुत बीमार हुई थी| उस समय भी तुम गोद में लेटते हुए कहती थी कि कौनसा गाना सुनना चाहती हो| दादी को गाना कहने के लिए कहती थी| बीमार होने के बावजूद भी कभी भी तुम लगातार रोती नही रही| हर समय तुम्हारी शान्ति कायम रहती थी| कड़वी दवा लेते समय भी तुम बहुत सहज होती हो| तुम उसे फैंक नही देती हो| या उससे रोती भी नही हो| इंजेक्शन भी हो, तुम सिर्फ एक मिनिट रोती थी| उसके बाद तुरन्त शान्ति और चेहरे पर मुस्कान! दादा के साथ और सबके साथ हमेशा तुम खेलती हो| तुम्हे लोग पसन्द आते हैं| और अदू, उस दिन तुमने जब घोषणा ही कर दी- "माँ, मुझे स्कूल जाना है!" मुझे बहुत ही अचरज हुआ!
अदू, तुम्हे कई बार हमारे कारण बहुत दूर दूर तक यात्राएँ करनी पड़ी| कई बार दिनों दिनों तक मम्मी से दूर रहना पड़ा| पर कभी भी तुमने शिकायत की नही| मन में आनेवाली प्रतिक्रिया कहने के बाद तुम हमेशा शान्त रह कर मुस्कुराती हो! मुझे याद है- घर में दु:खद घटना घटी थी, घर शोकमग्न था| पर सिर्फ तुम्हारी उपस्थिति के कारण ही वह वातावरण सहन किया जा सका| सब लोग बहुत दु:खमग्न थे, लेकीन तुम्हारी उपस्थिति मुस्कुराहट ले ही आई|
 

अदू, तुम्हारे साथ ट्रेकिंग करने में भी बड़ा मज़ा आता है! सड़क पर आनेवाली मज़ेदार चीज़ें तुम बहुत एंजॉय करती हो| कुत्ते, पंछी, तितली, पेड़, पहाड़, किड़े, घास, गाडियाँ, चाँद, तारे! और जम तुम्हे ले जाते समय मुझे पसीना आता है, तब कहती हो कि मै पोछ देती हूँ! और अक्सर कहती हो, नीचे छोड़ो, मै चलूँगी! चलाओ ना, चलाओ ना! मम्मी के साथ हिमालय में घूमते समय भी तुम कहती हो, नीचे छोड़ो, चलाओ ना| पास- पडौस के परिसर से तुम्हारा रिश्ता बिल्कुल पक्का है| चाहे वे खिलौने होंगे, कागज़ का टुकड़ा हो या तुम्हारा तेडी (टेडी बीअर) हो! तुम हम पर भी‌ उतना ही प्यार करती हो| हर एक में तुम्हे वही चैतन्य नजर आता है|
 

और छोटी चीज़ों में तुम्हे तो बहुत आनन्द आता है| पास से गुजरनेवाले जेसीबी का आवाज आने पर तुम दौड़ी चली आती हो! उसकी घर्र घर्र आवाज तुम्हे दूर से ही पता चलती है और तुम दौड़ी आती हो! फिर हम खिड़की में जा कर जेसीबी देखते हैं| जैसे ही‌ वह पास से गुजरता है, तुम उसे देख कर मुस्कुराती हो| धीरे धीरे वह आगे बढ़ता है| उसमें अक्सर गाना भी लगा हुआ होता है| (एक बार तो क्या कहूं मेरे बचपन का पसन्दीदा गाना लगा था- घूंघट की आड से! उस समय मैने जो महसूस किया, वो कह नही सकता . . !) और जेसीबी जाने तक तुम टकटकी लगा कर देखती रहती हो| अदू, तुम इतनी निष्पाप हो कि तुम्हे भौंकनेवाले कुत्तों से भी तकलीफ होती है| हमने रोने की सिर्फ एक्टींग भी की, तो तुम्हे सच में रोना आता है| खिलौनों में भी तुम्हे वही चैतन्य नजर आता है| तुम बताती हो, खिलौने को नीन्द आ रही है| फिर उसे गोद में ले कर तुम सुलाती हो! बाहर जाते समय तुम अक्सर कहती हो, मत जाओ, मत जाओ ना! इतना तुम्हारा प्यार है . . . जब टीवी पर सैराट का गाना लगता है, तब तुम फुदकती फुदकती नाचने लगती हो! जिंग जिंग कह के खुशी से झूम उठती हो! और मुझे उठा कर लेने के लिए कहती हो और हम साथ नाचते हैं! छोटी छोटी चीज़ों में इतना बड़ा चैतन्य देखने की सूक्ष्मदर्शी जैसी सूक्ष्म दृष्टि हमें तुमसे कैसे मिले, यह बड़ा प्रश्न है|
 

यह दृष्टि वैसे तो बहुत सीधी और वैसे बहुत कठीन भी है| क्यों कि हम वे ही चीजें देख सकते हैं जिनके लिए हमारी आंखों की खिडकियाँ खुली हुईं होती हैं और हमारी परिस्थिति उसके लिए अनुकूल होती है| अदू, तुम्हारा साथ मिलने के पहले मै छोटे बच्चों में होनेवाला चैतन्य इतना नही देख पाता था| जीवन के हर एक मोड़ पर हमारी दृष्टि अलग अलग होती है| हम जीवन के क्रम में जहाँ होते हैं, वहाँ से अगले पड़ाव के दृश्य हम देख सकते हैं| हमारी जो वासनाएँ होंगी, बलवान आवेग जिस तरह के होंगे, उस तरह हमारी दृष्टि होती है| एक ही बगीचे में अगर एक वैज्ञानिक और कवि साथ साथ जाते हैं, तो वे बिल्कुल ही अलग किस्म की चीजें देखेंगे| और यह भी होता है कि हम वही देखते हैं जिसे देखने की हमें इच्छा होती है| और जो देखने की हमारी इच्छा नही होती है, उसे हम देख नही पाते हैं| पर अदू, तुम्हारे साथ जीवन में पहले कभी भी जो नही देखा था, वह बहुत बड़ा दालन अब दिखाई देने लगा है! अनक्लटर्ड माइंड क्या होता है, शुद्ध ऊर्जा क्या होती है, यह देखने का मौका मिला है. . .
 

अदू, तुम्हारे प्यार और ममता से इतना भर जाता हूँ कि वास्तव में नतमस्तक होता हूँ| खाते समय तुम हमेशा एक निवाला हमें देती ही हो| इतनी तुम्हारी ममता है| इतनी आत्मीयता है| सिर्फ नतमस्तक होता हूँ| फिर समझ आता है कि तुम ही हमारी पालक हो, हमारी मार्गदर्शक हो| इसके बदले में तो कुछ भी नही किया जा सकता| और वह पात्रता अर्जित करना भी कठीन है| वह निर्दोष दृष्टि, वह शुद्ध और वर्तमान में होनेवाला मन! इसे कैसे ला सकता हूँ! इतनी अद्भुत सरलता! वाकई तुम्हारे खिलौने भी तुम्हारे लिए जीवित होते हैं| तुम इतनी निर्मल- निष्पाप हो, लेकीन मेरे मन में तो वासनाएँ और विकारों का घना जाल| तुम्हे तो हर चीज़ में चैतन्य नजर आता है, पर मुझे तो हर चीज़ में दोष नजर आता है| तुम्हारे पास हर एक चीज़ के लिए स्वीकृति है, तो मुझे हर चीज़ में कुछ अखरता है!
अदू, तुम्हारी बुद्धी इतनी तेज़ है कि तुम्हे हर चीज याद रहती है| जहाँ से हम वडा पाव लाते हैं, वहीं से जाते समय तुम अक्सर पूछती हो, वदा पाव लाओगे? गाना सुनते समय अपने आप तुम्हारे हाथ भी दाद देते हैं| तुम्हारे सारे बाल- गीत तुम्हे याद है और तुम्हारे कारण घर में सभी को भी! तुम लोगों को भी ऐसा ही याद रखती हो! और तुम मुझसे बहुत ज्यादा सोशल हो, इसकी सभी लोग सराहना करते हैं! मोबाईल में रिंगटोन के तौर पर कभी पहले लगाया हुआ गाना अचानक से बजा, तो भी तुम तुरन्त पहचानती हो और कहती हो- फोन आयी! गण बाप्पा के सामने से जाते समय तुम ही मुझे कहती हो, ‘जय बाप्पा करो!’ तुम इतनी तेज़ हो कि हम तुम्हारे सामने जो बोलते हैं, तुम्हे जो एक बार बताते हैं वो तुम पूरा याद रखती हो| इस कारण हमें जिम्मेदारी के साथ तुम्हारे सामने बोलना चाहिए| उतनी सजगता रखनी चाहिए|
 

विपश्यना साधना करते समय शुरू में मन के सब विकार उपर आ जाते हैं और अटके गटर में जैसे दुध की बून्द गिरी हो, उस तरह मन के दोषों की पृष्ठभूमि में जैसे सजगता का बिन्दू दिखाई देता है| लेकीन साथ ही वह उस गटर को मूल रूप में भी दर्शाता है| इसी तरह तुम्हारे साथ मन में होनेवाले अनगिनत विकार वाकई में महसूस होते हैं और वे विकार हैं, इसका पता चलता है| ऐसा इसलिए क्यों कि हमें‌ चीजों में फर्क समझने के लिए काँट्रैस्ट आवश्यक होता है| ब्लैकबोर्ड पर काले चॉक से लिखा तो उसे पढ़ा नही जा सकता है| ब्लैकबोर्ड पर लिखने के लिए सफेद चॉक ही आवश्यक होता है! तुम्हारा साथ होना इस सफेद चॉक जैसा है! मन में होनेवाले अनगिनत विकार तुम्हारी शुभ्रता में वास्तविक रूप से दिखने लगते हैं . . .
 

और ये विकार, ये तनाव और मन की अशान्ति और ये दोष सिर्फ दिखना काफी नही है| अखण्ड सजगता यह बिल्कुल अलग चीज़ हैं| विचारों के स्तर पर हम सब समझ रहे होते हैं| लेकीन उस पर वास्तविक अमल नही कर सकते हैं| हम अक्सर कहते हैं कि क्रोध बुरा होता है या क्रोध निरर्थक है| लेकीन ठीक समय पर क्रोध हमें अपने कब्जे में कर ही लेता है| अदू, एक कहानी तुम्हे कहता हूँ| बड़ी होने पर तुम उसे समझ पाओगी| एक गाँव में एक पुजारी रहता था| सबको लगता था कि वह बड़ा धार्मिक आदमी है| दिन रात वह उसके घर के सामने के मन्दीर में बालाजी इस देवता का जाप करता था| भोर में तीन घण्टे और शाम को तीन घण्टे उसका यह जाप और भजन बड़े शोरगुल के साथ चलता था| पास पडौस के लोगों को उससे बहुत तकलीफ होती थी| पर ईश्वर का भजन है, इसलिए कोई कुछ नही कहता था| उसके पास ही एक युवक रहता था| वह इस आदमी को जानता था| उसका वास्तविक नाम किसी को भी पता नही था, लेकीन वह बालाजी की अविरत उपासना करता था, इसलिए सभी लोग उसे बालाजी ही कहते थे| एक बार उस युवक ने तय किया कि उस आदमी को एक पाठ पढ़ा कर ही रहेगा| उसने कुछ दोस्तों को इकठ्ठा किया और उन्हे कुछ बताया| 

बालाजी के घर के सामने एक छोटा कुआ था| बालाजी रात में आंगन में ही खाट पर लेटा था| उस युवक ने देर रात दोस्तों को इकठ्ठा किया|‌ उन्होने बालाजी को खाट सहित चूपचाप उठाया और धीरे से उठा कर कुए के पास रख दिया| बालाजी नीन्द में ही था| फिर वे लोग कुछ दूरी पर जा कर रूके और उन्होने एक पत्थर फैंक कर बालाजी को जगा दिया| जिस क्षण वह जग गया, उसने कुआ देखा और जोर से दहाड़ मारी! उसकी चीख़ सुन कर आसपास के लोग जग गए! वह डर के मारे काँप रह था| तब वह युवक सामने आया और उसने बालाजी को पूछा, अब बताईए, आपने चीख क्यों मारी? आपको आपका बालाजी याद नही आया? आप उसकी इतनी भक्ति करते हैं, तो तुम्हे वह क्यों याद नही आया और डर ही क्यों लगा? बालाजी पहले तो बड़ा नाराज हुआ, लेकीन फिर शर्मिन्दा हुआ| हर रोज चिल्ला चिल्ला कर किया हुआ जाप भी मेरे मन में गहरे में नही जाता है और वहाँ का डर जस का तस रहता है, यह उसके समझ में आया| इसके बाद एक औपचारिकता जैसा किया जानेवाला उसका जाप उसने बन्द ही किया! और कुछ समय के बादतो वह बिल्कुल अलग इन्सान बन गया!
 

इस कारण से विचार और बुद्धी के स्तर पर ऐसी चीज़ों के बारे में सजग होना आसान है; लेकीन अन्तर्मन की गहराईयों में वह सजगता रखना बहुत कठीन है| और उसके लिए अविरत साधना और अविरत रिमाइंडर आवश्यक है| तभी यह सजगता गहरी जा सकेगी और किसी भी कठीन प्रसंग में- जागते हुए या नीन्द में भी- वह टिक सकेगी| अदू, तुम्हारी शुद्धता- तुम्हारी शुभ्रता आज है उसे वैसे ही बनाए रखना, उस पर कोई भी दाग़ या अन्धेरा न आने देना और निसर्ग ने तुम्हे हमे जिस शुद्ध स्वरूप में दिया है, उसे आगे भी सुरक्षित रखना, यह हमारी सच्ची जिम्मेदारी है| हालांकी कहते हैं ना कि प्रकृति में हर कोई मूल रूप से शुद्ध ही होता है, जन्म के समय शुद्ध ही होता है| लेकीन आगे बढ़ते हुए प्रकृति द्वारा दिया गया शुद्ध वस्त्र गन्दगी से मैला हो जाता है| प्राकृतिक नही, लेकीन यह सामाजिक नियम जैसी ही बात है| कोई विरले कबीर होते हैं जो अपना मूल स्वरूप प्राप्त करते हैं और कहते हैं 'ज्यों की त्यों धर दिनी चदरिया!' प्रकृति ने जो मूल स्वरूप दिया था, उसे वे कष्ट और साधना से फिर प्राप्त करते हैं| पर अदू, तुम्हारे कारण एक 'आशा' हमें मिली है कि जैसा तुम्हारा शुद्ध स्वरूप है, वैसा हमारा भी कभी था| आज उस पर धूल और मैल की कई पर्तें चढ़ी हुई है और गटर बहुत जाम हो गया है, लेकीन एक समय शुद्ध स्वरूप था, यह आज भी याद आता है| बचपन की धुन्धली यादें आज भी कहती हैं कि एक समय मुझे भी हर चीज़ में यही चैतन्य नजर आता था| अदू, तुम्हारे साथ होते हुए वह निर्मल दृष्टि हमें जरूर मिल सके, इतना आशीर्वाद तुम हमें जरूर देना. . .

इनको किसी से बैर नहीं
इनके लिए कोई गैर नहीं
इनका भोलापन मिलता
है सबको बांह पसारे
बच्चे मन के सच्चे. .  
सारी जग के आँख के तारे. .

धन्यवाद! 



Saturday, March 21, 2020

ओशो सम्बोधि दिन...

21 मार्च 1953 सद्गुरू ओशो का संबोधि दिन है...
 
"संबोधि दिवस पर आपका संदेश क्या है?"

आनंदित होओ। आनंद बांटो। और जो आनंदित है वही आनंद बांट सकता है, स्मरण रखो। दुखी दुख ही बांट सकता है। हम वही बांट सकते हैं जो हम हैं। जो हम नहीं हैं, उसे हम चाहें तो भी नहीं बांट सकते। इसलिए तो इस दुनिया में लोग ऐसा नहीं है कि दूसरों को सुख नहीं देना चाहते। कौन मां-बाप अपने बच्चों को दुख देना चाहता है! कौन पति अपनी पत्नी को दुख देना चाहता है! कौन पत्नी अपने पति को दुख देना चाहती है! कौन बच्चे अपने मां-बाप को दुख देना चाहते हैं!* *नहीं; लेकिन तुम्हारी चाह का सवाल नहीं है। दुख ही फलित होता है। नीम लाख चाहे कि उसमें मीठे आम लगें और कांटे लाख चाहें कि गुलाब के फूल हो जाएं, चाहने से क्या होगा? मात्र चाहने से कुछ भी न होगा। तो तुम चाहते हो कि लोगों को आनंदित करो, लेकिन कर तुम पाते हो केवल दुखी। चाहते तो हो कि पृथ्वी स्वर्ग बन जाए, लेकिन बनती जाती है रोज-रोज नरक।

इसलिए मैं तुमसे कहना चाहता हूं, यह मेरा संदेश है: इसके पहले कि तुम किसी और को आनंद देने जाओ, तुम्हें अपने भीतर आनंद की बांसुरी बजानी पड़ेगी, आनंद का झरना तुम्हारे भीतर पहले फूटना चाहिए। मैं तुम्हें स्वार्थी बनाना चाहता हूं।

Sunday, December 29, 2019

साईकिल कैसे चलाएं?

नमस्कार!

कई मित्र अक्सर बताते हैं कि उन्हे साईकिल चलानी है| कैसे चलानी है, यह भी पूछते हैं| उनके लिए यह एक लिख रहा हूँ| इसे कोई नियम नही समझा जाना चाहिए| ये सिर्फ मेरे अनुभव हैं| साईकिलिंग सीखते सीखते मैने जो अनुभव किया, उसके आधार पर आपसे यह बोलना चाहता हूँ| साईकिल चलाने में सबसे पहले बात आती है साईकिल की| लोग पूछते हैं कौनसी साईकिल चलानी चाहिए? इसका उत्तर अलग अलग हो सकता है| हर तरह की साईकिल बाज़ार में मिलती है| इसलिए पहले यह देखना चाहिए कि, हम कितनी चलानी चाहते हैं, किस प्रकार चलाना चाहते हैं| शहर में ही बस १०- १५ किलोमीटर तक ही चलाना चाहते हैं या ५० किलोमीटर और उसके आगे चलाना चाहते हैं| लोग अक्सर नई साईकिल की तरफ आकर्षित होते हैं| लेकीन ऐसे भी बहुत हैं जिन्होने बहुत महंगी साईकिलें खरीदी हैं और वे सब वैसी ही पड़ी हैं| इसलिए मेरा एक सुझाव रहता है कि शुरु में जो साईकिल मिलती हो, घर में हो, पडौसी के पास हो, जो भी उपलब्ध हो, उसे चलाना शुरू कीजिए| कम से कम एक महिने तक यह साईकिल चला कर देखिए कि आपको कितना मज़ा आता है| फिर आपकी जो रुचि होगी, आपको जितना मज़ा आएगा, उससे आप यह तय कर सकते हैं कि आपको कौनसी साईकिल चाहिए| और जब मैने एटलस साईकिल पर ५०० किलोमीटर का टूअर किया, तब से मै जानता हूँ कि साईकिल कोई भी हो, साईकिल के बजाय साईकिलिंग ज्यादा बड़ा होता है‌| साईकिल से साईकिल चलाना बढ़ कर होता है| साईकिल कौनसी भी हो, उसे चलाईए तो!

तो फिर शुरुआत कैसे करें? उसके लिए आपके फिटनेस के हिसाब से, आपकी सेहत के हिसाब से देखना होगा| जहाँ तक आप बहुत आसानी से साईकिल चला सकते हैं, चलाईए और शुरू कीजिए| किन किन लोगों के लिए यह आसानी सिर्फ दो- चार किलोमीटर तक होगी| कुछ लोग पहले दिन से १० किलोमीटर की राईड कर सकेंगे| जो भी आपके लिए आसान हो, उतनी दूरी तक साईकिल चलाईए| एकदम बहुत ज्यादा चलाने की जिद मत कीजिए| साईकिल या कोई भी व्यायाम हो, उसमें 'एकदम अचानक बहुत ज्यादा' कभी नही करना चाहिए और 'सहज- आसान' जो होगा, जहाँ तक होगा, उसे ही करते रहना चाहिए| अपने आप धीरे धीरे, ‘सहज- आसन' ही बहुत ज्यादा हो जाता है| और साईकिल चलाने के पहले और बाद में स्ट्रेचिंग करना चाहिए| स्ट्रेचिंग से पाँव के मसल्स ढिले हो जाते हैं, हल्के हो जाते हैं| जिससे बाद में पैर नही दुखते हैं| साईकिल चलाने के पहले और बाद में स्ट्रेचिंग और जहाँ सम्भव हो, वॉकिंग भी करना चाहिए| वॉकिंग भी‌ एक बहुत सुन्दर लेकीन unglamorous व्यायाम है| साईकिल के साथ वॉकिंग हो तो साईकिलिंग आगे बढ़ाने में आसानी होगी| और साईकिल चलाते समय आप आपकी राईड strava app पर रेकॉर्ड कर सकते हैं| इस app पर आपके मित्र साईकिलिस्ट या रनर भी मिल सकते हैं| App के इस्तेमाल से हमें सही समय, दूरी, स्पीड आदि का पता चलता है और हम प्रगति साफ देख सकते हैं|





















और जब आपको साईकिलिंग अच्छा लगने लगेगा, २० किलोमीटर से भी आगे साईकिल चलाने में मज़ा आने लगेगा, तब आप दूसरी साईकिल के बारे में सोच सकते हैं| सिंगल गेअर में भी फायरफॉक्स फिक्सी, बीएसए फोटॉन ऐसी अच्छी साईकिलें मिलती हैं| अगर आपको किसी चढाई के रास्ते पर साईकिल चलानी है या छोटे हिल रोड पर साईकिल चलानी है, तो आप गेअरवाली साईकिल ले सकते है‌ं| मार्केट में गेअर की साईकिलें लगभग आठ हजार रूपए के दाम से आगे मिलती हैं| आप उन्हे सेकंड हैंड भी खरीद सकते हैं| अगर आपके पास पहाड़ी या चढ़ाईवाली सड़क नही है, तो आपको गेअर के साईकिल की आवश्यकता नही है| लेकीन अगर आप गेअरवाली साईकिल लेना चाहते हैं, तो उसके बारे में भी बताता हूँ|

Wednesday, December 11, 2019

ओशो जयंती पर सद्गुरू नमन. . .

रुकी रुकी थी ज़िंदगी
झट से चल पड़ी
हुई खुशी से दोस्ती
मज़ा ले ले हर घड़ी

एक पल में सब कुछ मिल गया
सामने मंज़िल खड़ी...

...उसके सिवा कुछ याद नहीं
उसके सिवा कोई बात नहीं
उन ज़ुल्फो की छवो में
उन गहरी निगाहों में
उन क़ातिल अदाओं में
हुआ हुआ हुआ मैं मस्त
उसका नशा मै क्या कहूँ..
हर लम्हा मैं मस्त हूँ
वो दौडे है नस नस में
वो दौडे है रग रग में
अब कुछ न मेरे बस में
हुआ हुआ हुआ मैं मस्त..




इसी से जुड़े मेरे अन्य ब्लॉग: मेरे प्रिय आत्मन् और ओशो: एक आंकलन

Wednesday, October 23, 2019

फिट रहेंगे!!


नमस्कार. आपके साथ मेरी एक नई पहल के बारे में शेअर करना चाहता हूँ|

क्या आपको लगता हैं कि आप फिट हैं और आपको और फिट होना है?

क्या आपको लगता है कि आपने व्यायाम करना चाहिए?

क्या आपको स्वस्थ जीवनशैलि अपनानी है?

और यह सब करते समय आपको कुछ दिक्कतें आती हैं, कुछ प्रश्न आते हैं?

अगर हाँ, तो आपके लिए मै लाया हूँ एक सुन्दर कल्पना| अधिक फिट, अधिक स्वस्थ एवम् सकारात्मक जीवनशैलि की तरफ जाने के लिए एक राहगीर है| अगर आपकी पूरे मन के साथ इच्छा है, तो आपको स्वयं की सहायता करने में मै आपकी सहायता कर सकता हूँ| अगर आपको लगता है कि आपको अधिक फिट, अधिक एक्टीव्ह होना है, तो आपके लिए यह कैसे सम्भव है, इसको ले कर मै आपका साथ दे सकता हूँ|

(पोस्ट का लेखक साईकिलिस्ट, मॅरेथॉनर और योग ध्यान प्रेमी है| कई साईकिल याताएँ, ट्रेकिंग, योग, ध्यान इसके अनुभव ब्लॉग पर उपलब्ध हैं- www.niranjan-vichar.blogspot.in)

शायद आपको लगता होगा कि स्वयं में ऐसा परिवर्तन लाना बहुत कठिन है, समय नही है, फुरसत नही है, कई बन्धन हैं| पर मै आपसे कहना चाहूँगा कि इन सबके बावजूद यह सम्भव है| इसके लिए मेरे पास एक संकल्पना है| आप और आपके साथ होनेवाले आपके मित्र- करीबी इन सबको खुद की सहायता करने के लिए मै सहायता करूँगा| आपका रूटीन, आपका दिनक्रम, आपकी आदतें, आपकी पसन्द, आपने पहले किए हुए व्यायाम इन सबको सामने रख कर मै आपको ऐसा व्यायाम प्रकार बताऊँगा जो आप हफ्ते में पाँच दिन तो जरूर कर सकेंगे| आपके लिए मै उस व्यायाम की एक समय सारणी बनाऊँगा और हर हफ्ते में आप कितने घण्टे एक्टीव्ह हैं, इस पर ध्यान रखूँगा| आप और आपके साथ होनेवाले अन्य लोग इनका हम एक ग्रूप बनाएँगे|‌ इस ग्रूप में मेरे सहित हर कोई हर रोज अपना फिटनेस अपडेट देता रहेगा| तीन महिनों तक मै आपके हर रोज के और हर हफ्ते के फिटनेस घण्टों का रिकार्ड रखूँगा| यदि कभी आप यात्रा कर रहे होंगे, कभी बिजी होंगे, तो उस समय भी आप कौनसे व्यायाम कर सकते हैं, यह भी आपको कहूँगा| आपको यदि दूसरा कुछ व्यायाम करना हो, तो किस तरह से वह किया जा सकता है, यह भी आपसे कहूँगा|

Monday, October 14, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ११ (अन्तिम): इस यात्रा का विहंगावलोकन

११ (अन्तिम): इस यात्रा का विहंगावलोकन
 

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७ अगस्त की सुबह बससे लोसर से निकला और शाम को मनाली पहुँचा| वास्तव में इस पूरी यात्रा का यह हिस्सा ही सबसे अधिक डरावना और रोचक भी लगा| बहुत ज्यादा बरफ भी‌ करीब से देखने का मौका मिला| अब बात करता हूँ इस पूरी यात्रा के रिलेवन्स की| पहले साईकिल से जुड़े पहलूओं के बारे में बात करता हूँ| सामाजिक विषयओं को लेकर इसके पहले भी मैने कुछ साईकिल यात्राएँ की हैं| लेकीन इस बार विशेष यह रहा कि पहली बार मेरी साईकिल यात्रा के लिए कई संस्थाएँ और लोग भी सामने आए| एक तरह की स्पॉन्सरशिप मुझे मिली| जैसा मैने पहले लेख में कहा था, स्पॉन्सरशिप एक आंशिक हिस्सा ही होती है, बाकी की तैयारी और प्रैक्टीस राईडस आदि से जुड़ा बहुत बड़ा खर्चा स्वयं ही करना होता है| फिर भी, इस तरह की स्पॉन्सरशिप प्राप्त करना एक साईकिलिस्ट के तौर पर मेरे लिए बड़ी बात है| मै फिर एक बार मन्थन फाउंडेशन, रिलीफ फाउंडेशन एवम् अन्य सब संस्थाएँ तथा व्यक्तियों को धन्यवाद देता हूँ जिन्होने कई तरह से इस यात्रा में सहयोग दिया, एक तरह का सहभाग भी लिया| हिमाचल प्रदेश में और अंबाला में भी मुझे कई लोगों से मदद लेनी पड़ी, उन्हे भी उनके सहयोग के लिए धन्यवाद! अगर इस तरह का सहयोग मुझे मिला न होता, तो मेरे लिए ऐसी यात्रा करना लगभग नामुमकीन होता| दूसरी बात साईकिल को लेकर मैने जो तैयारी की‌ थी, जो व्यवस्थाएँ की थी, वे सब कारगर साबित हुई| जैसे साईकिल को महंगे प्रचलित टायर्स के बजाय देसी लेकीन मजबूत टायर्स डाले थे| बहुत से पथरिले और खतरनाक रास्तों पर चलने के बावजूद एक भी पंक्चर नही हुआ! उसके साथ मैने साईकिल के लिए मेरे साईकिल मित्र और साईकिल रेसर शेख खुदूस से जो थैला बनवा लिया था, वो भी बहुत काम आया| इस तरह से अब ट्रेन में आसानी से साईकिल कहीं से कहीं ले जा सकता हूँ! एक परेशानी हमेशा के लिए हल हुई| साईकिल चलाने से जुड़ी बाकी तैयारी भी वैसे ही काम आई| साईकिल को भी धन्यवाद देता हूँ, उसने खूब साथ निभाया!






Thursday, October 10, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति १०: एक बेहद डरावनी बस यात्रा

१०: एक बेहद डरावनी बस यात्रा
 

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५ अगस्त की शाम को बड़े बुरे हालत में लोसर पहुँचा! काज़ा से सुबह निकलते समय तो सोचा था कि  काज़ा से लोसर और लोसर से कुंजुमला दर्रे तक जाऊँगा और वैसे ही वापस काज़ा को जाऊँगा| लेकीन सड़क और शरीर की स्थिति देखते हुए यह सम्भव नही है| इसलिए लोसर से ही बस लेनी होगी| और लोसर से मनाली की बस चलती है! लेकीन उसके लिए भी अच्छा विश्राम करना होगा| इसलिए तय किया कि लोसर में एक दिन विश्राम करूँगा और उसके बाद दूसरे दिन मनाली के लिए निकलूंगा| लोसर! स्पीति का तिसरा मुख्य गाँव और कुंजुमला दर्रे का बेस! यहाँ से ४५५० मीटर ऊँचाई का कुंजुमला दर्रा सिर्फ १९ किलोमीटर ही है| और वहाँ से सड़क बड़े ही दुर्गम क्षेत्र से बढ़ते हुए मनाली की ओर जाती है! स्पीति से यह सड़क लाहौल जाती है| लोसर में पहुँचने पर देखा कि मोबाईल टॉवर तो है! लेकीन नेटवर्क नही है| यहाँ बिजली बहुत अनियमित होती है, इसलिए जब बिजली आती है, तभी मोबाईल भी चलता है| इस यात्रा के पहले लगा था कि मोबाईल के बिना कुछ दिन विपश्यना जैसी स्थिति में गुजरने तो मज़ा आएगा| लेकीन यहाँ एक तरह से मोबाईल और कनेक्टिविटी का लगाव नही छुटता दिखाई दे रहा है| खैर| शाम को बिजली आई और थोड़ा नेटवर्क भी आया| लोसर में मेरे होटल में लिखा है- आप ४०७९ मीटर पर डिनर कर रहे हैं! लोसर में शाम तो थोड़ी अच्छी गई| लेकीन रात में बहुत ज्यादा ठण्ड बढ़ गई! रात को शेअरिंग सिस्टम के कमरे में हिमाचल के अन्य यात्री भी हैं| उनसे भी थोड़ी बात हुई|







अगली सुबह थोड़े आराम से नीन्द खुली| बहुत ज्यादा ठण्ड है! आज कुछ भी करना नही है| लेकीन साईकिल तो फोल्ड करनी होगी| कल सुबह मनाली की बस मिलेगी| सुबह दो बार चाय का आनन्द लिया| होटल में कमरा दूसरी मंजिल पर है और सामने बहुत सुन्दर दृश्य दिखाई देते हैं! मेरी स्थिति ठीक नही है, लेकीन कितनी सुन्दर जगह है यह! पास ही की पहाड़ी पर लोसर गोम्पा भी है| लेकीन वहाँ जाने की इच्छा नही हुई| चढाई भी है| सुबह काफी देर बाद ठण्ड थोड़ी कम हुई| मौसम भी ठीक नही है, बादल उमड़े हैं| ज्यादा तर समय पुराने जमाने के नोकिया मोबाईल में गाने सुनता रहा| इस छोटे से शुद्ध फोन ने इस यात्रा में बड़ा साथ दिया! दोपहर जब इच्छा हुई, तो साईकिल को फोल्ड कर दिया| फोल्ड कर साईकिल कॅरी केस अर्थात् बोरे में रख दी| बेचारा स्टैंड टूटा है| सुबह की बस का पता किया| यहाँ से मनाली के लिए बस निकलती है सुबह सांत बजे| यह बस है काज़ा से लोसर- ग्राम्फू- मनाली- कुल्लू! इसी बस से मनाली तक जाऊँगा और वहाँ से अंबाला| अब ट्रेन का टिकिट भी नया निकलना होगा| एक तरह से अब भी हताशा तो है, लेकीन this is part and parcel of the game! साईकिल चलाना या अन्य कोई भी खेल हो, उसमें तो ऐसी चीजें होती ही हैं| कभी रिटायर्ड हर्ट होना पड़ता है, कभी इंज्युरी होती है, कभी स्थिति खराब भी होती है| वैसे मेरी योजना २०- २१ दिन साईकिल चलाने की थी, लेकीन सिर्फ ८ दिन चला पाया| एक तरह से क्रिकेट की भाषा में चार टेस्ट की‌ शृंखला का पहला मैच मैने जिता, दूसरे मैच के तीन दिन भी अच्छे गए और अन्त में वह मैच ड्रॉ हुआ और बाकी के दो मैच भी रद्द हुए| कुल मिला कर १-० रही यह शृंखला! और हताशा के बावजूद मुझे लगभग लोसर तक की इस अविश्वसनीय यात्रा का एक तरह से फक्र रहेगा, अचिव्हमेंट का एहसास भी रहेगा|






Friday, October 4, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ९: काज़ा से लोसर. . .

९: काज़ा से लोसर. . .
 

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५ अगस्त की सुबह! काज़ा में अच्छा विश्राम हुआ| अब तय हो गया है कि मै लदाख़ की तरफ नही जा पाऊँगा, क्यों कि जम्मू- कश्मीर बन्द अभूतपूर्व रूप से शट डाउन हुआ है| इस कारण अब मन में दो विचार हैं| मन का एक हिस्सा कह रहा है केलाँग तक तो जाओ कम से कम| केलाँग हिमाचल में ही है| और मेरी योजना के अनुसार वहाँ पहुँचने में और चार दिन लगेंगे| लेकीन उसमें दिक्कत यह है कि तबियत उतनी विश्वासभरी नही लग रही है|‌ और केलाँग तक पहुँचने के पहले मुझे लोसर- बातल- ग्राम्फू इस क्षेत्र से गुजरना होगा और इस क्षेत्र में सड़क है ही नही| या यूं कहे की बीच में सिर्फ कुछ जगह है जो ग्लेशियर्स, झरने, नदी, पहाड़, खाई इन के बीच से बची हुई है! और कहने के वास्ते "इधर" से वाहन निकलते हैं और कैसे तो भी "उधर" पहुँच जाते हैं| इस ट्रैक का डर बहुत लगने लगा है| वैसे तो मै दुनिया के तथा कथित सबसे दुर्गम सड़क पर साईकिल चला कर ही आ रहा हूँ, लेकीन यहाँ आगे तो सड़क भी नही होगी| और दूसरी बात यह भी लग रही है कि जब लदाख़ जाना ही नही होगा, तो सिर्फ केलाँग तक जाने से भी कुछ खास फर्क नही होगा और सिर्फ केलाँग तक जाने के लिए उस ट्रैक से जाने का मतलब नही लग रहा है| यह निर्णय या इस सोच में एक बड़ा आधार अन्त:प्रेरणा का भी होता है| हम सब परिस्थिति पर गौर करते हैं, जैसे सड़क की स्थिति, मौसम, शरीर का मैसेज और इन सब पर निर्णय लेने का काम भीतर  की आवाज़ का होता है| और वह आवाज़ मुझे अब रूकने के लिए कह रही है| भीतर की आवाज़ का बहुत महत्त्व होता है| क्यों कि मै यहाँ तक आया भी तो उसी आवाज के कहने पर! सब तैयारी की, सब जुगाड़ किए, उसी आवाज़ के कहने पर! अब वही आवाज़ मुझे और आगे जाने से रोक रही है तो रुकना होगा... आखिर कर काज़ा से निकलते समय यही सोच कर निकला कि काज़ा से लोसर तक जाऊँगा और लोसर से कुंजुमला टॉप तक जाकर वहीं से वापस लौटूंगा| मेरी कुल योजना २०- २१ दिनों की थी, तो और तीन दिन साईकिल चलाने पर कम से कम आधी योजना पूरी हो जाएगी अर्थात् १० साईकिल चलाना हो जाएगा और आँकडों के लिए ६०० किलोमीटर भी पूरे हो जाएंगे| अर्थात् अब सिर्फ तीन दिनों का साईकिलिंग बाकी है|







Tuesday, October 1, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ८: ताबो से काज़ा

८: ताबो से काज़ा
 

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३ अगस्त को नाको से ताबो पहुँचा| ताबो बहुत शानदार गाँव लगा| छोटा सा, लेकीन सड़के अच्छी हैं, होटल- दुकान भी हैं, लेकीन फिर भी गाँव ही है| पर्यटक और विदेशी पर्यटक भी हैं, लेकीन फिर भी शान्त गाँव लगा| नाको से ताबो की ऊँचाई तो कम है, लेकीन घूमक्कड़ी के लिहाज से उसका "कद" नाको से अधिक है! ताबो का होम स्टे बहुत अच्छा रहा| जिस घर में मै ठहरा था, उन्होने रात में भी नीचे घर में ही खाने के लिए बुलाया| एक तरह का बहुत ही अपनापन यहाँ मिला| परिवारवालों से बातचीत भी हुई| स्पीति के स्थानियों का घर अन्दर से देखने को मिला| और जाहीर तौर पर तिब्बत का करीब होना पता चल रहा है| क्यों कि हम जिसे ड्रॉईंग रूम कहते हैं, वहाँ पर ध्यान और प्रार्थना के लिए नीचे गद्दे बिछाए हैं| या गद्दे जैसे आसन| एक साथ पन्द्रह लोग बैठ कर ध्यान कर सकें, ऐसी व्यवस्था है| आदरणीय दलाई लामा जी का फोटो और मन्त्र फ्लैग्ज तो हर तरफ है ही|
 

यहाँ व्हॉईस और डेटा दोनो का कुछ नेटवर्क मिलने से घर पर और मित्रों से दो दिन के बाद ठीक बात हो सकी| कई सारे समाचार भी मिले| जम्मू- कश्मीर में अभूतपूर्व परिस्थिति है| अमरनाथ यात्रा रोकी गई है और सभी पर्यटकों को वहाँ से निकलने के लिए कहा गया है| इससे मेरी यात्रा भी बीच में खण्डित होगी| क्यों कि बाद में मुझे मनाली- लेह हायवे से लेह की तरफ जाना है जो की मै नही जा पाऊँगा| और इतनी अभूतपूर्व परिस्थिति में सब तरह के रिस्ट्रिक्शन्स भी वहाँ होंगे| जब यह समाचार मिला, तो सच कहता हूँ, एक तरह से राहत ही मिली| क्यों की लगातार चल रही अनिश्चितताओं से भरी यात्रा का मानसिक दबाव भी बहुत बना था| जब पता चला की, मै लेह की तरफ आगे नही जा पाऊँगा, तो सच में एक तरह का सुकून ही मिला| शिमला से निकल कर ताबो तक पहुँच तो गया हूँ, लेकीन शारीरिक और मानसिक दृष्टि से अब बहुत थकान भी हुई है| इस समाचार ने एक तरह से इस यात्रा का रूख भी और दिशा भी बदल ही‌ दी| बीच बीच में बारीश का अलर्ट भी चल रहा है| हिमाचल और जम्मू- कश्मीर की सीमा अभी बहुत दूर है| लेकीन तबियत को देखते हुए उस सीमा तक भी जा पाना कठीन लग रहा है| ४ अगस्त को ताबो से काज़ा के लिए निकला तो सब इस तरह से अनिश्चित बना हुआ है| हालांकी आज की यात्रा ज्यादा कठिन नही होगी, इस यात्रा का सबसे छोटा पड़ाव- सिर्फ ४७ किलोमीटर आज है|



  



Thursday, September 26, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ७: नाको से ताबो

७: नाको से ताबो
 

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१ अगस्त का वह दिन! गलितगात्र स्थिति में नाको पहुँचा| क्या दिन रहा यह! लगभग शाम होते होते अन्धेरे के पहले नाको पहुँच गया! जीवनभर के लिए अविस्मरणीय राईड रही! अविश्वसनीय भी! नाको में एक होटलवाले की जानकारी तो मिली थी, लेकीन थकान की वजह से सड़क पर जो होटल मिला, वही रूक गया| पहुँचते पहुँचते बहुत ठण्ड लगने लगी थी| गर्म पानी मिला तो नहा लिया| फिर धीरे धीरे कुछ राहत मिलती गई| गर्म चाय पी, गर्म खाना भी खाया| चारों ओर अद्भुत नजारे हैं! दोपहर तक मौसम जहाँ अच्छा था, वहीं अब बादल मंडलाए हैं| बहुत जगह पर बर्फ भी दिखाई दे रही है, ये जरूर दूर दूर के पहाड़ होंगे| सामने ही एक टीले पर बहुत ऊँचाई पर बना मन्दीर भी दिखाई दे रहा है| ठण्ड भी बढ़ गई है| दूर खाई में लकीर जैसी स्पीति बहती दिखाई दे रही है| एक दिक्कत यह है कि यहाँ मोबाईल नेटवर्क बिल्कुल न के बराबर है| और इसकी अपेक्षा भी थी| लेकीन मोबाईल नेटवर्क अगर पूरा नही होता, तो भी ठीक होता. बहुत धिमा सा नेटवर्क है, जिससे मॅसेज भेजे जाने की उम्मीद बनी है| लेकीन कुल मिला कर रात को किसी से बात नही हो सकी| सिर्फ दो मैसेज सेंड हो सके|









Thursday, September 12, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ६: स्पिलो से नाको

६: स्पिलो से नाको
 

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३१ जुलाई शाम को स्पिलो में होटलवाले युवकों‌ से अच्छी‌ बात हुई| यहाँ‌ से अब बौद्ध समुदाय ही मुख्य रूप से हैं| रहन- सहन और खाना भी लदाख़ जैसा लग रहा है| किन्नौर के इस दूरदराज के क्षेत्र में गाँव यदा कदा ही होते हैं| इसलिए हर एक गाँव में होटल, राशन, होम स्टे, बैंक आदि सब सुविधाएँ होती हैं| यहाँ पर पहले ब्लास्टिंग और सड़क की स्थिति का पता किया| मेरे जाने के बाद परसो स्पिलो के कुछ आगे ब्लास्टिंग किया जाएगा| सड़क फिलहाल तो ठीक है| स्पिलो में अच्छा नेटवर्क मिल रहा है, इसलिए आगे के रूट के बारे में कुछ पता किया| जब इंटरनेट पर पूह (पू) गाँव के बारे में देखा, तो पता चला कि १९०९ में‌ यहाँ तक- हिमालय में इतने अन्दर तक एक विदेशी‌ आया था और उसने निरीक्षण किया कि पूह (पू)‌ में सभी लोग तिब्बती बोलते हैं! अगले दिन याने १ अगस्त को मुझे वही‌ं से जाना है| सुबह निकलने के पहले जब प्रेयर व्हील के पास टहल रहा था, तब कुछ लोगों ने मुझसे बात की| उन्होने मेरे अभियान के बारे में जानना चाहा, बाद में रूचि भी ली| श्री नेगी जी से बात हुई| उन्होने मुझे आज के नाको के होटल का भी सम्पर्क दिया| मुझे शुभकामनाएँ भी दी| सुबह आलू- पराठे का नाश्ता करने के बाद निकला| आज शायद बीच में होटल कम ही लगेंगे, इसलिए बिस्कीट और केले भी ले लिए| कल के मुकाबले आज अच्छी धूप खिली है, आसमाँ नीला नजर आ रहा है| स्पिलो छोडते समय तो मुस्कुरा रहा हूँ....







Monday, September 9, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ५: टापरी से स्पिलो

५: टापरी से स्पिलो

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३१ जुलाई! टापरी में सतलुज की गर्जना के बीच नीन्द खुली| कल की साईकिल यात्रा क्या रही थी! और सड़क कितनी अनुठी थी! आज भी यही क्रम जारी रहेगा| अब मन बहुत प्रसन्न एवम् स्वस्थ है| एक दिन में बहुत फर्क लग रहा है| कल डर लग रहा था कि कहाँ आ फंसा हूँ| तब समझाना पड़ा था कि अरे तू तो कुछ दिनों के लिए ही यहाँ होगा, यहाँ के स्थानीय लोग और मिलिटरी के लोग तो कैसे रहते होंगे, सड़क की अनिश्चितताओं को कैसे सहते होंगे| कल ऐसा खुद को कहते कहते ही साईकिल चलाई थी| लेकीन आज तो अब खुद को खुशकिस्मत मान रहा हूँ कि इन सड़कों पर साईकिल चलाने का मौका मिल रहा है| एक तरह से जीवन की आपाधापी, तरह तरह के उलझाव, पहले शिक्षा और बाद में करिअर के दबाव इन सबमें जो जवानी जीना भूल गया था, उसे जीने का यह मौका लग रहा है! आज जाना है स्पिलो को जो लगभग अठावन किलोमीटर दूर होगा| आज भी सड़क बहुत मज़ेदार होगी!








Wednesday, September 4, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ४: रामपूर बुशहर से टापरी

४: रामपूर बुशहर से टापरी
 

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२९ जुलाई की शाम रामपूर बुशहर में बिताई| दो दिन शिमला और नार्कण्डा में ठहरने के बाद यहाँ बहुत गर्मी हो रही है| शाम को कुछ समय के लिए लगा कि बुखार तो नही आया है| उस दिन ठिक से विश्राम नही हो पाया| रात बारीश भी हुई| ३० जुलाई की सुबह नीन्द खुली तो नकारात्मक विचार मन में हैं| शायद ठीक से विश्राम नही हो पाया है और शरीर जब ताज़ा नही होता, तो मन भी ताज़ा नही हो सकता है| दो दिनों की ठण्डक के मुकाबले यह गर्मी कुछ भारी पड़ रही है| बुखार जैसी स्थिति में क्या मै आगे चला पाऊँगा? बारीश के भी आसार लग रहे हैं| कुल मिला कर जब भी ऐसी साईकिल यात्रा की है, पहले दिन मन में जो तनाव होता है; जो शंकाएँ होती हैं, वो सब आज तिसरे दिन मन में हैं| कुछ समय के लिए लगा भी कि शायद आज टापरी जा भी नही पाऊँगा और उसके पहले ही झाकड़ी में ही हॉल्ट करना पड़ेगा| धीरे धीरे हिम्मत बाँधी| सामान भी साईकिल पर बान्धा| पहले दो दिन मै स्पेअर टायर को सीट के नीचे रख रहा था| पेडल चलाते समय वह पैर को चुभ रहा था| अभी उसको सामने हैंडल पर एडजस्ट कर दिया| ऐसे ही बाकी शंकाओं को भी थोड़ा एडजस्ट कर दिया| गेस्ट हाऊस में पराठा खा कर निकलने के लिए तैयार हुआ| जैसे ही निकला, सतलुज की गर्जना फिर तेज़ हुई| हल्की हल्की बून्दाबान्दी भी हो रही है| मन का एक हिस्सा तो बारीश भी चाहता है| क्यों कि अगर बारीश नही होती है, तो यहाँ की गर्मी में साईकिल चलाना कठीन ही होगा| उससे अच्छा है कि कुछ बारीश आ जाए|







Monday, August 26, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति ३: नार्कण्डा से रामपूर बुशहर


३: नार्कण्डा से रामपूर बुशहर
 

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२९ जुलाई! इस यात्रा का दूसरा दिन| आज नार्कण्डा से रामपूर बुशहर की तरफ जाना है| कल नार्कण्डा में अच्छा विश्राम हुआ| रात बारीश भी हुई| २७०० मीटर से अधिक ऊँचाई पर रात में कोई दिक्कत नही हुई| और वैसे आज का दिन एक तरह का आसान चरण भी है, क्यों कि आज बिल्कुल चढाई नही है, वरन् बड़ी उतराई है| सुबह चाय- बिस्कीट और केले का नाश्ता कर रेस्ट हाऊस से निकला| नार्कण्डा में कई घर और दुकानों पर 'ॐ मणि पद्मे हुं' मन्त्र लगे हुए हैं! सुबह के लगभग आठ बजने के बाद भी बाहर बहुत कोहरा- धुन्द है| बारीश तो रूक गई है, लेकीन रोशनी बहुत कम है| नीचे बादल दिखाई दे रहे हैं| नार्कण्डा से आगे बढ़ते ही उतराई शुरू होती है| जैसे ही उतराई शुरू हुई, सड़क बादलों के बीच घिर गई| जैसे सड़क नीचे उतरने लगी तो बिल्कुल बादलों का समन्दर शुरू हुआ| विजिबिलिटी बिल्कुल ही कम है| मुश्किल से दस कदमों तक दिखाई दे रहा है| साईकिल पर टॉर्च लगाया| सभी वाहन रोशनी और इमर्जन्सी लाईट लगा कर ही चल रहे हैं! इस तरह की कम रोशनी बड़ी कठिन होती है| अगर पूरी रात हो, तो भी एक तरह से आसानी होती है| धीरे धीरे कुछ बून्दाबान्दी हुई और ठण्ड भी बढ़ गई| तब चेहरे पर मास्क लगा कर आगे बढ़ने लगा| पेडल मारने की जरूरत तो बिल्कुल नही है| यही उतराई अब सीधा शतद्रू अर्थात् सतलुज के करीब आने तक जारी रहेगी!







Monday, August 19, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति २: शिमला से नार्कण्डा

२: शिमला से नार्कण्डा 

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२५ जुलाई को ट्रेन से स्पीति- लदाख़ साईकिल यात्रा के लिए निकला| ट्रेन पर मुझे छोडने के लिए कई साईकिल मित्र और परिवारवाले आए| ट्रेन में चढ़ कर जल्द ही साईकिल का थैला बर्थ के नीचे रख दिया| बहुत आसानी से फोल्ड की हुई साईकिल और उसी थैले में काफी सामान भी बर्थ के नीचे चला गया! इससे बड़ी राहत मिली| अब साईकिल ट्रेन में से आसानी से ले जा सकता हूँ! साईकिल इस तरह फोल्ड करने के लिए उसका कैरीयर, दोनों पहिए, स्टैंड, सीट और दोनों पेडल निकालने पड़ते हैं| कल साईकिल इस तरह से थैले में भरने के लिए भी मित्रों ने सहायता की| अगले दो दिनों में शिमला तक की यात्रा करूंगा और उसके बाद २८ जुलाई से साईकिल चलाऊँगा| प्रयासपूर्वक मन को वर्तमान में ही रखा और ट्रेन की यात्रा का आनन्द लेने लगा|






Thursday, August 15, 2019

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति १: प्रस्तावना

साईकिल पर जुले किन्नौर- स्पीति १: प्रस्तावना
 

सभी को नमस्कार! हाल ही में किन्नौर- स्पीति यात्रा साईकिल पर की| इसके बारे में अब विस्तार से लिखना आरम्भ कर रहा हूँ| हर साईकिल यात्रा काफी कुछ सीखा जाती है, समृद्ध कर जाती है| इस यात्रा में भी बहुत कुछ सीखने को मिला| एक तरह से स्पीति में साईकिल चलाने का सपना भी पूरा हुआ| यह साईकिल यात्रा सिर्फ एक साईकिल यात्रा न हो कर एक सामाजिक उद्देश्य होनेवाली यात्रा थी| स्वास्थ्य, फिटनेस, पर्यावरण इन बातों के बारे में जागरूकता का मैसेज दिया जाना तथा इन्ही विषयों पर विभिन्न लोगों और समूहों से बात करना भी इसका एक अंग था| पुणे की संस्था मंथन फाउंडेशन, रिलीफ फाउंडेशन और अन्य संस्थाएँ तथा सहयोगियों का कई तरह का सहयोग इस सोलो साईकिल यात्रा के लिए मिला| एक तरह से यह एक नई पहल थी| समाज के सहयोग के साथ और सामाजिक उद्देश्य को ले कर यह यात्रा हुई| इसके बारे में अलग अलग सोच हो सकती है| किसी को ऐसा भी लग सकता है साईकिल यात्रा करनी हो तो अपने ही बल पर क्यों नही करते, संस्था का और अन्य व्यक्तियों का सहयोग क्यों लेना चाहिए| यह भी एक राय हो सकती है| मेरे विचार से मैने इस बार थोड़ा नया करने की कोशिश की| एक विचार और एक थीम ले कर कई लोगों के पास गया| पुणे की मंथन फाउंडेशन और रिलीफ फाउंडेशन इन दो संस्थाओं ने इस अभियान और उसके सामाजिक मैसेज में रूचि ली| उनके अपील पर कई और संस्थाएँ और व्यक्तियों ने भी इसमें रुचि ली| इसमें और एक बात भी है| जब मै अकेला साईकिल चलाता हूँ, तो वह मेरे तक या सिर्फ मेरे सोशल मीडीया तक सीमित रहता है| लेकीन जब मै किसी संस्था के साथ, व्यापक समाज के सामने आ कर साईकिल चलाता हूँ, तो वह ज्यादा लोगों तक पहुँचता है| प्रिंट मीडिया से और अधिक अनुपात में सोशल मीडिया में आने से कई लोगों तक यह विचार पहुँचता है| और जहाँ तक यात्रा के खर्च में सहयोग का मुद्दा है, यह सहयोग बहुत आंशिक होता है| इस यात्रा के प्रत्यक्ष यात्रा में होनेवाले अनुमानित खर्च के लिए संस्थाएँ और व्यक्तियों से सहयोग मिला| लेकीन काफी खर्च तो अप्रत्यक्ष होता है- जैसे मैने यात्रा की तैयारी के लिए कई महिनों तक जो राईडस की, जो अभ्यास किए उसका खर्च तो अलग ही होता है| या छुट्टियों की वजह से भी जो एक तरह का आर्थिक नुकसान होगा, वह भी तो होता ही है| खैर|



Thursday, July 25, 2019

स्पीति- लदाख़ साईकिल यात्रा!

पुणे की मंथन फाउंडेशन द्वारा दुर्गम प्रदेश- स्पीति एवम् लदाख़ में सोलो साईकिल अभियान
पुणे स्थित मंथन फाउंडेशन यह स्वयंसेवी संस्था स्वास्थ्य और पर्यावरण पर काम करती है| यह सोलो साईकिल अभियान स्पीति व लदाख़ में होगा जहाँ अत्यधिक दुर्गम मानी जाती है| स्पीति और लदाख़ में सड़क की ऊँचाई ५००० मीटर्स से अधिक होती है और ऐसी उंचाई पर ऑक्सीजन का अनुपात ५०% से कम होता है| यहाँ चलना भी कठिन होता है| ऐसे दुर्गम क्षेत्र में यह सोलो साईकिल अभियान किया जाएगा और वह शिमला से २८ जुलाई को शुरू होगा और शिमला- नार्कंडा- रामपूर- टाप्री- स्पेलो- नाको- ताबो- काजा- लोसर- बाटाल- ग्राम्फू- केलाँग- पांग- त्सो कार- लेह इस रूट पर पूरा किया जाएगा और सम्भवत: १७ अगस्त को साईकिलिस्ट निरंजन वेलणकर (मोबाईल क्रमांक 09422108376) लेह पहुँच जाएगा| हर रोज औसतन ६० किलोमीटर साईकिल चलाने की योजना है|

इस अभियान के उद्देश्य

1. साईकिल यह स्वास्थ्य और फिटनेस का संदेश देनेवाला माध्यम है|

2. साईकिल चलाना पर्यावरण- अनुकूल जीवनशैलि की ओर ले जानेवाला एक कदम है| पर्यावरण के प्रति आदर और पर्यावरण संवर्धन का संदेश उसमें दिया जाता है|

3. स्पीति और लदाख़ भारत के दुर्गम क्षेत्र हैं और वहाँ का लोकजीवन वैविध्यपूर्ण है| यहाँ साईकिल चलाते समय स्थानीय लोगों के साथ संवाद किया जा सकता है|

4. यहाँ साईकिल चलाना एक तरह से राष्ट्रीय एकात्मता और विविधता में एकता भी दर्शाता है|

5. ये हिस्से सीमा से सटे होने के कारण यहाँ साईकिल चलाते समय आर्मी के जवानों से भी मिलना होता है और उनसे अनौपचारिक संवाद भी किया जा सकता है| ये कितने विपरित स्थिति में काम करते हैं, यह जाना जा सकता है| उनसे मिलना भी उन्हे किया जानेवाला एक तरह का सैल्यूट ही है|

सोलो साईकिल योजना

यह सोलो साईकिलिंग सपोर्ट वाहन के बिना की जाएगी| उसकी शुरुआत शिमला में होगी और उसका समापन लेह, जम्मू- कश्मीर में होगा| लगभग २५ दिनों में साईकिलिस्ट १२०० किलोमीटर की दूरी तय करेगा और जगह जगह लोगों से और स्थानीय संस्थाएँ/ कार्यकर्ताओं से मिलेगा| उपर बताए गए विषयों पर मंथन करना भी उसमें होगा| अभियान पूरा होने के बाद साईकिलिस्ट यह अनुभव विविध फोरम्स पर लोगों के साथ साझा करेगा|

इस साईकिल यात्रा को रिलीफ फाउंडेशन, महा एनजीओ फेडरेशन, माहिती सेवा समिती, हरित सेना, महाराष्ट्र आदि विविध संस्थाओं का और कई व्यक्तियों का सहभाग मिला है|

मंथन फाउंडेशन सम्पर्क क्रमांक: आशा भट्ट 07350016571.
साईकिलिस्ट: निरंजन वेलणकर 09422108376

Tuesday, July 23, 2019

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी- १४ (अन्तिम): जीवनशैलि में दौड़ने का अन्तर्भाव

१४ (अन्तिम): जीवनशैलि में दौड़ने का अन्तर्भाव
 

डिस्क्लेमर: यह लेख माला कोई भी टेक्निकल गाईड नही है| इसमें मै मेरे रनिंग के अनुभव लिख रहा हूँ| जैसे मै सीखता गया, गलती करता गया, आगे बढता गया, यह सब वैसे ही लिख रहा हूँ| इस लेखन को सिर्फ रनिंग के व्यक्तिगत तौर पर आए हुए अनुभव के तौर पर देखना चाहिए| अगर किसे टेक्निकल गायडन्स चाहिए, तो व्यक्तिगत रूप से सम्पर्क कर सकते हैं|

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मुम्बई मैरेथॉन पूरी होने के बाद यह तय किया कि रनिंग तो जारी रखनी ही है, लेकीन महिने में एक लाँग रन करना है| तभी मैरेथॉन फिटनेस/ स्टैमिना बरकरार रहेगा| इसलिए जनवरी के बाद मार्च में एक बार २५ किलोमीटर दौड़ की और उसके बाद अप्रैल में २२ किलोमीटर दौड़ की| छोटे रन्स भी जारी रहे| और साईकिल चलाना,  चलना, योग, स्ट्रेंदनिंग आदि तो अब जीवन का हिस्सा बन चुके हैं| और अब उन्हे 'करने की' जरूरत नही पड़ती है| बल्की अब उन्हे न किए बिना चलता ही नही है|  



Friday, July 19, 2019

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी- १३: मुंबई मैरेथॉन के अन्य पहलू

१३: मुंबई मैरेथॉन के अन्य पहलू
 

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जनवरी २०१९ की मुम्बई मैरेथॉन! ए दिल है मुश्किल यहाँ, जरा हट के जरा बचके ये है बम्बई मैरेथॉन! अपेक्षाकृत एक तरह से यह ईवंट कुछ हद तक डरावनी लगती रही| और ईवंट की तुलना में बाकी चीजें- जैसे मुम्बई में यात्रा करना, मैरेथॉन के लिए बिब कलेक्शन आदि चीजें मानसिक रूप से थोड़ी थकानेवाली लगी| मैरेथॉन की पूर्व संध्या तक बहुत तनाव लगा, लेकीन जब उस विषय पर बहुत बातचीत हुई, बार बार उस पर सोचा गया, तो एक समय आया कि मन उस तनाव से हल्का हुआ| या एक तरह से उस विषय से थक गया/ बोअर हुआ| उससे राहत मिली| और बाद में मैरेथॉन तो बहुत ही अच्छी रही| इस लेखमाला के पहले लेख में उस मैरेथॉन के अनुभव बता चुका हूँ|

अब चर्चा करता हूँ उसके कुछ अन्य पहलूओं की| सबसे बड़ी बात तो लोगों द्वारा दिया जानेवाला प्रोत्साहन- लगातार घण्टों तक सड़क पर खड़े रहना और पानी, एनर्जाल, फल आदि देते रहना बहुत बड़ी बात है| यह एक मुंबई का कल्चर का हिस्सा लगा| मैरेथॉन का रूट जापानी दूतावास के पास से जाता है, तो वे लोग भी आए थे| इसी मैरेथॉन के दौरान राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय एलिट रनर्स (रेसर) भी देखने को मिले| आम रनर्स से दो घण्टा बाद में शुरू कर भी वे बहुत जल्द रेस पूरी कर गए! मेरे जैसे आम रनर और वे रेसर्स इनमें शायद संजय मंजरेकर और विरेंदर सेहवाग के स्ट्राईक रेट जितना अन्तर होगा!



फोटो: इंटरनेट से साभार


मैरेथॉन के उत्तरार्ध में सड़कों पर बहुत कुछ फेंका गया| कई बोतलें, एनर्जाल आदि के पाउच भी रनर्स फेंकते गए| उससे कुछ हद तक सड़क भी फिसलनेवाली हो गई| पानी पिने के बाद वजन नही ढोना पड़े इसलिए रनर्स उसे फेंकना था तो कूड़ेदान में भी फेंक सकते थे, लेकीन ऐसा शायद कम हुआ| बाद में तो कूड़े का ढेर लग गया| बेचारे वालंटीअर्स उसे सम्भालने का प्रयास करते दिखे|

Tuesday, July 2, 2019

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी- १२: मुंबई मैरेथॉन की तैयारी

१२: मुंबई मैरेथॉन की तैयारी
 

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नवम्बर २०१८ में फिर एक बार लाँग रन्स शुरू किए| २० जनवरी २०१९ की मैरेथॉन के लिए तैयारी करनी है| उसके पहले एक बार ३६ किलोमीटर तक मुझे पहुँचना है| अगस्त- सितम्बर में जब लगातार हर हफ्ते २५- ३० किमी दौड़ा था, तो दिक्कत हुई थी और इंज्युरी भी हुई थी| इसलिए इस बार सोचा कि हर हफ्ते के बजाय हर पखवाड़े लाँग रन करूँगा और बीच बीच में छोटे रन ही करूँगा| इसके साथ मैरेथॉन के पहले कुछ चीजें भी थोड़ी ठीक करनी है| शूज का निर्णय लेना है और तकनीक भी थोड़ी ठीक करनी है| इसी समय मेरे रनिंग के मार्गदर्शक बनसकर सर ने मुझे अदिदास के शूज गिफ्ट किए| मेरे लिए वह बिल्कुल अच्छे लगे| अब इन शूज के साथ लाँग रन कर के देखना होगा| साथ ही एक तरह से २५ किलोमीटर के बाद जो दिक्कत आती है, उसे भी पार करना है|

कई रनर्स के साथ इसके बारे में चर्चा भी कर रहा हूँ| २५ किलोमीटर के बाद रनिंग करना कठिन होता है और चलना पड़ता है, इसके कई कारण हो सकते हैं| जैसे ठीक डाएट ना होना, रनिंग की तकनीक गलत होना या मानसिक अवरोध भी! उस तरह से कुछ बदलाव भी करता गया| प्रोटीन का इन्टेक बढ़ाया| कुछ और व्यायाम शुरू किए| इसी दौरान बनसकर सर ने मुझे पुश अप्स करने की ट्रिक भी बताई| पहले कभी भी पुश अप्स नही किए थे, इसलिए उन्हे करना बहुत कठिन लग रहा था| क्यों कि उसमें पूरे शरीर का आधा वजन दो हाथों पर उठाना होता है| तब सर ने मुझे एक बार रनिंग के बाद एक फूट या दो फूट ऊँची फर्श पर पुश अप करने के लिए कहे| वे मै कर पाया| उसी से धीरे धीरे वह ट्रिक आ गई और वह क्षमता भी आ गई| रनिंग के लिए कुछ जिम के अभ्यास, योग, प्राणायाम, चलना, साईकिलिंग बहुत उपयोगी है| मसल्स भी तैयार होते हैं, स्टैमिना भी बढ़ता है| इसी कारण इस दौरान बड़े बड़े वॉक भी किए और आगे भी करता रहा| इससे फास्ट वॉकिंग की स्पीड भी बढ़ गई और २५ किलोमीटर या ३० किलोमीटर की दूरी के बाद चलना भी पड़े तो आसानी से बाकी की दूरी पार कर लूँगा, यह हौसला मिला|




Friday, June 28, 2019

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी- ११: दोबारा नई शुरुआत

११: दोबारा नई शुरुआत
 

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सितम्बर २०१८ में मेरी पहली फुल मैरेथॉन थी| २ सितम्बर को ३६ किलोमीटर दौड़ने से अच्छा हौसला आया| ३० सितम्बर के मैरेथॉन के पहले अब सिर्फ छोटे छोटे रन ही करने है| सिर्फ पैरों को हल्का सा अभ्यास देते रहना है| इसी दौरान मेरी साईकिल पर कोंकण जाने की योजना है| साईकिल रनिंग के मुकाबले बहुत हल्का व्यायाम है, इसीलिए ज्यादा सोचने की जरूरत नही समझी| सितम्बर में आठ दिन की साईकिल यात्रा कोंकण में की| वाकई यह बहुत रोमैंटिक यात्रा रही| एक तरह से एक सपना साकार हुआ| इस यात्रा से लौटते समय साईकिल वहीं पर रखनी पड़ी| बाद में उसे लेने के लिए जाना पड़ा| साईकिल यात्रा में तो नही, पर शायद उसके बाद की हुई कुछ यात्रा में कहीं इन्फेक्शन हो गया और मैरेथॉन के एक हफ्ते पहले वायरल बुखार हुआ| बाद में वीकनेस भी‌ आया| इसके चलते बड़े दु:ख के साथ महाराष्ट्र के त्र्यंबकेश्वर में बूक की हुई मैरेथॉन रद्द करनी पड़ी| पहला मौका हाथ से गया| लेकीन इसका बहुत ज्यादा बुरा भी नही लगा| पहली बात मेरे विचार में ईवेंटस सिर्फ रिजल्ट डे होते हैं, परिणाम के दिन होते हैं| और परिणाम के दिनों से प्रक्रिया के दिन बड़े होते हैं| मैरेथॉन पूरी करने के स्तर तक मेरा स्टैमिना बढ़ गया था| अगर यह मैरेथॉन बूक नही करता तो वह नही हो पाता| भला मैच चूक गई, लेकीन मै मैच फिटनेस के करीब तो पहुँचा था| खैर|




Wednesday, May 15, 2019

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी: १० फुल मैरेथॉन फिटनेस के करीब

१० फुल मैरेथॉन फिटनेस के करीब
 

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अगस्त २०१८ में फुल मैरेथॉन की तैयारी के लिए २५ किलोमीटर और ३० किलोमीटर के लाँग रन्स कर रहा था| सितम्बर के अन्त में फुल मैरेथॉन के लिए बूकिंग किया है| इसी दौरान मुंबई के फुल मैरेथॉन के लिए भी बूकिंग किया| लेकीन इसका उद्देश्य अलग था| पीछली बार २०१८ की मुंबई मैरेथॉन के फोटोज देखे थे तब लोगों को बांद्रा- वरली सी- लिंक पर दौड़ते देखा था| वैसे तो सी लिंक पर कभी साईकिल चलाने की या चलने की अनुमति भी नही होती है| लेकीन मैरेथॉन के समय यहाँ दौड़ सकते हैं| इसलिए इस मैरेथॉन में दौड़ने की इच्छा हुई| साथ ही यह बहुत प्रसिद्ध मैरेथॉन है, इसलिए भी इच्छा थी| जनवरी २०१९ की इस मैरेथॉन का बूकिंग किया था, लेकीन उसके पहले सितम्बर २०१८ की त्र्यंबकेश्वर मैरेथॉन की तैयारी कर रहा था|

५ अगस्त को ३० किलोमीटर दौड़ना था, २५ ही दौड़ पाया और अन्तिम पाँच किलोमीटर चल कर पूरे किए| इससे कुछ बातों पर गौर किया| २८ जुलाई के बाद एक हफ्ते के भीतर यह लम्बी दौड़ की थी| इसलिए अगला बड़ा रन चौदह दिनों के अन्तराल के बाद तय किया| साथ ही इंटरनेट पर कुछ जगह पर यह पढ़ा कि बीच बीच में रनिंग के बजाय कुछ दूरी चल कर पार की, तो उससे पैरों में कम दर्द होता है| इसलिए इस बार योजना बनाई कि हर आठ किलोमीटर के बाद का नौवा किलोमीटर चलूंगा|

Thursday, May 9, 2019

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी ९: लाँग रन्स से दोस्ती

९: लाँग रन्स से दोस्ती

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मई २०१८ में साईकिल यात्रा के बाद जून २०१८ में नियमित रनिंग शुरू की| लगातार छोटे रन शुरू किए| लगातार रन करने का लाभ यह होता है कि पैर बिल्कुल ढिले हो जाते हैं, रनिंग के मसल्स चुस्त हो जाते हैं| फरवरी से जो स्ट्रेंदनिंग शुरू किया था, उसका भी अब अच्छा लाभ मिल रहा है| इसी दौरान चलने के बारे में‌ भी बहुत कुछ पता चला| इससे समझ आया कि चलना- वॉकिंग इस तरह का व्यायाम है जिसे बिल्कुल भी ग्लैमर नही है| लेकीन है तो यह गज़ब का व्यायाम| एक तरह से रनिंग और साईकिलिंग का बेस यही है| मैने उसे जैसे समझा वह कुछ ऐसा है| रनिंग में और कुछ हद तक साईकिलिंग में भी जो ऊर्जा व्यय होती है, वह एक तरह से अधिक उपर से लिए जानेवाले इंटेक की होती है; स्टोअर्ड फैटस उसमें ज्यादा बर्न नही होते हैं| क्यों कि रनिंग और कुछ हद तक साईकिलिंग भी एक रिगरस गतिविधि है, ज्यादा थकानेवाली गतिविधि है, इसलिए शरीर को तुरन्त ऊर्जा चाहिए होती है जो बाहर के पदार्थों से मिलती है| इसकी तुलना में वॉकिंग एक कम थकानेवाली सामान्य गतिविधि है और इसमें शरीर स्टोअर्ड फैटस का इस्तेमाल करता है| इसलिए एक तरह से फैटस को बर्न करने के लिए वॉकिंग बेहतर है| और दूसरा लाभ यह है कि वॉकिंग में हृदय की गति उतनी तेज़ नही होती है जितनी रनिंग में होती है| और अगर हृदय की कम गति पर हम खुद को अभ्यास दे, तो हृदय की गति कम होने की रेंज बढ़ती है| मानो अगर हम लो- इंटेन्सिटी अभ्यास करते हैं, तो हमारी इंटेन्सिटी क्षमता बढती जाती है| इसलिए रनिंग में भी स्लो रनिंग को महत्त्व दिया जाता है| स्टैमिना और एंड्युरन्स इसीसे बढ़ता है| और तीसरी सबसे बड़ी बात यह है कि वॉकिंग से पैरों के मसल्स को अलग किस्म का व्यायाम मिलता है, वे और फुर्तिले, ढिले हो जाते हैं| इसलिए रनिंग के साथ वॉकिंग बहुत रूप से जुड़ा है, उसमें पूरक है|

संयोग से इसी समय मेरी बेटी को स्कूल बस पर रिसीव करने के लिए मै जाने लगा| वहाँ पर बस की प्रतीक्षा के लिए थोड़ी देर रूकना पड़ता है|‌ उस समय में भी बैठने के बजाय या खड़े रहने के बजाय बस आने के स्थान के पास १०० मीटर तक चलना शुरू किया| इससे मुझे चलने का बहुत अच्छा अवसर मिला| लोग जैसे छोटी दूरी के लिए गाड़ी नही निकालते हैं, वैसे मैने भी छोटी दूरी के लिए 'साईकिल' निकालना बन्द किया और जहाँ मौका मिले चलना शुरू किया| चलने की और एक खास बात यह है कि यह ऐसा व्यायाम है जो 'कहीं भी और कभी भी' किया जा सकता है| इसलिए जब भी साईकिलिंग/ रनिंग में गैप होती हो, तो भी चलना जारी रहा| बहुत हद तक वह रनिंग/ साईकिलिंग में सहयोगी है, इसलिए उससे भी लाभ मिलता रहा|

Monday, May 6, 2019

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी ८: हाफ मॅरेथॉन से आगे का सफर

८: हाफ मॅरेथॉन से आगे का सफर

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फरवरी २०१८ में हाफ मैरेथॉन ईवेंट बेहतर तरीके से हुआ| अब निगाहें है फुल मैरेथॉन पर| लग रहा है कि जब सवा दो घण्टों में हाफ मैरेथॉन कर सकता हूँ, तो फुल मैरेथॉन भी कट ऑफ (७ घण्टे) के भीतर आराम से कर लूंगा| पहले तो फुल मैरेथॉन के डेटस देखे| पहला ओपन बूकिंग जून में था वो भी सातारा नाईट मैरेथॉन का| तब मेरे परिचित दिग्गज रनर्स का मार्गदर्शन लिया| और धीरे धीरे उनके मार्गदर्शन में कई सारी चीजें पता चली| और इसके साथ हाफ मैरेथॉन तक मेरी जो यात्रा बहुत अर्थ में ad hoc थी, वह धीरे धीरे व्यवस्थित होने लगी| मेरे रिश्तेदार और दिग्गज रनर परागजी जोशी ने मुझे विस्तार से बताया और कहा कि फुल मैरेथॉन के लिए मुझे पहले कोअर- स्ट्रेंदनिंग करना चाहिए| दौड़ने में शरीर के जो मुख्य अंग होते हैं- उन्हे मजबूत करना चाहिए| उसके लिए इंटरनेट पर विडियो देखे और जल्द ही वह करने लगा| स्टैमिना/ एंड्युरन्स सिर्फ ऊर्जा की नही, बल्की मसल्स मजबूत होने की भी बात है| इसके लिए उन मसल्स को सही‌ व्यायाम दे कर तैयार करना जरूरी होता है|

शुरू में ये एक्सरसाईज बहुत कठिन लगे| लेकीन ७- मिनट के ये एक्सरसाईज धीरे धीरे ठीक से करने लगा| और कुछ दिनों में उनके परिणाम भी मिले| मानो ऐसा लगा कि अगर ये एक्सरसाईज नियमित अन्तराल से (हफ्ते में दो- तीन बार) करता रहूँ, तो रनिंग में कुछ गैप हुआ, तो भी वह महसूस नही हो रहा है| मै जो ७ मिनट के ७ एक्सरसाईजेस कर रहा था वे ये थे- ४५ सेकैंड के स्ट्रेंदनिंग- बॉडी वेट स्क्वॅटस, बॅकवर्ड लंज, साईड लेग रेझ, प्लँक, साईड प्लँक, ग्लूट ब्रिज, बर्ड- डॉग एक्सरसाईजेस| हर एक्सरसाईज के बाद १५ सेकैंड का विराम| इसमें बहुत विविधताएँ भी हैं, विकल्प भी हैं| मुझे जो ठीक लगे, वो मै करता गया| उसके साथ योग- प्राणायाम- ध्यान में भी नियमितता लाई| क्यों कि सिर्फ वर्क- आउट करना ठीक नही, उसे सन्तुलित करने के लिए वर्क- इन भी करना चाहिए| साईकिलिंग तो चल ही रहा है|

Thursday, May 2, 2019

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी ७: पहली और अन्तिम हाफ मैरेथॉन ईवेंट

७: पहली और अन्तिम हाफ मैरेथॉन ईवेंट

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नवम्बर २०१७ में अच्छे समय में सोलो हाफ मैरेथॉन दौड़ने के बाद फुल मैरेथॉन का इन्तजार था| लेकीन उस समय मेरी एक साईकिल यात्रा की तैयारी चल रही थी| इसलिए कुछ दिनों तक सिर्फ छोटे रन्स पर ही ध्यान दिया| फुल मैरेथॉन के लिए सात घण्टों का कट ऑफ समय होता है, इसलिए मन में लगता था कि जब ढाई घण्टों में आधी दूरी पार हो रही है, तो बाकी दूरी भी समय में ही पूरी हो सकती है| लेकीन यह सिर्फ एक भ्रम था| अभी फुल मैरेथॉन के लिए बहुत बड़ी यात्रा करनी बाकी थी| जनवरी २०१८ में जिस साईकिल यात्रा की योजना थी, उसे कुछ कारण से ऐन समय पर रद्द करना पड़ा| लेकीन उस यात्रा की तैयारी में जो सीखने को मिला, वह तो लाभ रहा| और रनिंग भी उसी की तैयारी का एक हिस्सा था| जब वह यात्रा न हो पाई, तब पहली बार हाफ मैरेथॉन ईव्हेंट के बारे में सोचा| और जल्द ही ११ फरवरी २०१८ को हाफ मैरेथॉन के लिए रजिस्ट्रेशन भी किया| उसके लिए कोई क्वालिफिकेशन नही होता है (कुछ ईव्हेंटस में होता भी है, ऐसा बाद में पता चला)| इसकी तैयारी के लिए मेरे पास बीस दिन हैं|

रनिंग ठीक कर तो पाता हूँ, लेकीन अभी इसमें उतना नियमित नही हूँ| हफ्ते में सिर्फ दो बार और महिने में सात- आठ बार दौड़ता हूँ| हालांकी साईकिल- योगा भी करता हूँ, जो रनिंग में लाभ देते हैं| जब हाफ मैरेथॉन का बूकिंग किया, तब रनिंग में नियमितता लाई| कुछ छोटे रन किए और फिर एक बार हाफ मैरेथॉन के लिए निकला| हाफ मैरेथॉन इवेंट के पन्द्रह दिन पहले की यह दौड़ कुछ अलग रही| एक तरह से काफी गलतियाँ भी हुई| फिर समझ में आया कि मै हाफ मैरेथॉन को बड़ा ही छोटा मान रहा था, नियमितता कम थी, इसलिए तकलीफ हुई| एक तो इस हाफ मैरेथॉन के लिए कट ऑफ लिमिट से अधिक समय लगा, २:४५ के बजाय २:४८ समय लगा जिससे कुछ दर्द हुआ| इसके साथ अन्त में रफ्तार भी कम हुई थी, तकलीफ भी हुई थी और अन्तिम चारसौ मीटर चलने की नौबत आई थी| इसके बाद काफी कुछ सोचा| मेरे रनिंग के गुरू और मित्र संजय बनसकर जी से मार्गदर्शन लिया| उन्होने हाफ मैरेथॉन लगभग दो घण्टों में की है| उनके साथ चर्चा करते हुए कुछ बातें समझ में आई|




Tuesday, April 30, 2019

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी ६: हाफ मैरेथॉन का नशा!

६: हाफ मैरेथॉन का नशा!

डिस्क्लेमर: यह लेख माला कोई भी टेक्निकल गाईड नही है| इसमें मै मेरे रनिंग के अनुभव लिख रहा हूँ| जैसे मै सीखता गया, गलती करता गया, आगे बढता गया, यह सब वैसे ही लिख रहा हूँ| इस लेखन को सिर्फ रनिंग के व्यक्तिगत तौर पर आए हुए अनुभव के तौर पर देखना चाहिए| अगर किसे टेक्निकल गायडन्स चाहिए, तो व्यक्तिगत रूप से सम्पर्क कर सकते हैं|

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सिंहगढ़ पर रनिंग करने के बाद और हौसला आया| धीरे धीरे रनिंग के तकनिकी पहलू भी सीखने लगा| इसमें सुधार के लिए बहुत अवसर है| जब हर्षद पेंडसे जी से मिला था, तब उन्होने मेरा रनिंग देख कर कहा भी था कि यह तो वॉकिंग का ही पोश्चर है| उन्होने और भी बातें बताई थी| इन सब बातों के कारण रनिंग धीरे धीरे बेहतर होने लगा| और आसानी से ११ किलोमीटर और १५ किलोमीटर दौड़ पा रहा हूँ| अब इन्तज़ार है पहली हाफ मैरेथॉन का जो मै कट ऑफ समय के भीतर पूरी करूँगा! इन दिनों एक बार जब रनिंग के लिए निकला था, तो एक बहुत अद्भुत अनुभव आया| बरसात का मौसम समाप्त होने के बाद सर्दियाँ हुई| भोर के अन्धेरे में रनिंग जब कर रहा था, तब घना कोहरा मिला| इतना घना कोहरा कि बीस कदम पीछे का कुछ भी नही दिख रहा है और आगे का भी कुछ नही दिख रहा है! बस बीस कदम की दूरी तक ही नजर जा पा रही है|

एक अर्थ में यह अनुभव अध्यात्म या ध्यान जैसा लगा! क्यों कि अध्यात्म या ध्यान में हमारी सजगता सिर्फ 'अभी और यहीं' पर रूकती है| विगत समय और भविष्य- दोनों से कोई सम्बन्ध नही होता है| सिर्फ इस क्षण की सच्चाई ही नजर में होती है| एक अर्थ में ध्यान के समय हमारा कोई आगा भी नही होता है और पीछा भी नही होता है! ध्यान तो बस वर्तमान का क्षण, वर्तमान का स्थान! घने कोहरे के बीच हाथ में मोबाईल की रोशनी में दौड़ते समय ठीक ऐसा ही लगा| पीछे देखने पर कुछ भी नही है और आगे भी कुछ भी नही है! अवाक् कर देनेवाला अविस्मरणीय अनुभव रहा!


Saturday, April 27, 2019

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी ५: सिंहगढ़ पर रनिंग!

५: सिंहगढ़ पर रनिंग!
 

डिस्क्लेमर: यह लेख माला कोई भी टेक्निकल गाईड नही है| इसमें मै मेरे रनिंग के अनुभव लिख रहा हूँ| जैसे मै सीखता गया, गलती करता गया, आगे बढता गया, यह सब वैसे ही लिख रहा हूँ| इस लेखन को सिर्फ रनिंग के व्यक्तिगत तौर पर आए हुए अनुभव के तौर पर देखना चाहिए| अगर किसे टेक्निकल गायडन्स चाहिए, तो व्यक्तिगत रूप से सम्पर्क कर सकते हैं|

इस लेख माला को शुरू से पढने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए|अगस्त २०१७ के अन्त में पहली निजी हाफ मैरेथॉन पूरी की| इससे काफी कुछ हौसला मिला| हालांकी अभी बहुत कुछ बाकी भी है| जैसे २१ के बजाय १९ किलोमीटर तक ही‌ दौड़ पाया था और समय भी बहुत ज्यादा लगा| जैसे जैसे रनिंग करता रहूँगा, वैसे इसमें सुधार होगा| लेकीन चाहे समय अधिक लगा हो, इस दौड़ से ज्यादा दूरी दौड़ने का हौसला जरूर आया| और यह सिर्फ शारीरिक नही‌ होता है| मन का टेंपरामेंट भी धीरे धीरे ही‌ आता है| किसी भी चीज़ को आगे बढ़ाना हो, तो उसके लिए कुछ उद्देश्य मन में रखने चाहिए| क्यों कि अक्सर अगर हमारे सामने टारगेट हो, तो ही हम कोशिश करते हैं| शायद मेरे सामने साईकिलिंग में सुधार करने का टारगेट न होता, तो मै कभी रनिंग भी नही करता!





Sunday, March 31, 2019

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी ४: पहली निजी हाफ मॅरेथॉन

डिस्क्लेमर: यह लेख माला कोई भी टेक्निकल गाईड नही है| इसमें मै मेरे रनिंग के अनुभव लिख रहा हूँ| जैसे मै सीखता गया, गलती करता गया, आगे बढता गया, यह सब वैसे ही लिख रहा हूँ| इस लेखन को सिर्फ रनिंग के व्यक्तिगत तौर पर आए हुए अनुभव के तौर पर देखना चाहिए| अगर किसे टेक्निकल गायडन्स चाहिए, तो व्यक्तिगत रूप से सम्पर्क कर सकते हैं|

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अगस्त २०१७ में हर्षद पेंडसे जी  सामाजिक अभियान चला रहे थे और लदाख़ में खर्दुंगला चैलेंज में ७२ किलोमीटर दौडनेवाले थे| उसमें सहभाग लेने के साथ मुझे भी कम से कम २१ किलोमीटर दौड़ने की इच्छा हुई| इस बहाने रनिंग में कुछ नियमितता भी आई| कई बार ११ किलोमीटर दौडा, छोटे छोटे ५ किलोमीटर के भी कई रन किए| अन्त में २७ अगस्त को परभणी में २१ किलोमीटर अर्थात् हाफ मैरेथॉन की दूरी दौड़ने की योजना बनाई| मेरे साथ परभणी के संजयराव बनसकर सर भी तैयार हुए| उनके और एक मित्र भी‌ तैयार हुए| अगस्त में लगभग आठ- नौ रन किए, जिससे रनिंग का थोड़ा मूमेंटम बना| २६ अगस्त को परभणी की यूनिवर्सिटी में छोटी दौड़ की- ५.५ किलोमीटर की| यहाँ पर पहली बार मेरी स्पीड ८ किलोमीटर प्रति घण्टा आई! अब २१ किलोमीटर दौड़ने का हौसला आया|

Thursday, March 28, 2019

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी ३: धिमी रफ्तार से बढते हुए

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जून २०१७ की गर्मी में बहुत दिनों के बाद रनिंग किया| रनिंग सीख तो गया हूँ, लेकीन फिर भी अभी भी इतना आसान नही लगता है| जैसे साईकिल कभी भी चला सकता हूँ, सोचने की भी जरूरत नही है, वैसे रनिंग का नही है| लेकीन एक बार जिस चीज़ का स्वाद मिला हो, उसे कैसे छोड सकते हैं... इसलिए अगस्त में रनिंग में कुछ नियमितता आ गई| और मेरा रनिंग नियमित और अधिक व्यवस्थित होने में दो रनर मित्रों का बहुत योगदान रहा| उनके बारे में भी बताता हूँ| परभणी के एक मित्र हैं- संजयराव बनसकर जी| पेशे से स्कूल के शिक्षक हैं, लेकीन दिल से बहुत कुछ हैं! वे मेरे रनिंग के मित्र और मार्गदर्शक बने| हालांकी उनके साथ रनिंग करना कठीन था, क्यों कि वे तो मलझे हुए रनर थे| और मै बिल्कुल नौसिखिया था| फिर भी उनके साथ दौड़ने से हौसला बढ़ा| एक तरह से पार्टनरशिप सी शुरू हुई| रनिंग करने की मन की तैयारी होती गई|





Friday, January 25, 2019

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी २: लडखडाते कदम

२: लडखडाते कदम
 

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मार्च २०१६ में एक साईकिल यात्रा की तैयारी के लिए पहली बार रनिंग शुरू की| इसमें बहोत सारी दिक्कतें आई| कई सालों से मेरी माँ कहती थी, भोर दौड़ने जाओ, लेकीन कभी मन नही हुआ| लेकीन जब २०१३ में साईकिल शुरू की थी, तब धीरे धीरे फिटनेस के प्रति लगाव होने लगा| बाद में साईकिल के ग्रूप्स में कई लोग रनिंग करते नजर आते थे| और साईकिल चलाने में स्टॅमिना बढ़ाने की बहुत इच्छा थी| तब जा कर रनिंग करना तय किया| क्यों कि रनिंग में कम समय में ही ज्यादा एनर्जी लगती है| आम भाषा में तो साईकिल चलाने से दोगुनी ऊर्जा लगती है| इसलिए अगर रनिंग का अभ्यास किया तो स्टॅमिना बढता है| और अगर रनिंग का अच्छा अभ्यास हुआ, रनिंग से स्टॅमिना बढा तो साईकिल चलाने में आसानी होती है| क्यों कि शरीर अगर अधिक थकान को आदि हो गया तो फिर साईकिल में वह कम थकता है| इस सोच से मार्च २०१६ में रनिंग का आगाज़ किया|

Monday, January 21, 2019

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी १: ए दिल है मुश्किल जीना यहाँ, जरा हट के जरा बच के ये है बम्बे मॅरेथॉन!!

१: ए दिल है मुश्किल जीना यहाँ, जरा हट के जरा बच के ये है बम्बे मॅरेथॉन!!
 

 नमस्ते! कल २० जनवरी को मुंबई में मैने मेरी पहली मॅरेथॉन की| ४२ किलोमीटर दौडने के लिए ५ घण्टे १४ मिनट लगे| बहुत अद्भुत अनुभव रहा! बहुत रोमांचक और विलक्षण माहौल था| इस अनुभव के बारे में और मेरी भाग- दौड की यात्रा कैसी शुरू हुई, इसके बारे में‌ विस्तार से लिखूँगा|

मेरी भागने की- रनिंग की यात्रा साईकिल के कारण ही‌ शुरू हुई| साईकिल अच्छी चलाने के लिए स्टैमिना बढ़ाना चाहता था| इस कारण एक साईकिल एक्स्पिडीशन की तैयारी के लिए २०१६ में रनिंग शुरू की| बाद में वह एक्स्पिडीशन तो नही हो पाई, लेकीन रनिंग जारी रही| धीरे धीरे इसके गुर्र सीखता चला गया, बाद में हाफ मैरेथॉन की और अब फुल मॅरेथॉन! मेरी यात्रा बताने के पहले कल के अनुभव के बारे में बताना चाहूँगा|

टाटा मुंबई मॅरेथॉन! वास्तव में धावक या रनर्स लोगों का एक मेला! इस पुरी ईवंट में ४६ हजार से अधिक रनर्स आए थे| उनमें से ८७०० रनर्स फुल मॅरेथॉन के लिए दौड़े! इस मॅरेथॉन में भाग लेने के पीछे मेरा कारण समुद्र तट के पास और खास कर मुंबई के सी- लिंक पर दौड़ना यह था| हाफ मॅरेथॉन पूरी करने के बाद इस फुल मॅरेथॉन के लिए क्वालिफाय हुआ| वैसे तो मॅरेथॉन का मतलब फुल मॅरेथॉन ही होता है| लेकीन कई बार लोग हाफ मॅरेथॉन को भी मॅरेथॉन कहते हैं या किसी ने दस किलोमीटर के रन में हिस्सा लिया हो तो उसे भी मॅरेथॉन कहते है जो कि गलत है| इसलिए फुल मॅरेथॉन कह रहा हूँ|